Gulabkothari's Blog

सितम्बर 14, 2015

धर्म को धर्म रहने दें-2

जैन धर्म का मूल अहिंसा है। यहां यह ध्यातव्य है कि अहिंसा के पालन के लिए अथवा धर्म के किसी भी सिद्धान्त के पालन के लिए बल का प्रयोग स्वयं में एक हिंसा है। धर्म स्वैच्छिक है, उसे किसी पर लादना नहीं चाहिए। यह सभी जैन आचार्यो का मत है।

जो यह चाहे कि मांसाहार का प्रयोग न किया जाए क्योंकि इसमें पशु के प्रति क्रूरता होती है वे पशु के प्रति संवेदनशीलता जगाने के लिए अधिकाधिक प्रेरणा दें-यह धर्मसम्मत मार्ग है किन्तु किसी को मांस न खाने के लिए कानून बनाकर मजबूर किया जाए यह धर्म का मार्ग नहीं क्योंकि इसमें बल का प्रयोग किया जा रहा है।

वस्तुत: जैनों को मांसाहार के विरूद्ध सारे तर्क देकर लोगों को मांस छोड़ने की प्रेरणा देनी चाहिए। यह उनका मौलिक अधिकार है कि वे अपनी धार्मिक मान्यता का प्रचार करें किन्तु इसके लिए किसी कानून का सहारा लेना धर्म की दृष्टि से उचित नहीं।

जहां तक मांसाहारियों का प्रश्न है उन्हें मांसाहार के विरोधियों की भावना का सम्मान करते हुए स्वेच्छा से पर्यूषण के दिनों में मांसाहार का त्याग करने की घोषणा कर देनी चाहिए। इस छोटे से त्याग के बदले उन्हें न केवल जैन प्रत्युत अजैन शाकाहारियों की भी सद्भावना का अमूल्य उपहार प्राप्त होगा। जैसा कि सदियों से होता रहा है।

चाहे मांसाहार विरोधी हों अथवा मांसाहारी हों-दोनों को ही एक-दूसरे के प्रति सद्भावना स्थापित करनी चाहिए। दुर्भावना तो किसी भी स्थिति में देश के लिए इष्ट नहीं है।

महावीर ने कहा कि जीव भारी होता है प्रणतिपात से, हिंसा करने से। जीव भारी होता है हिंसा की स्मृति से। हिंसा की स्मृति ही वास्तविक हिंसा है। क्रियमाण हिंसा उतनी बड़ी नहीं है। हिंसा के संस्कार की स्मृति बड़ी हिंसा है। वही हमें भारी बनाती है। हमारी हिंसा उस स्मृति को और भारी बना देती है। यदि मन में हिंसा का संस्कार न हो और हिंसा का संस्कार स्मृति रूप में जाग्रत न हो तो वर्तमान की हिंसा संभव ही नहीं है। जो भी वर्तमान में हिंसा कर रहा है, उसके मन में हिंसा का संस्कार है। उस हिंसा के संस्कार की स्मृति जाग्रत हो रही है। अत: हिंसा का मूल वर्तमान घटना से ज्यादा हिंसा की स्मृति है। घटना तो परिणाम है।

हमारी चेतना जैसे-जैसे जाग्रत होगी, ऊपर उठेगी, हिंसा स्वत: समाप्त हो जाएगी। महाप्रज्ञ ने लिखा था कि हिंसा छोड़ने से समाप्त नहीं होती, करने से समाप्त नहीं होती, केवल चेतना के जागरण से समाप्त होती है। उससे हिंसा का संस्कार समाप्त हो जाता है। न स्मृति रहती है, न ही घटना। हमारी भौतिकता के तल में छिपी हुई कोई ऎसी प्रखर ज्योति है जो निर्णय ले रही है और वह निर्णय हमारे बाहर तक पहुंच रहा है। भीतर हमारा अस्तित्व होता है- मैं हूं। बाहर हमारा व्यक्तित्व रहता है-“मैं” विशिष्ट हूं। “मैं” सदा बाहर देखता है। “हूं” भीतर देखता है।

शास्त्र की भाषा में कहें तो भाव-हिंसा मुख्य है, द्रव्य हिंसा नहीं। बलपूर्वक यदि द्रव्य हिंसा रोक भी दी जाए तो भाव-हिंसा तो प्रज्ञा के जागरण से ही रूकती है, न कि किसी कानून के द्वारा। सच्ची अहिंसा तो तब है जब भाव हिंसा अर्थात् मान, माया, क्रोध, लोभ की कषाय मन्द हो। स्पष्ट है कि यह समझ पैदा होने पर ही सम्भव है, कानून के बनाने से नहीं और यही सच्चा अहिंसा धर्म है।

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