Gulabkothari's Blog

जनवरी 4, 2016

बेहोश लोकतंत्र

लोकतंत्र करवटें बदल रहा है। जनता का धन, सरकार के द्वारा, सरकार के लिए। सारी देवतुल्य जनसेवकों की सेना आसुरी होती जा रही है। रसातल में पहुंच चुकी है। पाताल दूर नहीं है। मोदी जी का नारा ‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा’ अब बदल गया लगता है। अब लगता है ‘अकेले नहीं खाने दूंगा’ जैसा बन रहा है।

कैसे-कैसे चौंकाने वाले तथ्य उजागर होते जा रहे हैं। रिफाइनरी द्रोपदी के चीर सी खिंच रही है। अब तो छोटी लगने की चर्चा भी सुनाई पड़ रही है। रिसर्जेंट होते हैं पर एमओयू जमीन पर नहीं आते। रीको के औद्योगिक क्षेत्रों में आवास बन रहे हैं। उसके बाद भी सरकार उद्योगों के लिए नई जमीन अवाप्त कर रही है। बंद उद्योगों से जमीन वापस लेने की इच्छाशक्ति दिखती ही नहीं। बेतहाशा नित नई सड़कों का निर्माण, चौड़ीकरण जैसे कार्यों में जितनी जमीन मौत के मुंह में जा रही है और जितनी खेती उजड़ रही है, मानो बच्चों का खेल है। फिर जरूरत पड़ी तो किसी भी बस्ती को उजाड़कर सड़कें निकाली जा सकती हैं। उसी सरकार के कुछ चहेते नेता राष्ट्रीय राजमार्गों पर अतिक्रमण के लिए कुख्यात हैं। अब रिसर्जेंट  राजस्थान के एमओयू नई जमीन के आवंटन की कतार में खड़े हैं।

लोकायुक्त लिख रहे हैं कि बड़े-बड़े पदों पर बैठे अधिकारी प्रथम दृष्टया खुलेआम भ्रष्टाचार में लिप्त जान पड़ रहे हैं। उनको तो जेल में होना चाहिए। उधर उद्योग सचिव कह रहे हैं कि ये अफसर तो कानून से भी बड़े हैं। सरकार तो उपहार स्वरूप मुख्य सचिव का कार्यकाल तक बढ़ा चुकी है। कार्यपालिका को धिक्कार है। न्यायपालिका मौन है। जब पूर्व मुख्यमंत्री भी सरकार पर सीधे आरोप लगा रहे हैं, मुख्यमंत्री के विरुद्ध भी नामजद भ्रष्टाचार के आरोप लगा रहे हैं, कह रहे हैं कि उनको तो जेल में होना चाहिए, तब क्या लोकतंत्र नंगा नहीं हो रहा? क्या पूर्व मुख्यमंत्री की बात को अनसुना करना लोकतंत्र को गौरवान्वित करेगा?

गहलोत जी तो यहां तक कह गए कि दो साल में यदि कहीं कोई विकास हुआ तो केवल धौलपुर पैलेस का। माना कि धौलपुर पैलेस का मुद्दा संसद के हवाले हो गया। प्रधानमंत्री कार्यालय की फाइलों में दब गया। ललित मोदी को लाने के लिए गलीचे बिछाए जा रहे हैं, जयपुर के राजमहल होटल का मुद्दा भी स्वयं पूर्व मुख्यमंत्री उठा रहे हैं। हर तरफ की चुप्पी से क्या कानून और लोकतंत्र खतरे में दिखाई नहीं देता? जो कार्य सर्वोच्च न्यायालय और संसद के अधिकार क्षेत्र में नहीं है, वह जिले की अदालतों से हो रहे हैं। वाह रे कानून के रक्षक नुमाइंदों! पहले भी सरकार ने बड़े-बड़े अधिकारियों के विरुद्ध चलाए गए मामले वापस लिए थे। अब फिर ले लिए लेकिन सब मौन हैं। महामहिम राज्यपाल तक।

आजकल रोज फसल बीमा के मुद्दे मीडिया में छाए हुए हैं। न किसानों की आत्महत्याएं रुकने का नाम ले रही हैं, न ही बीमा कम्पनियों का ताण्डव। यह बात मैंने मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री को भी बताई थी। सरकार, चाहे राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ या कहीं की भी हो, हालात सभी प्रदेशों में एक से हैं। न्याय करने का दम भरने वाले भी किसान के साथ न्याय नहीं कर रहे? सम्पूर्ण लोकतंत्र (तीनों पाये) किसान के जीवन को नकार ही नहीं रहा, उससे खिलवाड़ कर रहा है।

बीमा कम्पनियां फसलों का बीमा करती हैं। पिछले 5-10 सालों के मुआवजे के आंकड़े देखें। शर्तें रोज बदल जाती हैं, ताकि मुआवजा देना ही नहीं पड़े। अभी हाल ही में तापमान की शर्त बदलने का समाचार छपा था। अब तापमान यदि -2.6 डिग्री से नीचे जाएगा, तब ही मुआवजा मिलेगा क्योंकि फतेहपुर में पहुंच चुका है अब तक -1.0 डिग्री ही आधार था।

दूसरी बड़ी बात, नियम शर्तें सब अंग्रेजी में, छोटे अक्षरों में छपी रहती हैं। साधारणतया किसान तो अनपढ़ होता है। आप कोई भी नियम दिखाकर उसका मुआवजा रद्द कर सकते हैं। मध्यप्रदेश में तो आतंक यहां तक भी है कि बीमा करवाना ही पड़ेगा। विभाग खुद दबाव बनाता है। बैंक की किस्तों में से पहले बीमा की किस्तें भरी जाती हैं। बैंक में उधार का और ब्याज का आंकड़ा बढ़ता जाता है। परिस्थितियां तो सब जगह एक ही हैं। बीमा कम्पनियां राष्ट्रीय स्तर की भी और कुछ सरकारी भी होती हैं। आज तो लगता है कि विष्णु के कल्कि अवतार आने तक किसान मरते ही रहेंगे।

चाहे राजस्थान की तकदीर बदलने का भरोसा जगाने वाली रिफाइनरी को लगाने में देरी की बात हो या बिना विचारे तेजी से आगे बढ़ विरासत को बर्बाद कर रही मेट्रो का मुद्दा। या फिर खनन का खेल, अतिक्रमण, आबकारी, भू-माफिया, अपराध, हथियार और मादक पदार्थों का आतंक, सभी कुछ तो धृतराष्ट्र की सरकार के आश्रय में आने वाली पीढिय़ों को ध्वस्त कर रहे हैं। क्या मुगल या अंग्रेज ज्यादा खराब थे? वन्य जीवों के साथ खिलवाड़, वनों में निर्माण, स्थानीय निकायों से उठता विश्वास, सभी को एक ही आस-न्यायपालिका से। ईश्वर से यह प्रार्थना है कि यह आस न टूट जाए। सरकारें टूटती जाएं, बदलती जाएं।

टिप्पणी करे »

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं ।

RSS feed for comments on this post. TrackBack URI

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

वर्डप्रेस (WordPress.com) पर एक स्वतंत्र वेबसाइट या ब्लॉग बनाएँ .

%d bloggers like this: