Gulabkothari's Blog

अप्रैल 22, 2016

ऑर्डर, ऑर्डर…!

लातों के भूत बातों से नहीं डरते। आज सत्ताधीश स्वयं को राजा ही मान रहे हैं। उनका अहंकार एवरेस्ट से ऊंचा है। यही हाल उनके निजी स्वार्थ और महत्वाकांक्षा का है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है कि सत्ता का तंत्र तो लोक से अनभिज्ञ हो गया। सत्ता के एक तिहाई भाग- न्यायपालिका को भी लगभग सत्ता से बाहर करने की जी-तोड़ कोशिश हो रही है। इसी कारण देश की एकता और अखण्डता की जड़ें पूरी तरह हिलने लगी हैं या सत्ता की कुल्हाड़ी (वोट बैंक के नाम पर) चलाई जा रही है। ये वे ही लोग हैं जिनको जनता ने सत्ता में बिठाया।

सत्ता ने न्यायपालिका को ठेस लगाने में कसर नहीं छोड़ी। केन्द्र तथा राज्यों ने सुप्रीम कोर्ट तथा विभिन्न हाईकोट्र्स के कई फैसलों को लागू ही नहीं किया। उलटे न्यायपालिका के प्रति आक्रामक हो गए। देश के हित में अब जाकर ‘अच्छे दिनों’ की शुरुआत हुई लगती है। न्यायपालिका ने करवट बदली है, आंखें तरेरी हैं, खरीद-बेच को ठुकराकर, असुरक्षा का खतरा मोल लेते हुए जो फैसले दिए हैं, उसके लिए साधुवाद! साधुवाद!!

केन्द्र सरकार भी जनता की चुनी हुई सरकार ही है। उत्तराखण्ड में राष्ट्रपति शासन की समीक्षा करने का अधिकार कोर्ट को नहीं मानता केन्द्र। न्यायपालिका ने पहली बार एक बड़ा तमाचा जड़ दिया। कोर्ट ने कह दिया कि ‘यह राजा का निर्णय नहीं है जिसकी समीक्षा न हो सके।’ लोकतंत्र के आबाद होने का बड़ा संकेत है। गुजरात को जिस प्रकार आड़े हाथों लिया, यह भी केन्द्र की ओर ही इंगित करता है। गुजरात के बारे में एक कहावत हो गई है कि गुजरात मोदी का पीहर है। उपरोक्त दोनों ही फैसलों पर अभी न्यायपालिका को संघर्ष करना है। क्योंकि कोई सरकार कितनी भी लोकतंत्री होने का दंभ भरे, मीडिया और न्यायपालिका को विरोधी भाषा बोलने का अधिकार नहीं देती है। इस देश का प्रिंट मीडिया तो वर्षों से इस लाचारी को भोग रहा है। न्यायाधीश लाचार नहीं होता।

यह सच है कि न्यायपालिका समय के साथ सक्रिय होती जा रही है। हाल ही राष्ट्रपति ने कहा है कि ‘लोकतंत्र के सभी अंगों को अपने दायरे में रहकर काम करना चाहिए।’ इसी कार्यक्रम में उन्होंने यह भी कहा कि ‘न्यायाधीशों को न्यायिक सक्रियता के जोखिमों के प्रति सावधान रहना चाहिए। न्यायिक समीक्षा बुनियादी ढांचे का हिस्सा है। इसमें बदलाव नहीं किया जा सकता। न्यायपालिका की न्यायिक समीक्षा के प्रभावकारी होने को इसी से सुरक्षित किया जा सकता है।’ राष्ट्रपति को इतना कहने की आवश्यकता क्यों हुई? केन्द्र में तो वे उम्र गुजार चुके हैं। आज भ्रष्टाचार जिस चरम पर है, निजी महत्वाकांक्षाएं संविधान को नकारते हुए, पुरानी सामंती व्यवस्था में दहाड़ रही हैं। जनता डरी-सहमी है। भूखी है- प्यासी है। आश्वासनों के सहारे दिन काट रही है कि ‘अच्छे दिन’ आएंगे।

भ्रष्टाचार ही सत्ता के अच्छे दिनों का प्रतीक है। मेरे अलावा कोई मेरा विरोधी भ्रष्ट है तो मैं उसे नहीं छोडूंगा। सुप्रीम कोर्ट का यह कहना कि ‘भ्रष्टाचार के आधार पर सरकारों को बर्खास्त किया गया तो कोई सरकार नहीं बचेगी’ बहुत साहसपूर्ण प्रतिक्रिया है। राजनीति का पूरा खुलासा कर दिया। जैसे नवरात्रि उत्सव के बाद शक्ति का जागरण होता है, वैसे ही न्यायपालिका नए सिरे से, संकल्पवान होकर चल पड़ी है।

यह संकल्प नीचे की अदालतों तक भी पहुंचे और वे भी संकल्पवान हों। कहते हैं- चोरी का माल मोरी में- भ्रष्टाचार की कमाई खानदान तथा भावी पीढि़यों के लिए भी अपशकुन है। सूखे से निपटने पर जब केन्द्र ने धन देकर पल्ला झाड़ना चाहा तो सुप्रीम कोर्ट बीच में आ गया। कोर्ट ने कहा- ‘सूखे की स्थिति का अनुमान लगाने, सूखे से निपटने के प्रयासों का प्रबंध करने और सूखे के असर को कम करने की पूरी जिम्मेदारी केन्द्र सरकार की है।’ ये कुछ ऐसे बड़े फैसले हैं, जिन्हें ‘कुछ’ न्यायाधीश टाल देते हैं।

कई मुकदमे न्यायालयों में इसलिए भी पड़े रहते हैं क्योंकि न्यायाधीश सत्ता पक्ष के खिलाफ फैसला नहीं करते। तारीखें पड़ती हैं बस! राजस्थान की राजधानी जयपुर में मेट्रो के कारण 300 साल पुरानी विरासत का गला भी सत्ता के अहंकार ने घोंट दिया। न्यायालय कुछ भी नहीं बिगाड़ सके। पुरातत्व के अधिकारी गुलछर्रे उड़ा रहे हैं। उनको भी पता है कि राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले के बाद भी रामगढ़ बांध सूखा पड़ा है। सैकड़ों फैसले धूल चाट रहे हैं।

लगता है समय बदल रहा है। एक ओर युवा जाग उठा है। धर्म-सम्प्रदाय बौने होते जा रहे हैं, भ्रष्ट राजनेता जल्दी ही घर लौटेंगे। दूसरी और न्यायालय यदि ठान ले तो ‘भ्रष्ट और जनहित के खिलाफ काम करने वाली कोई सरकार नहीं बचेगी’।
(कल पढ़ें- हमारी आपकी जिम्मेदारी)

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