Gulabkothari's Blog

मई 9, 2016

समाधान दे कुंभ

भारत एक विशाल देश है। लगभग दो-दो हजार मील लम्बा-चौड़ा, इतनी भाषाएं, भौगोलिक एवं सांस्कृतिक विभिन्नताएं और ये सब एक सनातन धर्म अथवा जीवनशैली के धागे में पिरोए हुए मणिए। यह हमारा दुर्भाग्य है कि इस देश के संविधान को धर्मनिरपेक्ष बनाकर धर्म को जीवन से बाहर कर दिया। यही कारण है कि आज वेद, पुराण, उपनिषद् आदि सभी साम्प्रदायिक कहलाने लग गए। धर्म तो सबका एक ही है- मानव धर्म। सम्प्रदाय हमारे यहां ही हजारों हैं। धर्म जहां ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य तथा अर्थ, काम, मोक्ष का आधार है, मुक्त करता है, वहीं सम्प्रदाय बांधता है। जब मैं यह कहता हूं कि मैं जैन हूं तो इसका यह अर्थ भी हो ही जाता है, कि शेष विश्व का अंग नहीं हूं। इससे अधिक और कोई हो भी क्या सकता है? मैं इसी को कट्टरवाद मानता हूं। क्योंकि मैं अन्य किसी धर्म या सम्प्रदाय के बारे में नहीं जानना चाहता। बाईबल, कुरान की आलोचना तो करूंगा किन्तु बिना उनको पढ़े और समझे। मैं किसी अन्य धर्मों के बड़े-बड़े सम्मेलनों में भी नहीं जाता। यही हाल कमोबेश सभी सम्प्रदायों का है।

धर्म के नाम पर जातीय राजनीति भी होने लगी। धार्मिक आयोजनों में संविधान के विरुद्ध राजनीति प्रवेश कर गई। नेता और सन्त एक जैसे हो गए। दोनों के बीच अन्तर घट रहा है। दोनों ही लेने वाले हो गए, देना भूल गए। संवेदनाएं पलायन करने लगीं। व्यापार रह गया। सन्त भी सौदा करने लगे। साधु-साध्वियों का मीडिया रिकॉर्ड प्रमाण है। चरण छूना है तो पहले लिफाफा पकड़ाओ। कष्ट दूर करना है तो लाओ दक्षिणा। वरना हमारे आश्रम तथा आश्रमवासियों, मंडलियों का क्या होगा? यह सब तो जनता के सिर ही है। जैसे सरकारें जनता के सिर पर जीती हैं। दोनों में ही लोकतंत्र एवं सम्प्रदायों के उत्तरदायित्व का बोध लुप्त हो रहा है।

प्रश्न यह उठता है कि देश में हजारों सम्प्रदाय एवं करोड़ों अनुयायी विभिन्न समुदायों में हैं। प्रतिवर्ष चातुर्मास एवं हर चार वर्ष में कुंभ जैसे समागम एवं आदान-प्रदान का वातावरण हमारी व्यवस्था में बना हुआ है। परन्तु इसका लाभ देश को नहीं हो रहा है। हर सन्त भी अपने समुदाय का होकर रह गया है। अपने इसी अहंकार के कारण समाज पर बोझ बन रहा है। संन्यास तो जीवन का स्वर्णकाल है और  उसकी यह दुर्दशा? काले धन वाले तथा बड़े नेता इनके यहां वीआईपी बन गए। मीडिया विशिष्ट हो गया। सन्त लोकेषणा के शिकार हो गए, तब चोला क्यों नहीं बदल लेते?

क्या सन्त समाज के अवदान का ऋण चुकाता है? आज का बड़ा प्रश्न यह है कि देश में लाखों सन्त होने के बाद भी कहीं धर्म दिखाई नहीं दे रहा। क्या सन्तों की सार्थकता इस ह्रास में ही है। आज जो सम्प्रदाय में बड़े सन्त करें, वही धर्म हो गया। कुंभ के बाद सभी सन्त अपने-अपने टोले के साथ आशीर्वाद में हाथ उठाकर चले जाएंगे। मेजबान समाज-प्रदेश ने क्या खोया-क्या पाया यह तो चर्चा में भी नहीं आएगा। दलाल और भ्रष्ट लोग उनको हाइजैक कर लेते हैं।

कुंभ में भी यदि कुछ असहनीय होता है तो वह सन्तों का व्यवहार। शाही स्नान के लिए तलवारें-बर्छे चलना यानी युद्ध का सा दृश्य। क्या यह साधुत्व है? रियासत काल में सुरक्षा कर्मी अखाड़ों से जुड़े थे। वे ही आज साधु हो गए। हथियार नहीं छूटे। हरिद्वार कुंभ में एक वरिष्ठ सन्त की कार के नीचे दबकर एक व्यक्ति की मृत्यु हो गई। उसके ललाट पर कोई शिकन नहीं आई। केवल चमत्कार ही धर्म नहीं है। कुंभ में एक आचार्यों की परिषद् होती है। उसको भी चाहिए कि वह सन्तों की परिभाषा और आचरण को तय करे। कोई साधु स्वतंत्र रूप से, बिना स्वीकृति के व्यक्तिगत चमत्कार के कार्य नहीं करे। आज पूरे विश्व के पर्यटक, शोधकर्ता कुंभ में आते हैं।

प्रत्येक कुंभ के प्रारम्भ में ही यह परिषद् घोषणा भी करे कि कुंभ में आए साधु-सन्त देश और विश्व की किन समस्याओं पर मंत्रणा करेंगे। इसमें देश-विदेश के कौन विशेषज्ञ शामिल होंगे? इसके अलावा यह भी संकल्प करना चाहिए कि जिस राज्य और शहर में कुंभ का आयोजन हो रहा है, के लोगों को क्या मिलेगा? जैसे अभी मध्यप्रदेश और उज्जैनवासियों को सन्तों की उपस्थिति का क्या लाभ होगा? बच्चों तथा महिलाओं को संस्कारित या शिक्षित करेंगे। नवाचार की कक्षाएं, ध्यान शिविर आदि के आयोजन, प्रकृति की जीवन सम्बन्धी जानकारियां देने का संकल्प हो। धर्म को शास्त्रों से बाहर निकालकर सम्प्रदायों में एकता और अखण्डता की लहरें उठ सकें। वर्ना हम समाज के ऋणी रहेंगे।

शिक्षा और विकास के कारण जीवन में जो कमी आती है, उसे धर्म ही पूरा करता है। धर्म आत्मा का विषय है, जो शिक्षा में नहीं होता। अत: कुंभ की समाप्ति से पूर्व इसका आकलन भी हो कि कितना समाज में रूपान्तरण का कार्य हो पाया? यदि परिणाम लक्षित हैं तो प्राप्त भी हो जाएंगे। इसके लिए सन्तों को भी उनकी मर्जी पर नहीं छोडऩा चाहिए। यदि वे संन्यास की मर्यादा से बाहर जाते हैं, राजनीति या सत्ता से जुड़ते जान पड़ते हैं तो उनका दंभ समाज और देश को अपयश ही दिलाएगा।

सवाल नई पीढ़ी के पाले में है। धर्म की वैज्ञानिकता, प्राकृतिक सामंजस्य, सामाजिक सौहार्द की पृष्ठभूमि को परखे बिना, केवल भावना के प्रवाह में किसी साधु के साथ होने की आवश्यकता नहीं है। धर्म मुक्त करता है। कट्टरता जकड़ती है। मेरे भीतर भी वही ईश्वर का अंश है जो साधु के भीतर है। यदि वह हथियार लेकर आक्रामक होता है, तुरन्त उसका चोला बदलवा दो।

उज्जैन के सिंहस्थ से आशा करनी चाहिए कि वह महामण्डलेश्वर से लेकर शंकराचार्यों तक के आचरण की समीक्षा करेगा। देश को अहिंसा और शान्ति का प्रकाश देगा। प्रत्येक साधु को अपनी-अपनी भूमिका निभाने के लिए संकल्पित करेगा। इसके बिना कोई भी साधु ‘साधुवाद’ का पात्र नहीं होगा। तब कौन साधु के परित्राण के लिए कृष्ण पुन: आएंगे?

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