Gulabkothari's Blog

सितम्बर 23, 2016

पूरा देश हिन्दू है…

भारतीय राजनीति ने राष्ट्रीयता को सम्प्रदाय का स्वरूप दे दिया, इसका उदाहरण हिन्दुत्व है। सारे धर्मगुरु और नेता यह भाषण देते हैं कि हिन्दू कोई धर्म या सम्प्रदाय नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय कह चुका है कि यह देश की संस्कृति है। लेकिन हमारे हिन्दूवादी संगठन इस बात को कहां स्वीकार करते हैं। क्या वे देश में रहने वाले मुसलमानों, ईसाइयों एवं अन्य मतावलम्बियों को हिन्दू मानने को तैयार हैं। जब राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का गठन हुआ तब इसका आधार राष्ट्रीयता था, हिन्दुत्व नहीं था। हिन्दुत्व तो राष्ट्रीयता थी।

आज मुसलमानों को हिन्दू मानने की तैयारी तो किसी की भी नहीं है। तब क्या उनके लिए हिन्दुस्तान के बजाय दूसरा राष्ट्र होना चाहिए? इस मुद्दे पर तो राष्ट्रीय बहस होनी चाहिए। जो स्वयं को हिन्दू कह रहे हैं तथा ‘हिन्दू’ को धर्म अथवा सम्प्रदाय भी नहीं मानते, तब वे क्या हैं? क्या उनको धर्मविहीन कहा जाए?

मुद्दा गंभीर है। क्या देश को अंग्रेजों के दिए नाम से हांकना चाहिए? इण्डिया नाम भी तो ‘इण्डस’ वैली या सिंधुघाटी से ही लिया गया है। तब देश को ‘हिन्दुस्तान’ कहने में शर्म किस बात की? क्यों नहीं हमारे संविधान से ‘इण्डिया दैट इज भारत’ को हटाया जाता? तब सारे देशवासी ‘हिन्दू’ हो जाएंगे। मजहब अपना-अपना, अपने-अपने समाज के भीतर। बाहर सब हिन्दू। देश की सारी अशान्ति समाप्त हो जाएगी।

देश के किसी शास्त्र में हिन्दू शब्द ही नहीं है। फिर शास्त्र कैसे साम्प्रदायिक हो सकते हैं? हम प्राणों को देवता कहते हैं। क्या प्राण साम्प्रदायिक हो सकते हैं? तब इनको धर्म निरपेक्ष क्यों नहीं मानते? क्यों हमने धार्मिकता के नाम पर संविधान से सारे चित्रों को निकाल दिया और हिन्दूवादी संगठन इस पर गौरवान्वित हो रहे हैं।

एक गौशाला में 27000 गायें मर गईं और एक भी हिन्दूवादी रोने नहीं आया। बाद में जो कुछ देखने में आया वह रस्म अदायगी से अधिक कुछ नहीं था। जयपुर में मेट्रो के नाम पर एक के बाद एक कई मन्दिर तोड़े गए और हिन्दूवादी संगठनों ने कोई आन्दोलन भी चलाया क्या? यदि हिन्दू धर्म नहीं है, वेद में भगवान नहीं है, तो मन्दिर क्यों बनाए जाने चाहिए। मैं नाम लेना नहीं चाहता किन्तु कहना चाहता हूं कि चाहे आर.एस.एस. हो, शिवसेना हो अथवा अन्य, सभी राजनीति में भागीदारी चाहते हैं-धर्म या हिन्दुत्व के नाम पर। देश के सभी अन्य समुदायों को हमने गैर-हिन्दू घोषित कर दिया। हम अभी तक भी अंग्रेजों की ‘फूट डालो-राज करो’ की नीति को सीने से चिपकाए हुए हैं। उन्होंने ही देश के दो टुकड़े करवाए थे। क्या हमारा भी वही लक्ष्य है?

आजादी के बाद अंग्रेजों की खण्ड दृष्टि को हमारे राजनेताओं ने भी अपना लिया। देश की प्रकृति पर एक के बाद एक प्रहार हुए। संविधान बनने के बाद पहला प्रहार हुआ देश के नाम पर। ‘हिन्दुस्तान’ के बजाय ‘इण्डिया दैट इज भारत’ कर दिया गया। ‘हिन्दू’ को धर्म के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया। संविधान में हिन्दू को परिभाषित किए बिना जैन, बौद्ध, सिखों को हिन्दू में जोड़ दिया गया। हिन्दू का अर्थ हो गया कि जो ईसाई या मुसलमान नहीं है वह हिन्दू है। हिन्दुकुश से हिन्द महासागर तक जिसके अवशेष हैं, हिन्द, चीन, हिन्देशिया जिस ‘हिन्दू’ शब्द को धारण किए हुए हैं, उसे संविधान ने समाप्त ही कर दिया। क्या हमारे सामने देश की पहचान मिटने का खतरा नहीं पैदा हो गया?

राजनीतिक दासता और दुरभि संधियों के कारण हिन्दू आज देश के स्थान पर सम्प्रदाय का वाचक बन गया है। देश का नाम हिन्दुस्तान होता तो हर नागरिक हिन्दू कहलाता। चाहे वह ईसाई हो या मुसलमान। जैसे जर्मनी का हर नागरिक जर्मन है या जापान का जापानी कहलाता है। मुसलमानों को हिन्दू नाम से डराकर नेताओं ने वोट बैंक बना डाले। आजादी के बाद मुसलमानों का डरना वाजिब भी था। देश में फूट के बीज राजनेताओं ने ही बोए। अब यहां तो केवल गैर हिन्दू ही रह गए। वैसे भी हिन्दू तो किसी धर्म या सम्प्रदाय का नाम है ही नहीं। इसीलिए आरक्षण के नाम पर हिन्दुओं के भी धड़े बना दिए। कुछ हिन्दुओं को भी अल्पसंख्यक बना दिया। बहुसंख्यक कौन बचा?

क्या हिन्दूवादी संगठन भी आरक्षित वर्गों में बंट जाएंगे?
मुसलमानों के आने से पहले यहां हिन्दू शब्द ही नहीं था। वह भी कभी इसे मजहब नहीं मानते थे। इसे कौम कहा करते थे। अंग्रेजों ने हिन्दू सम्प्रदाय बनाया और मुसलमानों के खिलाफ भड़काकर पाकिस्तान बनवाया। वैसे हिन्दू शब्द सम्प्रदाय या फिरका कैसे बन गया। इसका उत्तर कोई नहीं देता। बल्कि इस प्रश्न को टाल देने के लिए नया शब्द पैदा कर लिया-‘धर्म निरपेक्षता’। सभी धर्मों के अनुयायी जिस सहज भाव से अपनी-अपनी पूजा पद्धतियां मानते आ रहे थे, कालान्तर में उसमें विषैले बीज बढ़ गए। देश में दो राष्ट्र का सिद्धान्त स्थापित हो गया।

चुनावी राजनीति ने मुसलमानों को भी यथार्थ की तरफ देखने को मौका ही नहीं दिया। उनके घरों के टाट के पट्टे तो आज तक हटे नहीं। धर्म निरपेक्षता के नशे में खुद को अल्पसंख्यक मानकर बहुसंख्यक को दुश्मन मानते रहे। जबकि संविधान में कोई बहुसंख्यक है ही नहीं। यानि शत्रु भी काल्पनिक ही रहा। इसके पक्षधर राजनेता उनकी हौसला-अफजाई करते रहे। मुसलमानों के लिए हिन्दू शब्द और हिन्दू समाज पूरी तरह परहेज का विषय बन गया।

धर्म निरपेक्षता के चहेतों ने मुसलमानों को खतरे में बताना शुरू कर दिया। पूरे देश में आज यह दुर्गंध फैल चुकी है। धर्म निरपेक्षता के नाम पर राष्ट्र विरोधी गतिविधियों को भी दरगुजर करने लगे हैं। धर्म निरपेक्षता तो देश के लिए अभिशाप बन गई है। इसकी एक प्रतिक्रिया यह हुई कि हिन्दूवादी भावना भी तेजी से बलवती हो उठी। अपने नकली नेताओं के कारण मुसलमान हिन्दुओं की आंख का कांटा बन गया।

आज की पहली आवश्यकता है कि हिन्दू शब्द की व्याख्या की जाए। हिन्दू शब्द को किस प्रकार धर्म विशेष के सन्दर्भ में प्रयुक्त किया जाए। इसका वास्तविक अर्थ तो भौगोलिक क्षेत्र में रहने वालों से है। संविधान में भी इस संदर्भ में कुछ स्पष्ट नहीं किया गया। वहां अल्पसंख्यक तो है, बहुसंख्यक नहीं है। जो मुसलमान या ईसाई नहीं हैं, वे हिन्दू हैं। 11 दिसम्बर 1995 को माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा था- ‘शब्द हिन्दुत्व’ भारत के लोगों की संस्कृति तथा लोकाचार को सम्मिलित करता है, उनके जीवन जीने के तरीके को वर्णित/चित्रित करता है, यह कोई संकीर्ण धार्मिक विचार नहीं है।’

प्रश्न यह है कि ‘हिन्दू’ शब्द आया कहां से। किसी पुरातन शास्त्र, वेद, उपनिषद् में तो यह शब्द है नहीं। यह सिंधु घाटी (अंग्रेजी में इण्डस) का ही अपभ्रंश शब्द है। इसी से भारतवर्ष को हिन्दुस्तान कहा जाने लगा। यहां के निवासी हिन्दू हो गए। जिस प्रकार जापान के निवासी जापानी तथा चीन के निवासी चीनी कहलाते हैं। भले ही वे किसी भी धर्म के हों। हमारे यहां का मुसलमान, ईसाई, सिख या अन्य कोई मतावलम्बी पहले हिन्दू है। हिन्दू अपने आप में कोई धर्म या मजहब नहीं है।

जब सर्वोच्च न्यायालय कहता है कि हिन्दू शब्द इस देश की संस्कृति और लोकाचार (सभ्यता) का प्रतीक है तब भारतीय दर्शन की विशिष्ट छटा सामने आती है। अन्य देशों में वैसा स्वरूप दिखाई नहीं देता। इसीलिए इसको धर्म का स्वरूप देने का प्रयास किया गया। हमारी जीवन शैली में आत्मा और शरीर भिन्न-भिन्न संस्थाएं मानी गई हैं। आत्मा संस्कृति का क्षेत्र है और शरीर सभ्यता का। यह भेद विश्व के अन्य दर्शनों में दिखाई नहीं पड़ता। स्त्री और पुरुष दोनों के शरीर सभ्यता से जुड़े हैं। शरीर के अतिरिक्त मन, बुद्धि और आत्मा हमारा अध्यात्म बनाते हैं। हमारा दर्शन अधिदैव, अधिभूत तथा अध्यात्म पर आधारित है।पश्चिम में अधिदैव की अवधारणा ही नहीं है अर्थात् जीवन में देवतत्त्व उपलब्ध ही नहीं है। हमारे देश को अध्यात्म के स्वरूप ने एक सूत्र में बांध रखा है।

हमारे यहां कोई एक धर्म नहीं, एक धर्म संस्थापक नहीं है और न ही एक धर्म शास्त्र है। न ही किसी प्रकार की बाध्यता ही है। फिर भी यह देश एक सूत्र में क्यों है? जी हां, उस ज्ञान के कारण जो मानव मात्र से जुड़ा है। किसी धर्म या सम्प्रदाय के कब्जे में नहीं है। जब हम गीता या रामायण की बात करते हैं, तब हम साम्प्रदायिक कहलाते हैं। हमारे पौराणिक देवता भी प्राकृतिक तत्त्व हैं, किन्तु अधिदैव के अभाव में पूरा पश्चिम इनको साम्प्रदायिक मानता है। हमारे उपनिषद् एकमात्र ऐसे शास्त्र हैं, जो इस परिभाषा के बाहर हैं।

उनके विषय जीवन के मूल प्रश्नों से जुड़े हैं। ‘मैं स्वयं को कैसे जानूं, जीवन का उद्देश्य क्या है, शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा से जुड़े प्रश्नों के उत्तर हैं।’ पुरुषार्थ का स्वरूप, अध्यात्म के साथ सम्बन्ध तथा जीवन में मोक्ष सुख पाने का मार्ग जैसे विषय हैं। किस प्रकार ये प्रश्न साम्प्रदायिक हो सकते हैं? ईशावास्योपनिषद् में पुरुष और प्रकृति के स्वरूप की चर्चा है। कर्ताभाव, इन्द्रियादि साधन तथा कर्म तीनों का हेतु प्रकृति को बताया गया है। पुरुष भोक्ता है कर्मों के फल देने वाला ईश्वर (तत्त्व रूप) है। फल जड़ है, पुरुष चेतन है। कर्म स्वयं फल नहीं देता। इसके लिए चेतन संस्था की जरूरत पड़ती है। वह सर्वज्ञ, सर्व शक्तिमान ईश्वर है।

जीवन का लक्ष्य मोक्ष प्राप्ति है। पुरुषार्थ करते हुए संसार के द्वन्द्वों से छुटकारा पाना ही मोक्ष है। इसी के लिए  ‘तेनत्यक्तेन भुंजीथा:’ का सिद्धान्त लागू किया गया। अर्थात् किसी के ब्रह्मौदन को बिना आघात पहुंचाए उसके प्रवग्र्य से जीवनयापन करना। जगत चूंकि ईश्वर की व्यापकता ही है, प्रकृति ईश्वर की शक्ति है। जगत प्रकृति की ही अभिव्यक्ति है। इन विषयों में कहां सम्प्रदाय अथवा धर्म  दिखाई पड़ता है। केनोपनिषद्- जो सारे विश्व का नियन्ता ईश्वर है, यहां उसे ब्रह्म कहा गया है। हम अपनी जिस चेतना का अनुभव नित्य करते हैं उसमें ब्रह्म का चित्त रूप ही चमकता है। यदि हम किसी प्रकाश (रंगीन) युक्त पदार्थों को देखते हैं तब उसके साथ ही उपाधि- रहित प्रकाश का भी अनुभव करते हैं। यही प्रकृति के भीतर पुरुष है।

कठोपनिषद् में योग के साधन बताया गया है। एक लय: क्रम का तथा दूसरा चित्तवृत्ति निरोध क्रम का। इसी योग क्रम के कारण संयुक्त राष्ट्र ने योग को स्वीकार किया, लागू किया और योग दिवस की घोषणा भी की है। कहां सम्प्रदाय आता है बीच में। आए, तो सम्पूर्ण विश्व ही हिन्दू हो जाए। क्या अपने शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा के स्वरूप को समझना साम्प्रदायिकता कहलाती है? फिर जिस काल में उपनिषदों की रचना हुई, तब न हिन्दू ही था, न मुसलमान, ईसाई तथा न कोई वर्तमान का अन्य सम्प्रदाय। मानव धर्म था। जीवन का प्राकृतिक स्वरूप था। कर्म, कर्मफल तथा पुनर्जीवन की अवधारणाएं अवश्य थीं।

जीवन सामूहिक था। एक-दूसरे के प्रति उत्तरदायित्व का बोध था। आज यही सब हिन्दू हो गया। बाकी सब गैर हिन्दू। होना तो यह था कि हर भारतवासी हिन्दू हो तथा शेष विश्व गैर हिन्दू रहे। भला हो हमारे राजनेताओं का जिन्होंने हिन्दुस्तान को ही हिन्दू-मुस्लिम दो राष्ट्रों जैसा बना दिया। सब हिन्दू हो गए तो वोटों की राजनीति खटाई में पड़ जाएगी। खेद की बात यह है कि हमारे साधु-संत या रहनुमा भी राजनीति करने लगे। भगवा कपड़े भी पहनेंगे और चुनाव भी लड़ेंगे। अर्थात् वे भी हिन्दू-मुस्लिम विभाजन के पक्षधर बन बैठे। राष्ट्रीयता के लिए तो मानो आपातकाल आ गया। नई पीढिय़ों को ही नए सिरे से देश की अखण्डता का बीड़ा उठाना होगा। वर्तमान व्यवस्था में तो प्रकाश की किरण दिखाई नहीं देती।

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