Gulabkothari's Blog

नवम्बर 10, 2016

सर्जिकल स्ट्राइक

जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सर्जिकल स्ट्राइक-वन के लिए कदम उठाया था और उसका एक निश्चित अंजाम देशवासियों के सामने रखा था तब इस माटी का कण-कण उनको सलाम कर रहा था। आजादी के 70 साल बीत जाने के बाद भी किसी ने स्वयं को भारतीय प्रधानमंत्री की हैसियत से जनता के सामने प्रस्तुत करने का प्रयास नहीं किया। लोगों को सर्जिकल स्ट्राइक-वन क्यों मंत्रमुग्ध कर गया? क्योंकि उस कार्रवाई के पीछे देश की अंतरात्मा की ठोस आवाज थी। हमारे लोकतांत्रिक इतिहास को पढ़ें तो हमारे अधिकांश प्रधानमंत्री स्वयं को अपने राजनीतिक दल का नेता बनाकर सिमट गए। एक या दो को छोड़कर किसी का भी नाम जनता की जुुबान पर नहीं है।

प्रधानमंत्री मोदी, पिछले ढाई वर्षों में अपनी अनगिनत विदेश यात्राओं के लिए चर्चा में रहे हैं। मीडिया में छाए रहे हैं। क्योंकि वे विदेशों में भारत के प्रधानमंत्री के रूप में बोलते हैं। इसी अवधि के दौरान मोदी की छवि में जो गिरावट आई उसका भी कारण यही है। भारत में वे भाजपा के प्रधानमंत्री के रूप में जाने जाते हैं जबकि संघीय व्यवस्था में सदन का नेता, प्रत्येक सांसद का नेता होता है। वहां उसकी कोई दलीय पहचान नहीं रह जाती।

मोदी जी ने कांग्रेस के प्रति, ‘आप’ के प्रति या अन्य विपक्षी दलों के बारे में जिस प्रकार के वक्तव्य दिए हैं, उसमें नहीं लगता कि वे अन्य दलों के सांसदों का भाजपा सांसदों के बराबर सम्मान करते हैं। सर्जिकल स्ट्राइक-दो (500 एवं 1000 के वर्तमान नोटों पर पाबंदी) के परिणाम जो भी आएं, पूरा देश सर्जिकल स्ट्राइक-वन की तरह ही प्रधानमंत्री मोदी के साहस को सलाम करता है। इस निर्णय में मोदी जी सभी राजनीतिक दलों के स्तर से ऊपर उठकर देशहित पर मत्था टेकते दिखाई दे रहे हैं। यह स्ट्राइक लोकतंत्र के तीनों स्तम्भों पर असर डालेगा। इस निर्णय में वे कहीं भी भाजपा के प्रधानमंत्री नहीं है और यही इस देश के भविष्य की सुनहरी रेखा है।

हर देशवासी जानता है कि रावण के दस सिर होते हैं, नौ नहीं होते। अभी आठ बाकी हैं। और इसमें भी जो आखिरी होगा, वह देशवासियों के लिए समान नागरिक संहिता की अनिवार्यता होगा। सबसे पहले तो उन शक्तियों को विखण्डित करना होगा जिनसे देश की संप्रभुता विखंडित होती जान पड़ती है। उदाहरण के लिए आतंकवाद, उदाहरण के लिए धारा 370, उदाहरण के लिए आरक्षण, उदाहरण के लिए संविधान को धर्मनिरपेक्षता के स्थान सम्प्रदाय निरपेक्ष बनाना, उदाहरण के लिए एक राष्ट्रीय भाषा की नीति की प्रतिष्ठा होना, उदाहरण के लिए आयकर कानून का समाप्त होना वगैरहा-वगैरहा।

सर्जिकल स्ट्राइक का एक बड़ा क्षेत्र हमारी शिक्षा से मैकाले का सिर उड़ाना है जो केवल पेट भरने के लिए नौकर तैयार करती है। हमें व्यक्ति के निर्माण की रूपरेखा तैयार करनी है जिसके बिना देश का सांस्कृतिक निर्माण संभव ही नहीं है। शिक्षा में ही एक सर्जिकल स्ट्राइक हमारे पौराणिक और शास्त्रीय ग्रंथों का मजाक उड़ाने वालों पर भी होनी चाहिए। आज के संस्कृत विश्वविद्यालयों में भी इन ग्रंथों के जीवन का स्वरूप एवं प्रकृति विज्ञान का जीवन स्वरूप किसी को नहीं मालूम। न ही ऐसी बातें किसी पाठ्यक्रम में शामिल है। तब इस देश में पुराणों की संहिताओं के ज्ञान की चर्चा करना अर्थहीन लगता है।

पिछले 70 सालों में भारत के महामहिम राष्ट्रपति ने कितने संस्कृत विद्वानों का सम्मान किया है? क्या उनमें से किसी एक ने भी वेदों में छिपे विज्ञान को खोजने का साहस दिखाया? पाश्चात्य विद्वानों द्वारा उड़ाए गए मखौलों का प्रत्युत्तर ये विद्वान दे पाए? तब एक ही विषय के नियमित प्रोफेसरों के इस सम्मान का अर्थ क्या माना जाए? आप केवल उन विद्वानों के सम्मान की घोषणा करें जो हमारे शास्त्रीय ग्रंथों को प्रकृति से, जीवन से जोड़ सकें। और पाश्चात्य विद्वानों के समकक्ष खड़े हो सकें।

यह एक मात्र ऐसी सर्जिकल स्ट्राइक होगी जो भारत को नए सिरे से ज्ञान के शिखर पर लाएगी, सोने की चिडिय़ा भी बनाएगी और हर नागरिक को देश के शत्रुओं से लडऩे की ताकत भी देगी ताकि जरूरत पडऩे पर हर नागरिक अपने-अपने क्षेत्र की सर्जिकल स्ट्राइक में भाग ले सके। पिछले दो स्ट्राइक ने दिवाली के अंधेरे में, लक्ष्मी और सरस्वती के दो दीये जला दिए। उम्मीद है वे दीपमालिका भी प्रज्जवलित करेंगे।

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