Gulabkothari's Blog

दिसम्बर 11, 2016

लोकतंत्र का आतंक

भारत एक कृषि प्रधान देश है। जहां लगभग दो-तिहाई आबादी गांव में रहती है। इनका मुख्य व्यवसाय कृषि व पशुपालन ही है। अत: देश में इतना अनाज पैदा होता है कि हमारी आबादी सही अर्थों में उसको खपा भी नहीं सकती। दूसरी ओर हम अन्न को ब्रह्म कहते हैं, देवता कहते हैं। अग्नि-सोम की सृष्टि में जो आहूत होता है, वह अन्न कहलाता है। अत: केवल खेतों में पैदावार ही अन्न नहीं है। हमारा आपसी व्यवहार भी एक-दूसरे का अन्न है। सृष्टि के निर्माण क्रम में, अन्न की जठराग्नि में आहुति चौथे क्रम में आती है और उसी से शरीर की सप्तधातुओं का निर्माण होता है। अन्न के साथ चन्द्रमा से पितृ प्राण भी बारिश के साथ हमारे शरीर में प्रवेश करते हैं। ये पितृप्राण शरीर के सातवें धातु शुक्र के जरिए फिर अग्नि में आहूत होकर निर्माण की अन्तिम कड़ी को पूरा करता है। इसी से सन्तान उत्पन्न होती है। हम अन्न को निर्जीव वस्तु मानते हैं। अत: उसके बारे में उससे अधिक जानकारी करने का प्रयास भी नहीं करते। आज तो विकसित मानव नर-नारी के शरीर को भी वस्तुपरक संज्ञा ही देता है, यह एक अलग बात है।

किसानों को आर्थिक सुरक्षा देने के नाम पर गेहूं की खरीद सीधे सरकार करने लगी है। लाखों टन अनाज पैदा होता है। हम इस गेहूं का सहजता से निर्यात भी कर सकते हैं। किन्तु शर्म की बात ये है कि इसके बावजूद भी हमें गेहूं का आयात करना पड़ता है और इसका एकमात्र कारण सरकार की नीतियां तथा बाबू लोगों की भ्रष्ट कार्यप्रणाली। इसके कारण पूरा देश अच्छी किस्म के गेहूं से भी वंचित रहता है और विदेशों से कैंसरयुक्त गेहूं मंगाकर खाने को भी लाचार दिखाई पड़ता है।

गेहूं और व्यक्ति दोनों ही प्राकृतिक उत्पाद हैं। आज हम पूरा जोर लगाकर इस प्राकृतिक गेहूं का नामोनिशान मिटा देने पर तुले हैं। जैसे कांग्रेस मुक्त भारत का नारा। वैसे ही, हमारी श्वेत और हरित क्रान्ति ढलती जा रही हैं। न आधुनिक दूध का, न ही आधुनिक अन्न का प्राकृतिक मानव से कोई संबंध रह गया है। ऊपर से सरकारी कार्यप्रणाली कोढ़ में खाज का काम कर रही है। जिस बेरहमी से हमारे अधिकारी किसान के खून-पसीने की कमाई से खिलवाड़ करते हैं, उससे तो कभी-कभी ये भी लगता है कि वे पत्थर के बने हैं।

देशभर में तीन सालों में 46,568 मीट्रिक टन गेहूं सड़ गया। किसान की आंखों से तो खून टपकता है और अधिकारियों की बांछें खिलती रहती हैं। यदि गेहूं सड़ेगा नहीं तो आयात कैसे करेंगे? सड़ता क्यों है? क्योंकि सरकार के पास भंडारण की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होती। लाखों-करोड़ों के बजट में कहीं भी इन गोदामों के निर्माण का किसी को ध्यान ही नहीं आता। किसान के प्रति इनके दर्द का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले 25 सालों में नया गोदाम भवन ही नहीं बनाया गया। संवेदनहीनता और बेशर्मी की हद इससे ज्यादा क्या होगी?

अकेले राजस्थान में जहां 33 जिले हैं, वहां मात्र 91 गोदाम हैं और सभी 25 साल से ज्यादा पुराने हैं। हर साल गेहूं बाहर सड़ता है, क्योंकि जो भी 2-3 गोदाम जिले में होते हैं वे दवाइयों, फलों तथा अन्य खाद्य वस्तुओं के लिए किराए पर उठ चुके होते हैं। यदि सरकार की यही नीति है और आगे भी रहनी है तो क्या हमें इस व्यवस्था को बंद नहीं कर देना चाहिए? इसमें भी कई लोगों का स्वार्थ टकराता है। आयात में कमीशन का खेल हर विभाग में आम बात है। अब जब सरकार आयात कर में छूट दे देगी, तब तो कमीशन की राशि भी बढ़ जाएगी और देश में पहुंचने वाला गेहूं फिर भी सस्ता होगा।

प्रश्न तो यह है कि सरकार का लक्ष्य क्या केवल इतना ही है? सरकार को अन्न के बारे में अधिक गंभीर होने की आवश्यकता है। जो भी गेहूं हम आयात करेंगे उसकी कल्पना तो सहज ही हो सकती है। ये सब विकसित खेती के उत्पाद हैं। भारत में भी सरकारों ने स्वयं को विकसित देशों  की होड़ में उतारने का प्रयास किया है, जिसका परिणाम यह है कि उन्नत गेहूं और नहरी पानी की जो यात्रा पंजाब से शुरू हुई, जहां की धरती को सोना उगलने वाली बना दिया गया था, आज वहां गेहूं का उत्पादन घट गया। उसके स्थान पर प्रतिदिन 600 से अधिक कैंसर के मरीज इलाज के लिए राजस्थान आ रहे हैं। सोचिए देश में ये आंकड़ा क्या संदेश दे रहा होगा? मात्र पिछले 3 साल के आंकड़ों को देखकर सोच सकते हैं कि इस रोग की भारत में क्या स्थिति होगी।

क्या हमें इनके प्रति उदासीन हो जाना चाहिए? रासायनिक खाद के उपयोग के मामले में राजस्थान के श्रीगंगानगर व हनुमानगढ़ जिले ने पंजाब का अनुकरण किया। इन दोनों जिलों की स्थिति तो आज और भी बदतर है। उन्नत बीज, रासायनिक खाद, कीटनाशक जैसे विकसित एवं वैज्ञानिक संसाधनों के कारण आज माता के दूध में भी कीटनाशकों के अवशेष पाए जाते हैं। पत्रिका के एक सर्वे में आंकड़ा लगभग 50 प्रतिशत था। यहां का गेहूं उन्नत होते-होते पूर्ण रूप से रासायनिक हो गया है। हमारा शरीर सिंथेटिक खाने को पचा नहीं सकता। वे ही कैंसर का रूप लेते हैं।

आज भोजन से रस लुप्त हो गया, तब वह अन्न की श्रेणी में भी नहीं आता क्योंकि वेद कहते हैं- ‘रसौ वै स:’ अर्थात रस ही ब्रह्म है, इसके बिना शरीर की रोग निरोधक क्षमता कैसे बढ़ सकती है। न ही व्यक्ति की आत्मा का निर्माण होगा। वो भी तो ब्रह्म ही है, अर्थात् अन्न का जीवात्मा और परमात्मा को जोडऩे का सेतु। जिसका एक छोर स्थूल व दूसरा छोर सूक्ष्म है। क्या ऐसा सेतु परमात्मा के अलावा कोई बन सकता है।

लेकिन नीतिकारों को इससे क्या फर्क पड़ता है कि कौन मरता है, कौन बचता है। जो भी बीज हम आयात करेंगे वो शायद और भी उन्नत हो ताकि कैंसर भी पूरे देश में उसी गति से पनप सके। हम अपने अमृततुल्य अन्न को तो सड़ा कर दारू बनाने वालों को बेचने में खुशी मनाते हैं, वो भी तो आज की परिभाषा में विकसित होने का ही मापदंड है। हम इस अमृत के बदले रुपए किलो में कैंसर खरीदने जा रहे हैं। ये तो इसका स्थूल परिणाम स्पष्ट समझ में आता है। यह हमारा दुर्भाग्य ही है कि जनता का साहस मर चुका है, जिसके कारण देश में जगह-जगह आसुरी शक्तियां सिर उठा रही हैं।

यदि विश्वास करें तो एक और बड़ा पहलू सिद्धान्त रूप से अन्न के साथ जुड़ा है और वो है, जीवात्मा की यात्रा का निमित्त बनना। प्राकृतिक नियम के अनुसार पितृ आत्माओं का भी भौगोलिक विभाजन होता है। ये देश और काल का प्रभाव अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। हमारी संस्कृति का बहुत बड़ा आधार भी है। अब यदि ऑस्ट्रेलिया में पैदा किया गेहूं भारत आयात करता है, तब उसके साथ किस प्रकार का जीवात्माएं हमारे पैदा होंगी। उनके पितृ हमारे शरीरों में काम करेंगे। हमारे पितृ तो पानी में बह जाते हैं। हां ये भी सत्य है कि हमें प्रलय की ओर ही तो बढऩा है। सरकारें अपनी नीतियों से उसे जल्दी बुलाने का प्रयास कर रही हैं। और ये भी सपने देखती हैं कि भारत फिर से सोने की चिडिय़ा बनेगा। विश्व में फिर से ज्ञान के शीर्ष पर होगा, विदेशी अन्न खाकर? वहां की आत्माओं ने तो अन्न की धार्मिकता और मार्मिकता को समझा ही नहीं, तब उस अन्न को खाने वाला जीवात्मा कैसे भारतीय ज्ञान की ओर आकर्षित होगा।

विदेशों से आयातित गेहूं को वहां पशुओं के खाने लायक भी नहीं समझा जाता। हमारे यहां आने पर इसकी जांच भी नहीं की जाती कि इसकी गुणवत्ता खाने लायक भी है या नहीं।  अन्न का आयात देश के किसानों की तपस्या का अपमान है। कुदरत ने जो हमें दिया आज उसका अवदान हमें उपलब्ध नहीं है। ऋषियों के ज्ञान को विज्ञान के नाम पर झुठलाने की होड़ लगी है। किन्तु फिर भी वैदिक विश्वविद्यालयों में अनुवाद के आगे कोई शिक्षा उपलब्ध नहीं है। ज्ञान से तो पढ़ाने वाले भी अनभिज्ञ हैं। हमारे पास एक ही विकल्प रह जाता है कि हम अपने अज्ञान के कारण मानवीय संस्कृति का ह्रास करते हुए स्वयं को भी सिंथेटिक अन्न बनाकर प्रकृति में आहूत कर दें।

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