Gulabkothari's Blog

दिसम्बर 24, 2016

जंग हारे जंग

एक बार बुद्ध ने रत्नाकर डाकू से पूछा कि, तू यह सारे पाप किसके लिए करता है? उसने उत्तर दिया-अपने परिवार के लिए ! बुद्ध का दूसरा प्रश्र था कि क्या तेरे इन पापों का फल परिवार वाले भी बांटेंगे? इस प्रश्र को रत्नाकर ने अपनी पत्नी एवं पिता के सम्मुख रख दिया। उन्होंने कहा कि, हम तेरे कर्म में सहायक अवश्य हैं किन्तु तुम्हारा किया तो तुम ही भोगोगे। रत्नाकर जिंदगी की जंग हार गया। ठीक वैसे ही दिल्ली के उपराज्यपाल नजीब जंग अनगिनत ज्यादतियों के साथ अपने राजनीतिक जीवन की यह जंग हार बैठे। अचानक गुरुवार को उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। कह नहीं सकते कि, देश में किसी को भी इस दुर्घटना पर अफसोस हुआ हो। अपने कार्यकाल में उन्होंने भी चमड़े के सिक्के चलाने का वैसा ही प्रयास किया जैसा कि, भिश्ती ने एक दिन का बादशाह बनकर किया था।

नजीब जंग को जुलाई 2013 में यूपीए सरकार ने दिल्ली का उपराज्यपाल नियुक्त किया था। इससे पूर्व वे जामिया-मिलिया विश्वविद्यालय के उपकुलपति थे। मूलत: आईएएस अफसर रहे जंग ने उपराज्यपाल के रूप में जिस तरीके के आदेशात्मक प्रहार दिल्ली सरकार पर किए, उसने तो मथुरा के कंसराज की याद दिला दी। उनका वश चलता तो वासुदेव की तरह केजरीवाल को भी कारागार में ठूस देते। कितने घटनाक्रम सामने आए, सुनकर लगता ही नहीं कि नजीब लोकतंत्र के प्रतिनिधि थे। राजतंत्र में तो वैसे भी कोई किसी का सगा नहीं होता। फिर नजीब ने तो लोकहित की बड़ी-बड़ी योजनाओं (देवकी पुत्र) की निर्मम हत्याएं कम नहीं की। जंग ने अपने व्यवहार से यह तो साबित कर ही दिया कि, वे किसी शहंशाह से कम नहीं हैं। तब उनका बेआबरू होकर जाना, प्रकृति के कानून सम्मत ही है। देश के इतिहास में, उनका लिखा काला पन्ना, आने वाली पीढिय़ों के लिए एक नजीर रहेगा।

एक कहावत है कि, जो चोर होता है, उसको सारे लोग चोर ही नजर आते हैं। संत को कोई बुरा नहीं लगता। दिल्ली सरकार के प्रथम गठन के साथ ही उस पर जंग की नजर लग गई थी। जंग ने अरविंद केजरीवाल को एक सौत की तरह ही मानकर व्यवहार किया। दूसरे चरण में तो जंग दोनों हाथों में तलवारें लेकर मानो सड़क पर ही उतर आए। मानो यह उनका निजी स्वार्थ था। अफसरों की नियुक्ति को लेकर तो आए दिन फाइलें लौटाते ही रहे। उन्होंने तो मुख्यमंत्री के सचिव राजेन्द्र कुमार के घर पर छापा होने तक की व्यवस्था की। किंतु वहां कोई ऐसा दस्तावेज नहीं मिला कि वे मुख्यमंत्री को अपमानित कर पाते। उसके बाद तो वे चोट खाए हुए नाग की तरह फुफकारने लगे। दिल्ली सरकार की सैंकड़ों फाइलों की छानबीन करा डाली। यहां भी उन्हें निराशा ही हाथ लगी और केजरीवाल सूखे ही बच निकले। मुझे यह जानकारी तो नहीं कि, केन्द्र सरकार ने उनके इस सचाई पूर्ण वक्तव्य को कितना सच माना किन्तु आज के जमाने में यह पचने वाली बात नहीं थी। और जिस तरह से जंग ने केजरीवाल को सभी प्रकार के अधिकारों से वंचित कर रखा था, तब तो यह उत्तर असंभव ही था। आज की स्थिति तो यह है कि मुख्यमंत्री निवास के सभी बागवानों और रसोईदारों तक को हटा दिया गया है। मुख्यमंत्री बनाए खाना उनकी बला से।

जंग की कार्यप्रणाली से भाजपा सरकार को कितना फायदा हुआ या नहीं, यह अलग बात है लेकिन उनकी इस कार्यप्रणाली को सहन करना अथवा स्वीकृत करना दूसरी बात है। जिस प्रकार असंतुष्ट होकर भाजपा सरकार ने कई राज्यपालों के इस्तीफे लिए, उसी कड़ी में नजीब जंग का इस्तीफा भी जुड़ गया। उनका अब तक का सारा किया-कराया पानी में बह गया। अन्तर केवल इतना ही है कि, पिछले तीन साल से वे दिल्ली में भाजपा की किश्ती चला रहे थे। सुप्रीम कोर्ट के एक झौंके ने किश्ती को हिला दिया। अच्छा हुआ जंग ने इस्तीफा दे दिया वर्ना क्या पता न्याय की अगली कड़ी क्या रंग लाती क्योंकि अपने पूरे कार्यकाल में नजीब जंग एक चुनी हुई सरकार को उखाड़ फैंकने में लगे हुए थे। दिल्ली में तो आने वाले समय में, प्रत्येक उपराज्यपाल के लिए सम्मानपूर्वक जीने के लिए जंग की नजीर ही काफी होगी। अभी तक की जंग में जीत जनता की हुई, इसमें कोई सन्देह नहीं है।

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