Gulabkothari's Blog

फ़रवरी 5, 2017

नया दौर

पंजाब और गोवा विधानसभा के लिए मतदान हो चुका है। दोनों ही प्रदेशों में उत्साह के साथ वोट डाले गए हैं। गोवा में 83 प्रतिशत और पंजाब में 75 प्रतिशत मतदान हुआ। इन चुनावों में इस बार कुछ नया-नया भी दिखाई पड़ रहा है। वैसे तो परिवर्तन नित्य है ही, किन्तु इस बार दोनों ही मोर्चों पर रूपान्तरण जैसा माहौल दिखाई पड़ रहा था। दोनों स्थानों पर एक नई राजनीतिक पार्टी आम आदमी पार्टी पहली बार मैदान में उतरी है। आज तक केवल दो ही दल चुनाव लड़ते रहे हैं। चाहे अकेले या गठबंधन के रूप से। पंजाब में कांग्रेस और भाजपा घटक शिरोमणि अकाली दल आमने-सामने होते थे। आम आदमी पार्टी ने भी धमाके के साथ नया समीकरण बनाया है। हालांकि ‘आप’ ने अपना पंजाब में प्रवेश पिछले लोकसभा चुनावों में ही कर लिया था, जहां उसने चार सीटों पर कब्जा किया था। यह भी एक आश्चर्य ही था। उसी हौसले को लेकर वह इस बार पूरे प्रदेश स्तर पर चुनाव लड़ रही है।

पिछली बार जब अरविन्द केजरीवाल से बात हुई थी तब उनका आकलन 87 सीटों का था। इसका मूल कारण वे युवा वर्ग तथा सिख मतदाताओं को मानते थे। इसके बाद ही वे हिन्दू मतदाताओं में उतरे थे। जीतना-हारना समय के गर्भ में है, किन्तु इसका यह अर्थ तो स्पष्ट है कि टक्कर कांटे की है। यही अपने-आप में महत्वपूर्ण घटना है। युवा वर्ग इतिहास पढ़कर भविष्य की सोचता है। इसी के हाथ में त्रिकोणीय संघर्ष की नकेल भी है। भाजपा तथा शिअद के लिए भी दांव बड़ा है। लोकसभा में स्थिति परिवर्तन का मुख्य प्रश्न भी है और राज्य में सत्ता चले जाने का भी।

गोवा में भी आम आदमी पार्टी ने दो बंदरों की लड़ाई में बिल्ली की भूमिका निभाने की सोची है। पहली बार वहां भी आप तीसरे दल के रूप में टक्कर देने को खड़ी है। युवा वर्ग के साथ-साथ वहां दिल्ली के बदले वातावरण एवं केन्द्र के प्रहारों को सहन करने की क्षमता उसका हथियार है। यहां उसकी छवि पंजाब से भले ही कम लगती होगी, किन्तु परम्पराओं को तोडऩे का साहस तो दिखाया है। यही इतिहास बनेगा, आने वाली पीढ़ी का। इसमें भी हार-जीत गौण ही है। लोकतंत्र को समय के साथ दिशा देना राजनेताओं का ही दायित्व है। ठहरा पानी सड़ जाता है।

इस बार यूपी में कांग्रेस का सपा से हाथ मिलाना भी एक नया प्रयोग साबित हो सकता है। जिस प्रकार भाजपा भी जम्मू और कश्मीर में सत्ता तक पहुंची थी। कांग्रेस भी अवसर का लाभ उठाने की सोच रही है। इस कदम की कांग्रेसियों में तो विपरीत प्रतिक्रिया भी हो चुकी है। इसी प्रकार नोटबंदी का असर भी इस चुनाव पर विशेष पडऩे वाला है। हालांकि केन्द्र ने समय पूर्व बजट पेश करके इस प्रभाव को कम करने का प्रयास तो किया है। परिणाम समय बताएगा।

इन दोनों प्रदेशों में युवा का वर्चस्व और ‘आप’ का प्रवेश, दो धाराओं के बहाव की दिशा को तय करेंगे। पहले ही चुनाव में किसी दल का इतनी बड़ी चुनौती बन जाना भी एक प्रश्न है। मानो जनता पार्टी या स्वतंत्र पार्टी का युग लौट आया है। बिना किसी आपातकाल के। हां, प्रधानमंत्री की यह घोषणा कि देश को कांग्रेस मुक्त करके छोड़ेंगे। कांग्रेस को विपक्ष का दर्जा न देना तथा लोकतंत्र के मूल स्वरूप को ध्वस्त करना भी परोक्ष रूप से यही दर्शाता है। इस कदम के बिना नोटबंदी का निर्णय भी संभव नहीं था। भाजपा को भावी सभी चुनावों में इनके प्रभावों को देखने का अवसर मिलेगा। बेरोजगारी और महंगाई विकास के मार्ग की दो ही तो बड़ी बाधाएं हैं। नोटबंदी ने इनको चरम पर पहुंचा दिया है। चुनावी वादों को जुमला बताकर स्वयं भाजपा ने मतदाता का अपमान ही किया है। तब नए जुमलों पर कौन विश्वास करेगा?

आज चुनावों में जिस प्रकार का भ्रष्टाचार, धन का बहाव देखा जाता है, वैसा ही लोकतंत्र का स्वरूप भी बनता जा रहा है। हमारे जहन में तो एक ही नारा है- जनता जागे, तो भ्रष्टाचार भागे। तब हमारा लोकतंत्र देश को लाए आगे।

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