Gulabkothari's Blog

अप्रैल 2, 2017

किसके भरोसे महिला?

आधी आबादी किसके भरोसे रहे? अपनी पीड़ा लेकर किसके पास जाए? निर्भया के दोषी आज भी कानूनी गलियों में अपना बचाव करते घूम रहे हैं।

भा रत की संस्कृति में रावण को अपराधियों का सिरमौर माना जाता है। सीताहरण का हीरो था वह। किन्तु सीता को उसने छुआ तक नहीं था। उस पर यह कलंक कि, वह अपराधियों का सिरमौर है! और आज जो कुछ हो रहा है, उन घटनाओं ने तो रावण को भी आदर्श पुरुष प्रमाणित कर दिया। छोटी-छोटी बच्चियों के साथ बलात्कार, खून के रिश्तों द्वारा दुष्कर्म! मन में आता है कि ऐसे लोग पैदा होते ही क्यों नहीं मर जाते! भ्रूण हत्या तो इनकी होनी चाहिए थी। इनके डर से कन्याएं पेट में ही मारी जा रही हैं। खेद है कि, माताओं को भी ऐसी औलाद पर शर्म नहीं आती। दूसरी ओर प्रभावशाली लोग दुष्कर्मियों को बचाने में लगे रहते हैं। न्यायपालिका की स्थिति यह है कि, वहांं तारीखें पड़ती रहती हैं। अपराधियों को बचाने में सब लग जाते हैं। पीडि़ता और परिजनों पर बयान बदलने के दबाव डाले जाते हैं। नोखा (बीकानेर) का उदाहरण ताजा है। और यह सब पुलिस की आंखों के सामने होता है। तब जय-जयकार किसकी हो- गृहमंत्री की या सरकार की।

प्रश्न यह है कि क्या हम लोकतंत्र में जी रहे हैं? किसी पीडि़त परिवार से पूछना चाहिए। राजस्थान के गृहमंत्री की हालत के बारे में कुछ कहने की जरूरत ही नहीं है। वे स्वयं को ही प्रभावहीन मानकर चल रहे हैं। बातों में पीड़ा जताते रहते हैं कि सारे निर्णय तो मुख्यमंत्री स्तर पर होते हैं। तब यदि राजस्थान महिला अपराधों के मामले में दूसरे या तीसरे स्थान पर रहता है तब आश्चर्य क्यों होना चाहिए? राज्य की मुख्यमंत्री स्वयं एक महिला हैं लेकिन बड़ी से बड़ी दुर्घटना पर भी मुख्यमंत्री ने एक शब्द नहीं बोला। तब क्या प्रत्येक पीडि़ता प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के पास शिकायत करने जाएगी? प्रदेश के स्तर पर इतना बड़ा कलंक का टीका भी सरकार को उद्वेलित नहीं कर रहा।

इसी तरह हत्याओं का सिलसिला भी थमने का नाम नहीं ले रहा। तीन मार्च को खबर छपी थी ‘हर दूसरे दिन मर्डर-18 दिन में 9 हत्याएं।’ मानो जयपुर नहीं जोहानिसबर्ग हो गया है। पिछले सप्ताह जोधपुर के हरियाढाणा में ललिता को पेट्रोल डालकर जिन्दा जला दिया गया था। वह पेड़ों को काटने से रोक रही थी। क्या यह आश्चर्य नहीं है वहां जनभावनाओं को भी ठुकरा दिया? कोटा में 12 साल की बच्ची से दुष्कर्म करने वाला फरार है। लालकोठी, जयपुर में छह साल की बच्ची शिकार हो गई। जोधपुर में 17 मार्च को ही डॉक्टर के घर फायर करके लोग फरार हो गए। राज्य में बलात्कार, हत्याएं आम बात हो गईं। सरकार का मौन चिंताजनक है। पुलिस भी गृहमंत्री जी के कदमों पर चल रही है। चोरियों की संख्या तो पुलिस रिकॉर्ड में नगण्य होती है।

चिन्ता की बात यह भी है कि जनता को अब पुलिस पर भरोसा नहीं रहा। पुलिस जरूर अपनी इस छवि से चिन्तित नजर नहीं आती। अब पीडि़त बलात्कार तथा हत्याओं की जांच पुलिस से करवाने को राजी नहीं होते। सरकार इसके लिए बधाई की पात्र है!

पुलिस भर्ती भी नहीं हो रही, घरों से अर्दली हट नहीं रहे, किसी घटना के होने के बाद छानबीन में व्यस्त पुलिस घटनाओं को रोकने, जनता को शिक्षित करने में नाकाम ही साबित हुई है। इस दृष्टि से सुरक्षाकर्मी भी केवल सजावटी ही बन गए हैं। किसी दुर्घटना को टाल पाना संभव नहीं रह गया है। हां, सुरक्षा के नाम पर आम आदमी को अपमानित करने से नहीं चूकते।

आंकड़ों को देखें तो मध्यप्रदेश के हों या अन्य किसी प्रदेश के, जनता के प्रति सरकारों की बेरुखी साफ झलकती है। किसानों की आत्महत्याएं भी मानो रोबोट देखते हों। संवेदना का लेशमात्र शब्द भी सुनाई नहीं देता। तब आधी आबादी किसके भरोसे रहे? अपनी पीड़ा लेकर किसके पास जाए? पांच साल हो गए निर्भया के दोषी आज भी कानूनी गलियों में अपना बचाव करते घूम रहे हैं। तब उसे सख्त बनाने का भी क्या लाभ हुआ? वह भी कागजी ही रह गया। जैसा पहले था। फांसी तो किसी को हुई नहीं। महिला अत्याचारों के मामलों में समाज को भी जागना पड़ेगा। जब आरोपियों के पीडि़त या उसके परिजन बयान बदलते हैं तब समाज को आगे आना चाहिए। उसे हिम्मत बंधानी चाहिए। जब तक समाज नहीं जागेगा, सरकार और पुलिस के भरोसे कुछ नहीं होने वाला। जब महिला की पीड़ा पर महिला का हृदय भी न पिघले, तब निराकरण क्या?

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