Gulabkothari's Blog

अप्रैल 21, 2017

कश्मीर में आपात स्थिति

हम यह समझना ही नहीं चाहते कि बिना मुस्लिम देशों की आर्थिक मदद के न कश्मीर सुलग सकता है, न पत्थर चल सकते हैं और न ही हथियारों के जखीरे देश में आ सकते हैं।

आज का ज्वलन्त प्रश्न यह है कि कश्मीर सुलग रहा है अथवा सुलगाया जा रहा है? पूरा देश देख रहा है। सोशल मीडिया पर जो फिल्में चल रही हैं, वे देखने में भारतीय भी नहीं लग रहीं। मेरे देश में मेरी सेना के खिलाफ बगावत के सुर, पत्थरबाजी और देश विरोधी नारे? और वह भी भाजपा की संयुक्त सरकार में, जहां केन्द्र में भाजपा बैठी हो? प्रधानमंत्री मौन, मुख्यमंत्री भी बयान में कश्मीरियों के पक्ष में, सर्वोच्च न्यायालय सीमा के बाहर जाकर निर्देश जारी करे, सेना के हाथ बांधने पर उतारू हो जाए। क्या अब तक राष्ट्रपति शासन लागू नहीं हो जाना चाहिए था? सख्ती बरतें तो आपातकाल भी लागू कर सकते हैं। जिन सैनिकों ने बाढ़ में कश्मीरियों की जान बचाई, क्या यह उसका इनाम दिया जा रहा है?

दूसरा प्रश्न यह है कि क्या यह सब रातों-रात हो गया? दिल्ली में क्या एक भी नेता ऐसा नहीं है जिसने एक साल पहले ही स्थिति को भांप लिया हो? क्या भाजपा ने महबूबा से समझौता करके सरकार बनाई थी, तब ऐसी आशंका नहीं बनी थी? राजनीति में सत्ता के आगे देशवासियों की प्रतिक्रिया का कोई अर्थ नहीं रह जाता। अब तो केन्द्र का कोई भी सख्त निर्णय स्वयं भाजपा के ही खिलाफ पड़ेगा।

यूपी के विधानसभा चुनावों में इस आग में दोनों हाथों से घी की आहुतियां सभी दलों के नेताओं ने दे डाली। क्या-क्या शब्द नहीं कहे गए, किस-किस ने नहीं कहे। न लोकलाज, न मर्यादा, न देश के भविष्य पर पडऩे वाले प्रभावों की किसी को चिन्ता। ध्रुवीकरण की राजनीति चरम पर थी। श्मशान और कब्रिस्तान के चर्चे गर्म थे। आज हम कितनी भी सफाई दें, किन्तु तथाकथित हिन्दूवादी नेताओं ने जिस आक्रामक शैली से वार किया था, वह तो हिन्दुओं की उदारवादी नीति से मेल खाती ही नहीं। कभी-कभी तो यह भी लगता है कि ऐसी भाषा बोलने वाले हिन्दू का अर्थ भी जानते हैं या नहीं? ग्रंथ पढ़े भी होंगे या नहीं? आज भी सरकारें गंभीर चिन्तन में नहीं लगी हैं। कश्मीर केवल भाजपा का ही मुद्दा नहीं है। वैसे भी सांसद शपथ लेने के बाद किसी दल का नहीं रह जाता। प्रधानमंत्री भी भारत के रहेंगे, भाजपा के नहीं। यह सीमा भी समय के साथ छोटी होती जा रही है।

आज पूरे विश्व में आतंक छाया हुआ है। जो भी जिहादी अब तक पकड़े गए सब इस्लाम से जुड़े निकले। अभी हाल ही में जिन-जिन यूरोप के देशों ने इनको शरण दी, उनके साथ भी आतंकियों जैसा व्यवहार करने लग गए। प्रभाव यहां तक दिखाई दिया कि, फ्रांस के नागरिक, इनसे दु:खी होकर फ्रांस छोड़ गए। अहसान की तो बात किताबों में ही रह गई। अलग-अलग मार्गों से ये ही लोग हमारे यहां पहुंच रहे हैं। सैनिक इनकी मदद करने के लिए बदनाम हो चुके हैं। मोटे अनुमान के तौर पर 3-4 करोड़ बांग्लादेशी यहां अवैध रूप से रह रहे हैं। किसी सरकार में किसी तरह की कोई हलचल नहीं है। देश में हथियार जमा हो रहे हैं। जब-जब परिस्थितियां बनीं राजस्थान में भी ऐसे जखीरे सामने आते रहे हैं। ऐसी स्थिति में कश्मीर का मुद्दा बड़ी लपटों में बदल सकता है। हमारी खुफिया एजेंसियों की क्षमता करगिल में सामने आ चुकी है। हम यह समझना ही नहीं चाहते कि बिना मुस्लिम देशों की आर्थिक मदद के न कश्मीर सुलग सकता है, न पत्थर चल सकते हैं और न ही हथियारों के जखीरे देश में आ सकते हैं।

हमारी केन्द्र सरकार तो भाजपा का परचम फैलाने और देश को कांग्रेस मुक्त करने में व्यस्त है। सरकार को आज जुमलों की राजनीति का चस्का लग गया है। आश्चर्य है कि मोहन भागवत भी यदा-कदा कुछ बोलते तो हैं लेकिन कोई स्पष्ट निर्देश नहीं दे रहे। न तो भाजपा के लिए, न ही संघ के लिए। एक प्रश्न जो सबकी आंखों से ओझल है, वह यह कि क्या सन् 2026 के बाद देश रहेगा?

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