Gulabkothari's Blog

मई 26, 2017

पूत के पांव

उनके काम में, काम करने के तरीके में कमियां गिनाई जा सकती हैं लेकिन उनकी नीयत या देश के प्रति निष्ठा पर अंगुली उठाने वाला शायद ही कोई मिले।

मोदी सरकार आज अपने कार्यकाल के तीन वर्ष पूरे कर रही है। जब यह सरकार बनी थी तब देश की जनता को भाजपा से ज्यादा नरेन्द्र मोदी से उम्मीदें थीं। वह उन्हें सर्वशक्तिमान की तरह देख रही थी। जो कुर्सी पर बैठते ही देश की सारी समस्याओं का समाधान कर देंगे। यही वह कारण था कि भारतीय जनता पार्टी को पहली बार स्पष्ट बहुमत मिला। तीन साल का कार्यकाल बहुत ज्यादा भी नहीं होता, तो बहुत कम भी नहीं होता। कोई भी सरकार जो करना चाहती है वह शुरू कर चुकी होती है। कुछ नतीजे सामने भी आने लगते हैं। कई तरह से सरकार के वादों और देशहित की मंशा भी सतह पर आ जाती है।

इन तीन सालों में सबसे बड़ी उपलब्धि सरकार देश की जनता में निराशा के माहौल का खात्मा बता सकती है। जब 2014 के आम चुनाव हुए तो देश में निराशा का सा माहौल था। हर दिन यूपीए सरकार के किसी ना किसी मंत्री का भ्रष्टाचार अथवा भाई भतीजावाद अखबारों की सुर्खियां बन रहा था। कभी कॉमनवैल्थ खेल तो कभी टू जी तो कभी कोयला घोटाला। स्वच्छ छवि का होने के बावजूद चुप्पी की वजह से उसके छींटे तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तक जा रहे थे। कम से कम इन तीन सालों में ऐसे किसी भ्रष्टाचार का आरोप तो केन्द्र सरकार के किसी मंत्री पर नहीं लगा।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तो इन वर्षों में पूर्ववर्ती तमाम प्रधानमंत्रियों से अपनी एक अलग साख बनाई है। उनके काम में, काम करने के तरीके में कमियां गिनाई जा सकती हैं लेकिन उनकी नीयत या देश के प्रति निष्ठा पर अंगुली उठाने वाला शायद ही कोई मिले। एक तरफा ही सही पर नियमित रूप से देश के सामने अपने ‘मन की बात’ रखना भी कम हिम्मत की बात नहीं है। उनकी मंत्रिपरिषद के सदस्यों में कुछ तो ऐसे हैं ही जो अपने विभागों में मन लगाकर काम कर रहे हैं। अपने-अपने विभागों का उनका काम देश भर में बोल रहा है। ऐसे मंत्रियों में  रेलमंत्री सुरेश प्रभु, ऊर्जामंत्री पीयूष गोयल, मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर, पेट्रोलियम व गैस मंत्री धर्मेंद्र प्रधान एवं सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी शामिल हैं। गोवा लौटने से पहले ढाई साल में रक्षामंत्री के रूप में मनोहर पर्रिकर भी अपनी अलग छाप छोड़ गए हैं।

पिछले तीन सालों में बहुत कुछ अच्छा हुआ किन्तु लोकतंत्र को झटके भी कम नहीं लगे। विपक्ष का सम्मान लगभग समाप्त हो गया। जो भी नेता भाजपा के विरुद्ध भारी पड़ेगा, उससे निपट लिया जाएगा। मानो भाजपा के सारे नेता दूध के धुले ही हों। कांग्रेस द्वारा नियुक्त राज्यपाल किस तरह हटाए गए, किस प्रकार नजीब जंग ने दिल्ली सरकार को नाकों चने चबवाए- ऐसा नजारा आश्चर्यजनक ही था। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि विपक्ष जितना मजबूत होगा, सरकार भी उतना ही अच्छा कार्य कर पाएगी। इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए उन्होंने स्वयं पार्टी के कुछ कद्दावर नेताओं को विपक्ष की भूमिका से जोड़ा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी कुछ बड़े नेताओं के जरिए जनसंघ की स्थापना की थी।

तीन वर्ष पहले किए गए कुछ चुनावी वादों को तो भाजपा के ही बड़े नेताओ ने चुनावी जुमले कहकर दाखिल दफ्तर कर दिया। जनता ने जो बहुमत दिया शायद यह उसका इनाम था। पेट्रोल के दाम बढ़ते गए। खाद्य पदार्थ पहले ही वर्ष में महंगे हो गए। नीचे का भ्रष्टाचार ज्यों का त्यों है। कालाधन वापस लाने की घोषणाएं अभी पूरी होने का इंतजार कर रही हैं। इसके विपरीत नोटबंदी करके बेरोजगारी की समस्या भी पैदा कर दी। सैकड़ों उद्योग धंधे बन्द हो गए। प्रधानमंत्री ने अपनी पारी की शुरुआत ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ के सपने के साथ की थी। इसके लिए दिन रात मेहनत भी की थी। लोगों की उम्मीदों के खिलाफ  अपने शपथ समारोह में पड़ोसी राष्ट्राध्यक्षों के साथ पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ  को भी बुलाया था।

विकास की नीतियों में ‘रिटेल में सीधे विदेशी निवेश’ का विरोध करने वाली भाजपा ने यूपीए सरकार द्वारा मंजूर 51 प्रतिशत एफडीआई को ही आगे बढ़ाया। मेक इन इंडिया की चर्चा तो खूब की गई, किन्तु रोजगार का ग्राफ  नीचे आता ही जा रहा है। अब तो छटनी की हवा चल पड़ी है, सरकारी भर्तियां बन्द पड़ी हैं। हर व्यक्ति के बैंक खातों में 15 लाख जमा कराने का वादा ‘अच्छे दिन’ उड़ाकर ले गया। देश में नक्सलवाद बढ़ता जा रहा है। लोग मरते जा रहे हैं। अन्य अपराध, महिलाओं से जुड़े अपराधों का ग्राफ  भी बढ़ा और निर्भया जैसे मामले भी बढ़े।

कश्मीर में हालात बेकाबू हो चुके हैं। पाकिस्तान युद्ध विराम का उल्लंघन करता जा रहा है। सर्जिकल स्ट्राइक का प्रयोग निष्प्रभावी रहा। उसके बाद भी तीन बार पाक सैनिक हमारे जवानों के सिर काटकर ले गए। चीन-रूस से संबंध कड़वे हुए। सारे पड़ोसी पहले ही मुंह सुजाए हुए हैं। चीन से हुए व्यापारिक समझौते काम नहीं आए। अब तो नेपाल से भी तनाव बढऩे लगा है।

इन वर्षों में केन्द्र ने हर सरकार की तरह योजनाओं का अम्बार-सा लगा दिया। जनधन योजना, स्वच्छ भारत, प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास, उज्जवला, ग्राम सड़क योजना की शुरुआत की। 22 करोड़ जनधन खाते खुले, 100 करोड़ से अधिक आधार-कार्ड बने, स्वच्छ भारत के लिए 9000 करोड तथा स्मार्ट सिटी के लिए 7060 करोड़ रुपए आवंटित किए। 20 हजार करोड़ गंगा की सफाई के लिए रखे गए। दो वर्षों में 13 लाख शौचालय बनाए गए। कालाधन, मनरेगा, आधार कार्ड, जीएसटी और एफडीआई पर टैक्स के मुद्दों पर सरकार ने यू-टर्न लेकर मनमोहन सरकार की शैली को ही स्वीकार किया। लोकपाल की नियुक्ति अभी तक नहीं हो पाई है। उच्चतम न्यायालय के साथ कॉलेजियम को लेकर विवाद भी जारी है। धारा 370 और राम मंदिर के मुद्दे वहीं के वहीं हैं। कॉमन सिविल कोड और तीन तलाक के मुद्दे सर्वोच्च न्यायालय में हैं।

एक और परिवर्तन पिछले तीन सालों में यह सामने आया कि मोदी सरकार ने यह प्रमाणित कर दिया कि लोकतंत्र के प्रहरी-मीडिया को आसानी से जनता के बजाय सरकार के साथ जोड़ा जा सकता है। उसके मुंह में शब्द रखे जा सकते हैं। जिस सोशल मीडिया को मोदी सरकार ने सर पर बिठाया था आज वही मोदी जी के पिछले और आज के वक्तव्यों के विरोधाभास दिखा रहा है। समझने की बात इतनी ही है कि, सरकार का ध्यान कितना देश की ज्वलंत समस्याओं पर रहा। जैसे कि, जनसंख्या, गरीबी, बेरोजगारी, स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा। अन्तिम बिन्दु के व्यक्ति तक कितना लाभ पहुंच पाया-? आज तो जीवन की पहली प्राथमिकता-पीने का स्वच्छ पानी भी सबको नसीब नहीं है।

और भी कई कमियां हैं पर ये सब आज की नहीं हैं। पिछले सत्तर वर्षों से चल रही हैं। तब प्रश्न दोष देने का नहीं है। प्रश्न है उम्मीदों का। देश की जनता को प्रधानमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी से कुछ अलग ही तरह की उम्मीदें हैं। ऐसी उम्मीदें जो शायद उसने पहले देश के किसी प्रधानमंत्री से नहीं की। यह उम्मीदें रोजमर्रा के सरकारी कामकाज से हटकर हैं। उनके द्वारा कुछ क्रान्तिकारी काम करने का जनता को अभी इन्तजार है।

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