Gulabkothari's Blog

जून 19, 2017

जीएसटी?

आज जिस रूप में हम एक जुलाई से इसे लागू करने की सोच रहे हैं क्या उसमें वो ही सारी अवधारणा दिखाई पड़ रही हैं? उनमें से कुछ भी दिखाई नहीं पड़ रहा। ये चिंता का विषय भी है और सब तरफ से एक चिंता की आवाज देश भर में सुनाई भी दे रही है।

हमारे देश में राजनीति ने एक नया स्वरूप ग्रहण कर लिया है। सरकारें अपनी संतुष्टि के लिए नीतियां बनाने लगी हैं। हर दल जो सत्ता में आता है उसे अपनी संतुष्टि की परवाह ज्यादा होती है। उसके आगे वो आम आदमी के कष्टों को गौण मान लेते हैं। आज सबसे तेज चर्चा जो देश में चल रही है, वो जीएसटी की है। जीएसटी को एक जुलाई से लागू करने का प्रस्ताव भी है। जीएसटी आज का नहीं करीब-करीब 15-16 वर्ष पुराना विषय है। इतने सालों से जीएसटी पर चर्चा चल रही है। और अब जाकर के इस निर्णय पर सरकार आ रही है कि हमें इसे लागू करना है।

प्रश्न यह है कि क्या सोच कर हमने जीएसटी की अवधारणा को लागू करने की सोची। वैट वाले सिस्टम में ऐसी क्या कमियां थी कि हम उसको हटाना चाह रहे हैं। जीएसटी की सबसे बड़ी उपादेयता देश भर में करों में एकरूपता बताई गई। बहुत बड़ी बात है, यह छोटी बात नहीं है, करों में एकरूपता लाना, इंस्पेक्टर राज का घट जाना, छोटे व्यापारियों-उद्योगपतियों को इससे कितनी बड़ी राहत होती है। इसमें संदेह नहीं है लेकिन आज जिस रूप में हम एक जुलाई से इसे लागू करने की सोच रहे हैं क्या उसमें वो ही सारी अवधारणा दिखाई पड़ रही हैं? उनमें से कुछ भी दिखाई नहीं पड़ रहा। ये चिंता का विषय भी है और सब तरफ से एक चिंता की आवाज देश भर में सुनाई भी दे रही है।

अभी 15 जून को कपड़ा व्यापारियों ने देशभर में हड़ताल की थी, इसी जीएसटी के खिलाफ। अभी सरकार के ही नागरिक उड्डयन विभाग ने कहा है कि एक जुलाई को लागू करने की तैयारी हमारी नहीं है। हमको कम से कम सितंबर तक का समय दिया जाना चाहिए। सवाल ये है क्या एक विभाग की तैयारी नहीं है या बाकी विभागों की बात किसी एक विभाग के जरिए हम बाहर पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। मंशा तो सभी विभागों की हो सकता है यही हो। क्योंकि इस वक्त जो देश के हालात चल रहे हैं। उनको बहुत गंभीरता से समझना पड़ेगा। भाजपा सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री सुब्रह्रमण्यम स्वामी ने तो यहां तक कहा कि 2019 के पहले यदि जीएसटी लागू कर दिया तो केंद्र सरकार को भारी पड़ जाएगा। वो भी एक वाटरलू जैसा कांड हो जाएगा। ये सही है कि इतना दूर हमारी सरकार को देखना तो पड़ेगा। आज हम किस स्थिति में से गुजर रहे हैं, ये तो देखें। क्या हमको नहीं मालूम है कि नोटबंदी के बाद देश की क्या स्थिति रही आर्थिक स्तर पर? आज नकदी की जो समस्या है, उसको कौन नकार रहा है। खुद एसबीआई और हमारे आर्थिक सलाहकार लोग कह रहे हैं कि देश में बड़ा आर्थिक संकट है। सात लाख करोड़ के कर्जे तो जो बड़े-बड़े प्रभावी लोग हैं वो वापस नहीं चुका रहे हैं। किसानों के ऋण माफ किए तो वो तीन लाख करोड़ का भार आने वाला है। दस लाख करोड़ तो ये ही हो गए। इसके साथ-साथ ये भी देखना है कि महंगाई की मार कितनी पड़ती है। हमारी जीडीपी की दर घटकर 6.1 प्रतिशत पर आ गई।

बेरोजगारी की स्थिति सबके सामने है। किसानों की हड़ताल से जो नुकसान हो रहा है। इसमें भी तो ये सारी प्रतिक्रियाएं दिखाई दे रही हैं। हर आंदोलन इसी जीएसटी के नाम पर होना भी जरूरी नहीं है? पर उन सब अभिव्यक्तियों के अंदर उनकी मंशाओं में जाएंगे तो सबको आर्थिक संकट ही दिखाई पड़ रहा है। और उसके अलावा भी देखें की जो सुविधाएं जो प्रावधान जीएसटी ने वापस किए वो सब वह नहीं हैं जो शुरूआती अवधारणा में थे। आज खुद जीएसटी एक दर पर टिका हुआ नहीं दिखाई दे रहा, उसके आठ स्तर बना दिए। कैसे बना दिए आठ स्तर? जीएसटी की तो एक दर देश में रखनी थी। आठ स्तर कहां से हो गए।

हमको इंस्पेक्टर राज से मुक्ति दिलानी थी। आज उल्टा ये है कि छोटे-छोटे व्यापारियों को जो तीन-चार फॉर्म भरने पड़ते थे, उनको तीन दर्जन फॉर्म भरने पडग़ें। लग यह रहा है कि हम सुविधाओं की बात तो कर रहे हैं कि सुविधाएं बढ़ेंगी, महंगाई भी घटेगी। लेकिन ये सरकार की घोषणाएं तो ठीक उसके विपरीत जा रही हैं। तब ये स्वभाविक है कि लोग नाराज तो होंगे। देश के हर कोने से इस नाराजगी की आवाज अब आ रही है। प्रश्न ये है कि ये आवाज सरकार के कानों में कितनी पहुंचती है? सरकार की खुद की तैयारी कितनी है कि दस लाख करोड़ की ये कमी और उसके बाद किसानों की मांगें पूरी करना। अगर किसानों की ही मांगें हर प्रदेश की पूरी हो गई तो वो कितना भार आने वाला है। और क्या सरकारें उससे बच सकती हैं और क्या जेटली जी के कहने से लोग मान जाएंगे कि राज्य सरकारें अपना-अपना निर्णय खुद करेंगी। ये सब भुलावे की बातें हैं। जो परिस्थितियां बनेंगी वो कुछ और बनने वाली हैं। और इन जुमलों से परिस्थितियों का सामना हम नहीं कर पाएंगे। हमें यथार्थ के धरातल पर काम करना चाहिए और इतनी बड़ी नीति में परिवर्तन से पहले लोगों को विश्वास में लेना पहली जरूरत है। बल्कि आज वैट जो भी चल रहा है इन नई परिस्थितियों के मुकाबले में तो ठीक ही है।

यह भी सही है कि कई विकसित देशों में जीएसटी लागू हुई। पर क्या कहीं पर भी 20 प्रतिशत से ऊपर जीएसटी है? बल्कि 15 और 20 प्रतिशत के बीच में ही है। फिर हमारे यहां 28 प्रतिशत जीएसटी तक पहुंचने की जरूरत क्या है? हमारे यहां तो लोगों के पास रोटी खाने को नहीं है, पीने को साफ पानी भी नहीं है और हम 28 प्रतिशत जीएसटी पर जा रहे हैं। ये वो बड़े सवाल हैं जो छोटे व्यापारियों को अभी भी दुख दे रहे हैं। उनकी समस्याएं घटने के बजाए बढऩे वाली दिख रही हैं। महंगाई भी बढऩे वाली दिख रही है। इन सब चीजों पर संवेदनाओं के साथ पुनर्विचार होना चाहिए। और इस जीएसटी का अगले पांच सालों में देश की आर्थिक व्यवस्था पर क्या असर पड़ता है, उसका आंकलन अभी हमारे हाथ में होना चाहिए। हम गलतियों को ढंकने की कोशिश करते हैं, लेकिन वो फिर नासूर बन कर के प्रकट हो जाती हैं, वो स्थिति आगे ना आए और जीएसटी को हमे और दो-चार महीने आगे भी करना पड़ा तो इतने बड़े देश में ये कोई बड़ी अवधि नहीं है। प्रश्न ये है कि हम निश्चिंत होकर पूरे देश की जनता को विश्वास में लेकर ये काम करेंगे तो सुखद परिणाम भी होंगे और पूरा देश केंद्र सरकार के साथ हाथ मिलाकर के काम करेगा।

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