Gulabkothari's Blog

August 19, 2017

जैसा अन्न- वैसा मन

प्रकृति के सिद्धान्त समय, व्यक्ति अथवा क्षेत्र के साथ बदलते नहीं हैं। प्रकृति प्रत्येक कर्म का निश्चित फल भी देती है। हां, यह हमारी समझ से परे है कि फल कब मिलेगा। कहते हैं- ‘वहां देर है, अंधेर नहीं है।’ कर्म का केन्द्र मन होता है। मन में इच्छा पैदा होगी तभी कर्म होगा। और मन बनता है अन्न से। ‘जैसा अन्न, वैसा मन’। मन का सत्वभाव अन्न शुद्धि पर ही टिका है। सात्विक, राजस, तामस जैसा भी अन्न खाया जाएगा वैसा ही भाव भी मन में पैदा होगा। मनु ने तो अन्न दोष को ही व्यक्ति की जीवित-मृत्यु का कारण माना है। तब क्या आश्चर्य है कि अनेक बड़े-बड़े नेताओं, अधिकारियों और उद्योगपतियों के आचरण तथा उनकी सन्तानों के आचरण आसुरी हो रहे हैं। ऐसा पहली बार नहीं है। हर काल में होता रहा है। जाति, धर्म, राजनीतिक दलों की इसमें कोई सीमा नहीं होती। ऐसे दागी हर जगह मिल जाते हैं।

हाल ही हमारे सामने कुछ नाम सार्वजनिक हुए हैं- पूर्व मंत्री (उ.प्र) याकूब कुरेशी की चाबुक वाली बेटी आशमां, सपा नेता का भतीजा मोहित यादव, राहुल महाजन, महिपाल मदेरणा, मलखान सिंह, बी.बी. मोहन्ती, मधुकर टंडन, अमित जोगी, विकास-विशाल यादव, विकास बराला से लेकर तेजस्वी-मीसा तक के उदाहरण रिकॉर्ड पर हैं। भले ही नेता सत्ता के जोर पर अपराधों को ढंकने में कामयाब हो जाएं, किन्तु ईश्वर की नजर से कैसे बचेंगे। कहते हैं कि ईश्वर जिससे रुष्ट होता है, उसे खूब धन, समृद्धि देता है ताकि वह ईश्वर से बहुत दूर चला जाए। उसको याद भी नहीं करे। और जिससे प्रेम करता है उसको तिल-तिल कर जलाता है। ताकि वह एक पल को भी दूर न हो।

स्वामी राम नरेशाचार्य ने पत्रिका के ही एक कार्यक्रम में कहा था-‘कोई मंगल उपस्थित हो जो हमारे जीवन को उत्कर्ष देने वाला है तो हमारे यहां कहा जाता है, हमारे पुण्य का फल है। वैसे तो आपने देखा है, गलत तरीके से जीवन जीकर भी आदमी मोटा हो जाता है, बड़े पद पर चला जाता है, धनवान हो जाता है। लेकिन उसको, शास्त्र कहते हैं कि यह उसके पुण्य का फल नहीं है, उसके पाप का फल है, क्योंकि निश्चित रूप से यह उसे दु:ख देगा, लांछित करेगा, जेल में पहुंचाएगा, उसकी पीढिय़ां दर पीढिय़ां लांछित होंगी, नष्ट हो जाएंगी। यदि सही रीति से कोई आगे बढ़ा है तो ही वह सुख प्राप्त करता है और जीवन का जो परम उत्कर्ष है जहां स्थायित्व है, पुनरावर्तन नहीं है उसको प्राप्त करता है।’ मनुस्मृति में कहा है-

‘अधर्मेणैधतेतावत्ततो भद्राणि पश्यति।
सपत्नाञ्जयते सर्वान् समूलस्तु विनश्यति ॥’

अर्थात्-प्रथमत: मनुष्य अधर्म से बढ़ता है और सब प्रकार की समृद्धि प्राप्त करता है तथा अपने सभी प्रतियोगियों से आगे भी निकल जाता है किन्तु समूल नष्ट हो जाता है। इसका भावार्थ है कि अधर्म के जरिए उत्पन्न अन्न जिसके भी भोग में आएगा, उसका, उसकी सन्तानों का, सम्बन्धियों का सम्पूर्ण (जड़ सहित) नाश निश्चित है। ऐसे अन्न का अर्जन करने वाला यह सुनिश्चित कर जाना चाहता है कि इस अन्न का भोग करने वाला अपराधी, असामाजिक तत्त्व के रूप में भी जाना जाए। कुल को कलंकित भी करे तथा अन्त में समूल नष्ट हो जाए। आज जिस गति से भ्रष्टाचार बढ़ता जा रहा है, भ्रष्ट लोगों के परिजन नित्य-प्रतिदिन समाजकंटक के रूप में सामने आते जा रहे हैं। हर युग मे ऐसे प्रमाण सामने आते रहे हैं। पारिवारिक कलह, असाध्य रोग और अकाल मृत्यु के योग बने रहते हैं। आज तो इनके नाम बड़े-बड़े घोटालों में अपयश प्राप्त करते हैं।

हम प्रकृति की सन्तान हैं। न अपनी मर्जी से पैदा होते हैं, न ही मर्जी से मर सकते हैं, केवल कर्म हमारे हाथ में है। चूंकि आज अन्न भी तामसिक हो गया है। गीता १७/१० में तामस भोजन को परिभाषित करते हुए कहा गया है कि, ‘झूठ-कपट, चोरी-डकैती, धोखेबाजी आदि किसी तरह से पैसे कमाए जाएं, ऐसा भोजन तामस होता है।’ इसी तरह गीता १६/१२ में अन्यायपूर्वक धन संचय करने वाले के लिए कहा गया है कि ‘आसुरी प्रकृति वाले मनुष्यों का उद्देश्य धन संग्रह करना और विषयों का भोग करना होता है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए वे बेईमानी, धोखेबाजी, विश्वासघात, टैक्स की चोरी आदि करके, दूसरों का हक मारकर, मन्दिर, बालक, विधवा आदि का धन दबाकर और इस तरह अन्यान्य पाप करके धन का संचय करना चाहते हैं।’

आज स्वाद स्वभाव पर भारी पड़ रहा है। जंक फूड, विषाक्त अन्न और आपराधिक, भ्रष्ट आचरणों से अर्जित अन्न समाज और देश के नवनिर्माण की सबसे बड़ी बाधा है। पिछले दस-बीस वर्षों के मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों, दल के नेताओं का इतिहास देखें, उनकी सन्तानों का आकलन आज करें, तो सारे प्रकृति के समीकरण समझ में आ जाएंगे। और यह भी समझ में आ जाएगा कि अपने परिजनों के इनसे बड़े शुभचिन्तक भी कौन होंगे, जो इनके सम्पूर्ण नाश की व्यवस्था करके जाते हैं-रावण और कंस की तरह। और यह भी तय है कि भविष्य की भी यही तस्वीर है। भ्रष्टों की सन्तानें अधिक भ्रष्ट होंगी। समाज को आतंकित करेंगी। पुलिस उनकी ही सहायता करेगी। जनता को स्वयं इस समस्या से लडऩा पड़ेगा। सत्ता का अहंकार सत्व गुण का विरोधी होता है। सत्ता भी भ्रष्ट तरीकों से हासिल की जाने लगी है। खुद अपराधी सत्ता में बैठने लगे हैं। ईश्वर उनको सद्बुद्धि दे, वरना सरकारी आतंक ही सुख-चैन छीनने का माध्यम बन जाएगा। रक्षक ही भक्षक हो जाएंगे।

August 15, 2017

हे ‘नाथ’ सन्त!

योगी आदित्यनाथ ‘नाथ’ सम्प्रदाय के महन्त हैं, जिसमें योगी मच्छेन्द्रनाथ, जलंधरनाथ, गोरखनाथ जैसे ऋषि तुल्य गुरु हुए हैं। यह सम्प्रदाय अखाड़ों के रूप में फैला हुआ है और रजवाड़ों के समय में शहरी सुरक्षा व्यवस्था के लिए जाना जाता था। आध्यात्मिक क्षेत्र की विशिष्ट परम्पराओं के लिए भी यह सम्प्रदाय जाना जाता है। आज योगी आदित्यनाथ राजनीतिक अखाड़े में उतर चुके हैं। राजनीति किसी मर्यादा एवं संवेदना से सम्बन्ध नहीं रखती। यह बात गोरखपुर के बीआरडी अस्पताल में ४८ घंटों में हुई ३० बच्चों की मौत से प्रमाणित हो गया। योगी के मुख से क्षमा याचना और धार्मिक मर्यादा से जुड़े दो शब्द भी नहीं निकल पाए। ऑक्सीजन की समाप्ति की चेतावनी दरकिनार हो गई। किसी को योगी की नाराजगी का डर नहीं था क्या?

योगी सरकार ने पहले मृतक बच्चों के शवों का पोस्टमार्टम करवाने से क्यों मना कर दिया? क्या यह कार्य धर्म विरुद्ध था? क्या किसी निजी अस्पताल को ऐसी ही दुर्घटना पर माफ कर दिया जाता? मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल का निलम्बन क्यों किया, क्या उसे बर्खास्त नहीं किया जाना चाहिए था।

दो शर्मनाक व्यवहार के उदाहरण योगी के धार्मिक आचरण को सीधा कलंकित करते हैं। वैसे तो सम्पूर्ण दुर्घटना ही सरकार पर कलंक है। उस पर स्वास्थ्य मंत्री का बयान दुर्घटना का मुंह चिढ़ा रहा है। वाह रे राजनीति! ‘अगस्त में मौत का आंकड़ा बढ़ जाता है। बच्चों की मौत उस समय में नहीं हुई, जब ऑक्सीजन समाप्ति का अलार्म बज रहा था। छह घंटे के बाद हुई।’ यह निर्लज्जता, निर्दयता और संवेदनहीनता की पराकाष्ठा ही कही जाएगी। इस पर योगी का महन्ती मौन?

सबसे दर्दनाक और अमानवीय कार्रवाई जो धार्मिक छाते के नीचे हुई वह थी डॉ. कफील खान को पद से हटा देने की। यह वार्ड के प्रभारी थे जिन्होंने इतने बच्चों की मृत्यु के बाद अन्य अस्पतालों से ऑक्सीजन सिलेण्डर मंगाए थे ताकि आगे बच्चों को मौत के मुंह से बचाया जा सके। ऐसे प्रयासों के लिए तो सरकार को उन्हें पारितोषिक देना चाहिए था। यहां भी राजनीति ही संस्कारों पर भारी पड़ गई। और यह सब कुछ धार्मिक चोगे के रहते।

योगी को एक तथ्य पर अवश्य विचार करना चाहिए कि यदि गोरखनाथ यह सब देख रहे होंगे तो क्या मन में आ रहा होगा उनके? क्या उनके उत्तराधिकारियों का भी ऐसा आचरण उन्हें स्वीकार होगा? राजनीति पर सम्प्रदाय हावी रहे तो उत्तम, सम्प्रदाय पर राजनीति हावी हो गई तो गद्दी ही कलंकित हो जाएगी। इस सबका समाधान यह है कि वे, वो करें जो उनका दिल कहे। किसी और को उनके विचारों को प्रभावित करने की छूट नहीं होनी चाहिए। और यदि वर्तमान भूमिका में उन्हें दिल की सुनना असंभव लगे तो गद्दी किसी और को सौंप खुद पूरी तरह राजनीति में उतर जाना चाहिए। वर्ना दो घोड़ों की सवारी हमेशा जान को जोखिम में बनाए रख सकती है।

August 3, 2017

भय बिन होत न प्रीत

माननीय जस्टिस खेहर,
भारत के मुख्य न्यायाधीश

आपकी टिप्पणी ‘आखिरकार हम ठहरे तो भारतीय ही। कानून और कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन हमारे खून और संस्कृति में है।’ ‘आज यह एक चलन बनता जा रहा है कि मैं कानून का पालन नहीं करूंगा। मैं कोर्ट के निर्देशों को नहीं मानूंगा। जो भी हो, इसमें मुझे कोई फर्क नहीं पडऩे वाला है।’ संवेदना भी प्रकट कर रही है और न्यायालयों की कार्यप्रणाली का प्रभाव भी दिखा रही है। मान्यवर! हमारे देश की संस्कृति सदा संस्कारवान ही रही है। आज की शिक्षा, सत्ता का अहंकार, क्षुद्र स्वार्थ और न्यायपालिका का नरम रवैया ही अवमानना की मानसिकता को खून में प्रवाहित करने के कारण हैं। यह तो सही है कि सुविधाओं के लिए न्यायपालिका सरकारों की ओर से देखती है, किन्तु इतनी बड़ी कीमत चुकाकर संविधान तथा न्यायपालिका की हैसियत को समय-समय पर आहत भी किया है।

सत्ताधीशों, प्रभावशाली अधिकारियों तथा सरकारों की अमर्यादित कार्यशैली पर मौन रहना, स्वप्रसंज्ञान न लेना और बड़े लोगों को सजा के स्थान पर लम्बी अवधि की सुविधा देने के लिए क्या न्यायालय दोषी नहीं हैं? हमारे सामने दर्जनों बड़े-बड़े उदाहरण हैं जहां राज्य सरकारों ने न सर्वोच्च न्यायालय के कई फैसले ही लागू करवाए, न ही राज्य के उच्च न्यायालयों के। आज तक किसी भी मंत्री या अधिकारी को जेल नहीं जाना पड़ा। फिर कैसी अवमानना? जब न्यायाधीशों को अवमानना ही नहीं लगे, अवमानना करने वालों के हौसले बुलन्द क्यों नहीं होंगे!

मान्यवर! इससे भी गंभीर प्रश्न यह है कि अवमानना घोषित होने पर सजा न देना एक पहलू है, दूसरा मुख्य पहलू यह है कि इस स्थिति के चलते सारा जनहित अनदेखा होता जा रहा है। जनहित के कई बड़े-बड़े फैसले अनेक कारणों से लागू ही नहीं हो पाते। इसके लिए अलग से विभाग भी होना चाहिए, जो फैसलों की क्रियान्विति पर नजर रख सके।

राजस्थान उच्च न्यायालय में ही हर माह सरकार के बड़े अधिकारियों को अवमानना मामलों में तलब किया जाता है। प्रश्न है कि परिणाम क्या निकले! जयपुर के निकट रामगढ़ बांध, जिसकी भराव क्षमता साठ फुट से अधिक है, वर्षों से सूखा पड़ा है। अनेक बार हाईकोर्ट की टिप्पणियां भी जारी हुईं कि प्रवाह क्षेत्र मे कॉलोनियां न बसने दी जाएं, अतिक्रमण न किए जाएं, निम्स विश्वविद्यालय के निर्माण प्रवाह क्षेत्र से हटा दिए जाएं। आज भी न कोई कार्रवाई, न अवमानना में कोई सजा! प्रदेश में तो यह भी हुआ, जिन १९ वरिष्ठ अधिकारियों पर मामले चल रहे थे उन्हें भी राज्य सरकार ने वापस ले लिया।

विभिन्न शहरों के मास्टर प्लान बदलते रहने के मामले की सुनवाई के दौरान माननीय न्यायाधीशों ने अधिकारियों को फटकार लगाते हुए जारी निर्देशों की पालना करने के आदेश दिए। क्या फटकार लगाना, ऐसे जनहित के महत्वपूर्ण मुद्दों में, पर्याप्त है? अफसर तो बदलते ही रहते हैं। अगली सुनवाई पर दूसरा आ जाएगा। तब किसको चिन्ता पड़ी अवमानना की। यह चिन्ता तो न्यायपालिका को ही करनी पड़ेगी। पूरे देश पर अंगुली उठाना तो उचित नहीं कहा जा सकता।

एक और परम्परा भी देखने को मिल रही है। प्रदेश के उच्च न्यायालय यदि जनहित में कोई महत्वपूर्ण फैसला राज्य सरकार के खिलाफ देता है, तो राज्य सरकारें इस तरह के फैसले के विरुद्ध सर्वोच्य न्यायालय पहुंच जाती हैं। फैसला लागू ही नहीं हो पाता। तब सरकारें क्यों डरने लगीं अवमानना से। होना तो यह चाहिए कि राज्य सरकारों को बाध्य किया जाए कि पहले फैसला लागू करें, फिर अपील करें।

जबलपुर हाईकोर्ट का निर्णय कि प्रमोशन के दौरान आरक्षण लागू न हो, अभी तक उच्चतम न्यायालय में अटका पड़ा है। क्या इससे उच्च न्यायालय की मानसिकता को चोट नहीं पहुंचेगी? इसी प्रकार दूध के दाम और नियंत्रण के अधिकार का २०१५ का फैसला उच्चतम न्यायालय में निलंबित है। वहां अधिकांश मामले निपटने तक सरकारें ही बदल जाती हैं।

शहरों की सफाई, यातायात, कारों के शीशों पर काली फिल्में लगाना, ध्वनि प्रदूषण, रात्रि में पटाखे चलाने जैसे कार्यों की सूची तो लम्बी है। क्या राज्यों में भी कानून विभाग में ऐसे अधिकारी नहीं होने चाहिएं जो कानून एवं फैसलों की पालना के लिए जिम्मेदार हों? सबसे जरूरी तो यह है कि अवमानना को एक सीमा के बाद नजरअंदाज ही न किया जाए। भ्रष्टाचार ही बढ़ेगा। जो लोग न्यायालय की अवमानना या कानून का उल्लंघन करते हैं उनके मन में डर पैदा होना आवश्यक है। उनमें यह डर पैदा हो, इसकी जिम्मेदारी भी न्यायपालिका की ही है।

आज सारा देश न्यायपालिका की ओर आशा की किरण तलाश रहा है, कार्यपालिका और विधायिका विश्वास खोती जा रही है, ऐसे में माई लॉर्ड, आपकी टिप्पणी देश को निराशा की ओर ले जाएगी। अब भी समय है, आप न्यायपालिका के लिए प्रकाश स्तम्भ की भूमिका निभा सकते हैं ताकि देशवासियों का न्याय के प्रति विश्वास और अधिक सुदृढ़ हो सके।

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