Gulabkothari's Blog

September 22, 2017

या देवी सर्व भूतेषु!

‘या देवी सर्व भूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्ये, नमस्तस्ये, नमस्तस्ये नमो नम: ॥’

हे दुर्गे! हे प्रकृते! तेरे तीनों गुण- सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण क्रमश: सुख, दु:ख और मोह स्वभाव वाले हैं। प्रकाशक, प्रवर्तक एवं नियामक भी हैं। सत्वगुण का कार्य प्रकाश (प्रकट) करना, रजोगुण का कार्य प्रवर्तन करना तथा तमोगुण नियमन कर्ता है। तेरी शक्ति से ही शिव भिन्न-भिन्न रूप में विश्व बनता है। तेरे से बाहर विश्व में चेतन-अचेतन कुछ नहीं है।

हे शकेृ! आजादी के समय देश ने कुछ सपने देखे थे। राष्ट्र का संचालन हमारे चिन्तन और संस्कृति के अनुकूल होगा। इसी के अनुरूप ज्ञान की धारा बहेगी। कोई गरीब नहीं रहेगा। किसी का शोषण नहीं होगा। मेहनती, चरित्रवान और बुद्धिप्रधान युवा शक्ति देश का नेतृत्व करेगी। आज वह बेरोजगार घूम रही है। राष्ट्र का एकता और अखण्डता का सपना पूरा होगा। आज तो धर्म, जाति, सम्प्रदाय, क्षेत्र, भाषा जैसे असुर इस यज्ञ को भ्रष्ट कर रहे हैं। ये फूट ही स्वतंत्रता के लिए सबसे बड़ा खतरा है। रक्तबीज की तरह बढ़ रहा है।

हमारे संविधान की भूमिका में, तेरी साक्षी में, हे सरस्वत्ये! तीन पुष्प जनता को समर्पित किए थे- समानता का अधिकार, स्वतंत्रता और बन्धुत्व का अधिकार। वरुण की सेना ने छीन लिए सारे सपने। समान नागरिक संहिता तक नहीं बनी, देश का ‘भारत’ नाम नहीं पड़ पाया, ऊंच-नीच वैसे ही है। बड़े-बड़े नेता दलितों के घर जाते हैं भोजन का दिखावा करने। विकास के समान अवसर शिक्षा की सुरसा निगल गई। बच्चा जीवन की शुरुआत ही विषमता से करता है। महिलाओं के प्रति अपराध बढ़े हैं। राजनीति का भी स्वरूप ‘राम राज्य’ के स्थान पर लंका जैसा, राक्षस रूप हो गया। धर्म में राजनीति प्रवेश कर गई। बड़े-बड़े संत विकराल दैत्य रूप धारण करने लगे हैं। सफेदपोश नेता भी वोट की राजनीति करने के लिए सांपों को दूध पिला रहे हैं। यह नया गठजोड़ देश के सीने पर कटार बन गया है।

हम तेरा आह्वान करते हैं, हे काली! इन असुरों का अपने खड्ग से सिर विच्छेद कर। अगले नौ दिनों में ये भ्रष्टाचारी, जन-धन के चोर, बढ़-चढक़र तेरी आराधना का ढोंग भी रचाने वाले हैं। जड़ स्वभाव वाली लक्ष्मी के पीछे दौडऩे से इनकी मति भी जड़ हो गई है। उल्लू के वाहन पर अंधकार में विचरण करने वाली लक्ष्मी के पुजारी मद-मस्त होकर देश को विदेशी हाथों बेचने के सपने देख रहे हैं। बहुत कुछ व्यापार ठप हो चुका। बाकी अपे्रल के बाद होने लग जाएगा, जब विदेशी माल शुल्क मुक्त प्रवेश करने लगेगा देश में। सोने की चिडिय़ा भी अब नहीं बनेगा भारत और आज की गुलाम परस्त (पेट भरने मात्र के लिए) शिक्षा विश्वगुरु भी नहीं बनने देगी। न धर्म-ज्ञान-वैराग्य-ऐश्वर्य रूपी विद्या देश में प्रचारित होगी, न अभ्युदय की फिर कोई दुंदुभि बजेगी। रणभेरी बजाओ मां! शस्त्र उठाओ! चारों ओर भस्मासुर और महिषासुर के सींग ललकार रहे हैं। आरक्षण ने देश को खण्ड-खण्ड कर दिया है। शुंभ-निशुंभ से अधिक बलवान हैं। नि:श्रेयस के मार्ग को बन्द कर रखा है।

हे शक्ति स्वरूपा दुर्गे! सुर-असुर दोनों का अस्तित्व तुझसे ही है। तुझसे बलवान भी अन्य कोई नहीं। तब क्यों महिलाएं तेरे राज में असुरक्षित हैं? क्यों कानून का राज नहीं ठहर पाता? क्यों मैं अपने देश में बिना टोल दिए यात्रा नहीं कर पाता? दो पैसे भी कमाता हूं तो सरकार गली निकालकर कर लगा देती है। सत्तर साल हो गए, मां! वरुणपाश बढ़ते ही जा रहे हैं। किसानों के साथ अब तो व्यापारी भी आत्म-हत्या करने लगे हैं। सत्ता में संविधान कौन पढ़ता है। सब झूठ और अमर्यादित बोलने में गर्व महसूस कर रहे हैं, दुर्गे! क्या वे ही तुम्हारी सन्तान हैं? उनके आगे कानून-पुलिस सब घुटने टेकते जान पड़ते हैं। कोई प्रत्यक्ष, कोई परोक्ष।

अब तू ही बता प्रकृते! क्यूं करे कोई तेरी आराधना? या हमारे पापों का ही फल हम भोग रहे हैं? तब तेरी क्या आवश्यकता रह जाएगी? फिर तो कृष्णा के स्थान पर कृष्ण को याद करेंगे, जो कह गए-‘यदा यदाय धर्मस्य….’ पर यह देश आस्थावान है। यहां संस्कृति प्रकृति का सम्मान करती है। हम प्रतीक्षा करेंगे, हे देवी! तू आएगी, दु:ख और संहार से देश को बाहर निकालेगी। आज से नवरात्र में स्वागत करता तेरा, ये देशवासी।

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