Gulabkothari's Blog

फ़रवरी 6, 2018

अवसर तो है…?

विधानसभा में सोमवार को विवादास्पद विधेयक वापस लेने की तैयारी नहीं दिखाते हुए प्रवर कमेटी के कार्यकाल को अगले सत्र के लिए बढ़ा दिया। यानी सरकार ने काले कानून वाले विधेयक को निरस्त तो किया नहीं। बल्कि सदन को अपनी मंशा समझाते हुए विधेयक को प्रासंगिक भी बताया। इसमें आश्चर्य केवल इतना ही हुआ कि सदन में उपस्थित सत्ता पक्ष के एक घनश्याम तिवाड़ी को छोडक़र किसी विधायक की आवाज तक नहीं निकली मानो सभी राज्य में लोकतंत्र को नकारना चाह रहे थे। सब जानते हैं कि, यदि यह विधेयक पास हो गया और कानून बन गया तो कार्यपालिका, न्यायपालिका, मीडिया कुछ भी स्वतंत्र नहीं रहेंगे। राजस्थान से लोकतंत्र विदा हो जाएगा। और भाजपा के सभी विधायक मानो इसे धक्का देने को तैयार ही बैठे हैं। और यह सब कुछ होगा, लोकतंत्र के नाम पर चुनी हुई सरकार द्वारा। जनता के साथ इससे बड़ा धोखा और हो भी क्या सकता है?

हाल ही के उपचुनावों में जनता ने सरकार को आईना दिखा दिया। सम्पूर्ण चुनाव क्षेत्रों से ही भाजपा को देश निकाला दे दिया। देश के इतिहास में पहली बार सत्ता पक्ष को सभी क्षेत्रों में हार का ऐसा उदाहरण शायद ही मिले। उसके बाद भी सरकार अपनी हठधर्मिता पर अड़ी हुई है। वह विधेयक को प्रासंगिक भी मानती है और इसके विरोध को अनर्गल भी कहती है। मानो लोकतंत्र को मिटाकर फिर से राजाओं के राज को स्थापित करना चाहती है। क्या सभी विधायक भी यही चाहते हैं, यह भी जनता को जानने का अधिकार है। जैसे एक दिन के लिए भिश्ती को राजा बनाया तो उसने चमड़े के सिक्के चला दिए, यह कहावत है। आज तो प्रदेश इस कहावत को चरितार्थ होते स्पष्ट देख रहा है।

हाल ही एक स्थानीय टीवी चैनल के राज्य प्रभारी ने अपने साक्षात्कार में कहा है कि, यदि आज राज्य में चुनाव होते हैं तो सत्ता पक्ष को ८-१० सीटें ही मिलेंगी। लेकिन सरकार तो केवल सोशल मीडिया पर ही विश्वास करती है। उसी के माध्यम से छवि सुधार करने के लिए २० करोड़ रुपए का बजट प्रावधान भी किया है। यह सारा कुछ सरकार के सलाहकारों की समझ पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है। हाल के चुनाव परिणाम भी उन्हीं की सलाह का परिणाम हैं। प्रश्न यह भी है कि सत्ता में प्रतिष्ठा, व्यक्तिगत अहंकार की होनी चाहिए अथवा सरकार की। यहां सरकार की मंशा स्पष्ट रूप से विधेयक को वापस लेने की नहीं है। जनता का दिया गया बहुमत ही इस अहंकार का कारण है। जनता अगले विधानसभा चुनाव में जो चाहे कर ले, आज तो कुछ नहीं कर सकती।

चुनौती तो असल में प्रदेश के युवा के सामने है कि, उसे अपना भविष्य कैसा चाहिए? इसके लिए अपनी भूमिका आज ही तय करनी होगी। अपने भाग्य के निर्माण को अपने ही हाथ में लेना पड़ेगा वर्ना हो सकता है कि, आजादी के संघर्ष पर ही प्रश्न खड़ा हो जाए। प्रदेश फिर से लोकतंत्र का गुलाम होकर रह जाए।

हां, इसमें अभी एक आशा की किरण है। और वो है, सरकार की सद्बुद्धि। सरकार प्रदेश को अनहोनी से बचा सकती है। फिर से आजादी का नया वातावरण पैदा कर सकती है। और जनता से फिर एक सीधे संवाद का मार्ग प्रशस्त कर सकती है। यह सरकार के हाथ में है कि, वह चाहे तो विधानसभा की प्रवर समिति को दिया हुआ विधेयक सदन के माध्यम से वापस भी ले सकती है। सारा परिदृश्य सरकार के पक्ष में हो जाएगा। अब तक जो कीमत सरकार ने चुकाई वह भी कम नहीं है। आगे न चुकानी पड़े, उसी में भलाई है। अत: सरकार को अपनी हठधर्मिता छोडक़र इसी सत्र के चलते यह निर्णय कर लेना चाहिए।

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