Gulabkothari's Blog

मार्च 1, 2018

सब एक रंग…

भारत में चार सांस्कृतिक राष्ट्रीय उत्सव रहे हैं-होली, रक्षाबन्धन, दशहरा और दीपावली। समय के साथ कुछ नए पर्व जुड़ गए। इनमें एकमात्र होली ही ऐसा त्यौहार है जिसे सभी वर्ग समान रूप से, मिलजुलकर मनाते हैं। सर्वाधिक उल्लास का पर्व है। इसमें सबकी पहचान खो जाती है। कोई छोटा-बड़ा भी नहीं रह जाता। एक-दूसरे के प्रति जो शिकवे-शिकायत होती है, वह भी धुल जाती है या यूं कह लें कि रंगों में घुल जाती है। एक नए संकल्प के साथ नए जीवन की डगर पर पांव रखते हैं। हर कोई दूसरे को अपने रंग में रंगना चाहता है। तब अपने पास रंग कैसा होना चाहिए? जो शरीर पर लगे और भीतर तक को स्पन्दित कर दे, रंग दे।

रंगना, किसी के रंग में रंग जाना ही तो भक्ति की परिभाषा है। जिस रंग पर दूसरा रंग न चढ़े, वही तो भक्ति है। तब सोचिए, यह रंगने का त्यौहार कितना गूढ़ अर्थ रखता है। आपका रंग किसी पर कब चढ़ेगा? वह तो एक ही रंग है-प्रेम का। इसमें शरीर की भूमिका ही नहीं है। मैं शरीर नहीं हूं-शरीर मेरा है। ‘अहं ब्रह्मास्मि’ बनकर जब ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के लिए निकलूं, तब प्रेम बरसेगा। होली का त्यौहार इसी का अभ्यास है। स्थूल के माध्यम से सूक्ष्म को रंगा जाता है। यहां न कोई काला है, न ही कोई ताला है। जो तू वही मैं।

होली मनों के मैल धोने का त्यौहार है। पर्व तो पौरी को कहते हैं, जहां से नया निर्माण (कोपल) फूटता है। प्रत्येक पर्व पर हमें भी नए निर्माण के लिए स्वयं को संकल्पित करना है। हमारा लक्ष्य देश को अखण्ड एवं मूल्यवान बनाए रखना है। यह कार्य तपस्या जैसा होगा। सच्चाई का मार्ग कांटों भरा होता है। बीच-बीच में ईश्वर भी हमारी परीक्षा लेता रहता है। किन्तु दृढ़ संकल्पवान सदा उत्तीर्ण ही होते हैं। हमें भी उत्तीर्ण ही होते रहना है। हम मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारे कहीं भी जाएं, हमारी एक ही प्रार्थना रहनी चाहिए। होली के रंगों में हमारी पहचान खो जाए। हम भारतीय रह जाएं। हमारे सम्प्रदाय और धर्म घर तक रहें, पूजाघरों तक रहें। बाहर हम सब एक रंग में रंगे नजर आएं। नई पीढ़ी मेरी इस बात पर अवश्य गौर करे, यह मेरा अनुरोध है। धर्म ने, सम्प्रदायों के रहनुमाओं ने हमें मशीन बना दिया। हमें ग्रन्थ पकड़ा दिए कि इनको पढ़ते जाओ और वैसे ही जीते जाओ। स्वतंत्र रूप से जीने की इजाजत नहीं है। और ग्रन्थ कितने अनगिनत। सारे अनुयायी एक फैक्ट्री के माल की तरह एक जैसे, एक-दूसरे की नकल करते हुए जीएंगे। धत् तेरे की!

ईश्वर ने किसी दो को एक जैसा नहीं बनाया। एक ओर सम्प्रदायों ने तथा दूसरी ओर शिक्षा ने रोड रोलर चलाकर सबको समतल कर दिया। जो कुछ ईश्वर ने देकर भेजा, सब पिचककर दब गया। अब सिर पर चुनाव आ रहे हैं। राजनेताओं के आक्रमण शुरू होने वाले हैं। वे हमको फिर से धर्म-जातियों में बांटेंगे। कोई क्षेत्रवाद की दुहाई देगा। कोई किसान अथवा व्यापारी कहकर सम्बोधित करेगा। सबको टुकड़ों में बांटने की चेष्टा करेगा। एक नहीं होने देगा। हमें जागते रहना है। नहीं तो हमारा भविष्य हमारे हाथ से छूटकर उनके हाथ में पूरे पांच वर्ष के लिए चला जाना है। ये तो मुडक़र भी नहीं देखेंगे।

हमारी होली का रंग नहीं उतार सके कोई। पूरी आत्मीयता के साथ, सारे भेदभाव छोडक़र ही लगाना है। सदा-सदा के लिए सम्प्रदाय, जात-पांत, क्षेत्र या भाषा के भेद समाप्त हो जाएं। किसी के भी आगे हमारी एकता समर्पित न होने पाए। रोज सवेरे अपना संकल्प दोहराएं, देश की अखण्डता का सपना ही देखें। नित्य प्रार्थना करें कि हम प्राणवान बने रहें। होली की तरह हर त्यौहार विकास का नया पर्व (पौर) बनता चला जाए। इस नए संघर्ष का शुभारम्भ हम इस होली से ही करें। एक कहावत है-‘काम गेलो काढ़ ले सी।’

Advertisements

टिप्पणी करे »

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं ।

RSS feed for comments on this post. TrackBack URI

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s

वर्डप्रेस (WordPress.com) पर एक स्वतंत्र वेबसाइट या ब्लॉग बनाएँ .

%d bloggers like this: