Gulabkothari's Blog

मार्च 21, 2018

एक और काला

राजस्थान सरकार के काले कानून की राख अभी ठण्डी भी नहीं हुई कि मध्यप्रदेश में एक और काला कारनामा हो गया। अभी १५ मार्च को विधानसभा के प्रक्रिया तथा कार्य संचालन सम्बन्धी नियमावली में संशोधन किया गया। संशोधन करना साधारण बात है, किन्तु ७० साल के लोकतांत्रिक इतिहास में पहली बार कोई संशोधन बिना सदन में बहस के लागू कर दिया गया। अत: यह संशोधन प्रश्नों के घेरे में आ गए।

कुछ संशोधन तो ऐसे कर दिए कि संविधान की मूल भावना का गला ही घोंट दिया गया है। एक ओर विधायकों के अभिव्यक्ति के अधिकारों को कुचल दिया गया, वहीं दूसरी ओर विधानसभा के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया। जिस कार्य के लिए विधायक चुने जाते हैं, उसी मंशा को ध्वस्त कर दिया। आप देखिए संशोधन क्या किए गए।

एक नियमावली २३१ के तहत। क्रम सं.(२२) उसमें किसी समिति की ऐसी कार्यवाही के बारे में नहीं पूछा जाएगा जो समिति के प्रतिवेदन द्वारा सभा के सामने न रखी गई हो या समिति के समक्ष विचाराधीन हो। (इसका अर्थ यह हुआ कि कितना भी महत्वपूर्ण मुद्दा यदि किसी समिति के सामने विचाराधीन है तो कोई विधायक उस मुद्दे पर प्रश्न ही नहीं पूछ सकता।) क्रमांक (२५) उसमें साम्प्रदायिक दंगे, संवेदन घटनाओं अथवा गोपनीय स्वरूप की ऐसी गतिविधियों की जानकारी नहीं मांगी जाएगी जिनको प्रकट न करने का संवैधानिक, संविहित या पारम्परिक दायित्व हो। (संवेदन घटना और पारम्परिक दायित्व जैसे शब्दों की आड़ में किसी भी प्रश्न को सदन में आने से जब चाहे रोकने की आशंका) विधान सभा में प्रश्न करने का दायित्व तो हर एक विधायक का है। इसे बाधित नहीं किया जा सकता। अध्यक्ष के पास अधिकार होते हैं कि वह प्रश्नकर्ता को रोक सकता है। प्रश्न को स्थगित करवा सकता है। प्रश्न करने के अलावा एक विधायक वहां क्या कर सकता है। विशेषकर निर्दलीय अथवा विपक्ष का! उसका तो मूल कार्य ही सरकार के काले पक्ष को उजागर करना है। उस पर अंकुश लगाना तो सीधा-सीधा लोकतंत्र पर ही अंकुश है। फिर क्यों विधायकों का चुनाव हो और क्यों विधानसभा का गठन ही किया जाए? इन संशोधनों के बाद विधायकों की आवाज जहां चाहे रोकने की आशंका हो जाएगी। इनका दुरुपयोग कर जब चाहे लोकतंत्र का गला घोंटा जा सकता है। इस प्रकार के संशोधन ने तो संविधान निर्माताओं की समझ एवं निष्ठा पर ही सवाल उठा दिए।

क्या लोकतंत्र में स्पष्ट बहुमत का यह परिणाम होता है? क्या जनता को आगे के लिए इसे एक बड़े घातक अनुभव की तरह नीलकण्ठ बनकर निगल जाना चाहिए? पहले महाराष्ट्र ने तुरप का एक पत्ता खेला, फिर राजस्थान कुरुक्षेत्र में उतरा। अब मध्यप्रदेश में काला झण्डा लहराने लगा है। आश्चर्य तो यह है कि जिन लोगों ने आपातकाल का दंश झेला है, उन्हीं के हाथों आपातकाल के समकक्ष कदम उठाए जा रहे हैं। विधानसभा में जिनको विशेषाधिकार प्राप्त हैं, उनके अधिकार का हनन करना कितना सहज लग रहा है, मानो जीवनभर सरकार कुर्सी से नीचे ही नहीं आएगी। सत्ता का यह कैसा अहंकार है! अभी कुछ दिन पूर्व ही मध्यप्रदेश की एक मंत्री यशोधरा राजे ने एक चुनाव सभा में कहा था कि ‘यदि आप हमको वोट नहीं देंगे तो हम आपके कोई काम नहीं करेंगे।’ आज तक उनका बाल भी बांका नहीं हुआ।

इस संशोधन के लिए किसी प्रकार के कारण चर्चा में नहीं आए। क्यों सरकार इस तरह के संविधान विरोधी संशोधन ला रही है? किस प्रकार की समस्याएं पिछले कार्यकाल में सामने आईं जिनका निराकरण न विधायक के पास है, न आरटीआइ (जो कि आज भी लागू है) से हल हो सकती है। सरकार को खतरा आरटीआइ से कुछ नहीं है, केवल विधायकों द्वारा उठाए जाने वाले प्रश्नों से है। क्या इस संशोधन से विधायकों के साथ-साथ आम मतदाता का अपमान नहीं होगा? आज यह संशोधन आया, कल संविधान ही मान्य नहीं होगा, तब क्या करेंगे?

सरकार को संकल्प करके लोकतंत्र के हित में इस संशोधन को वापस ले लेना चाहिए। यदि सरकार का विवेक साथ न दे और केन्द्र भी महाराष्ट्र और राजस्थान की तरह यहां भी मौन रहे, तो विधायकों को मिलकर अपने इस अधिकार पर कुठाराघात के विरुद्ध संघर्ष करना चाहिए। भले ही ये संशोधन सर्वसम्मति से किए गए हों फिर भी इन्हें वापस लेने के लिए पार्टी और विचारधारा जैसे भेद त्याग कर उन्हें एकजुट होकर आवाज उठानी होगी।

Advertisements

टिप्पणी करे »

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं ।

RSS feed for comments on this post. TrackBack URI

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s

WordPress.com पर ब्लॉग.

%d bloggers like this: