Gulabkothari's Blog

अप्रैल 4, 2018

जनता जनार्दन!

क्या सपने देखे थे इस देश के नागरिकों ने, आजादी के सिपाहियों ने, संविधान निर्माताओं ने, लोकतंत्र के प्रथम शासकों ने जब देश के भविष्य की कमान अंग्रेजों से छीनकर भारतीयों ने संभाली थी। नागरिकों का मनोबल भी शिखर पर था कि हम ही चुनेंगे हमारी सरकार और अब हम ही होंगे अपने देश के भाग्य विधाता। आज सत्तर साल बाद लगता है कि सिपाही सो गए, सपने हवा हो गए, नागरिक भी देश के प्रति उदासीन होते जा रहे हैं। नई पीढ़ी तो फिर से अंग्रेज बनने के सपने देखने लगी है। देश का प्रशासन-संविधान आज भी भारतीय नहीं बन पाया। देश की जिस अखण्डता और एकता की तब कसमें खाई गईं थीं, वो आज तार-तार हो चुकी हैं। हर सरकार अंग्रेजों की तरह ‘फूट डालो और राज करो’ के अभियान चलाती रही है। जाति और सम्प्रदाय इस देश के नासूर बन चुके हैं। जात-पांत की राजनीति ने देश का आन्तरिक विभाजन कर डाला। इस पर लोग फूले नहीं समा रहे। युवा बेरोजगारी से त्रस्त्र है, देश विकास को तरस रहा है। सामन्ती युग याद आने लगा है जब अपने ही अपनों को ठगने लगे हैं। राज दरबार फिर से चापलूसों से चहकने लगे, हड्डियां चबाने वालों का बोलवाला, चारों ओर शकुनि मामा के परिजनों की याद दिलाने लगे। पूरा देश आज लक्ष्मी के अंधकार में डूब गया है।

मेरे देशवासी जिस देश में भी जाकर बसे, उसे ही चमका दिया, ऊपर उठा दिया। आज फिर अवसर आ रहा है जब हम फिर से नए सपने देख सकते हैं, उनको साकार भी कर सकते हैं। हमारा सर्वे इशारा भी कर रहा है कि लोग बदलाव चाह रहे हैं। आइए! हम मिलकर राजस्थान पत्रिका/पत्रिका के मंच पर चिन्तन करते हैं, मनन करते हैं, निदिध्यासन करते हैं। यही उपासना देश के अभ्युदय का मार्ग प्रशस्त करेगी। स्वतंत्र चेतना की जागृति के इस यज्ञ में प्रत्येक वयस्क नागरिक को आहुति देनी है। स्वयं को देश के विकास में लगाने का संकल्प करना है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ‘स्वच्छ भारत अभियान’ के अन्तर्गत भ्रष्ट एवं स्वार्थी जनप्रतिनिधियों की सफाई का कार्य हाथ में लेना है। विधानसभाओं के चुनाव आ रहे हैं-राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और कर्नाटक में तो सिर पर ही हैं।

हम तुरन्त चर्चा शुरू कर दें कि हमको किस तरह के विधायक नहीं चाहिए और क्यों नहीं चाहिए? किस तरह के विधायक आने चाहिए, जिनको नई पीढ़ी, नए युग और भारतीय सांस्कृतिक वैभव की भी समझ हो? जो बेशर्मी से स्वार्थपूर्ति और अनाचार से चिपका न रहे। देश के प्रति मन में संवेदना हो। ईश्वर से डरता हो। वंशवाद, जातिवाद जैसे शस्त्रों से देश के टुकड़े करने वाला न हो। जनता के बीच में रहने वाला हो। आयाम तो अन्तहीन हैं। पत्रिका सर्वे दर्शाता है कि सुधार के लिए गैर राजनीतिक लोगों को भी आगे आना चाहिए। तीनों ही हिन्दी-भाषी राज्यों में पाठकों की एक जैसी राय है। आज राजनीतिक दलों के लिए न सिद्धान्त बड़ी चीज है और न विचारधारा। भ्रम और दिखावे की राजनीति ने देश के लोकतंत्र पर अनेक प्रश्नचिन्ह लगा दिए। आज गाली-गलौज पर आकर सारे दिग्गज तक ठहर चुके हैं।

आश्चर्य नहीं कि राजस्थान के ५६.०१ प्रतिशत, मध्यप्रदेश के ५२.०२ प्रतिशत, छत्तीसगढ़ के ४९.०५ प्रतिशत पाठक वर्तमान विधायकों को पुन: लौटाना नहीं चाहते। इससे भी एक कदम आगे ६२.५९, ५४.९७ तथा ५८.७८ प्रतिशत लोग सरकार को भी बदलने के पक्ष में हैं। कांग्रेस को भी जनता लायक नहीं मान रही। ५७.४७ प्रतिशत पाठकों का मानना है कि कांग्रेस को विपक्ष के रूप में जो भूमिका निभानी थी, उसका निर्वहन भी ढंग से नहीं कर पाई। जब मतदाता दोनों दलों से निराश है, तब कहां जाएगा? क्या दिल्ली की तरह बाहरी हवा का झोंका रंग लाएगा? मूल प्रश्न यह है कि सरकारें तो हम बदलते ही रहे हैं। क्या कर लिया? अब हमें क्या करना चाहिए, अपने नजरिए और कर्म की दिशा में क्या परिवर्तन करना चाहिए, ताकि नए प्रतिनिधि नए युग के अनुरूप चुने जाएं।

आंख मूंदकर जाति-धर्म-क्षेत्र जैसे नामों पर तो किसी भी दबाव में चयन नहीं करें। युवा आगे आएं। समाज में सामूहिक चिन्तन हो। व्यक्ति को प्राथमिकता दी जाए और उस व्यक्ति का चयन भी समाज ही करे। चेंजमेकर के तौर पर, बदलाव के नायक के रूप में राजनीति में अच्छे लोग सक्रिय हों। साफ-सुथरी छवि वाले, हालात बदलने का संकल्प धारण करने वाले आगे आएं। दूसरों को भी प्रेरित करें। बदलाव के नायकों का यह कदम स्वस्थ राजनीति के मार्ग का अभ्युदय करेगा। आरोप-प्रत्यारोप के स्थान पर रचनात्मक विकास की बहस आगे बढ़ेगी। पुराने विधायकों को भी अन्य दलों को गालियां देने के बजाय विकास और उपलब्धियों की बात करनी पड़ेगी। चुनावी हथकण्डे ज्यादा काम नहीं आ सकेंगे। नेताओं को भी मर्यादा में रहकर अपनी बात कहनी पड़ेगी। राजनीति में सफाई का दौर शुरू हो जाएगा। जनता अपनी शक्ति एवं विवेक का फिर से जागरूक होकर प्रयोग करेगी। ईश्वर साक्षी रहे!

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