Gulabkothari's Blog

June 20, 2018

बड़ी ठोकर

आदमी का स्वभाव है कि दूसरों के अनुभवों से भी नहीं सीखता और न दूसरों की सलाह का ही उपयोग करता है। स्वयं ठोकर खाता है, आगे बढ़ता है। भारतीय जनता पार्टी के लिए जम्मू-कश्मीर में सत्ता का अनुभव बड़ी ठोकर ही मानी जाएगी।

तीन साल पूर्व पूरा देश भाजपा के इस निर्णय से सहमत नहीं था कि उसे सरकार में महबूबा मुफ्ती की पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के साथ गठबंधन करना चाहिए। आखिर भाजपा को समर्थन वापस लेना पड़ा। इस बीच कितनी किरकिरी हुई। भाजपा ने संघर्षविराम करके भी देख लिया। आज भी महबूबा भाजपा को दोष दे रही हैं। उन्होंने यहां तक कह डाला कि भाजपा भुज-बल की भाषा बोल रही है।

प्रेस कॉन्फ्रेंस में वे अपने पिता मुफ्ती मोहम्मद सईद के सपनों की बातें कर रही थीं, जिन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री रहते हुए अपनी बेटी को बचाने के लिए देश की सुरक्षा से समझौता किया था। खुद महबूबा भी संघर्षविराम को बढ़ाने की सिफारिश कर रही हैं, भले ही कितने ही सैनिक शहीद हो जाएं। वे पत्थरबाजों को रोक पाने में विफल हुईं या उन्हें उकसाने में मौन स्वीकृति दी, इसका भी उत्तर देश को जल्दी ही मिल जाएगा।

भाजपा ने भी सत्ता के लालच में देश की आवाज अनसुनी कर दी। आज लाचार होकर राज्यपाल शासन का मार्ग पकडऩा पड़ रहा है। दो विपरीत प्रकृति के दलों का गठबंधन नहीं करने का निर्णय शपथग्रहण के पहले ही हो जाना चाहिए था। किन्तु दोनों ही पक्षों को सत्ता का लालच था। पीडीपी को आज भी कोई हानि नहीं हुई। उसके पास खोने को है ही क्या। विधानसभा में तो वह पहले ही अल्पमत में थी। भाजपा अवश्य कंगाल हो गई। लोगों में उसके प्रति विश्वास हिल गया। जिस अनुच्छेद 370 को हटाने की घोषणा प्रधानमंत्री ने किश्तवाड़ रैली में की थी, उसे लोकसभा में पुन: प्रतिष्ठित करना पड़ा। अलगाववादियों से बात करनी पड़ी। जम्मू के कैम्प में पाकिस्तान शरणार्थियों की नागरिकता अधरझूल में है, कश्मीरी पंडित आज भी बेघर हैं। और गठबंधन टूट गया।

पत्रिका ने तो दो मार्च, 2015 को ही लिख दिया था कि ‘दोनों पार्टियों के नेतृत्व को देखते हुए यह भी कहा जा सकता है कि जिस दिन भी उनमें से एक के भी हितों पर आंच आई, सरकार गिर जाएगी।’

सरकार बनने के बाद का मुफ्ती मोहम्मद का भाषण भी भाजपा को याद आ रहा होगा और वे सारे समझौते भी जो भाजपा ने महबूबा सरकार के साथ किए। सब धूल में मिल गए। यह समय है जब भाजपा को अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करना चाहिए। देश का माहौल चुनाव परिणामों में दिख रहा है। पीछे हटने की जरूरत पड़ रही है। पीडीपी से गठबंधन तोडऩा भी पीछे हटने की दिशा का ही एक संकेत है। तेल की बढ़ती कीमतों पर सरकार की हर तरफ आलोचना हो रही है। नोटबंदी और जीएसटी के घाव भी अभी हरे हैं। यह समय है जब इन सबके मद्देनजर भाजपा को अपने पिछले चुनावी वादों और आगामी चुनावों की दृष्टि से जनता को नए सिरे से विश्वास में लेना चाहिए। अन्यथा जिस तरह से पार्टी जनाधार खो रही है, आरएसएस भी संकेत देने लगा है, कहीं और नुकसान न हो जाए। राज्यपाल शासन ही काफी नहीं है, समझदारी से गठबंधन में हुए नुकसान की भरपाई भी जरूरी है।

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