Gulabkothari's Blog

January 17, 2020

कौन सा स्कूल

जीवन से बड़ा मायाजाल ब्रह्माण्ड में भी दूसरा क्या होगा। हर प्राणी भ्रम में जी रहा है और उसी को वास्तविकता मानकर जी रहा है। ‘मैं हूं’। क्या हूं, कौन हूं, नहीं मालूम। अभी कल के समाचार पत्रों में एक सर्वे रिपोर्ट छपी थी कि माता-पिता बेटों को निजी स्कूलों में अधिक भेजना चाहते हैं तथा बेटियों को अधिकांशत: सरकारी स्कूलों में भेजते हैं। यही सबसे बड़ा कारण है समाज की दुर्दशा का। एक ओर सरकारी स्कूल के अध्यापक नई पीढी की बुद्धिमता एवं अनुशासन क्षेत्र में पिछडे दिखाई पड़ते हैं, वहीं निजी क्षेत्र के स्कूल पूर्ण रूप से व्यावसायिक सिद्ध हो रहे हैं। ट्यूशन, निजी लेखकों की पुस्तकें, पेपर सेटिंग तक में गले तक भ्रष्टाचार में डूबे हैं। उनकी सांसों की डोर माता-पिता के अहंकार से जुड़ी है। धनाढ्य माता-पिता तो बच्चों को घर के स्थान पर दूर स्कूलों के छात्रावासों में रखकर गौरवान्वित होते हैं। उनको कहां पता है-‘मातृ/पितृ देवो भव:’ अथवा ‘आचार्य देवो भव:’ का अर्थ क्या है। शास्त्र यह भी कहते हैं-‘सूर्य आत्मा जगतस्तुस्थुश्च:’ अर्थात् सूर्य जगत का आत्मा है। देवता भी सूक्ष्म प्राणों को ही कहते हैं। प्राण दिखाई नहीं देते। माता-पिता और सन्तान के सम्बन्धों को इस दृष्टि से देखा जाए तो सारा तंत्र कुछ और ही संदेश देता जान पड़ता है।

प्रथम प्रश्न-क्या सन्तान हम अपनी मर्जी से पैदा करते हैं? असंभव! तब स्पष्ट ही है कि हमारी तरह सन्तान भी प्रकृति के तंत्र का हिस्सा है। हमारे लिए तो वह प्रकृति का प्रसाद है और अपना स्वतंत्र भाग्य-कर्म-प्रारब्ध लेकर जन्मा है। पुरुष में पौरुष अधिक है, स्त्री में स्त्रैण अधिक है। आज की शिक्षा न पौरुष सिखाती है, न ही स्त्रैण। क्या शिक्षा बीज में पेड़ को देख लेना सिखा सकती है? बीज का निर्माण और पोषण सिखा सकती है? अथवा लडक़ी को माता बनाना सिखा सकती है? मां की ममता और वात्सल्य सिखा सकती है? जीवन में शिक्षा या तो पेट भरना सिखाती है या पूर्ण व्यक्ति को मानवीय दृष्टि से अपूर्ण बनाती है। स्कूल चाहे सरकारी हो अथवा निजी, मानव नहीं बनाते।

हमारे हाथ में है भी क्या! हम तो प्रकृति के हाथों कठपुतली हैं। सूर्य ही सृष्टि का प्रथम षोडशी पुरुष है, जगत का पिता है। अमृत और मृत्यु लोक दोनों को प्रभावित करता है। प्रकृति मां है। सृष्टि के सम्पूर्ण प्राणी सूर्य से उत्पन्न होते हैं। सूर्य किरणों द्वारा नीचे उतरते हैं। बादल बनते हैं। वर्षा के जल के साथ पृथ्वी की अग्नि में आहूत होते हैं। औषधि-वनस्पतियों का रूप लेते हैं। यह उनका प्रथम स्थूल रूप में अवतरण होता है। यही प्राणियों का अन्न होता है। अन्न जठराग्नि में आहूत होता है। शरीर के सप्तधातुओं का निर्माण करते हुए शुक्र में समाहित हो जाता है। पांचवें स्तर पर माता के गर्भ में शरीर धारण करता है। अर्थात् माता-पिता भी बादल-बिजली की तरह एक पड़ाव ही होते हैं, जीव को आगे प्रकट करने का-स्थूल शरीर देकर। जीव को पैदा नहीं करते। जीव की अपनी यात्रा है, अपने कर्मों के अनुसार। उन्हीं फलों को भोगने के लिए समाज के बीच में विभिन्न सम्बन्ध स्थापित करने आता है। क्या इस जीव को हम शिक्षित कर सकते हैं? हमारी शिक्षा पद्धति तो जीव तक पहुंच भी नहीं सकती। इसीलिए तो मानव शरीर में पशुता बढ़ती जा रही है। व्यक्ति के लिए शरीर-मन-बुद्धि जीने के साधन हैं। अत: शिक्षा का लक्ष्य इन साधनों का उपयोग करने की क्षमता पैदा करना होना चाहिए। नश्वर के बजाए शाश्वत सृष्टि को शिक्षित करने की मूल आवश्यकता है। इसके बिना मानव शरीर पशुवत एवं अनियंत्रित ही व्यवहार करेगा।

इसके लिए शिक्षा को नए सिरे से परिभाषित करना पड़ेगा। कैरियर की शिक्षा तो व्यक्ति को पेट से ही बांधेगी। ऐसा व्यक्ति समाज के लिए नहीं जी सकता। परिवार तक सिमटकर ही चला जाएगा। शिक्षा को प्राकृतिक नियमों से जोड़ा जाए। शरीर पंचमहाभूतों से बनता है, तो इनके महत्व एवं स्वरूपों को स्पष्ट करना चाहिए। तब पर्यावरण की समस्या भी सुलझ जाएगी। बीज को पेड़ बनना सिखाया जाए, ताकि वह समाज के काम आ सके। कुछ समाज को लौटा सके। उसे अपने अस्तित्व का मोह छोडक़र ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ के बोध के साथ जीना सिखाया जाना चाहिए।

चौरासी लाख योनियों में मानव भी एक जाति है। उसे फिर और जातियों में बांटना अपने ज्ञान का ही अपमान कहा जाएगा। शिक्षित व्यक्ति अपने स्वरूप में ब्रह्म को देख सके, सभी प्राणियों को अपने जैसा मान सके, तभी शिक्षा उपयोगी होगी। आज तो उपभोगी बना रही है, जहां हर व्यक्ति बिकने को, भोगे जाने के लिए, तत्पर दिखाई पड़ता है।

शिक्षा का उद्देश्य है समर्थ बनाना। वास्तविक ज्ञान अर्थात् विद्या (धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य) देना। इसके आधार पर ही मिथ्या दृष्टि का निवारण हो सकता है। भले-बुरे का भेद करने की क्षमता प्राप्त होती है। जीवन में संघर्ष करने की क्षमता आती है। समाज के मिथ्या विघटनकारी तत्त्वों को ज्ञान के प्रभाव से दबाने की प्रेरणा मिलती है। ईश्वर और शान्त जीवन के प्रति आस्था की प्रतिष्ठा होती है। आज जैसे ही कैरियर का लक्ष्य जुड़ा, धन की प्रधानता छा गई। मानव-चेतना (शिक्षित) जड़ के पीछे दौडऩे लग गई। मिथ्यात्व ही दृष्टि का आधार बन गया। पुरुषार्थ शब्द जीवन से खो गया। आज हर व्यक्ति को सारे सुख रातों-रात चाहिए। पात्रता जरूरी नहीं रही। तब अपराध ही पनपेंगे, शान्ति भंग होगी। शिक्षित वर्ग देश का जितना अहित करता है, उतना अशिक्षित नहीं कर सकता। आज चारों ओर शिक्षित वर्ग अभावग्रस्त दिखाई पड़ रहा है। बड़े-बड़े पदों पर बैठकर भी उसका पेट नहीं भर रहा। इसके लिए वह किसी अन्य के पेट पर लात मारने को भी तैयार है। स्कूल सरकारी हो या निजी, क्या अन्तर पडऩे वाला है। निजी स्कूल वाले भी जानते हैं कि बच्चों के अभिभावक कैसी मानसिकता वाले हैं। कहीं भी छात्र/छात्रा का कोई सम्मान नहीं है। सब अभिभावक की जेब देखते हैं।

लड़कियों की स्थिति किसी भी स्कूल में अच्छी नहीं कही जा सकती। यहां तक कि कन्या विद्यालय और महाविद्यालयों में भी नारी योचित शिक्षा नहीं दी जाती। जो लडक़ों को सिखाते हैं, वही लड़कियों को भी सिखाते हैं। समानता के आधार पर। घर में भी बहन-भाइयों की समानता का यही स्वरूप है। आज सभी कन्याएं बिना दाम्पत्य ज्ञान, बिना प्रसव ज्ञान एवं शिशु चर्यानुभव के नए जीवन में प्रवेश करती हैं। मात्र शरीर के आधार पर, जिसका ज्ञान भी उन्हें नहीं होता। समाज संस्कार शून्य, आहार-निद्रा-भय-मैथुन पर आकर ठहर गया है। शायद कल्की अवतार की प्रतीक्षा कर रहा है।

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