Gulabkothari's Blog

January 19, 2020

मेरा कर्म, मेरा फल-1

हमारे ऋषियों ने प्रकृति को समझा, प्रकृति द्वारा उत्पन्न प्राणी जगत को समझा और दोनों के मध्य एक तारतम्य बिठाने के लिए गुणाश्रम व्यवस्था तैयार की। सृष्टि विज्ञान का खुलासा अनेक ग्रन्थों के माध्यम से किया गया। उसी आधार पर भारत विश्व गुरु रहा। किन्तु सृष्टि परिवर्तनशील है। सतयुग से बदलते-बदलते आज यहां तक बदल गई कि पति तो पत्नी और बच्चों की हत्या करने में गर्व करने लगा, वहीं पत्नी को भी सात जन्मों के साथी से आज ही पिण्ड छुड़वाने की जरूरत पडऩे लग गई। न जाने लक्ष्मीनारायण किस माटी के बने हैं कि सृष्टि पूर्व से लेकर आज तक साथ ही चल रहे हैं।

सृष्टि तब भी युगल तत्त्व से पैदा होती थी, आज भी युगल तत्त्व से होती है। आत्मा का स्वरूप भी वही है और वैसा ही शरीर भी है। दोनों के मध्य में मन है और बुद्धि है। एक मनमानी करने में पारंगत है, दूसरा बुद्धिमानी के अहंकार से त्रस्त रहता है। आत्मा षोडशी है, मन का पोषण चन्द्रमा से, बुद्धि का सूर्य से तथा शरीर का पृथ्वी से होता है। सूर्य जगत का आत्मा भी है, पिता भी है। सृष्टि इसी का विस्तार है। सूर्य अग्नि है, चन्द्रमा सोम है। सृष्टि अग्नि-सोमात्मक है। पुरुष सोम-युक्त पौरुष भाव है, स्त्री पौरुष-युक्त सौम्या है। केन्द्र में दोनों पुरुष हैं। अत: सृष्टि पुरुष प्रधान कहलाती है। पुरुष ही ब्रह्म है, शेष सभी कुछ माया है।

माया ही पुरुष के स्वरूप का निर्माण करती है। सभी चौरासी लाख योनियों का स्वरूप माया ही, कर्मफल के अनुसार, नए जन्म में तय करती है। भारतीय दर्शन बहुत गहन एवं गंभीर है। अत: शक्ति स्वरूप की पूजा करता है। आधुनिक शिक्षा में न कर्म, न कर्मफल, न निर्माण और न ही आत्मा के लिए कोई स्थान रह गया है। सम्पूर्ण शिक्षित मानव समुदाय आत्म-विहीन होकर संवेदना शून्य होता जा रहा है। यही पाशविक धरातल है, जिस पर जीने वाले दम्पत्ति दोनों हाथों से इस बन्धन को काटने लगे हैं। यह क्रम भविष्य में तेज गति वाला हो जाएगा।

भारतीय दर्शन में विवाह को सृष्टि का मूल आधार माना है। प्रति सृष्टि का आधार भी यही है। विश्व में अन्यत्र ऐसा नहीं है। यहां कर्म है, पुन: जन्म है, मोक्ष का सिद्धान्त (पुरुषार्थ चतुष्ट्य) है। अत: विवाह का एक पहलू है प्रेम को, भक्ति की तरह, पैदा करना, पल्लवित करना और विस्तार करना। दूसरा पहलू है दाम्पत्य रति-श्रद्धा, स्नेह, वात्सल्य और प्रेम-का विकास इस तरह से करना कि गृहस्थाश्रम की समाप्ति तक ये देवरति में प्रतिष्ठित हो जाए। जो स्त्री कामना बनकर आई, वही विरक्ति का कारण बन जाए। आज की भोगवादी डबलबैड संस्कृति मृत्यु पर्यन्त व्यक्ति को गृहस्थाश्रम से बाहर ही नहीं निकलने देती। इसी कारण जीवन की गंभीरता खो गई। जीवन मनोरंजन मात्र रह गया। अर्थ-काम के चक्रव्यूह में दम्पत्ति अच्छी आत्मा को भेजने के लिए ईश्वर से प्रार्थना कहां करता है? जीव की आत्मा को मानव रूप में कौन मां परिष्कृत करती है, प्रसव पूर्व? अभिमन्यु पैदा होना बंद हो गए।

केवल भू-पिण्ड से जड़ पदार्थों का निर्माण होता है। सूर्य और चन्द्रमा के योग से बुद्धि और मन का विकास होता है। जहां आत्मभाव का विकास जुड़ता है वहां आत्मनिष्ठ मानव बनता है। बुद्धि तो उष्ण भी होती है और अहंकार के कारण आक्रामक भी। मन शीतल एवं मृदु होता है। जीवन के सपनों, अभिव्यक्ति एवं अनुभव के केन्द्र हैं। पुरुष बुद्धि प्रधान, स्त्री मनस्वी कही गई है।

भौतिक विकास के साथ जीवन उपकरण बनकर रह गया। भोग की वस्तु बन गया। शरीर नश्वर है, बाहरी ज्ञान भी नश्वर है। पेट भरने के आगे ज्ञान उपयोगी नहीं है। इसका प्रभाव यह पड़ा कि जिस प्रकृति से हमारा जीवन संचालित है, उससे हमारा नाता ही टूट गया। अब हम पेड़ के फूल, फल और पत्तों की तरह एक स्वरूप में, एक-दूसरे के लिए जीने को तैयार नहीं। बीज भले ही अपने फल नहीं खाता हो, हम तो स्वयं ही खाना चाहते हैं। तब पेड़ तो कभी बन ही नहीं पाएंगे। बीज रूप में ही समय के साथ मर जाएंगे।

आज शिक्षा यही सिखा रही है। माता-पिता कुछ सिखा ही नहीं रहे। या तो टीवी, फोन या मित्र मण्डली। शरीर का सुख, मन की स्वच्छन्द कामनाएं, बुद्धि का अत्यधिक विकास। मानवीय दृष्टि से शिक्षित व्यक्ति शरीर और बुद्धि से पुष्ट तथा मन और आत्मा से हीन होता है। जीवन के सम्बन्ध मन से और व्यवसाय बुद्धि से ही चलते हैं। आज रिश्ते भी बुद्धि पर ठहर गए हैं। जो नारी पति के साथ एकाकार होकर जीने के लिए समर्पण के साथ बंधी थी। माता-पिता तक को छोडक़र सौम्या अग्नि में आहूत होने आई थी। अब क्या होने लगा कि सारा पासा पलटने लगा है।

एक तो वह बुद्धिमान होकर पुरुष के लिए चुनौती बनकर आई। अर्थात् पुरुष से अलग अपनी पहचान के साथ जीना चाहती है, किन्तु रहना तो पुरुष के यहां ही चाहती है। शादी की उम्र इतनी हो गई कि शरीर का आकर्षण अल्पकालीन रह गया। आगे बुद्धि के अहंकार का टकराव पुरुष मानसिकता में अधिक परिवर्तन इस बात में आया कि पत्नी के लिए उसके पास कोई सपना ही नहीं है। जो स्त्री सपने लेकर आती थी, वह भी कैरियर लेकर आती है। दोनों को अपने-अपने कैरियर में दखल देने की गुंजायश नहीं। अत: शादी के समय तो स्त्री मरने तक ससुराल में रहने को आती थी, अब तलाक की तैयारी करके ही आती है। पीहर पक्ष भी उसे कभी छोड़ता दिखाई नहीं पड़ता। पुरुष को कोई दिक्कत नहीं, वह अपने घर में बैठा है। जो बाहर से स्वामिनी बनने आई थी, उसी को जाना है। विकसित देश गवाह हैं कि पहला घर छोडऩे के बाद दूसरा घर आसानी से नहीं बसता। जिन्दगी के सारे थपेड़े महिला को ही खाने पड़ते हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि उसके जीवन का अन्तिम दौर अकेले ही निकले। भारत में तो परित्यक्ता को आसानी से पीहर में भी स्थान नहीं मिलता। बड़ी उम्र ने उसे जीवन-दर्शन से समझौता करने में कठिनाई पैदा की। तब तलाक होने में कोई भी आपत्ति नहीं है। प्रश्न इससे आगे निकल गया है। फिर एक-दूसरे की हत्या करने पर उतारू क्यों? (शेष अगले अंक में)

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