Gulabkothari's Blog

February 12, 2020

यह तो होना ही था

दिल्ली विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी (आप) की लगातार तीसरी बार जीत और देश की दोनों बड़ी पार्टियों की हार लोकतंत्र में एक नया पथ प्रदर्शित करेंगी। एक ओर अरविन्द केजरीवाल और उनकी टीम, दूसरी ओर प्रधानमंत्री और गृहमंत्री सहित भाजपा का सम्पूर्ण तंत्र और कांग्रेस के दिग्गज नेताओं का राजधानी में जमावड़ा। ऐसे में आज के परिणामों को आप सरकार के पांच साल के कार्यकाल का ही परिणाम कहना होगा।

दिल्ली परिणामों ने स्पष्ट कर दिया है कि राज्यों में विकास के मुद्दों को हल करने के मामले में भाजपा और कांग्रेस-दोनों ही जनता का विश्वास खो चुकी हैं। राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी पिछले विधानसभा चुनावों में कांग्रेस जीती तो इसका मुख्य कारण इन राज्यों में स्थानीय भाजपा सरकारों से नाराजगी था। जब सरकारें वादा करके भी जनता से जुड़ी समस्याओं को भूल जाती हैं और विकास के नाम पर कमीशनखोरी वाले कामों को ही आगे बढ़ाती हैं तो जनता को उन्हें सबक सिखाने में देर नहीं लगती। दिल्ली कभी केदारनाथ साहनी, मदल लाल खुराना, विजय कुमार मल्होत्रा जैसे दिग्गज भाजपा नेताओं का गढ़ होता था। ढह गया अथवा ढहा दिया गया। आज मनोज तिवारी नौसिखिए नजर आते हैं।

आप पार्टी सेवा के नाम पर जीती है। दिल्ली में नागरिकों का सम्मान बढ़ा है। भ्रष्ट नेताओं पर तुरन्त कार्रवाई की गई। दूसरी ओर, भाजपा अपराधियों को बचाने में जुटती दिखाई पड़ती है। भाजपा राष्ट्रीयता और धर्म को आधार बनाकर आगे बढ़ती है। विकास के आगे इस मुद्दे की सीमा छोटी होती है। इस दृष्टि से भाजपा को अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करना चाहिए। पिछले वर्षों में राज्यों में स्थापित नेतृत्व की उपेक्षा करके नए, कमजोर लोगों को खड़ा किया गया। जिन-जिन राज्यों में भाजपा पिछले वर्षों में हारी, वहां मुख्य समस्या ही नेतृत्व रहा। कई स्थानों पर भाजपा ने ऐन मौके पर सहयोगी दलों का साथ छोड़ दिया। राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखण्ड के परिणामों का इसी दृष्टि से आकलन किया जाना चाहिए। वरना, भविष्य में यह रेखा बड़ी ही होती चली जाएगी। बिहार, पं.बंगाल, उत्तराखण्ड के चुनावों में पुन: भाजपा की अग्नि परीक्षा होने वाली है। हार गए तो बचेगा क्या? परिवर्तन की बयार चल पड़ी है। इसका रुख मोडऩे की तैयारी दिखानी चाहिए। कांग्रेस की स्थिति और भी विकट है। वह भी विकास के मुद्दे छोड़ भाजपा विरोध के सहारे आगे बढऩे का प्रयास कर रही है। उसने सोच लिया है कि भाजपा जिन मुद्दों को आगे बढ़ाएगी उनका विरोध करना ही है। भाजपा को दिल्ली में अगर कुछ सीटें मिली हैं तो उसका कारण कांग्रेस ही है जो स्वयं शून्य को छू रही है। भाजपा के पास मजबूत केन्द्रीय नेतृत्व तो है, कांग्रेस इस मामले में भी उलझी हुई है।

दिल्ली चुनाव ने देश को नई सोच विकसित करने की ओर संकेत किया है। पहले भी क्षेत्रीय दल भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुके हैं। इस बार चुनौती सेवा के माध्यम से, विकास के नाम पर दी गई। अत: आप पार्टी की ओर से चुनाव जनता ने लड़ा है। अरविन्द केजरीवाल एवं इनके सहयोगी बधाई के पात्र हैं। जनता न बंटी, न भ्रमित हुई, बल्कि अपने संकल्प पर डटी रही। निश्चित है कि दिल्ली के ये चुनाव देश के भावी चुनावों की नजीर बनेंगे।

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