Gulabkothari's Blog

April 16, 2020

पुण्य कमाएं

संसार सागर में देवासुर संग्राम और समुद्र मंथन एक सतत प्रक्रिया है। सृष्टि में देवता तैंतीस तथा असुर 99 होते हैं। असुर देवताओं से अधिक बलवान भी होते हैं। आज कलयुग में तो नित्य ही आपात स्थिति बनी रहती है। देवता त्राहि-त्राहि करते हुए विष्णु-महेश को ढूंढ़ते रहते हैं, रक्षा के लिए। किन्तु देश आस्थावान है और कृष्ण के उस आश्वासन पर जिंदा है, जो उसने गीता में दिया था-

‘यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। 
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्’॥ (गीता 4/7)

तथा आगे कहा था-

‘परित्राणाय साधूनां, विनाशाय च दुष्कृताम्। 
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे-युगे’॥ (गीता 4/8)

इसका एक अर्थ यह भी है कि ईश्वर हर युग में उपलब्ध रहता है। नाम, रूप स्थान कुछ भी हो सकते हैं। वैसे तो वह सबके हृदय में ही प्रतिष्ठित है, किन्तु समय के प्रभाव में प्रकट कहीं-कहीं हो सकता है। आपातकाल के अधंकार में तो असुरों (कालाबाजारियों) का ही बोलबाला रहता है। किन्तु इस बार कोरोना वायरस के आपातकाल में ईश्वर के दोनों आश्वासन खरे उतर रहे जान पड़ते हैं। विश्व स्तर पर बड़े-बड़े दानदाताओं ने दोनों मुट्ठियां खोल दी।

भारत में दानदाताओं के नाम तो शास्त्रों तक में उद्धृत हैं। राजा बलि से लेकर, राजा कर्ण और भामाशाह तक अनगिनत नाम इतिहास में दर्ज हैं। इतिहास लेने वालों को याद नहीं करता। धर्म के रूपों में यज्ञ और तप के साथ दान को ही प्रतिष्ठा मिली है। इस दु:खद स्थिति में भारत के उन कालजयी दानदाताओं का देशवासियों को मुक्त कण्ठ से आभार व्यक्त करना चाहिए, अभिनन्दन करना चाहिए, जिन्होंने देश की ईश्वरीय शक्ति के प्राकट्य का उदाहरण प्रस्तुत किया है। इनके भीतर का कृष्ण जाग्रत हुआ है। देश के भले लोगों में आस्था का संचार होगा।

राजस्थान के इतिहास के पन्ने भी भामाशाहों के नामों से रंगे पड़े हैं। शेखावाटी के सेठों ने भी खजाना खोला है। आदित्य बिड़ला ने 500 करोड़ रुपए सहायता राशि दी है। इसी प्रकार एल.एन मित्तल, पीरामल, सिंघानिया, डालमिया, बजाज, वेदान्ता गु्रप भी आगे आए हैं। राजस्थान के इन उद्योगपतियों की समग्र राशि लगभग एक हजार करोड़ है।

अब तक टाटा ग्रुप ने 1,500 करोड़ रुपए की सहायता राशि घोषित की है। विप्रो के अजीम प्रेमजी भी 1,125 करोड़़ दे चुके हैं। रिलायंस ग्रुप ने 510 करोड़, आईटीसी ने 150 करोड़, अडाणी फाउण्डेशन-एक सौ करोड़ तथा अक्षय कुमार (एक्टर) भी 25 करोड़ रुपए की सहायता कर चुके हैं। राष्ट्र इनके सहयोग के लिए इनका आभारी है। इन्होंने सरकार के हाथ मजबूत किए हैं। उम्मीद करनी चाहिए कि देश के अन्य काले/सफेद समृद्ध जन भी इनसे प्रेरित होकर पुण्य कमाने पर चिन्तन करेंगे।

कोरोना महामारी से निपटने के लिए कई राजकीय कोष बन गए हैं। इनको लेकर भी कुछ विवाद सामने आ रहे हैं। बड़ी-बड़ी कंपनियां जब पीएम केयर फंड में दान देती हैं तो यह राशि सीएसआर की श्रेणी में मान ली जाती है, जबकि राज्यों के कोषों में जमा कराने पर ऐसा नहीं होता। बड़े-बड़े कॉरपोरेट हाउस दान दे रहे हैं, लेकिन देश के कई बड़े धार्मिक ट्रस्ट इसमें ज्यादा रुचि नहीं दिखा रहे। सैकड़ों धर्मस्थल देश में ऐसे हैं जिनमें प्रतिवर्ष अरबों रुपए चढ़ावे के रूप में आता है। विश्व में आए इतने बड़े संकट के समय उन्हें भी जनता की मदद खुद करनी चाहिए। चढ़ावे में आई कमी पूरी करने में श्रद्धालु देर नहीं लगाएंगे। इसी तरह देश के राजनीतिक दलों के पास भी चंदे के रूप में बड़ी-बड़ी रकम जमा है। उन्हें भी अपने कोष में से कुछ राशि इस महामारी से निपटने के लिए दान करनी चाहिए।

दान का ही एक स्वरूप है-परोपकार या परहित। गोस्वामी तुलसीदास भी कह गए हैं-परहित सरसी धरम नहीं भाई। जिसके पास धन है, वह दान स्वरूप धन देता है, पर यह आवश्यक नहीं कि दान धन का ही हो। तन-मन-धन दान किसी भी रूप में दिया जा सकता है। तन से सेवा करना, मनोयोग से सेवा करना या परोपकार के लिए अपना समय देना भी दान ही है। धन का दान देना कई बार हर किसी के लिए संभव नहीं हो सकता लेकिन सेवा और समय का दान हर व्यक्ति कर सकता है। आज के संकट के समय ऐसे दान की सर्वाधिक आवश्यकता है। संकल्प कर लें तो हममें से हर एक दानी बन जाएगा।

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