Gulabkothari's Blog

April 17, 2020

आ, भारत लौट चलें

हमारे देश में सर्वश्रेष्ठ वायु पुरवाई मानी जाती है और आंथूणी (सूर्यास्त की दिशा) से आने वाली वायु विनाशकारी। पूर्व इन्द्र का, अग्नि का क्षेत्र है, पश्चिम वरुण का, सोम का क्षेत्र है। अग्नि सरस्वती का तथा सोम लक्ष्मी का क्षेत्र है। अग्नि आत्मा या अध्यात्म का केन्द्र है, वहीं सोम शरीर अथवा भौतिक-पदार्थों का क्षेत्र है। हम कभी जगतगुरु थे, आज नकल करके लक्ष्मी के वाहक बनने लगे।

आज कोरोना का जो संकट इतना व्यापक हो रहा है, उसका कारण हमारी घटती रोग-निरोधक क्षमता है। इसके पीछे हमारा उन्नत खानपान, विकसित डेयरी उत्पाद, उन्नत बीज जैसी वैज्ञानिक उपलब्धियां रही हैं। हम जहर खा रहे हैं, विषपान कर रहे हैं। एक ओर चन्द्रमा और मंगल तक उड़ान भर रहे हैं, तो दूसरी ओर अपने-अपने घरों में कैद हो गए, क्योंकि हम विकास के नाम पर विदेशी हो गए।

आज हम न चाहते हुए भी बंद हैं। कोस रहे हैं कोरोना को। क्या यह भी संभव है कि न चाहते हुए भी हम दो सप्ताह के लिए भारत लौट चलें। तब आगे का जीवन भी तो तय हो जाएगा। हम एक अनुभूति के दौर से गुजरेंगे। विकास को कोरोना के साथ घर के बाहर छोडक़र, प्राकृतिक भारत के नागरिक होंगे। हवा, पानी, धूप, वृक्ष, पक्षी, पशु आदि सबकी जीवन में भूमिका को नजदीक से देख सकेंगे। समझ जाएंगे कि हम भी कभी इधर से गुजरे थे। आज तो मनुष्य हैं, पर हैं सब एक ही बिरादरी के।

एक ही नियम होगा-प्रकृति के साथ जीना है। सोना-जागना है। अनावश्यक कुछ नहीं करना है-ताकि जीवन मूल्यवान बना रहे। न कोई अति हो। मन-प्राण-वाक् (शरीर) को हृष्ट-पुष्ट-तुष्ट रखना है। सात्विक अन्न, सात्विक विचार, देव अराधना, सूर्य नमस्कार, संध्या आरती, सब करने हैं-अपने-अपने धर्म-सम्प्रदायों के अनुसार। खाना वही खाना है जो आपकी भूमि (जन्म स्थान) पर पैदा होता है। न रासायनिक खाद, न कीटनाशक। बाजरा, मक्का, जौ और ज्वार ही खाना है। न गेहूं, न मैदा। न दवा छिडक़ी सब्जियां। सूखे साग, दालें, दही-छाछ, राब आदि बस।

जो सामग्री आज से 50 वर्ष पूर्व रसोई (रसायन शाला) में नहीं जाती थी, वह इन दो सप्ताह में भी बाहर ही रहे। आप भोजन भी, व्यंजन भी वैसे ही पकाएं, जैसे उस काल में, आपके क्षेत्र में पकाए जाते थे। रासायनिक-चीनी, नमक, रासायनिक खाद और कीटनाशकों के उपयोग से तैयार अनाज, सब्जियां, फल, दूध एवं दूध के पनीर-मक्खन, मैदा सब बाहर।

अन्न के साथ मन के प्रयोग भी करें। जो यह भोजन खाएगा, वह विनम्र होगा, आस्थावान होगा वगैरह-वगैरह। हर व्यक्ति हमारे लिए ईश्वर का प्रसाद है, ईश्वर भी है। तब खाना-खिलाना क्या पूजा-कर्म नहीं है? हम सब एक-दूसरे के भक्त बन जाएं। सबके हित की बात करें। स्वयं की बात स्वयं से ही करें, प्रशंसा न करें तो अच्छा। व्यक्तित्व के विकास पर, भावी जीवन निर्माण पर चर्चा हो। बुद्धि में प्रेम नहीं होता। इन दिनों उसे बाहर खूंटी पर टांग दें। स्नेह, वात्सल्य, करुणा, दया, सुख-दु:ख, सपने, स्मृति आदि मन के ही विषय हैं। मन का पोषण करें, संकल्पवान बनाएं, चर्चा करें।

वस्त्र देशी, ढीले पहनें-कुर्ता पायजामा जैसे। तंग वस्त्रों में त्वचा के, श्वांस लेने, विषाक्त द्रव्यों को बाहर निकालने में तथा सूक्ष्म ऊर्जाओं के आकाश-वायु तत्त्वों के साथ आदान-प्रदान में बाधा पहुंचती है। हमारा देश गर्म क्षेत्र है। यहां पतलून (पेंट) कमीज, कोट जैसे कपड़े स्वास्थ्यवर्धक नहीं हैं, जैसे सीमेंट-कॉन्क्रीट के मकान। गर्मी में गरम, सर्दी में ठण्डे। इन दो सप्ताह में कोशिश तो हम यह भी करें कि फ्रीज, माइक्रोवेव, एयरकंडीशनर जैसे विलासिता के उपकरणों का उपयोग भी न करें। सिर्फ बिजली और पंखे के सहारे दिन गुजारें। जैसा कि पचास साल पहले करते थे।

शाम को भोजन के बाद कहानियों का एक नियमित सत्र हो। ब्यालु जल्दी करें, ताकि सोने से पूर्व दो-तीन बार जल पी सकें। हर व्यस्क बच्चों को एक कहानी सुनाए। हर बच्चा कोई कविता या संस्मरण सुने। अनावश्यक मनोरंजन इस जीवन का अपमान है। ईश्वर ने हमें एक प्रयोजन से भेजा है। उसे समझ सकें और तप सकें तो चमक जाएंगे-प्रकाश फैलाएंगे।

स्वयं को ईश्वर (सूक्ष्म प्रकृति) के साथ जोडऩा सीखें। बाहर जीने में सार्थकता तब ही पैदा कर पाओगे, जब भीतर-बाहर जुड़ जाएंगे। आप स्वयं अपने ईश्वर हैं। बाहर ढूंढने की आवश्यकता नहीं है। जब हर प्राणी ईश्वर है, मेरी तरह, तब क्यों न जीवन को उसे ही समर्पित किया जाए! सब मेरा ही विस्तार है, अलग रह ही नहीं सकते। कोई जड़ है, कोई पत्ता-फूल-या फल। जो अलग हुआ-समझो मर गया। यही भारत की देन है-वसुधैव कुटुम्बकम्!

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