Gulabkothari's Blog

मई 19, 2009

भटकती भाजपा

इस बार लोकसभा चुनावों में भी भाजपा की वैसी ही स्थिति उभरकर सामने आई, जैसी कि पिछले लोकसभा चुनाव में आई थी। शायनिंग इण्डिया का नारा अंधेरे में दबकर रह गया था। अपनी इतनी बडी हार से भाजपा में बौखलाहट का बडा वातावरण भी दिखाई दिया। इस बार भी दावे तो आसमान से नीचे ही नहीं उतरे, किन्तु भाजपा चारों खाने चित्त हो गई। लालजी ने तो यहां तक घोषणा कर दी थी कि यदि मैं पी.एम. नहीं बना तो घर लौट जाऊंगा। न पी.एम. ही बने, न घर ही लौटे। भाजपा की यह सबसे बडी भूल साबित हुई कि उनको इतना पहले से ही प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया। इस सम्मान को पचा सकना उनके लिए असंभव हो गया। इस पूरे काल में उनके तेवर भी प्रधानमंत्री जैसे ही रहे। अन्तत: जनता ने ही उनके नेतृत्व को नकार दिया। चुनाव प्रचार के दौरान ही एक और समझदार नेता ने अपने पिटारे से मोदी का नाम छोड दिया। इसका एक अर्थ यह था भाजपा के एक धडे को भी आडवाणी का नेतृत्व स्वीकार नहीं है और वह भी ऎन चुनाव के पहले। भाजपा का इससे बडा नुकसान तो कांग्रेस ने भी नहीं किया। इस घोषणा से नरेन्द्र मोदी भी फुफकारने लग गए। सभी नेताओं की वाणी से विष उगला जा रहा था। इसका परिणाम भी वही होना था। भाजपा के सहयोगी दलों ने भी मोदी को नकार दिया।
दिल्ली के गढ में भाजपा का एक संतरी भी नहीं बचा। उत्तराखण्ड में भी भाजपा को बैरंग लौटना पडा। राजस्थान में अकाल पड गया। मात्र चार सीटों पर संतोष करना पडा। चुनाव प्रचार में यहां भी बयानबाजी का बडा दौर चला था। गुलाब चन्द कटारिया की रथ यात्रा आगे बढती गई और पीछे-पीछे भाजपा की चादर सिमटती चली गई। पहले ही दिन से उदयपुर की पांच सीटें कांग्रेस को जाती दिखाई दे रही थीं, राजसमन्द को छोडकर। भाजपा के लोग इस बात को मानने को तैयार नहीं थे। राजस्थान में हम इन चुनावों के आंकडों को पिछले चुनाव के आंकडों से मिलाएं तो पता चल जाएगा कि भाजपा का मतदाता उदासीन होता जा रहा है। सन् 2003 में विधानसभा और सन् 2008 के विधानसभा में कांग्रेस के पक्ष का मतदान मात्र 1 प्रतिशत बढा था, जबकि भाजपा के पक्ष में लगभग 5 प्रतिशत मतदाता घटे थे। सन् 2004 के और सन् 2009 के लोकसभा चुनाव कहानी को और आगे ले गए। कांग्रेस के पक्ष में 5.75 प्रतिशत वोट बढे, किन्तु भाजपा के पक्ष में टूट 12.44 प्रतिशत की हुई। शेष मतदाता वोट डालने नहीं आए।
कांग्रेस के हारे हुए विधायक सी.पी. जोशी और लालचन्द कटारिया सांसद चुने गए, जबकि भाजपा के जीते हुए विधायक घनश्याम तिवाडी, किरण माहेश्वरी और राव राजेन्द्र सिंह चुनाव हार गए। एक बात और भी है कि गांवों में रोजगार गारण्टी योजना का प्रभाव भी दिखाई पडा। भाजपा की कई योजनाएं लागू ही नहीं हो पाई।
किसी की नहीं मानना भी भाजपा के लिए शान की बात हो गई है। चाहे राजनाथ सिंह हो, चाहे आडवाणी, सुषमा स्वराज या वसुन्धरा राजे। इनके लिए तो सही उतना ही है जो इनको सही लगता है। इस पर भी जातिवाद का भूत भीतर इतना उतर गया है कि लोगों को राष्ट्रवाद छोटा सा जान पडता है। लोग अपनी-अपनी जाति के बाहर नेतृत्व देने को ही तैयार नहीं है। प्रचार के दौरान भाजपा की छवि गिरती चली गई और किसी के भी कान खडे नहीं हुए। भ्रष्टाचार और अपराधियों को शरण देने में भी किसी पार्टी से पीछे नहीं रही। आज भी भाजपा अपनी साम्प्रदायिक छवि से उबर नहीं पाई है। नई पीढी का मतदाता शान्ति चाहता है।
राजनीति में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका क्या हो, इस पर वह सोचे। आज भाजपा से न कार्यकर्ता संतुष्ट है, न ही देश। भाजपा ही देश की दूसरी बडी राजनीतिक पार्टी भी है। हर बार इसी तरह मार खानी हो तो इसकी मर्जी, किन्तु कुछ करने लायक बनना है तो पार्टी का पुनर्गठन एवं नीतियों का आकलन करना होगा। सभी पुराने चेहरों को सलाहकार का दर्जा देकर पीछे की सीट पर बिठा देना चाहिए। कांग्रेस में भी ऎसे ही लोग “घुण” का कार्य कर रहे हैं। वहां तो नीचे पोल ही पोल है। भाजपा में तो ऎसा नहीं है। केवल अहंकार है।
यह देश का दुर्भाग्य ही है कि दो बडे दलों में से एक पटरी से उतर गया है। वरना तीसरे मोर्चे की जरूरत ही देश को नहीं पडती। सब जानते हैं कि तीसरा और चौथा मोर्चा किन लोगों का गठबन्धन है और देश को क्या दे सकता है। भाजपा में यदि आवश्यक सुधार नहीं हुआ तो ये लोग ही लोकतंत्र के नायक होंगे।
गुलाब कोठारी

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मई 18, 2009

आशा की किरण

लोकसभा चुनाव के परिणामों ने मतदाता की परिपक्वता पर मुहर लगा दी है। अब कोई भी राजनीतिक दल मतदाता के साथ खिलवाड नहीं कर सकेगा। यह मान लेने का समय भी अब नहीं रहा कि मतदाता उदासीन दिखाई देते हुए भी चौकस नहीं हैं। चुनाव परिणाम यूं तो अनेक पहलुओं की स्थिति बखान कर रहे हैं, फिर भी दो-तीन बातें मुख्य तौर पर उभरी हैं। मतदाता ने किसी एक दल को, कांग्रेस को, ही बहुमत देने की ओर कदम उठाया है। ताकि कांग्रेस को अपना घोषणा पत्र निर्विघ्न रू प से लागू करने का अवसर मिल सके।
पिछले पांच वर्षों का इतिहास इसका साक्षी है कि कांग्रेस का प्रधानमंत्री भी अनेक महत्वपूर्ण मुद्दों पर कांग्रेस की नीति के अनुरू प निर्णय नहीं कर सका। हर बार कोई न कोई सहयोगी ही कांटे बिछा देता था। मतदाता ने इस बार उन कांटों को भी बुहार दिया। जो आपराधिक तत्व सत्ता पर काबिज हो गए थे और सत्ता को अपनी मुट्ठी में लेकर चल रहे थे, उनको बडा सबक सिखा दिया।
देश के मानचित्र पर आपराधिक तत्वों का विकास और जमावडा सर्वाधिक उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में होने लगा है। इसके लिए जिम्मेदार वहां के क्षेत्रीय दल ही रहे हैं। मतदाता ने उन दलों को इस बार पटखनी दे दी और विकास की डोर विश्वसनीय पार्टी के हाथों सौंप दी। समाजवादी पार्टी, लोकजन शक्ति पार्टी, राजद एवं वाम दलों पर कडा प्रहार करके लोकतंत्र की लाज बचा ली। इसके लिए मतदाता को नमन! अपराधियों के बीच बैठकर इतना साहस दिखाना कम बात नहीं है। मतदाता ने भाजपा को भी बडा झटका दिया है। कर्मठ और विवेकशील माने जाने वाले दल ने पिछले दस वर्ष में अपनी छवि खराब ही की है। आज भाजपा के अधिकांश नेता अपने अहंकार के कारण यथार्थ को स्वीकार ही नहीं करते। वाणी का संयम भी खो बैठे। आचरण में भी भारी गिरावट आई है। इन सब पर भी धन का दाग गहरा लगा हुआ है (अनेक पर)। अटलजी का काल भी देखा, यूपीए की जीत के बाद भाजपा की बौखलाहट देखी और इस बार उन्हें अनियंत्रित होते हुए भी देखा। देश एक पार्टी का शासन तो चाहता है, किन्तु ऎसा सत्ता का मद भी नहीं चाहता, जैसा कि आज भाजपा में आ गया है। भाजपा को अपने आचरण पर चिंतन करना चाहिए।
तीसरा और चौथा मोर्चा किन दलों ने बनाया है, यह भी मतदाता के जेहन में रहा है और उन क्षेत्रीय दलों को राष्ट्रीय स्तर पर निष्क्रिय करने का भी प्रयास किया है। उनको अपनी सीमा बताने का कार्य भी काफी हद तक इन चुनावों में हुआ है। बचा-खुचा अगले चुनाव में नई पीढी कर दिखाएगी। इस दृष्टि से ऎसे क्षेत्रीय दलों को मर्यादित एवं लोकहित का व्यवहार भी सीख लेना चाहिए।
कुल मिलाकर एक परिपक्व परिणाम सामने आया है। पिछले कार्य और भावी दृष्टि का प्रभाव भी इनमें झलकता है। उम्मीद करनी चाहिए कि नई सरकार देशहित के और जनजीवन के मुद्दों को प्राथमिकता देती रहेगी।
गुलाब कोठारी

मई 14, 2009

नेतृत्वविहीन चुनाव

लो, चुनाव भी हो गए हैं। अब क्या होगा खरीद-बेच का समय आएगा। मोल-तोल होंगे। यह सारा इस बात पर भी निर्भर करेगा कि बढत किस पार्टी को मिलती है। मोल भी खरीददार देखकर ही बताया जाता है। फिर राष्ट्रपति का रूख क्या कहता है, वह भी महत्वपूर्ण है। वह बडे गठबन्धन को भी बुला सकती हैं और बडी पार्टी को भी। उनके बुलावे के बाद भाव-ताव और बदल जाएंगे।
किसी भी दल को राष्ट्रपति द्वारा बडे दल के रूप में स्वीकृत करने के समय चुनाव पूर्व का गठबन्धन समझौता महत्वपूर्ण होता है। इस बार कांग्रेस ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, द्रमुक और झामुमो से सीमित गठबन्धन करके देशभर में अपने ही प्रत्याशी खडे किए हैं। इससे कांग्रेस को अपनी सही शक्ति का अनुमान भी हो जाएगा। कांग्रेस का ही एक खेमा राहुल गांधी को विपक्ष में बिठाकर प्रतिष्ठित कराना भी चाहता है। इससे मध्यावधि चुनाव की भी सम्भावना बढ जाएगी। मायावती के साथ एनडीए आसानी से पांच साल नहीं खींच पाएगा। तब राहुल के प्रधानमंत्री बनने के अवसर होंगे।
चुनावों में दोनों ही दल कमजोर साबित हुए। दोनों में ही नेतृत्व का अभाव रहा। इसी कारण मतदाता भी उदासीन दिखाई दे रहा था। हालात यहां तक हो गए कि कई प्रदेशों में तो मतदान आधा भी नहीं हुआ। क्या यह इस बात का प्रमाण नहीं है कि लोगों के मन में लोकतंत्र के प्रति सम्मान कम हो गया है! हमने देखा है कि कहीं विरोधी पार्टी के मतदाताओं को धमकियां दी जाती हैं, तो कहीं मदिरापान कराया जाता है। कहीं जीतने पर उपहार देने के लिए टोकन बांटे जाते हैं। गोलियां तक चलाने से नहीं चूकते लोग। यही रह गया हमारे लोकतंत्र का यथार्थ रू प। यही हमारी साठ साल की उपलब्धि है। ऎसे चुनाव तो वैध भी नहीं माने जाने चाहिए। नेताओं को क्या फर्क पडता है! उन्हें कुर्सी के अलावा कुछ नहीं दिखाई पडता। जो रास्ते में आता जान पडे उससे तो गाली-गलौच कर बैठते हैं। संतुलन खो देते हैं। अब जो खरीद-फरोख्त होगी, तब पीछे रहने वाले कैसे विष उगलेंगे, सामने आ जाएगा। सारे नेताओं को तो कुर्सियां मिल नहीं पाएंगी। चुनावों में सार्वजनिक रूप से गालियां देने वाले भी तलुए चाटेंगे और प्रशस्ति गान करते दिखाई देंगे। जोड-तोडकर भानुमति का कुनबा बनेगा। वही हमारा भविष्य तय करेंगे। शायद अगले चुनावों में नई पीढी कुछ क्रांतिकारी परिणाम दिला सके।
सरकार बनाने का निमंत्रण वैसे तो तयशुदा नियमों के तहत ही दिया जाता है, फिर भी राष्ट्रपति का स्वविवेक भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अटलजी को तत्कालीन राष्ट्रपति ने बडे दल के रूप में सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया था। वहीं राष्ट्रपति के.आर. नारायण ने सबसे बडे गठबन्धन को आमंत्रित किया था। वर्तमान राष्ट्रपति का नजरिया समय आने पर सामने आएगा। वर्तमान स्थिति में यह तो तय है कि कांग्रेस और भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिलता हुआ दिखाई नहीं दे रहा। ज्यादा सीटें मिलने का दावा भी दोनों ही दल कर रहे हैं। दोनों के बीच अन्तर भी बहुत बडा रहने वाला नहीं है। कौन दल किन-किन पार्टियों के साथ गठबन्धन करता है और संख्या में भी आगे निकलता है, उसी पर निर्णय ठहरेगा।
सरकार किसी की भी बने, मुख्य प्रश्न यह है कि कौन पार्टी आगे बढकर देश को नेता देती है। सरकार चलाना नेतृत्व नहीं है। देश जिसके पीछे चलने को तैयार रहे, वैसा नेता होना चाहिए। अभी दो बडे नेताओं पर तो जूते फेंके जा चुके हैं। जब तक देश में कोई नेता नहीं उभरेगा, देश आगे नहीं बढेगा। यह दायित्व भी दोनों ही मुख्य दलों का है।
गुलाब कोठारी

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मई 13, 2009

दलों का दलदल

देश के लोकसभा चुनावों का आज अन्तिम चरण है। कल से दिल्ली में नेताओं की मण्डी शुरू हो जाएगी। मतदाता सारे घटनाक्रम को मूक दर्शक बनता देखता रहेगा। ये सब वे ही लोग होंगे जो मतदाता द्वारा अथवा उसके नाम से चुने जाकर दिल्ली पहुंचते रहे हैं। जो कुछ परिणाम आएंगे, उन्हें देखकर मतदाता के मन पर जो कुठाराघात होगा उसका अनुमान कौन कर पाएगा नेता तो हर्गिज नहीं कर सकेंगे।
इस देश में चुनाव, दल, मतदान जैसे शब्दों के द्वारा कुछ नियम कानून भी बने हुए हैं, किन्तु उनकी पालना करने की बात कौन करता है हमारा तो देश ही आश्वासनों के सहारे चल रहा है।
हमारे देश में आज सात राष्ट्रीय राजनीतिक दल हैं और 39 प्रान्तीय दल हैं। इनकी भी परिभाषा बनी हुई है। प्रान्तीय दलों की शर्त यह है कि वह राज्य की राजनीति में पांच साल से सक्रिय हो और पिछली विधानसभा के चुनाव में उसके पास चार प्रतिशत सीटें हों। या फिर पार्टी को पिछले विधानसभा चुनावों में कुल मतदान का छह प्रतिशत हिस्सा मिला हो। एक बार सदस्य बनने के बाद यदि सदस्य किसी अन्य दल से जुडता है, तो उसको मिले मत मूल पार्टी के ही माने जाएंगे। हमने यह भी देखा है कि सरकार नियम-कानून तो बनाती है, लेकिन उसमें गलियां भी छोड देती है। जैसे एक तरफ पांच वर्ष की सक्रियता की बाध्यता और दूसरी तरफ सीधे चुनाव में कूद कर छह प्रतिशत वोट हासिल करने
की छूट।
इससे भी बडे आश्चर्य की बात है राष्ट्रीय दलों के बारे में। एक राष्ट्रीय दल का कम से कम चार राज्यों में मतदान का छह प्रतिशत हिस्सा होना चाहिए। तभी उसे राष्ट्रीय दल का दर्जा दिया जा सकता है। क्या किसी ने इस दृष्टि से इन आंकडों को देखा है “हाथ कंगन को आरसी क्या” की तर्ज पर पिछले दो चुनाव के आंकडे देखने से भी सारी स्थिति स्पष्ट हो जाएगी। लगभग सभी प्रादेशिक दलों को चुनाव आयोग ने राष्ट्रीय स्तर पर चुनाव लडने की स्वीकृति किस आधार पर दे रखी है स्वाभाविक ही है कि ऎसी स्थिति में मतदाता भ्रमित होता है। जातिवादी या निहित स्वार्थी ठेकेदार पार्टियां बनाकर मैदान में उतर जाते हैं। मोल-भाव और दबाव का बाजार गर्म होता है। ऎसे में मतदाता का रूझान चुनावों के लिए घटेगा ही।
प्रादेशिक और राष्ट्रीय पार्टियों की भेद रेखा भी आज दिखाई नहीं दे रही। सभी प्रमुख प्रादेशिक पार्टियां लोकसभा के लिए भी चुनाव लडने को स्वतंत्र हैं। यदि उनका अस्तित्व अन्य तीन राज्यों में है ही नहीं, तो उन्हें राष्ट्रीय दलों की हैसियत क्यों मिल जानी चाहिए यही तो एक भेद है दोनों के बीच। इस भेद को जाने-अनजाने मिटा देना ही वह कारण है कि इतने सारे दलों के प्रत्याशी लोकसभा में पहुंच जाते हैं। तब कैसे जनता किसी एक दल को बहुमत दे सकेगी। इससे तो बहुमत की सरकार बनने का रास्ता ही सदा के लिए बन्द कर दिया। हर सरकार गठबन्धन की ही बनेगी। बेशक देश का संविधान हर नागरिक को चुनाव लडने की आजादी देता है। लेकिन इस अधिकार का विवेकपूर्ण उपयोग होना चाहिए। तभी राजनीति शुद्ध हो सकेगी, मोल-भाव के रास्ते बन्द होंगे।
आज जितनी पार्टियों के प्रत्याशी लोकसभा में पहुंचेंगे, उनमें कितने प्रत्याशी गैर राष्ट्रीय दलों से होंगे और वे देश के लिए कितने व्यापक दृष्टिकोण से कार्य कर पाएंगे! आज हर केन्द्रीय मंत्री अपने राज्य के लिए काम करके चला जाता है। राष्ट्र के प्रति समग्र दृष्टिकोण कहां से पैदा होगा देश में चुनाव आयोग और सर्वोच्च न्यायालय, दो सक्षम संस्थाएं हैं, जिन्हें ऎसे मुद्दों पर तुरन्त निर्णय देने चाहिए, ताकि देश की बागडोर सक्षम हाथों में ही सुनिश्चित रह सके। वैसे चुनाव आयोग तो अपनी गलती मानने वाला नहीं है। कानून ही कुछ करे, तब है।
गुलाब कोठारी

मई 8, 2009

मत चूके चौहान

चुनाव का चिडियाघर आज बन्द हो जाएगा। सब अपनी-अपनी बोलियां बोलकर चले गए। झेलना तो हमको है। हमारी भाषा में किसी ने कोई भी बात नहीं कही। एक-दूसरे को ही सुना गए। उनको सत्ता चाहिए, फिर हमारी कोई जरू रत नहीं, अगले पांच वर्ष तक। हम तक दस पैसे पहुंचे या पांच ये भी जबानी जमा खर्च की बातें हैं। उनकी तो लडाई बडे हिस्से पर हाथ मारने की है। लोकतंत्र की धज्जियां उडाने में किसी ने कसर नहीं छोडी। मुद्दों पर किसी ने बात ही नहीं की। गरीबी और बेरोजगारी जैसे मुद्दे तो किसी को याद भी नहीं आए। विकास की बात तो बहुत दूर की है। आतंकवाद को तो जैसे भूल ही गए। हां, प्रचार अभियान में अचानक सभी पार्टियों को एक-दूसरे की झोली में काला धन भरा हुआ जरू र दिखाई देने लगा।
राजस्थान का चुनाव प्रचार मूल रू प में अशोक गहलोत और वसुंधरा राजे पर ही निर्भर रहा। दोनों ने ही अपनी पार्टियों का प्रतिनिधित्व किया। इसमें भी कांग्रेस ने वसुंधरा को झालावाड में अटका कर अपना रास्ता काफी साफ कर दिया। इसी प्रकार भाजपा ने जसवंत सिंह और उनके पुत्र को साथ-साथ टिकट देकर अपनी लाचारी भी प्रकट की। गहलोत का प्रचार अभियान 125-150 बैठकों तक पहुंच गया। लाभ तो मिलेगा ही।
इस बार जातिगत समीकरण भी कुछ तो ठण्डे पडे हैं। विधानसभा चुनावों जितनी चर्चा इस बार केवल मीणा वर्ग में ही रही। किरोडी लाल ने मीणाओं का साथ देकर कांग्रेस के नमोनारायण को जिताने का आह्वान भी किया, वहीं भाजपा के श्याम शर्मा का प्रचार करने कोटा पहुंच गए। इधर गैर मीणा समुदाय ने मीणा जाति के प्रत्याशी को वोट न देने का मंतव्य जता करके सारा समीकरण बिगाड दिया। इससे दौसा के दोनों ही मुख्य पार्टियों के प्रत्याशी सकते में आ गए। जो भी हो जातीय आधार तो समाप्त होना चाहिए। और वंशवाद भी। हालांकि राहुल गांधी ने कहा है कि परिवारवाद अलोकतांत्रिक है, फिर भी इतिहास गवाह है कि कांग्रेस ने देश में जितने सामंतों को सत्ता सौंपी है, वह तो इसके विपरीत ही है। बडे लोगों को करना चाहिए, कहने का काम तो छोटे लोग करते रहेंगे। आज दोनों ही दल देश को नेतृत्व देने की स्थिति में नहीं हैं। इसके बारे में पूरे प्रचार के दौरान किसी ने कुछ चिन्ता नहीं जताई। सरकारें भी तभी काम करती हैं, जब देश किसी नेता की आवाज के पीछे चलता है। इस चुनाव में भी कोई नेता उभरकर नहीं आया।
आज मतदान करना है। लोकतंत्र के उत्सव का दिन है। आज का संकल्प है कि हमें “मतदान” करके ही अन्य कार्य करने हैं। कोई भी छूट न जाए। राजस्थान वैसे ही देश में सदा से पीछे रहा है। औसत मतदान में। उसमें भी महिलाएं और भी पीछे हैं। पिछले चुनाव में भी महिलाएं पुरूष मतदाताओं से 11 प्रतिशत पीछे थीं। इस बार तो कुछ आगे निकलने की बात हो। युवा पीढी भी जुड गई है अब तो। और हां! मतदान भी करना है और विवेक पूर्वक भी करना है। प्रत्याशी जनता के बीच का हो, जमीन से जुडा हो, शिक्षित और अनुभवी हो। अपराधी प्रवृत्ति का तो बिल्कुल भी नहीं होना चाहिए। न ही किसी जाति के वोट मांगने वाला ही हो। उसे तो अन्य लोग सीधा नकार सकते हैं। आपका वोट इस देश का भविष्य बनाता है। फिर किसी पर दोष डालकर भी क्या मिल जाएगा। आपका प्रत्याशी किसके साथ मिलकर काम करेगा, यह भी समझना है। ईश्वर हम सबको सद्बुद्धि दे, चुनाव शान्तिपूर्वक सम्पन्न हों और देश विकास के पथ पर आगे बढ सके, यही प्रार्थना है।
गुलाब कोठारी

अप्रैल 24, 2009

सबसे पहले देश

विधानसभा चुनाव की खुमारी अभी उतरी नहीं थी, कि लोकसभा चुनाव धमक पडे। सारे कामकाज ठप हो गए। महंगाई चुनावी चन्दे की चादर ओढकर फूले नहीं समा रही। चुनाव की गर्मी सभाओं के साथ उठती है और सभा समाप्ति के साथ ही उड जाती है। बडी सभाओं में तो स्थानीय लोगों के बजाये बाहरी लोगों के भाव बढ रहे हैं। हालात कमोबेश राजस्थान जैसे ही हैं, कुछ अच्छे ही रहेंगे।
गत विधानसभा चुनाव में मध्यप्रदेश में भाजपा को पुन: सरकार बनाने का जनादेश मिला था। लोकसभा की भी 29 में से 24 सीटें भाजपा की झोली में थीं। शिखर पर बैठने वाले के लिए ऊपर जाना संभव नहीं होता। चलना है तो नीचे आना ही पडता है। देता भी वही है जिसके पास होता है। इसी सिद्धांत के अनुसार यदि कुछ देना पडा तो भाजपा को ही देना पडेगा। कांग्रेस के पास केवल चार सीटें हैं, तो देगी क्या! उसे तो मिलना ही है। यही संघर्ष है- कांग्रेस अधिक से अधिक लेने का प्रयास कर रही है और भाजपा टूट को रोकने का।
कांग्रेस की संगठन क्षमता विधानसभा चुनावों के मुकाबले कुछ सुधरी भी है। कमलनाथ अपने क्षेत्र में अटक गए। हार गए तो नेतागिरी उठने का डर है। अर्जुन सिंह, राहुल सिंह का प्रभाव उठ गया है। दिग्विजय सिंह को प्रचार के लिए प्रेरित किया जान पडता है। पहली बार 19 अप्रेल को बाहर निकले हैं। सुरेश पचौरी जरूर एक बार पूरे प्रदेश का दौरा कर चुके हैं। आलाकमान की कृपा दृष्टि इन पर ही दिखाई दे रही है। राहुल गांधी ने चुनाव घोषणा से पहले ही दौरा शुरू कर दिया था। इनके सामने टिकटों के आवंटन की नाराजगी अभी भी कई क्षेत्रों में दिखाई दे रही है।
भाजपा अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह तोमर भी अपने निर्वाचन क्षेत्र से बाहर निकलने में स्वयं को असमर्थ पा रहे हैं। उमा भारती तो लगता है राजनीति छोड गई हैं। कहीं उनका नाम लेवा ही नÊार नहीं आया। उनके कार्यकर्ता भी जहां से आए थे, वहीं लौट गए। उनके मतदाता भी नई जगह तलाश करेंगे। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह पूरी तरह जोश में दिखाई दे रहे हैं और आशान्वित भी हैं कि अधिकांश सीटों को रोकने में सफल रहेंगे।
भाजपा को एक झटका यह भी लगा कि उसकी एक मंत्री रंजना बघेल ने गंगूबाई को चांटा मारकर नेताओं के मुंह एक बार तो बंद कर ही दिए थे। उधर जाटव समाज में कांग्रेस विधायक माखन सिंह की हत्या से ग्वालियर, भिण्ड, मुरैना क्षेत्र में भी कुछ नुकसान हो सकता है। इस क्षेत्र पर ज्योतिरादित्य की भी प्रतिष्ठा दांव पर लगी है, लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष इन सीटों को (कम से कम भिण्ड और मुरैना को) तो कांग्रेस भी झोली में मानकर ही चल रहे हैं।
इस बार चुनाव में दोनों ही पार्टियों के पास कोई मुद्दा उभरकर सामने नहीं आया। इससे चुनाव परिणाम व्यक्ति की सामथ्र्य पर अधिक निर्भर करेंगे। चुनाव के शुरू के दौर में कांग्रेस ठण्डी थी। राजकुमार पटेल का नामांकन रद्द होने के बाद तो मानो उसे लकवा ही मार गया था। यहां तक बातें होने लगी थीं कि सोच समझकर मुख्यमंत्री ने दिग्विजय सिंह के साथ समझौता करके पर्चा गलत ही भरवाया था। नहीं तो नौ बार चुनाव लड चुके पटेल इतनी बडी भूल कैसे करते! सुषमा स्वराज के सामने विदिशा में कांग्रेस प्रत्याशी नहीं होने से कार्यकर्ताओं में चुनौती का भाव ही समाप्त हो गया। वे वोट बढाने में लगे हैं। कांग्रेस कार्यकर्ता प्रयास कर रहे हैं कि भाजपा की जीत को कैसे छोटा किया जाए।
मध्यप्रदेश में मतदान का प्रतिशत भी लगातार घट रहा है। आज भी शाम को कुछ युवा मतदाता क्रिकेट देखेंगे। गर्मी के तेवर भी कुछ बाधा बन सकते हैं। लोगों को फिर भी अपने अधिकार का विवेक सम्मत प्रयोग अनिवार्य रूप से करना ही चाहिए। हमारे सामने विडम्बना ही है कि एक ओर चुनाव आयोग जातिवाद को नकार रहा है, वहीं दूसरी ओर आरक्षण का आधार भी जातिवाद को ही बना रखा है। इसे भी तोडना है।
मध्यप्रदेश में इस बार भी भाजपा आगे तो रहेगी ही, किन्तु महाकौशल और विंध्य में कुछ परिवर्तन की हवा बनी है। ये क्षेत्र ही कुछ बदलाव लाएंगे। इनमें भी अधिकांश सीटें तो भाजपा के पास ही हैं। इनमें कितनी टूटेंगी और कितनी रहेंगी आज पहले चरण में तय हो जाएगा।
गुलाब कोठारी

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