Gulabkothari's Blog

अप्रैल 14, 2009

जागना तो पडेगा

Filed under: Gujjar Andolan — gulabkothari @ 7:00

आरक्षण आंदोलन तो ठहर गया किन्तु अनेक प्रश्न खडे कर गया। सबसे बडा प्रश्न तो यही है कि हर जाति यदि अपने हितों के लिए स्वतंत्र आंदोलन करने लग गई तो लोकतंत्र का स्वरू प क्या होगाक् क्या निर्वाचन क्षेत्र भी जातीय आधार पर तय होंगेक् क्या कोई भी जाति अपने आंदोलन के नाम पर अन्य जातियों का इतने सहज रू प से अहित कर सकती हैक् जो सम्पत्ति नष्ट हुई वह भी जनता की थी, तो जनता उसे बचाने को आगे क्यों नहीं आईक् पांच प्रतिशत लोगों के आगे 95 प्रतिशत लोगों ने क्यों घुटने टेक दिएक् क्या इस तरह की हिंसा एवं आगजनी के डर से लोग गांवों से पलायन नहीं कर जाएंगेक् क्या बहुमत के आधार पर कोई भी जाति अपने गांव की अन्य जातियों को स्वतंत्र रहने देगीक् जातिगत राजनीति करने वालों का क्या सामूहिक प्रतिकार नहीं होना चाहिएक् इनको अन्य जातियों के हितों की चिन्ता नहीं होती है। इनके भाषण भी भडकाऊ होते हैं और जाति के नाम पर अपराधी प्रवृति के लोगों को भी आगे आने का अवसर मिल जाता है। यह लोकतंत्र का दुर्भाग्य ही है कि जातीय समूहों ने राजनीतिक ब्लैकमेल के रास्ते अपना लिए हैं। इनके आन्दोलनों का स्वरू प अब अहिंसात्मक और शान्तिपूर्ण नहीं रह गया है। पिछले कई आंदोलन उदाहरण के लिए सामने हैं। अन्य जातियों में विद्वेष का प्रसार ही बढ रहा है। राजनीतिक दल भी इस जातीय कमजोरी का लाभ उठा रहे हैं। चुनावों में टिकट वितरण सबसे बडा माध्यम होता है। जाति विशेष के लिए की जानी वाली घोषणाएं भी हो सकती हैं। कई लोग कहते मिल जाएंगे कि उनके लिए जाति का हित समाज से ऊपर है। क्या यह समाजद्रोह नहींक् ऎसे ही लोग जातीय भावना भडका कर तथा अपने ही लोगों को हिंसा के लिए उकसा कर मनमाने निर्णय कराने का दम्भ भरते रहते हैं। जनता के शेष वर्गों के हितों से इनका कोई लेना-देना नहीं होता।

मण्डल आयोग की सिफारिशों से शुरू हुआ जातीय विद्वेष देश को कहां ले जाएगा इसका अनुमान हाल ही का आंदोलन देखकर लोगों ने लगा लिया होगा। भीतर ही भीतर कई जातियों में द्वेष भाव बढ गया है।

आंदोलन में हिंसा, हथियारों का प्रदर्शन एवं उपयोग जिस तरह बढ रहा है, चिन्ताजनक है। इससे पूरे राज्य में दहशत और आतंक का एक वातावरण बन जाता है। बच्चों पर क्या बीतती होगीक् मार-काट की घटनाओं में घृणा का जो रूप दिखाई दिया वह साम्प्रदायिक दंगे से कम नहीं था। भीड ने यह भी समझा दिया कि उसकी कोई जाति, धर्म या समाज नहीं है। नेतृत्वहीन, अनियंत्रित भीड अराजकता का पर्याय बन गई।
यह भी एक गुत्थी ही है कि इस बार आन्दोलन रातों-रात कैसे इतना बडा हो गया। क्या पहले कभी आन्दोलन नहीं हुएक् हिंसा नहीं फैलीक् कौन लोग थे इसके पीछे जिन्होंने इतनी हवा दी। कल तो कोई भी आन्दोलनकारी किसी के भी घर में घुसकर ताण्डव कर सकता है। जैसा कि वैर की महिला उप जिला मजिस्ट्रेट के घर में घुसकर किया गया। ऎसे खून की होली खेलने वालों की तो समाज को भी सीमा तय करनी पडेगी। जरू रत पडे तो ऎसे लोगों को गांव से निकाला भी जाना अनुचित नहीं होगा।

एक बात स्पष्ट है। समाज को स्वयं को भी जागना पडेगा। कोई भी जातीय गुट सम्पूर्ण समाज से बडा नहीं होता। आंदोलन यदि शान्तिपूर्ण है, तो उसका साथ दिया जाए। न किसी को मारा जाए और न सार्वजनिक सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाया जाए। आंदोलन हिंसक हो जाए तो तुरन्त उसका प्रतिकार करना होगा। जन-जीवन आए दिन अस्त-व्यस्त नहीं हो सकता। किसी एक जाति के हितों के कारण शेष समाज त्रस्त भी नहीं हो सकता। केवल सरकार और पुलिस के भरोसे बैठा नहीं जा सकता। पुलिस भी ऊपर से आदेश आने की प्रतीक्षा करती है। राज्य की शान्ति व्यवस्था पर हमारा पहला अधिकार होना चाहिए। वह हमारे नियंत्रण में रहे।

गुलाब कोठारी

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याद रखें…

Filed under: Gujjar Andolan — gulabkothari @ 7:00

सरकार और आंदोलनकारियों के बीच समझौता हो गया। भले ही मिठाइयां बांट लो। किसी को भी यह समझ में नहीं आया कि समझौता किस बात का हुआ। कौन हारा, कौन जीता। कागजों में भले ही गुर्जर आरक्षण का मुद्दा शान्त हो गया, किन्तु लोगों के दिलों में बडे गहरे घाव हो गए। काल का एक ऎसा अंश आया था कि लोकतंत्र ध्वस्त हो चला था। भारतीय दण्ड संहिता ने समर्पण कर दिया था और स्वतंत्रता के झण्डे के नीचे लोग अपने ही प्रदेश में कैद होकर रह गए थे। दूसरा कोई देश होता तो फंसे हुए लोगों को निकालने की व्यवस्था होती, खाद्य सामग्री और दवाएं उपलब्ध कराई जाती, बच्चों को परीक्षा केन्द्र तक पहुंचाने की व्यवस्था होती। यहां तो कुछ भी नहीं हुआ। मानो सरकार ने स्वेच्छा से समर्पण कर दिया हो। हिंसा के उस दौर में न किसी पर राजद्रोह का मुकदमा चला, न सरकारी सम्पत्ति के नुकसान का। पुलिस खुद नदारद थी। रक्षा की आवश्यकता पर रक्षक ही भाग खडा हो और किसी को शर्म तक न आए। शेष नेता और अघिकारी भी कायरों की तरह मौन थे।
इससे भी बडा अनर्थ किया हमारे जनप्रतिनिघियों ने। किसी ने भी जनप्रतिनिघि की भूमिका नहीं निभाई। न अपने क्षेत्र के मतदाता का सम्मान किया, न ही इनका प्रतिनिघित्व किया। बल्कि अघिकांश विधायक तो भीड को उकसाने में लगे थे, नेतृत्व कर रहे थे, अथवा मूकदर्शक बने खडे थे। अपने ही मतदाता के सामान को आग लगवा रहे थे। हिंसा को रोकने का प्रयास तो कोई कर ही नहीं रहा था। इसी का दूसरा पहलू यह भी है कि सरकार में बैठे मंत्रीगण व्यवस्था के खिलाफ आस्तीनें चढाए खडे थे। मंत्री का पहला दायित्व है कि मंत्रिमण्डल के फैसले को लागू करवाए। जनता के जान-माल की रक्षा करे। जो हुआ, सब कुछ उलटा हुआ। इन्होंने साधारण जनप्रतिनिघि तक की भूमिका भी नहीं निभाई। जनता के दुख में हाथ बंटाना तो दूर, अपनी जाति के लोगों को हिंसा के लिए लगातार उकसाते रहे। अघिकांश भाजपा विधायक (प्रभावित क्षेत्रों के) अपनी ही सरकार की नाक कटवाने में लगे रहे। जैसे इन्होंने अपनी ही जाति का उद्धार करने के लिए अवतार लिया हो। विधानसभा में ली गई शपथ किसी को भी याद नहीं रही। कांग्रेस के एक सांसद तो भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष से गुर्जरों के पक्ष में गुहार करने जा पहुंचे। धरने की शुरूआत पर सांसद सचिन पायलट तो पूरे काफिले के साथ धरना स्थल पर पहुंच गए थे। खाद्य मंत्री किरोडी लाल मीणा सरकार पर बराबर दबाव बनाए हुए थे। इस्तीफे की पेशकश भी कर डाली थी। वे इसे अपने अस्तित्व का मामला मान बैठे थे। इसी प्रकार पंचायती राज मंत्री कालूलाल गुर्जर, वित्त राज्य मंत्री वीरेन्द्र मीणा, बयाना विधायक अतर सिंह भडाना उन जनप्रतिनिघियों में से थे जो अपने क्षेत्रों को जलते हुए देख रहे थे। सबसे ज्यादा आगजनी इन्हीं के क्षेत्रों में हुई थी। ये अपने मतदाता को, शक्तिदाता को, भस्मासुर की तरह जलाकर खाक कर देना चाह रहे थे। रामगंज मण्डी रेलवे स्टेशन जला, दरां का स्टेशन ध्वस्त हुआ और भी नुकसान हुआ। इसके चश्मदीद गवाह और लोगों में प्राण फूंकने वाले वहीं के विधायक प्रहलाद गुंजल थे। कामां, डीग, मांडल, नैनवा, बस्सी, सिकराय, बांदीकुई, करौली, सपोटरा, टोडाभीम जैसे क्षेत्रों के विधायकों का व्यवहार भी ऎसा ही था। सबने अपने आपको जातीय प्रतिनिघि ही प्रमाणित करने का प्रयास किया। जनप्रतिनिघि सिद्ध नहीं हो सके।
इसे कैसा लोकतंत्र कहा जाए जहां सभी राजनीतिक पार्टियां, सरकार सब अपने-अपने लोगों को जातीय संघर्ष में भस्म कर रही थीं। पुलिस और गृह विभाग मौन खडे थे। आंदोलनकारियों को खुली छूट मिली हुई थी। किसी को जातीय हित से ऊपर उठते नहीं देखा। न किसी पार्टी अध्यक्ष ने कोई कार्रवाई की। न किसी ने इस काल में जनता को सम्बोघित करके उसे विश्वास में लेने का प्रयास ही किया। केवल अपने-अपने वोटों की गणित लगा रहे थे।

प्रशासन ने पूरे प्रदेश को आंदोलनकारियों के भरोसे छोड दिया था। नागरिक अपने ही गांव में बंधक होकर रह गया था। जब-जब जातिगत आधार पर कोई आन्दोलन होता है, उस जाति के नेता और अघिकारी उसमें शरीक होने में गर्व महसूस करते हैं। इस बार भी यही हुआ। जातिगत समारोह, उत्सव आदि में भी जातिगत आधार पर ही मुख्य अतिथियों का चयन किया जाता है। ये उस लोकतंत्र की भाषा है जहां जातीय आधार पर मतदाता की सूची भी नहीं बन सकती। इस लोकतंत्र के रक्षक ही जातीय आधार पर इसके भक्षक हो गए। भावी चुनावों में हमें केवल “जन प्रतिनिघि” चुनना चाहिए। जातीय प्रतिनिघि तो कदापि नहीं।

गुलाब कोठारी

साधुवाद!

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आज प्रात: लद्दाख से दिल्ली आकर उतरा तो मन में एक ही प्रश्न था-क्या कार से जयपुर जाना उचित रहेगा। हवाई अड्डे से ही कार्यालय के वरिष्ठ सहयोगियों से चर्चा भी की। सबने अपने-अपने रक्षात्मक सुझाव भी दिए और साथ ही मेरी बात का समर्थन भी टाल गए। “शाम की फ्लाइट से आना ही उचित रहेगा।” सभी का एक-सा उत्तर था।

मेरे भीतर का पत्रकार किसी सुझाव को स्वीकार करने को तैयार नहीं था। राजस्थान पत्रिका और पाठकों के बीच एक आत्मीयता का नाता है, उसे व्यापारिक दृष्टि से नहीं समझा जा सकता। और अब तक के उदाहरण कुछ इंगित करते हैं तो मुझे मार्ग में किसी तरह की रूकावट नहीं आनी चाहिए। और मैं जयपुर के लिए रवाना हो गया।

आज सुबह से ही मेरे पास अनेक फोन आ रहे थे। सम्पादकीय लेख के बारे में। मैं रास्ते भर उनका ही विश्लेषण करता रहा। मोबाइल पर भी कई तरह के संदेश मिले। इन सबकी एक ही प्रतिक्रिया थी कि पत्रिका न्यायसंगत ढंग से अपना धर्म निभा रहा है। समाज एवं सरकार को मार्ग भी बताता रहा है। वैसे भी न्याय तो होता ही धर्म की रक्षा के लिए है। अन्तर यही है कि न्याय को मांगना पडता है और धर्म को साधा जाता है। पत्रिका एक साधक है।

पत्रिका के संदेश ने लोगों के दिल को छुआ, उनके दायित्व का बोध कराया वह एक बात है। किन्तु लोगों ने अपने आन्दोलित मन पर नियंत्रण करके शान्ति का वातावरण बनाने में जो वीरता और धीरता दिखाई, इसके लिए वे साधुवाद के पात्र हैं। आज प्रदेश भर में कहीं कोई बडी दुर्घटना, आगजनी या लूटमार नहीं हुई। चौबीस घण्टे से कम समय में यह कर दिखाना वंदनीय है। जैसे हर व्यक्ति भीष्म पितामह हो गया हो। पूरा राष्ट्र आज स्तब्ध रह गया होगा, कि यह क्या हुआ। सब शान्त कैसे हो गया। दोनों ही समुदाय के लोग इसके लिए साधुवाद के पात्र हैं कि उन्होंने हमारे निवेदन को स्वीकारा। राज्य के उन सभी नागरिकों को भी साधुवाद जिन्होंने आज अपने-अपने इष्ट से प्रार्थना की है। शान्ति बनाए रखने की। कई लोगों ने सद्भावना उपवास भी किए हैं। मुझे आज भी लगता है कि सामूहिक प्रार्थना में बडी शक्ति है।

अघिकार के लिए संघर्ष करना भी हमारा धर्म है। न्यायसंगत भी है। किन्तु हमारे संघर्ष के कारण किसी अन्य के अघिकारों का हनन नहीं होना चाहिए। तब वह नृशंसता की श्रेणी में आ जाता है। हमें कृष्ण के निर्देशानुसार नीति का सहारा लेना चाहिए। धर्म का यही व्यावहारिक स्वरूप है। सब लोग आपके संघर्ष में साथ हो जाएंगे। फिर तो सफलता निश्चित है।

राजस्थान में अभी कुछ और जातियां आरक्षण को लेकर आंदोलन की तैयारियां कर रही हैं। उन्हें इस घटना से सबक लेना चाहिए। धर्मगुरूओं को भी इस बात को अपने प्रवचन का एक निश्चित अंग बनाना चाहिए कि कोई भी समुदाय अपने स्वार्थ के लिए दूसरे समुदायों को नुकसान नहीं पहुंचाए।

हम सब प्रकृति द्वारा संचालित हैं। हममें से कोई अकेला रह कर सुखी नहीं हो सकता। जब हमारे चारों ओर के प्राणी सुखी होंगे तो व्यक्ति स्वयं सुखी हो जाएगा। अत: राष्ट्र के सुख में ही व्यक्ति का सुख निहित है। अलग से कोई व्यक्ति सुखी नहीं हो सकता।

कार्यालय पहुंच कर सबसे पहले श्रद्धेय बाबूसा. को प्रणाम किया। मन ही मन उनको बताया कि कल तक जहां रास्ते बंद थे आज एक व्यक्ति भी नहीं मिला। इससे अघिक गर्व की बात मेरे लिए हो ही क्या सकती थी। आपका और पाठकों का आशीर्वाद इसी तरह मेरी कलम में समाया रहा तो पत्रिका निश्चित रूप से प्रदेश एवं राष्ट्र के नीति-परक विकास में गहन भूमिका निभाएगा।

गुलाब कोठारी

ईश्वर सद्बुद्धि दे

Filed under: Gujjar Andolan — gulabkothari @ 7:00

तीन दिन तक राजस्थान में हिंसा और आगजनी की बेकाबू घटनाएं होने के बाद शुक्रवार को जो कुछ घटा, उसने राज्य को वर्षो पीछे धकेल दिया है। प्रदेश गृह युद्ध के मुहाने पर खडा है। स्वार्थी तत्व आतंक फैलाने में लगे हैं। जातीय हिंसा की लपटें कभी भी पूरे प्रदेश को अपनी चपेट में ले सकती हैं। आज कोई भी राजस्थान की बात नहीं कर रहा। जातीय संकीर्णता के स्वर उबाल लेने लगे हैं। प्रदेश धूं-धूं कर जल रहा है, और कुछ राजनेता ऎसे में भी लोगों को उकसा रहे हैं। ऎसे में विकास, विनियोजन जैसे मुद्दे तो दूर की बात है, राजस्थान और उसकी पहचान का सवाल खडा हो गया है। कोई गुर्जर और कोई मीणाओं की बोली बोल रहा है। राजस्थान की चिंता करने वाला कोई नहीं है। किसी को इस बात की चिंता नहीं कि राजस्थान में गुर्जर-मीणा के अलावा भी समुदाय और जातियां रहती हैं, जिनका जीवन आज अस्त-व्यस्त ही नहीं त्रस्त भी हो गया है। पक्ष-विपक्ष के नेता शांति की अपील तो कर रहे हैं, लेकिन सब मिलकर घटनास्थलों पर पहुंच कर समझाइश करने को तैयार नहीं हैं।
ऎसा लग रहा है मानों राजस्थान में दो ही समुदाय रहते हैं और इनके हितों की लडाई में पूरा राजस्थान झुलस रहा है। सही अर्थों में यह जन आंदोलन होता तो किसी जाति विशेष के हित की बात नहीं होती। ऎसे मुद्दे पर जन आंदोलन इसलिए भी नहीं हो सकता क्योंकि यह भी महसूस किया जाने लगा है कि आरक्षण का लाभ अब क्रीमीलेयर को नहीं दिया जाना चाहिए। राजस्थान में कुछ अरसे पूर्व तक जाटों और राजपूतों की भी यही हालत थी लेकिन धीरे-धीरे परिस्थितियां बदल गई। जाति-समुदाय कोई भी हो, उन्हें अपने देश-प्रदेश का वातावरण विषाक्त नहीं करना चाहिए। ऎसा करके वे स्वयं अलग-थलग पड जाएंगे।

क्या बाकी समाज इन घटनाओं को भूल पाएगा। क्या गुर्जर और मीणा समाज को इन घटनाओं की भरपाई नहीं करनी पडेगीक् लडाई सरकार से है तो बाकी लोगों पर इसकी आंच क्यों आएक् दोनों समाज के मंत्रियों-विधायकों ने अपने समाज के आंदोलन के पक्ष में इस्तीफा देने की पेशकश की है। यह संकीर्णता का ही उदाहरण है। मंत्रियों और विधायकों को सबसे पहले राज्य का हित देखना चाहिए, फिर समुदाय का। मंत्री-विधायक की हैसियत से वे किसी समुदाय के प्रतिनिघि नहीं रह जाते। अच्छा होता वे पहले इस्तीफा देते, फिर अपने समाज के आंदोलन से जुडते।
आंदोलनकारियों की मांगें सही हैं या गलत, आज के हालात में इस पर चर्चा करना बेमानी है। अभी सबसे ज्यादा चिंता का विषय दो जातियों का आमने-सामने हो जाना है। इसे तुरंत नहीं रोका गया तो आने वाले दिनों में प्रदेश की क्या हालत होगी, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। आज ये दो हैं कल और जुड गईं तो क्या होगाक् चार दिन से राजस्थान की जनता जिस तकलीफ को झेल रही है, वैसी स्थिति पहले कभी नहीं आई। राजधानी का सम्पर्क मुख्य सडकों से काटा जा चुका है। कोटा में बच्चे दूध को तरस रहे हैं। कई जगह पानी की लाइनें काट दी गई हैं। जिन बच्चों ने प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए वर्ष भर मेहनत की, वे परीक्षाएं ही नहीं दे पाए। क्या कोई उनकी इस वर्ष की परीक्षाएं दिलवा पाएगाक् उनको हुए नुकसान की भरपाई कौन करेगा। राज्य सरकार या आंदोलनकारी नेताक् बसें बंद पडी हैं। कई रेल मार्गो की पटरियां उखड चुकी है। वाहनों को नुकसान पहुंचाया जा रहा है। सडकों को काट दिया गया है। पुलिस थानों और चौकियों को आग लगाई जा रही है। दिनों-दिन हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। पुलिस या तो मौकों पर है ही नहीं, या चुपचाप बैठी है। सेना के भी हाथ बंधे हुए हैं।
अधिकांश प्रभावित क्षेत्रों में इतनी तबाही होने के बावजूद कफ्र्यू, गिरफ्तारी जैसे उपायों का इस्तेमाल नहीं किया जाना आश्चर्यजनक है। राजस्थान का और नुकसान न हो, इसके लिए कानून का राज स्थापित होना, सबसे पहली आवश्यकता है। यह सही है कि बन्दूक और गोली आखिरी हथियार के रूप में ही इस्तेमाल होने चाहिए। लेकिन जब नेतृत्वहीन भीड मार-काट पर उतारू हो जाए तो उनमें राज के भय का संचार करना ही उचित उपाय है। अब और इंतजार नहीं किया जा सकता। राज्य सरकार को अपनी मशीनरी को निर्देश देने चाहिए कि वह कानून का राज स्थापित करे। निर्णय में एक-एक क्षण की देरी भारी तबाही कर सकती है। ऎसी तबाही जिसका असर कई वर्षो और पीढियों तक रहने वाला है।

प्रदेश में बने अराजकता के माहौल को दूर कर भयमुक्त कानून का राज स्थापित करना राज की पहली जिम्मेदारी है। प्रदेश की जनता को भयमुक्त और शांति का वातावरण देने वाले शासन को ही राज करने का अघिकार है। सारे राज्य को ईश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए कि दोनों ही समुदायों के लोगों को शांतिपूर्ण आंदोलन करने की सद्बुद्धि दे। राज्य में तुरंत शांति स्थापित करने में दोनों समुदाय मदद करें तो राज्य उनका उपकार मानेगा।

गुलाब कोठारी

कठघरे में सरकार

Filed under: Gujjar Andolan — gulabkothari @ 7:00

नाकारा गृह विभाग, विपक्ष भी बरी नहीं शांति नहीं तो प्रदेश गर्त में

साठ साल के लोकतंत्र के इतिहास में राजस्थान के माथे पर इतना बडा काला टीका पहले कभी नहीं लगा। पिछले दो दिनों की घटनाओं से जनता स्तब्ध है। एक ही दिन में 14 लोगों की मृत्यु और ज्यादातर की पुलिस फायरिंग में- आश्चर्यजनक ही है। गुर्जर समाज को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने की मंाग को लेकर कई जिलों में आग लगी हुई है। तमाम पूर्व सूचनाओं के बावजूद गृह विभाग ने जिस प्रकार अदूरदर्शिता दिखाई और हमेशा की तरह गंभीरता को कम करके आंका उसने पूरी सरकार को कठघरे में खडा कर दिया है।

रावला-घडसाना, सोहेला, कोटडा इत्यादि के बाद अब दौसा और बूंदी में गोली की जुबान में आंदोलनों से निपटने वाले गृहमंत्री गुलाब चंद कटारिया एक के बाद एक विफलता के बाद अब पद पर बने रहने का अघिकार खो चुके हैं। उन्हें तुरंत इस्तीफा दे देना चाहिए। खेद की बात है कि मुख्यमंत्री को उनके नकारेपन का एहसास तीन साल बाद भी नहीं हुआ। वे हर आंदोलन को गोलियों से कुचलना चाहते हैं। किसी की मौत पर सफाई देने का इनका अपना अंदाज है। इसी तरह गृह सचिव भी इस जिम्मेदारी वाले पद पर बने रहने की अयोग्यता सिद्ध कर चुके हैं। यह वही गृह विभाग है जिसके अफसरों ने मुख्यमंत्री को घडसाना जाने से रोका था।

गुर्जर समाज को अनुसूचित जनजाति में शामिल किया जाए या नहीं, यह एक अलग सवाल है, लेकिन अब इससे बडा सवाल यह बन गया है कि देखते-देखते ऎसी स्थितियां कैसे बन गई, जिसने राजस्थान के सबसे भीषण उपद्रव का रास्ता खोल दिया। शांति और सद्भाव का गौरवशाली इतिहास एक दिन में ही ध्वस्त हो गया। इसके लिए निश्चित रूप से सबसे ज्यादा जिम्मेदारी सरकार के स्तर पर रही अदूरदर्शिता की है। सब जानते हैं, घटनाएं अचानक नहीं घटी हैं। पिछले कई माह से आंदोलन चल रहा था, लेकिन तमाम सूचनाओं के बावजूद गृह विभाग के दम्भ, अविवेक और अतिविश्वास के कारण इससे निपटने की पर्याप्त तैयारी नहीं की गई। जो तैयारी की गई, वह केवल हिंसा के रास्ते की ओर ले जाने वाली थी। किसी भी लोकतंत्र में आंदोलन से निपटने के जो तरीके होते हैं वे बातचीत से शुरू होते हैं। गोलीबारी सबसे आखिरी उपाय होता है। लेकिन यहां बातचीत के रास्ते की पूरी तरह उपेक्षा कर दी गई। बल्कि एक दम्भी मंत्री ने यह बयान देकर चिंगारी को और हवा दे दी कि हमने किसी को बातचीत के लिए नहीं बुलाया, वे स्वयं आए थे। इसके बाद जो तैयारी की गई वह कुछ ऎसी थी, मानो जनता से नहीं, शत्रु से मुठभेड की तैयारी की जा रही हो। कब उग्रता बढे और कब बन्दूकों का मुंह खोला जाए। राजस्थान के इतिहास में ऎसा पहले कभी नहीं हुआ कि संघर्ष के रास्ते चल जन आंदोलनों से निपटा गया हो।

यह भी विचारणीय प्रश्न है कि गुर्जर जाति की मांग को लेकर बनाई गई मंत्रिमंडलीय सलाहकार समिति इतनी धीमी गति से काम क्यों कर रही थी। उनकी पहचान आवश्यक है जो इनके काम में आडे आ रहे थे। राज्य सरकार 32 में से 26 जिलों में सर्वे का काम पूरा कर चुकी थी। यदि समिति चाहती तो आंदोलन की रूपरेखा बनते ही शेष जिलों का काम युद्धस्तर पर निपट सकता था।

दूसरी ओर, आंदोलनकारी समुदाय का रवैया भी राज्य के हितों के लिए उचित नहीं माना जा सकता। गुर्जर समुदाय शांति और सहिष्णुता के लिए जाना जाता रहा है। राज्य के आर्थिक विकास में इसकी बडी भूमिका रही है। क्या उसे ये स्वीकार होगा कि आने वाली पीढियां उसे अपने ही हाथों लगाए हुए बगीचे को उजाडने के लिए याद करें। राज्य में अनेक आंदोलन हुए हैं, पर इस आंदोलन का स्तर किसी गृह युद्ध से कम नहीं है। उनके मुद्दे पर निर्णय आसान नहीं हैं। गुर्जरों के बाद अनेक जातियां आंदोलन की तैयारी में हैं। हमारे यहां आरक्षण ने समाज और जातियो का जितना विखण्डन कर दिया है, उतना न मुगल कर पाए और न अंग्रेज। आज वोटों की गणित हर आंदोलन के पीछे नजर आ रही है।
विपक्ष के रूप में कांग्रेस को भी बरी नहीं किया जा सकता। तीन साल तक निष्क्रिय पडी रहने के बाद अब उसकी भूमिका आंदोलन को भडका कर राजनीतिक रोटी सेंकने वाली नजर आ रही है। जबकि राजस्थान में आरक्षण के जिन्न को बाहर निकालने की जिम्मेदारी उसी की बनती है। आज भी गुर्जर आरक्षण के मुद्दे पर शायद ही कांग्रेस अपना रूख स्पष्ट कर पाए।

मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने घटना हो जाने के बाद स्थिति अपने हाथ में ली है और वार्ता के द्वार खोले हैं। लेकिन उनके मंत्रिमंडल में शायद ही कोई दूसरा ऎसा होगा जो उनके पीछे से स्थितियां संभालने में सक्षम हो। कई मंत्रियों ने तो अपनी भूमिका तमाशबीन बने रहने तक सीमित कर रखी है। उन्तीस मई को काला दिन बनाने में बडी भूमिका मीडिया की भी रही। एक-दो टी.वी. चैनलों ने कुछ चुने हुए दृश्य इस तरह दिन में बार-बार दिखाए, जिनसे लोग ज्यादा से ज्यादा भडकते गए। इन चैनलों ने घटना के एक पक्ष को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। इस घटना ने साबित कर दिया कि मीडिया चाहे तो शांति कायम कर सकता है और चाहे तो आग लगा सकता है।

इतना सब कुछ हो जाने के बाद अब इन्हीं पक्षों पर निर्भर है कि उसे राजस्थान में लगी आग को भडका कर प्रदेश को गर्त में डालना है या शांति स्थापित करने में सहयोग करना है। शांति नहीं रही तो पर्यटन सहित अन्य क्षेत्रों में नुकसान तो तुरंत नजर आएगा। आज प्रदेश एक नाजुक मोड पर खडा है। मुद्दा जनभावनाओं का भी है और अतिसंवदेनशील भी। जिस तरह वार्ता के दरवाजे अब खोले गए हैं, ऎसा पहले किया होता तो स्थिति बिगडती नहीं। आंदोलनकारी नेताओं को सूझ-बूझ से काम लेना होगा। कहीं ऎसा न हो कि उनके स्वयं के हाथों से नियंत्रण निकल जाए। टीवी चैनलों को कम से कम वल्र्ड ट्रेड सेंटर की घटना से सबक लेना चाहिए जिसमें अमरीकी मीडिया ने भारी जनहानि के बावजूद भावनाओं से खिलवाड करने वाले दृश्यों से परहेज रखा था। राज्य की जनता और विभिन्न जातियों को भी ऎसे समय संयम से काम लेना चाहिए। एक छोटा सा अविवेकपूर्ण कदम राजस्थान को वर्षो पीछे धकेल देगा।

गुलाब कोठारी

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