Gulabkothari's Blog

अप्रैल 10, 2012

तृष्णा (मानस)

किसी की समझ में न आए उसी का नाम माया है। जीवन का आधार कामना है और अत्यन्त तीव्र कामना को ही तृषा या तृष्णा कहते हैं। व्यक्ति जैसे-जैसे अपनी शक्तियों का संग्रहण करता है, उसकी तृष्णा बढ़ती जाती है। चूंकि व्यक्ति उम्र भर बाहरी संसार में ही खोया रहता है, अत: उसकी तृष्णा भी बाहरी विषयों की ही होती है। उसके मन में शक्ति-संग्रहण का जो वातावरण बना रहता है, उसी के कारण तृष्णा का भाव बढ़ता है। धन, वस्तुएं, मकान, जमीन आदि में बढ़ोतरी करना ही उसे शक्ति-सम्पन्नता लगती है।

इस तृष्णा का मूल हेतु भी माया रूप अविद्या है, अज्ञान है। इस अज्ञान के कारण ही मन की चंचलता बनी रहती है। जीव को अपने अस्तित्व का ज्ञान ही नहीं होने देती। जितनी चंचलता होती है, उतनी ही मन की अस्थिरता बढ़ती जाती है। मन में तनावों के नित नए स्पन्दन पैदा होते जाते हैं। जीवन में एक बड़ा व्यवधान चंचलता के कारण बना रहता है। चंचलता ही बुद्धि को भ्रमित रखती है। सुख की तलाश, संकल्प-विकल्प का चक्रव्यूह बना रहता है। शरीर, मन और भाव, व्यक्ति के तीनों धरातल ही तनावग्रस्त हो जाते हैं।

विचारों का क्रम टूटने का नाम ही नहीं लेता। व्यक्ति क्षमता से अधिक अर्जित करने में लगा रहता है। एक ओर वह प्रिय वस्तु की प्राप्ति के लिए भागता है, वहीं दूसरी ओर अप्रिय से भागने का यत्न करता रहता है। जीवन में एक द्वंद्व रह जाता है। अनेक भय से व्यक्ति त्रस्त होने लगता है। कई प्रकार के रोग व्यक्ति में परिलक्षित होने लगते हैं। परिग्रह जीवन में अभिशाप बनता जान पड़ता है।
मन नित्य नया चाहता है। जो वस्तु प्राप्त नहीं होती, उसके लिए भटकता है। प्राप्त होते ही उसके प्रति उदासीन भी शीघ्र ही हो जाता है और फिर नई वस्तु के प्रति दौड़ने लगता है। मन की कामना ही ईष्र्या और अहंकार का मूल है। इसी कारण व्यक्ति मर्यादाओं का लंघन करता है। येन-केन-प्रकारेण प्राप्ति ही उसका लक्ष्य रहता है। संग्रहण और फिर उसकी सुरक्षा में लगा ही रहता है। भय की उत्पत्ति का भी यही कारण बनता है।

तृष्णा के कारण ही व्यक्ति संयम खो देता है। लोभ और ईष्र्या की जकड़ में रहता है। असत्य और अहिंसा के मूल में भी तृष्णा ही है। तृष्णा के कारण ही देश की राजनीति का स्वरूप इतना विकृत हुआ है। तृष्णा ही पूंजीवाद का मूल है। नया उपभोक्तावाद भी तृष्णा के कारण ही आया। बटोरने की लालसा हर एक के मन में बढ़ती ही जा रही है। व्यक्ति किसी भी स्थिति में संतुष्ट नजर ही नहीं आता। इसमें सारी तृष्णा अविद्या रूप है। अज्ञान के कारण फैलती नजर आ रही है। नकारात्मक भावों की ही वृद्धि हो रही है। व्यक्ति सुख की तलाश में स्वयं को जकड़ता हुआ सुख से दूर भाग रहा है। यहां तक कि तृष्णा के कारण दूसरों का धन, भूमि, जीवन आक्रान्त करके हड़पने के प्रयास करने लगा है। अज्ञान की शिक्षा नहीं देनी पड़ती।

तमोगुणी तृष्णा का प्रसार जीवन में आसानी से हो जाता है।यही तृष्णा जब विद्या का सहारा लेकर उत्पन्न होती है तो जीवन में कल्याणकारी बन जाती है। देश का कल्याण करने वाली बन जाती है। सžव गुण बढ़ने लगते हैं। ज्ञान की पिपासा बढ़ती है। भक्ति और उपासना के मार्ग खुलते हैं। यहां तृष्णा को सकारात्मक कहा है। विद्या भाव को बन्धन मुक्ति का मार्ग कहा है। विद्या युक्त तृष्णा व्यक्ति को स्वयं में स्थिति देती है, आत्मभाव में बनाए रखती है। जैन दर्शन में पंच महाव्रतों में एक है अपरिग्रह। यानी तृष्णा से मुक्ति। अज्ञान के कारण लोभ या परिग्रह की धारणा कार्य करती है। इसी से प्रमाद या आचरणहीनता का भाव पैदा होता है। व्यक्ति हिंसा का सहारा लेता है अपनी तृष्णा को शांत करने के लिए। अत:, आगे चलकर परिग्रह ही हिंसा का कारण बनता दिखाई देता है। समाज में विषमता का मुख्य कारण परिग्रह ही बनता है।

गुलाब कोठारी

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मई 10, 2011

जीवन का विकास

हमारा शरीर स्थूल और भौतिक है, हम इसके हर अंग और कार्यो को देख सकते हैं, उनका आकलन कर सकते हैं, ऎसा हमारा मानना है। किन्तु, वास्तविकता यह है कि इसका संचालन हमारी बुद्धि करती है, हमारा भाव-तंत्र करता है जिसको हम न देख पाते हैं, न समझ पाते हैं। शरीर में अपने आप तो केवल प्राकृतिक क्रियाएं ही हो सकती हैं, अन्य कुछ नहीं।

कोई भी व्यक्ति बिना भावों के जी नहीं सकता। हमारे सुख-दु:ख, मित्र-शत्रु, प्रसन्नता-अवसाद आदि सभी भावों पर आधारित हैं। इन्हीं के अनुरूप हमारी प्रतिक्रियाएं होती हैं। जीवन के प्रति हमारा दृष्टिकोण ही इनका आधार तय करता है। भाव कहां से आते हैं?

भाव हमारे अनुभवों और दृष्टिकोण का मिश्रण कहे जा सकते हैं। हमारे अनुभव चेतनागत होते हैं। जिस प्रकार हमारी इच्छा मन में स्वत: उठती है, उसी प्रकार हमारे भाव भी स्वयं स्फूर्त होते हैं। अन्तर केवल इतना ही है कि इच्छा का स्वरूप स्वतंत्र होता है और भावना हमारे व्यक्तित्व के अनुरूप ढली होती है।

भावना हमारे सूक्ष्म और कारण शरीरों से जुड़ी होती है, क्योंकि यह स्वयं सूक्ष्म है। इसका प्रतिबिम्ब होता है- हमारा आभा मण्डल। उसे हमारा भावनात्मक शरीर कह सकते हैं। दिनभर हमारे भावों के साथ आभा-मण्डल में भी परिवर्तन होते रहते हैं। आज आभा-मण्डल के अध्ययन में विश्व स्तर पर अनेक संस्थाएं जुड़ी हुई हैं। आभा- मण्डल में दो तरह के परिवर्तन होते हैं- रंगों के रूप में और तरंगों के रूप में। इनका विश्लेष्ाण करके व्यक्ति के भावों का आकलन किया जा सकता है। आज वैज्ञानिकों का मानना है कि प्रकृति का सारा खेल ऊर्जा और पदार्थ के एक-दूसरे में परिवर्तित होने के सिद्धांत पर चलता है। हमारे भाव भी ऊर्जा की श्रेणी में आते हैं, इनको देखना, समझना और मापना भी सम्भव है। जब भावनाओं के द्वारा हमारे मन और शरीर में अनेक क्रियाओं का संचालन होता है तो निश्चित है कि वहां कोई शक्ति है।

सृष्टि की सभी ऊर्जा सामग्री का सम्बन्ध पदार्थ से होता है, अत: भाव भी पदार्थ रचना से बाहर नहीं हो सकते। यह भी सत्य है कि यह ऊर्जा अति सूक्ष्म है। इसी कारण यह (अंतरिक्षीय) वैश्विक ऊर्जा का अंग भी है और उसी के साथ एक जीव होकर कार्य करती है। एक ही प्रकार के नियम दोनों ऊर्जाओं पर लागू होते हैं। अत: इसका भी अर्थ यही है कि हम सीधे प्रकृति से जुड़े हैं और हमारे कार्यकलापों का नियमन भी प्रकृति ही करती है। चूंकि हमारा आभा-मण्डल पृथ्वी के आभा-मण्डल से सीधा जुड़ा है, इसीलिए हम पार्थिव कहलाते हैं। इसी प्रकार हमारा जीवन पृथ्वी पर निर्भर करता है और पृथ्वी सूर्य-चन्द्रमा आदि से जुड़ी हुई है।

जिस प्रकार भावों की तरंगों का आभा-मण्डल होता है, उसी प्रकार हमारी बौद्धिक तरंगों का आभा-मण्डल भी होता है। दोनों आभा-मण्डल अपने आप में स्वतंत्र होते हैं और एक-दूसरे को निरन्तर प्रभावित करते रहते हैं। ये शरीर के साथ भी जुड़े रहते हैं। इस प्रकार हमारे आभा-मण्डल के भी अनेक स्तर होते हैं, अनेक रूप और रंग होते हैं।

संसार में जड़ और चेतन दोनों में आभा-मण्डल विद्यमान रहता है। जड़ पदार्थो में आभा-मण्डल स्थिर दिखाई पड़ते हैं, क्योंकि इनमें क्रियाकलाप नहीं होते। इसके विपरीत चेतना का आभा-मण्डल परिवर्तनशील नजर आता है। सभी चेतन स्वतंत्र रहते हुए भी पृथ्वी की सीमा में ही रहते हैं। इन सभी के केन्द्र में जीव होता है, आत्मा होती है या कारण शरीर रहता है। इसके बिना न तो क्रिया हो सकती है और न ही अभिव्यक्ति। हमारा शरीर, हमारी आकृति ही हमारी अहंकृति का यश है, सोम है, अभिव्यक्ति है और हमारी प्रकृति इसका व्यक्तित्व प्रकट करती है। हमारे जीवन को अर्थ प्रदान करती है।

हमारे विचार और भाव आते-जाते रहते हैं, किन्तु यह केन्द्र अथवा “मैं” स्थाई बना रहता है। इसी के कारण शरीर की आस्था है। जीवन के सारे ज्ञान और अनुभवों का आधार यही है। अनुभवजनित यही ज्ञान सृष्टि के विकास का आधार बनता है। कौन सीखता है और कौन ज्ञान का उपयोग करता है, इसका उत्तर “अन्त” है। ज्ञान और अनुभव ही हमारी भावभूमि का निर्माण करते हैं। ये कार्य मन के स्तर पर होते हैं। अनुभव निरन्तर होते ही रहते हैं, रूकते नहीं। भाव भी रूकते नहीं हैं। हमारा आभा-मण्डल एक ओर हमारे व्यक्तित्व के आधार पर बदलता रहता है तो दूसरी ओर पृथ्वी के आभा-मण्डल के प्रभाव से भी बदलता रहता है, अत: इस सृष्टि और शरीर का संचालन एक ही सिद्धान्त पर आधारित है। “यथा अण्डे तथा पिण्डे” का भी यही अर्थ है।

जो कुछ हमारे जीवन में घटित होता है उसका भावनात्मक प्रारूप हमारे आभा-मण्डल में विद्यमान रहता है। सूक्ष्म स्तर पर आभा-मण्डल वैसा ही बना रहता है। चूंकि स्थूल के परिवर्तन धीरे होते हैं अत: समय के साथ ही वे परिलक्षित होते हैं। सूक्ष्म में परिवर्तन निरन्तर गतिमान रहता है। अतिसूक्ष्म तक इसका विस्तार होता है। हर प्राणी और पदार्थ का आभा-मण्डल सृष्टि से जुड़ा है। वह दूर-दूर तक सूक्ष्म रूप से व्याप्त है, अत: हर एक प्राणी एक-दूसरे से प्रभावित होता ही है चाहे दूसरा चुपचाप पास ही बैठा रहे। ऊर्जा का आदान-प्रदान तो वहां भी होता ही रहता है। भावनाओं को प्रभावित करने का क्रम तो बना ही रहता है। चीनी विद्वान एवं दार्शनिक ताओ ने लिखा है कि परिवर्तन सृष्टि का नियम है। सृष्टि या प्रकृति के इस आदर्श को नकारा नहीं जा सकता। इसी में सृष्टि के विकास का बीज छिपा हुआ है।

यह परिवर्तन हम सब मिलकर लाते हैं। हमारी ऊर्जाओं का आदान-प्रदान ही परिवर्तन का मूल कारण है। हम भावनाओं को भले ही निजी सम्पत्ति मानें, किन्तु यह सत्य है कि हमारी भावनाओं को हमारा सम्पूर्ण वातावरण, जड़-चेतन प्रभावित करता है। सब मिलकर एक-दूसरे को परिवर्तित करते हैं, इसीलिए “वसुधैव कुटुम्बकम्” की अवधारणा का सही अर्थ समझा जाना आवश्यक है।

हमें आयु सूर्य से मिलती है। अन्न चन्द्रमा से मिलता है। सोम की कमी चन्द्रमा पूर्ण करता है। हमारा मन परमेष्ठि लोक से आया हुआ है। अर्थात हमारे जीवन में इन सबका नित्य जुड़ाव है, प्रभाव है। हमारी इच्छा, कामना, भावना इसी की अंग हैं। जैसे-जैसे हम ऊपरी स्तरों पर देखते हैं, इनका स्वरूप अतिसूक्ष्म होता चला जाता है, गतिमान होता चला जाता है।

हमारे भावों की तरंगें अंतरिक्ष में रहती हैं। सभी प्राणियों के भावों की तरंगें अंतरिक्ष में होने से अंतरिक्ष इन तरंगों का समुद्र बन जाता है। ये मिश्रित तरंगें सबको प्रभावित करेंगी और सब मिलकर इन तरंगों के मिश्रण को प्रभावित करेंगे। इस बात से किसी देश अथवा भू-भाग की संस्कृति का महžव भी समझा जा सकता है। एक व्यक्ति को आने वाला क्रोध दूसरे व्यक्ति के क्रोध की तरंगों को बढ़ा देता है और उनके आपसी व्यवहार का निर्घारण करता है। सही प्रभाव सद्भाव की तरंगों का होता है। ऋ çष्ा-मुनियों के समीप सभी शांत क्यों दिखाई पड़ते हैं- हम समझ सकते हैं। यही कारण है कि रोगी को स्वास्थ्य लाभ के लिए प्राकृतिक सौन्दर्यपूर्ण स्थानों पर रहने की सलाह दी जाती है। प्रकृति की इस अद्भुत उपचार क्षमता का कारण भी सूक्ष्म भाव तरंगें ही हैं। वन्य जीव, पशु-पक्षी, पर्वत, नदी-नाले, पेड़-पौधे सभी की भाव-तरंगों का मिश्रण हमें प्रसन्न एवं निरोगी बनाये रखता है।

गुलाब कोठारी

मई 3, 2011

भोजन का महत्व

जीवन में शक्ति का आदान-प्रदान निरन्तर क्रम के रूप में चलता रहता है। एक से दूसरे का और दूसरे से तीसरे का निर्माण होता है। सृष्टि के इस क्रम को हम अपने ही शरीर में देख सकते हैं। एक कहावत है- “जैसा खावे अन्न, वैसा होवे मन।”

हम जो भोजन करते हैं उससे हमारा शरीर बनता है। इसको आधुनिक चिकित्सा शास्त्र भी मानता है। भारतीय ज्ञान इससे भी ऊपर है। भोजन के साथ भाव का भी महत्व है, क्योंकि इससे खाने वाले का मन तुष्ट होता है। भोजन किस भावना के साथ बनाया गया, किस भाव और दुलार के साथ खिलाया गया, किस वातावरण और मनोभाव से भोजन ग्रहण किया गया, आदि बातों का सीधा प्रभाव मन पर पड़ता है।

व्यक्ति मन की इच्छाएं पूरी करने के लिए कर्म करता है। इच्छा व्यक्ति की मर्जी से पैदा नहीं हो सकती। पूरा करना या न करना व्यक्ति की मर्जी है। जब इच्छा किसी अन्य शक्ति से पैदा होती है और वही हमारा जीवन चलाती है, तो स्वत: ही हम निमित्त बन जाते हैं। हमारा बुद्धि तंत्र निर्णय करता है, योजना करता है और उसी के अनुरूप शरीर को निर्देश देता है। शरीर कार्य में लग जाता है। इसका अर्थ यह निकला कि मन राजा है, बुद्धि और शरीर सेवक हैं। अत: मन, जो हमारी पहचान है, को शक्तिवान बनाना हमारा प्रथम धर्म है, ताकि हमारी पहचान भी वैसी ही बने।

इसका सरलतम और मुख्य मार्ग है- भोजन। भारतीय संस्कृति में हर खुशी की पहली अभिव्यक्ति भोजन ही है। जन्म, विवाह आदि से लेकर जीवन की हर खुशी पर खाना, दावत, पार्टी से आगे कोई अन्य अपेक्षा क्यों नहीं रखता? क्योंकि इसके साथ जीवन-शक्ति जुड़ी है। इससे मन पल्लवित होता है। इसमें वातावरण भी अपना योगदान करता है।

भोजन शरीर में पहुंच कर रस बनाता है। रस से रक्त, मांस, मेदा, मज्जा, अस्थि और वीर्य बनते हैं। जो बचता है वह मल-मूत्र के रूप से बाहर निकल जाता है। यहां स्थूल निर्माण कार्य समाप्त हो जाता है। वीर्य आगे ऊर्जा के रूप में परिवर्तित हो जाता है, इसी से व्यक्ति का मन बनता है। चेहरे का “ओज” इसी से आता है। यही व्यक्तित्व की पहचान बनता है। ब्ा्रह्मचर्य का महत्व भी इसी संदर्भ में समझना चाहिए।

भोजन के गुण- सत्व, रज, तम ही हमारे व्यक्तित्व के महत्वपूर्ण अंग बनते हैं। अत: भोजन हर दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

गुलाब कोठारी

मार्च 15, 2011

क्रोध

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किसी भी व्यक्ति के स्वभाव का एक प्राकृतिक भाव है- क्रोध। इतिहास उठाकर देखें तो पता चलेगा कि क्रोध की भी अपनी अहम् भूमिका रही है। अनेक अवसरों पर क्रोध ने इतिहास को नए मोड़ दिए हैं। क्रोध को शारीरिक शक्ति और अहंकार का सूचक भी माना गया है। भय पैदा करने में भी क्रोध की अपनी भूमिका रही है। क्रोध ने बडे-बड़े ऋषियों को शाप देने जैसी नकारात्मक भूमिका में डाला है। दुर्वासा और लक्ष्मण के व्यक्तित्व क्रोध के ही पर्याय भी बने।

कौन व्यक्ति होगा इस पृथ्वी पर जिसे क्रोध नहीं आता? क्रोध अनेक प्रकार के आवेशों और आवेगों का निमित्त बनता है। अपराधों का मूल निमित्त क्रोध को ही माना जाता है। यही कारण है कि क्रोध अपनी अतुल शक्ति के उपरान्त भी अवांछनीय माना जाता है। क्रोध को उपशान्त करने के बारे में लगभग सभी धर्म-ग्रंथ एकमत हैं। हर व्यक्ति अपने क्रोध को दबाना चाहता है। शांत और निर्मल प्रकृति का दिखाई देना चाहता है। क्रोध को जीवन में किसी भी प्रकार का सम्मान प्राप्त नहीं है।

हमारा जीवन प्राण और ऊर्जा के सहारे चलता है। मन, बुद्धि, शरीर आदि सभी का संचालन प्राण और ऊर्जाओं से होता है। हम पार्थिव प्राणी हैं, अत: हमारा मूल शक्ति-स्त्रोत पृथ्वी है। हम गुरूत्वाकर्षण द्वारा पृथ्वी-केन्द्र से आबद्ध होते हैं। यहीं से हमारी मूल ऊर्जा आती है। ऋषि, पितृ और देव-प्राण हमें अंतरिक्ष से प्राप्त होते हैं।

व्यक्तित्व के अनुसार ऊर्जा शक्तियों की अभिव्यक्ति होती है। क्रोध भी एक अभिव्यक्ति है। मूलाधार चूंकि शारीरिक शक्तियों की भौतिक अभिव्यक्ति का स्थान है, अत: यहां एकत्र ऊजाएं क्रोध, कामना, इन्द्रिय सुख, कला, कृतित्व, शक्ति, वैभव आदि विषयों से जुड़ी होती हैं। एक भाव को रोकने का प्रयास करें तो दूसरी अभिव्यक्ति होने लगेगी। क्रोध भी इसी प्रकार स्वयं में कुछ नहीं है। एक अभिव्यक्ति मात्र है, जिसकी नकारात्मक भूमिका होने के कारण उसको उत्तम नहीं कहा जाता।

आप क्रोध आने पर क्या करेंगे, इसका आकलन करें। क्या-क्या करेंगे, यह क्रम देखें तो इसकी परिणति का अनुमान भी होगा। भाव-परिवर्तन के साथ आप क्रोध के आवेग की दिशा बदल सकते हैं। आपने भी अनेक बार अनुभव किया होगा कि कुछ विचार करने के बाद जब क्रोध शान्त होता प्रतीत होता है तो अन्य प्रकार की अभिव्यक्ति की अभिलाषा तुरन्त मन में उठने लगती है। यह अभिव्यक्ति भी जीवन-शक्ति की तरह दिखाई देती है, जो उतनी ही गहन होती है जितना कि क्रोध, अर्थात- क्रोध भी एक जीवन-शक्ति है, ऊर्जा से ओत-प्रोत है। मात्र इसको दिशा देने की जरूरत है।

क्रोध आने का अर्थ यह भी है कि मूलाधार में ऊर्जा गतिमान है। जीवन के भौतिक सुखों की अभिलाषाएं इसी कारण उठती हैं। यदि इस ऊर्जा का पूरा उपयोग नहीं किया जाए तो क्या होगा? ऊर्जा घटकर वहीं समाप्त हो जाएगी। “करो या मरो” वाली बात है। आप या तो ऊर्जा का उपयोग कर लें, अन्यथा यह व्यर्थ जाएगी। उपयोग भी सकारात्मक होना चाहिए, तभी विकास हो सकता है।

जब तक मूलाधार में ऊर्जा क्रियाशील रहती है, तब तक ही व्यक्ति भी कार्य कर सकता है। उसका शरीर स्वस्थ रह सकता है। इस शक्ति का शान्त होना ही मृत्यु है। सकारात्मक दृष्टि से देखा जाए तो क्रोध जीवनसूचक है। मूलाधार को गतिमान रखता है। मूलाधार के अनेक अवरोध क्रोध के कारण हटते भी हैं। मात्र भावनात्मक धरातल पर कार्यरत होने की जरूरत है।

इसके विपरीत होता यह है कि क्रोध को सामाजिक बुराई के रूप में देखा जाता है। व्यक्ति इसे दबाने का प्रयास करता है। इसके परिणाम अधिक भयावह होते हैं। इसका पहला प्रभाव है- जीवन शक्ति को विकसित होने से रोकना। इसकी अभिव्यक्ति तथा अभिव्यक्ति के परिवर्तन को रोकना। न आप क्रोध दिखा पा रहे हैं, न ही इसका अन्य क्षेत्रों में उपयोग कर पा रहे हैं। यानी- इसकी नकारात्मक दिशा को बढ़ावा दे रहे हैं।

जीवन-शक्ति को मूलाधार से ऊपर की ओर ऊज्र्वस्वित करना इसकी सकारात्मक दिशा है। यह शक्ति भावनात्मक धरातल से जुड़ते ही अपना स्वरूप बदल देती है। मूलाधार के ऊपर स्वाधिष्ठान इसका स्थान है। क्रोध को दबाने से इसकी ऊर्जा की गति अधोगामी हो जाती है। इसका सबसे ज्यादा प्रभाव शरीर के निचले अंगों पर दिखाई देने लगता है। अत्यन्त क्रोध की अवस्था में सारा शरीर कम्पित होने लगता है। जोड़ों का दर्द इसकी प्रथम सूचना देता है, जो आगे चलकर गठिया में परिवर्तित हो जाता है और एक असाध्य रोग का रूप ग्रहण कर लेता है। जैसे-जैसे मूलाधार की शक्ति क्षीण होगी, गठिया बढ़ता जाएगा। ऊर्जा की कमी से बढ़ते इस रोग का इलाज नहीं हो सकता। शरीर अपना प्रयास भी करता है, किंतु आरोग्य प्राप्त नहीं होता। सूजन आने का अर्थ भी यही है कि शरीर अपनी ऊर्जाओं को वहां पहुंचा तो रहा है, किन्तु पर्याप्त मात्रा में नहीं। ऊर्जा का सही स्थान तो मूलाधार ही है।

आप फिर से मूलाधार की ऊर्जाओं पर ध्यान करके देखें। उन्हें गतिमान करें, उध्र्वगामी करें। क्रोध आएगा, आने दें। शुभ लक्षण होगा। दर्द कम होने लग जाएगा। आपने देखा होगा कि लम्बे काल तक तीर्थयात्रा में रहने वाले कई असाध्य रोगों से मुक्त हो जाते हैं। अमरीका के डॉ. ब्रूयन ने तो इस क्षेत्र में अनेक प्रयोग किए हैं। उनके अनुसार “क्रोध से रोग, रोग से भय, भय से नए रोग, एक ऎसा क्रम बनता है कि पीछा नहीं छुड़ा सकते। जैसे ही आप शान्त वातावरण में बैठें, आपने अभय का अनुचिन्तन किया अथवा भय तथा क्रोध पैदा करने वाले सभी निमित्त दूर हुए कि आपको आरोग्य लाभ होने लग गया। सोचें, आप क्रोध को कहां उगलेंगे?”

गुलाब कोठारी

नवम्बर 13, 2009

भय

किसी भी रोग के मूल में व्यक्ति के भाव ही होते हैं। शरीर की विभिन्न ऊर्जाओं का संचलन भावों के द्वारा ही प्रतिपादित होता है। भावों के कारण ही ऊर्जाएं सन्तुलित रहती हैं और ऊर्जाओं का असन्तुलन ही रोगों का मूल कारण बनता है। रोगों की शुरूआत भीतर से होती है और समय के साथ-साथ शरीर में रोग बढ़ता हुआ दिखाई पड़ता है।
आधुनिक विज्ञान में चूंकि आत्मा, भाव और मन जैसे तžवों का समावेश नहीं है, अत: शरीर-विज्ञान की दृष्टि से शरीर का स्वरूप भी एकांगी है। अब तो अमरीकी शोधकर्ता भी इस तथ्य पर चर्चा करने लगे हैं। भारतीय दर्शन जीवन का आधार आत्मा को मानता है। मन के माध्यम से भाव-क्रिया ही हमारे शरीर और कर्मो का संचालन करती है। इसका एक अनूठा उदाहरण है “भय”। हर व्यक्ति जीवन में सुख चाहता है और सुख का शत्रु है—भय।
भय भी कई प्रकार के होते हैं। मृत्यु, रोग, दुर्घटना, असफलता, हानि, अपयश आदि अनेक कारण हो सकते हैं भय के। फिर, कतिपय भय व्यक्ति के मन में स्वयंजनित भी हो सकते हैं। बाहरी भय का आकलन आसानी से किया जा सकता है, किन्तु भीतर के भय को समझने में विशेष चिन्तन की आवश्यकता पड़ती है। भय वस्तुत: काल्पनिक स्वरूप में अधिक होते हैं। जितना अधिक चिन्तन, उतना अधिक भय। बुद्धिजीवी अधिक भयत्रस्त होते हैं। आशंकाएँ ही भय पैदा करती हैं। जिस रूप में मन की आशंका होती है, उसी रूप में परिणाम भी आते हैं।
हमारे यहां प्रार्थना, उपासना में अभय की चेतना का विकास किया जाता है। मानव मन में श्रद्धा, आत्मविश्वास जगाया जाता है। स्तुति में सभी प्रकार के भय से त्राण का मार्ग समर्पण भाव के साथ प्रशस्त किया जाता है। व्यक्ति अपने सभी प्रकार के भय ईश्वर के हवाले छोड़कर आश्वस्त होता है। यही भाव-क्रिया में अभय की अनुभूति पैदा करते हैं। जो विषय हमारी सामथ्र्य के बाहर होते हैं, उनको तो ईश्वर पर छोड़ दिया जाता है। महाभारत में कहा गया है—”शोकस्थान सहस्त्राणि भयस्थानशतानि च, दिवसे दिवसे मूढ़माविशंति न पंडितम्।” — हजारों शोक के स्थान (अवसर) तथा सैकड़ों भय के अवसर प्रतिदिन प्रतिपल मूढ़ मस्तिष्क में आविष्ट होते हैं। सत् और असत् को पहचान लेने वाली पण्डा नाम की बुद्धि जिस भाग्यवान मनुष्य की हो जाए उस पण्डित को ये शोक-भय कभी नहीं सताते।
अमरीकी शोधकर्ता रोजलिन ब्रूयेरे ने अपनी पुस्तक “व्हील्स ऑफ लाइट” में लिखा है कि अब तक के सभी परीक्षण इस बात को स्वीकारते हैं कि शरीर में गठिया, रक्तचाप और ह्वदयरोग जैसे रोगों का कारण हमारे भाव ही हैं। इनमें भी क्रोध और भय सबसे प्रमुख हैं। एक महžवपूर्ण तथ्य को रोजलिन ने उजागर किया है कि क्रोध, भय, आवेग आदि भाव हमारे शरीर के रक्षातंत्र के अंग होते हैं, क्योंकि हमेंं विश्वास नहीं होता कि शरीर स्वयं इनको व्यवस्थित कर लेगा। हमें कुछ न कुछ अनर्थ अथवा आक्रोश का भी भय रहता है। वास्तव में आक्रोश तो हमारे अवरोध से पैदा होता है।
रोजलिन लिखते हैं कि जब भी हम भय, क्रोध, जैसे आवेगों को दबाते हैं अथवा इनके प्रति लापरवाही बरतते हैं तो हमारे मूलाधार की गति में अवरोध पैदा होता है। स्वयंजनित भय भी मूलाधार को प्रभावित करता है और बाहरी भय स्वाधिष्ठान को पहले प्रभावित करता है। बढ़ने की अवस्था में यह भी मूलाधार में ही पहुंच जाता है। शरीर और बुद्धि को होने वाले सभी अनुभव मूलाधार से होकर ही हमारे स्नायुतंत्र में जाते हैं।
मूलाधार की स्वीकारोक्ति के बिना कोई अनुभव हमारी स्मृति में अंकित नहीं होता। मूलाधार का सन्तुलन बिगड़ने से रक्तवर्ण का सन्तुलन खराब होता है। शरीर के विभिन्न अंगों में सूजन आ जाती है। दर्द होने लगता है। रक्तवर्ण की यह ऊर्जा पृथ्वी से प्राप्त होती रहती है। इसका सन्तुलन व्यक्ति को जीवन्त बनाए रखता है। जीवनशक्ति प्रदान करता है और पृथ्वी से जोड़ों को प्रभावित करता है।
भय तथा आवेग का असन्तुलन रक्तचाप और ह्वदय विकार को प्रभावित करता है। व्यक्ति के मन से जीवन-भाव बिखरने लगता है। दवाओं से शरीर की प्रतिक्रिया दब जाती है, किन्तु जीवन-भाव नहीं लौटता। इसके लिए दो ही उपाय हैं। एक बिखरी हुई रक्त-ऊर्जा को पुन: मूलाधार में लाना, ताकि व्यक्ति फिर से जीवन्त हो सके। यद्यपि इसके साथ ही क्रोध भी पुन: स्थापित होगा। दूसरा यह कि जहां-जहां दर्द बढ़ने लगा है वहां-वहां शीतल वर्ण ऊर्जाएं उपलब्ध करानी होंगी। यह केवल विकल्प चिकित्सा से ही सम्भव है। ध्यान प्रक्रिया में भी इसका समाधान निहित है। ध्यान में सभी ऊर्जा-केन्द्रों अथवा चक्रों पर इन्द्रधनुषी रंगों का सन्तुलन सिखाया जाता है।
अभिप्राय यह है कि भाव-क्रिया व्यक्ति को बहुत दूर तक प्रभावित करती है। समाज में जिस तेजी से अपराध बढ़ रहे हैं, उसके मूल में हम इस भय और क्रोध को देख सकते हैं। यौन अपराध का मूल भी यही है, किन्तु स्थिति अधिक भयावह है। पश्चिम में प्रतिदिन होने वाली जघन्य हत्याओं को भी इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है।
जिस समाज में भक्ति, स्तुति तथा श्रद्धा का बोलबाला है, वहां क्रोध और भय जैसे आवेग अल्प ही होते हैं। व्यक्ति सुख-शान्ति से जीता है। उसकी समाज में प्रतिष्ठा रहती है।

अक्टूबर 31, 2009

ध्वनि

श्रवण हमारी अतीव शक्तिशाली इन्द्रिय है। सुनी हुई बात यदि मन मे घर कर जाती है तो बरसों तक हमारे कान में गूंजती रहती है। सुनी हुई बात की प्रतिक्रियाएं भी लम्बे समय तक हमारे मानस में चलती रहती हैं। हम चलते-फिरते भी अपने वातावरण से कई प्रकार की ध्वनियां, शब्द अथवा नाद ग्रहण कर लेते हैं।
संगीत का आधार भी ध्वनि है और शब्द का आधार भी ध्वनि ही है। सच पूछो तो सृष्टि का आधार भी ध्वनि या नाद ही है। इसका रहस्य हमारी वर्णमाला मेंं छुपा हुआ है। हमारी वर्णमाला एक विशेष सिद्धान्त पर आधारित है। इसीलिए हमारे मंत्रों का भी महžव है। मंत्रों का महžव शब्दों के गठन से नहीं है, भाषा से नहीं है, अपितु उनके उच्चारण से होने वाले “नाद” से है। यह नाद ही प्रभावशाली तžव है। हमारे शरीर मेंं अनेक प्रकार के नाद सुनाई पड़ते हैं। एक नाद होता है जो दो या अधिक चीजों के टकराने से होता है। आमतौर पर इसी को ध्वनि की संज्ञा दी जाती है। एक नाद स्वत: ही होता है, जिसे “अनहद” नाद के रूप मेंं जाना जाता है।
नाद आकाश का गुण होता है। नाद वाक्-संसार का उत्पादक कहलाता है। इसीलिए वाक्देवी सरस्वती इसकी अधिष्ठात्री है। वाक् में तो अर्थवाक् भी आता है, जो यह सिद्ध करता है कि शब्द से ही अर्थ की उत्पत्ति होती है। दोनों एक ही हैं, केवल स्वरूप की भिन्नता है। हमारे शरीर में अनेक चक्र हैं या शक्ति के केन्द्र हैं, जो वातावरण से ऊर्जा ग्रहण करते हैं और हमारे शरीर, मन और बुद्धि को चलाते हैं, हमारा सम्बन्ध सृष्टि से बनाए रखते हैं। इनको भी वर्णमाला के अक्षरों में ही विभाजित किया गया है।
सभी ध्यान और साधना पद्धतियों के मूल ध्वनि, नाद और बिन्दु हैं। नाद ब्रह्म को कहा जाता है, बिन्दु माया को। व्यक्ति आत्मा की खोज मेंं बिन्दु के माध्यम से इसी नाद-ब्रह्म में लीन हो जाता है। ध्वनि के साथ ही शरीर में स्पन्दन शुरू होता है। यह स्पन्दन ही अपना प्रभाव मन पर डालता है। मन इन्द्रियों का राजा है। हर इन्द्रिय अपने प्रभाव को प्राणों के द्वारा मन तक ले जाती है। अच्छा-बुरा लगना तो मन का स्वभाव है। मन की इच्छा शक्ति ही स्मृति का आधार भी बनती है। यही स्मृति उसकी कल्पना का आधार होती है। यदि आपकी स्मृति मेंं कोई ज्ञान नहीं है तो मन में इच्छा कैसे उठेगी? इच्छा ही मन के लिए बीज का कार्य करती है। स्पन्दन को समझने के लिए ध्वनि को समझना होगा। स्पन्दन हमारे नित्य परिवर्तन का कारण बनते हैं, अत: इनका कौनसा स्वरूप ग्रहण करने योग्य है और कौनसा ग्रहण नहीं किया जाए, इसका चिन्तन करना हितकर होगा। आज हम रेडियो, टेलीविजन अथवा टेप से कुछ भी सुन लेते हैं। जाने-अनजाने ही ये स्पन्दन हमारा व्यक्तित्व बदल डालते हैं।
हम प्रकम्पनों का जीवन जी रहे हैं। शरीर के भीतर प्रकम्पन ही तो भरे हैं& शरीर की तरंगें, श्वास की तरंगें, विचारों की तरंगें, ध्वनि की तरंगें। हम तरंगों का ठीक उपयोग करें। उनकी शक्ति का, अर्थात्—ध्वनि की शक्ति का उपयोग सीखें। जब ध्वनि की तरंगें मन के साथ जुड़ जाती हैं, श्वास और संकल्प इन तरंगों के साथ जुड़ जाते हैं, तब ध्वनि एक बड़ी शक्ति के रूप में दिखाई देती हैं। शब्द की सिद्धि आस्था की शुद्धि से होती है। आस्थाहीन शब्द शक्ति-शून्य होते हैं। शक्तिमान क्या नहीं कर सकते?
आज तो पाश्चात्य विद्वानों ने संगीत को अनेक श्रेणियों में बांट दिया है। इसके विविध रूप हमारे सामने रख दिए, किन्तु क्या ये रूप हमारे लिए हितकर हैं? यही हाल हमारे सिनेमा के संगीत का भी है। हम एक ही गाने को सालों तक गाते रहते हैं। कालान्तर में वह गायन लुप्त हो जाता है, किन्तु चिरकाल से चले आ रहे भारतीय संगीत के नादमय आकर्षण आज भी सभा को स्तब्ध करने में समर्थ हैं। संगीत का प्रभाव शरीर के अलग-अलग चक्रों को उत्तेजित करता है। इसी के अनुरूप हमारे शरीर में ऊर्जा पैदा होती है और हमारे विचारों का मार्ग प्रशस्त करती है। आज तो कुछ संगीत ऎसे भी आ गए हैं जो मूलाधार से सहस्त्रार तक के सभी चक्रों को क्रमश: उत्प्रेरित करते हैं। ये साधकों के लिए विशेष उपयोगी हैं। किन्तु, अधिकांश संगीत हमारे शरीर-तंत्र को ही प्रभावित करता है। मन तक उसकी पहुंच नहीं होती।
मंत्र का नित्य जाप भी इसी क्रम में देखा जाना चाहिए। ध्वनि या शब्द का ज्ञान हमारे ज्ञान की अनेक खिड़कियों को खोलता है।

अक्टूबर 1, 2009

भावनात्मक विकास

 समाज की इकाई है—परिवार और परिवार की इकाई है—व्यक्ति। व्यक्ति अच्छे होंगे तो परिवार भी अच्छा होगा। समाज भी अच्छा होगा और राष्ट्र भी उन्नत होगा। इसीलिए परिवार को बच्चे का पहला स्कूल कहते हैं। बच्चा परिवार के साथ-साथ अपनी धरती की संस्कृति से जुड़ता है। परिवार में ही जीवन संघर्षो का सामना करना सीखता है। उसका भावनात्मक विकास होता है। ये घटक ही आगे चलकर उसके व्यक्तित्व को समाज में स्थापित करते हैं। भावना और वासना, ये मन की दो महत्वपूर्ण अवस्थाएं हैं। ज्ञान के द्वारा मन में जमे हुए संस्कार को भावना कहते हैं तथा कर्म के द्वारा मन में जमे हुए संस्कार को वासना कहते हैं। वासना को रोकने का विधान है जबकि भावना को बढ़ाने का विधान है। बच्चा परिवार में पांच-छ: साल की उम्र से ही सीखना शुरू कर देता है। अनुभव तो उसे पहले ही होने लग जाते हैं। वह उनको अलग ढंग से अभिव्यक्त करता है। उसका आस-पास का वातावरण सीमित ही होता है और विषय भी। यह उसके निजी विकास का काल है। जब बच्चा कुछ समझने लायक होता है तो दादा-दादी, नाना-नानी उसे कहानियां सुनाना शुरू कर देते हैं। बच्चा बड़े चाव से सुनता है। इन कहानियों का आधार लालित्य और माधुर्य होता है। जिस भावनात्मक वातावरण और स्नेह के साथ ये कहानियां कही जाती हैं, यही इनका महत्वपूर्ण पहलू है। किन्तु, आज इसको ही सबसे कम महत्व दिया जाता है। जबकि बच्चों में भावनात्मक विकास का आधार इसी उपक्रम से तैयार किया जा सकता है और वह भी इसी कच्ची उम्र में। इसी आधार पर बालक आगे मिलने वाले ज्ञान को ग्रहण करता है और अपने संस्कार अर्जित करता है। जिस बच्चे के पास यह भावनात्मक आधार नहीं है, वह जीवन के संघर्ष नहीं झेल सकता। पढ़ाई में अच्छा हो सकता है, बड़ा व्यवसायी या अधिकारी भी बन सकता है, किन्तु भावनात्मक संस्कार का धरातल उसका निर्बल ही रहेगा। पूरा पाश्चात्य समाज इसका ज्वलन्त उदाहरण है। आज शिक्षा ने युवकों को नौकरी में धकेलकर संयुक्त परिवार को छिन्न-भिन्न कर दिया है। बच्चे से उसके दादा-दादी और नाना-नानी छीन लिए। अब इतना समय और किसी के पास नहीं है। स्कूल में इस प्रकार के विषयों का स्थान ही नहीं रहा। वहां तो शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य ही आकलन के आधार रह गए। घर पर “होम वर्क” के आगे मानो शिक्षा ही समाप्त हो गई। बच्चों को छोटे से घर में खेलने के लिए न तो स्थान उपलब्ध है, न ही दूसरे बच्चे। ले-देकर आज टेलीविजन का प्रवेश एक अध्यापक की तरह हो गया है। इसी के आधार पर आप परिवार को पहला स्कूल कह सकते हैं। यही तय करता है कि बच्चा क्या सीखेगा? बड़ा घाटा तो बच्चे का आधारहीन होना है। भावनात्मक दृष्टि के बिना व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्माण इसलिए नहीं होता कि जहां उसकी दृष्टि जानी चाहिए वहां जाती ही नहीं, क्योंकि भावनात्मक संस्कार जम ही नहीं पाए हैं और न सिखाए गए हैं। अच्छी नौकरी अथवा कमाई का अर्थ अच्छा व्यक्तित्व कभी नहीं हो सकता। इसका एक अन्य प्रभाव भी पड़ता है। भावनाएं व्यक्ति को जीवन-संचालन की दृष्टि देती हैं। उसके पिछले जन्म के संस्कारों के कारण भी भावनाओं के कुछ अंश उस व्यक्ति में आते हैं। भावनात्मक विकास होने पर वह अपने अच्छे-बुरे संस्कारों का आकलन करके जीवन की दिशा तय करता है। बुरे गुणों का बहिष्कार करता है। अपने व्यक्तित्व में नया निखार पैदा करता है। समाज और राष्ट्र के लिए एक स्तम्भ के रूप में तैयार हो जाता है। इसके विपरीत, भावनात्मक विकास के बिना उसके विचारों में विशेष परिवर्तन नहीं आ पाता। अच्छे-बुरे सभी तरह के विचारों का पोषण उसमें समान रूप से होता है। बुरे विचार उसके मन को प्रभावित करते हैं और अन्तत: शरीर में रोग रूप में प्रस्फुटित होते हैं। शरीर का ग्रंथि-स्त्राव केवल वासनाओं से ही चलता है। बुरे संस्कार धीरे-धीरे ऎसे रसायन पैदा करते हैं कि कालान्तर में बड़ा रोग जड़ें जमा लेता है। जिस प्रकार क्रोध, चिन्ता आदि से रोग होते हैं, उसी प्रकार भावनात्मक निर्बलता और वासनात्मक प्रबलता भी बड़े रोगों का निमित बनती हैं।

सितम्बर 12, 2009

सकारात्मक सोच

सकारात्मक होना या नकारात्मक होना केवल अभ्यास की बात है। जीवन में संस्कारों को तो आसानी से नहीं बदला जा सकता; किन्तु आदत, व्यवहार और परम्पराओं को हम सहज ही विचार करके बदल सकते हैं। भावभूमि कुछ तो व्यक्ति को आनुवांशिक तौर पर प्राप्त होती है और कुछ जीवन के अनुभवों से। किन्तु, यह एक साथ नहीं होता। समय के साथ अनेक प्रकार के अनुभव एक-दूसरे के साथ जुड़कर भावनात्मक गठन तैयार करते हैं, अत: इनका बदलना भी सहज नहीं होता। फिर, भाव तो मन की दुनिया की बात है। इनका धरातल शरीर और बुद्धि से भी गहरा है। मन के साथ आत्मा के धरातल पर भाव पैदा होते हैं।
मन के भाव ही व्यक्ति को चलाते हैं। मन की इच्छापूर्ति के लिए ही शरीर और बुद्धि कार्य करते हैं। हमारा कार्य अच्छा हो, हम अपने कार्यो में सदा सफल हों, इसके लिए आवश्यक है कि हमारे भाव भी सरल हों। इससे हमारी क्रियाएं भी सरल होंगी, व्यवहार भी सरल होगा। अवरोध कम आएंगे। दूसरी बात है कि भाव खुद दृढ़ हों। बिना दृढ़ता के आप लक्ष्य तक कैसे पहुंच सकते हैं भटकाव आने के कई कारण बन सकते हैं। सकारात्मक भाव स्थूल भी होते हैं और दृढ़ भी। ये व्यक्ति में साहस जगाते हैं। विकट परिस्थितियों में संघर्ष करने की क्षमता भी देते हैं। उसे सदा स्फूर्त रखते हैं।
नकारात्मक भाव व्यक्ति की ऊर्जा को क्षीण करते हैं। उसका ओज ही समाप्तप्राय: हो जाता है, और साहस तो उसके कोष से विदा ही हो जाता है। आज तो वैज्ञानिक भी इस तथ्य को स्वीकार करते हैं कि सकारात्मक व्यक्तित्व सामने वाले नकारात्मक व्यक्तित्व का, बाली की तरह, आधा बल खींच लेता है। नकारात्मक व्यक्ति तो उस स्थिति में स्वयं को हारा हुआ ही मानता है। अच्छी से अच्छी अनुकूल परिस्थिति में भी पहले उसकी दृष्टि अपने नकारात्मक पहलू पर ही पड़ती है और वह सकारात्मक पहलू पर ध्यान जाने से पूर्व ही निस्तेज हो जाता है।
इसके विपरीत, सकारात्मक भाव उसकी आत्मा के मूल अंक से जोड़ने का कार्य करते हैं। वह अपनी आत्मा की शक्तियों को पहचानने एवं उनके उपयोग के लिए प्रेरित रहता है। उसकी आत्मा में छिपे सभी सृजनात्मक पहलू प्रकट में आ जाते हैं। हर विषय को वह आगे बढ़ने के लिए ही देखता है। हर अवरोध को चुनौती के रूप में स्वीकार करता है, तभी उसके जीवन में आनन्द बरसता है। चुनौतियां पार कर अपने लक्ष्य तक पहुंचने का सुख केवल सकारात्मक भाव के साथ ही मिल सकता है।
नकारात्मक भाव व्यक्ति को पहले ही अधमरा कर देते हैं। उसे परास्त करने के लिए किसी अन्य उपाय की जरूरत ही नहीं पड़ती। सुख मिलना इतना कठिन नहीं है, जितना कि सुख को भोग लेना। धन, वैभव मिलना तो फिर भी पुरूषार्थ से सम्भव है, किन्तु इसे भोगने के लिए अनुकूल स्वभाव चाहिए। आपको अनेक लोग मिलेंगे, जिनके पास अथाह सम्पत्ति है, किन्तु वे सुखी नहीं हैं। उनके भरा-पूरा परिवार भी है, किन्तु सुख नहीं है। क्या केवल कर्मो का फल ही इसका कारण है
व्यक्ति का दृष्टिकोण विशेष महžवपूर्ण होता है। उसके सुख की परिभाषा भी महžवपूर्ण है। व्यक्ति यदि सकारात्मक भाव नहीं रखता, तो वह मन की गहराइयों तक नहीं पहुंच सकता। अन्य व्यक्तियों के प्रति वह सम्मानजनक हो ही नहीं सकता। तब सुख कहाँ से आएगा सुख को बांटने के लिए भी हमें लोगों की जरूरत पड़ती है। दु:ख को बांटने के लिए भी लोगों की जरूरत पड़ती है। नकारात्मक दृष्टि से आलोचना का भाव बढ़ता है, वह व्यक्ति को मुख्य धारा से दूर कर देता है।
आप कितने ही बड़े हों, कितने ही धनी हों, आपको अन्य प्राणियों का सम्मान करना आना ही चाहिए। “वसुधैव कुटुम्बकम्” के सहारे ही आप सकारात्मक जीवनधारा में जी सकते हैं। अपनी-अपनी जगह सभी महžवपूर्ण हैं। सबको गलतियां करने का अधिकार भी अपनी-अपनी समझ के अनुसार है। वे उनके परिणाम भी स्वयं ही भोग लेंगे। फिर, आप क्यों आलोचना का मार्ग पकड़कर अपनी बुद्धि पर आवरण डालते हैं उसका कुछ बिगड़े या नहीं, किन्तु आपका सुख तो चला गया। आप अपने सुख का ध्यान रखें, उसकी वह जाने।

सितम्बर 2, 2009

सकारात्मक दृष्टि

जीवन में अच्छा या बुरा दृष्टि के आधार पर ही तय होता है। सृष्टि में सबका अर्थ समान है। सबकी बराबर उपयोगिता भी है, आधार भी है। सृष्टि में अर्थहीन कुछ भी नहीं है। हमारी अवधारणाएं, अनुभव एवं परिणाम की कल्पना ही अच्छा-बुरा तय करती हैं। जीवन में हमारे अध्यात्म-विकास का क्रम भी अच्छा-बुरा तय करने का कारण बनता है।
एक व्यक्ति जीवन में हत्याएं करता है। पशुओं को मारकर आजीविका कमाता है। बुरी बात है। किन्तु, व्यक्ति के पिछले कर्म, पशुओं के पिछले कर्म और उनको खाने वालों के कर्म मिलकर ही तो वह सब तय करते हैं। इसमें विशेष क्या है, एक-दूसरे के ऋणों का आदान-प्रदान ही तो है।
यदि इतना ही मान लें तो भी एक प्रश्न उठता है कि क्या नए कर्म भी उसी दिशा में बांधे जाएं क्या अनजाने में भी ऎसे ही कर्म करते रहें जीवन में ज्ञान की भूमिका, ज्ञानयुक्त कर्म की भूमिका और जीवन को लक्षित करने का महžव तभी समझ में आता है। और, इसके बाद क्यों विधायक भाव महžवपूर्ण है सकारात्मक दृष्टि की भूमिका जीवन को कैसे बदलती है नकारात्मक से बचने की जरूरत क्या है आदि प्रश्न स्वत: हल हो जाते हैं।
हमारे साथ सत, रज और तम जुड़े हुए हैं। द्वन्द्वात्मक दृष्टि जुड़ी है, कर्मो के बन्धन जुड़े हैं और भावी जीवन का (चाहे मोक्ष ही हो) लक्ष्य जुड़ा हुआ है। जब तक वर्तमान को नहीं समझेंगे, भविष्य समझ में नहीं आएगा। हमारा मन कहां-कहां अटकता है, भटकता है, चिपकता है, इसको समझना भी जरूरी है और अनावश्यक जगह नहीं चिपके, यह प्रयास करना भी जरूरी है।
इसका सरलतम उपाय है—सकारात्मक दृष्टि। जीवन में जागरूकता का भाव और सकारात्मक दृष्टि आपको हर कार्य में सार्थक भूमिका प्रदान करेगी। आपके आध्यात्मिक विकास का महžवपूर्ण सूत्र बनेगी। शारीरिक, बौद्धिक अथवा मानसिक धरातल पर सकारात्मकता का भाव वास्तविक धरातल से भी जोड़े रखेगा, साथ ही नकारात्मक भूमिका से भी बचाएगा। आपका जीवन व्यवहार सरल होगा। आप सृष्टि कर्म के साथ जुड़ेंगे, ऋणों के आदान-प्रदान की दृष्टि पैदा होगी और अनावश्यक प्रतिक्रियाओं से बच सकेंगे।
सकारात्मक भाव आपका मार्ग निश्चित लक्ष्य की ओर तय करेंगे। जैसे-जैसे आपकी शक्तियों का विकास होगा, प्रकृति आपकी परीक्षा भी लेती रहेगी। आपको हर अगले चरण में पहुंचने के लिए कोई न कोई कठिन परीक्षा पास करनी ही होगी। परीक्षा इस बात की सूचना भी है कि आपका विकास हो रहा है। आप एक धनी व्यक्ति हो गए, जीवन के सभी सुख आपके पास हैं, क्या आप इनको पचा सकते हैं अथवा भोग में लिप्त होकर अपना लक्ष्य भूल जाएंगे परीक्षा ही तो है। अनेक प्रकार की कठिनाइयों के दौर आपके समक्ष आएंगे, उनमें स्वयं को उत्तीर्ण भी होना है, जो आप सकारात्मकता के सहारे ही हो सकते हैं। समय लगेगा, धैर्य की परीक्षा होगी, विचलन का भाव भी आएगा। यदि आपकी आस्था अडिग है तो आपको अभय की प्रतीति बनी रहेगी। आपके बड़े व्यक्तित्व का निर्माण होगा, तब और भी बड़ी परीक्षा होगी।
सकारात्मक दृष्टिकोण मूलत: भावों पर आधारित होता है। बुद्धि भी उसी क्रम में कार्य करने लगती है। अनावश्यक शारीरिक क्रियाएं भी रूक जाती हैं। गम्भीरता और निर्मलता का अद्भुत संगम होता है। यही दृष्टि आगे चलकर अद्वैत की भूमिका में ले जाती है।
एक साधु कहता है कि मैं चरस इसलिए पीता हंू कि इससे मेरी एकाग्रता बढ़ती है, मैं स्वयं को शिव की टोली के साथ देख सकता हँू, शरीर की चुनौतियों का सामना करने का अवसर मिलता है मुझे। क्या शरीर मेरी एकाग्रता मेंं बाधक बन सकता है लगता है, वह सभी कुछ सकारात्मक कह रहा है। सच्चाई तो यह है कि जो सक्षम होते हैं वे ही सबसे पहले कृत्रिम नशे को छोड़ते हैं। उनको लगने लगता है कि शिव का ही स्वयं नशा इतना बड़ा है कि उसके आगे अन्य कोई नशा टिकता ही नहीं। शरीर का नशा भी उतर जाता है, बुद्धि अहं-विहीन सात्विक रूप ले लेती है।

अगस्त 25, 2009

भावों के धरातल

हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। जीवन भी युगल तत्व पर आधारित है। युगल के बिना न सृष्टि संभव है और न ही सृष्टि का संचालन। कौन किस पहलू को विशेष महत्व देता है, इसी पर जीवन की धुरी टिकी रहती है। कोई ऊध्र्वगामी हो जाता है, तो कोई अधोगामी। कार्य समान करने पड़ते हैं, समय समान ही लगता है, किन्तु परिणाम अलग-अलग आते हैं। मात्र श्रम ही परिणाम नहीं लाता, बुद्धि भी परिणामों की दिशा तय कर सकती है। परिणामों का जिम्मा मन का है, भावनाओं का है। मन यदि कार्य में जुड़ेगा ही नहीं तो परिणाम कैसे आएंगे आधा मन जुड़ेगा तो अधूरे परिणाम ही आएंगे।
मन के जुड़ने का अर्थ है—भावनाओं का जुड़ाव। कार्य करने की मंशा क्या है और कार्य के परिणाम क्या ढूंढ़ रहे हैं या केवल कर्म समझकर ही कार्य कर रहे हैं किसके लिए कर रहे हैं सचमुच कर रहे हैं अथवा दबाव या भय के कारण कर रहे हैं इत्यादि सभी बातें परिणाम तय करती हैं। ये सभी हमारे मन के भावों की परिचायक हैं।
भावों को हम तीन प्रकार के धरातलों पर आंक सकते हैं—सकारात्मक, नकारात्मक और तटस्थ। सकारात्मक भाव सदा कार्य के गुणों पर केन्द्रित होते हैं, आशावादी होते हैं, लोक-कल्याण के साथ जुड़े होते हैं। व्यक्ति की कल्पना के साथ सकारात्मक भावों का नाता होता है। ये प्रोत्साहन का मार्ग प्रशस्त करते हैं, प्रसन्नता देते हैं।
नकारात्मक भाव कार्य के अवगुणों को पहले देखते हैं। इनमें शंकाओं का प्रभाव अधिक होता है, अस्थिरता अथवा हिचक बनी रहती है। स्मृति का प्रभाव अधिक होता है, व्यक्ति स्वयं केन्द्र में ही सीमित रहता है।
स्थिर रह पाना आसान नहीं है। यह श्रेष्ठ है, किन्तु इसके लिए बहुत अभ्यास की जरूरत पड़ती है। कुछ व्यक्ति स्वभाव से स्थिर होते हैं अथवा दिखाई देते हैं। हर व्यक्ति अलग-अलग जगह पर अलग-अलग लोगों के सामने अलग तरह से व्यवहार करता है। भूमिकाएं बदलता है। अत: बाहर और भीतर वह एक-सा रहे, यह बहुत मुश्किल कार्य है। वह अनायास अलग-अलग दिखाई पड़ सकता है और विचार करके भी।
जीवन में बढ़ता भौतिकवाद भी हमारी अनेक चिन्ताओं का कारण है। हमारे बढ़ते अहंकार का कारण है। यही हमें व्यक्तिवाद की ओर अग्रसर कर रहा है। असुरक्षा का बढ़ता भाव जीवन में अनेक प्रकार के भय पैदा कर रहा है। ये सब मिलकर ही हमारे भावों को नकारात्मक बना रहे हैं। हमारी चिन्ताओं को बढ़ा रहे हैं और हमें मानसिक रूप से रोगी बना रहे हैं।
जीवन की विकास यात्रा सहज नहीं होती। मानव-जीवन हमें प्रसाद रूप में मिला है, यह आसानी से नहीं मिलता है। सृष्टि या सृजन विकास का अन्तिम सोपान है। मानव के पास बुद्धि है। वह विवेक और प्रज्ञा प्राप्त कर सकता है। प्रकाश देवताओं का भोजन है, अंधकार असुरों का। हमने रात्रि-भोज को श्रेष्ठ मानकर असुर समाज में जगह बनाने की सोची। मानव की मर्यादा छोड़कर पशु के समान दिनभर कुछ न कुछ खाते रहने को श्रेष्ठ माना। भौतिकवाद के इस चक्र से हमें बाहर निकलना होगा। अपने जीवन की सार्थकता का विचार तो करना ही होगा। किन्तु, यह सब बिना सकारात्मक भाव के संभव नहीं हो सकता। यह मुश्किल कार्य नहीं है, किन्तु जब तक हम कोई निश्चय नहीं करें, तो यह आएगा नहीं।
इसके लिए वातावरण बनाना पड़ेगा। मन का वातावरण, जहां सदा विकास का चिन्तन हो, जीवन का चिन्तन हो। आपके परिवार का हर व्यक्ति महत्वपूर्ण है, चाहे वह आपको अच्छा लगे या न लगे। उसके योगदान से ही आपका व्यक्तित्व विकास पा रहा है। आप जहां कार्य करते हैं, वहां हर व्यक्ति आपके व्यक्तित्व में योगदान करता है। वे सब हैं, इसीलिए संस्थान का व्यक्तित्व है, आपका व्यक्तित्व है। जब वहां कोई नहींं होता तो आपको वह संस्थान अच्छा कैसे लगता आपको अपने संस्थान पर गर्व है तो इन सबके कारण ही है। सबने मिलकर संस्थान को गर्व करने योग्य बना रखा है। संस्थान का हर कर्मचारी, भवन, पेड़-पौधे आदि सभी महत्वपूर्ण हैं। सब मिलकर ही उसका स्वरूप-निर्धारण करते हैं। हर एक का अपना विशिष्ट व्यक्तित्व है और संस्थान इन सबका सामूहिक व्यक्तित्व है, अत: सभी महत्वपूर्ण हैं।
जीवन में हर घटक का महत्व है, यह बात समझ में आते ही सकारात्मक भाव की शुरूआत हो जाती है। आपके मन में सबके लिए आदर-भाव पैदा होता है। समाज में हर व्यक्ति का जीवन में योगदान दिखाई पड़ने लग जाता है। यही भाव मन में नया वातावरण बनाता है, जीवन को समझने और सकारात्मक बनाने का मार्ग प्रशस्त करता है। आप अपने आप में कितने ही महत्वपूर्ण हों, इस भाव के आते ही आपका महत्व कम होता जाता है, अहंकार छंटता जाता है। व्यक्ति भीतर के चिन्तन में उतरने लगता है। जीवन को नजदीक से देखने लगता है। स्वयं को दूसरों के लिए कैसे उपयोगी बनाए, इस पर विचार करता है। व्यष्टि से समष्टि की ओर मुड़ता है। उसका यश बढ़ता है, विनय बढ़ता जाता है, कर्म की भूमिका बदलती जाती है। कार्य और चर्चा वही रहती है, केवल भाव बदलते हैं। इसी से कार्यो के परिणाम बदलते हैं।
भौतिकवाद के केन्द्र में शरीर होता है। सकारात्मक भाव में मन की प्रधानता होती है। माँ जिस प्रकार बच्चे का कार्य करते समय शरीर को भूल जाती है और भावों के सुख का आस्वादन करती है, यही पवित्रता मानस में सकारात्मक भाव बनाए रखती है।

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