Gulabkothari's Blog

फ़रवरी 15, 2012

आद्या

आद्या
तुम्हारा आना
इस घर में
चमत्कार-सा है।
सबको लगा
सब बड़े हो गए
पदोन्नति हो गई,
ऊपर चढ़ गए
एक पीढ़ी,
परिवार की
एक सीढ़ी।
आज हम सब
गर्वित हैं
इस विकास से
और आज
लग रहा है
मुझको
एक झटका-सा,
क्यों बाबा,
बधाई के साथ
पिटाई भी,
कर रही हो
आद्या, तुम!
बाबा बनने तक
कहां था एहसास
पिता होने का,
कब हुए बच्चे
कब हो गए बड़े
पता कहां चला,
और आज
बघारते शेखियां
बाबा होने पर
तुम्हारे आने से।

गुलाब कोठारी

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जून 9, 2010

धरातल

मनुष्य
प्राणी है
पृथ्वी लोक का।
हर हाल में
जुडे रहना है
धरती से।
जब छूट जाती है
धरती,
जीने लगता है
देव लोक में,
इंद्रियों के सहारे,
बुद्धि के सहारे
प्राणों के सहारे,
तब उखड जाते हैं
पांव
जमीन से।
जवाब देने लगता है
शरीर,
छूटने लगते हैं
सहारे
डरने लगता है
पांव रखने से
जमीन पर।
पार्थिव देह
हिलने लगती है
बिना सहारे
बिगड जाता है
लौकिक व्यवहार
सृष्टि-रचना से।

गुलाब कोठारी

अप्रैल 7, 2010

रसविहीन

कोई देखे तो
झगडना
मां-बेटे का
उन मुद्दों पर
जो कभी थे नहीं
परिवारों में
जब से
पनपने लगी है
सोच
समानता की
स्वतंत्रता की
स्त्री
दूर होती गई
अपनी भूमिका से
चूल्हा-चौका
अब नहीं काम
उसका
नौकर बनाने लगा
खाना
भावहीन-नीरस
कैसे संतुष्ट हो
बालक
रोज झगडता है
अच्छे खाने को
मां
तैयार नहीं
बनाने को
होटल में भी
जा नहीं पाते
रोज-रोज
फिर वहां भी तो
खाते हैं
फर्नीचर ही
खाना तो वहां भी
होता है
रसविहीन।
बनाने वाले को
कहां पता है
कौन खाएगा
किसके लिए उडेलंू लाड-प्यार
खाने में
तटस्थ भाव से
बनता है
तटस्थ भोजन
नहीं भर सकता
मन का शून्य
नहीं करता
निर्माण
मन मन्दिर का
‘जैसा खावे अन्न
वैसा होवे मन’
मां के रहते
भावशून्य
बनता जाता है
जीवन
बालक का।

गुलाब कोठारी

मार्च 10, 2010

पुनरागमन

पूरब की दुल्हन
पश्चिम का दूल्हा
मिल गए
न जाने कैसे
मानते थे
भीतर से तो हैं
सभी बराबर
सभी एक से,
यह भरम
टूट गया
कुछ सालों में
विचारों का भेद
मिलने नहीं देता
दोनों को
अहंकार तैयार नहीं
झुकने को।
पहले घायल हुई
दुल्हन
चली गई साथ
पूरबिया के
छोड़कर
अपनी लाड़ली को
बाप के भरोसे।
होश उड़ गए
बाप के भी
कहां सोचा था
यह हो जाएगा
कैसे पालूंगा
इस नन्ही परी को
वह भी चल दिया
पश्चिम में
जा बसा
अमरीका में
भर्ती कराकर
बच्ची को
किसी छात्रावास में।
इस बीच
तड़प उठी मां
रो पड़ा
उसका कलेजा
धिक्कारने लगी
खुद को
कैसे जाए
इतनी दूर
कैसे मुंह देखे
दिल के टुकड़े का
पढ़ाई भी
इतनी महंगी
अमरीका में
बाप को करनी पड़ी
दो-दो नौकरियां
बच्ची की खातिर
बेहाल था
खुद का तो।
घर-बेघर सा
मारा-मारा
थकने लगा था
जीवन से।
क्या भूल हुई
उससे
क्यों दिया अभिशाप
ईश्वर ने
वह तो आस्तिक था
क्या हुआ जो नहीं गया
मंदिर
या गिरिजाघर,
भूल यही थी
बस
उसको मान लिया
अपने जैसा
संस्कृतियां
मिल नहीं सकतीं
शिक्षा के भरोसे
बुद्धि के बल पर
वहां तो होता है
बस अपमान
एक दूजे का
खोखले दिखते हैं
नारे सत्यता के
भौतिक विकास के
दिल तो सब में
एक-सा होता है
उस धरातल पर
कौन जीता है
मां समझती है
सबसे पहले
इसीलिए
लौट आई
दुल्हन
फिर से पश्चिम में
करके प्रायश्चित
पिछले कर्मों का
रहने लगे फिर से
साथ-साथ।

गुलाब कोठारी

नवम्बर 11, 2009

नया युग

कि मां कहती है
लडका अच्छा है
मेरा मान करता है
मित्रता चाहता है
किंतु डरती हूं
मैं
आगे बढने से
जानती नहीं
कौन है वो
वह भी नहीं जानता
मैं कौन हूं-कैसी हूं
फिर भी अच्छा तो
लगता है।
पहले भी हो चुका
ऎसा ही
एक बार
अच्छा लगा था
एक प्यार।
मिलते थे
कई संदेश
प्यार भरे
किंतु बादल थे
बरसाती
छंट गए
बहुत जल्दी
शादी की चर्चा
उसे नहीं सुहाई
जब वह आया
मुझे मिलने
साथ उसके
एक और कन्या आई
कह रही थी
हम करने वाले हैं
शादी, जल्दी ही।
अपनी भूल
मैं चिंतित हो गई
उसके लिए
आज फिर
खडी हूं
उसी दोराहे पर,
जाना भी चाहती हूं
किसी की गोद में
मिलते भी हैं
प्यार करने वाले
किंतु,
एक प्रश्न
उठता है बार-बार,
क्या कभी भी
बन सकूंगी
किसी के बच्चे की
मां
क्या हो सकेगी
मेरी भी
छोटी-सी गृहस्थी
क्या होगा
कभी मेरा मन संतुष्ट
इस सदी के रिवाज
कुछ अलग हैं
आदमी
नहीं बदलता
अपनी जगह
और औरतें
लुढकती रहती हैं
इनके हाथों में।
यही कहानी है
विकासवाद की
समानता की
समृद्धि की।
औरत रूक जाती है
कहानी ठहर जाती है
अकेले जीने की जगह
मर जाने की
याद आती है।

गुलाब कोठारी

अक्टूबर 7, 2009

किसके साथ

पशुभाव है
कर्म
ज्ञान के बिना
ज्ञान भी
बन जाता है
विष
बिना उपयोग के।
पैदा किसने किया
अज्ञान को
कौन करता है
इसको विकसित
फिर भी होता है
बहुत बडा
ज्ञान से
असीम-अनंत।
सर्वाधिक त्रस्त
होते हैं ज्ञानी ही
अज्ञान से
ज्ञान के अहंकार से
दुत्कारते हैं
अपने ही कर्मोü को
आगे चलकर
साहस नहीं होता
स्वीकार करने का।
जैसे कि
मुझे पसंद आई
एक लडकी
प्यार हो गया
मन भी
तैयार हो गया
करने को शादी
लगने लगी
सबसे सुंदर
दुनिया भर में
भाती नहीं
कोई भी दूसरी
जवाब दे दिया
बुद्धि ने भी
हम मान गए।
मान गए
मां-बाप भी
दोनों के
वे तो
करते भी क्या
बस गया
घर हमारा
सुंदर-सा।
कुछ काल बाद
गूंजने लगी
किलकारियां
देर कहां लगती है
गुजर जाने में
अच्छे दिनों को,
और फिर
शुरू हो गए
विवाद-संवाद
नित नए तेवर
नित नए विषय
कभी पीहर
कभी ससुराल
कभी बच्चे
सूखने लगे कंठ
पछताने लगा मन।
सुना था
शादी के लaू
खाओ और पछताओ
नहीं खाओ
तो भी पछताओ।
पडने लगा भारी
हर दिन
कटती नहीं रातें
होने लगा
बीमार, शरीर भी
चिंतित हो उठे
परिजन-स्वजन
फिर एक दिन
तय कर लिया
अलग होना
दोनों ने।
लगा, मिल गया
मार्ग
सुखी रहने का।
पिताजी ने पूछा
विश्व सुंदरी
आज बन गई है
विष-कन्या
किसके साथ रहकर
वाह, रे ईश्वर
जड दिया
मेरे ही गाल पर
उठा,
लगा दिया सिंदूर
फिर से
पत्नी के भाल पर।

गुलाब कोठारी

सितम्बर 9, 2009

जो जागा

गलतियों का
पुतला है
आदमी।
भोलेपन में,
प्रवाह में,
आवेश में,
नादानी में,
हो सकती हैं
गलतियां।
क्या जरू री है
हर गलती का
लाभ उठाता रहे
जमाना,
कोई तो मिले
जो रोक सके
हाथों को
गलती करते समय
कोई तो दिखाए रास्ता
जीवन की सच्चाई का।
जब हाथ उठता है
गलती करने को
मन छूट जाता है
पकड़ से
तब वहां
उस माहौल में
कौन मिलेगा मनीषी
खोजता हुआ
अपने ईश्वर को
और, जो जागा,
मनीषी हो जाएगा।

गुलाब कोठारी

अगस्त 26, 2009

भागमभाग

जिस रंग का चश्मा
उस रंग का नजारा
पड़ोसन मेरी
बहुत सुंदर थी
आवाज भी सुरीली
लगता था
एक बार तो
दिखती रहे
दिन भर में
बहुत आकर्षण था
उसके रूप में।
पति बोले
एक दिन मुझसे
कैसे मिले शांति
उस कर्कशा से
कैसे छूटे पीछा
उस
भली मानस से
तंग आ गया
मैं तो
गलती भी तो है
मेरी ही
मैं ही
डालता था
डोरे
उसे रिझाने को
बहुत पीछा किया था
अब छटपटा रहा हूं
मैं ही
मुक्त होने को।
वो है कि
कसकर बांध दिया
मुझको
मैं अवाक था
मेरी अवधारणा
संुदरता की
हवा हो गई
वह तो चल पड़ी
किसी और के पीछे
छोड़कर सुख
बाल-बच्चों का
जो न हो सकी
अपने पति की
अपने बच्चों की
क्या होगी
किसी अन्य की ?
इस धरती पर
भोग में डूबी
आंखें
कैसे देखेंगी
धरातल
आत्मा का
नकली निकलता
24 कैरेट का
खरा सोना
18 का हो गया
14 कैरेट का
हो गया
क्या पता
मुलम्मा ही
निकले अंत में
फिर क्यों
भागता रहता है
इंसान
खोट भरने को
जीवन में
छोड़कर सुख
24 कैरेट का
प्रसाद
ईश्वर का
क्यों नहीं चाहता
भोगना
प्रारब्ध को ?
छूट नहीं सकता
भागने से
इसे तो
स्वीकारना होगा
भोगना होगा
यथार्थ मानकर
हंसते हुए।

गुलाब कोठारी

अगस्त 12, 2009

देते रहें

कर्म और भोग
दोनों ही
पर्याय हैं जीवन के
भाग नहीं सकते
भोगना पडेगा
इसी दलदल में
और
उठना भी होगा
इससे ऊपर।
जीवन व्यापार है
लेन-देन है,
कर्म देना है
उल्टा भी होगा
यदि
उलट गए
हमारे भाव।
कुदरत देती है
हम मांगते हैं
ईश्वर देता है
हम मांगते हैं
सीखना पडेगा
हमको भी
देना
यदि बनना है
ईश्वर,
बिना किसी
अपेक्षा भाव के
लेने के लिए,
देना ही होता है
विस्तार आत्मा का,
‘स्व’ का
संकोच बन जाता है
लेना
आत्मा देता है
व्यक्ति नहीं देता
देय वस्तु
होती है
आत्मा का अंग
होता है उस पर
अधिकार हमारा
और
देते समय
हम दे देते हैं
अधिकार भी
साथ में
छोडकर अपना
स्वामित्व-भाव
फिर नहीं करते
कामना
उसे पाने की
वापस
अपने लिए।
जिंदगी
नहीं रहती
फिर व्यापार
देना ही देना
लेना कुछ नहीं,
बन जाता है
भामाशाह
देते रहने वाला,
धन नहीं चाहिए
देने के लिए
तन भी चलेगा
मन भी चलेगा
सेवा भी चलेगी
मिठास भी चलेगा
ताकि
कोई न रहे
वंचित
बनने से
भामाशाह।
कोई आस नहीं
शेष रहे
लेने की
वासना के घेरे की
देते-देते
बन जाए
नारायण
यह मानव देह
लोग मांगते रहें
हम देते रहें।
ईश्वर से लेकर
ईश्वर को ही
न भोग रहे
न कर्म रहे
न जीवन व्यापार।

गुलाब कोठारी

जुलाई 30, 2009

बाहरी ज्ञान

आदमी खाता है ठोकरें
अपनी होशियारी
के कारण
मानता है
स्वयं को
अपना भाग्यविधाता
करता है मनमानी
उधार के ज्ञान से
समझ नहीं पाता
लेख
विधाता के।
समझ नहीं पाता
अपनी सीमा को
चाहता है लांघना
सारी मर्यादाएं
कुदरत की,
सुनता भी नहीं
अपने मन की
अंतरआत्मा की।
यही स्वतंत्रता
बदलती है
स्वच्छंदता में,
बन जाती है
कारण
ठोकरों का।

गुलाब कोठारी

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