Gulabkothari's Blog

July 21, 2019

हर दिन हो नवरात्रा!

नवरात्रा पूजा के नौ दिन देश शक्ति की आराधना करता है। उसके आगे अपना सर्वस्व समर्पित कर समृद्धि और खुशहाली मांगता है। महिला को यह दर्जा शरीर के कारण नहीं, बल्कि स्त्रैण गुणों के कारण, नई पीढिय़ों को संस्कारित करने और समाज से असुरों का नाश करने की शक्ति के लिए दिया जाता है। घर-घर में कन्या पूजन किया जाता है। अभ्युदय के लिए उनसे आशीर्वाद लिया जाता है।

और उसके बाद…? नौ दिन बाद जैसे सब भुला दिया जाता है। फिर वही सिलसिला शुरू हो जाता है। रेप और गैंगरेप! पीडि़ताओं के प्रति पुलिस का अट्टाहास! अब तो थानों में भी होने लगे गैंगरेप। प्रतिदिन मीडिया सजा-धजाकर इन खबरों को परोस रहा है। सरकारें और पुलिस मगरमच्छी आंसू बहाते हैं, जनता का मन बहलाने के लिए। चारों ओर बेटियों के प्रति दरिन्दगी! अभी तो कलियुग बहुत बाकी है। लोग घरों में घुसकर गैंगरेप करने लगे। पति के हाथ से पत्नी को छीनकर रेप करने लगे। तब कौन मां-बाप ऐसी परिस्थितियों में बेटी पैदा करना चाहेंगे। स्कूल के मास्टर अबोध का शिकार करने लगे और सरकार का संगीत चलता है-‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ।’ किसके भरोसे? हो सकता है आने वाले समय में पुलिस अधिकारी भी बेटी पैदा करना न चाहें।

परिणाम भी देखते जाएं….

किसी समय गरीब घरों में बेटियां खर्च की दृष्टि से अभिशाप मानी जाती थीं। विशेषकर गांवों में। आज ठीक उल्टा हो रहा है। गांव से अधिक शहरी लोगों को, निर्धन से ज्यादा अमीरों को ‘पुत्र रत्न’ चाहिए। आज शहरी और समृद्ध व्यक्ति समर्थ भी है। मनचाही संतान पैदा कर लेता है। तकनीक उसकी पहुंच में है। ‘बेटी बचाओ’ का नारा कम से कम गरीबों में तो, जिनके लिए यह अभियान चलाया गया था, फेल हो गया। अधिकांश सरकारी अभियान विरुद्ध दिशा में सफल अधिक होते हैं। परिवार नियोजन भी समृद्ध परिवारों में ही अधिक सफल रहा। गरीबों की संख्या बढ़ती गई। आज उन्हीं समृद्ध, शिक्षित परिवारों में बेटियां कम हो रही हैं।

स्त्री-पुरुष का अनुपात तेजी से बदल रहा है। शहरों में गांवों से ज्यादा संख्या घट रही है स्त्रियों की। पिछले सात-आठ सालों में अनुपात एक हजार पुरुषों के मुकाबले नौ सौ से कम रह गया है। क्या यह आर्थिक दृष्टिकोण का ही परिणाम है? इसका उत्तर इस बात में ढूंढना चाहिए कि देश में महिलाओं का अनुपात अतिशिक्षित एवं अति समृद्ध राज्यों-दिल्ली, केरल, तेलंगाना में सबसे कम है।

समय के साथ आबादी के नियंत्रण का प्रभाव भी दिखाई देगा। आज प्रति परिवार संतान का औसत लगभग दो रह गया है। लोग प्रसन्न तो हैं कि संतान का पालन-पोषण अब ठीक से होने लगा है। और यह भी सच है कि लड़कियों के मां-बाप दु:खी रहने लग गए। आशा की किरण किधर?

इसका एक कारण भौतिक विकास पर आधारित शिक्षा। शिक्षित व्यक्ति का बस एक ही सपना रह गया-पैसा। वह किसी भी व्यक्ति का अहित कर सकता है, स्वयं के हित के लिए। संस्कारों का देहान्त हो गया। शिक्षित व्यक्ति के जीवन में धन के प्रवेश के साथ ही संस्कार उठ जाते हैं। अपनी बुद्धिमानी की होशियारी में वह स्वयं के अहित से शुरू करता है। जीवन-दूसरों का-उसके लिए मात्र पदार्थ रह जाता है। स्वयं के लिए जीने लगता है। अपने किए का सुख भोगने में व्यस्त हो जाता है। इसी का एक पक्ष है ‘कन्या भ्रूण हत्या’ का बढ़ता अभिशाप। कोई विचार नहीं करता कि बिना स्त्री के पुरुष की प्रजाति भी लुप्त हो जाएगी। स्त्री भी गुणवान हो, ताकि समाज और देश संस्कारवान बन सके। यह कार्य भी पुरुष को ही करना पड़ेगा। नहीं तो इसकी कीमत उसी की अगली पीढिय़ां चुकाएंगी।

व्यक्ति स्वार्थी भी हो गया और भोगी भी। न बच्चों का दर्द, न मां-बाप का। न ही संबंध बच पा रहा बाप-बेटी का। न सरकार को शर्म, न समाज को।

शिक्षा ने सब को मानवता से शून्य कर दिया है। शरीर तो पशु देह है। जैविक संतानें पैदा हो रही हैं। जिस योनि से जीव आता है, वैसे ही इस देह में भी जीता है। इंसान कौन बनाए इसे?

यह विषय केवल बौद्धिक धरातल के आंकड़ों का नहीं रह गया है कि, लड़कियां कम हो रही हैं और लडक़े बढ़ रहे हैं। प्रश्न है-इंसान कम हो रहे हैं। मानव देह में पशु बढ़ रहे हैं। समाज में हिंसा, बलात्कार और आसुरी वृत्तियां हावी हो रही हैं। तब कौन बचाएगा अपनी बेटियों को और किसके लिए? क्या यह प्रलय की शुरुआत नहीं है?

इसका समाधान…?

सामाजिक संकल्प, शिव संकल्प। कन्या या स्त्री की महत्ता को केवल नौ दिन ही क्यों याद रखा जाए। जिस गांव से खबर आए कि वहां कन्या-भ्रूण की हत्या हुई है अथवा गैंगरेप हुआ है, उस गांव में तो हर दिन नवरात्रा मननी चाहिए। उस दौरान पूरे गांव या पूरी बस्ती को संकल्प लेना चाहिए कि वे आज के बाद फिर किसी स्त्री के मान को ठेस नही पहुंचने देंगे। अपराधियों को सजा काटने के बाद भी गांव में प्रवेश न दिया जाए।

हर घर से युवा क्रान्ति की अलख जगनी चाहिए। उनके स्वयं के भविष्य का प्रश्न है। क्या कन्याएं घर से बाहर निकलना बंद कर दें? घर में घुसने वालों को पुलिस नहीं रोक पाएगी। युवा शक्ति को ही यह उत्तरदायित्व अपने हाथ में लेना पड़ेगा। यदि कोई पुलिस कर्मी अपराध में लिप्त होता है तो उसे भी गांव से बाहर निकाल देना चाहिए। दूसरी ओर परिवारों में शिक्षा-संस्कारों का नया वातावरण बनना चाहिए। अभिभावक अपनी सन्तान को अच्छा नागरिक बनने के लिए नित्य प्रेरित करें। धर्म-ग्रंथों का नित्य पारायण शुरू होना चाहिए। टीवी तथा मोबाइल फोन का प्रभाव कुछ धीमा होगा। बच्चों को और अभिभावकों को भी समझना पड़ेगा कि शरीर नहीं जीता, आत्मा जीता है इस शरीर में। शिक्षा को आध्यात्मिक स्वरूप देना पहली आवश्यकता है। व्यावसायिक स्वरूप तो उच्च शिक्षा से पहले शुरू ही नहीं होना चाहिए। तब बच्चों को प्रकृति और पुरुष का स्वरूप समझने का अवसर भी मिलेगा। जीवन का अर्थ मानव के सम्मान में ही निहित है, यह सीख अनेक समस्याओं से मुक्त करा देगी। वरना कन्या पूजन करके भी हम ईश्वर से भी सदा झूठ बोलते रहेंगे। कन्या की हत्या करने वाली मां को तो फांसी होनी चाहिए।

June 14, 2019

बीज की तरह रहे, वटवृक्ष बन गए

एक साधारण व्यक्ति किसी असाधारण विभूति के बारे में क्या कह सकता है। आचार्यश्री महाप्रज्ञ उस समर्पित आत्मा का नाम है, जिनकी आत्मा में सदा आचार्य तुलसी ही तरंगित रहे हैं। उनके ही प्रतिबिम्ब को हम आचार्यश्री महाप्रज्ञ कहते हैं। इनका आधा शरीर आचार्य था और आधा शरीर महाश्रमण था। आत्म रूप में वो महाप्रज्ञ थे। व्यक्ति को भीतर से रूपान्तरित कर सकने की क्षमता आचार्य महाप्रज्ञ में देखी है। यह कार्य वही सद्पुरुष कर सकते हैं, जो प्राणों का आकलन करने में सिद्ध हो जाते हैं। उनका दृष्टिकोण समय और परिस्थिति के साथ बदलता नहीं है।

आचार्य महाप्रज्ञ के प्रेम और समर्पण ने ही इनके जीवन को गहनता प्रदान की है। जब भी आचार्य तुलसी ने कुछ कह दिया, वह तुरन्त इनके जीवन का अंग बन गया। न कोई प्रश्न, न कोई शंका। आप कह सकते हैं कि महाप्रज्ञ आचार्य तुलसी के अर्धांग बन गए थे। सदा ग्रहण करने की मुद्रा और स्वागत का भाव। शायद इसीलिए जो ईश्वरीय ज्ञान आचार्य तुलसी तक पहुंचा, वह सीधा का सीधा बहकर आचार्य महाप्रज्ञ तक आ गया। आचार्यश्री उसकी आगे वृद्धि करते ही गए। इन्होंने स्वयं को सदा गौण रखा। दोनों की एकरूपता जगजाहिर है। इसी से इनका अमन का मार्ग प्रशस्त हुआ। इसी से नए रूपान्तरण के प्रयोग कर पाए। भीतर की अनुभूतियां समृद्ध हो सकीं। तभी वे धर्म को वैज्ञानिक स्वरूप दे पाए। भगवान महावीर को वर्तमान जीवन शैली से जोड़ पाए। अहिंसा यात्रा के माध्यम से धर्म की अर्थवत्ता एवं सार्थकता सिद्ध कर गए। सबसे बड़ी बात चेतना से जुड़े विषयों को मानवीय संवेदना की भाषा दे गए।

मैं भी सौभाग्यशाली हूं कि मुझे आचार्यश्री का इतना सान्निध्य मिला। इनके मार्गदर्शन में प्रेक्षाध्यान के अनेक प्रयोग करने के अवसर मिले। हम आज भी अभेद ही हैं। आचार्यश्री ने मुझे कई बार कहा था कि मैं तुम्हें न पत्रकार मानता हूं, न ही कोई उद्योगपति। तुम एक निष्ठावान मानव हो, जो सिद्धान्तों पर चलता भी हो और डटा रहता हो।

गुरु का सम्मान बनाए रखना शिष्य की ही जिम्मेदारी होती है। अच्छे गुरु के शिष्य भी अच्छे ही होते हैं। हमारा संकल्प भी रहना चाहिए कि भविष्य में भी हम अच्छे ही रहेंगे। इनका सम्मान उत्तरोतर बढ़ता ही जाएगा।

विश्व पटल पर उनका प्रधान विषय था – अहिंसा। अहिंसा के प्रति आचार्य महाप्रज्ञ जी का स्पष्ट मत था कि ‘हिंसा छोडऩे से समाप्त नहीं होती, करने से भी समाप्त नहीं होती, केवल चेतना के जागरण से समाप्त होती है।’ उससे हिंसा का संस्कार समाप्त हो जाता है। न स्मृति रहती है, न ही घटना। क्योंकि हमारी भौतिकता के पीछे कोई ज्योति है जो निर्णय ले रही है। वही निर्णय बाहर तक पहुंचता है। भीतर हमारा अस्तित्व होता है – ‘मैं हूं’। बाहर व्यक्ति ‘मैं’ रहता है – जो बाहर ही देखता है। ‘हूं’ भीतर देखता है।

जिन संस्कारों के उदय से कोई हिंसा करता है, वह स्मृति हिंसा का मूल है। वही वास्तविक हिंसा है। क्रियात्मक हिंसा उतनी बड़ी नहीं होती। जो भी वर्तमान में हिंसा कर रहा है, उसके मन में हिंसा का संस्कार है। घटना तो परिणाम है। हमारी चेतना जैसे-जैसे जागृत होगी, हिंसा स्वत: समाप्त हो जाएगी। अहिंसा को गीता में शरीर का तप कहा गया है।

‘दैव द्विज प्राज्ञ पूजनम्, शौचम् आर्जवम्।
ब्रह्मचर्यम्, अहिंसा, च शरीरम् तप: उच्येते ॥’ 17/14

वास्तव में शरीर तो तप का माध्यम होता है, इसकी शुरुआत तो मन से होती है। प्राण मन का अनुसरण करते हैं। मन की इच्छा अनुसार प्राणन (तपन) करते हैं। शरीर के सातों धातु जठराग्नि में आहुत होते हैं। भाव शुद्धि ही इस तप का आधार है।

अणुव्रत कार्यक्रम, अनेकान्त दर्शन, महावीर का अर्थशास्त्र जैसे कार्यों की राष्ट्र स्तर पर प्रशंसा भी हुई, अणुव्रत अभियान में अन्य धर्मों की भागीदारी भी देखने को मिली और जैन धर्म का एक वृहत चिन्तन स्वरूप उभरकर सामने आया। आचार्य तुलसी ने जो समणी संस्था बनाई, उसने हमारी भागीदारी देश-विदेशों में पहुंचाई। आज प्रत्येक धर्म-सम्मेलन में हमारी उपस्थिति स्पष्ट है।

आज परिवर्तन की गति बढ़ गई है। कम्प्यूटर आगे निकल गया, मानव पीछे रह गया। अत: हम सब टीवी, फोन, इंटरनेट से बंध गए। छूट पाने की शक्ति कम पड़ गई। धर्म को घुटने टेकते देखा जा सकता है। हर परिवार में सब-कुछ बदल गया। शर्म के मारे हमने मुखौटे लगाने शुरू कर दिए। हमने सत्य को छोड़ दिया, अपरिग्रह को भूल गए, अहिंसा की अवधारणा को ही नहीं जानते। बच्चों को हिंसा के उदाहरण देकर अहिंसा सिखा रहे हैं। महाव्रतों की ही यह हालत है, तब आश्चर्य नहीं कि विश्व पटल पर जैन धर्म सिमटता जा रहा है। आज धार्मिक और सामाजिक आयोजनों में राजनीति का प्रवेश बढऩे लगा है। हम देख चुके हैं कि ‘जीवन विज्ञान’ को शिक्षा से जोडऩे में किसने कितना साथ दिया। नए युग की चुनौतियों पर मंथन होना, नई पीढ़ी को तथा अन्य समाजों को जोडऩा हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। समाज में जिस तरह से धन का, परिग्रह का, व्यसनों का और असत्य का वर्चस्व बढ़ रहा है, इसे देखकर महाप्रज्ञ जी की संवेदनशीलता और व्यक्तिगत प्रेरणा याद आते हैं, आगे भी याद आएंगे। कहीं स्मृति बनकर ही न रह जाए।

मैं तो वैसे भी किसी सम्प्रदाय का अंग नहीं रहा। आज भी स्वतंत्र पत्रकार ही हूं। अत: अनेक गहन विषयों पर चर्चाओं में भाग लेने का अवसर भी मिला। चाहे दलाई लामा से औपचारिक चर्चा हो, चाहे महावीर के अर्थशास्त्र की।

मैं दलाई लामा से भी इसी प्रांगण में आचार्य महाप्रज्ञ के साथ मिला था। आचार्य तुलसी तथा महाप्रज्ञ जी ने जो छाप छोड़ी थी, उससे दलाई लामा मुग्ध होकर गए थे। एक व्यक्तित्व का प्रभाव ही तो था, जिसने आत्मा के धरातल को जोड़ा था। दिमाग से बांधने का प्रयास नहीं था। आचार्य महाप्रज्ञ अन्तर्जगत के यात्री थे। वे भीड़ में भी अकेले शान्त भाव से देखे जा सकते थे। वास्तव में तो वे आचार्य तुलसी के प्रतिबिम्ब ही थे। हम उनको महाप्रज्ञ बोलें या आचार्य तुलसी, मुझे तो अन्तर नजर नहीं आता। मैंने महाप्रज्ञ जी को कभी किसी कार्य का श्रेय अपने ऊपर लेते नहीं देखा। सब गुरुदेव को अर्पण! उनको कभी स्वयं के लिए जीते नहीं देखा। बीज की तरह जमीन में दबे रहे और वटवृक्ष बन गए।

मेरी दृष्टि में आचार्य महाप्रज्ञ धर्म-सम्प्रदाय से ऊपर साधक बन चुके थे। इनका प्रमाण उनका मौन सम्प्रेषण था। अनेकों ने इसका अनुभव किया है। उनकी प्रज्ञा व्यवहार क्षेत्र में भी गहरी और खरी दिखाई पड़ती थी। दर्शन के क्षेत्र में तो आचार्य महाप्रज्ञ ने अनेक आयाम स्थापित किए। वे संकीर्णता से परे थे और लाखों मनों पर छाप छोड़ गए। मैं तो उनको तेरापंथ का पर्याय मानता हूं। आचार्य भिक्षु की तरह पीढिय़ों तक उनका मार्गदर्शन उपलब्ध रहेगा।

मेरे जीवन में तो उनकी उपस्थिति अद्भुत थी। मेरे आने की जानकारी उनको सदा 2-3 दिन पहले हो जाती थी। यह मेरी बात का स्थूल पहलू है। सूक्ष्म पहलू यह है कि मुझे यह संकेत कर देते थे कि मुझे उनके पास कब पहुंचना है। वे तो घोषणा भी कर देते थे कि किसी कार्यक्रम में मैं आऊंगा या नहीं आऊंगा। जबकि मेरा आने का कोई कार्यक्रम नहीं होता था और मैं पहुंच जाता था। मैंने समाचार पढ़ा कि दलाई लामा लाडऩूं आ रहे हैं, तो विचार उठा कि चलना चाहिए। यहां पहुंचा तो द्वार पर स्वागत के लिए समाज के कुछ वरिष्ठ कार्यकर्ता लेने को खड़े थे। मुझे वहां ले गए जहां दोनों धर्मचार्यों का संवाद चल रहा था। द्वार पर दो संत खड़े थे। मुझे भीतर ले गए। आचार्य तुलसी की ओर चार आसन थे। एक मेरा आसन खाली था। किसने उनको सूचना दी कि मैं आऊंगा!

इस प्रकार के अनुभव तो मुझे लगभग हर एक यात्रा में होते थे। एक ओर मेरे बुआ सा. लाडऩूं में रहते हैं। उनको सदा मुझसे यही शिकायत रही कि मैं उनको कभी भी आने की सूचना नहीं देता था। जैसे विश्व भारती परिसर में सबको 2-3 दिन पहले मेरे आने की जानकारी होती थी। जयपुर बैठे का मेरा कार्यक्रम तय नहीं होता था। अब तो बुआजी भी मान गए – मैं गलत नहीं था।

एक अन्य घटना का उल्लेख भी करना चाहता हूं। मैं, परिवार, अपने गुरु स्व. देवीदत्त जी चतुर्वेदी एवं कार्यालय के वरिष्ठ सहयोगियों के साथ महामहिम राष्ट्रपति को हमारी पुस्तकों की प्रथम प्रति भेंट करने दिल्ली गया था। प्रात: जल्दी ही जयपुर के लिए रवाना होना तय हुआ। रात को सूचना मिली कि आचार्य महाप्रज्ञ महरौली में विराजे हुए हैं। हम उनके दर्शन करते हुए जयपुर जाने को रवाना हुए। महरौली में एक बड़ा जन सैलाब उमड़ रहा था। हम कुछ तय करते, उससे पहले ही एक-दो संतों की नजर हम पर पड़ गई, मानो वे प्रतीक्षा ही कर रहे थे। उन्होंने हमारे लिए मार्ग सुलभ कराया और कार भीतर ले गए। हम सबको आचार्यश्री के कमरे तक पहुंचाया और बाकी सभी अतिथियों को अनुरोध करके बाहर भेज दिया। मैं अभी भी उत्सुक था कि बात क्या है? मैंने निवेदन किया कि हम सब जयपुर जा रहे हैं। आचार्यश्री ने इतना ही इशारा किया कि अच्छा हुआ तुम आ गए, कार्यक्रम देखकर जाना। बाहर निकलकर मालूम किया तो पता चला कि आज उनका आचार्य पदारोहरण का कार्यक्रम है। मैं मन ही मन धन्य हुआ। आचार्यश्री को मन ही मन में उल्लसित होकर पुन: प्रणाम किया। एक संत हमारे साथ चल रहे थे। साथ वालों को दर्शकों में बिठाकर मुझे मंच तक पहुंचा गए। मुझे आश्चर्य तब हुआ जब कार्यक्रम के शुरू में अणुव्रत के अध्यक्ष शिवराज पाटिल और टीएन शेषन के बाद वक्ता के रूप में मेरा नाम पुकारा गया। मेरे बोलने के बाद कार्यक्रम शुरू हो गया। मैंने तब गुरु और शिष्य को एक-दूसरे में लीन होते देखा था। गुरु के हाथों शिष्य को गुरु बनते देखा। दुर्लभ हैं ऐसे दृश्य। ऐसी ही स्थिति तब भी बनी थी जब लाडऩूं में महामहिम राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा आए थे और मुझे बोलने का आदेश हुआ था। दोनों ही कार्यक्रमों में हमारे मंत्रियों की उपस्थिति भी थी।

मुझे सबसे बड़ा सुखद आश्चर्य तब हुआ था, जब सन् 2003 में मुझे सूरत में ‘आचार्य तुलसी सम्मान’ मिला था। आचार्यश्री ने अपने सम्बोधन में कहा था – ‘मुझे नहीं मालूम कि यह सम्मान गुलाब का हो रहा है या कि मेरा हो रहा है।’ कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री स्व. भैंरोंसिंह शेखावत ने बीच में माइक पकड़ते हुए कहा कि, ‘मुझे मालूम है कि यह सम्मान मेरा ही हो रहा है।’ स्नेह की वर्षा के मीठे पल थे। मैं भी आत्मविभोर था।

मैने आचार्य तुलसी और आचार्य महाप्रज्ञ दोनों से ही स्नेह अर्जित किया है। आचार्य महाप्रज्ञ के पास जयपुर प्रवास के दौरान नित्य प्रात: चार बजे ध्यान करने जाता था। विशेष बात यह थी कि आचार्यश्री घड़ी में चार बजे का अलार्म लगाया करते थे। जैसे ही अलार्म बजता, आचार्यश्री के मुंह से एक वाक्य निकलता था – ‘देखना गुलाब आ गया क्या?’ आप और क्या जानना चाहते हो? किसी भी दिन मैं देर से नहीं पहुंचा और नित्य लगभग तीन घंटे बाद आचार्यश्री मुझे आवाज देकर वापिस बुलाते थे। आंख खुलती तो देखता कि चारों ओर संत और श्रावक चर्चा करते रहते। आचार्यश्री इस बात से अति प्रसन्न थे कि किसी अन्य की आवाज मेरे ध्यान में बाधक नहीं होती थी। कहते भी थे – ‘मेरी आवाज से ही लौटेगा।’

आचार्यश्री जानते थे कि मैं अन्य गुरु के द्वारा अन्य उपासना क्षेत्र में दीक्षित हूं। उन्होंने कभी इस बारे में विरोध नहीं किया, बल्कि सरदारशहर प्रवास में मुझसे आग्रह किया कि अपने गुरुजी को साथ लेकर आना। मिलना चाहता हूं। और मैं लेकर गया, दोनों को मिलाया। नवरात्रि पर मेरे नौ दिन के एकान्तवास और जाप के अभ्यास की भी सदा चर्चा करते थे। साधना क्षेत्र के भी कुछ स्वर्णिम पक्ष होते हैं। आचार्यश्री भी मेरा ऐसा ही पक्ष थे। बाहर जीने के साथ भीतर बैठे रहना, स्वयं को समेटकर समष्टि भाव में जीना सिखा गए।

March 8, 2019

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवसः क्या चन्द्रमा सूर्य से स्वतंत्र हो सकता है?

पश्चिम के प्रभाव में दाम्पत्य सम्बन्धों की हमारी आध्यात्मिक पृष्ठभूमि धुंधली पड़ती जा रही है। भौगोलिक दृष्टि से पूर्वी प्रदेश अग्नि प्रधान तथा पश्चिमी देश सोमप्रधान क्षेत्र है। वहां के नर-नारी शरीर पर प्रकृति के प्रभाव एक समान नहीं हो सकते। एक-दूसरे की नकल के परिणाम या दुष्परिणाम भी सामने आते जा रहे हैं।

हमारी इस सृष्टि में निर्माण-स्थिति एवं संहार की प्रक्रिया सतत चलती रहती है। इस प्रक्रिया में कम से कम दो तत्त्व होते हैं द्ग ब्रह्म और माया। विज्ञान कहता है कि सृष्टि में दो तत्त्व मूल में हैं। एक पदार्थ तथा दूसरा ऊर्जा यानी मैटर और एनर्जी। दोनों एक दूसरे में बदलते रहते हैं, किन्तु इनका ह्रास नहीं होता। वेद भी ब्रह्म और माया को ही इन दो तत्त्वों के रूप में देखता है। आगे जाकर इन्हीं को अग्नि-सोम के नाम से व्यवहार किया जाता है। आकाश में ये ही सूर्य-चन्द्रमा हैं, पर्जन्य और सोम हैं, पृथ्वी और वर्षा भी यही हैं, नर-नारी भी इन्हीं का रूपान्तरित अग्नि-सोम रूप हैं। अर्थात् नर-नारी भी तत्त्व रूप हैं, मात्र देह नहीं हैं। अग्नि-सोम के इस तात्विक स्वरूप को योषा-वृषा कहते हैं।

समय के साथ नर-नारी के देह में तो कोई परिवर्तन नहीं आया, किन्तु चिन्तन और जीवन शैली में बहुत परिवर्तन आया है। यह परिवर्तन किस सीमा तक हितकर है तथा कहां जाकर विष उगलने लगता है, किसी को इसका आकलन करने का समय नहीं मिलता। सबसे बड़ी बात तो यह है कि स्त्री अपने भोग्या रूप को भी नहीं समझा पा रही और भोक्ता रूप में सफल भी नहीं हो पा रही। स्त्री (देह में) पुरुष के साथ स्वतंत्रता एवं समानाधिकार के साथ-जीने को उत्सुक है। उसे शायद स्वतंत्रता के अर्थ भी नहीं मालूम। क्या चन्द्रमा सूर्य से स्वतंत्र हो सकता है या पृथ्वी बिना वर्षा के औषधि और वनस्पति पैदा कर सकती है? इनको तो संवत्सर के तंत्र को शिरोधार्य करना ही पड़ेगा।

शरीर के साथ मन-बुद्धि-आत्मा (अध्यात्म) को भी सम्मिलित करना होगा। हम ऐसा नहीं करेंगे तो शरीरपरक मिथुन भाव तक ही सीमित रह जाएंगे। मानव देह तो पैदा कर सकेंगे, अभिमन्यु की कल्पना नहीं कर सकते। काम पुरुषार्थ की उस उदात्त अवधारणा का स्पर्श नहीं कर पाएंगे जो सृष्टि का मूल है। ‘कामस्तदगेे्र समवर्तताधि…’ अभिप्राय यह है कि जीव शरीरों के सृजन की प्रक्रिया केवल शरीर पर निर्भर नहीं है। वह दो मनों का मिलन तो है ही, दो आत्मरूपों का मिलन भी है। इसमें पिछले जन्मों के कर्मफल भी अपना प्रभाव डालते हैं। दाम्पत्य की भारतीय अवधारणा आत्मिक ही है, शारीरिक नहीं है।

पश्चिम के प्रभाव में दाम्पत्य सम्बन्धों की हमारी यह आध्यात्मिक पृष्ठभूमि धुंधली पड़ती जा रही है। भौगोलिक दृष्टि से पूर्वी प्रदेश अग्नि प्रधान तथा पश्चिमी देश सोमप्रधान क्षेत्र है। वहां के नर-नारी शरीर पर प्रकृति के प्रभाव एक समान नहीं हो सकते। एक-दूसरे की नकल के परिणाम या दुष्परिणाम भी सामने आते जा रहे हैं। विवाह-विच्छेद की बढ़ती घटनाएं, ‘लिव-इन-रिलेशन’ द्ग जैसी अवधारणाएं तथा समलैंगिकता जैसी मानसिक विकृतियां प्रकृति विरुद्ध आचरण ही तो है। इनको कानूनी मान्यता देना मानवता को पाशविक स्वच्छन्दता की ओर धकेलना ही है। परम्परागत विवाह संस्था तो आज मानो ‘आउट-डेटेड्’ हो गई। जबकि इस संस्था का वैज्ञानिक आधार सार्वभौमिक और सार्वकालिक है। मनुष्य जब पशु योनि से विकास की ओर बढ़ता है, तब विवाह का स्वरूप कुछ प्राकृतिक नियमों की वैज्ञानिकता को स्वीकारता है। ऐसी किसी समाज व्यवस्था पर नहीं ठहरता जिसे हम जब चाहें बदल डालें।

शिव का विश्व रूप ही अभ्युदय है और विश्व का शिव में लीन हो जाना ही नि:श्रेयस है। पहला निर्माण काल है, दूसरा निर्वाण काल। यही शिव-शक्ति का दाम्पत्य भाव है। यही भारतीय विवाह संस्कार की मूल अवधारणा है। नारी यज्ञ में भागीदार बनकर पत्नी का स्वरूप ग्रहण करती है। यही सृष्टि निर्माण की कामना का प्रथम ‘स्पन्द’ कहलाता है। शक्ति ही कामना बनकर आहुत होती है। दाम्पत्य रति ही निर्माण की भूमि बनती है। इसी से वानप्रस्थ में देवरति का प्रादुर्भाव होता है, जो निर्वाण का मार्ग प्रशस्त करती है।

नर आग्नेय है-सत्य है, नारी सौम्या है, ऋत है। केन्द्र रहित है। कामनाघन है। अभ्युदय ही इस कामना का लक्ष्य है। नर केन्द्र में जीना चाहता है। अंशी में लीन होने को जीवन भर आतुर रहता है। दाम्पत्य भाव में नर की प्रधानता गृहस्थी को अध्यात्म से जोड़े रखती है। नारी की प्रधानता भौतिक सुखों का जाल फैलाए रखती है। मन की चंचलता, आसक्ति, राग-द्वेष आदि क्लेशों में भी उलझी ही रहती है। भीतर आत्मा उसकी भी नर ही है, किन्तु लक्ष्य भोग ही रहता है, योग नहीं रहता।

यही नारी पत्नी रूप में संकल्पित होकर पति की शक्ति बन जाती है। पति को पूर्णता प्रदान करके स्वयं भी पूर्ण हो जाती है। दोनों का अद्र्धनारीश्वर स्वरूप पूर्णता को प्राप्त होता है। समय के साथ विरक्ति भी पत्नी ही पैदा करती है। यह कार्य अन्य नारी नहीं कर सकती। इसी विरक्त भाव के कारण पूर्णता प्राप्त ‘पति’ अपने नि:श्रेयस् मार्ग का चयन कर पाता है। शक्ति ही पुरुष शरीर में सदाशिव को प्रकट कर देती है। शरीर शव, आत्मा सदाशिव।

पश्चिम में विवाह के बाद भी पति-पत्नी एक-दूसरे के लिए, अर्थात् एकाकार होकर नहीं जीते। दोनों ही स्वतंत्र पहचान बनाकर जीना चाहते हैं। आगे चलकर यही चिन्तन विवाह विच्छेद का कारण बनता है। पूर्व में विवाह विच्छेद की अवधारणा शास्त्रीय तो कभी नहीं थी। आदिम जातियों में ही रही थी। यहां विवाह का उद्देश्य दोनों द्ग ‘अभ्युद और नि:श्रेयस’ रहे हैं। जीवन के 25 साल पूर्ण होने पर विवाह के साथ ही ‘गृहस्थाश्रम’ की शुरुआत होती है। नारी का पत्नी रूप में, नर के जीवन में प्रवेश होता है। वह नर के साथ जीने के लिए आती है। अपना सब कुछ छोडक़र ही आती है (नाम और पहचान भी)। नारी सौम्या है और अग्नि में पूर्णरूपेण आहुत होने आती है। फिर से माता-पिता के घर में जाकर जीना उसका स्वप्न नहीं होता।

तब जीवन के शेष 75 साल उसको पति के घर में क्या करना है? पहले तो उस घर में अपना स्वामित्व स्थापित करना है। पति को अपने वशीभूत करना है, ताकि वह हर सलाह को स्वीकार कर सके। इसके लिए पति को रिझाना उसका पहला और अनिवार्य कर्म होता है। वह पति की ‘शक्ति’ है। उसे दाम्पत्य रति-वात्सल्य, स्नेह, श्रद्धा, प्रेम का अभ्यास कराती है। उसके अग्नि प्रधान जीवन में इन गुणों का स्थान कहां हो सकता है? वह अपने माधुर्य और लालित्य के सहारे उसमें मिठास घोलने का प्रयास करती है। उसे भी स्त्रैण बनाने का प्रयास करती है। यही तो पुरुष का वह निर्माण है, जो निर्वाण की पृष्ठभूमि है। विवाह पूर्व जो व्यक्ति स्वच्छन्द था, नारी साहचर्य से अनभिज्ञ था, कोरा पत्थर था-संवेदनाहीन था, उसे कड़ुवे-मीठे बोल से पूर्णता देती है। उसके अधूरेपन की पूर्णता उसकी स्वयं की पूर्णता बन जाती है। सही अर्थों में वही नर की भोक्ता है। जीवन के 25 वर्षों में पुरुष का निर्माण ऐसे करती है कि 50 वर्ष की उम्र में पुरुष के मन में एक विरक्ति का भाव भी पैदा कर देती है। उसके जीवन के निर्माण क्रम से बाहर होकर उसे निर्वाण पथ पर खड़ा कर देती है। यहां से जीवन का तीसरा आश्रम-वानप्रस्थ शुरू हो जाता है। अब दोनों पूर्ण भी हैं और मित्र भी हैं।

वानप्रस्थ गृहस्थ कार्यों से मुक्ति का काल है। धारणा-ध्यान-समाधि-सेवा के अभ्यास का काल है। मन में विरक्ति का भाव यदि नहीं आया, तो व्यक्ति कभी वानप्रस्थ को सही रूप में सार्थक नहीं बना सकता। यह कार्य तो न स्वयं व्यक्ति ही कर सकता है, न कोई अन्य नारी ही कर सकती है। अन्य नारी तो आसक्ति ही पैदा करेगी, चंचलता पैदा करेगी। तब कहां ध्यान और कहां समाधि?

पत्नी वानप्रस्थ में पति के मन को प्राण और वाक् (सृष्टि क्रम) से हटाकर आनन्द-विज्ञान (मोक्ष साक्षी क्रम) से जोड़ती है। आध्यात्मिक दाम्पत्य रति को आधिदैविक देवरति में प्रेरित करती है। जीवन का लक्ष्य पुरुषार्थ (धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष) ही तो है। कामनामुक्त व्यक्ति ही मोक्ष प्राप्त करता है। नारी या नर दोनों ही अकेले रहकर कामनामुक्त नहीं हो सकते। यही आज पश्चिम की मूल समस्या है। न अकेले रह सकते, न दूसरे का बनकर ही रह सकते। एक साथी से विरक्त होते ही दूसरे की तलाश शुरू हो जाती है। जीवन आहार-निद्रा-भय-मैथुन में बंधकर रह जाता है। अभ्युदय प्राप्त हो जाता है। नि:श्रेयस उनके चिन्तन का विषय ही नहीं होता। हमें इससे बचना है। दाम्पत्य सम्बन्धों की अपनी आध्यात्मिक पृष्ठभूमि की उज्ज्वलता को बनाए रखना है। तभी हम विश्व को बता पाएंगे कि नारी क्या है और क्या कर सकती है?

March 4, 2019

समर्पित करें अहंकार!

अग्रि-सोम-इन्द्र तीनों त्रिलोकी के अधिपति हैं। तीनों मिलकर- ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र – प्राणी मात्र का अन्तरात्मा महेश्वर है। यही रुद्र है – एक घोर रूप, एक शिव रूप। यही सूर्य का जनक है। तत्व रूप में प्रत्येक शरीर में निवास करता है। इन्द्र की प्रधानता से यह महेश्वर, सोम की प्रधानता से महादेव तथा अग्नि की प्रधानता से रुद्र है। सोम रूप महान् ने वायु रूप ओज भर दिया इन्द्र में, सूर्य में ज्योति को पैदा किया। सूर्य ही जगत् का पिता कहलवाया। अध्यात्मभाव में इन्द्र का अंश सूर्य से निकलकर बुद्धि के रूप में विज्ञान आत्मा बनता है। तीन अक्षर प्राणों के योग से त्रिनेत्र या त्र्यंबक बनते हुए हृदय रूप (हृ-इन्द्र, द-विष्णु, य-ब्रह्मा) बनते हैं। पुराणों में इन्द्र को महेश कहा गया है। ‘‘अग्रिर्वा रुद्रस्तस्य द्वे तन्वौ घोरान्या च शिवान्या च’’। यही सूर्य रूप तपते हैं। अग्रि-इन्द्र-वरुण रूप कार्य करते हैं। सूर्य का ही नाम सत्यनारायण (विष्णु) है। विष्णु ही यज्ञ कहलाते हैं।

सूर्य ही शिव है। चारों ओर जल समुद्र है। किरणें ही केश हैं और उनका जल ही इनको गंगाधर बनाता है। ललाट पर चन्द्रमा है, तो यह चन्द्रशेखर हैं। घोर अग्रि के द्वारा की गई जितनी भी खराबी है उसको सोम रूप से शान्त कर देता है। अत: शिव, शंकर, शंभु कहलाता है।

सूर्य प्रतिबम्ब से महत् में जीव की अहंकृति बनती है। अत: शिव को अहंकार का अधिष्ठाता कहा जाता है। चन्द्रमा तथा पृथ्वी के प्रतिबिम्ब से क्रमश: प्रकृति और आकृति बनती है। अहंकार ही बुद्धि का जनक है, जो तापधर्मा है, उष्ण है। सृष्टि कर्म में प्रकृति अहंकार – अभिमान रूप में ही कर्म करने की, फल प्राप्त करने की कामना पैदा करती है। कर्म करना तो हमारे हाथ है, फल हम पैदा कर नहीं सकते। कामना पूर्ण नहीं हो तब आवेश या क्रोध आता है। क्योंकि मन में स्वयं को सर्वोपरि मान बैठता है। कृष्ण कहते हैं कि कर्ता मत बनो। अहंकार एक ओर ठेस लगाता है, धैर्य और धृति कम करता है, प्रमाद बढ़ाता है। जीवन को भारभूत कर देता है। जीवन की मूच्र्छा है। इसी को बुद्धिनाश, विवेकशून्यता अथवा बुद्धि का आत्मयोग से वंचित हो जाना कहते हैं। बुद्धि भी तो उसी अहंकार से पैदा होती है। अहंकार से कर्ता का मिथ्या भाव जीव के चित्त में स्थान बना लेता है। उसका आत्मभाव सुप्त हो जाता है। व्यक्ति बाहरी विश्व में लीन हो जाता है।

भौतिक जीवन का लक्ष्य भोग है, आध्यात्मिक साधनों का लक्ष्य मोक्ष है। यही हमारे मन की दो धाराएं हैं। मन ही किसी धारा में फैलता है, वही सिकुड़ता है। अहंकार ही पतन की शुरुआत है। अहंकारी किसी दूसरे को नहीं, स्वयं को खत्म कर लेता है। अहंकार का कोप पीढिय़ों को भोगना पड़ता है। अहंकार ही व्यक्ति को रावण बनाता है। शिव से प्राप्त शक्ति के अहंकार से ग्रस्त होकर कैलाश पर्वत को उठाने चला था। शिव से वर प्राप्त करके भस्मासुर शिव को ही भस्म करने दौड़ पड़ा था। वैसे ही आज जनता जनार्दन से शक्ति प्राप्त करके जनप्रतिनिधि जनता को ही छीलने में जुट जाते हैं। भगवान के संहार करने का यह भी एक स्वरूप है। इससे मुक्त भी वे ही कर सकते हैं। वे ही अग्रि-सोम अद्र्धनारीश्वर हैं, सृष्टि स्वरूप हैं। सम्पूर्ण सृष्टि शिव रूप है, शिवमय है। चूंकि सूर्य ही आशुतोष है, अत: प्रतिदिन शिवरूपी सूर्य का ही पूजन किया जाता है। चूंकि अहंकार एक शक्तिशाली अभिव्यक्ति है। अत: इससे मुक्त होने के लिए श्रम के साथ तप की भी आवश्यकता होती है। स्वयं सूर्यनारायण निरंतर तपते हैं। नए स्वरूप को (आधिदैविक, आधिभौतिक, आध्यात्मिक) प्राप्त करने के लिए भीतर जगह बनानी पड़ती है। प्राणों को बाहर प्रतिष्ठित करना, अपने प्राणों का समर्पण करना ही तप है।

हमें स्वयं को रिक्त करना है उन सभी उपाधियों से जो अन्य लोग हमें देते हैं – नाम, धर्म, प्रशंसा, धन, ज्ञान, यश आदि। ‘मैं’ का समर्पण बिना दृढ़ संकल्प के, तपन के संभव नहीं है। महाशिवरात्रि पर्व इसी संकल्प को दोहराने, आत्मशुद्धि करके भीतर शिव रूप में स्वयं को प्रतिष्ठित करने का पर्व है। आइए! हम सब मिलकर शिव (सूर्य) से प्रार्थना करें कि ‘जो मन जागते हुए मनुष्य से बहुत दूर तक चला जाता है, वही द्युतिमान मन सुषुप्ति अवस्था में सोते हुए मनुष्य के समीप आकर लीन हो जाता है तथा जो दूर तक जाने वाला और जो प्रकाशमान श्रोत्र आदि इन्द्रियों को ज्योति देने वाला है, वह मेरा मन कल्याणकारी संकल्प वाला हो।’

यज्जाग्ग्रतो दूरमुदैतिदैवन्तदुसुप्प्तस्यतथैवैति।।
दूरङ्गमञ्ज्योतिषाञ्ज्योतिरेकन्तन्न्मेमन शिवसङ्कल्प्पमस्तु।।

‘‘कर्मानुष्ठान में तत्पर बुद्धिसम्पन्न मेधावी पुरुष यज्ञ में जिस मन से शुभ कर्मों को करते हैं, प्रजाओं के शरीर में और यज्ञीय पदार्थों के ज्ञान में जो मन अद्भुत पूज्य भाव से स्थित है, वह मेरा मन कल्याणकारी संकल्पवान् हो।’’

येनकर्म्माण्यपसोमनीषिणोयज्ञेकृण्वन्तिव्विदथेषुधीरा:।।
यदपूव्र्वंय्यक्षमन्त: प्प्रजानान्तन्न्मेमन शिवसङ्कल्प्पमस्तु।।६।।

आज देश को शिव रूप कल्याणकारी संकल्प की अत्यन्त आवश्यकता है। चारों ओर अहंकार, अपराध, अनर्गल-मर्यादाहीन आचरण के प्रकोप बढ़ रहे हैं। लंका किसी को जलती हुई दिखाई नहीं पड़ रही। बिना आध्यात्मिक धरातल के प्रज्ञा शून्य हो रहा है शिक्षित वर्ग भी। सींचने का कार्य, निर्माण कार्य शीतलता से, प्रेम की आहुति से, प्राणों की तपन से होता है। शिव से आज संकल्प की दृढ़ता मांगें! नमो शिवाय:!

June 26, 2016

पहले देश फिर हम

चर्चा है कि ब्रिटेन आजाद हुआ। एक परम्परावादी, संकीर्णता के लिए जाना जाने वाला देश, अनेक देशों पर शासन करने वाला ब्रिटेन आज के समय के अनुसार बदलने को तैयार नहीं है। दूसरी ओर विकासवादी युवा वैश्वीकरण के साथ जीना चाहता है। युवावर्ग में 73 प्रतिशत यूरोपीय यूनियन के साथ रहना चाहता है। इसके अलावा 18 वर्ष से कम आयु का युवा भी मतदान का अधिकार पाने को आतुर है। बुजुर्ग कहते हैं कि वैश्वीकरण में हमारी पहचान-संस्कृति-खो जाएगी। जिस तरह से बाहरी लोग ब्रिटेन में घुस गए और स्थानीय नौकरियों में घुस गए, वह तो युवावर्ग के भविष्य पर बड़ा खतरा है। जैसे हमारे देश में करोड़ों बांग्लादेशी घुस आए हैं। अपराधों की संख्या बढ़ गई है। बेरोजगारी का ग्राफ आसमान छूने लगा है। हमारे यहां तो लगभग सभी पड़ौसी देशों के नागरिक अवैध रूप से रहते मिल जाएंगे। हर सरकार इसको अपनी उपलब्धि मानती आई है। अमरीका की राजनीति में इसका असर तुरंत हुआ है। रिपब्लिकन पार्टी के राष्ट्रपति पद के संभावित उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रम्प ने प्रतिक्रिया में जो कहा, वह चिन्तन करने लायक है। उन्होने कहा-यह महान रोमांचक और ऐतिहासिक परिणाम है। ब्रिटेनवासियों ने ईयू को छोड़कर अपना देश वापिस ले लिया। इसी तरह हम भी अमरीका को वापस लेंगे। अर्थात सभी प्रकार की सरकारों को जनता की मर्जी से चलना होगा।

ब्रिटेन का अलग होना कोई साधारण घटना नहीं है। एक ओर इसको पड़ौसी देशों से व्यापार, उद्योग एवं अन्य आदान-प्रदान में अन्तर्राष्ट्रीय मर्यादाओं का पालन करना पड़ेगा, वहीं दूसरी ओर इसे विखण्डन के लिए भी तैयार रहना पड़ेगा। स्कॉटलैण्ड जैसे देश जहां अधिकांश नागरिक यूरोपीय यूनियन में रहने के समर्थक हैं, ब्रिटेन से अलग भी हो सकते हैं। साथ रहने के पक्ष में तथा विपक्ष में बहुत अन्तर नहीं है। साथ 48.1 प्रतिशत तथा अलग 51.9 प्रतिशत में 16-17 वर्ष के युवा शामिल नहीं हैं। वरना अलग हो ही नहीं पाते। अगले 2-3 सालों में साथ रहने वालों का प्रतिशत बढ़ जाएगा। वैश्वीकरण तो हावी रहेगा ही।

विश्व का भविष्य युवा वर्ग के हाथ में है। वह अभी वैश्वीकरण की चकाचौंध में है। उसकी जीवन शैली एक प्रवाह में बह रही है। वह विदेशी जीवन के अनुभवों, प्रयोगों एवं आधुनिकीकरण के बीच जीना चाहता है। उसे कभी-कभी भारतीय परम्पराएं भी याद आती हैं, किन्तु कब तक? जिस देश में कपिल सिब्बल जैसे अवतारी पुरुष नीति निर्धारकों में बैठे हों, तब लिव-इन-रिलेशन, समलैंगिकता का जीवन, 16 साल की उम्र में कन्याओं को शारीरिक सम्बन्धों की छूट के कानून हमारी संस्कृति को तार-तार कर देंगी। माननीया स्मृति ईरानी ने घोषणा की है कि हमारे विश्वविद्यालयों का पाठ्यक्रम सात विदेशी विश्वविद्यालयों का समूह तय करेगा। सिखा देना सनातन संस्कृति!

ब्रिटेन में भी यही द्वन्द्व चलेगा। और नई पुरानी पीढ़ी के बीच जीवन शैली का टकराव बढ़ेगा। पुरानी पीढ़ी जीत नहीं पाएगी। घटती भी जाएगी। तब क्या संस्कृति विकास की भेंट चढ़ जानी चाहिए? पैसों की खनक में इसकी आवाज खो जानी चाहिए? देश कोई भी हो, शक्ति तो संस्कृति में रहती है। ब्रिटेन के उदाहरण ने एक बहुत महत्वपूर्ण पहलू उजागर किया। युवा वर्ग का मतदान में भाग लेने का। वोट कितना कीमती या अमूल्य है, यह बात प्रत्येक युवा के जहन में बैठ जानी चाहिए। वही कर्णधार है देश का।

हमारे लिए ब्रिटेन का उदाहरण बहुत महत्वपूर्ण है। इसमें सांस्कृतिक परिपक्वता तो है, किन्तु भविष्य कंटकों से भरा है। युवा के चुभेंगे ये कांटे। हमारे युवा वर्ग को भी जाग जाना चाहिए। हमारे यहां तो संस्कृति और संविधान दोनों की धज्जियां उड़ रही हैं। युवा मौन है। क्यों? आपने पढ़ा होगा कि चालीस लाख अवैध प्रवासियों के सवाल पर अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा और सर्वोच्च न्यायालय के बीच ठनी हुई है, इन दिनों। किन्तु ओबामा ने न्यायपालिका को धमकाने अथवा अपमानित करने का कोई प्रयास नहीं किया। और हमारे यहां-? चयनित सरकारों को बर्खास्त करके हड़पने के जो प्रयास होते रहे हैं, क्या वे संविधान सम्मत हैं-?

हमारे पास समय कम है। युवा वर्ग को सारे भेद भुलाकर कमर कस लेना है। इस देश की संप्रभुता और अखण्डता पर कोई खतरा न आए। हमें भी ब्रिटेन जैसा दिन न देखना पड़े। इसके लिए युवा वर्ग को गंभीर हो जाना चाहिए। हम समय के साथ भी रहें और मूल्यों की ताकत भी कम न होने पाए। हम वैश्वीकरण के अलावा हमारी ज्ञान परम्परा या विरासत को केन्द्र में रखकर दूसरों से आगे भी दिखाई पड़ें। ये विरासत अन्य किसी भी देश के पास नहीं। इसको ठेस पहुंचाने वाली प्रत्येक नीति का युवा वर्ग पुरजोर विरोध करे। पहले देश-फिर हम। वरना ब्रिटेन के युवा की तरह मुंह बांए खड़े रह जाएंगे। हमारे इरादे बहुमत के गुलाम को जाएंगे। आज भी हमने जिनको केन्द्र या प्रदेशों में बहुमत दिया, वे हमको गुलाम ही मान रहे हैं। युवा मौन है। कब तक-? क्या बचेगा पीछे वालों के लिए-उद्योगों को विदेशी खरीद लेंगे। किसान जहर उगलेगा, जमीनें रहेंगी नहीं। न रोटी, न पानी, न दवा, न हवा। युवा को जागना ही पड़ेगा, नहीं तो देश हाथ से निकल जाएगा।

February 25, 2014

समलैंगिकता-6

ब्रह्मचर्य का अर्थ मनोभावों का नियंत्रण होता है। इसी से ओज पैदा होता है।

आत्मा के संस्कारों को भी समझने की आवश्यकता है। क्या कारण है कि एक शरीर का आत्मा उसी तरह के शरीर वाले आत्मा की ओर आकर्षित हो रहा है। दोनों ही प्रकृति दत्त ही तो है। वे आपस में आकर्षित कैसे हो रहे हैं? यज्ञ के सिद्धान्त के विपरीत प्रकृति कैसे काम कर रही है? आकर्षित होने का (बाहर दिखने वाला) एक कारण तो यह है कि समाज की तरफ से स्त्री-पुरूषों के मिलने पर तो रोक लगी रहती है। पुरूष और पुरूष के तथा स्त्री और स्त्री के मिलने पर कोई रोक नहीं है। तो समलैंगिकता सहज सुलभ हो जाती है। विषमलिंगता सहज सुलभ नहीं होती। एकान्त में दो पुरूष आपस में बैठे हैं तो किसी को कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन एक स्त्री और एक पुरूष बैठे हैं तो समाज सवाल करेगा कि अकेले में क्या कर रहे हैं ये लोग। स्त्री-पुरूष की निकटता पर जो रोक लगी है तो उस पर पुरूष सोचता है कि पुरूष-पुरूष की निकटता पर ऎसी कोई रोक ही नहीं है। तब अपनी इच्छा यहां पूरी करो। अत: यह कारण बन जाता है ऎसे सम्बन्धों का। स्त्री-पुरूष की निकटता पर रोक का भी कारण है कि वहां प्रजनन हो सकता है। इस खतरे के कारण रोक है।

दुनिया में ऊंचे पदों पर बैठे लोगों में भी क्या हो रहा है-अमरीका-फ्रांस-इटली के प्रसंग सामने आए हैं। भोग का ऎसा स्वरूप सत्ता से जुड़ा हुआ है। भोग ही सत्ता का पर्यायवाची है। इस समस्या का समाधान कहीं नजर नहीं आता। ध्यान का मार्ग भी सुझाया जाता है-समाधान के तौर पर। लेकिन ध्यान भी प्रतिक्रिया कर जाता है। आप तीन दिन ध्यान करें उसके बाद तीन दिन भोग की तीव्र इच्छा होगी। क्योंकि आपका ध्यान प्रकृति की प्रवृत्ति को दबाने में व्यस्त था। जैसे ही आपने दबाने के प्रयास हटाए तो एकदम विस्फोटक प्रतिक्रिया हुई।

आज हम ध्यान में “कांशियसली”-प्रवृत्ति को दबाने का प्रयास कर रहे हैं और इसे ध्यान कह रहे हैं! यह ध्यान नहीं है-“सपे्रशन का”, दबाने का प्रयास है। ऎसे ही ध्यान से भोग सम्बन्धी व्यभिचार भी निकलते हैं। ओशो जैसे संत-विचारक बदनाम ही इसलिए हुए कि उनके “ध्यान” का विचार केन्द्र ही खुलेआम यही था। जहां भावनाओं का प्रवाह एक पक्षीय हो, व्यक्ति का निर्माण बुद्धि से नही बल्कि दिल से निर्देशित हो, वहां भी व्यक्ति प्रवाह पतित हो जाता है। संगीत-नृत्यादि कलाओं के क्षेत्र में ऎसे उदाहरण मिल जाते हैं। क्या चित्त की दशा और दिशा पर भी ग्रहों का प्रभाव पड़ता होगा? क्या प्रभाव से प्रारब्ध का भी सम्बन्ध है? क्योंकि इस दशा का प्रभाव प्रत्येक दिशा में पड़ता है। सम्पर्क में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति पर पड़ता है। पूरा वातावरण ही कम्पायमान हो जाता है। इस दशा का मूल कारण वासना होती है। काम-क्रोध जैसे नकारात्मक प्रकरण वासना रूप ही हैं। इनमें ब्रह्मचर्य का अभाव किसी भी साधन की सिद्धी नहीं होनेे देता। जितने भी सूक्ष्म (अक्षर) देवी अथवा व्यावहारिक प्रभाव हैं, वे सर्वप्रथम पूर्ण संयत वीर्य में ही अपना असर पैदा करते हैं। “ब्रह्मचर्य प्रतिष्ठायां वीर्य लाभ:”-योग सूत्र। ब्रह्मचर्य से अशक्य कार्य भी किए जा सकते हैं। भीष्म, हनुमान जैसे पुरूष इसी के उदाहरण हैं। वेद विद्या सरस्वती भी ब्रह्मचारिणी रूप में ही उपास्य है। इसीलिए विद्यार्थियों के लिए भी ब्रह्मचर्य अनिवार्य कहा है।

ब्रह्मचर्य का विनाश ही वेद विद्या के लोप होने का कारण रहा है। कामुक व्यक्ति के पास वेद विद्या नहीं रह सकती। जैसे प्रकाश और अंधकार विरोधी होते हैं। दतिया स्वामी ने लिखा है कि आलस्य, प्रमाद, कुचेष्टा आदि दुर्गुण ब्रह्मचर्य के अभाव में ही उत्पन्न होते हैं। धैर्य का भी नाश होता है। अत: गम्भीर और विचारात्मक भावों से जुड़े कार्य हैं, वे कामुक व्यक्ति नहीं कर सकते। शिक्षा के साथ ब्रह्मचर्य का सम्बन्ध अग्नि और दाह की तरह है, नित्य है। साधक के पतन का कारण कामिनी है। “मरणं बिन्दु पातेन जीवनं बिन्दु धारणात्” वीर्य का धारण ही जीवन है और बिन्दु का पात ही मरण है। ब्रह्मचारी मृत्यु पर विजय प्राप्त कर लेता है। ब्रह्मचर्य के अभाव से सद्विद्याओं का लोप, निर्लज्जता का आधिक्य होता है। “कामातुराणां न भयं न लज्जा।” ब्रह्मचर्य ही निर्भयता का सूत्र है। निर्भयता का अर्थ उच्श्खलता नहीं है, स्वतंत्रता भी नहीं कह सकते। ब्रह्मचारी को पूर्ण स्वातं˜य प्राप्त होता है। आपत्तियों को सहन करना, संघर्ष करने की क्षमता ब्रह्मचर्य से प्राप्त होती है। इन्द्रिय निग्रह ही वीरता का प्रमाण है।

ब्रह्मचर्य का अर्थ मनोभावों का नियंत्रण होता है। इसका परिणाम शुक्र संग्रह भी है। इसी से ओज पैदा होता है। ओज से मन का निर्माण होता है। मन में ही इच्छाएं पैदा होती हैं। इच्छाओं की पूर्ति ही जीवन का विकास है। इच्छाओं की गुणवत्ता, गंभीरता ओज तथा मन के स्वरूप पर निर्भर करता है। समलैंगिकता के संदर्भ में ब्रह्मचर्य की विकृति ही प्रमुख है। यांत्रिक क्रिया के कारण मन तो मृत प्राय: ही रहता है। साथी बदलता रहे तो भी भाव में अन्तर नहीं आता। सारा क्रम निष्परिणाम होता है। इससे बड़ी विकृति क्या हो सकती है! आप बिना किसी परिणाम की कामना के कोई कार्य करें, तो ये बेवकूफी है। क्षणिक सुख, वह भी मात्र भ्रान्ति, जीवन को अर्थहीन, महत्वहीन तथा ऎश्वर्यहीन बना देता है।

– गुलाब कोठारी

February 24, 2014

समलैंगिकता-5

दुनिया में कोई विचारधारा ऎसी नजर नहीं आती जहां संयम की बात न की गई हो।

सारे संसार में सबसे सरल और सहज सुख प्राप्ति का उपाय सेक्स है। अन्य कार्यो में तो सुख के लिए मेहनत करनी पड़ती है। पैसा कमाने में मेहनत करनी पड़ती है। लेकिन यह प्रकृति का दिया आपके पास ऎसा धन है कि आप उसका उपयोग कर रहे हैं और आपको आनन्द आ रहा है। इसलिए संसार की सारी परम्पराओं में संयम की बात की गई है। उस संयम का क्या प्रयोजन है। संयम का प्रयोजन मनुष्य को पुरूषार्थी बनाना है। तू मुफ्त में मत खोज कुछ-यानी पुरूषार्थी बन! इसका प्रभाव व्यक्ति पर, परिवार पर, समाज पर और राष्ट्र तथा पूरी मानव जाति पर पड़ता है। क्या मानव जाति को भोग विलास के प्रवाह में लाकर पुरूषार्थहीन बनाना चाहते हैं!

आचार्य महाप्रज्ञ ने उपनिषद के आधार पर कहा-ये सेक्स की प्रक्रिया हमारे नर्वस सिस्टम पर क्या प्रभाव डालती है। नर्वस सिस्टम को शिथिल बनाती है। इस शिथिलता के कारण हम संसार के झंझावतों को सहन करने में असफल होते हैं। हर आत्महत्या के पीछे नर्वस सिस्टम की वीकनेस होती है। नर्वस सिस्टम मजबूत होगा तो व्यक्ति आत्महत्या नहीं करेगा, मुसीबत को सहन करेगा। सामना करेगा उसका। नर्वस सिस्टम के कमजोर होने में भोग बड़ा कारण है। कठोपनिषद में कहा है-“सर्वेन्द्रियाणाम् चरयन्ति तेजो।” भोग इन्द्रियों के तेज को क्षीण करता है। इन्द्रियों के तेज क्षीण होने का मतलब व्यक्ति का ही तेज क्षीण हो गया। इन्द्रियों का तप गायब हो गया। वही तप संयम है। संयम और तप पर्याय हैं। दुनिया में कोई विचारधारा ऎसी नजर नहीं आती जहां संयम की बात न की गई हो। चाहे वह विचारधारा राजनीतिक हो, सामाजिक हो अथवा धार्मिक हो। मार्क्सवादी भी संयम की बात करेगा। उच्छृंखलता का तो कहीं सवाल ही नहीं, वरना समाज ही नहीं बनेगा।

मनु ने एक श्लोक और दिया-“न मांसभक्षणे दोष: न मद्ये न च मैथुने प्रवृतिरेषभूतानां निवृत्तिस्तुमाफला।” मांस भक्षण में कोई दोष नहीं। मद्य-मैथुन में भी कोई दोष नहीं क्योंकि यह मनुष्य की सहज प्रवृत्ति है। लेकिन इस में संयम बरतना, उसका बहुत बड़ा फल है। इन तीनों में यज्ञ की दृष्टि से हमने क्या किया। शास्त्रों में मनुष्य के मांस भक्षण की जो प्रवृत्ति है उसे यज्ञ तक सीमित कर दिया। कहा कि यज्ञ में पशु आलम्बन होगा उससे जो मांस लिया जाएगा, वहीं लिया जाएगा। यज्ञ के बाहर मांस नहीं लिया जाएगा। अत: मांस भक्षण की प्रवृत्ति का सीमाकरण हुआ यज्ञ में पशु आलम्बन से। मद्य के लिए कहा-“सौत्रामण्याम् सुरा पिबेत।” सौत्रामणि यज्ञ होगा तभी शराब पिएगा। इससे पहले या बाद में नहीं पिएगा। मैथुन का नियंत्रण विवाह संस्था से किया। यह पति-पत्नी के बीच सन्तान उत्पत्ति के लिए होगा, उससे बाहर नहीं होगा। यह मानकर कि मनुष्य में ये सहज होते हैं, वैदिक परम्पराओं में इनका निषेध नहीं किया। एक प्रतिशत की अनुमति देकर निन्यानवे प्रतिशत को रोका। पशु व्यवहार से मनुष्य को रोका। सभी परम्पराओं में, चाहे वह कोई भी विचार धारा हो-यह पशु प्रवृत्ति रोकना मूल बात है। असंयम से “सिस्टम” कमजोर हो जाता है, भंग हो जाता है और आदमी कायर-भीरू हो जाता है।

आजकल यह जो चल रहा है कि स्त्री और पुरूष ने तीन-चार बार तलाक दिए और अब फिर किसी अन्य के साथ हो लिए। यह एक प्रकार की सामाजिक अराजकता है। ऎसी अराजकता अन्य जीवों में-पशु-पक्षियों में भी सामान्यत: नहीं मिलती। वहां भी प्रजनन के उद्देश्य से सम्बन्ध बनते हैं। कुछ जीवों में अंग भंग या अंग विच्छेद होने पर टूटा हिस्सा नए जीव में विकसित हो जाता है। कुछ जीवों में नर-मादा की भूमिका एक ही शरीर में सम्पन्न हो जाती है। लेकिन समान जीवों में नर-नर अथवा मादा-मादा में संसर्ग के उदाहरण नहीं मिलते। उच्छृंखल, प्रकृति विरोधी व्यवहार के परिणाम में यौन रोगों सहित अन्य व्याधियां भी भोगनी पड़ती है।

चिकित्सा विज्ञान की दृष्टि से न्यूरोलाजिस्ट और साइकियाट्रिस्ट, साइकोलोजिस्ट यह स्पष्ट कर सकते हैं कि वे सामान्य यौन व्यवहार और असामान्य यौन व्यवहार के मामलों में पड़ने वाले प्रभावों के अन्तर को किस तरह देखते हैं। वे असामान्य व्यवहार वालों की मानसिकता में क्या अन्तर पाते हैं। – क्रमश:

– गुलाब कोठारी

February 22, 2014

समलैंगिकता-4

पाप-पुण्य का सम्बन्ध सुख-दु:ख से नहीं हैं, आत्मा की मलिनता और निर्मलता से है।

स्त्री-पुरूष की एक विशेष संरचना है। वही संरचना प्रजनन क्रिया को जन्म देती है। आकर्षण भी उसी प्रक्रिया से होगा। विपरीत भाव में ही आकर्षण होगा। इसका मनोविश्लेषण यूं भी किया जा सकता है कि जब हम विपरीत से भयभीत हो जाते हैं तो समलिंगी हो जाते हैं। विपरीत से भय लगता है क्योंकि हम उसको सह नहीं पाते, पचा नहीं पाते। समान से भय नहीं लगता है। क्योंकि वह मेरे जैसा ही है तो कोई डर की बात नहीं है।

यह भाव तो तब है जब दो बराबरी की समझ वाले आपस में समझौता कर आगे बढे लेकिन बच्चों को बिगाड़ने की कोशिश हो रही है। इन बच्चों को जीवन निर्माण के मार्ग पर बढ़ाने के बजाय पटरी से उतार रहे हैं और वह भी किस उम्र में! उनकी उम्र तो सोचने की भी नहीं है। फिर धीरे-धीरे वे सिगरेट-शराब भी पीना शुरू कर देंगे। उसे ये सब चीजें सिखा दोगे तो बच्चा भाग कर पास आएगा इन लतों के वशीभूत होकर। तो यह तो समाज का विघटन ही हो रहा है। सारे धर्म पतित हुए इस एक कर्म से। स्कूली बच्चों को फुसलाकर उनका आचरण भंग कर रहे हैं। संस्कृति का अपभ्रंश होता दिख रहा है। ये बच्चे बड़े होकर क्या करेंगे।

स्त्री-पुरूष जब आपस में जुड़ते हैं और संतान होती है तो उसके साथ एक दायित्वबोध भी जुड़ता है। जब दो समान व्यक्ति जुड़ते हैं तो कोई दायित्वबोध तो है ही नहीं। जब तक साथ हैं तब तक हैं। उसके बाद कोई दायित्व न इस पर है न उस पर। इसमें न यज्ञ है, न निर्माण है और न ही दायित्व का बोध ही है। और न पूर्णता है। कभी जैन साधुओं के बीच यह विचार रखना चाहिए कि ये पांचों जो व्रत हैं उनकी प्रक्रिया एक जैसी नहीं है। अहिंसा अलग तरह का व्रत है और ब्रह्मचर्य अलग तरह का व्रत है। इस अर्थ में अहिंसा अलग है कि आप अगर मुझे चांटा मारें तो मुझे दु:ख होता है कि आपको मुझे चांटा नहीं मारना चाहिए। लेकिन ब्रह्मचर्य में क्या होगा कि आप अगर मेरे साथ सहचर्य करोगे तो मुझे भी आनन्द आता है, आपको भी आनन्द आता है। अब इसमें क्या बुराई है। अत: यह ब्रह्मचर्य का मामला अहिंसा से अलग तरह का है। इसमें दोनों पक्ष को सुख होता है। दु:ख तो किसी को होता ही नहीं। फिर इसको क्यों निषेध किया जा रहा है। आप मुझे सुई चुभाओं मैं आपको सुई चुभो दूं तो दोनों को दु:ख है। लेकिन आपसी समझौते से सहचर्य से तो दोनों को सुख है। यहां क्या कसौटी लगाएंगे कि ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए, इसका क्या कारण दोगे? समलैंगिकता के मामले में भी तो यही कहा जा रहा है कि आपस में सहमति से कर रहे हैं तो किसी को क्या लेना-देना!

पाप-पुण्य का सम्बन्ध सुख-दु:ख से नहीं हैं, आत्मा की मलिनता और निर्मलता से है। दोनों को सुख मिल रहा है यह अलग बात है लेकिन दोनों की आत्मा मलिन हो रही है। इस कारण यह निषिद्ध है। दु:ख और सुख तो आत्मा का विषय ही नहीं है। अनुभूति वहां तक जाती ही नहीं है। इसीलिए जैनों ने बड़ा स्पष्ट कहा है, उन्होंने राग को पाप माना। दु:ख-सुख का इससे सम्बन्ध नहीं है। आसक्ति पाप है। दोनों को सुख हो रहा है या दु:ख हो रहा है इससे कोई लेना-देना नहीं है। इसलिए अब्रह्म का सेवन, जिसको महामोह कहा, वह सबसे अधिक आसक्ति पैदा करता है। खाने-पीने की, कपड़े-लत्तों की भी आसक्ति होती है लेकिन सबसे बड़ी सम्भोग की आसक्ति है। यह इसलिए क्योंकि “एकोहं बहुस्याम” दोनों का स्वभाव है। यह दोनों की प्रकृति है।

इतिहास में मंच से ब्रह्मचर्य पर बोलने वाले राजनेताओं में महात्मा गांधी आखिरी व्यक्ति हुए। उनके बाद ब्रह्मचर्य का नाम अब कोई नहीं लेता। अहिंसा-अहिंसा तो खूब चिल्लाते हैं, ब्रह्मचर्य का नाम ही लेना अब बन्द कर दिया है। गांधीजी तो ये भी कहते थे कि भाई मामला टेढ़ा है, मैं भी फिसल गया हूं। स्वामी दयानन्द ने सत्यार्थ प्रकाश में लिखा है कि कोई आदमी ब्रह्मचारी रहना चाहे तो मुश्किल काम है। बहुत कठिन है। इसलिए यह नहीं कहा कि आजन्म ब्रह्मचारी रहो। इतना ही कहा कि ब्रह्मचर्य आश्रम का पालन करके गृहस्थाश्रम में प्रवेश करो।

अन्न से सप्तधातुओं के निर्माण के बाद मन और ओज का निर्माण होता है। वीर्य संचयन से इसकी महत्ता बताते हैं। इसके अभाव में ओज का क्षरण ही होगा। ये तो अन्न की फिर भी भौतिक उपलब्घियां हैं। शुक्र भी भौतिक अनुभूति है, ओज को भी भौतिक उपलब्घि कह रहे हैं। इससे जो बन रहा है वह भी भौतिक है।

दो के आपसी सहमति के मामले में समाज को दो प्रकार का कष्ट है-प्रथम तो यह कि ये दोनों व्यक्ति भी समाज का हिस्सा हैं। समाज का दायित्व बनता है कि उनको पतित होने से बचाए। वे अगर गलत रास्ते पर जा रहे हैं तो मेरा भी दायित्व बनता है कि मैं उनको रोकूं। आखिर विवाह संस्था भी तो इसलिए बनाई गई है। आपसी सहमति से दोनों अगर कुएं में गिर रहे हैं तो मेरा दायित्व है कि उन्हें रोकूं। आखिर मैं भी तो समाज का हिस्सा हूं और वे भी हैं। दूसरी बात कि उन दोनों के इस व्यवहार से शेष समाज पर क्या असर पड़ रहा है। आज तो वो जो भी करते हैं उसकी घोषणा करके करते हैं। छुपाकर भी नहीं कर रहे। तो उसका मेरे बच्चों पर क्या असर पड़ेगा।
-क्रमश:

-गुलाब कोठारी

समलैंगिकता-3

संसार में सारे रिश्ते निभा लेना सरल है, पति-पत्नी का रिश्ता निभाना सबसे कठिन है।

यौनाचार बुरा है यह सब बोल रहे हैं लेकिन सीमाकरण या निषेध कैसे किया जाए इसका उत्तर किसी के पास नहीं है। हम तो यह भी तय नहीं कर पा रहे कि बुरा है या बुरा नहीं है। कुदरत ने बनाया है, बुरा कैसे हो सकता है। आपको वे परिस्थितियां परिभाषित करनी पडेंगी कि इन स्थितियों में बुरा है। सही पूछें तो समलैंगिकता का झगड़ा यही है। आप साबित करें कि इस परिस्थिति में बुरा है तब छोड़ देंगे, पर पहले आप इस बात से सन्तुष्ट करें कि बुरा क्यों है।

पुरूष से पुरूष के सम्बन्ध का तो कारण दिखता है लेकिन स्त्री से स्त्री की समलैंगिकता का अर्थ क्या है! अब तो वैध शादियां भी हो रही हैं। बाकायदा मैरिज एक्ट में स्त्री की स्त्री से शादी हो रही है। इसे क्या हम सद्बुद्धि मानें! प्रश्न इतना है कि इसमें जीवन का कहीं भी अभ्युदय नहीं दिख रहा। जिन घरों में वे रहती हैं वहां से मोहल्ले में, बाहर कैसे निकलती होंगी। आदमी तो वहां भी वही बैठा है, भीतर से आदमी वही है। समाज की दृष्टि से नियंत्रण तो कहीं न कहीं चाहिए ही।

एक के बाद एक पत्नी बदलने के मामले भी देखें। सवाल यह है कि आप जिसे घर में लेकर आए हो उसको तो आप भूल बैठे हो और जो घर में नहीं है उसके लिए भाग रहे हो। लड़ाई होगी। दोनों में से एक को जाना होगा। तब आप दूसरी ले आए। तब तक आपकी नजरें अगली के लिए उत्सुक हो जाती हैं। यह भी विचारणीय है कि ऎसा करने वाले बड़े लोगों में शुमार हैं। इनके ऎसे समाचार आते हैं। इसका हम सामान्य लोगों पर क्या प्रभाव पड़ता है। स्पष्ट है कि समलैंगिकता का सवाल भी तो वहीं से नीचे उतर रहा है। नीचे से ऊपर प्रश्न थोड़े ही जा रहा है। आज भी जो हाय-हाय मची है यह उसी उच्च और उच्च मध्यम वर्ग में है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी हो हल्ला तो उच्च वर्ग में हो रहा है। मध्यम वर्ग वाले तो बहुत खुश हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने बढिया फैसला किया। नीचे वाली क्लास को कोई मतलब ही नहीं होता। मूल प्रश्न तो यह है कि इस परिस्थिति में कोई कानून बनाने की जरूरत क्या है। रजामंदी से कोई किसके साथ क्या करता है, करे। आज हर घर में पति-पत्नी रह रहे हैं। किसी को क्या लेना-देना कि क्या हो रहा है। तब इस मामले में कानून की क्या जरूरत है। कानून तो विवाद की स्थिति में जरूरी होता है। सहमति से जो हो रहा है उसमें विवाद हो ही नहीं सकता।

हां, कानून की जरूरत वहां आ गई कि दो समलिंगी आकर कहें कि हम शादी कर रहे हैं तो मैरिज रजिस्ट्रार उसे रजिस्टर करे या न करे। यहां कानून बताएगा कि क्या पुरूष-पुरूष की भी शादी होती है। उसे कानून के प्रकाश में ही तो पता करना पडेगा कि यह वैध है या अवैध।

एक तर्क तो यह भी था कि 25 लाख व्यक्ति अगर देश में हैं तो क्या आपको नहीं लगता कि वे अपनी मर्जी से जीने चाहिए! पच्चीस लाख आदमी एक काम को कर रहे हैं तो क्या उनको कानून का संरक्षण नहीं मिलना चाहिए!

मनुष्य ने निर्णय लिया कि विवाह नाम की एक संस्था बने। यह संस्था भी वैश्विक है। जब यह तय हुआ होगा तब कोई प्रचार साधन नहीं था, मीडिया नहीं था। इसके बावजूद पूरी दुनिया में एकसाथ लागू हो गया। आज तक यह विवाह संस्था एक जैसी है। आज भी सभी लड़कियां विवाह करके लड़के के घर जाती हैं। पूरी दुनिया में यही हो रहा है। इतना बड़ा अनुशासन कैसे पूरी दुनिया में फैल गया! वह भी बिना किसी मीडिया के! इस बात पर पूरी दुनिया के विभिन्न समाज एक हैं। ऎसा संभव कैसे हुआ कि एक ने चिन्तन किया कि पति-पत्नी विवाह कर साथ रहें और पूरी दुनिया में यह फैल गया। पहुंचा कैसे। इसके साथ फिर परिवार संस्था बनी विवाह के आधार पर। इस आधार पर यदि समलिंगी को देखें तो रति का आभास है यह तो एक बात है लेकिन समलिंगियों के विवाह हो जाने पर परिवार थोडे ही बनता है! सन्तति कहां है, परम्परा कहां चलती है। परम्परा तो स्त्री-पुरूष से ही चलेगी।

हम देखें कि कारण क्या हैं! किसी भी समुदाय में ये चीजें घट-बढ़ रही हैं तो उसके पीछे कोई कारण क्या है। जो पुरूष एक बार इस पटरी पर चढ़ गए तो फिर उन्हें नारी का संसर्ग अच्छा ही नहीं लगेगा। लड़के फिर शादी ही नहीं करते। दूसरे, इसमें रिश्तों की कहीं कोई रूकावट भी नहीं। जैसे घरों में भाई-बहिन का रिश्ता है तो एक सीमा है। इस प्र्रवृत्ति में वह भी कुछ नहीं है। कुल मिलाकर इस विषय में कुछ बिन्दु विचारणीय हैं।

  1. जिसे हम पितृ ऋण कहते हैं उसके अर्थ में बोलचाल की भाषा में कहें कि मनुष्य जाति की निरन्तरता बनी रहनी चाहिए। यह निरन्तरता दम्पति से ही हो सकती है। कल यदि यह निर्णय ले लिया जाए कि समलिंगी व्यवहार ही आदर्श व्यवहार है तो सौ साल के बाद मनुष्य जाति ही समाप्त हो जाएगी। अगली पीढ़ी कहां से आएगी। एक ही पीढ़ी में सब खत्म!
  2. मनुष्य का मनोविज्ञान अपने से विपरीत के द्वारा ही परिपूरित होता है, समान से नहीं। विज्ञान की “काम्प्लीमेंटेरिटी” विरोधी के साथ है। समान ध्रुवों में तो विकर्षण होता है।
  3. आदमी का निखार और मनुष्य की सहिष्णुता का आधार, वह कसौटी जहां आदमी को परखा जाए, वह विरोधी के साथ है। जो अपने जैसा ही है उसके साथ नहीं है।

संसार में सारे रिश्ते निभा लेना सरल है, पति-पत्नी का रिश्ता निभाना सबसे कठिन है। क्योंकि दो छोर, दो ध्रुव अलग-अलग होते हैं। यहीं पर मनुष्य की असली परीक्षा होती है। मैं सारे संसार से मधुर व्यवहार कर सकता हूं, पत्नी के साथ मेरा क्या व्यवहार है-वही कसौटी है कि सचमुच मैं खड़ा कहां हूं। सारी मधुरता सरल है, वहां (पत्नी के साथ) मधुरता कठिन है। एक कथन भी प्रचलित है, कहते हैं कि सन्तान नहीं हुई तो तू नरक में जाएगा। अभिप्राय यह है कि कसौटी पर मैं पूरा कसा ही नहीं गया जब तक कि पत्नी के सम्बन्ध में मैं पति रूप में नहीं हुआ। पुरूष की और स्त्री की भी वरना परीक्षा ही नहीं हुई। दोनों अपूर्ण ही रहे।
-क्रमश:

– गुलाब कोठारी

February 20, 2014

समलैंगिकता-2

ग्रंथों में कुंआरे मातृत्व के उद्धरण तो मिलते हैं, पर समलैंगिकता के उदाहरण नहीं मिलते।

पुरूष-पुरूष के सम्बन्धों का उल्लेख मध्य युग/ प्राचीन काल में नहीं मिलता है। लेकिन रसाभास का अंकन हमारे मन्दिरों में काफी पहले हुआ है। पशुओं के साथ ऎसा अंकन मूर्तियों और चित्रों में है। सैनिक छावनियों में, सैनिकों के साथ यह स्थिति बनी रही है। जीवन में उन अंशों को ढूढें जहां स्त्री की उपलब्धता नहीं है। वहां पुरूष सम्बन्धों की स्थिति मिलेगी। उदाहरण के लिए कथकली, भरतनाट्यम, ओडिसी जैसे नृत्य विधाओं में देखें। इसमें भी ख्याल-नौटंकी की भांति एपिक्स हैं जो लम्बे समय तक प्रदर्शित किए जाते हैं। महिलाएं इसमें वर्जित हैं। क्योंकि रजस्राव के दौरान महिलाएं मन्दिर में नहीं जाएंगी। ऎसे में महिला कलाकार हों तो प्रदर्शन कभी एक महिला के कारण, कभी दूसरी-तीसरी महिला के कारण रूक जाए या प्रभावित होगा ही। अत: इन सब विधाओं में महिला की वर्जना रही। एक-एक माह चलने वाली कथाएं होती हैं, ऎसी जगह पर इस तरह की स्थितियां उत्पन्न होने की बात समझी जा सकती है। सैनिक छावनी और सीमा पर तैनात फौजियों में भी महिलाएं वर्जित रही। धर्म के रहनुमाओं के मामले सुने जाते है। उपनिषद में सत्यकाम की कथा भी बिलकुल ऎसी ही है। जाबाली दासी के बच्चा हो गया। शिक्षा के लिए गुरूकुल में प्रवेश के लिए बच्चा गया तो आचार्य ने पूछा पिता का नाम बताओ। वह मां के पास गया। जाबाली ने पुत्र से कहा कि गुरूजी से कह दो कि मैं दासी हूं, अनेक घरों में विचरण करती थी। मुझे मालूम नहीं कि तुम्हारा पिता कौन है। तुम यह कहो कि मेरी माता का नाम जाबाली है तो मैं जाबाल हूं। बच्चे ने गुरूजी के पास जाकर यही कहा। तो गुरूजी ने सुन कर ये व्यवस्था कर दी कि जो मां इतना सच बच्चे के साथ बोल सकती है और जो बच्चा इतनी सच बात बोल सकता है तो यह बच्चा ब्राह्मण का ही होना चाहिए। ये सत्य की बात कह रहा है इसलिए इसका नाम अब सत्यकाम है। अत: सत्यकाम जाबाल उसका नाम रखा और गुरूकुल में प्रवेश दिया।

उपनिषद ने सम्भव है कि यह उद्धरण देकर किसी सिद्धान्त पक्ष को प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया है। जीवन में ऎसी कई अप्रत्याशित घटनाएं घट जाती है तो उनको कैसे देखा जाए, इसका कोई प्रतिपादन किया लगता है। इस घटना में यही सिद्धान्त निकला कि “सत्य बोलने की हिम्मत” यह ब्राह्मण (अर्थात जो ब्रह्म का चिन्तन करे) का लक्षण है। ऎसी घटनाओं का उल्लेख तो हमारे ग्रंथों में है लेकिन समलैंगिकता के उदाहरण नहीं मिलते। कुंआरे मातृत्व के उद्धरण भी मिलते हैं। कुन्ती कुंआरी थी लेकिन कर्ण को जन्म दिया। फिर पांच पुत्रों का भी जन्म हुआ।

समलैंगिकता के पक्षधर ये सवाल करते हैं कि इससे संस्कृति का ह्रास कैसे होगा, यह बताएं। उनके जवाब के लिए रसाभास ही उदाहरण बनेगा। पिछले दो हजार वर्षो के उपलब्ध चित्रों में चीन एवं जापान के चित्रों में इस प्रकार का अंकन परवर्ती काल का भले ही मिल जाए लेकिन हमारे यहां (परवर्ती समय को छोड़कर) समलैंगिकता को दर्शाते चित्र नहीं है।

इस प्रवृत्ति के दो ही कारण हो सकते हैं-या तो स्त्री उपलब्ध ना हो अथवा समाज की तरफ से स्त्री-पुरूष संसर्ग पर प्रतिबन्ध हो। जो ठीक रास्ता है उससे जब व्यक्ति संसर्ग कर ही न पाए तो फिर कोई कृत्रिम रास्ता अपनाता है। जैसे यूरोप में द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद मर्द गायब हो गए, युद्ध में काम आ गए। उससे उपजी वेश्यावृत्ति का तो यूरोप में अब तक निपटारा नहीं हो पा रहा है। हर सभ्यता में युद्ध प्रवृत्त आदमी ने यही रास्ता निकाला। हमारी औरत दूसरी कौमों में जाएं, उससे तो बेहतर है कि हम ही चार-चार औरतें रख लें। ऎसे कानून इसी तरह की स्थितियों से भी तो बनते हैं। लेकिन इससे यह हुआ कि औरत की हैसियत खत्म हो गई। वह उपयोग की वस्तु हो गई। यही हाल यूरोप का है। एक आदमी चार-चार बीवियां बदल लेता है। कारण है उपलब्धता। बिन मांगे मिल रही हैं, तो उस की कीमत ही नहीं रह जाती।

वस्तुस्थिति यह है कि ब्रह्मचर्य को हमने खूब महिमा मण्डित कर रखा है। जैनों में, ब्राह्मणों में, बौद्धों में भी। ईसाइयों में भी। लेकिन भोग मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है-एकोअंह बहुस्याम। उसका कोई वैकल्पिक मार्ग का सीधा फार्मूला किसी के पास नहीं है। सारे लोग इससे कुण्ठित हो गए है। रजनीश आदि कई विद्वान बोलते रहे हैं। खोज करें कि क्या इन्होंने सेक्स के उदात्तीकरण की कोई बात की है? या जैनों में कहीं ऎसा कोई मार्ग सुझाया है! सबने यही डण्डा सिर पर ठोका है कि ब्रह्मचर्य का पालन करना है। जो प्रवृत्ति है उसे आप कैसे रोकेंगे। उसका कोई उपाय आपके पास है? उपाय कोई दिख नहीं रहा। ऎसे में वही जानना ठीक लगता है कि वैदिक ऋषियों के भी पत्नियां होती थी। वे कुंआरे नहीं थे। उनके बच्चे-परिवार सब थे। बल्कि दूसरे ऋषि से भी मांग लेते थे कि तुम्हारी पत्नी कुछ काल के लिए दे दो क्योंकि मुझे बच्चा चाहिए। नियोग प्रथा भी थी। इसलिए मनुस्मृति में मनु का श्लोक है कि जो केवल संतान के लिए पति, पत्नी का संसर्ग करता है वह ब्रह्मचारी ही है। प्रकृति को आप नकार नहीं सकते। साधु-संत, नन-पादरी आदि जिन्हें कुंआरा रहना होता है वे भी इसमें फंसे रहते हैं। निश्चित है कि आप प्रकृति की हूक को कहीं न कहीं तो शान्त करोगे। किसी भी विचार को, भाव को आप जितना ही दबाते चलेंगे, एक सीमा के आगे वह दबेगा नहीं। जैसे ही मौका मिलेगा, विस्फोट होगा। जैसे स्प्रिंग में उछाल आता है। ये सारे कथित धर्मात्मा बरसों तक उसे दबाते जाते हैं कि मुझे यह नहीं करना। कभी मौका मिला भी तो ऎसे सन्नद्ध हो जाते है कि फिर छूटता ही नहीं। व्यक्ति का सारा व्यवहार भी असामान्य हो जाता है। क्योंकि आप प्राकृतिक रूप में उसको जी ही नहीं रहे हो। साधु-साघ्वियों की भांति ही कई संघों में भी तो प्रचारक को विवाह नहीं करना होता। सभी एक ही भांति के लगते हैं-अभाव ग्रस्त। एक ही उत्तर समझ में आता है कि जीवन में खुद के प्रति आस्था होना। जो कुछ मैं कर रहा हूं वह पूरी समझ और आस्था के साथ कर रहा हूं। इसी में धर्म-कर्म सभी आ जाएगा। इसमें मेरा भी अभ्युदय है और दूसरे का भी। -क्रमश:

-गुलाब कोठारी

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