Gulabkothari's Blog

जून 26, 2016

पहले देश फिर हम

चर्चा है कि ब्रिटेन आजाद हुआ। एक परम्परावादी, संकीर्णता के लिए जाना जाने वाला देश, अनेक देशों पर शासन करने वाला ब्रिटेन आज के समय के अनुसार बदलने को तैयार नहीं है। दूसरी ओर विकासवादी युवा वैश्वीकरण के साथ जीना चाहता है। युवावर्ग में 73 प्रतिशत यूरोपीय यूनियन के साथ रहना चाहता है। इसके अलावा 18 वर्ष से कम आयु का युवा भी मतदान का अधिकार पाने को आतुर है। बुजुर्ग कहते हैं कि वैश्वीकरण में हमारी पहचान-संस्कृति-खो जाएगी। जिस तरह से बाहरी लोग ब्रिटेन में घुस गए और स्थानीय नौकरियों में घुस गए, वह तो युवावर्ग के भविष्य पर बड़ा खतरा है। जैसे हमारे देश में करोड़ों बांग्लादेशी घुस आए हैं। अपराधों की संख्या बढ़ गई है। बेरोजगारी का ग्राफ आसमान छूने लगा है। हमारे यहां तो लगभग सभी पड़ौसी देशों के नागरिक अवैध रूप से रहते मिल जाएंगे। हर सरकार इसको अपनी उपलब्धि मानती आई है। अमरीका की राजनीति में इसका असर तुरंत हुआ है। रिपब्लिकन पार्टी के राष्ट्रपति पद के संभावित उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रम्प ने प्रतिक्रिया में जो कहा, वह चिन्तन करने लायक है। उन्होने कहा-यह महान रोमांचक और ऐतिहासिक परिणाम है। ब्रिटेनवासियों ने ईयू को छोड़कर अपना देश वापिस ले लिया। इसी तरह हम भी अमरीका को वापस लेंगे। अर्थात सभी प्रकार की सरकारों को जनता की मर्जी से चलना होगा।

ब्रिटेन का अलग होना कोई साधारण घटना नहीं है। एक ओर इसको पड़ौसी देशों से व्यापार, उद्योग एवं अन्य आदान-प्रदान में अन्तर्राष्ट्रीय मर्यादाओं का पालन करना पड़ेगा, वहीं दूसरी ओर इसे विखण्डन के लिए भी तैयार रहना पड़ेगा। स्कॉटलैण्ड जैसे देश जहां अधिकांश नागरिक यूरोपीय यूनियन में रहने के समर्थक हैं, ब्रिटेन से अलग भी हो सकते हैं। साथ रहने के पक्ष में तथा विपक्ष में बहुत अन्तर नहीं है। साथ 48.1 प्रतिशत तथा अलग 51.9 प्रतिशत में 16-17 वर्ष के युवा शामिल नहीं हैं। वरना अलग हो ही नहीं पाते। अगले 2-3 सालों में साथ रहने वालों का प्रतिशत बढ़ जाएगा। वैश्वीकरण तो हावी रहेगा ही।

विश्व का भविष्य युवा वर्ग के हाथ में है। वह अभी वैश्वीकरण की चकाचौंध में है। उसकी जीवन शैली एक प्रवाह में बह रही है। वह विदेशी जीवन के अनुभवों, प्रयोगों एवं आधुनिकीकरण के बीच जीना चाहता है। उसे कभी-कभी भारतीय परम्पराएं भी याद आती हैं, किन्तु कब तक? जिस देश में कपिल सिब्बल जैसे अवतारी पुरुष नीति निर्धारकों में बैठे हों, तब लिव-इन-रिलेशन, समलैंगिकता का जीवन, 16 साल की उम्र में कन्याओं को शारीरिक सम्बन्धों की छूट के कानून हमारी संस्कृति को तार-तार कर देंगी। माननीया स्मृति ईरानी ने घोषणा की है कि हमारे विश्वविद्यालयों का पाठ्यक्रम सात विदेशी विश्वविद्यालयों का समूह तय करेगा। सिखा देना सनातन संस्कृति!

ब्रिटेन में भी यही द्वन्द्व चलेगा। और नई पुरानी पीढ़ी के बीच जीवन शैली का टकराव बढ़ेगा। पुरानी पीढ़ी जीत नहीं पाएगी। घटती भी जाएगी। तब क्या संस्कृति विकास की भेंट चढ़ जानी चाहिए? पैसों की खनक में इसकी आवाज खो जानी चाहिए? देश कोई भी हो, शक्ति तो संस्कृति में रहती है। ब्रिटेन के उदाहरण ने एक बहुत महत्वपूर्ण पहलू उजागर किया। युवा वर्ग का मतदान में भाग लेने का। वोट कितना कीमती या अमूल्य है, यह बात प्रत्येक युवा के जहन में बैठ जानी चाहिए। वही कर्णधार है देश का।

हमारे लिए ब्रिटेन का उदाहरण बहुत महत्वपूर्ण है। इसमें सांस्कृतिक परिपक्वता तो है, किन्तु भविष्य कंटकों से भरा है। युवा के चुभेंगे ये कांटे। हमारे युवा वर्ग को भी जाग जाना चाहिए। हमारे यहां तो संस्कृति और संविधान दोनों की धज्जियां उड़ रही हैं। युवा मौन है। क्यों? आपने पढ़ा होगा कि चालीस लाख अवैध प्रवासियों के सवाल पर अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा और सर्वोच्च न्यायालय के बीच ठनी हुई है, इन दिनों। किन्तु ओबामा ने न्यायपालिका को धमकाने अथवा अपमानित करने का कोई प्रयास नहीं किया। और हमारे यहां-? चयनित सरकारों को बर्खास्त करके हड़पने के जो प्रयास होते रहे हैं, क्या वे संविधान सम्मत हैं-?

हमारे पास समय कम है। युवा वर्ग को सारे भेद भुलाकर कमर कस लेना है। इस देश की संप्रभुता और अखण्डता पर कोई खतरा न आए। हमें भी ब्रिटेन जैसा दिन न देखना पड़े। इसके लिए युवा वर्ग को गंभीर हो जाना चाहिए। हम समय के साथ भी रहें और मूल्यों की ताकत भी कम न होने पाए। हम वैश्वीकरण के अलावा हमारी ज्ञान परम्परा या विरासत को केन्द्र में रखकर दूसरों से आगे भी दिखाई पड़ें। ये विरासत अन्य किसी भी देश के पास नहीं। इसको ठेस पहुंचाने वाली प्रत्येक नीति का युवा वर्ग पुरजोर विरोध करे। पहले देश-फिर हम। वरना ब्रिटेन के युवा की तरह मुंह बांए खड़े रह जाएंगे। हमारे इरादे बहुमत के गुलाम को जाएंगे। आज भी हमने जिनको केन्द्र या प्रदेशों में बहुमत दिया, वे हमको गुलाम ही मान रहे हैं। युवा मौन है। कब तक-? क्या बचेगा पीछे वालों के लिए-उद्योगों को विदेशी खरीद लेंगे। किसान जहर उगलेगा, जमीनें रहेंगी नहीं। न रोटी, न पानी, न दवा, न हवा। युवा को जागना ही पड़ेगा, नहीं तो देश हाथ से निकल जाएगा।

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फ़रवरी 25, 2014

समलैंगिकता-6

ब्रह्मचर्य का अर्थ मनोभावों का नियंत्रण होता है। इसी से ओज पैदा होता है।

आत्मा के संस्कारों को भी समझने की आवश्यकता है। क्या कारण है कि एक शरीर का आत्मा उसी तरह के शरीर वाले आत्मा की ओर आकर्षित हो रहा है। दोनों ही प्रकृति दत्त ही तो है। वे आपस में आकर्षित कैसे हो रहे हैं? यज्ञ के सिद्धान्त के विपरीत प्रकृति कैसे काम कर रही है? आकर्षित होने का (बाहर दिखने वाला) एक कारण तो यह है कि समाज की तरफ से स्त्री-पुरूषों के मिलने पर तो रोक लगी रहती है। पुरूष और पुरूष के तथा स्त्री और स्त्री के मिलने पर कोई रोक नहीं है। तो समलैंगिकता सहज सुलभ हो जाती है। विषमलिंगता सहज सुलभ नहीं होती। एकान्त में दो पुरूष आपस में बैठे हैं तो किसी को कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन एक स्त्री और एक पुरूष बैठे हैं तो समाज सवाल करेगा कि अकेले में क्या कर रहे हैं ये लोग। स्त्री-पुरूष की निकटता पर जो रोक लगी है तो उस पर पुरूष सोचता है कि पुरूष-पुरूष की निकटता पर ऎसी कोई रोक ही नहीं है। तब अपनी इच्छा यहां पूरी करो। अत: यह कारण बन जाता है ऎसे सम्बन्धों का। स्त्री-पुरूष की निकटता पर रोक का भी कारण है कि वहां प्रजनन हो सकता है। इस खतरे के कारण रोक है।

दुनिया में ऊंचे पदों पर बैठे लोगों में भी क्या हो रहा है-अमरीका-फ्रांस-इटली के प्रसंग सामने आए हैं। भोग का ऎसा स्वरूप सत्ता से जुड़ा हुआ है। भोग ही सत्ता का पर्यायवाची है। इस समस्या का समाधान कहीं नजर नहीं आता। ध्यान का मार्ग भी सुझाया जाता है-समाधान के तौर पर। लेकिन ध्यान भी प्रतिक्रिया कर जाता है। आप तीन दिन ध्यान करें उसके बाद तीन दिन भोग की तीव्र इच्छा होगी। क्योंकि आपका ध्यान प्रकृति की प्रवृत्ति को दबाने में व्यस्त था। जैसे ही आपने दबाने के प्रयास हटाए तो एकदम विस्फोटक प्रतिक्रिया हुई।

आज हम ध्यान में “कांशियसली”-प्रवृत्ति को दबाने का प्रयास कर रहे हैं और इसे ध्यान कह रहे हैं! यह ध्यान नहीं है-“सपे्रशन का”, दबाने का प्रयास है। ऎसे ही ध्यान से भोग सम्बन्धी व्यभिचार भी निकलते हैं। ओशो जैसे संत-विचारक बदनाम ही इसलिए हुए कि उनके “ध्यान” का विचार केन्द्र ही खुलेआम यही था। जहां भावनाओं का प्रवाह एक पक्षीय हो, व्यक्ति का निर्माण बुद्धि से नही बल्कि दिल से निर्देशित हो, वहां भी व्यक्ति प्रवाह पतित हो जाता है। संगीत-नृत्यादि कलाओं के क्षेत्र में ऎसे उदाहरण मिल जाते हैं। क्या चित्त की दशा और दिशा पर भी ग्रहों का प्रभाव पड़ता होगा? क्या प्रभाव से प्रारब्ध का भी सम्बन्ध है? क्योंकि इस दशा का प्रभाव प्रत्येक दिशा में पड़ता है। सम्पर्क में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति पर पड़ता है। पूरा वातावरण ही कम्पायमान हो जाता है। इस दशा का मूल कारण वासना होती है। काम-क्रोध जैसे नकारात्मक प्रकरण वासना रूप ही हैं। इनमें ब्रह्मचर्य का अभाव किसी भी साधन की सिद्धी नहीं होनेे देता। जितने भी सूक्ष्म (अक्षर) देवी अथवा व्यावहारिक प्रभाव हैं, वे सर्वप्रथम पूर्ण संयत वीर्य में ही अपना असर पैदा करते हैं। “ब्रह्मचर्य प्रतिष्ठायां वीर्य लाभ:”-योग सूत्र। ब्रह्मचर्य से अशक्य कार्य भी किए जा सकते हैं। भीष्म, हनुमान जैसे पुरूष इसी के उदाहरण हैं। वेद विद्या सरस्वती भी ब्रह्मचारिणी रूप में ही उपास्य है। इसीलिए विद्यार्थियों के लिए भी ब्रह्मचर्य अनिवार्य कहा है।

ब्रह्मचर्य का विनाश ही वेद विद्या के लोप होने का कारण रहा है। कामुक व्यक्ति के पास वेद विद्या नहीं रह सकती। जैसे प्रकाश और अंधकार विरोधी होते हैं। दतिया स्वामी ने लिखा है कि आलस्य, प्रमाद, कुचेष्टा आदि दुर्गुण ब्रह्मचर्य के अभाव में ही उत्पन्न होते हैं। धैर्य का भी नाश होता है। अत: गम्भीर और विचारात्मक भावों से जुड़े कार्य हैं, वे कामुक व्यक्ति नहीं कर सकते। शिक्षा के साथ ब्रह्मचर्य का सम्बन्ध अग्नि और दाह की तरह है, नित्य है। साधक के पतन का कारण कामिनी है। “मरणं बिन्दु पातेन जीवनं बिन्दु धारणात्” वीर्य का धारण ही जीवन है और बिन्दु का पात ही मरण है। ब्रह्मचारी मृत्यु पर विजय प्राप्त कर लेता है। ब्रह्मचर्य के अभाव से सद्विद्याओं का लोप, निर्लज्जता का आधिक्य होता है। “कामातुराणां न भयं न लज्जा।” ब्रह्मचर्य ही निर्भयता का सूत्र है। निर्भयता का अर्थ उच्श्खलता नहीं है, स्वतंत्रता भी नहीं कह सकते। ब्रह्मचारी को पूर्ण स्वातं˜य प्राप्त होता है। आपत्तियों को सहन करना, संघर्ष करने की क्षमता ब्रह्मचर्य से प्राप्त होती है। इन्द्रिय निग्रह ही वीरता का प्रमाण है।

ब्रह्मचर्य का अर्थ मनोभावों का नियंत्रण होता है। इसका परिणाम शुक्र संग्रह भी है। इसी से ओज पैदा होता है। ओज से मन का निर्माण होता है। मन में ही इच्छाएं पैदा होती हैं। इच्छाओं की पूर्ति ही जीवन का विकास है। इच्छाओं की गुणवत्ता, गंभीरता ओज तथा मन के स्वरूप पर निर्भर करता है। समलैंगिकता के संदर्भ में ब्रह्मचर्य की विकृति ही प्रमुख है। यांत्रिक क्रिया के कारण मन तो मृत प्राय: ही रहता है। साथी बदलता रहे तो भी भाव में अन्तर नहीं आता। सारा क्रम निष्परिणाम होता है। इससे बड़ी विकृति क्या हो सकती है! आप बिना किसी परिणाम की कामना के कोई कार्य करें, तो ये बेवकूफी है। क्षणिक सुख, वह भी मात्र भ्रान्ति, जीवन को अर्थहीन, महत्वहीन तथा ऎश्वर्यहीन बना देता है।

– गुलाब कोठारी

फ़रवरी 24, 2014

समलैंगिकता-5

दुनिया में कोई विचारधारा ऎसी नजर नहीं आती जहां संयम की बात न की गई हो।

सारे संसार में सबसे सरल और सहज सुख प्राप्ति का उपाय सेक्स है। अन्य कार्यो में तो सुख के लिए मेहनत करनी पड़ती है। पैसा कमाने में मेहनत करनी पड़ती है। लेकिन यह प्रकृति का दिया आपके पास ऎसा धन है कि आप उसका उपयोग कर रहे हैं और आपको आनन्द आ रहा है। इसलिए संसार की सारी परम्पराओं में संयम की बात की गई है। उस संयम का क्या प्रयोजन है। संयम का प्रयोजन मनुष्य को पुरूषार्थी बनाना है। तू मुफ्त में मत खोज कुछ-यानी पुरूषार्थी बन! इसका प्रभाव व्यक्ति पर, परिवार पर, समाज पर और राष्ट्र तथा पूरी मानव जाति पर पड़ता है। क्या मानव जाति को भोग विलास के प्रवाह में लाकर पुरूषार्थहीन बनाना चाहते हैं!

आचार्य महाप्रज्ञ ने उपनिषद के आधार पर कहा-ये सेक्स की प्रक्रिया हमारे नर्वस सिस्टम पर क्या प्रभाव डालती है। नर्वस सिस्टम को शिथिल बनाती है। इस शिथिलता के कारण हम संसार के झंझावतों को सहन करने में असफल होते हैं। हर आत्महत्या के पीछे नर्वस सिस्टम की वीकनेस होती है। नर्वस सिस्टम मजबूत होगा तो व्यक्ति आत्महत्या नहीं करेगा, मुसीबत को सहन करेगा। सामना करेगा उसका। नर्वस सिस्टम के कमजोर होने में भोग बड़ा कारण है। कठोपनिषद में कहा है-“सर्वेन्द्रियाणाम् चरयन्ति तेजो।” भोग इन्द्रियों के तेज को क्षीण करता है। इन्द्रियों के तेज क्षीण होने का मतलब व्यक्ति का ही तेज क्षीण हो गया। इन्द्रियों का तप गायब हो गया। वही तप संयम है। संयम और तप पर्याय हैं। दुनिया में कोई विचारधारा ऎसी नजर नहीं आती जहां संयम की बात न की गई हो। चाहे वह विचारधारा राजनीतिक हो, सामाजिक हो अथवा धार्मिक हो। मार्क्सवादी भी संयम की बात करेगा। उच्छृंखलता का तो कहीं सवाल ही नहीं, वरना समाज ही नहीं बनेगा।

मनु ने एक श्लोक और दिया-“न मांसभक्षणे दोष: न मद्ये न च मैथुने प्रवृतिरेषभूतानां निवृत्तिस्तुमाफला।” मांस भक्षण में कोई दोष नहीं। मद्य-मैथुन में भी कोई दोष नहीं क्योंकि यह मनुष्य की सहज प्रवृत्ति है। लेकिन इस में संयम बरतना, उसका बहुत बड़ा फल है। इन तीनों में यज्ञ की दृष्टि से हमने क्या किया। शास्त्रों में मनुष्य के मांस भक्षण की जो प्रवृत्ति है उसे यज्ञ तक सीमित कर दिया। कहा कि यज्ञ में पशु आलम्बन होगा उससे जो मांस लिया जाएगा, वहीं लिया जाएगा। यज्ञ के बाहर मांस नहीं लिया जाएगा। अत: मांस भक्षण की प्रवृत्ति का सीमाकरण हुआ यज्ञ में पशु आलम्बन से। मद्य के लिए कहा-“सौत्रामण्याम् सुरा पिबेत।” सौत्रामणि यज्ञ होगा तभी शराब पिएगा। इससे पहले या बाद में नहीं पिएगा। मैथुन का नियंत्रण विवाह संस्था से किया। यह पति-पत्नी के बीच सन्तान उत्पत्ति के लिए होगा, उससे बाहर नहीं होगा। यह मानकर कि मनुष्य में ये सहज होते हैं, वैदिक परम्पराओं में इनका निषेध नहीं किया। एक प्रतिशत की अनुमति देकर निन्यानवे प्रतिशत को रोका। पशु व्यवहार से मनुष्य को रोका। सभी परम्पराओं में, चाहे वह कोई भी विचार धारा हो-यह पशु प्रवृत्ति रोकना मूल बात है। असंयम से “सिस्टम” कमजोर हो जाता है, भंग हो जाता है और आदमी कायर-भीरू हो जाता है।

आजकल यह जो चल रहा है कि स्त्री और पुरूष ने तीन-चार बार तलाक दिए और अब फिर किसी अन्य के साथ हो लिए। यह एक प्रकार की सामाजिक अराजकता है। ऎसी अराजकता अन्य जीवों में-पशु-पक्षियों में भी सामान्यत: नहीं मिलती। वहां भी प्रजनन के उद्देश्य से सम्बन्ध बनते हैं। कुछ जीवों में अंग भंग या अंग विच्छेद होने पर टूटा हिस्सा नए जीव में विकसित हो जाता है। कुछ जीवों में नर-मादा की भूमिका एक ही शरीर में सम्पन्न हो जाती है। लेकिन समान जीवों में नर-नर अथवा मादा-मादा में संसर्ग के उदाहरण नहीं मिलते। उच्छृंखल, प्रकृति विरोधी व्यवहार के परिणाम में यौन रोगों सहित अन्य व्याधियां भी भोगनी पड़ती है।

चिकित्सा विज्ञान की दृष्टि से न्यूरोलाजिस्ट और साइकियाट्रिस्ट, साइकोलोजिस्ट यह स्पष्ट कर सकते हैं कि वे सामान्य यौन व्यवहार और असामान्य यौन व्यवहार के मामलों में पड़ने वाले प्रभावों के अन्तर को किस तरह देखते हैं। वे असामान्य व्यवहार वालों की मानसिकता में क्या अन्तर पाते हैं। – क्रमश:

– गुलाब कोठारी

फ़रवरी 22, 2014

समलैंगिकता-4

पाप-पुण्य का सम्बन्ध सुख-दु:ख से नहीं हैं, आत्मा की मलिनता और निर्मलता से है।

स्त्री-पुरूष की एक विशेष संरचना है। वही संरचना प्रजनन क्रिया को जन्म देती है। आकर्षण भी उसी प्रक्रिया से होगा। विपरीत भाव में ही आकर्षण होगा। इसका मनोविश्लेषण यूं भी किया जा सकता है कि जब हम विपरीत से भयभीत हो जाते हैं तो समलिंगी हो जाते हैं। विपरीत से भय लगता है क्योंकि हम उसको सह नहीं पाते, पचा नहीं पाते। समान से भय नहीं लगता है। क्योंकि वह मेरे जैसा ही है तो कोई डर की बात नहीं है।

यह भाव तो तब है जब दो बराबरी की समझ वाले आपस में समझौता कर आगे बढे लेकिन बच्चों को बिगाड़ने की कोशिश हो रही है। इन बच्चों को जीवन निर्माण के मार्ग पर बढ़ाने के बजाय पटरी से उतार रहे हैं और वह भी किस उम्र में! उनकी उम्र तो सोचने की भी नहीं है। फिर धीरे-धीरे वे सिगरेट-शराब भी पीना शुरू कर देंगे। उसे ये सब चीजें सिखा दोगे तो बच्चा भाग कर पास आएगा इन लतों के वशीभूत होकर। तो यह तो समाज का विघटन ही हो रहा है। सारे धर्म पतित हुए इस एक कर्म से। स्कूली बच्चों को फुसलाकर उनका आचरण भंग कर रहे हैं। संस्कृति का अपभ्रंश होता दिख रहा है। ये बच्चे बड़े होकर क्या करेंगे।

स्त्री-पुरूष जब आपस में जुड़ते हैं और संतान होती है तो उसके साथ एक दायित्वबोध भी जुड़ता है। जब दो समान व्यक्ति जुड़ते हैं तो कोई दायित्वबोध तो है ही नहीं। जब तक साथ हैं तब तक हैं। उसके बाद कोई दायित्व न इस पर है न उस पर। इसमें न यज्ञ है, न निर्माण है और न ही दायित्व का बोध ही है। और न पूर्णता है। कभी जैन साधुओं के बीच यह विचार रखना चाहिए कि ये पांचों जो व्रत हैं उनकी प्रक्रिया एक जैसी नहीं है। अहिंसा अलग तरह का व्रत है और ब्रह्मचर्य अलग तरह का व्रत है। इस अर्थ में अहिंसा अलग है कि आप अगर मुझे चांटा मारें तो मुझे दु:ख होता है कि आपको मुझे चांटा नहीं मारना चाहिए। लेकिन ब्रह्मचर्य में क्या होगा कि आप अगर मेरे साथ सहचर्य करोगे तो मुझे भी आनन्द आता है, आपको भी आनन्द आता है। अब इसमें क्या बुराई है। अत: यह ब्रह्मचर्य का मामला अहिंसा से अलग तरह का है। इसमें दोनों पक्ष को सुख होता है। दु:ख तो किसी को होता ही नहीं। फिर इसको क्यों निषेध किया जा रहा है। आप मुझे सुई चुभाओं मैं आपको सुई चुभो दूं तो दोनों को दु:ख है। लेकिन आपसी समझौते से सहचर्य से तो दोनों को सुख है। यहां क्या कसौटी लगाएंगे कि ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए, इसका क्या कारण दोगे? समलैंगिकता के मामले में भी तो यही कहा जा रहा है कि आपस में सहमति से कर रहे हैं तो किसी को क्या लेना-देना!

पाप-पुण्य का सम्बन्ध सुख-दु:ख से नहीं हैं, आत्मा की मलिनता और निर्मलता से है। दोनों को सुख मिल रहा है यह अलग बात है लेकिन दोनों की आत्मा मलिन हो रही है। इस कारण यह निषिद्ध है। दु:ख और सुख तो आत्मा का विषय ही नहीं है। अनुभूति वहां तक जाती ही नहीं है। इसीलिए जैनों ने बड़ा स्पष्ट कहा है, उन्होंने राग को पाप माना। दु:ख-सुख का इससे सम्बन्ध नहीं है। आसक्ति पाप है। दोनों को सुख हो रहा है या दु:ख हो रहा है इससे कोई लेना-देना नहीं है। इसलिए अब्रह्म का सेवन, जिसको महामोह कहा, वह सबसे अधिक आसक्ति पैदा करता है। खाने-पीने की, कपड़े-लत्तों की भी आसक्ति होती है लेकिन सबसे बड़ी सम्भोग की आसक्ति है। यह इसलिए क्योंकि “एकोहं बहुस्याम” दोनों का स्वभाव है। यह दोनों की प्रकृति है।

इतिहास में मंच से ब्रह्मचर्य पर बोलने वाले राजनेताओं में महात्मा गांधी आखिरी व्यक्ति हुए। उनके बाद ब्रह्मचर्य का नाम अब कोई नहीं लेता। अहिंसा-अहिंसा तो खूब चिल्लाते हैं, ब्रह्मचर्य का नाम ही लेना अब बन्द कर दिया है। गांधीजी तो ये भी कहते थे कि भाई मामला टेढ़ा है, मैं भी फिसल गया हूं। स्वामी दयानन्द ने सत्यार्थ प्रकाश में लिखा है कि कोई आदमी ब्रह्मचारी रहना चाहे तो मुश्किल काम है। बहुत कठिन है। इसलिए यह नहीं कहा कि आजन्म ब्रह्मचारी रहो। इतना ही कहा कि ब्रह्मचर्य आश्रम का पालन करके गृहस्थाश्रम में प्रवेश करो।

अन्न से सप्तधातुओं के निर्माण के बाद मन और ओज का निर्माण होता है। वीर्य संचयन से इसकी महत्ता बताते हैं। इसके अभाव में ओज का क्षरण ही होगा। ये तो अन्न की फिर भी भौतिक उपलब्घियां हैं। शुक्र भी भौतिक अनुभूति है, ओज को भी भौतिक उपलब्घि कह रहे हैं। इससे जो बन रहा है वह भी भौतिक है।

दो के आपसी सहमति के मामले में समाज को दो प्रकार का कष्ट है-प्रथम तो यह कि ये दोनों व्यक्ति भी समाज का हिस्सा हैं। समाज का दायित्व बनता है कि उनको पतित होने से बचाए। वे अगर गलत रास्ते पर जा रहे हैं तो मेरा भी दायित्व बनता है कि मैं उनको रोकूं। आखिर विवाह संस्था भी तो इसलिए बनाई गई है। आपसी सहमति से दोनों अगर कुएं में गिर रहे हैं तो मेरा दायित्व है कि उन्हें रोकूं। आखिर मैं भी तो समाज का हिस्सा हूं और वे भी हैं। दूसरी बात कि उन दोनों के इस व्यवहार से शेष समाज पर क्या असर पड़ रहा है। आज तो वो जो भी करते हैं उसकी घोषणा करके करते हैं। छुपाकर भी नहीं कर रहे। तो उसका मेरे बच्चों पर क्या असर पड़ेगा।
-क्रमश:

-गुलाब कोठारी

समलैंगिकता-3

संसार में सारे रिश्ते निभा लेना सरल है, पति-पत्नी का रिश्ता निभाना सबसे कठिन है।

यौनाचार बुरा है यह सब बोल रहे हैं लेकिन सीमाकरण या निषेध कैसे किया जाए इसका उत्तर किसी के पास नहीं है। हम तो यह भी तय नहीं कर पा रहे कि बुरा है या बुरा नहीं है। कुदरत ने बनाया है, बुरा कैसे हो सकता है। आपको वे परिस्थितियां परिभाषित करनी पडेंगी कि इन स्थितियों में बुरा है। सही पूछें तो समलैंगिकता का झगड़ा यही है। आप साबित करें कि इस परिस्थिति में बुरा है तब छोड़ देंगे, पर पहले आप इस बात से सन्तुष्ट करें कि बुरा क्यों है।

पुरूष से पुरूष के सम्बन्ध का तो कारण दिखता है लेकिन स्त्री से स्त्री की समलैंगिकता का अर्थ क्या है! अब तो वैध शादियां भी हो रही हैं। बाकायदा मैरिज एक्ट में स्त्री की स्त्री से शादी हो रही है। इसे क्या हम सद्बुद्धि मानें! प्रश्न इतना है कि इसमें जीवन का कहीं भी अभ्युदय नहीं दिख रहा। जिन घरों में वे रहती हैं वहां से मोहल्ले में, बाहर कैसे निकलती होंगी। आदमी तो वहां भी वही बैठा है, भीतर से आदमी वही है। समाज की दृष्टि से नियंत्रण तो कहीं न कहीं चाहिए ही।

एक के बाद एक पत्नी बदलने के मामले भी देखें। सवाल यह है कि आप जिसे घर में लेकर आए हो उसको तो आप भूल बैठे हो और जो घर में नहीं है उसके लिए भाग रहे हो। लड़ाई होगी। दोनों में से एक को जाना होगा। तब आप दूसरी ले आए। तब तक आपकी नजरें अगली के लिए उत्सुक हो जाती हैं। यह भी विचारणीय है कि ऎसा करने वाले बड़े लोगों में शुमार हैं। इनके ऎसे समाचार आते हैं। इसका हम सामान्य लोगों पर क्या प्रभाव पड़ता है। स्पष्ट है कि समलैंगिकता का सवाल भी तो वहीं से नीचे उतर रहा है। नीचे से ऊपर प्रश्न थोड़े ही जा रहा है। आज भी जो हाय-हाय मची है यह उसी उच्च और उच्च मध्यम वर्ग में है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी हो हल्ला तो उच्च वर्ग में हो रहा है। मध्यम वर्ग वाले तो बहुत खुश हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने बढिया फैसला किया। नीचे वाली क्लास को कोई मतलब ही नहीं होता। मूल प्रश्न तो यह है कि इस परिस्थिति में कोई कानून बनाने की जरूरत क्या है। रजामंदी से कोई किसके साथ क्या करता है, करे। आज हर घर में पति-पत्नी रह रहे हैं। किसी को क्या लेना-देना कि क्या हो रहा है। तब इस मामले में कानून की क्या जरूरत है। कानून तो विवाद की स्थिति में जरूरी होता है। सहमति से जो हो रहा है उसमें विवाद हो ही नहीं सकता।

हां, कानून की जरूरत वहां आ गई कि दो समलिंगी आकर कहें कि हम शादी कर रहे हैं तो मैरिज रजिस्ट्रार उसे रजिस्टर करे या न करे। यहां कानून बताएगा कि क्या पुरूष-पुरूष की भी शादी होती है। उसे कानून के प्रकाश में ही तो पता करना पडेगा कि यह वैध है या अवैध।

एक तर्क तो यह भी था कि 25 लाख व्यक्ति अगर देश में हैं तो क्या आपको नहीं लगता कि वे अपनी मर्जी से जीने चाहिए! पच्चीस लाख आदमी एक काम को कर रहे हैं तो क्या उनको कानून का संरक्षण नहीं मिलना चाहिए!

मनुष्य ने निर्णय लिया कि विवाह नाम की एक संस्था बने। यह संस्था भी वैश्विक है। जब यह तय हुआ होगा तब कोई प्रचार साधन नहीं था, मीडिया नहीं था। इसके बावजूद पूरी दुनिया में एकसाथ लागू हो गया। आज तक यह विवाह संस्था एक जैसी है। आज भी सभी लड़कियां विवाह करके लड़के के घर जाती हैं। पूरी दुनिया में यही हो रहा है। इतना बड़ा अनुशासन कैसे पूरी दुनिया में फैल गया! वह भी बिना किसी मीडिया के! इस बात पर पूरी दुनिया के विभिन्न समाज एक हैं। ऎसा संभव कैसे हुआ कि एक ने चिन्तन किया कि पति-पत्नी विवाह कर साथ रहें और पूरी दुनिया में यह फैल गया। पहुंचा कैसे। इसके साथ फिर परिवार संस्था बनी विवाह के आधार पर। इस आधार पर यदि समलिंगी को देखें तो रति का आभास है यह तो एक बात है लेकिन समलिंगियों के विवाह हो जाने पर परिवार थोडे ही बनता है! सन्तति कहां है, परम्परा कहां चलती है। परम्परा तो स्त्री-पुरूष से ही चलेगी।

हम देखें कि कारण क्या हैं! किसी भी समुदाय में ये चीजें घट-बढ़ रही हैं तो उसके पीछे कोई कारण क्या है। जो पुरूष एक बार इस पटरी पर चढ़ गए तो फिर उन्हें नारी का संसर्ग अच्छा ही नहीं लगेगा। लड़के फिर शादी ही नहीं करते। दूसरे, इसमें रिश्तों की कहीं कोई रूकावट भी नहीं। जैसे घरों में भाई-बहिन का रिश्ता है तो एक सीमा है। इस प्र्रवृत्ति में वह भी कुछ नहीं है। कुल मिलाकर इस विषय में कुछ बिन्दु विचारणीय हैं।

  1. जिसे हम पितृ ऋण कहते हैं उसके अर्थ में बोलचाल की भाषा में कहें कि मनुष्य जाति की निरन्तरता बनी रहनी चाहिए। यह निरन्तरता दम्पति से ही हो सकती है। कल यदि यह निर्णय ले लिया जाए कि समलिंगी व्यवहार ही आदर्श व्यवहार है तो सौ साल के बाद मनुष्य जाति ही समाप्त हो जाएगी। अगली पीढ़ी कहां से आएगी। एक ही पीढ़ी में सब खत्म!
  2. मनुष्य का मनोविज्ञान अपने से विपरीत के द्वारा ही परिपूरित होता है, समान से नहीं। विज्ञान की “काम्प्लीमेंटेरिटी” विरोधी के साथ है। समान ध्रुवों में तो विकर्षण होता है।
  3. आदमी का निखार और मनुष्य की सहिष्णुता का आधार, वह कसौटी जहां आदमी को परखा जाए, वह विरोधी के साथ है। जो अपने जैसा ही है उसके साथ नहीं है।

संसार में सारे रिश्ते निभा लेना सरल है, पति-पत्नी का रिश्ता निभाना सबसे कठिन है। क्योंकि दो छोर, दो ध्रुव अलग-अलग होते हैं। यहीं पर मनुष्य की असली परीक्षा होती है। मैं सारे संसार से मधुर व्यवहार कर सकता हूं, पत्नी के साथ मेरा क्या व्यवहार है-वही कसौटी है कि सचमुच मैं खड़ा कहां हूं। सारी मधुरता सरल है, वहां (पत्नी के साथ) मधुरता कठिन है। एक कथन भी प्रचलित है, कहते हैं कि सन्तान नहीं हुई तो तू नरक में जाएगा। अभिप्राय यह है कि कसौटी पर मैं पूरा कसा ही नहीं गया जब तक कि पत्नी के सम्बन्ध में मैं पति रूप में नहीं हुआ। पुरूष की और स्त्री की भी वरना परीक्षा ही नहीं हुई। दोनों अपूर्ण ही रहे।
-क्रमश:

– गुलाब कोठारी

फ़रवरी 20, 2014

समलैंगिकता-2

ग्रंथों में कुंआरे मातृत्व के उद्धरण तो मिलते हैं, पर समलैंगिकता के उदाहरण नहीं मिलते।

पुरूष-पुरूष के सम्बन्धों का उल्लेख मध्य युग/ प्राचीन काल में नहीं मिलता है। लेकिन रसाभास का अंकन हमारे मन्दिरों में काफी पहले हुआ है। पशुओं के साथ ऎसा अंकन मूर्तियों और चित्रों में है। सैनिक छावनियों में, सैनिकों के साथ यह स्थिति बनी रही है। जीवन में उन अंशों को ढूढें जहां स्त्री की उपलब्धता नहीं है। वहां पुरूष सम्बन्धों की स्थिति मिलेगी। उदाहरण के लिए कथकली, भरतनाट्यम, ओडिसी जैसे नृत्य विधाओं में देखें। इसमें भी ख्याल-नौटंकी की भांति एपिक्स हैं जो लम्बे समय तक प्रदर्शित किए जाते हैं। महिलाएं इसमें वर्जित हैं। क्योंकि रजस्राव के दौरान महिलाएं मन्दिर में नहीं जाएंगी। ऎसे में महिला कलाकार हों तो प्रदर्शन कभी एक महिला के कारण, कभी दूसरी-तीसरी महिला के कारण रूक जाए या प्रभावित होगा ही। अत: इन सब विधाओं में महिला की वर्जना रही। एक-एक माह चलने वाली कथाएं होती हैं, ऎसी जगह पर इस तरह की स्थितियां उत्पन्न होने की बात समझी जा सकती है। सैनिक छावनी और सीमा पर तैनात फौजियों में भी महिलाएं वर्जित रही। धर्म के रहनुमाओं के मामले सुने जाते है। उपनिषद में सत्यकाम की कथा भी बिलकुल ऎसी ही है। जाबाली दासी के बच्चा हो गया। शिक्षा के लिए गुरूकुल में प्रवेश के लिए बच्चा गया तो आचार्य ने पूछा पिता का नाम बताओ। वह मां के पास गया। जाबाली ने पुत्र से कहा कि गुरूजी से कह दो कि मैं दासी हूं, अनेक घरों में विचरण करती थी। मुझे मालूम नहीं कि तुम्हारा पिता कौन है। तुम यह कहो कि मेरी माता का नाम जाबाली है तो मैं जाबाल हूं। बच्चे ने गुरूजी के पास जाकर यही कहा। तो गुरूजी ने सुन कर ये व्यवस्था कर दी कि जो मां इतना सच बच्चे के साथ बोल सकती है और जो बच्चा इतनी सच बात बोल सकता है तो यह बच्चा ब्राह्मण का ही होना चाहिए। ये सत्य की बात कह रहा है इसलिए इसका नाम अब सत्यकाम है। अत: सत्यकाम जाबाल उसका नाम रखा और गुरूकुल में प्रवेश दिया।

उपनिषद ने सम्भव है कि यह उद्धरण देकर किसी सिद्धान्त पक्ष को प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया है। जीवन में ऎसी कई अप्रत्याशित घटनाएं घट जाती है तो उनको कैसे देखा जाए, इसका कोई प्रतिपादन किया लगता है। इस घटना में यही सिद्धान्त निकला कि “सत्य बोलने की हिम्मत” यह ब्राह्मण (अर्थात जो ब्रह्म का चिन्तन करे) का लक्षण है। ऎसी घटनाओं का उल्लेख तो हमारे ग्रंथों में है लेकिन समलैंगिकता के उदाहरण नहीं मिलते। कुंआरे मातृत्व के उद्धरण भी मिलते हैं। कुन्ती कुंआरी थी लेकिन कर्ण को जन्म दिया। फिर पांच पुत्रों का भी जन्म हुआ।

समलैंगिकता के पक्षधर ये सवाल करते हैं कि इससे संस्कृति का ह्रास कैसे होगा, यह बताएं। उनके जवाब के लिए रसाभास ही उदाहरण बनेगा। पिछले दो हजार वर्षो के उपलब्ध चित्रों में चीन एवं जापान के चित्रों में इस प्रकार का अंकन परवर्ती काल का भले ही मिल जाए लेकिन हमारे यहां (परवर्ती समय को छोड़कर) समलैंगिकता को दर्शाते चित्र नहीं है।

इस प्रवृत्ति के दो ही कारण हो सकते हैं-या तो स्त्री उपलब्ध ना हो अथवा समाज की तरफ से स्त्री-पुरूष संसर्ग पर प्रतिबन्ध हो। जो ठीक रास्ता है उससे जब व्यक्ति संसर्ग कर ही न पाए तो फिर कोई कृत्रिम रास्ता अपनाता है। जैसे यूरोप में द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद मर्द गायब हो गए, युद्ध में काम आ गए। उससे उपजी वेश्यावृत्ति का तो यूरोप में अब तक निपटारा नहीं हो पा रहा है। हर सभ्यता में युद्ध प्रवृत्त आदमी ने यही रास्ता निकाला। हमारी औरत दूसरी कौमों में जाएं, उससे तो बेहतर है कि हम ही चार-चार औरतें रख लें। ऎसे कानून इसी तरह की स्थितियों से भी तो बनते हैं। लेकिन इससे यह हुआ कि औरत की हैसियत खत्म हो गई। वह उपयोग की वस्तु हो गई। यही हाल यूरोप का है। एक आदमी चार-चार बीवियां बदल लेता है। कारण है उपलब्धता। बिन मांगे मिल रही हैं, तो उस की कीमत ही नहीं रह जाती।

वस्तुस्थिति यह है कि ब्रह्मचर्य को हमने खूब महिमा मण्डित कर रखा है। जैनों में, ब्राह्मणों में, बौद्धों में भी। ईसाइयों में भी। लेकिन भोग मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है-एकोअंह बहुस्याम। उसका कोई वैकल्पिक मार्ग का सीधा फार्मूला किसी के पास नहीं है। सारे लोग इससे कुण्ठित हो गए है। रजनीश आदि कई विद्वान बोलते रहे हैं। खोज करें कि क्या इन्होंने सेक्स के उदात्तीकरण की कोई बात की है? या जैनों में कहीं ऎसा कोई मार्ग सुझाया है! सबने यही डण्डा सिर पर ठोका है कि ब्रह्मचर्य का पालन करना है। जो प्रवृत्ति है उसे आप कैसे रोकेंगे। उसका कोई उपाय आपके पास है? उपाय कोई दिख नहीं रहा। ऎसे में वही जानना ठीक लगता है कि वैदिक ऋषियों के भी पत्नियां होती थी। वे कुंआरे नहीं थे। उनके बच्चे-परिवार सब थे। बल्कि दूसरे ऋषि से भी मांग लेते थे कि तुम्हारी पत्नी कुछ काल के लिए दे दो क्योंकि मुझे बच्चा चाहिए। नियोग प्रथा भी थी। इसलिए मनुस्मृति में मनु का श्लोक है कि जो केवल संतान के लिए पति, पत्नी का संसर्ग करता है वह ब्रह्मचारी ही है। प्रकृति को आप नकार नहीं सकते। साधु-संत, नन-पादरी आदि जिन्हें कुंआरा रहना होता है वे भी इसमें फंसे रहते हैं। निश्चित है कि आप प्रकृति की हूक को कहीं न कहीं तो शान्त करोगे। किसी भी विचार को, भाव को आप जितना ही दबाते चलेंगे, एक सीमा के आगे वह दबेगा नहीं। जैसे ही मौका मिलेगा, विस्फोट होगा। जैसे स्प्रिंग में उछाल आता है। ये सारे कथित धर्मात्मा बरसों तक उसे दबाते जाते हैं कि मुझे यह नहीं करना। कभी मौका मिला भी तो ऎसे सन्नद्ध हो जाते है कि फिर छूटता ही नहीं। व्यक्ति का सारा व्यवहार भी असामान्य हो जाता है। क्योंकि आप प्राकृतिक रूप में उसको जी ही नहीं रहे हो। साधु-साघ्वियों की भांति ही कई संघों में भी तो प्रचारक को विवाह नहीं करना होता। सभी एक ही भांति के लगते हैं-अभाव ग्रस्त। एक ही उत्तर समझ में आता है कि जीवन में खुद के प्रति आस्था होना। जो कुछ मैं कर रहा हूं वह पूरी समझ और आस्था के साथ कर रहा हूं। इसी में धर्म-कर्म सभी आ जाएगा। इसमें मेरा भी अभ्युदय है और दूसरे का भी। -क्रमश:

-गुलाब कोठारी

फ़रवरी 19, 2014

समलैंगिकता-1

कुछ समय पूर्व सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक सम्बन्धों को अवैध मानते हुए धारा-377 को बहाल रखने का फैसला सुनाया था। जबकि इससे पूर्व दिल्ली हाईकोर्ट ने समलैंगिक सम्बन्धों को कानूनी तौर पर मान्यता प्रदान कर दी थी। दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के बाद से ही इस विषय पर देश भर में एक बहस चल पड़ी थी। गत दिसम्बर माह में जब सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया तो पत्रिका ने फैसले का स्वागत किया। प्रधान सम्पादक गुलाब कोठारी ने 16 दिसम्बर 2013 को विशेष सम्पादकीय लेख लिखा “लहूलुहान संस्कृति” जिसमें समलैंगिक सम्बन्धों को अप्राकृतिक मानते हुए भारतीय संस्कृति के विरूद्ध बताया। इस लेख पर पाठकों की ढेरों प्रतिक्रियाएं प्राप्त हुई थीं। अनेक पाठकों ने लेख का समर्थन किया। कुछ पाठकों ने विरोध जताया तो कई पाठकों ने “पत्रिका” से अपेक्षा की कि वह इस विषय पर विस्तार से प्रकाश डाले ताकि युवा पीढ़ी को सही मार्गदर्शन मिल सके। इन्हीं में दो पाठकों की प्रतिक्रियाएं और इस विषय के सभी आयाम पर पत्रिका सम्पादक का विस्तृत लेख यहां दिया जा रहा है।

हर क्रिया एक अदृश्य कारण होता है। हर क्रिया किसी कारण का प्रतिबिम्ब है। हमारी नजरें उस कारण को नहीं देख पाती हैं। हम अपने माता-पिता के अंश हैं। हमारे बीज की उत्पत्ति तरल रूप में दो लोगों के मिलन से संभव हुई थी जो समलैंगिक मिलन से संभव नहीं था। हमें इस बीज के अवयव के बारे में कुछ ज्ञात नहीं है। इसमें हमारे पूर्वजों की सात पीढियों के गुण समाहित रहते हैं, माता और पिता दोनों की ओर से। क्या हम इस द्रव के मूल्य को समझ सकेंगे? क्या हम समझ सकते हैं कि प्रजनन के अलावा इस द्रव की जीवन में क्या भूमिका हो सकती है? यह तो जीवन का पर्याय ही है और इसकी एक भी बूँद बर्बाद नहीं की जा सकती है। इसमें सात सात पीढियों के गुणों का खजाना मौजूद है। इसका इस्तेमाल तभी किया जाना चाहिये जब धरती पर आठवीं पीढ़ी को लाना है। समलैंगिक रिश्तों या पशुगमन, जहाँ नवजीवन की उत्पत्ति नहीं होती, वहाँ इस द्रव की बर्बादी से चौदह पीढियों का आशीर्वाद बेकार चला जाता है।

वहीं, ब्रह्मचर्य का पालन कर इस द्रव को सुरक्षित रखने से हम भावनात्मक और आध्यात्मिक रूप से सुदृढ़ और मजबूत बनते हैं। हमारा आभामण्डल अधिक तेजवान और समस्त इंद्रियां ज्यादा सक्षम हो जाती हैं। शादीशुदा जोड़े को भी सलाह दी जाती है कि वे इस शुक्र को बर्बाद न होने दें। नहीं तो उनकी याददाश्त घटेगी और प्रतिरक्षी तंत्र कमजोर हो जायेगा। ये द्रव वाष्प के रूप में ऊपर उठकर एक अदृश्य स्तर, ब्रह्माण्ड के अक्षर मंडल तक पहुँच जाता है जहाँ हर क्रिया का कारण देखा जा सकता है।

समलैंगिक रिश्तों की नींव, विपरीत तत्वों के बीच आकर्षण के सिद्धान्त पर नहीं टिकी होती है । इसमें निहित दैहिक सुख यंत्रवत रहता है ना कि भावनात्मक या आध्यात्मिक। यह बन्धन दीर्घकालिक न होकर कुछ समय तक ही रहता है। वहीं कुछ लोग टॉफियां या चाकलेट का लालच देकर बच्चों को लुभाने की कोशिश करते हैं। जब बच्चे इन के साथ ही बड़े होते हैं तो वे कई तरह के नशे का शिकार हो जाते हैं। ये एक छोटा लेकिन घनिष्ठ समूह होता है जहां बच्चों को स्वस्थ सामाजिक वातावरण और जीवन की प्राकृतिक धारा से दूर रखा जाता है। मनोचिकित्सकों का कहना है कि ये काम-विकृत मानसिकता है। जीवन को इस दिशा में धकेलने में कुछ भी प्रकृति के अनुरूप नहीं है।

हमें सिखाया गया है कि पुरूष और नारी, दोनों ही अर्द्ध-नारी और अर्द्ध-पुरूष हैं। पुरूषों में पुरूषोचित गुणों के साथ स्त्रैण गुण भी होते हैं। इसी तरह महिलाओं में, पौरूष गुण भी रहते हैं। लेकिन समलैंगिक रिश्ते में जब दो पुरूष साथ रहते हैं तो अर्द्ध नारी का हिस्सा समाप्त हो जाता है। इसी तरह महिलाओं के बीच सम्बन्ध में अर्द्ध-पुरूष का हिस्सा समाप्त हो जाता है। प्रकृति ने हमें अपूर्ण बनाया है, लेकिन इस तरह के सम्बन्ध से हम में पशु प्रवृति बढ़ जाती है। वैसे, पशु भी प्रकृति के नियम के विरूद्ध नहीं जाते हैं, हम उनसे भी बदतर बन जाते हैं। हम अपनी इच्छाओं और इंद्रियों पर नियंत्रण खो देते हैं ।

इस तरह के सम्बन्ध में किसी तरह का आध्यात्मिक पक्ष नहीं रहता। ये पूर्ण रूप से काम इच्छा की संतुष्टि के लिये है। इससे नई रचना सम्भव नहीं। दाम्पत्य में जिस निर्मल पे्रम की अनुभूति स्पर्श-आलिंगन आदि व्यवहार में होती हैं वैसी आन्तरिक प्रसन्नता समान तरह के व्यक्ति से अनुभूत नहीं हो सकती। प्रेम रस का कोई भी साहित्य पढ़ लो, वह दैहिक सुख की बजाय भावनाओं पर आधारित है। यहां तक कि पशुओं में भी यही बात देखी गई है। सिर्फ शारीरिक समागम होने पर, उसमें किसी तरह के लगाव की कोमल भावनाएं नहीं जुड़ी रहती हैं। महज कामुक अनुभूति रहती है जिसमें नवसृजन की अपेक्षा भी नहीं होती। परिणामस्वरूप हमारा बर्ताव पशुओं जैसा होता है। ऎसे सम्बन्धों में आत्माओं का मिलन नहीं होता है ।

प्राचीन काल के हमारे साहित्य में एक शब्द है- रसाभास यानि मिथ्या सुख की अनुभूति। एक ऎसे संवेदनहीन सुख की अनुभूति जिसमें गुदगुदाती मीठी भावनाओं का अभाव रहता है। सभी इन्द्रियबोध भ्रामक और क्षणिक होते हैं। ना इसमें पिछली क्रिया के लिए कोई संवेदना होती है और न ही भविष्य के प्रति आकांक्षा। प्राकृतिक रस सिर्फ स्त्री-पुरूष के संसर्ग में बहता है। रसाभास के कई उदाहरण हैं ।

  1. किसी और के जीवन साथी के साथ शारीरिक सम्बन्ध।
  2. दोनों की सहमति की बजाय सिर्फ एक साथी की रूचि होने पर, फिर भले ही दोनों इस क्रिया में शामिल हो जाएं।
  3. पशुगमन या पति-पत्नी के अलावा किसी अन्य की ओर आकर्षण।
  4. भय या आक्रामक दबाव में संसर्ग।
  5. वेश्या गमन या आदतन व्यभिचारी में।

रसाभास में प्रेम की अभिव्यक्ति, रति-क्रीड़ा जैसे प्रेम के आभूषण नहीं होते हैं। इसमें न बदलती ऋतुओं का साथ होता है, न साथ बैठकर सूर्योदय का इंतजार और न ही ढलते सूरज को विदा किया जाता है। जल-क्रीड़ा, वन के शांत वातावरण में साथ टहलना, इत्र-सुगंधी, आकर्षक वस्त्रों के जरिये रिझाने जैसी कोई बात नहीं रहती है। फिर मानवोचित क्या है? प्रत्येक क्रिया के पीछे कोई इच्छा रहती है। कुछ पाने की, कुछ हासिल करने की। लेकिन यही एक क्रिया है जो हम साथ करना तो चाहते हैं लेकिन उसका परिणाम नहीं चाहते, भले ही इसमें अलग अलग मंजिल के स्त्री-पुरूष साथ शामिल हों। ऎसे में क्रिया के दौरान पर-पुरूष या पर-नारी के विचार मन में आते हैं।

प्राचीन भारतीय संस्कृति, हिन्दू शास्त्रों में जीवन के अंतिम दिनों में पुरूषार्थ के माध्यम से भक्ति, त्याग और तपस्या करने की बात कही गई है। ये तभी सम्भव है जब हम एक नारी की तरह ईश्वर से अनुराग करें। इस ब्रह्माण्ड में सिर्फ ईश्वर ही पुरूष है और पूर्ण समर्पण के लिये हमें नारी रूप धारण करना ही होगा। लेकिन समलैंगिक सम्बन्ध में न प्रेम है, न ह्वदय है, न आस्था है और न ही मोक्ष है। सात पीढियों के तžवों की बर्बादी से जीवन में सुख को ग्रहण लग जाता है। अगले जन्म में भी ये हमारा पीछा नहीं छोड़ता है और हम समलैंगिक चक्र में फंस जाते हैं क्योंकि ये प्रकृति के किसी अन्य जीव में देखा नहीं गया है। इससे किसी जन्म में मुक्ति नहीं है और न ही वर्तमान में किसी तरह की सामाजिक छवि।

ऋषभदेव से पहले लड़का-लड़की एक साथ जन्में तो उसे युगलिया कहते थे। उन्हीं भाई-बहन की आपस में शादी हो जाती थी। आदिम जातियों में यह समझ नहीं थी कि भाई-बहन में विवाह न हो। उनके लिए तो एक लड़का-एक लड़की होता था। उनके लिए तो ये बस युगलिया थे। विवाह पद्धति ऋषभदेव के पुत्र भरत चक्रवर्ती ने स्थापित की। ऋषभ ने असि, मसी, कृषि, शिल्प और वाणिज्य के विषय परिष्कृत किए। शादी की प्रथा होने के बाद भाई-बहन के विवाह होना बंद हुए।

यम-यमी संवाद में इसका उल्लेख है। यम नाम का भाई यमी नाम की बहिन से कहता है आओ हम शादी कर लें। यमी मना कर रही है कि नहीं, भाई-बहन की शादी नहीं हो सकती। ये संवाद-सूत्र ऋग्वेद में हैं। समलैंगिकता के बारे में वैदिक साहित्य-पुराण, उपनिषदों में उल्लेख नहीं मिलता। इसका कोई पर्यायवाची शब्द भी संस्कृत में नहीं मिलता। लेकिन यह बात भी केवल पुरूषों के आपसी सम्बन्धों पर लागू होती है। महिलाओं पर लागू नहीं होती। एक पुस्तक भी अंग्रेजी में उपलब्ध है-इनवेजन आन द सेक्रेड(पवित्र पर आक्रमण) 600 पेज की किताब है यह। इसमें पश्चिम के लोगों ने रिसर्च की है। इसमें कई बेहूदा बातें लिखी हैं।
हमारी संस्कृति में सेक्स का सम्बन्ध काम पुरूषार्थ से है। काम पुरूषार्थ या रति का प्रयोजन सन्तति उत्पन्न करना है। रघुवंशी राजा सन्तति के लिए गृहस्थ में प्रवेश करते थे। राजा भोग के प्रयोजन से क्या करते थे यह व्यवहार की बात अलग है, रति का प्रयोजन सन्तति रहा, यह बात प्रमुख है।

समलिंगी गुण रसाभास है। श्रृंगार रस नहीं है इसमें, यह रस का आभास है। साहित्य शास्त्र विपरीत रति को भी रसाभास कहता है। इसी तरह पशु-पक्षियों के साथ सम्बन्ध को भी रसाभास कहा है। साहित्य का ही आधार है जिससे हम कह सकते हैं कि यह व्यवहार हमारी परम्परा का नहीं है। इसको कहीं भी हमने श्रृंगार या रति नहीं माना। काम पुरूषार्थ नहीं माना। ऎसा संसार में होता है जिसे हमने रसाभास लेबल दिया। लगता है कि इसमें प्रेम हो रहा है वस्तुत: यह प्रेम का स्वरूप नहीं है। – क्रमश:

-गुलाब कोठारी

जून 22, 2013

रजत पट पर काला ही काला

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आज का मानव दु:खी है, तो अपने मन की चंचलता से। न तो उसे चंचलता का प्रभाव समझ में आता है और न ही उसे इस पर नियंत्रण करना आता है। बल्कि सत्ता से जुड़े, प्रभावशाली, धनिक श्रेष्ठी तथा आपराधिक प्रवृत्ति के लोग तो इस चंचलता पर गौरवान्वित होते हैं।

चंचलता को हवा देते रहते हैं। निरन्तर बनी रहने वाली चंचलता मन को प्रवाह पतित करती है। प्रवाह नीचे की ओर ही ले जा सकता है। अत: इसी चंचलता के प्रभाव में समाज भी कमोबेश नीचे ही गिरकर संतुष्ट है। आज शिक्षा व्यक्ति को हित-अहित की भेद दृष्टि नहीं देती। पेट से बंधी होने के कारण शिक्षा पेट के आगे सोचने ही नहीं देती। इच्छा पेट में पैदा नहीं होती। शिक्षा भी इच्छा को पैदा नहीं कर सकती। हम तो ईश्वर के हाथों कठपुतलियां हैं। यही चिन्तन हमारे दर्शन का आधार है।

उन्नीस सौ पचास के दशक तक सिनेमा में भी संस्कारों, मानव मूल्यों और आस्था की प्रधानता थी। अभिनेता और अभिनेत्रियां भी आदर्श रूप में प्रतिष्ठित थे। आजादी के समय का देशभक्त मीडिया समय के साथ दिशाहीन होता माफिया के शिकंजे तक पहुंच गया।

 

शराब और मादक पदार्थो की तरह यह भी एक मादकता ही परोस रहा है समाज में। सम्प्रेषण का इतना सशक्त माध्यम कोरे कागज जैसे युवामन के भीतर की कोमल दुर्बलताओं को वीभत्सता दे रहा है। आई.पी.एल. हो या सिनेमा, दोनों ही आज माफिया की मुटी में हैं। देर रात की कहानियां दोनों क्षेत्रों में ही दिन की “चीयर लीडर्स” पर उन्माद के आक्रमण की कहानियां कहती हैं।

तब ऎसे मीडिया से राष्ट्र प्रेम के संस्कार, संस्कृति का विकास या राष्ट्र निर्माण के संदेश की उम्मीद कैसे की जा सकती है? हिन्दी में ही औसतन दो फिल्में प्रतिदिन बनती हैं। हिट होती होगी महीने में दो। बाकी की फिल्में क्यों और किसके लिए बनाई जाती हैं? इसका अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है।

एक समय था, जब पटकथा, गीत, संगीत, गायन आदि में प्रत्येक का महत्व था। भारतीय शास्त्रीय संगीत का विस्तार हुआ। कई घरानों को आगे बढ़ने का मार्ग मिला। अभिनय का अद्भुत प्रदर्शन आम आदमी को देखने को मिला। सिनेमा देश का पहला सस्ता और सर्वसुलभ मास मीडिया बना। बड़ा पर्दा इसकी आत्मा है।

छोटा पर्दा आज सौतन बन गया। घर के शयन कक्ष में प्रवेश कर गया। जो बड़े पर्दे पर नहीं देखा जा सकता, छोटे पर्दे पर वह भी उपलब्ध है। इसी स्पर्धा के रहते बड़ा पर्दा भी अपनी लक्ष्मण रेखा को आगे खिसकाता जा रहा है। कब मिट जाएगी पता नहीं। हर बार सेंसर बोर्ड ज्यादा से ज्यादा उदारवादी दिखाई देता है। न्यायपालिका भी समय के साथ लचीलापन बनाए रखती है, किन्तु लगता है, यह बांध ज्यादा दबाव सहन नहीं कर पाएगा। सरकारें आग में घी का डालने का काम कर रही हैं।

ऎसे-ऎसे कानून लाने के लिए हाथ धोकर पीछे पड़ी हैं कि आदमी, आदमी कहलाने लायक भी न रहे। युवा जीवनशैली ही पोर्न बनकर रह जाएगी। बिना किसी बन्धन के दूसरे का शरीर भोगने की खुली छूट। तब टीवी और सिनेमा में सेंसर क्या काटेगा? सारे कानून और मर्यादाएं, आत्मानुशासन केवल समाचार-पत्रों के लिए! क्या बाकी माध्यम मीडिया की परिभाषा में नहीं आते? फिर यह सरकारी दोगलापन क्यों? कई बार जनता भी मुखौटा ओढ़ लेती है। पत्रिका में कोई चित्र छप जाए जिसमें अंग अधिक खुले हों, तो पाठक मुझे संवादों में ही टोकते रहे हैं।

“आपके यहां तो ऎसा नहीं होना चाहिए। बच्चों पर अच्छा प्रभाव नहीं पड़ता। दूसरे यदि करते हैं, तो करने दीजिए।” कभी किसी ने टीवी या सिनेमा को लेकर शिकायतें की क्या? बल्कि इन्हीं दर्शकों के कारण महेश भट्ट जैसे कई निर्देशकों की फिल्में लोकप्रिय हुई। देशभर में अश्लील फिल्मों का मार्केट किसके भरोसे?

देश गढ़ने का बीड़ा यदि उठाना है, तो मन पर अंकुश लगाना सीखना पड़ेगा। आदमी बनने का मार्ग पकड़ना पड़ेगा। तपना पड़ेगा। हर युवा लड़के-लड़की को चिंतन करना पड़ेगा कि क्या नारी बाजार में बिकने की वस्तु है या प्रत्येक नर की जीवनसंगिनी है।

 

पुरूष्ा के जीवन को निर्मित करने वाली, पुरूष की शक्ति है। सिनेमा उसी नारी शक्ति का धन के लालच में दोहन कर रहा है। टीवी और सिनेमा नारी की अस्मत बेच रहे हैं। सार्वजनिक रूप से उसे नंगा करने का प्रयास कर रहे हैं। इनके पीछे कोई सभ्य इन्सान नहीं है। माफिया है बस। उसे धन कमाना है। उसके लिए शराब, चरस और औरत में कोई अंतर नहीं है। किंतु हमारा तो इस नारी से सरोकार होना चाहिए। हम भी तो इन्हीं से हैं।

हममें से ही किसी परिवार की होगी। नादानी में भूलवश भेडियों के हाथ पड़ गई। अब वहां देवता नहीं बसते पहले की तरह। आज तो अमिताभ बच्चन और शाहरूख खान भी लाचार बने बैठे हैं। फिर इनके मंदिर बनाने का क्या अर्थ रह जाएगा? क्यूं नहीं ये देवता देशहित में मुखरित होते। आमिर खान भी तो कर ही रहे हैं। क्यूं सिनेमा पर सभ्यता की आचार संहिता लागू नहीं करवाते? सेंसर बोर्ड भी क्या रिश्वत लेकर देश के साथ खिलवाड़ कर सकता है? स्वयं शर्मिला जी और शबाना जी तो अपने समय की बड़ी अदाकारा रही हैं। इन सबके रहते इनके द्वारा पोषित मसाला फिल्मों वाला सिनेमा देश को गर्त में ले जाने वाला कैसे बन गया? क्या इसी माध्यम के जरिए राष्ट्र निर्माण नहीं हो सकता?
आज का सिनेमा क्या हो गया, क्यों गीत और संगीत-नृत्य, सब तो इतने भौण्डे हो गए हैं कि धैर्य ही छूट जाता है? शास्त्रीय संगीत का आत्मीय धरातल छूट गया। शरीर के आगे नए संगीत का प्रभाव पहुंचता ही नहीं। पशुभाव को जाग्रत करने वाला है। किसी पर कोई प्रभाव नहीं छोड़ पाता। फिर भी आपका सिनेमा महंगा होता जा रहा है।

 

जो दूसरे के धन से फिल्में बनाते हैं, निवेशक के नियंत्रण में ही रहते हैं। हीरो-हिरोइन, कथा, संगीत आदि सभी में निवेशक का दखल रहता है। उसे लोकप्रियता नहीं, धन चाहिए। विदेशी निवेश के कारण प्रिंट मीडिया में भी तो यही हो रहा है। यहां भी सस्ता मनोरंजन प्रवेश कर गया। युवा को शरीर के रोमांच से भ्रमित रखना है, नशे को कम नहीं होने देना है। देश जिसका है, उसके देशवासी जानें। निवेशक पर यह दबाव क्यों?

क्या इस हाल में देश गढ़ने में सिनेमा योगदान कर सकता है? हरगिज नहीं! यह तो आज युवाओं का अपमान कर रहा है। जिस सिनेमा ने आजादी से पहले राष्ट्रभक्ति एवं विकास में योगदान का नारा दिया-धर्मात्मा, अछूत कन्या, बन्धन, किस्मत, हिन्दुस्तान हमारा जैसी फिल्मों से। जागृति, शहीद एवं हकीकत जैसी रोंगटे खड़े कर देने वाली, खून का प्रवाह का बढ़ा देने वाली फिल्मों की सौगंध खानी पड़ेगी। युवा मन को तरंगित करना होगा।

 

पृथ्वीराज कपूर की आवाज से। राजा हरिश्चंद्र से चलकर आलमआरा, रामायण और महाभारत जैसी फिल्में जिन्होंने पूरे देश को एक माला की तरह पिरोकर रखा। दुर्गेश नन्दिनी जैसी धरोहरों से परिचित कराना होगा देश के जवान को। फिल्मों को शिक्षा का पूरक बनना होगा। शिक्षा में आज मानवीय अभिव्यक्तियां, संवेदनाएं सब लुप्त हो गई। सिनेमा को लौटाना होगा नारी का वात्सल्य, करूणा, भाव, वो लोरियां जो नम कर देती हैं आंखों को आज भी।

 

कसमें खानी होंगी नर्गिस, मधुबाला, मीना कुमारी या वहीदा रहमान जैसी अभिव्यक्तियों की, जिनका स्वरूप आज भी तैर रहा है पिछली पीढ़ी की आंखों में। पुन: प्रतिष्ठित करना होगा नारी के खोये सम्मान को, ताकि हर पुरूष सभ्य हो सके। रेन-डांस पशु युग का प्रतीक है, जो भारत की कर्मभूमि का अपमान है। आज जितने दिग्गज हैं इस उद्योग में, उनको शपथ लेनी चाहिए कि उनका शेष जीवन देश गढ़ने में लगेगा। युवा शक्ति उनका अनुसरण करेगी। भारतीय सिनेमा को विदेशी चोला फेक देना चाहिए। बहुत कीमत चुका दी हर अभिनेता-अभिनेत्री ने भी। हमें नई पीढ़ी को भविष्य देना है, लाचारी नहीं देनी।

कर्णधारों को व्यक्तिश: राष्ट्रनिर्माण में अपनी आहुतियां देनी होंगी। आत्मा की मशाल जलानी होगी, ताकि धिक्कार ना पड़े आगे कभी! जिन-जिन अदाओं पर आपकी भी आंखें रोई थीं कभी, उठाओ सौगंध उन आत्माओं की-देश गढ़ने के लिए।

गुलाब कोठारी प्रधान सम्पादकपत्रिका समूह

मई 26, 2013

उदारता

उदार शब्द ही उदारता का प्रमाण है। इसमें ‘उ’ का अर्थ दूर भेजना, ‘दा’ का अर्थ पूर्ण रूप में देना और ‘र’ का अर्थ भी देना। यहां देना दो बार आने का अर्थ यह भी मान सकते हैं कि दिए हुए को वापस नहीं लेना है। ‘र’ अग्नि बीज है। जो भी आप दे रहे हैं, वह अग्नि में परिपाक होकर, रूपान्तरित होकर, जाना चाहिए। दही बन जाने के बाद फिर उसका दूध नहीं बन सकता।

 

 

उदारता का उद्देश्य आदान-प्रदान से नहीं है। क्योंकि उदारता का क्षेत्र केवल भौतिक पदार्थ ही नहीं है। विचार, भाव, नीयत जैसे सूक्ष्म विषय भी आते हैं। ईश्वर से बड़ा तो काई उदाहरण नहीं हो सकता, उदारता का। मनुष्य जीवन के पुरूषार्थ का लक्ष्य भी तो नारायण बन जाना ही है। तब देने के अलावा मार्ग क्या है!

एक ट्रक के पीछे लिखा था-

 

मालिक हो तो ऎसा

हिसाब मांगे न पैसा।

 

कोई मांगने वाला आ जाए तो देखो कैसे सिर ठनकता है। मानो जीव निकल रहा हो। कौन नहीं जानता कि भाग्य से अघिक नहीं मिल सकता। हम किसी का भाग्य बदल भी नहीं सकते। फिर भी विश्व की सारी स्पर्घाएं एक-दूसरे को पछाड़ने में लगी रहती हैं। अपने नुकसान के लिए, दु:खों के लिए, दूसरों को दोषी ठहराते रहते हैं। उनको मिटा देने तक की सोच बैठते हैं। स्वयं के कर्म की ओर ध्यान तक नहीं जाता। घर की महिला-खूंटा या स्वामिनी-जब स्वयं अहंकार से ग्रसित हो जाती है, तब न अपने पति को सही सलाह दे पाती है, न ही बच्चों को संस्कारित कर पाती है। परिवार में माधुर्य का अभाव आते ही बिखराव शुरू हो जाता है।

 

इन नकारात्मक भावों के कारण स्त्री सबसे पहले रोगग्रस्त होती है। हजारों उदाहरण मिलते हैं। विचारों के स्पन्दन ही रक्त को दूषित करते हैं। इन सब परिस्थितियों से मुक्त रहने के लिए ही उपासना, पूजा, जप आदि का सहारा लिया जाता है। उदारता भी एक तरह की उपासना ही है। इसका लक्ष्य ह्वदय में बैठे ईश्वर को प्रसन्न करना है ताकि व्यक्ति के आभामण्डल में प्रकाश का प्रवेश हो सके। उदारता और दान में अन्तर इतना ही है कि उदारता का भाव ही दान की प्रेरणा बनता है। परिणाम ही दान है। तन का, मन का, धन का। तीनों ही माध्यम बनते हैं-आत्मा की अभिव्यक्ति के। उदारता का सूत्र दो आत्माओं को जोड़ने का कार्य करता है।

 

उदारता परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त करती है। अनेक परम्पराएं समाज की पहचान होती हैं। कुछ परम्पराएं समय के साथ अपनी सार्थकता खोती जाती हैं। कट्टरपंथी विचार जहां इनसे चिपके रहना चाहते हैं, वहीं उदारमना लोग समय के साथ बने रहते हैं। लचीले होते हैं। यह फूल की उदारता ही है कि कोई भी भंवरा उसका पराग ले सकता है। कोई भी राहगीर उसकी सुगंध भीतर उतार सकता है। क्यों व्यक्ति अपने माधुर्य से सबको सींच नहीं सकता? क्योंकि उसका अहंकार उसे पूर्वाग्रह के जाल में बांधे रखता है।

 

वह दूसरों को भी वैसा ही मानता है। जबकि सामाजिक स्तर पर उदारता आपसी सौहाद्रü एवं सम्पर्को का विकास करती है। इसमें भी एक श्रेणी उन लोगों की होती है, जो उदारता का ढोंग करने वाले होते हैं। धर्म के क्षेत्र में उदारता दिखाने वालों की कमी किसी भी सम्प्रदाय में नहीं है। उदारता का पहला कदम ही मन को स्वत: स्फूर्त कर देता है। आप किसी से मीठा बोलकर देखिए, कड़ुवे बोल का उत्तर मत दीजिए अथवा ऎसा बोलने वालों के साथ भी आप तो मृदु बनकर देख लीजिए। कभी कोई आर्थिक सहायता मांगने आ जाए, संकट की घड़ी में, तब बिना परिचय पूछे उसकी मदद करके देख लीजिए। उसके चहरे की प्रसन्नता आपको अपने किए कार्य का महžव समझा देने वाली है।

 

सेवा और भक्ति के क्षेत्र में तो बिना उदारवादी दृष्टिकोण के प्रवेश ही असम्भव है। वह प्रसन्न आत्मा आपको अपना ही लगता है। पराएपन का भाव लुप्त हो जाता है। उदारतापूर्वक की गई सेवा में व्यक्ति स्वयं को पीडित का अंग मानकर कार्य करता है। अपने जीवन का महžवपूर्ण काल खर्च करता है। जो प्रत्युत्तर मिलता है, वह ईश्वर का आशीर्वाद ही होता है। व्यक्ति अपने भीतर भी ईश्वर की अनुभूति करने लगता है।

 

उसका ध्यान ईश्वर की शक्तियों, ईश्वर की सृष्टि एवं भीतर की एकरूपता पर जाने लगता है। यह भी स्पष्ट हो जाता है कि सबका प्रारब्ध भिन्न होने से सबकी आकृति और प्रकृति भिन्न दिखाई देती है। तब कौन मित्र और शत्रु कौन? सब अपने-अपने प्रारब्ध के कारण इस बड़े नाटक के पात्र बने हुए हैं। धन भी ईश्वर देता है, मांगने वाला हो या छीनने वाला, उसे भी ईश्वर ही भेजता है। मित्र भी वही भेजता है, शत्रु भी वही भेजता है। तब शत्रु का दोष क्या? हां आप उदारता के माध्यम से उसे मित्र बना सकते हो।

 

उदारता आदत नहीं संस्कार है। आत्मा के साथ जुड़ा है। इसमें नकारात्मकता नहीं होती, किन्तु हां, विशेष परिस्थितियों में लोग अर्थ नकारात्मक लगा सकते हैं। इसका कोई विकल्प नहीं है। संस्कारवान् लोग अपने ‘सर्व मंगल’ भाव से विशेष उदारता प्रकट करके उम्रभर के लिए अमिट छाप छोड़ देते हैं। कुमार्ग से गुजरता कोई आत्मा जब सामने आकर खींचता है, संस्कारवान व्यक्ति च्युत नहीं होते। सामने वाले आत्मा को भी सुमार्ग पर ले ले, तो उसका जीवन भी नर्क होने से बच जाता है। समय के साथ विश्वास स्वत: ही गहरा हो जाता है।

 

उदारता का यह श्रेष्ठ उदाहरण है। इससे बड़ा उदाहरण परिवार में ही मिल सकता है। मां का सन्तान के प्रति उदारता का भाव। किसी परिस्थिति में नहीं बदलता। यहां तक कि जिन जातियों में बूढ़ी मां को बेचने की प्रथा है, वहां भी नहीं बदलता। इसी प्रकार शिष्य के प्रति गुरू की उदारता कभी घटती नहीं। वात्सल्य यहां उदारता का पर्याय बनता है। सन्तान की माता-पिता के प्रति उदारता भी प्रकृति का अद्भुत उदाहरण है। माता-पिता से बात-बात में डांट खाते रहने के बाद भी उनकी हर गलती को क्षमा कर देना अद्भुत नहीं है क्या? प्रकृति में सामाजिक सम्बन्ध नहीं होते। नर-मादा-नपुंसक होते हैं। अपने-अपने कर्म भोगकर चले जाते हैं। उदारता में विस्तार अग्नि का ही धर्म है। संकोच सोम का धर्म है।

 

मन को सौम्य कहा है। क्योंकि इसका स्वामी चन्द्रमा है। सूर्य पत्नी रूप में। सूर्य के प्रकाश से ही प्रकाशमान् है। मन तीन प्रकार का है। चिदात्मक, प्राणात्मक और इन्द्रियात्मक। अव्यय पुरूष का मन-श्वोवसीयसमन-चिदात्मक है। जो स्वयं इन्द्रिय न होते हुए भी इन्द्रियों का प्रवर्तक है, वह प्राणात्मक मन है। सुख-दु:ख का अनुभव करना इन्द्रियात्मक मन का गुण है। ह्वदय इसका स्थान है। प्राणरूप मन प्रज्ञानात्मा है। वाणी में वही वाक् है। रसना में वही रस है। ह्वदय में वही मन है। यह मन जब आनन्द-विज्ञान की ओर उठता है, तब उदारता बढ़ जाती है। आसक्ति और उदारता विरोधाभासी भाव धाराएं हैं। आसक्ति के कारण संकुचन प्रभावी रहता है। विस्तार कभी भी संभव नहीं होगा। उदारता में व्यक्ति स्वयं को नित्य विस्तार पाते देखता है।

 

उदारता का मूल है देना। चाहे सामने वाले को अपनी बात कहने का अवसर ही हो। उदारवाद का अर्थ है सामने वाले को अघिक महžव देना। अहंकार मुक्त होकर देना। कर्ता भाव छोड़कर देना। सामने वाले के शरीर को नहीं, उसके आत्मा को देना। ताकि आपके अतिरिक्त किसी को पता भी न चल सके। वापिस नहीं मांगने के भाव से, सामने वाले का शुभचिन्तक बनकर देना। अपेक्षा भाव उदारवादी कर्मो में विष घोल देता है। जीवन को व्यापार बना देता है।

 

उदारवादी बनने पर व्यक्ति अपनी प्रकृति के अनुरूप सहजता से जीने लग जाता है। बीज बनकर अपने जीवन का मोह भूल जाता है। पेड़ बनकर फल और फूल देता है। कोई भी भोग ले। लोगों के साथ और लोगों के लिए जीने का मार्ग है उदारता। समय के साथ बदलते रहने को उदारता कहते हैं।

 

इस देश में प्राणी मात्र के प्रति उदारता का महžव है। गाय को चारा, पक्षियों को दाना एवं चींटियों को ‘कीड़ी नगरा’ जैसी परम्पराएं भले ही धर्म के नाम पर चलती हों, किन्तु व्यक्ति के मन में प्राणी मात्र के लिए सम्मान पैदा करने जैसा दुर्गम कार्य आसानी से हो जाता है। इन भावनाओं के स्पन्दन शरीर की ऊर्जा को संतुलित रखते हैं। शरीर प्रसन्न एवं निरोग रहता है। व्यक्ति व्यष्टि से समष्टि भाव की ओर बढ़ता रहता है।

 

गुलाब कोठारी

लेखक पत्रिका समूह के प्रधान संपादक हैं

मई 19, 2013

रे मनवा मेरे!

रे मनवा मेरे
तीन माध्यम हैं
तेरे लिए जो
सहायक बन सकते हैं
ऊध्र्व यात्रा में-
धारणा-संकल्प
ध्यान-चिन्तन
और समाधि।
एक मार्ग से
तुझे रोकना है
नए विषयों को
चिपकने से,
न बढ़े भीड़
स्मृतियों की,
दूसरे मार्ग से
निकालना है बाहर
पुराने कचरे को
खूंटियों को ताकि
रह सके अन्त में
अकेला-स्वयं में।
पहला कदम है
धारणा-संकल्प
कि नहीं प्रवेश होगा
स्थायी भाव में
नए विचारों का,
विचार आएंगे
जाएंगे भी, किन्तु
कहीं ठहराव नहीं,
पकड़ने का प्रयास
नहीं होगा अब,
देखेंगे, एक
फिल्म की तरह।
साक्षी बनकर
सोचेंगे, समझेंगे,
करेंगे चिन्तन भी,
अस्पृश्य रहकर।
स्थूल में भी
व्यक्ति ले जाएगा
अपनी खूंटी
अपने ही साथ,
घटना के होंगे
दर्शक-साक्षी,
तब हट जाता है
मोह का पर्दा,
माया से बनती है
दूरी मन की,
मन बन जाता है
दृष्टा प्रकृति का।
दृष्टा होने का अर्थ
“अमन” हो जाना,
मन का निर्माण
हो नहीं सकता
कोई खंूटी
बना नहीं पाएगी
स्थान, बिना मन।
मन ही ग्रन्थि है
मन ही बन्धन है
मन ही प्राण होकर
बन जाता है
वाक्-पदार्थ।
इच्छा से बना मन
स्वीकृति की पड़ गई
गांठ,
खुल भी जाती है
पूर्णता के साथ
इच्छा की।
वेद कहते हैं
इस जगत को
“नाम-रूपात्मक”,
नाम का अर्थ
नहीं है वस्तु,
न ही रूप का अभिप्राय
वस्तु है।
गांठ भी ऎसी है
दिखाई देती है
बाधक होती है
सुलझ सकती है
और है कुछ भी नहीं।
गांठ नाम माया है।
ओशो कह गए हैं
“गांठ है मनुष्य भी
नाम-रूप की,
खोल दो इसे,
जो शेष बचे
वही परमात्मा।
न रूप ही बचे
और न नाम ही,
“मैं” चला गया
गांठों के साथ।”
क्या गांठ वस्तु है?
ओशो कहते हैं-
यदि वस्तु होती
तो रहती गांठ
बिना रस्सी के,
संभव नहीं अलग करना
रस्सी से, गांठ को।
मुक्त कर सकते हो
रस्सी को गांठ से,
किन्तु इसका विपरीत
संभव नहीं है।
आकृति है,
रूप है गांठ का,
किन्तु नहीं है
स्वतंत्र अस्तित्व,
भीतर कुछ नहीं,
केवल रस्सी है,
गांठ कुछ नहीं है
अपने-आप में।
तब देखो
खोलना है बस
ग्रन्थियों को
और मुक्त रस्सी।
मन भी नहीं होता
गांठ की तरह,
मन बनता है
चेतना के क्षोभ से,
इच्छा के कारण,
पर्दे की फिल्म
केवल रूप है जैसे।
रूप है मन भी,
जब भीतर का दृष्टा
भूल जाता है “मैं”
और खो जाता है
दृश्यों में,
रह जाते हैं जब
मात्र दृश्य
बंध जाती है गांठ।
गांठ भारी
और भारी
जन्म-जन्म से
बांधे जा रहे
गांठें, ढेर सारी
अपने मन पर,
समझा ना,
क्यों कहते हैं
पागल तुझको
मनवा मेरे!
“बाहर नहीं मनुष्य से
मनुष्य का बंधन,
उसने ही बनाया
अपने भीतर
कारागार और
बैठा है स्वयं उसमें।”
लगता ऎसा है
जैसे सब कुछ बाहर
सुख-दु:ख, उपलब्घि,
सफलता-पराजय,
किन्तु हैं सब भीतर।
दौड़ भीतर, लक्ष्य
पहुंचना, हार-जीत
सब कुछ भीतर,
पे्रमी बाहर, किन्तु
प्रेम-ग्रन्थि, भीतर,
टूट जाए भीतर
तो सब समाप्त
बाहर।
ध्यान क्या है
देखना ग्रन्थियों को,
नजदीक से
दत्तचित्त होकर
जागरूक रहकर,
वर्तमान में।
आपने देखा
झूठ की ग्रन्थि को
समझा क्यों बोला,
क्षमा मांगी और
ग्रन्थि गायब।
ग्रन्थि खोलना
यानी कि स्वीकारना
अपने स्वरूप को,
उस नाम के साथ,
नहीं करने पड़ते
प्रयास अलग से
खोलने के लिए।
इन्द्रियों की
हर इन्द्रिय के विषय
हर जन्म की ग्रन्थियां
आती जाती हैं
सामने आपके
ध्यान की स्थिति में,
काया नहीं है
वहां आपकी,
मन नहीं है
वहां पर
विचार नहीं है
बस स्वरूप है
पश्यन्ति में,
आ लौट चलें मनवा,
खोलने गांठें
ठहरकर ध्यान में।
गुलाब कोठारी
लेखक पत्रिका समूह के प्रधान संपादक हैं

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