Gulabkothari's Blog

मई 17, 2010

बड़ा बनाने वाले!

 बहुत बड़े थे शेखावत सा.। राजनीति में तो कहते हैं कि संवेदना होती ही नहीं। उन्हें सत्ता के अलावा कुछ दिखाई भी नहीं देता। अधिकांश राजनेता खूब बहादुरी से झूठ ही बोलते हैं। निष्ठुर एवं घोर स्वार्थी भी होते हैं। हो सकता है शेखावत सा. में भी किसी ने ये गुण देखे हों। मैंने उनमें नेतृत्व की क्षमता देखी, जो आज किसी भी राजनेता (कांग्रेस या भाजपा) में दिखाई नहीं पड़ती। पूरा देश नेतृत्वविहीन चल रहा है। संवेदना एवं सह्वदयता ही तो उनके व्यक्तित्व की मूल शक्ति थी। सारी व्यस्तताओं, राजकाज और राजनीति के बीच उन्होंने व्यक्ति को कभी नहीं भुलाया। कभी व्यक्ति को छोटा नहीं माना। भले वह व्यक्ति जानकार हो अथवा अनजान। अमीर हो अथवा गरीब। उनके दरवाजे सबके लिए खुले रहते थे। उनके उपराष्ट्रपति भवन में भी एक निर्देश यह था कि राजस्थान से आने वाले हर व्यक्ति को भीतर आने दिया जाए। अभी तक तो ऎसा अनुभव किसी भी राजनेता के यहां नहीं हुआ। इसमें उनका मानवीय पक्ष इस बात का प्रमाण है कि वे सही अर्थो में नेता थे। इसी कारण लोग भी उनको चाहते थे। जब तक वे स्वस्थ रहे, राज्य की हर संवेदनशील घटना पर वहां (घटनास्थल) तक पहुंचे। व्यक्तिगत संबंधों को भी राजनीति से ऊपर उठकर निभाया। आज राजनीति का भावनाओं से कोई रिश्ता नहीं रह गया। अत: गरीब तो बड़े नेताओं तक पहुंच ही नहीं सकता है। गरीब को वोट भी डालने नहीं दिया जाता। सत्ता का अर्थ है- “”जिसकी लाठी, उसकी भैंस।”” उनके साथ कभी मेरा राजनीतिक संबंध भी नहीं रहा। न ही इस विषय पर हमारी चर्चा होती थी। मेरे लिए तो वे सदा पिताजी के अंतरंग मित्र ही रहे। अत: हमारे बीच एक अटूट विश्वास सदा ही बना रहा। इसका एक प्रभाव मैंने यह भी देखा कि जब भी मैं उनसे मिलने गया, वे हमेशा गाड़ी तक छोड़ने भी आते थे और बच्चों को भी बुलवाते थे कि उनको बुलाओ मामाजी जा रहे हैं। निश्चित रू प से वे मुझे महसूस करा देते थे कि मैं कोई बड़ा आदमी हूं। अधिकांश राजनेताओं का व्यवहार मुख्यतया आलोचनापरक ही होता है। खाने के लिए पूछना तो अब किताबों में ही पढ़ने को मिले। मुझे उनका सदा देने का भाव बड़ा ही प्रभावित करता रहा। नेकी कर कुएं में डाल। काम निकलने के बाद अनेक लोग रास्ता भूल जाते हैं। कई भाजपा मंत्रियों ने इनके कहे की अवज्ञा भी की है। इनको किसी से शिकायत नहीं रही। सत्ता के मद में भाजपा की जो छिछालेदार हुई, उनकी वेदना इनके मन पर भारी पड़ी। पनपते-गहराते भ्रष्टाचार को भी वे सहन नहीं कर पाए। उनके नेतृत्व की कुंजी रही उनका माटी से लगाव। केवल शब्दों में नहीं, कर्म से भी। परंपराओं से भी उतना ही जुड़ाव। आस्थावान तो थे ही। श्रीनाथजी, गणेशजी, गोविंद देवजी इनके नित्य आराध्य थे। इसी का प्रभाव था कि वे जीवन के प्रति एक स्पष्ट दृष्टिकोण रखते थे। संबंधों के साथ काम को कभी जोड़ते हुए उनको नहीं देखा। पिताजी के साथ पचास वर्षो के संबंध रहे, निरंतर मिलने का क्रम भी रहा। शुरूआती दौर में तो दोनों एक-दूसरे के लिए कार्य करते भी रहे। राजस्थान पत्रिका में उनके या उनकी पार्टी के विरूद्ध क्या छपा, उस कारण उनका शाम को मिलना कभी बंद नहीं हुआ। भाजपा और संघ का तो कई बार हमें कोपभाजन बनना पड़ा होगा, किंतु मुझसे भी (संपादक बनने के बाद) कभी इस तरह के मुद्दों पर बात नहीं की। पत्रिका में कोई बात या किसी का व्यवहार उनको सही नहीं लगा, तो तुरंत जानकारी देते थे। स्नेह व सम्मान की पराकाष्ठा ही थी कि पिताजी के स्वर्गवास के बाद तो वे और भी नियमित रू प से संभालने लगे। हर बार जयपुर दौरे पर दो मंदिर (गोविंद देवजी और मोतीडूंगरी गणेश) तथा दो मित्रों के घर (हमारा तथा स्व. मोहन छंगाणी का) अवश्य छूते ही छूते थे। उपराष्ट्रपति के पद पर बैठने के बाद भी घंटों बातें करना मेरा सौभाग्य ही था। एक अन्य नेता रहे हैं अटलजी, जिन्होंने कभी बात समाप्त करने की जल्दी नहीं दिखाई। यही तो बड़े लोगों के लक्षण हैं। श्रद्धेय पिताजी की तरह शेखावत सा. भी साधारण स्थिति से पुरूषार्थ के सहारे ऊपर उठे थे। उन्होंने प्रत्येक पुरूषार्थी की आगे बढ़ने में मदद की। नई पीढ़ी के नेताओं का तो लेने से ही पेट नहीं भरता, देंगे क्या? शेखावत सा. राजनीति में रहते हुए भी अंत समय तक इससे ऊपर उठ गए थे। उनका अनेक अर्थो में मोहभंग भी हुआ। अनेक कार्यो और परिस्थितियों का सिंहावलोकन भी किया, जो शायद सब लोग करते भी न हों। इनकी रूग्णता ने इनको चिंतन-मनन का अच्छा समय दे दिया। कई लोगों से मन की बातें कर गए। हलके होकर, तैयारी करके गए। राजस्थान का सौभाग्य ही कहिए कि उसे एक संवेदनशील नेतृत्व का सान्निध्य प्राप्त हुआ। आगे भी ईश्वर की कृपा हो कि शीघ्र ही लोगों का दिल जीतने वाला नेता मिले। भले किसी भी पार्टी का हो! स्व. शेखावत की आत्मा शांति को प्राप्त हो! ? शांति !!!

 गुलाब कोठारी

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नवम्बर 10, 2009

विष वृक्ष

महाराष्ट्र में एक विधायक को राष्ट्र भाषा में शपथ लेने के कारण पार्टी विशेष के विधायकों की आक्रामकता का शिकार होना पड़ा। पूरा सदन जैसे शिथिल होकर रह गया था। यह हमारे लोकतंत्र की पगड़ी उछालने जैसा ही मामला है। वह भी चुनौती देकर। जिसकी लाठी उसकी भैंस वाला नियम तो दुर्याधन और कंस के राज में भी था। महाराष्ट्र विधानसभा में आज जो कुछ दुर्घटना हुई, उस पर तो पूरे देशवासियों का खून उबल जाना चाहिए था। क्षेत्रवाद का यह स्वरूप किसी जातिवाद और आतंकवाद से कम तो नहीं कहा जा सकता। भाषा की इस संकीर्णता में और कटट्रवाद में कहां अन्तर रह जाता है?

राज ठाकरे ने जब यह घोषणा की कि जो भी विधायक मराठी में शपथ नहीं लेगा, उसे सदन में ही देख लिया जाएगा, उसे तब ही गिरफ्तार कर लिया जाना चाहिए था। इससे बड़ा देशद्रोह और क्या हो सकता है। जिन-जिन प्रदेशों ने क्षेत्रीयता और भाषावाद का सहारा लिया है, उनके सम्बन्ध शेष राष्ट्र के साथ स्वत: ही बदलते चले गए हैं। महाराष्ट्र में जब छठ की पूजा को लेकर बिहार/यूपी के लोगों के विरूद्ध अभियान चला था, तब भी शिवसेना प्रमुख की देश भर में थू-थू हुई थी। इस बार भी उनका अहंकार चुनाव से पूर्व चरम पर था, जब उन्होंने कहा था कि राज कौन होता है मराठी की बात करने वाला। मैं सबका बाप हूं। यही अहंकार राज ठाकरे को भी विरासत में मिला है। इसी के कांटे उसको चुभ भी रहे हैं।

ईश्वर ने उसे आगे बढ़ने का साहस दिया है। साथ चलने को टीम में भरोसे के साथी भी दिए हैं। फिर उसे समाज के हित में कार्य क्यों नहीं करना चाहिए। केवल मराठी का संघर्ष तो आगे चलकर घाटे का सौदा ही रहेगा। बाल ठाकरे इसके उदाहरण हैं। उनके पास धनबल, भुजबल, सत्ता क्या नहीं है। पर क्या महाराष्ट्र के बाहर देशवासी उनका उतना ही सम्मान करते हैं, जितना महाराष्ट्र में करते हैं।

प्रश्न यह है कि सदन में राज ठाकरे की पार्टी के विधायकों ने जब संविधान और लोकतंत्र का मखौल उड़ाते हुए अकेले विधायक पर आक्रमण कर दिया तब उन विधायकों को केवल चार साल के लिए निलम्बित करने का क्या औचित्य है? उनके लिए तो पूरे पांच साल के लिए सदन से निष्कासित किया जाना और जीवन में फिर कोई भी चुनाव लड़ने के अयोग्य घोषित करना भी कम ही सजा होती। पुलिस में मामला भी दर्ज कराया जाता। चार साल का निलम्बन तो उनसे ज्यादा उनके चुनाव क्षेत्रों के मतदाताओं को दण्डित करना है, जिनकी अब सदन में आवाज ही नहीं रहेगी।

महाराष्ट्र की इस दुर्घटना ने एक मौका दिया है सच्चाई के लिए संघर्ष करने का। यह संघर्ष खतरों से खेलना ही है। लोकतंत्र को प्रतिष्ठित रखना है तो सामंती/ अपराधी तत्वों से संघर्ष करना ही पड़ेगा। बल्कि यह संकल्प तो अब हर प्रान्त के सदन और संसद के शपथ-पत्र में जुड़ जाना चाहिए कि- “मैं संकल्प करता हूं कि मेरी उपस्थिति में यदि सदन में कोई लोकतंत्र की मर्यादा तोड़ने का प्रयास करता है और सभापति भी कार्रवाई नहीं करता, तब मैं कानून की शरण लूंगा।”

महाराष्ट्र विधानसभा में भाषा के नाम पर आतंकित करना, मारपीट करना तो बलवे की परिभाषा में आता है। इसे किसी भी बहाने से, किसी भी समीकरण के बहाने ठण्डे बस्ते में नहीं डाला जाना चाहिए। यह अकेले महाराष्ट्र का नहीं देश का सवाल है। देशभर में इस दुर्घटना के विरोध में आवाजें उठनी चाहिएं। कैंसर प्रभावित अंग शरीर की शोभा नहीं बढ़ाता।

गुलाब कोठारी

अक्टूबर 1, 2009

वेदना के नश्तर

लता मंगेशकर का नाम स्वयं में एवरेस्ट शिखर है। गायकी का पर्यायवाची बन गई हैं। करोडों लोग जिसकी प्रशंसा करते नहीं थकते और ईष्र्या करने वाले भी इतने ही होंगे। उनके साक्षात्कार की एक पंक्ति ने आत्मा को झकझोर दिया। ‘अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो’। जीवन के 80 वर्ष पार करके, सफलता की हिमालय जैसी ऊंचाइयो को नाप लेने के बाद, आज उनके मुंह से निकली यह पंक्तियां नश्तर से भी गहरी चुभने वाली हैं। आम नारी के ह्वदय की वेदना, उसकी पीडा को व्यक्त करने वाली हैं। इनमें छिपे 80 वर्ष के न जाने कितने अनुभव देश की सभ्यता और संस्कृति को चांटे मार रहे हैं। यह वक्तव्य इस बात का भी प्रमाण है कि साठ साल की आजादी के बाद हमने क्या हासिल किया। कन्या शिक्षा, नारी शक्ति योजनाएं, आरक्षण और न जाने क्या-क्या बहाने ढूंढे, नारी के नाम पर शोषण के। हमारे देश के कर्णधारों को इस बात से कुछ शर्म आएगी, पता नहीं। और जब इनकी यह कहानी है तो साधारण महिला तो नर्क में ही जी रही होगी। दरिन्दों के बीच। मुझे तो यह भी लग रहा है कि राजस्थान के सिर पर जो कन्या भ्रूण हत्या का टीका लगा हुआ है, लताजी का कथन इसी का साक्षी है। एक व्यक्तिगत अभिव्यक्ति है, दूसरी सामाजिक।<br /><br />कल ही समाचार पढा था कि आठ माह में राज्य में महिलाओं के प्रति अपराध 18.5 प्रतिशत बढे हैं। बलात्कार भी बढे हैं। लगता है कि कोई आदमी किसी औरत को हंसते हुए देखना ही नहीं चाहता। उसे यह भी समझ लेना चाहिए कि औरत के साथ धरती भी रोती है। संस्कृति और सभ्यता भी रोती है। वह चाहेगी तब तक ही आदमी हंस पाएगा।<br /><br />गहराई से देखें तो इसका कारण भी स्वयं स्त्री ही है। विश्व भर में। वह लडके की तरह जीना चाहती है। पत्नी और मां बनने की सीख अब नहीं लेती। उसका प्रभुत्व घर में जिन कारणों से रहा करता था, लुप्त हो गया। कहते हैं कि शरीर की पकड नौ साल, दिमाग की पकड दो साल। उसके बाद सुख कहां<br /><br />लताजी की वेदना में सामाजिक चिन्तन पर भी बडा प्रहार है। जिस प्रकार के परिवेश से लताजी गुजरीं, जिस प्रकार विवाह के संघर्ष में असफल हुई, ईष्र्याजन्य आरोपों से सदा घिरती रहीं, तब लगता है कि सुख को न धन से, न ही पद से खरीदा जा सकता है। वे छोटे परिवार में भी सुख से रह सकेंगी, यदि अगले जन्म में लडका बन पाई। शक्ति पूजा करने वाले देश को इससे बडा कौन सा अभिशाप लग सकता है सौ करोड की आबादी के देश में आधी दुनिया देश को जीने लायक ही नहीं मान रही। अपमान, संघर्ष और अपमान! जबकि देश की राष्ट्रपति स्वयं एक महिला हैं।<br /><br />गुलाब कोठारी

अगस्त 4, 2009

मीडिया और संस्कृति

हमारा देश आज संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। वैश्वीकरण ने एक ओर अमरीकी डालर का तथा दूसरी ओर अंग्रेजी भाषा का महत्व बढ़ा दिया है। चूंकि हमारी शिक्षा में मानसिक परिपक्वता को स्थान नहीं है, अत: हम एक प्रवाह में पड़ गए। आंखें मूंदकर चले ही जा रहे हैं। अच्छे-बुरे अथवा उपादेय एवं हेय का भेद करना भूल गए। शिक्षित समाज धीरे-धीरे भारतीय संस्कृति से और स्वयं अपनी आत्मा से दूर होता जा रहा है। अभी इनकी संख्या बहुत कम है, किन्तु इनका झुकाव अंग्रेजी संस्कृति एवं जीवन दर्शन की ओर दिखाई पड़ता है। ये ही लोग देश के नीति-निर्माता भी हैं।

परिणाम यह होता है कि जब भी कोई नीति संस्कृति में बदलाव की बात कहती है, तब टकराव की एक स्थिति बन जाती है। अधिकांश देशवासी मूल अवधारणाओं में बदलाव नहीं चाहते। नई संस्कृति इन मर्यादाओं को तोड़ती हुई दिखाई पड़ती है। जैसा कि आज संविधान की धारा 377 के मामले में होता दिखाई पड़ता है।
ऎसे हालात में मीडिया की भूमिका को भी इसी भाषाई परिपेक्ष में देखना चाहिए। अंग्रेजी मीडिया और टीवी नई विचारधारा के पोषक दिखाई पड़ते हैं। आम आदमी से दूर रहने के कारण भारतीय मानसिकता को गहराई से नहीं समझ पाते। भारतीय शब्दों को अंग्रेजी में अनुवाद करके ही समझते हैं। अत: विदेशी विचारधारा एवं तर्क देकर विषयों को प्रस्तुत करते रहते हैं। भाषाई समाचार-पत्र लोगों के नजदीक भी रहते हैं और सांस्कृतिक विषयों के साथ भी जुड़े होते हैं। वे मूल्यों पर किसी भी दबाव का विरोध करते हैं। हमारे नीति-निर्माता इसीलिए अंग्रेजी मीडिया तथा टीवी पर आश्रित रहते हैं। वहां टकराव भी नहीं है और उनके अहंकार की तुष्टि भी हो जाती है। चिन्तनधारा भी एक सी होती है। इस प्रकार मीडिया भी देशी एवं अंग्रेजी भेद से दो भागों में बंट गया।

अंग्रेजी का सर्वाधिक प्रभाव हमारे अधिकारी एवं न्यायिक वर्ग पर दिखाई पड़ता है। इनकी शिक्षा एवं प्रशिक्षण दोनों ही अंग्रेजी में होते हैं। इनकी जीवनशैली भी वैसी ही रहती है। इनके मुकाबले नेता आम आदमी के ज्यादा नजदीक होते हैं, किन्तु दोनों का चोली-दामन का साथ रहता है। नीतियां तो अधिकारी बनाते हैं। आम आदमी से तो इनका नाता ही नहीं रहा। विदेशी कानूनों और विश्लेषणों के आधार पर यहां भी कानून बनाते रहते हैं। देश में एक नई संस्कृति पैदा की जाने लगी है। नए कानूनों के कारण जनजीवन भी अस्त-व्यस्त और त्रस्त होने लगा है। इस ओर कानूनविदों का या नेताओं का ध्यान कभी नहीं जाता। देश में शान्ति के स्थान पर अशान्ति की प्रतिष्ठा होती है। टकराव तो सरकार से किया नहीं जाता, भ्रष्टाचार को अवश्य बढ़ावा मिलता रहता है।

आवश्यक यह है कि हम किसी व्यवस्था अथवा जीवन की अवधारणा को अच्छा-बुरा तो नहीं कहें, किन्तु हर निर्णय का दूरगामी परिणाम तो निर्णय करने से पहले समझ लें। यही तो नहीं होता। जिन लोगों को ईश्वर ने देश चलाने के लिए संसद में बिठाया, वे भी यदि प्रवाह में बहने लगे, तब दोष हम किस को देंगे।
हमें न अंग्रेजी से विरोध है, न ही किसी अन्य भाषा से। भाषा तो माध्यम ही है। जब तक माध्यम रहती है, तब तक कोई हानि भी नहीं होती। हो क्या रहा है कि हमारे शब्दों के समकक्ष अंग्रेजी शब्द ढूंढ़कर दोनों के पूरक की तरह काम लेने लग गए हैं। इस दोष को यदि दूर कर लिया जाए, तो टकराव स्वत: ही रूक जाएगा। उदाहरण के लिए हमारा संविधान धर्मनिरपेक्ष है। धर्म की परिभाषा के अनुसार किन्हीं दो व्यक्तियों का धर्म एक नहीं हो सकता। हर व्यक्ति का अपना निजी धर्म होता है। धर्म को हम अंग्रेजी के रिलिजन में बदल दें तो वह साम्प्रदायिक/सामूहिक स्वरूप है। संविधान का सम्प्रदाय निरपेक्ष होना तो सही होगा। धर्मनिरपेक्ष अथवा अधर्मी होना वांछित नहीं है। धर्म की तरह शिक्षा भी एक अवधारणा है। बहुत बड़ी परिभाषा है इसकी और इसमें सम्पूर्ण जीवन का सर्वागीण विकास सम्मिलित है। एजुकेशन में व्यक्ति की तो कहीं चर्चा ही नहीं है। केवल विषय पढ़ाए जाते हैं। और इसका लक्ष्य केवल नौकरी देना रह गया। शेष जीवन से इसका लेना-देना ही नहीं है। शिक्षा नीति भले किसी भी भाषा में बने, उसकी मूल अवधारणा बनी रहनी चाहिए। आज शिक्षित व्यक्ति ही अधिक अपराध करता दिखाई पड़ता है। यह तो शिक्षा का अपमान ही कहा जाएगा। जब अरबों रूपए खर्च करके इसी शिक्षा को बढ़ावा दिया जाएगा तो एक संवेदनाविहीन मानव संस्कृति का ही निर्माण होगा। इसका विरोध करना ही यदि टकराव है, तो यह तो समय के साथ बढ़ता ही जाएगा। भले ही मीडिया का एक हिस्सा धन लेकर मौन हो जाए, देश की आत्मा तो मुक्ति के लिए छटपटाएगी।

(“राजनीतिक परिदृश्य पर सहमति और टकराव तथा इसमें मीडिया की भूमिका” विषय पर दिल्ली में आयोजित सेमिनार में पत्रिका समूह के सम्पादक गुलाब कोठारी द्वारा व्यक्त विचार)

जुलाई 4, 2009

कसो कमर

आज से मध्य प्रदेश के विधायकों का प्रशिक्षण शुरू हो रहा है। राजस्थान के विधायकों का ऎसा ही प्रशिक्षण शिविर विधानसभा के बजट सत्र के बाद होगा। उन्हें अपने काम-काज में दीक्षित किया जाएगा। दोनों ही जगह नई सरकार के 6 महीने तो चुनावों में ही गुजर गए। नई सरकार के विजय के जश्न भी हो चुके। मध्य प्रदेश में तो पहले भी सरकार भाजपा की ही थी, लेकिन राजस्थान में पिछली सरकार के कर्मो का फल इनके हिस्से में आया है। इसका अर्थ है कि हमें इतिहास से सीख लेनी चाहिए। ठोसकाम करने के लिए कमर कस लेनी चाहिए। एक संकल्प यह भी होना चाहिए कि प्रतिनिधि आप किसी भी दल के हों, कार्य प्रदेश के लिए करना है। ये संकल्प मध्य प्रदेश, राजस्थान ही नहीं हर राज्य के विधायकों को लेने चाहिएं।
पिछले दशकों का इतिहास गवाह है कि सबसे अधिक गिरावट जन प्रतिनिधियों के व्यक्तिगत आचरण और उसकेकारण सदन की गरिमा बनाए रखने में आई। अच्छा हो इस बात को प्रशिक्षण का पहला अध्याय बनाया जाए। व्यक्ति अच्छा है, तब उसके हाथ से गलत कार्य कभी हो ही नहीं सकता।
पिछली विधानसभा में भी अनेक विधायकों और मंत्रियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे। सदन में अनुशासनहीनता के दृश्य देखकर विधायकों को शर्म आना बन्द सा हो गया। मुद्दों के बजाए विरोधी दलों पर छींटाकशी आधुनिक संसदीय सभ्यता की शैली बनती जा रही है। जब विधायक मुद्दों पर तैयारी करकेनहीं आएंगे, देर रात तक अन्यत्र व्यस्त रहेंगे, तब सदन में और क्या कर सकते हैं
अन्य महत्वपूर्ण बात यह भी है कि वे किसी भी दल से चुनकर आए हों, सदन का लक्ष्य एकही होना चाहिए- प्रदेश का हित। इसमें किसी तरह की जाति, धर्म, क्षेत्र अथवा राजनीति को जगह नहीं मिलनी चाहिए। इसके बिना किसी जन प्रतिनिधि की दृष्टि का विकास नहीं हो सकता। तब भावी नेतृत्व का विकास कैसे सम्भव हो सकेगा विधायकों को देश के चुने हुए विशेषज्ञों जैसे सोमनाथ चटर्जी के साथ संवाद कराया जाए। राजनीति को व्यवसाय बनाकर नेतृत्व के सपने नहीं देखे जा सकते। न ही इसके अभाव में विधायिका का सशक्तिकरण हो पाएगा। विधायक झोला लेकर अधिकारियों के पीछे घूमते रह जाएंगे। जनता अब आकलन के आधार पर ही किसी जन प्रतिनिधि को दोबारा अवसर देगी। अगला चुनाव नई पीढ़ी तय करेगी।
विधायक का अपना सचिवालय भी होना चाहिए और उसके कार्यो का नियोजन भी। तबादले कराना पिछली सदी का काम था, आज का नहीं है। अब तो उसे विकास के मुद्दों को समझना है। लोगों से जुडकर रहना है। उनके मूल अधिकारों की रक्षा के लिए कमर कसनी है। धर्म, जाति, वंश और क्षेत्र से ऊपर उठकर। यदि हर विधायकअपने-अपने क्षेत्र पर भी पूरी पकड़ कर लेता है, तो कागजों में होने वाले विकास पर अंकुश लगाया जा सकता है। बशर्ते कि स्वयं विधायक अपने कार्यो में पारदर्शिता बरते। उसका दृष्टिकोण भी व्यापक हो और स्वयं सदा सक्रिय बना रहे। स्थानीय मुद्दों पर सार्वजनिक बहस को बढ़ावा दे सके तो सोने में सुहागा। इससे स्थानीय परिस्थितियां, सम्भावनाएं और विकास के मुद्दे स्पष्ट हो सकेंगे। परम्पराओं और सांस्कृतिक वातावरण का संरक्षण हो सकेगा। यह निरन्तर संवाद ही आधुनिक विकास के मार्ग प्रशस्त करेगा और लोकतांत्रिक समाज के निर्माण का नया इतिहास रच जाएगा।
गुलाब कोठारी

जून 15, 2009

देशहित में

लोकतंत्र की दो बड़ी पार्टियों में से यदि एक छिन्न-भिन्न हो जाती है, जैसा कि स्पष्ट दिखाई दे रहा है, तब देश में लोकतंत्र की सुगंध फीकी पड़ जाएगी। देश का हित दोनों दलों के सक्षम और सशक्त रहने में ही है। लोकतंत्र में चुनावी हार-जीत तो चलती रहती है। वर्ष 1977 में कांग्रेस हारी है तो वर्ष 1984 के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को महज दो सीटें मिलीं। लेकिन कोई भी पार्टी खत्म नहीं हुई। नेतृत्व खत्म नहीं हुआ। लेकिन आज स्थितियां चिन्ताजनक हैं। देशभर का मीडिया एक स्वर में उनमें से एक के विखण्ड़न का चित्रण कर रहा है। पार्टी में नीचे का कार्यकर्ता मूकदर्शक है और राष्ट्रीय पदाधिकारी ही कूद-फांद कर रहे हैं। जबकि पार्टी उनकी विरासत तो नहीं है।

देशवासियों के सामने आज महत्वपूर्ण सवाल यह है कि यदि भाजपा नहीं तो कौन लेकिन कौन के जवाब में कोई नहीं दिखाई दे रहा। कहने को भाकपा, माकपा, राकांपा, बसपा कई राष्ट्रीय पार्टियां हैं, लेकिन सब क्षेत्रीय पार्टियों जैसी। किसी पर भी देश चलाने का भरोसा नहीं कर सकते।

जब अटलजी प्रधानमंत्री थे, तब मैंने विभिन्न यात्राओं के दौरान देश और पार्टी के भविष्य को लेकर सवाल उठाए थे। उन लोगों के नाम भी लिए जो पार्टी को नुकसान पहुंचा रहे हैं, ड़ुबोने का कार्य कर रहे हैं। बेलगाम तो बोल ही रहे थे। वे इतना ही कहकर रह जाते कि देश का दुर्भाग्य है। आज सारे ही नाम पटल पर हैं और पूरा देश इन्हें टकटकी बांधे देख रहा है। नीचे कार्यकर्ता लज्जित भी महसूस कर रहा है। मोहन भागवत इस दर्द को समझ तो रहे हैं, किन्तु संघ को अचानक राजनीति से बाहर निकालने में हिचक रहे हैं। न वे यह कह पाते कि भविष्य में संघ भी राजनीति में रहेगा। अच्छा तो ये हो कि संघ अपनी सन् 1965 की भूमिका पर लौट आए और देश का गौरव बढ़ाए। भाजपा के अधिकांश राष्ट्रीय पदाधिकारी संघ की पृष्ठभूमि के हैं।

इतना ही नहीं, पिछले कुछ वर्षो में भाजपा के सहयोगी दल विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल, शिव सेना आदि का भी जो व्यवहार देश के समक्ष दिखाई दिया, उसे भी गरिमापूर्ण नहीं कहा जा सकता। उसमें भी अधिकांशत: धर्म के नाम पर ही किया गया। बड़े नेताओं के अहंकार की चर्चाएं मीडिया में भरी पड़ी हैं। चुनाव में जनता द्वारा नकारे जाने पर भी इनकी हैंकड़ी कम नहीं हुई। देश को किसी दल की चिन्ता नहीं होती, यदि नकारा है तो। चिन्ता तो लोकतंत्र और देश की है। ऎसा भी नहीं कि कांग्रेस इन झगड़ों से बची हुई है। किन्तु वहां एक ड़ोर से बंधे हैं।

आज कांग्रेस की सरकार केन्द्र में है। उसे भी दो दलों पर आधारित लोकतंत्र के बारे में चिन्तन करना चाहिए। प्रादेशिक पार्टियों को प्रदेश तक ही सीमित करना उचित है। नए सिरे से चुनाव आयोग को निर्देश दिए जाएं। चुनाव में जातिगत विष प्रभावी न रहे और आरक्षण भी बना रहे, इस पर निर्णय करना भी आज की महती आवश्यकता है। देश खण्डित होने से बच जाएगा।

देश के आगे हर व्यक्ति गौण हो जाना चाहिए। यशवन्त सिन्हा के बाद उन अन्य नेताओं को भी पदों से इस्तीफे दे देने चाहिए, जिन पर सार्वजनिक रूप से अंगुलियां उठ रही हैं। आज की स्थिति में बाहर बैठकर भी उन्हें पार्टी के लिए सकारात्मक कार्य में सहयोग देना चाहिए। आखिर उनका भी वर्षो का दुख-सुख का साथ रहा है। आशा करनी चाहिए कि पार्टी और संघ मिलकर शीघ्र ही स्थिति में सुधार लाएंगे। नहीं तो लोकतंत्र अपनी करवट स्वयं बदलेगा।

गुलाब कोठारी

जून 12, 2009

आ-रक्षण

Filed under: Stambh — gulabkothari @ 7:00
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अरक्षण का अर्थ है चारों ओर से सुरक्षित होना। महिला आरक्षण बिल को लेकर एक वाक् युद्ध सा देश में छिड़ा हुआ है। हमारा लक्ष्य होना चाहिए कि आरक्षित वर्ग की सुरक्षा भी हो और देश भी असुरक्षित महसूस नहीं करे। महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने पर दोनों बड़े दल तो सहमत हैं, किन्तु कुछ प्रान्तीय दल आलोचना कर रहे हैं। वैसे आरक्षण का मूल प्रस्ताव जब स्वीकृत हुआ, तब कोई आगे नहीं आया। आज मुलायम-लालू यदि कहते हैं कि सीटों का नहीं पार्टी प्रत्याशियों की संख्या का आरक्षण होना चाहिए। बात उचित तो है, किन्तु अन्य पदों के आरक्षण या अन्य सीटों के आरक्षण में यह नीति क्यों नहीं अपनानी चाहिए, इस पर वे मौन हैं।

वास्तविकता यह है कि अन्य नीयत से लागू किया कानून आज देश के विखण्ड़न का हेतु बन गया। क्योंकि इसके कार्यगत स्वरूप को नियंत्रण में नहीं रखा गया। इससे आरक्षण की मूल भावना ही खो गई। लाभ कुछ प्रभावशाली लोगों तक सिमट कर रह गया। अधिकांश वंचित रह गए। एक ही परिवार के एक ही सदस्य को आरक्षण देने की शर्त होती, तब इसका व्यावहारिक स्वरूप दूसरा होता। गुणवत्ता का मापदण्ड़ तो रहा ही नहीं।

आरक्षण की पूरी नीति पर पुनर्विचार होना चाहिए, ताकि इसका लाभ व्यापक समाज तक पहुंच सके और गुणवत्ता भी बनी रहे। इसके लिए जिस प्रकार सीटों या क्षेत्रों को आरक्षित किया गया है, यह तो सामन्ती दृष्टिकोण ही है। लोकतंत्र या जनता की आवाज कहां सुनाई देगी। आज इन सीटों पर जनता मतदान करते हुए भी कुण्ठित है। यह विड़म्बना ही है कि चुनाव आयोग की संहिता में जहां “जाति” शब्द का निषेध है, वहीं आयोग “जाति” आधारित आरक्षण के आधार पर सीटें आरक्षित करता है। आरक्षण का अर्थ होना चाहिए कि प्रत्येक पार्टी अपने प्रत्याशियों की सूची में आरक्षित वर्ग का हिस्सा निश्चित करे और जनता उनमें से अपनी पसन्द का उम्मीदवार चुने। सीटों का आरक्षण तो लोकतंत्र पर कुठाराघात ही है। यही लक्ष्य महिला आरक्षण में भी होना चाहिए। हर पार्टी की सूची में 33 प्रतिशत महिलाएं भी हों, सामान्य और आरक्षित वर्ग की भी हों। शेष जनता पर छोड़ा जाना चाहिए, ताकि हर उम्मीदवार गुणवत्ता के आधार पर ही मैदान में उतरे।

सच तो यह है कि हमारे राजनेता स्वयं संकल्पवान नहीं हैं, अवसरवादी हैं। भीतर से खोखले हैं, अत: जनता का सामना नहीं कर पाते। देश के हित में आवाज उठाने वाले भी नहीं हैं। साठ साल की यात्रा स्वयं इसका उदाहरण है। चुनाव जीतने के बाद सभी दलों के नेता एक-दूसरे की भाषा बोलने लग जाते हैं। तब सुधार कहां से निकलेगा आरक्षण का जहर भी यह देश इसीलिए पी रहा है। प्रतीक्षा है कि कब कोई नेता ऎसा आए, जनता को साथ ले और देशहित में बड़े मुद्दों को हल कर दे।

गुलाब कोठारी

अप्रैल 15, 2009

कहां तक गिरेंगे

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आपने किसी स्कूल में दो बच्चों को झगडा करते देखा हैक् इसने मेरी पेन्सिल छीन ली। इसने मेरे कपडों पर स्याही छिडक दी। पहले इसने मुझे पागल कहा था-वगैरह-वगैरह। न उनको यह ध्यान रहता कि आस-पास कौन खडे देख रहे हैं, न ही यह कि आचार्य के सामने क्या उत्तर देंगे। आगामी लोकसभा चुनाव के परिप्रेक्ष्य में हमारे देश के राजनेता इसी तरह आपस में गुत्थम्-गुत्था हो रहे हैं। एक वाक् युद्ध का-सा वातावरण पूरे देश में दिखाई पड रहा है। इस बार तो बडे-बडों ने भी अपनी मर्यादाएं तोडकर व्यक्तिगत आरोप-आक्षेप लगाने शुरू कर दिए। नरेन्द्र मोदी कांग्रेस को बुढिया कहते हैं, तो प्रियंका को लगता है कि मोदी उससे अघिक कैसे गिर सकते हैं। कह देती है कि मैं उनको 125 साल की बुढिया लगती हूं। आडवाणी और मनमोहन सिंह दोनों ही प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में देखे जा रहे हैं, किन्तु दोनों के ही बयान सडक छाप हो गए। कोई चुप रहकर अच्छा प्रमाणित करने को आतुर ही नहीं है। लगने तो यह लगा है कि राज्य स्तरों पर भी यह चुनाव वाक्युद्ध प्रतियोगिता से जीता जाएगा।

क्या यही हमारे लोकतंत्र की अवधारणा रही हैक् दोनों बडी पार्टियों के घोषणा-पत्रों को ध्यान से पढें तो इस बार के और पिछले चुनावों के घोषणा-पत्रों में मूलत: कोई नीतिगत अन्तर नहीं निकलेगा। ये तो अब रस्म अदायगी मात्र रह गई है। कौन नेता अपनी घोष्ाणाओं की चर्चा करता है। सभाओं में तो सामने वाली पार्टियों पर केवल प्रहार करते हैं। देश के ज्वलंत मुद्दों पर किसी घोषणा-पत्र में कोई संकल्प नहीं है। आतंकवाद, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, शिक्षा, चिकित्सा-सारे घोडे-गधे एक समान नजर आते हैं। पिछले 15-20 साल में किस सरकार ने क्या-क्या राष्ट्रव्यापी घोषणाएं की थीं, सब गायब हैं। बोफोर्स, सत्यम्, सवाल के बदले धन, महिला-आरक्षण, पेयजल आदि सभी मुद्दे गायब हैं। ऊपर से वंशवाद, जातिवाद को सभी हवा देते नजर आ रहे हैं। जातिवाद को हटाना चाहते हैं, किन्तु आरक्षण रखना चाहते हैं। आश्चर्य ही है। टिकिट देने के नियम सब बदल गए। कार्यकर्ता होने की अनिवार्यता समाप्त कर दी गई। धनवान हो और जीतने लायक हो, भले ही पिछली बार का हारा हुआ हो। लगता है कि ईश्वर भी भारतवासियों के धैर्य की परीक्षा ले रहा है। नेताओं की कसरत तो मात्र कुर्सी हथियाने की दिख रही है। देश को नेतृत्व देने की नीयत किसी की नहीं है। तीसरा मोर्चा सबसे आगे उतावला हो रहा है। परिणाम में केवल छाछ ही हमारे हिस्से आएगी, मक्खन तो निकलता नजर नहीं आ रहा। जो कुछ उम्मीद है वह मतदाता के लोकतंत्र के प्रति संकल्प को बनाए रखने से पूरी होगी।

गुलाब कोठारी

मार्च 23, 2009

बढते चलें

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जिस प्रकार हर समाज की इकाई एक परिवार होता है ठीक उसी प्रकार देश की भी इकाई एक गांव होता है। जैसे-जैसे गांव का विकास होता है उसी अनुपात में देश का विकास भी होता है। एक- एक व्यक्ति को उस विकास में अपनी भागीदारी निभानी होती है तभी हमकोे सामूहिक परिणाम देखने को मिलते हैं। हम पिछले साठ साल से देख रहे हैं कि हमारे यहां पंचायती राज है। सन् 1959 में पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने नागौर में पंचायती राज की शुरूआत की। तब से आज तक इस पंचायती राज का फोटो हम हाथ में लेकर घूम रहे हैं। संविधान के 73वें और 74वें संशोधनों के माध्यम से पंचायत राज और नगरपालिका संस्थाओं को अघिकार सम्पन्न बनाने की मंशा प्रकट की गई। पर खानापूर्ति ही ज्यादा हुई। न पंचायती राज के चुनाव के प्रति कोई सरकार हमको गम्भीर दिखाई देती है, न अघिकारों के प्रति कोई सचेत है। हम खुद भी सचेत नहीं हैं। बजट मिलने की बात तो बहुत ही दूर है, क्योकि ऊपर वाले कोई चाहते ही नहीं कि नीचे तक पंचायतों को बजट के अघिकार भी दिए जाएं।

पर समय बदल चुका है। और हमें भी इसके साथ-साथ बदलने की जरूरत है। अपने विकास के लिए हम दूसरों के भरोसे नहीं रह सकते। बीडा हमको खुद ही उठाना होगा। हमारे यहां एक कहावत है कि आप मरे बिना स्वर्ग नजर नहीं आता। लोकतंत्र की अवधारणा है जनता के लिए, जनता के द्वारा। जनता के लिए है, तो यह हमारा अघिकार हुआ लेकिन जनता के द्वारा है। हमें इसको जनता के द्वारा ही स्थापित करके मूर्त रूप देना पडेगा।

हम पिछले साठ साल से देख रहे हैं, बहुत सारे स्वार्थी तत्व बीच में पड गए और पंचायती राज के नाम से अपनी -अपनी स्वार्थ सिद्धी में लगे हुए हैं। हम वहीं के वहीं खडे हैं। हमारा विकास, हमारी शिक्षा, हमारी चिकित्सा, हमारा रोजगार, गांव की उन्नति सब वहीं के वहीं दिख रहे हैं। अन्य देश इसी दौरान कहां से कहां पहुंच गए। हमारे लिए ये सब आज भी सपना बने हुए हैं। समय आ गया है जब हमें नए संकल्प के साथ नए लोकतंत्र की स्थापना करने की जरूरत है। हमें संकल्प करना चाहिए कि हमारे गांव की हर गतिविघि पर हमारी नजर होगी। हमारे गांव की हर योजना पर हमारी नजर होगी। हमारे गांव के नाम पर हो रहे हर खर्च पर हमारी नजर होगी। हम सूचना के अघिकार का अघिक से अघिक उपयोग करके इसकी जानकारी अपने हाथ में रखेंगे। तब ही हम सुनिश्चित कर सकेंगे कि हमें लोकतंत्र का जो लाभ मिलना चाहिए, वह मिल रहा है। तभी शायद हम नए सिरे से अपनी पीढी को संस्कारवान बना पाएंगे। नई पीढी को आवश्यकता के अनुरूप शिक्षित भी कर पाएंगे। हम अपने-अपने गांव को एक आदर्श गांव की तरह से विकसित कर सकेंगे।

हर बार पांच साल में हमारे सामने चुनाव आते हैं। हर चुनाव में हमसे कुछ वादे किए जाते हैं। चुनाव समाप्त होने के बाद वे सब वादे भुला दिए जाते हैं। हम अपनी-अपनी आवश्यकताओं के लिए जूझते रहते हैं, एडियां घिसते रहते हैं। हमारी आवाज किसी कान तक नहीं पहुंचती। दूसरी ओर हम यह देख रहे हैं कि विकास के स्थान पर हमारा कितना बडा नुकसान इस लोकतंत्र के नाम पर होता चला जा रहा है। चुनाव में वोटों की राजनीति ने हमारे समाज के कितने टुकडे कर दिए। आरक्षण ने टुकडे कर दिए, जातिवाद ने टुकडे कर दिए, वंशवाद ने टुकडे कर दिए। इसका नुकसान यहां तक हो रहा है कि कई अपराधी भी चुनाव जीत कर आने लग गए। फिर हम अपने गांव में विकास की उस छवि को, उस सपने को मूर्त रूप होते हुए देखने की उम्मीद कैसे करेंक्

आज सचमुच हमें इस बात के लिए संकल्पित होना है कि हम जातिवाद, धर्म या और किसी भी बहाने से समाज को टूटने नहीं देंगे। उन प्रत्याशियों पर भी कडी नजर रखेंगे जो इन चीजों को बढावा देकर या इनके बहाने से हमें बहला-फुसला कर हमारा मत ले जाते हैं। अगर यह टूट हम रोक पाए तो निश्चित है कि हम स्वस्थ समाज को खडा कर सकेंगे। नई पीढी को भी हमें आश्वस्त करने की जरूरत है कि उसका भविष्य लोकतंत्र में ही सुरक्षित है। और किसी तंत्र में सुरक्षित नहीं। नई पीढी को कमर कस कर नई उडान के लिए अपने आपको तैयार करना चाहिए। जुट जाना चाहिए। पत्रिका कदम-कदम पर उनके साथ रहेगी। पत्रिका जनता को जागरूक करने के लिए, लोकतंत्र में उनकी भूमिका को बढाने के लिए लगातार अभियान चलाती रहती है। विधानसभा चुनाव के दौरान जागो जनमत अभियान इसी उद्देश्य के लिए था। हमने मतदान बढाने के लिए या मताघिकार का उपयोग करने के लिए अभियान चलाए। हमने प्रत्याशियों से लोगों को रूबरू कराने के लिए अभियान चलाए। ठीक उसी तरह अब नया अभियान हमें चलाना है। लोकतंत्र में अपनी भागीदारी और अपनी संकल्पबद्धता बढाने और अपने सपनों के गांव को, विकसित करने के मार्ग पर हम श्रद्धेय बाबूसा. के जन्म दिवस 20 मार्च को अपना पहला कदम उठा चुके हैं। राजस्थान के 157 गांवों में ग्रामसभाएं हुई। मध्यप्रदेश और कुछ अन्य राज्यों में भी हुईं। आप सबने पूरे उत्साह से भाग लिया। महिलाओं ने भी पूरी भागीदारी की। हजारों लोगों ने अपने-अपने गांव को साक्षर करने, बुराइयों को दूर करने और विकास की दिशा में आगे बढने का संकल्प किया। पत्रिका परिवार की ओर से आपकी भागीदारी के लिए हार्दिक आभार। यह तो शुरूआत है। इस अभियान को आगे बढाने में पत्रिका कोई कसर नहीं छोडेगी। ईश्वर से कामना करता हूं कि इस उठे हुए कदम को आगे पूरे जोश के साथ बढाने में हमारे सहायक बनें। हमें आशीर्वाद दें, यही मंगल कामना है।

गुलाब कोठारी

मार्च 21, 2009

स्वयं में रहो

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नर-नारी पंच महाभूत से बने इस शरीर के नाम हैं। इसकी एक निश्चित उम्र भी होती है। इसका उपयोग भीतर बैठा जीव करता है, जिसकी उम्र का कोई पता नहीं और जिसका कोई लिंग भेद नहीं होता। शरीर जीवन का एक चौथाई अंश है। शेष तीन अंश (अंग) मन-बुद्धि और आत्मा हैं। शरीर के अंश की उपयोगिता (प्रकृति के अनुरू प) भी एक चौथाई, केवल गृहस्थाश्रम में ही होती है। यदि हमारे जीवन का आधार केवल शरीर और इससे जुड़े हुए सुख ही हैं, तो हम तीन चौथाई जीवन व्यर्थ कर देते हैं। पुरूष की शक्ति बुद्धि और शरीर में है। नारी की शक्ति मन में है। पुरूष का निर्माण स्त्री/पत्नी ही कर सकती है। न कोई नारी, न स्वयं पुरूष इसे सम्भव कर सकते हैं। पत्नी रू प स्त्री ही गृहस्थाश्रम में निर्माण करती है और आगे निर्वाण पथ पर चढ़ा देती है।

आज के अर्थ युग में सबकी एक ही तो महत्वाकांक्षा रहती है- धन कमाने की। इसका उपयोग भी शरीर ही करता है। व्यक्ति अपने और अपनी संतान के लिए ही करता है। शरीर का उपयोग आहार-निद्रा-भय और मैथुन रह जाता है। यह तो एक पशु के लक्षण हैं। मानव जीवन का लक्ष्य इसके आगे भी होना चाहिए। तभी सार्थक होगा।
हमारे जीवन को पुरूष और प्रकृति (माया) मिलकर चलाते हैं। नर-नारी दोनों में ही पुरूष भाव भी होता है और स्त्रैण (प्रकृति) भाव भी होता है। दोनों ही के निर्माण में अधिदेव, अधिभूत और अघ्यात्म की भूमिका रहती है। नर-नारी एक ही सौर संवत्सर (सूर्य-चन्द्रमा-पृथ्वी युक्त) के दो भाग हैं। न कोई छोटा, न कोई बड़ा। दोनों के ही अपने-अपने निर्धारित (प्रकृति दत्त) स्वरू प और कार्य हैं। पुरूष भाव अहंकार प्रधान होता है। स्त्रैण भाव मन की मृदुता और शीतलता पर आधारित है। वही पुरूष को 75 साल बांधकर रख सकता है। शरीर की सीमा बहुत थोड़ी होती है। पुरूष के साथ सृष्टि क्रम को बढ़ाने के लिए शुक्र होता है। नारी पृथ्वी की तरह उसका ग्रहण और पोषण करती है।

आज महिला स्वयं को आक्रान्त महसूस करती है। विश्व भर में कहीं भी वह सुखी नहीं है। विडम्बना यह है कि जिस पुरूष समाज से वह दु:खी है, वह भी एक नारी का ही ग्रहण और पोषित किया हुआ है। साथ ही जो उसे पीडि़त कर रहा है, उसी से उम्मीद कर रही है सहायता की। इससे भी आगे, वह स्वयं भी उसी की नकल करके उसी की तरह जीना चाहती है। जो आज अच्छी है, संस्कारवान है, वह भी खराब हो जाना चाहती है। हो क्या रहा है इस नकल में न तो वह पुरूष ही बन पा रही है, न ही वह नारी के गुणों का ही संरक्षण और पोषण कर पा रही है। वह शरीर से अपने को नारी मानकर जीवन की समग्रता को खण्डित कर रही है। जब शरीर एक चौथाई महत्व रखता है, तब उसकी तीन चौथाई जिन्दगी तो दु:ख के हवाले हो जाएगी। पुरूष की नकल में वह स्त्रैण नहीं बनी। अच्छी पत्नी और अच्छी मां बनना छूट गया। तब शरीर में क्या रह जाएगा, जो सुख देगा बुद्धि का अहंकार उसे पुरूष जैसा बनाएगा। इसी से शादी के बाद भी एक बनकर नहीं रह पाते, दो ही रहते हैं। दो पुरूष विवाह करके लम्बे काल तक सुख से नहीं रह सकते। संतान भी उसकी जैविक होगी। बिना किसी संस्कार के। अभिमन्यु तो कोई पैदा ही नहीं कर पाएगी। उसकी मां भी उसे नहीं सिखा रही। लड़के-लड़की की बराबरी की होड़ में लड़की भी उतना ही सीख पाती है, जितना कि लड़का। फिर लड़की का दोष कहां मां की विकासवादी अवधारणा ही तो बेटी को अंधे कुए में धकेलती है। भले ही आगे लड़की को दु:खी देखकर उनका बुढ़ापा खराब हो जाए

नारी को ईश्वर ने नर से हजार गुणा ज्यादा शक्तियां देकर, ज्यादा व्यावहारिक समझ देकर पैदा किया है। वह सृष्टि का एक गतिमान तत्व है। परिवार, समाज और संस्कृति का वह निर्माण करती है। नारी शरीर से नहीं, नारीत्व से करती है। स्त्रैण बनकर करती है। जब वह पुरूष से अच्छा पढ़ सकती है, उससे अच्छी नौकरी कर सकती है, तब उसकी नकल क्यों करना चाहती है। वह खूब आगे भी बढ़े और अपने प्राकृतिक स्वभाव को भी पूर्ण रू प से विकसित करती रहे। पुरूष स्वत: ही उसके आगे छोटा हो जाएगा। यदि वह स्त्री भाव को स्वीकार नहीं करती, तो यह भी तो प्रकृति को चुनौती देना ही है। फिर कुदरत की मार खाकर पुरूष को दोष क्यों देना चाहती है व्यक्ति अपने किए का ही फल भुगतता है। दूसरे के कर्मो का नहीं। आज भी बहुत बड़ा नुकसान नहीं हुआ है। हम इस देश को नए सिरे से संस्कारवान बना सकते हैं, जहां नारी का फिर से सम्मान होगा। वह इस देश की शक्ति बनकर उभर सकती है। शक्ति तब नजर आएगी, जब पुरूष उसके चक्कर लगाएगा और वह छूने भी नहीं देगी। विवाह संकल्प है, शेष सब विकल्प हैं।

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