Gulabkothari's Blog

मार्च 7, 2013

Women’s day special : Edit video of Patrika Group’s Chief Editor Gulab Kothari

The chief editor of Patrika Group Shree Gulab Kothari speaks about Women’s Day.

 

नारी नहीं, नारीत्व

आज सम्पूर्ण विश्व महिला दिवस मना रहा है। महिला को पुरूष से अलग करके देखे जाने का उत्सव है। महिलाएं सशक्तीकरण की मांग किससे कर रही हंै? पुरूष से ही तो? उसको अलग करके शक्तिकिसकी बनना है? पुरूष की तरह क्या महिला भी अर्द्धनारीश्वर नहीं है? क्या मानव की मादा का नाम महिला है? किस प्राणी के मादा नहीं होती? महिला की तो पहले ही शक्ति संज्ञा है। चूंकि वह नारीत्व के इस शक्ति स्वरूप को भूल बैठी, प्रकृति की इस मार को सहन नहीं कर पा रही है। वह अपने भीतर की स्त्री को भूल बैठी। शिक्षा ने उसे शरीर और बुद्धि तक ही ठहरा दिया है।

उच्च शिक्षा ने उसकी संवेदनशीलता, प्रेम और वात्सल्य, धैर्य एवं सहनशीलता जैसे गुण छीन लिए हैं। शिक्षित होने के बाद उसके पास एक ही विकल्प बचा है-लड़कों की तरह जीना, लड़कों की तरह सोचना, लड़कियों की प्राकृतिक जीवन शैली से दूर हो कर जीना। शादी-परिवार आदि क्षेत्रों में पश्चिम की जीवन शैली की नकल करना। जो वहां की महिलाएं आज भोग रही हैं, उन्हीं परिणामों को भोगने की तैयारी करते जाना।

प्रकृति ने नर-नारी में भेद नहीं किया। केवल शरीर भिन्न दिए, ताकि एक-दूसरे के पूरक बन सकें। अग्नि-सोमात्मक जगत की यज्ञ के द्वारा सृष्टि कर सकें। आत्मा के स्तर पर दोनों भिन्न नहीं हैं। कृष्ण का गीता में उद्घोष है-ममैवांशो जीव लोके, जीव भूत सनातन:।

सभी जीव उसी के अंश से उत्पन्न होते हैं। तब महिलाओं में शक्ति प्राप्ति का यह सारा चीत्कार क्यों है? क्या विश्व की सारी महिलाएं इस अभियान में साथ हैं? अस्सी के दशक के शुरू में मैंने अमरीका में “वुमन्स लिब” का अभियान भी देखा है। तब भी मुझे एक दैनिक पत्र की सम्पादक ने कहा था कि “न जाने कौन इस झण्डे को लेकर चल रहीं हैं। आगे जाकर इसका बड़ा नुकसान ही होगा।”

भारत शरीर का पुजारी नहीं है। आत्मा की पूजा करता है। कई जन्मों के सम्बन्ध निभाने एवं कर्मफल भोगने तथा ऋण चुकाने की शिक्षा देता है। स्वयं के लिए गृहस्थाश्रम तथा शेष जीवन मानवता के लिए त्यागने की उद्घोषणा करता है। बीज बनकर जमीन में गड़ जाने का मार्ग प्रशस्त करता है, ताकि बीज वृक्ष बन सके। समाज को फल और छाया मिल सके। बीज इनका स्वयं उपभोग नहीं करता। आज की शिक्षा स्वयं के लिए जीना सिखाती है। स्वयं के लिए केवल पशु जीता है।

उसके जीने का कोई लक्ष्य नहीं होता। मानव को धर्मयुक्त अर्थ-काम का जीवन मोक्ष प्राप्ति तक जीना होता है। शिक्षा शरीर (अर्थ) और बुद्धि के बल पर जीना सिखाती है। मन-आत्मा की बात नहीं होती। अत: जीवन की अपूर्णता का मार्ग खोलती है। शिक्षा का उद्देश्य अच्छे इंसान तैयार करना था। यह कार्य तो बन्द ही हो गया। अब यह बोझ हर बच्चे पर आ गया कि स्वयं अपने को अच्छा इंसान बनाए। आज शिक्षा केवल कॅरियर देती है।

विश्व महिला दिवस पर यह चिन्तन तो होना ही चाहिए कि दिवस नारी का मनाया जाए अथवा नारीत्व का! नारीत्व ही तो नारी की शक्ति है। फिर सोचें कि अलग से महिला शिक्षा क्यों? क्या आवश्यकता है महिला विद्यालय और महाविद्यालयों की? क्या हम अच्छी नारियां प्रस्तुत कर पा रहे हैं? नारी शिक्षा का एक ही अर्थ है-देश में सुसंस्कृत नारी तैयार कर सके।

नारी शरीर में स्त्रैण भाव (वुमन हुड) तैयार कर सकें। तभी समाज सुदृढ़ होगा, समाज की सांस्कृतिक छवि बन पाएगी, समाज आर्थिक विकास कर सकेगा। शिक्षा का उद्घोष है कि लड़के-लड़की में कोई भेद नहीं। बराबरी की बात, सुविधाओं तथा अवसरों की होती है, प्रकृतिदत्त कर्मो की नहीं। लड़कों की तरह जीने को तैयार कर रहे हैं।

इस अन्धी दौड़ में न अच्छी नारी बन पाएगी, न ही पुरूष बन सकेगी। स्वयं की कमजोरियों में लड़कों की भी कमजोरियां जुड़ जाएंगी। आज शिक्षित और विकसित नारी इसलिए कष्ट पा रही है कि उसमें नारीत्व का विकास घट रहा है। क्या महिला शिक्षा अच्छी पत्नी या मां बननेे की दिशा तय करती है? आज भी महिला शादी करके पति के साथ ही रहती है। क्या सौम्या अग्नि में आहुत होने नहीं आती? क्या आहुत होने पर सोम शेष रहता है?

क्या एक चरम पर पहुंचकर सोम ही अग्नि तथा अग्नि ही सोम नहीं हो जाते? इन प्रश्नों के उत्तर ही जीवन के स्वरूप का निर्माण करते हैं। स्थूल शरीर के कर्मो के द्वारा ही मानव सूक्ष्म और कारण शरीर तक की यात्रा करता है। महिला दिवस पर मानव के इस स्वरूप पर भी चिन्तन होना चाहिए। इसके बिना शरीर आधारित महिला-पुरूष अन्य पशुओं से भिन्न नहीं हो सकते। उनका जीवन भी आहार-निद्रा-भय-मैथुन से ऊपर नहीं उठ पाएगा। हमारे भी पशुओं की तरह जैविक (असंस्कारित) संतानें होंगी। मानव शरीर का उपयोग पशु जैसा ही होगा। महिला चाहे तो स्त्रैण (वुमन हुड) बनकर विश्व की संस्कृति एक ही पीढ़ी में बदल सकती है।

आज महिला दिवस के अवसर पर चिन्तन इस बात पर भी होना चाहिए कि आखिर यह दिवस किसके लिए मनाया जा रहा है? महिला के आधे महिला शरीर के लिए या पुरूष के आधे महिला भाग के लिए! जिन परिस्थितियों के कारण महिला आज दबाव में है, उनको महिला ही बदल सकती है। तब फिर दबाव स्वत: ही दूर होते चले जाएंगे। प्रश्न यह है कि क्या मुझे कॅरियर पूरा करके ही मर जाना है या खुद के लिए भी कुछ लक्ष्य पूरे करने हैं। कॅरियर तो महिला निभा सकती है, किन्तु दूसरे लक्ष्यों के लिए नारीत्व को प्रतिष्ठित करना ही पड़ेगा।

गुलाब कोठारी

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दिसम्बर 24, 2012

गुलाब कोठारी को मूर्तिदेवी पुरस्कार

नई दिल्ली। लेखक,चिंतक एवं पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी को सोमवार को उनकी कृति “मैं ही राधा मैं ही कृष्ण” के लिए भारतीय ज्ञानपीठ की ओर से वर्ष 2011 का 25वां मूर्तिदेवी पुरस्कार प्रदान किया गया। यह सम्मान लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने दिया। गुलाब कोठारी को पुरस्कार स्वरूप चार लाख रूपए का चेक प्रदान किया गया। उन्हें श्रीफल देकर और शॉल ओढ़ाकर राजस्थान निर्मित मूर्ति प्रदान कर सम्मानित किया गया।1

इस मौके पर उत्तर प्रदेश के राज्यपाल बीएल जोशी भी मंचासीन थे। तीन मूर्ति भवन में आयोजित सम्मान समारोह में मीरा कुमार ने कहा कि एक अच्छा लेखक वही होता है,जिसके अंदर संवेदनाएं होती हैं। मेरा अपना अनुभव है कि बिना संवेदनशील हुए लेखक नहीं बना जा सकता।

इस लिहाज से गुलाब कोठारी बेहद संवेदनशील हैं। इसका अंदाजा मुझे तब हुआ,जब मैं सामाजिक न्याय मंत्री थी और निशक्तजनों की सहायता के लिए अलग-अलग राज्यों में शिविर लगाए जा रहे थे। इसी सिलसिले में एक बार जयपुर में शिविर का आयोजन हुआ,जिसमें बच्चे,अभिभावक और इस क्षेत्र में काम कर रहे कई संगठन के प्रतिनिधि थे। वहां केवल एक ही व्यक्ति थे,जो किसी संगठन से जुडे हुए नहीं थे,तब मुझे मुलाकात के दौरान बताया गया कि ये तो राजस्थान पत्रिका के प्रधान संपादक हैं,मैं उनसे बहुत प्रभावित हुई।

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मुझे लगा कि जो व्यक्ति इस छोटे शिविर में आ सकता है,वह कितना संवेदनशील है,इसलिए वे जब भी,जहां भी बुलाएंगे,मैं वहां चली आऊंगी।

इस मौके पर भारतीय ज्ञानपीठ के आजीवन न्यासी अलोक प्रकाश जैन ने कहा कि मूर्तिदेवी पुरस्कार से सम्मानित गुलाब कोठारी एक प्रतिष्ठित और विचारशील रचनाकार हैं। वे एक पत्रकार हैं,कवि हैं,संवेदनशील विचारक और सुचिन्तित गद्यकार हैं। वे निरन्तर करूणा,बुद्धि और विवेक की चिन्तन परम्परा को आगे बढ़ा रहे हैं।

समारोह के अंत में ज्ञानपीठ के निदेशक रविंद्र कालिया ने सभी का धन्यवाद देते हुए कहा कि मूर्तिदेवी पुरस्कार ज्ञानपीठ की परंपरा का उज्वल प्रयास है। गुलाब कोठारी की कृति में स्त्री भावों को जिस तरह उकेरा गया है,वह अतुल्यनीय है।

Gulab kothari

 

ये भी रहे मौजूद
समारोह में राजस्थान विधानसभा में प्रतिपक्ष नेता वसुंधरा राजे सिंधिया,सांसद गिरिजा व्यास,सांसद दुष्यंत सिंह,विधायक ओम बिड़ला,भाजपा की राष्ट्रीय महासचिव किरण माहेश्वरी,पूर्व भाजपा महासचिव संजय जोशी,पंजाब केसरी के संपादक विजय चोपड़ा के अलावा साहित्यकार विश्वनाथ त्रिपाठी,चित्रा मुद्गल,कैलाश वाजपेयी,सत्यव्रत शास्त्री,ममता कालिया,पदमा सचदेव समेत साहित्या,कला,संस्कृति से जुड़ी तमाम हस्तियां उपस्थित थीं।

व्यक्ति स्वयं ही राधा-स्वयं ही कृष्ण : कोठारी
समारोह में गुलाब कोठारी ने कहा कि लेखन कर्म की शुरूआत पाठक को इष्ट मानकर की जाती है। उसी का आशीर्वाद आवरणों को समझने में दर्पण बनता है। चौरासी लाख योनियों के आवरणों को हटाने के लिए भी कम से कम चौरासी लाख कृष्ण अंशों का आशीर्वाद चाहिए। पाठक यदि इससे भी अधिक हों तो आवरण हटने की गति तेज हो जाती है। इसी से ज्ञान प्रकट होता है क्योंकि ज्ञान पैदा नहीं होता,बस ढका रहता है।

 

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कोठारी ने कहा कि कर्म के लिए कामना और कामना के लिए ज्ञान आवश्यक है। जैसे-जैसे ज्ञान से पर्दे हटते जाते हैं,पाठक रूपी इष्ट भीतर दिखाई देने लगता है। उसी के माध्यम से आवरण दिखाई देते हैं। पाठक का भीतर प्रविष्ट हो जाना ही शब्द-ब्रह्म की साधना का मूल लक्ष्य है। हम कह सकते हें कि लेखन कार्य शब्द-ब्रह्म या कृष्ण को पाने का यात्रा मार्ग हो सकता है।

फिर क्या जरूरत उसे बाहर कहीं ढूंढ़ने की और क्या जरूरत है,कोई अन्य वेद पढ़ने की। भीतर-बाहर सब कृष्ण ही कृष्ण। उनके मुताबिक कृष्ण बनकर कृष्ण को नहीं पाया जा सकता इसके लिए पुरूष का स्त्रैण बनना भक्ति मार्ग की अनिवार्यता है। अर्द्धनारीश्वर का स्वरूप तब जाकर समझ में आता है और तब पाठक शब्दों के अंतराल को पढ़ने लायक बनता जाता है। गीता साक्षी है कि शब्द -ब्रह्म का ऎश्वर्य ही भगवान हो जाता है। व्यक्ति स्वयं ही राधा,स्वयं ही कृष्ण हो जाता है।

उन्होंने कहा कि ब्रह्म के कारण ही सृष्टि पुरूष प्रधान है। शेष सारी माया है,आवरण है। इसी कारण लेखन कार्य शब्द-ब्रह्म की तपोभूमि है। शब्द वाक का जप है,अनुष्ठान है। श्रद्धा और समर्पण पाठक के प्रति कृष्ण अंश के प्रति इसकी अनिवार्यता है। तब भयास की निरंतरता इस जप को वाचिक से उपांशु और आगे मानस में प्रष्ठित कर देती है। मन के भाव ही अभिव्यक्ति के लिए होते हैं। वे ही प्राणों के रूप में गतिमान होकर शब्द-वाक बनते हैं।। जिस प्रकार अर्थ सृष्टि में क्षर पुरूष में अक्षर पुरूष और अक्षर पुरूष में अव्यय पुरूष रूप आलंबन प्रतिष्ठित रहता है,वैसे ही वाक सृष्टि में भी शब्द के भीतर अक्षर, स्वर और स्फोट रहते हैं। व्यक्ति अपने आवरणों को भी पाठक के निमित्त समझता जाता है। इनको समझना ही हटाने की प्रक्रिया है।

पुरस्कार एवं सम्मान

मूर्ति देवी पुरस्कार 2011- “मैं ही राधा मैं ही कृष्ण” कृति के लिए भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा घोषित पुरस्कार
हल्दीघाटी अवार्ड 2012- उल्लेखनीय पत्रकारिता के लिए महाराणा मेवाड़ चेरिटेबल फाउण्डेशन द्वारा
डॉ. राममनोहर लोहिया स्मृति राष्ट्रीय
पुरस्कार 2011- अखिल भारतीय मारवाड़ी युवा मंच नासिक (महाराष्ट्र)
तरूण क्रांति साहित्य सम्मान 2011
आईओयू पीस अवार्ड 2010
जाइन्ट्स इंटरनेशनल अवार्ड 2010- पत्रकारिता के क्षेत्र में कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ विशेष अभियान के लिए जाइन्ट्स इन्टरनेशनल मुम्बई द्वारा
पंडित दीनदयाल उपाध्याय साहित्य सम्मान 2009 – छोटी खाटू हिंदी पुस्तकालय राजस्थान
चतुर्थ ओकी-दो पुरस्कार 2007-08 -ओकीदो जिक्कोकई मिक्यो योगा, इटली
राष्ट्र गौरव अवार्ड 2007- तिरूपति आंध्रप्रदेश स्थित ब्रह्मचारी आश्रम के आचार्य गुरूजी गुरूवानंदजी द्वारा
नैतिक सम्मान-2006- गुलजारीलाल नंदा फाउण्डेशन, आम आदमी के जीवन में नैतिक मूल्यों की स्थापना के लिए
भास्कर पुरस्कार 2003- प्रखर नेतृत्व के लिए भारत निर्माण संगठन द्वारा
आचार्य तुलसी सम्मान 2003- पत्रकारिता में मानवीय मूल्यों के समावेश के लिए
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पुरस्कार 1995-96
फोटो पत्रकारिता पुस्तक लेखन के लिए
मेट्रो ओकी-दो योगा सम्मान
ओकी-दो गूडो जिक्कोकई मिक्यो योगा इटली
सुदीर्घ साधना सम्मान, भोपाल

इन मानद पदों पर आसीन

जनमंगल चेरिटेबल ट्रस्ट- पत्रिका के लोक कल्याण कार्यक्रमों के लिए पत्रिका की ओर से संचालित संस्था। यह गरीबी व आपदा से प्रभावित लोगों की मदद के लिए है।
पंडित मधुसूदन ओझा वैदिक अध्ययन एवं शोधपीठ संस्थान- वैदिक साहित्य के अनुसंधान व प्रोत्साहन के लिए राजस्थान विश्वविद्यालय द्वारा मान्यता प्राप्त
आईओयूएफ नीदरलैण्ड्स तथा ओकी-दो ग्लोबल रिसर्च इंस्टीट्यूट, इटली के अंतरराष्ट्रीय सलाहकार
ओकी-दो मिक्यो योगा लिबेरा यूनवर्सिता, कोरबोरदोलो (इटली) के मानद अध्यक्ष
आईओयूएफ नीदरलैण्ड्स व अमरीका के प्रोफेसर वैदिक स्टडीज

प्रकाशित पुस्तकें

मानस- हिंदी संस्करण चार भाग- वैदिक मूल्यों पर आधारित यह पुस्तक संतुलित जीवन का रास्ता दिखाती है। यह पुस्तक मानव मस्तिष्क को आम आदमी व समाज को वास्तविक खुशियों का मार्ग दिखाती है। इस पुस्तक का दस भाषाओं में अनुवाद हो चुका है।
बाडी माइंड इन्टेलेक्ट (अंग्रेजी) -शोध पुस्तक, इस पर आईओयू ने डॉ. कोठारी को डी लिट की उपाधि दी।
सोल ऑफ इवोल्यूशन (अंग्रेजी)
संप्रेषण- सोल ऑफ इवोल्यूशन पुस्तक का हिन्दी संस्करण
न्यूजपेपर मैनेजमेंट इन इंडिया (अंग्रेजी) -शोध पुस्तक जिस पर आईओयू ने उन्हें पीएचडी की उपाधि दी।
सिमटता नारी तत्व- इसमें डॉ. कोठारी ने नारी के विभिन्न रूपों का सजीव चित्रण किया है।
कलर टेक्सटाइल्स ऑफ राजस्थान (हिन्दी-अंग्रेजी द्विभाषी) -इस पुस्तक में राजस्थान के वस्त्रों व हैण्डीक्राफ्ट की जानकारी मिलती है।
स्पंदन- चिन्तनपरक आलेखों का संकलन
स्पंद- कविताओं का संग्रह
धर्म, अर्थ,काम,(माया) मोक्ष -मानव जीवन के व्यथित भावों की चार गाथात्मक कविताएं
स्टेपिंग स्टोन्स टू स्प्रिचुअलिटी- (अंग्रेजी)
फोटो पत्रकारिता- फोटो पत्रकारिता के बारे में उपयोगी संदर्भ पुस्तक
पत्रकारिता जनसंचार एवं विज्ञापन- पत्रकारिता के छात्र- छात्राओं के लिए उपयोगी पुस्तक
समाचार पत्र प्रबंधन – (हिंदी)
लिखावट और आपका व्यक्तित्व- हस्तलेखन पर शोधपरक पुस्तक
आद्या- नन्ही पौत्री से प्रेरित गाथात्मक दार्शनिक कविताओं का संग्रह
कृष्ण तत्व की वैज्ञानिकता- पंडित मधुसूदन ओझा के शास्त्रीय दृष्टिकोण में गीता में कृष्ण तत्व का वैज्ञानिक आधार
वेद : वैज्ञानिक दृष्टि- वेद के वैज्ञानिक पहलुओं पर आधारित आलेखों का संकलन
राजस्थान की ग्रामीण कलाएं एवं कलाकार- राजस्थान के ग्रामीण जीवन की कलाएं व कलाकारों पर प्रामाणिक अध्ययन

मैं ही राधा मैं ही कृष्ण एक मानि्त्रक काव्य

आचार्य गुलाब कोठारी का जीवन और काव्य दोनों ही अस्तित्व का सहज प्रतिफलन हैं। उन्होंने जिसे जिया उसे ही लिखा और जिसे लिखा उसे ही जिया भी। इसलिए उनका जीवन श्री से अलंकृत हो गया और उनका काव्य सारस्वत सुषमा से चमत्कृत हो उठा। दूसरे शब्दों में, उनका जीवन एक काव्य बन गया और उनका काव्य जीवन का दर्पण बन गया।

योगीराज श्री अरविन्द ने कहा था कि भविष्य की कविता माçन्त्रक होगी। “मैं ही राधा मैं ही कृष्ण” उसी माçन्त्रक कविता का उदाहरण है। महर्षि वेदव्यास ने घोषणा की थी कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के सम्बन्ध में जो कुछ महाभारत में कह दिया गया है उसके बाद कुछ कहने को शेष नहीं रहता-

धर्मे अर्थे च कामे च मोक्षे च भरतर्षभ।
यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत्क्वचित् ।।

गुलाब जी ने चारों पुरूषार्थो पर फिर भी अपनी कलम चलाई तो लगता है कि उनकी कविता वैदिक ऋçष्ा की उषा के समान “पुराणी युवति” है। उषा न जाने कब से उदित होती आ रही है किन्तु प्रत्येक प्रात: वह नई ही प्रतीत होती है।

आलोच्य काव्य के केन्द्र में मनुष्य है और मनुष्य इतिहास के प्रारम्भ से ही सुख-दु:ख की चिरपरिचित धूप-छाया में पलता रहा है। फिर भी नूतन की उद्भावना कहां से की जाए? कश्मीर के नैयायिक जयन्त भट्ट के सामने यही समस्या थी- कुतो वा नूतनं वस्तु वयमुत्प्रेक्षितुं क्षमा:- मनुष्य से सम्बद्ध सत्य तो सनातन ही होगा किन्तु देश-काल का परिवेश नित्य नवीन होता है। अत: जो कवि देश-काल से जुड़कर चलता है वह सनातन सत्य में भी नवीनता ला देता है। पुरूषार्थ चतुष्टय पर हजारों पृष्ठ लिखे गए हैं किन्तु प्रस्तुत कृति में किसी भी पुरूषार्थ पर पढ़ते समय बासीपन का अहसास नहीं होता।

इसे ही काव्यशास्त्री “नवनवोन्मेषशालिनी प्रतिभा” कहते हैं। गुलाब जी की विशेषता यह है कि वे नवीनता के मोह में शाश्वत को भूले नहीं हंै, जैसा कि आजकल बहुत से कवियों के साथ घटित होता रहा है। इस कृति में उन्होंने शाश्वत सत्य को भी इस तरह प्रस्तुत किया है मानो वह हमारे अपने समय का ही सत्य है। दूसरे शब्दों में कहूं तो यह कृति शास्त्र भी है और समाचार पत्र भी। इस प्रकार इसमें क्लासिकल और रोमान्टिक का संगम है। उचित होगा कि स्थालीपुलाक-न्याय से कृति के कुछ अंशों पर विमर्श किया जाए।

धर्म- मूल काव्य धर्म से प्रारम्भ होता है। महर्षि वेदव्यास की घोष्ाणा थी, धर्म से ही अर्थ और काम की सिद्धि होती है- धर्मादर्थश्च कामश्च। उनकी यह वेदना थी कि उनकी यह बात कोई नहीं सुनता- न च कश्चिच्छृणोति मे। यही वेदना प्रस्तुत काव्य की भी जननी बन रही है- श्लोकत्वमापद्यत यस्य शोक:। धर्म का एक रूप पूजा भी है। कवि की पूजन विधि अद्भुत है- जो कुछ मिला है/ “उसी का” दिया है/ मुझे तो मिला है/ एक ही वरदान/कर्म करने का/ तब क्यों न चढ़ाऊं/ मैं अपना कर्म/ ईश्वर को/ बिना मांगे कुछ भी। कवि ने साम्प्रदायिक कट्टरता की सारी इमारत ही यह कह कर ढहा दी कि- धर्म नहीं है/आस्तिक होना/ नास्तिकता भी है/ धर्म/ यदि केन्द्र में हो/ आनन्द भाव। यहां कवि दार्शनिक से भी आगे निकल गया है। दार्शनिक किसी वाद को लेकर चलता है किन्तु कवि जीवन की अखण्डता को देखता है।

अर्थ- गुलाब जी का अर्थ गणित-केन्द्रित नहीं है। वह बहुत व्यापक है- अर्थ वाक्/ और शब्द वाक् / अर्थात् लक्ष्मी/ और सरस्वती एक है दोनों ही। वेदविज्ञान में कोई पदार्थ जड़ नहीं है। किन्तु जड़ में चेतन देख पाने की बात तो दूर की है, हम तो चेतन को भी जड़ मानकर चल रहे हैं- पत्नी भी अर्थ/ बच्चे भी अर्थ/ वरना नहीं है/ किसी भी काम के।

काम- काम पुरूषार्थ की व्याख्या में कवि फ्रायड को बहुत पीछे छोड़ देता है- कैसे दाम्पत्य-यज्ञ का अवभृथ स्नान हो अद्वैत सरोवर में। जहां न पहुंचे रवि वहां पहुंचे कवि। स्त्री-पुरूष भाव की एक मौलिक व्याख्या कवि ने की है- दोनों ही/ रहना चाहते हैं/ पौरूष भाव में/ प्रारम्भ काल में/ और अन्त में दोनों ही/ बन जाते हैं/ स्त्रैण्य।

मोक्ष- इस खण्ड में कविता पूरी तरह माçन्त्रक हो गई है- मन-प्राण-वाक् का, इच्छा-क्रिया-ज्ञान/ नाद-शब्द-ध्वनि/ अहंकृति, प्रकृति और आकृति। जब इतने पर भी कवि को सन्तोष नहीं हुआ तो उसने श्रुति को ही उद्धृत कर दिया- यो बुद्धे:परतस्तु स:। जहां तक मोक्ष का प्रश्न है- कोई नहीं चाहता/ मोक्ष/ बातें करते हैं/ सब कोई मोक्ष की/ मोक्ष का अर्थ है- खुद का मर जाना।

अब “मोक्ष का अर्थ है- खुद का मर जाना” मन्त्र नहीं है तो और क्या है? इसे मन्त्र की तरह जपा जाए तो अहंकार का विष उतरता चला जाता है। विश्वास न हो तो जप कर देख लें। माçन्त्रक काव्य का रस जीवन-रस है।

अक्टूबर 21, 2012

लज्जा रूपेण संस्थिता

या देवी सर्वभूतेषु लज्जा रूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।

परिवर्तन के इस दौर में सामाजिक और नैतिक मूल्यों की बड़ी उठापटक हुई। जीवन भौतिकवादी दृष्टिकोण के कारण इतना एकपक्षीय हो गया कि सुर-असुर के बीच का झीना परदा -लज्जा- भी फट गया। लज्जा ही सदाचार में बनाए रखती है और अनाचार में प्रवेश से रोकती है। लज्जा के पीछे कई प्रकार के भय रहते हैं। उसी से व्यक्ति मर्यादा में रहता है। लज्जा नर-नारी दोनों पर समान रूप से लागू होती है। दोनों ही अर्धनारीश्वर हैं।

पुरूष चूंकि çस्त्रयों के अनुपात में आक्रामक अधिक होता है, अभिमानी अधिक होता है, उतावला होने की वजह से करने के बाद विचार करता है, लज्जा के भय से बहुत हद तक मुक्त रहता है। इसी लज्जा को बनाए रखने के लिए नवरात्रा में शक्ति पूजा करता है, कन्या पूजन करता है, ताकि महिलाओं के प्रति उसके आदर भाव में कोई कमी नहीं आए। यदि कमी आ भी गई, तो आराधना करके, प्रायश्चित करके पुन: प्रतिष्ठित किया जा सके। देवी स्वरूप की व्याख्या करके उसका झूठा महिमामण्डन नहीं किया जाता। पुरूष-प्रकृति की गलत परिभाषा भी इसके लिए उत्तरदायी है। प्रत्येक पिण्ड, मूर्ति और आकार का केन्द्र पुरूष ही है — जड़, चेतन, नर-नारी में। पुरूष के चारों ओर परिधि तक माया-प्रकृति है।

पुरूष में अहंकार के कारण आसुरी (नकारात्मक) भाव अधिक होते हैं। स्त्रैण ही इनका संतुलन है। आज नारी का स्त्रैण घट रहा है। वही उसके संत्रास का मुख्य कारण है। शिक्षा ने नारी का पौरूष भाग अधिक विकसित किया। भयमुक्त भी किया और विवाह की उम्र भी बढ़ा दी। एक ओर, उसके विचारों का लचीलापन लगभग समाप्त होने लगा, दूसरी ओर, प्रकृतिदत्त मातृत्व भाव का दबाव भी अपना प्रभाव दिखाता रहा। उसकी पुरूष प्रकृति का विकास विकर्षण का कारण बन गया। विवाह विच्छेद होते ही सुरक्षा-चक्र टूटने लगा।

नौकरी के यौन शोषण ने उसको अपनी ही नजरों में गिरा दिया। उसका सारा गर्व चूर-चूर हो गया। किसी युवा महिला का अकेले जीना शायद जमाने को गवारा ही नहीं। हर मुकाम पर अत्याचार, बलात्कार और वह भी अपने ही समर्थ लोगों द्वारा, किसका ह्वदय नहीं चीर देगा! तब लगता है कि नारी होना एक अभिशाप है। यही सच है। इसका उत्तर स्त्रैण भाव में निहित है, जो पीछे छूट गया। मैं कार चला रहा हूं। सामने से एक कार आ रही है। ड्राइवर नशे में लगता है। दुर्घटना होने के बाद ड्राइवर को कोसने से क्या फायदा। कारण तो हमारी असावधानी या अक्षमता है।

आज तो भ्रूणहत्या और आत्महत्या दोनों के आंकड़े वीभत्स नजर आते हैं। भ्रूणहत्या तो अपने आप में दरिन्दगी का प्रमाण है। इस कृत्य में मां, दादी, डॉक्टर, नर्स आदि सभी महिलाएं जुड़ी होती हैं। पुरूष वर्ग को कभी अभाव महसूस नहीं होता। प्रश्न यह है कि हत्या से जुड़ी सारी औरतें अपने-अपने जीवन से इतनी दुखी होती हैं कि भय के कारण किसी नई कन्या का अवतरण ही नहीं चाहतीं? क्या दहेज हत्या, महत्वाकांक्षा आदि घर में नारी को देखना ही नहीं चाहते, संतान को संस्कारवान कोई देखना ही नहीं चाहता?

इसी का दूसरा पहलू है पुरूष का नारी के प्रति व्यवहार। इसमें पिछले वर्षो में बहुत गिरावट आई है। शायद नारी की अत्यधिक महत्वाकांक्षा का ही दोहन हो रहा है। शुरू का दौर ग्लैमर युक्त रहता है। उम्र के साथ एक भाव फिर से मन में कौंधने लगता है कि घर पर रहती, तो कभी अपमान के इतने घूंट नहीं पीने पड़ते।

नारी को अत्याचारों से मुक्ति चाहिए तो सबसे पहले उसे अपने स्वरूप की जानकारी हो। शरीर के आगे वह पुरूष से कई गुणा आगे है। वही समाज को धर्म, संस्कृति और पहचान देती है। हर एक के भीतर शक्ति है। उसका विकास ही उसका त्राण बन सकता है। बाहर जिसकी सहायता मांगेगी, वही अपना मोल मांगेगा। यही अत्याचार की शुरूआत है। इसका पहला बीज मंत्र है लज्जा।

गुलाब कोठारी

सितम्बर 3, 2012

रे मनवा मेरे!

रे मनवा,कहां चला रे,बाहर-बाहर,जगत के जाल में,कुछ फंसनेकुछ फांसने,जाता है रो…
रे मनवा,
कहां चला रे,
बाहर-बाहर,
जगत के जाल में,
कुछ फंसने
कुछ फांसने,
जाता है रोज
आता नहीं लौटकर।
क्या तेरा व्यापार
जगत में,
क्या तेरा व्यवहार,
भरता नहीं पेट रे
लोभ से, तृष्णा से,
राग और द्वेष से,
किसी की चमड़ी प्यारी,
किसी की दमड़ी,
कौन लगे खोटा
कौन लगे प्यारा,
माया का जाल
है ये जग सारा।
कोई ले जाता तुझे
भरकर अहंकार में,
तोड़ता मर्यादा
मन की हुंकार में।
बांधता है खुद को
मर्जी के नाम पर,
कैसी स्वतंत्रता यह
कैसा अज्ञान है।
रे मनवा,
क्यों झूमता
इस धुन पर,
क्यों थिरक रहे पांव,
क्यों गया रे वहां
नहीं तेरा गांव।
पता नहीं तू
भागता पीछे-पीछे
इन्द्रियों के विषयों के,
अथवा पकड़ती तुझे
माया ही
इन्द्रियों के जरिए।
तू है पागल
मेरे मनवा
बंधा पड़ा माया से,
माया भोगे तुझको
हर पल
रूप बदलकर
छाया से।
लोग कहे
माया है पत्नी,
तब क्या है
शेष जगत की रचना,
क्या है गंध,
स्वाद, रस, भाषा,
क्या दिखता है
आंखों से,
क्यों बन जाते
सारे बन्धन,
मन को बींधकर,
बांधकर
नचाते रहते हैं
जीवन भर,
और जान कहां पाया
तू
गुजार दी योनियां
चौरासी लाख,
बस एक भूत
सवार तेरे सिर पर
“एकोहं बहुस्याम”1
देखी तेरी शक्ति
देख ली माया तेरी,
आंख-मिचौनी
तुम-दोनों की
बदले कितने रूप
हर योनि में
तूने भोगे
माया रूप अनन्त,
“बहुस्याम्” की
क्या परिभाषा
जान न पाया संत
“अलख-निरंजन”
की तर्ज पर
कब उठ जाती
मन में तरंग
“बहुस्याम” की,
पूरी उम्र
ढूंढता धरती
नई बुवाई करने को,
छk वेश में
माया ढंकती
तेरी इन करतूतों को,
माया का स्वामी
तू ही है
माया तेरी दास,
करती सब
तेरे इंगित पर
फिर भी तू उदास,
क्यों फंसा है
लेन-देन में
बनकर तू व्यापारी
तू तो स्वामी
है इस जग का
नर हो चाहे नारी,
कुछ दिन देख
बैठकर भीतर
माया के सब रूप,
साक्षी भाव में
समझ सकेगा
जीवन अंधा कूप।
इस अज्ञान अंधकार में
पलते हैं दो पूत
ममकार2 का मोह
साथ में फुफकारे
अभिनिवेश3 का
अहंकार।
मोह की सीमा
नहीं कोई
तन की, मन की,
धन की,
रस की, स्वाद की,
श्रवण, स्पर्श की
यश की
संतानों की,
अभिमानी के
नेत्र सुखों की
गिनती है अनजानी।
पुनरावृत्ति प्रमाण
मोह का
जीवन की कमजोरी,
माया आती
पलट-पलट कर
रचने को व्यापार।
सोच कभी तो
क्यूं तू आया
धरकर मानव देह,
कार्य हो चुका,
काल गया तब
क्यों उलझे
नित नेह?
आ, लौट चलें
अपने घर को,
क्षमा मांगकर सबसे!
माया के रूपों से
खोल सके
सब बन्धन मन के,
मुड़-जाएं भीतर
इन्द्रियां मन की ओर,
आत्मा के संग
जुड़ सके
मन की डोर,
आत्मभाव भी
लीन हो सके
सागर से ईश्वर में,
आ, लौट चलें!

रे मनवा
आया था तू
एक संकल्प लेकर
इस देह में
“एकोहं बहुस्याम”।
पुरूष रूप तेरा
घिरा था
माया के घेरों में,
बंधा था केन्द्र में
बेबस, निरीह सा,
छटपटाहट सी
बनी है आज भी
मुक्ताकाश की,
लौट जाने की
जहां से आया था
इस ओर।
जी चुका है खूब तू
इस देह में,
हो गया है मोह
तुझको देह से
देह-सुख से,
डर चला है
मृत्यु के आगोश से।
भूल चुका क्या
आना-जाना
एक क्रम है
सृष्टि का,
क्या देखे नहीं
तूने खुद ने भी
क्रम 84 लाख
आने-जाने के,
कौन सी देह
धरी नहीं तूने,
कौन औषध और
वनस्पति नहीं खाई
इस सृष्टि की?
देव था, असुर था
रह चुका पशु-पक्षी भी
तब आया लेकर
मानव देह,
ताकि छूट सके
इस चक्र से,
कर्म-फल के
जनम-मरण से।
मोह और ममता
बांधे बैठे हैं
खुद का भी
संतान भी
स्वजन-परिजन भी
जड़-चेतन दोनों
धरे चित्त को
अपनी चकाचौंध से,
कर रहे भ्रमित
तुझे हर क्षण
मुखौटे माया के।
क्या कोई सम्बंध
देखा है कहीं
प्रकृति भाव में,
न कोई नर,
न मादा है वहां,
है तो बस प्राण,
पुरूष है अकेला
माया शक्ति संग
आया है रचने
विश्व-बहुस्याम्
जी चुका तू
हर योनि को,
कर चुका भोग
हर कर्म का
पूर्ण हुई इच्छाएं,
तब क्यों भ्रमित,
ललचाता दरिद्र सा,
भागता देख माया को
क्यों अभी भूखा है
यह त्रिगुणी मन?
एक और बाकी है
परीक्षा तेरी,
करते ही संकल्प
लौट आने का
देखना गरजेंगी
माया की छाया सभी,
जाने देंगी क्योंकर
छूटकर चंगुल से
तुझे,
आएगी रिझाने को
तुझे कई रंग में,
पकड़ने को किसी
इन्द्रिय सुख के
भ्रम में।
बहुत हो चुका
भ्रमित रे मनवा
लख चौरासी भागा
सारा जग है
भूल-भुलैया
एक माया का धागा
उसके भीतर तू
बैठा अकेला
करता प्रतीक्षा
निकलने बाहर।
कर ले साहस
मान हकीकत
मरना तो होगा ही,
तोड़ के बन्धन
मुड़ जा भीतर
कछुवे जैसा हो ले।
साक्षी भाव है
लौट आना,
छोड़कर जीवन के
क्रमण4 को,
आक्रमण को,
अतिक्रमण को,
खोल देना मुटि्ठयां
समय से पहले ही
क्या ले जाएगी
मृत्यु तब, जब
होंगे हाथ खाली?
हो जा भय से मुक्त
ठहर जा अभी,
वर्तमान में,
समय में,
आ लौट चलें!
रे मनवा मेरे!

1. मैं एक हूं, बहुत हो जाऊं
2. ममत्व
3. अज्ञान जो मृत्यु के भय का कारण हो
4. चाल

गुलाब कोठारी

जून 10, 2012

पानी का नाटक

राजस्थान से अधिक कौन-सा राज्य जल का महत्व समझता होगा। आज यदि यहां का नागरिक सर्वाधिक त्रस्त है, तो पानी की समस्या से। सरकारें सदा ही ‘उधार लेकर घी पीने’ का मार्ग अपना रही हैं। नौकरशाह पानी के प्रति कभी संवेदनशील रहे ही नहीं। पानी की कमी होती जान पड़े, तो तुरन्त करोड़ों की योजना बनाकर मंत्रिमंडल के आगे रख देंगे। कहीं से भी जल ले आएंगे। भले ही वहां के किसान, पशु एवं अन्य आबादी प्यासी रह जाए। खेती सूख जाए। ज्यादा दबाव बढ़ा तो वहां कहीं और स्थान से पानी ले आएंगे। नई योजना का बजट मिल जाएगा।

आज राज्य की दुर्दशा का कारण राजनीति भी है। भ्रष्टाचार भी है। अधिकारियों की क्षुद्र मानसिकता भी है। संवेदनहीनता तो है ही। क्या पचास फीट के भराव वाला रामगढ़ बांध अपने आप सूख गया? इसकी जमीन पर हल चलाते हुए, मकानों की नींवें खोदते हुए किसी का सीना फट क्यों नहीं गया? बीसलपुर का पानी भी रामगढ़ में डालते तो पचास कि.मी. तक के गांव हरे हो जाते। जमीन में जल का स्तर बढ़ गया होता, परन्तु इनका ध्यान तो मकान बनवाने पर टिका था। तीस लाख लोगों की बद्दुआओं का इनके लिए कोई महत्व नहीं था। जो नुकसान मुगलों और अंग्रेजों ने नहीं किया, हमारे अपनों ने कर दिखाया। सन् 1982 के एशियाड में यहां नौकायन की प्रतियोगिताएं हुई थीं। आज असुर प्रदेश बन गया है।

ठीक यही दुर्दशा राज्य के अनेक बांधों की हो चुकी है। उच्चतम तथा उच्च न्यायालय के फैसलों को स्थानीय न्यायपालिकाएं लागू नहीं कर पा रही हैं। झीलों के किनारे भवन, होटल निर्माण स्थानीय पालिकाओं के सहयोग से ही होता है। शहर की गन्दगी उन्हीं में मिलती है। पर्यटन और बीमारी दोनों को निमंत्रण है। ऎसी ही स्थिति बांधों-तालाबों और नदियों के बहाव क्षेत्रों में बसने वाली कॉलोनियों अथवा सूखने पर उनमें शहर भर का सीवरेज डालने की है। जयपुर का तालकटोरा और इंदौर की खान नदी इसके उदाहरण हैं। बहाव क्षेत्रों में निर्माण, सीवरेज पर तो सख्ती से रोक लगनी चाहिए।

राज्य स्तर पर कोई जल नीति सार्वजनिक नहीं है। हर सरकार में चोरों की तरह काम होता है। पता चलता है, तब तक देर हो चुकी होती है। हमारे इंजीनियरों की क्षमता भी फाइलें चलाने तक सिमट चुकी हैं। जोधपुर में पानी की ऎसी व्यवस्था की, कि पानी अभिशाप बन गया। राज्य का मास्टर प्लान बनता ही नहीं। पिछली सरकार के जल मंत्री जागरण या जन चेतना के नाम से ही करोड़ों निपटा गए। उत्तरी राजस्थान में नहरें आई तो उनकी बपौती बन गईं। वे प्यासे जिलों को पानी छोड़ने को ही तैयार नहीं, भले उनकी जमीन में सेम की समस्या हो जाए।

कण-कण में कीटनाशक-रासायनिक खाद के अवशेष हर जीवन में विष घोल रहा हो। अशुद्ध, फ्लोराइड युक्त, विषाक्त जल पीना लोगों की मजबूरी बन गया। इसका उत्तर सरकार के पास नहीं है। साठ सालों में कितना बजट लगा होगा इस मद में! आज भी भू-जल का स्तर गिरता जा रहा है। क्यों? इसका कारण आबादी नहीं है, भ्रष्टाचार है। वर्षा का जल भी यदि प्रदेश रोक पाए तो बहुत कुछ समस्या कम हो सकती है।

जमीन में जल स्तर बढ़ाने के स्थायी कार्य कभी नहीं किए गए। लोगों को शिक्षित नहीं किया जाता। पानी की आवक का मार्ग अवरूद्ध करने वालों को कठोर दण्ड का प्रावधान भी नहीं है। न्यायालयों के फैसले तो जनहित में हैं, विभाग नहीं है। सरकार ने बांधों एवं बड़े तालाबों की मिट्टी निकालना ही छोड़ दिया है। इंजीनियर्स भी पाल को थोड़ा ऊंचा करके जनता को बेवकूफ बनाते रहते हैं। यदि नीचे की मिट्टी नहीं हटेगी, तो नदी की ढलान समाप्त हो जाएगी।

राज्य में जल-जमीन के कानून भी बाबा आदम के जमाने के हैं। गांव के तालाब की जमीन पंचायत की, पानी जलदाय विभाग का, खेती का रकबा राजस्व विभाग का। मौज केवल भ्रष्टाचारियों की। अब तो एनिकट ने पानी का गला घोंट दिया। पानी का बहाव रोकने की स्वीकृति देशद्रोह जैसा अपराध माना जाना चाहिए। इसके लिए किसी भी मद में राशि स्वीकृत नहीं होनी चाहिए। फिर भी यदि कोई यह दुस्साहस करता है, तो उसके विरूद्ध आपराधिक मुकदमा चलाया जाना चाहिए।

जो भी सरकार लोगों को पीने का जल नहीं उपलब्ध करा सकती, वह कितनी भी कसमें खा ले, जनता की हमदर्द नहीं हो सकती। सरकारें चाहें तो एक वर्ष का सारा बजट पानी पर खर्च दे (आवश्यक सेवाओं को छोड़कर), तो पानी की समस्या पर बहुत कुछ नियंत्रण हो सकता है। एक साल स्वास्थ्य वर्ष हो सकता है। किन्तु इच्छाशक्ति के समाचार तो हर दिन पढ़ रहे हैं। सरकार की हालत  देखकर तो तरस आता है। नंगा क्या धोए, क्या निचोड़े? भ्रष्टों के खिलाफ मुकदमे वापस ले लिए। रामलाल जाट जैसे अपराधियों के विरूद्ध न खनन घोटालों की जांच, न पारस देवी के मुद्दे पर कोई एफ.आई.आर.। सरकार को अल्पमत में आने का इतना डर है सबको खुली छूट है। लूट सके तो लूट।

गुलाब कोठारी

सितम्बर 13, 2011

अंतरजातीय विवाह की उलझन

हमारा देश आज एक ऎसे मार्ग पर चल पड़ा है जिसकी परिणति दुख के सिवाय कुछ और नहीं है। हर व्यक्ति उस मार्ग पर चलकर गौरवान्वित महसूस करता है। उसके पास कोई विकल्प भी नहीं है। हमारे सामने तथ्य हैं, सारे आंकड़े हैं, दर्शन है, अनुभव हैं, किन्तु हमारा अहंकार या लाचारी हमें इनमें से किसी को स्वीकारने नहीं देती। समाज और परिवारों में अनावश्यक तनाव, वैमनस्य बढ़ता जा रहा है। यह नया रोग है अन्तरजातीय विवाह।

 

इसको विकासवादी दृष्टिकोण की पैदाइश माना तो जाता है, किन्तु जीना उनके बीच पड़ता है, जिनके दिलो-दिमाग पर विकास पहुंचा ही नहीं है। प्रेम का रिश्ता कितनी सहजता से कट्टरता की भेंट चढ़ जाता है, यह दृश्य देखकर कितने लोग खुश हो सकते हैं, यह भी मानव समाज की त्रासदी ही है। क्योंकि भारत में यह पीड़ा या मुसीबतों का पहाड़ मूल रूप में तो कन्या पक्ष के सिर टूटता है।

 

पिछले सप्ताह कर्नाटक के धर्मस्थल गया था। एक ब्राह्मण लड़के की शादी अन्य जाति की कन्या से इसलिए की गई कि ब्राह्मण जाति में उपयुक्त कन्या नहीं मिली। एक साल के बाद लड़के ने लड़की को छोड़ दिया। वह लड़की न्याय की तलाश में आध्यात्मिक चेतना के साथ सामाजिक जनजागरण में जुटे वीरेन्द्र हेगड़े के पास आई थी।

 

आज शिक्षा की आवश्यकता और भूत ने इस समस्या में ‘आग में घी’ का काम किया है। भौतिकवाद, विकासवाद, स्वतंत्र पहचान, समानता की भ्रमित अवधारणा आदि ने व्यक्ति को शरीर के धरातल पर भी लाकर खड़ा कर दिया और अपने जीवन के फैसले मां-बाप से छीनकर अपने हाथ में लेने शुरू कर दिए। अधिकांशत: माता-पिता उसके मार्गदर्शक बनते नहीं जान पड़ते।

 

चूंकि शिक्षा नौकरी के अतिरिक्त अधिक विकल्प नहीं देती, अत: परिवार का विघटन अनिवार्य हो गया। दादा-दादी बिछुड़ गए। नई बहुएं सास-ससुर से भी मुक्त रहना चाहती हैं, तो बच्चों को संस्कार देने से भी। स्कूल, होम वर्क के सिवाय बच्चों के लिए उसके पास न समय है, न ही वह ज्ञान जिससे बच्चों का व्यक्तित्व निर्माण होता है। शिक्षा ने उसके मन को भी समानता के भाव के नाम पर यहां तक प्रभावित कर दिया कि वह ‘मेरे घर में लड़के-लड़की में कोई भेद नहीं है’ का आलाप तार स्वर में गाती है। इससे कोई अधिक क्रूर मां धरती पर कौन होगी जो अपनी बेटी को स्त्री युक्त, मातृत्व, गर्भस्थ अवस्था आदि की भी जानकारी नहीं देती, क्योंकि बेटे को भी नहीं देती। बेटी को अंधेरे में धक्का देकर गौरवान्वित होती है। बेटे को तो पूरी उम्र मां-बाप की छत्रछाया में रहना है। मां बनना नहीं है। नए घर में जीना नहीं है।

 

इस जीवन-शिक्षा के अभाव में न जाने कितने संकट हो रहे हैं। बच्चों को यथार्थ का ज्ञान नहीं होता और मित्र मण्डली के प्रवाह में जीना सीख जाते हैं। उच्च शिक्षा की भी अवधारणा हमारे यहां नकारात्मक है। बच्चों का शिक्षा के साथ उतना जुड़ाव भी नहीं होता, जितना विदेशों में दिखाई देता है। हां, शिक्षा के नाम पर अधिकांश बच्चों को उन्मुक्त वातावरण रास आता है। फिर कुदरत की चाल। उम्र के साथ आवश्यकताएं भी बदलती हैं। भूख लगी है और भोजन भी उपलब्ध है, तब व्यक्ति कितना धैर्य रख सकता है? मां-बाप बच्चों को भूखा रखते हैं।

 

संस्कारों का सहारा नहीं देते। उधर टीवी, इण्टरनेट इनको दोनों हाथों से शरीर सुख परोसने में लगे हैं। मन और आत्मा का तो धरातल ही भूल गए। शुद्ध पशुभाव रह गया। आहार-निद्रा-भय-मैथुन। और कुछ बचा ही नहीं जीवन में।

 

भारत में कुछ सीमा तक जो संस्कृत समाज हैं, उनको छोड़ दें। शेष अपने जीवन में इस पशुभाव पर नियंत्रण नहीं कर पाते। आज तो स्कूल में ही बच्चे 17-18 साल के हो जाते हैं। कक्षाओं से गायब रहते हैं। तब एक मोड़ जीवन में ऎसा आता है कि नियंत्रण भी छूट जाता है और विकल्प भी खो जाते हैं। ये परिस्थितियां ही इस अन्तरजातीय विवाह की जननी बनती हैं।

 

अन्तरजातीय विवाह में यूं तो खराब कुछ नहीं दिखाई देता। जिसको दिखाई देगा वह दुनिया का सबसे बड़ा मूर्ख है। जब लड़का-लड़की दोनों राजी हैं, तब किसी को अच्छा-बुरा क्यों लगना चाहिए? लेकिन जो कुछ नजारा अगले कुछ महीनों में सामने आता है, उसे देखकर मानवता पथरा जाती है। सारा समाज बीच में कूद पड़ता है। अनेक बाध्यताएं, जिनमें धर्म परिवर्तन तक की भी हैं, अपने मुखौटे दिखा-दिखाकर चिढ़ाती हैं। कट्टरता, संकीर्णता और निर्दयता से सारा वातावरण कम्पित हो जाता है। लड़की के मां-बाप की स्थिति बयान करना सहज नहीं है।

 

लड़की भी हजार गलतियां करने के बाद भारतीय है। मन में कुछ लज्जा का भाव होता है। जब किसी सभ्य परिवार की लड़की असभ्य परिवार से जुड़ जाती है, तब तो ताण्डव ही कुछ और होता है। किसी असभ्य परिवार की लड़की सभ्य और समृद्ध परिवार में चली जाती है, तब एक अलग तरह के अहंकार की टकराहट शुरू हो जाती है। जिन जातियों में नाता होता है, वहां मन कोई मन्दिर नहीं रह जाता। लड़की के दो-तीन तलाक हो जाएं तो लाखों का किराया वसूल लेते हैं मां-बाप। ऊपर से कानून एकदम अंधा। परिस्थितियों की मार से दबे मां-बाप के लिए कानून भी भयावह जान पड़ता है।

 

आज न्यायालयों में विवाह विच्छेद के बढ़ते आंकड़े इस देश के सामाजिक तथा पारिवारिक भविष्य को रेखांकित करते हैं। जीवन विषाक्त होता दिखाई पड़ रहा है। पश्चिम में सम्प्रदायों तथा जातियों की इस प्रकार की वैभिन्नता भी नहीं है और है तो भी ऎसी कट्टरता दिखाई नहीं देती। वहां पैदा होने वाले व्यक्ति को जीवन में दो-तीन शादी कर लेना मान्य है। हम अभी अर्घविकसित हैं। विकास का ढोंग करते हैं। भीतर बदले नहीं हैं। परम्पराओं और मान्यताओं की जकड़ से मुक्त भी नहीं हैं। फिर भी हम विकसित समाजों के पीछे दिखना भी नहीं चाहते। विदेशों में उच्च शिक्षा का कारण सुख प्राप्ति है।

 

स्वतंत्रता भी है और स्वावलम्बन भी। भारत में लड़कियों को उच्च शिक्षा सुख प्राप्ति के लिए नहीं दी जाती, बल्कि इसलिए दी जाती है कि खराब समय (वैधव्य या विवाह विच्छेद) की स्थिति में पराश्रित न रहे। नकारात्मक चिन्तन ही आधार होता है। तब समझौते का प्रश्न किसी के मन में उठता ही नहीं है। हम जब तक इस लायक हों कि यथार्थ को स्पष्ट समझ पाएं, हमारे यहां कुछ विकासशील कुण्ठाएं संस्कृति विरोधी कानून भी पास करवा लेती हैं। एक कहावत है कि हम अपने दुख से उतने दुखी नहीं हैं, जितने कि पड़ोसी के सुख से।

 

मात्र कानून बना देना विकास नहीं है। अभी मन्दिर-मस्जिद के झगड़ों से हम बाहर नहीं आए। आरक्षण ने जातियों के नाम पर अनेक विरोध के स्वर खड़े कर दिए। जब हमारी सन्तान हमारे साथ किसी जाति के विरोध में लड़ती है, हिंसक हो जाती है, तब क्या वह लड़का विरोधी जाति की लड़की का पत्नी रूप में सम्मान कर सकेगा।

 

अथवा ऎसा होने पर जातियों के बीच नए संघर्ष के बीज बोये जाएंगे? क्या समाज का यह दायित्व नहीं है कि यदि किसी सम्प्रदाय को वह स्वीकार नहीं करता, तो अपने बच्चों को भी शिक्षित करे? क्या विरोधी समाज की लड़की का अपमान करके अपनी बहू के प्रति उत्तरदायित्व के बोध का सही परिचय दे रहे हैं? क्या यह पूरे समाज का अपमान नहीं है? आज जीवन एक दौड़ में पड़ गया है।

 

एक होड़ में चल रहा है। स्पर्धा ने मूल्यों को समेट दिया है। नकल का एक दौर ऎसा चला है कि व्यक्ति की आंख खुद के जीवन के बजाए दूसरे पर टिकी होती है, जिसकी वह नकल करना चाहता है। जैसे कि शिक्षित लड़कियां भी लड़कों की नकल करना चाहती हैं। अत: लड़कियों के गुण ग्रहण ही नहीं करतीं। लड़का बन नहीं सकतीं। अत: यह आदमी की हवस का पहला शिकार होती हैं। भले ही इस कारण ऊंचे पदों तक पहुंच भी जाए, किन्तु सुख न इनको मिलता, न ही इनके माता-पिता को। बस, विकास की धारा में बहते रहते हैं।

 

प्रश्न यह है कि यदि हम विकसित हो रहे हैं, शिक्षित हो रहे हैं, तो इसका लाभ स्त्री को क्यों नहीं मिल रहा। शिक्षित व्यक्ति निपट स्वार्थी भी होता जा रहा है और उसे नुकसान करना भी अधिक आता है। अनपढ़ औरतें कन्या भ्रूण हत्या के लिए बदनाम इसलिए हो गई कि उनको गर्भस्थ शिशु के लिंग की जानकारी उपलब्ध नहीं थी। आंकड़े साक्षी हैं कि ऎसी हत्याओं में शिक्षित महिलाएं अधिक लिप्त हैं और चर्चा भी नहीं होती। ये हत्याएं इस बात का प्रमाण तो हैं ही कि नारी आज भी स्वयं को लाचार और अत्याचारग्रस्त मानती है। अपनी कन्या को इस पुरूष के हवाले नहीं करना चाहती।

 

पुरूष वर्ग का इससे अधिक अपमान हो भी क्या सकता है। अब अन्तरजातीय विवाह ने इस नासूर को नया रूप ही दिया है। लड़का अधिकांश मामलों में मां-बाप के साथ होकर लड़की को अकेला छोड़ देता है। तब उसके लिए मायके लौटने के अलावा कोई विकल्प नहीं रहता। इसके लिए भी उसे अदालतों के और वकीलों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। यह आत्म-हत्याओं को बढ़ावा देने वाला मार्ग तैयार हो रहा है। यह भी सच है कि व्यक्ति अपना किया ही भोगता है।

 

समाज हर युग में एक-सा रहा है। शिक्षा बाहरी परिवेश है भीतर की आत्मा की शिक्षा, उसका जागरण, परिष्कार आदि जब तक जीवन में नहीं जुड़ेंगे, संस्कारवान मानव समाज का निर्माण संभव नहीं है।

 

गुलाब कोठारी

पत्रिका समूह के प्रधान सम्पादक

जुलाई 14, 2011

हेराफेरी

हमारे यहां एक शब्द है फेर-बदल। उसका ही दूसरा रूप है हेरा-फेरी। केन्द्रीय मंत्रिमण्डल में जो फेरबदल हुआ, वह भी एक श्रेणी की हेराफेरी ही कही जाएगी। क्योंकि हेराफेरी के रूप में उन मंत्रियों को हटाया जाता है जिनका कार्य और आचरण सही नहीं होता या फिर जिनसे दल का अध्यक्ष नाराज होता है। आजकल दोनों ही कारण गौण हो गए।

 

भ्रष्टाचार ही वह कारण है जिस कारण एक को हटाया जाता है तथा दूसरे को अवसर दिया जाता है। दिल्ली में तो सोनिया गांधी के आगे सब गूंगे हैं, किन्तु राज्यों में स्थिति स्पष्ट दिखाई पड़ती है। भाजपा में तो हर विधायक ही मंत्रिमण्डल में रहना चाहता है। सब अपने मुख्यमंत्री के कपड़े खींचते रहते हैं।

 

समस्या बहुत बड़ी होती जा रही है। संसद के पास चिन्तन को समय नहीं है। गंभीर विषय या बिल चर्चा में आते ही शोर शुरू हो जाता है। क्योंकि जिस तरह के सदस्य चुनकर आने लगे हैं और बहुमत के अभाव में मिश्रित दलों की सरकारें बनने लगी हैं, वहां गुणवत्ता के प्रश्न हवा हो गए। संसद में सदस्य भी केवल मेरिट से आते हों ऎसा नहीं है। कई तरह की श्रेणियां-आरक्षण आदि से, जातिगत आधार पर, महिला आरक्षण के कारण गोलमा देवी जैसे सदस्य को मंत्री बनाना भी नेता के लिए लाजमी हो जाता है।

 

दल-बदलुओं की शक्ति भी फेरबदल के लिए मजबूर कर सकती है। इनमें अघिकांश सदस्य प्रदेश/देश के परिप्रेक्ष्य में चिन्तन क्षमता भी रखें, यह आवश्यक नहीं है। कई बार अपराघियों को भी मंत्री बनाना पड़ता है। मध्यप्रदेश में कई हैं। तब नेता के पास एक ही मार्ग बचता है सबको संतुष्ट करने का फेरबदल। हालांकि यह कोई समाधान नहीं, लाचारी है। इससे परिणाम सुधरते हों, ऎसा भी संभव नहीं है। बारह जुलाई के शपथ ग्रहण समारोह के चित्रों को ध्यान से देखने पर यह स्पष्ट दिखाई दे जाता है।

 

फेरबदल में दूसरा महत्वपूर्ण पहलू है कुछ मंत्रियों के विभागों में परिवर्तन। क्योंकि न तो उनको निकाला जा सकता, न ही वे खरे उतरे। अन्य लोगों को भी संतुष्ट करना पड़ता है। इन मामलों में जनता का अनुमान गलत भी निकल सकता है, क्योंकि जनता मेरिट को ध्यान में रखती है और नेता समीकरण को।

वैसे फेरबदल का यूपी चुनावों से ही तो लेना-देना है। वरना तो भ्रष्ट लोगों को फेरबदल के नाम पर बाहर निकालकर उन्हें सजा पाने से बचाया भी जाता है। यह भी भ्रष्टाचार ही है। अनेक मुद्दों पर चर्चाएं बदल जाती हैं, क्योंकि या तो मंत्री को हटा दिया गया या विभाग बदल गया।

 

विपक्ष स्वयं कुछ बोलने की स्थिति में आज नहीं है। मंत्री हटता है या बदल जाता है, भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सजा तो उसको मिलनी ही चाहिए। होता कुछ विपरीत ही है। भ्रष्ट मंत्री ही धन लाते हैं और बांटते भी हैं। फण्ड-रेजर माने जाते हैं। वे तो दूसरों को भी भ्रष्टाचार का लाइसेंस देते हैं। जनता को लूट लेना, जमीनों के अतिक्रमण, हत्याएं करवाना आदि को आश्रय देने वाले होते हैं। इनका तो दलों में विशेष सम्मान होता है।

 

फेरबदल का एक कारण है शीर्ष नेताओं के मर्जीदां लोगों को जगह देना। यह बहुत नाजुक मसला है। इस पर या तो नेता चुप रहकर मान लेता है अथवा शीर्ष की त्योरियां भी चढ़ सकती हैं। इसका एक ही अर्थ निकलता है कि अब राजनीति में मेरिट के जमाने लद गए। अब बहुमत से चुनने के भी मार्ग बन्द हो गए। फेरबदल के नाम पर शीर्ष नेताओं की ओर से की जाने वाली नियुक्तियां लोकतंत्र के गाल पर तमाचा हैं। इस बात की कोई गारण्टी नहीं कि नया स्वरूप देश के लिए कुछ अवश्य करेगा। उसका इस दृष्टि से शिक्षित होना भी आवश्यक नहीं है।

 

पहले दौर में श्रेष्ठ मानकर लोगों को मंत्रिमण्डल में लिया जाता होगा। आगे तो बस समीकरण ही तय कराते हैं। जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने घोषणा की कि चुनाव तक अब कोई और फेरबदल नहीं होगा, तब कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने पत्रकार सम्मेलन में कह डाला कि प्रधानमंत्री का आशय यह नहीं था। उनकी बात से प्रधानमंत्री को ठेस पहुंच सकती है, इसकी चिंता उनको नहीं है। वे तो उनसे ज्यादा समझदार नजर आना चाहते हैं।

 

खैर, मंत्रिमण्डल फेरबदल होते रहेंगे। इनका लोकतंत्रीय व्यवस्था से कोई लेना-देना नहीं है। जरूरी है हर सदस्य को आवश्यक ज्ञान एवं अनुभव का सहारा देना। उसके लिए मात्र अघिकारियों पर छोड़ देना भी देशहित में नहीं है। क्योंकि यह लोकतंत्र की मूल अवधारणा से भिन्न है।

गुलाब कोठारी

 

जुलाई 4, 2011

बलिदान

कहते हैं कि जिनको मरना नहीं आता, उनको जीना भी नहीं आता। मरना कौन चाहता है- गरीब, रोगी, वृद्ध? कोई नहीं चाहता। प्रभात झा जैसे अपवाद को छोड़ दें, जो इच्छामृत्यु मांगकर स्वयं के लिए अनन्त भोगों की कामना करता जान पड़ता है। आहार-निद्रा-भय-मैथुन में उलझकर एक पशु की तरह जीने के स्वप्न देखता है। एक मृत्यु जबलपुर में रेलवे के मास्टर क्राफ्टमैन दसई ने देखी। कभी मृत्यु की कामना भी नहीं की। अपनी योग्यता के आधार पर प्रमोशन भी पाता रहा।

 

मृत्यु शरीर की होती है। महापुरूषों का शरीर मानवता का प्रकाश फैला देने वाली मशाल होता है। ऎसे लोग समय से पहले पैदा होते हैं। कृष्ण द्वापर में ही पैदा हो गए और आवश्यकता उनकी आज है। आज भी वे हमको उपलब्ध हैं। आजादी की जंग में कितने महापुरूष काम आए? क्या उनके बिना स्वतंत्रता का मिलना संभव था? वे कहीं भी इस मुद्दे के लिए कुछ भी करने को तैयार थे। ऎसे महापुरूष स्वयं को देश और देशवासियों के आगे नगण्य मानते थे। जीवन का श्रेष्ठतम उपयोग है, मातृभूमि के लिए काम आ सकना। और जिन-जिन को ऎसे अवसर प्राप्त हुए, उन्होंने प्रमाणित भी कर दिखाया। हंसते-हंसते फांसी पर झूल गए। शहीद हो गए। जीवन को देशवासियों के भावी सुख के लिए समर्पित कर गए। कुर्बान हो गए।

 

दसई की कुर्बानी भी शहीदों की सूची में सदा जीवित रहेगी। विवेकपूर्ण ढंग से, सम्पूर्ण जागरूकता के साथ डेढ़ हजार लोगों की जीवन रक्षा के लिए अपने जीवन का बलिदान कर गए। एक ही बार मरता है आदमी। इनमें से कुछ मृत्यु को भी अनुष्ठान बना लेते हैं और सदा-सदा के लिए अमर हो जाते हैं।

 

दसई अमर हो गए। आज आवश्यकता इस बात की भी है कि यदि सामान्य जन-जीवन में भी लोग देश के व्यापक हित में ऎसी कुर्बानियां देते हैं, तो सरकार उनको भी शहीदों की सूची में शामिल करे। उनके परिवारों का सम्मान किया जाए। उनके बच्चों का सिर गर्व से ऊंचा रह सके, इसमें समाज के हर वर्ग का सहयोग रहे। भ्रष्टाचार के युग में जहां बड़े-बड़े पदों पर बैठे लोग स्वार्थपूर्ति के लिए टूटे पड़ते हैं, वहां ऎसी शहादत युवा पीढ़ी में नए प्राण फूंकती है। इसी से देश जिन्दा रहता है।

 

यह सही है कि रेलवे ने दसई परिवार को बड़ी आर्थिक सहायता का आश्वासन दिया है। किन्तु आर्थिक सुख-सुविधा की सीमा बहुत छोटी होती है। सम्मान बड़ी चीज है। नेताओं जैसा नहीं कि कुर्सी से उतरे और राम-राम से भी गए। सरकार को ऎसे उदाहरण प्रस्तुत करने चाहिए, जिससे समाज में ऎसे शहीदों के प्रति एक आत्मीयता का भाव जागृत हो, श्रद्धा पैदा हो सके। इनके परिजनों का समाज में स्थान बन सके। इनके लिए भी जन समारोह किए जाएं।

 

इनका राजकीय सम्मान हो। इनकी भी प्रतिमाएं लगाई जाएं। पाठ्य पुस्तकों एवं इतिहास में इनका नाम दर्ज हो। सेना में मरने वाले हर सैनिक को पदक और ‘शहीद’ संज्ञा से नवाजा जाता है। यहां इस स्वैच्छिक बलिदान को भी क्यों नहीं उसी श्रेणी का सम्मान, ‘पk’ अलंकरण जैसे सम्मानों से अलंकृत किया जाए। तब देश में एक नई शक्ति का संचार होता रहेगा। देश सुरक्षित ही नहीं, आत्मबल के साथ आगे बढ़ता रहेगा।

 

गुलाब कोठारी

जून 20, 2011

बाबा रे बाबा!

हाल ही दिवंगत हुए सत्य साई बाबा के निजी कक्ष से मिली सम्पत्ति का ब्योरा सुनकर देश स्तब्ध रह गया। स्वयं को संत ही नहीं भगवान कहने वाला व्यक्ति माया के जाल में इतना जकड़ा हुआ था कि संत की परिभाषा ही खो गई। भक्तों की श्रद्धा तो स्वत: ही समाप्त हो जाएगी। यह भी हो जाना चाहिए कि ऎसे संतों के रूप में रहने वाले धर्म के सौदागरों को राजनीति में प्रश्रय नहीं मिले। बड़े-बड़े पदों पर बैठे लोग इनके आगे जब नतमस्तक होते हैं और मीडिया में प्रशस्ति ज्ञान होता है, तो आम आदमी मोह में फंस जाता है। ऎसे संतों के कार्यकलापों पर नियमित रूप से सरकार की भी दृष्टि होनी चाहिए।

 

बचपन में साधु-संतों की एक छवि गांवों में दिखाई पड़ती थी, कि वे घर के बाहर पहुंचकर आवाज लगाते थे। जैसे-अलख निरंजन! और भीतर से कोई आकर एक मुटी आटा दे जाता। कभी-कभार जैन मुनि भी आते। कथावाचक आते। इनमें कुछ तो किसी परम्परा में दीक्षित होते हैं, कुछ नहीं होते। संत शब्द तो लगता है अंग्रेजी के सेंट का अनुवाद बन गया है। साधु अपने-अपने सम्प्रदाय का प्रचार करते थे। आध्यात्मिक जीवन के प्रति जागरूकता पैदा करते थे। कुछ नागा साधु गांव के बाहर बगीचों में, चबूतरों पर धूणी जमा लेते। चिलम पीते और गांव वालो के साथ चर्चा करते।

 

एक और भी श्रेणी थी। इनके साधु अखाड़ों से जुड़े होते थे। गोरखनाथ परम्परा के लोग भी थे। सामन्त युग में ये लोग मल्ल युद्ध तथा अस्त्र-शस्त्र विद्याएं सीखते थे। क्षेत्र की सुरक्षा का भार इनके पास होता था। सामन्ती युग तो समाप्त हो गया, किन्तु अखाड़े रह गए। धीरे-धीरे ये भी नागा साधुओं के रूप में पूरे देश में छा गए। हर कुंभ मेले में इन अखाड़ों को देखा जा सकता है। आज ये सब साधु हो गए। व्यसनों से भी इनका जीवन ओत-प्रोत दिखाई पड़ता है। अभी हरिद्वार कुंभ के बाद अखाड़ों के क्षेत्र में सफाई अभियान के दौरान बड़ी संख्या में शराब की खाली बोतलें मिलीं। जबकि हरिद्वार में मद्यनिषेध लागू है। साधु की शास्त्रीय कल्पना भिन्न है।

 

हर जीवनशैली में धर्म भी एक अनिवार्य घटक है। रूप भिन्नता के साथ। आज अघिकांश लोग बिना दीक्षा के साधु-संत का ताना बना लेते हैं। इसमें इनका बाहरी स्वरूप साधु का जान पड़ता है और भीतर में बिना शिक्षा-दीक्षा का। आज इस देश में साधु-संत महत्वाकांक्षी हो गए। आश्रम-ट्रस्ट बना लिए। यात्राओं के दौर तथा वैभव और यश-कीर्ति की लालसा में लिपट गए। इस देश ने वशिष्ठ और वाल्मीकि से लेकर विदुर और चाणक्य तक के स्वरूप देखे हैं। इन सबने बिना किसी लोभ-लालच के केवल राजा का मार्गदर्शन किया। लोक की समृद्धि पर आंख रखी तथा राजनीति से बाहर रहे। संत ही रहे।

 

आजादी के बाद संतों ने भी जैसे स्वतंत्रता का अनुभव किया। श्रीमती इंदिरा गांधी के समय धीरेन्द्र ब्रह्मचारी हथियार का कारखाना चलाते थे। चन्द्रास्वामी को आप क्या कहेंगे- बाबा, तांत्रिक या सत्ता/हथियारों का दलाल? नरसिंह राव से लेकर चन्द्रशेखर तक पहुंच थी। सेंट किट्स घोटाला, लखू पाठक मामला और फेरा में भी आरोपी रहे। स्वामी चिन्मयानन्द अयोध्या मामले में भी जुड़े और मंत्री पद भी पाया। इसी प्रकार इनके साथी महन्त अवैद्यनाथ भाजपा की सक्रिय राजनीति में रहे। महंत चांदनाथ, आदित्यनाथ आदि भी राजनीति में रहे।

 

शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वती भी राजनीति की चपेट में आ गए। जेल भी जाना पड़ा। स्वामी अग्निवेश, साध्वी उमा भारती, ऋतंभरा, प्रज्ञा ठाकुर जैसे कई नाम भी सीधे या परोक्ष रूप से सक्रिय राजनीति से जुड़े हैं। बाबा रामदेव ने जो अभियान एक संत के रूप में शुरू किया था, उसने भी बाद में राजनीतिक मोड़ ले लिया। अभियान ठप हो गया।

 

देश के सामने प्रश्न है कि किस को साधु-संत का दर्जा दे और किस आधार पर? क्या दीक्षित साधु को राजनीति में जाने की छूट दी जाए या गृहस्थ वेश में लौटकर ही प्रवेश करे। आज जिस प्रकार लोग संत बन रहे हैं, बदनाम हो रहे हैं, उससे नई पीढ़ी के मन में इन संतों के नाम से अविश्वास पैदा हो रहा है।

 

व्यक्ति संसार छोड़कर साधु-साध्वी बने और सत्ता के पीछे भी भागे तो संयम कैसे पाल सकता है? सत्ता से जुड़ते ही बाकी सारे कर्मकाण्ड भी जुड़ने लगते हैं। क्या आपने आसाराम बापू की भाषा सुनी है? बाबा रामदेव को बोलते सुना है? दिल्ली जामा मस्जिद के इमाम मौलाना बुखारी के तो अनेक वाक्य आज भी लोगो के कानों में गूंज रहे होंगे। और ये सब धर्म के रहनुमा हंै।

 

साधु-साध्वी का चोला भी पहनो, सत्ता में भी रहो और गर्भपात भी करवाते रहो। बड़े-बड़े संतों के आश्रमों से निकले यौनाचार के किस्से देशभर में सुने जा सकते हैं। कई बड़े-बड़े आचार्यो के आश्रमों से हत्या के समाचार भी देश में फैले हैं। इससे मिलता-जुलता एक उदाहरण अजमेर का अश्लील फोटो काण्ड है। संत भिंडरावाले की घटना भी देश भूला नहीं है। तब क्या इनको डूबकर नहीं मर जाना चाहिए? लोग हैं कि फिर भी इनके आगे श्रद्धा से दण्डवत करते हैं। पश्चिम में भी ऎसे काण्ड न्यायालयों में पहुंचे हैं।

 

भीतर का आदमी सब जगह एक-सा है। क्यों नहीं ऎसे संतों को जनता वेश बदलने के लिए मजबूर करे? क्यों इनके नाम के पहले संत शब्द लगाया जाए? बल्कि इनका बहिष्कार क्यों नहीं किया जाए? क्यों इनको धन भेंट करें? क्या दे रहे हैं आश्रमों वाले देश को-अपना अहंकार? कभी अखाड़ों में लड़ने वाले, चरस-गांजा पीने वाले भी संत और तपस्या करने वाले भी संत।

 

व्यापार करने वाले भी संत और मर्यादाहीन बोलने वाले भी संत? देश को चिन्तन करना पड़ेगा कि हम किस अज्ञान की कीमत चुका रहे हैं। क्या विरासत नई पीढ़ी के लिए छोड़ना चाहते हैं। हजारों साल पुराने कर्म और कर्म फलों की अवधारणा या धर्म और विज्ञान के समन्वय का सिद्धांत। क्यों साधुता का अपमान करने का अघिकार उनको दिया जाए? जिस धर्म का साधु सत्ता में भागीदार हो गया, मान लो धर्म बिक गया। वह धर्म के माथे पर काला टीका बन जाएगा। वोट की राजनीति को इस नुकसान से कुछ लेना-देना नहीं होता।

 

साधु के पद से जो सत्ता को बड़ा मानता है, वह मन में तो साधु है ही नहीं। समाज को क्या फिर भी ऎसे लोगों का बोझ उठाना चाहिए? क्या इनके आचरण का प्रभाव इनके साथ के उन अन्य संतों पर नहीं पड़ता जो धन और सत्ता की भूख से दूर रहकर वास्तव में संत का सा आचरण करते हैं। समय आ गया है जब जनता दूध का दूध और पानी का पानी करे। जो सत्ता मांगे, पहले उसका चोला उतरवाया जाए। ताकि उनके कारण देश के अन्य साधु-संत लांछित होने से बच सकें। विदेशियों की नजरों में देश और धर्म का सम्मान बचाया जा सके।

 

गुलाब कोठारी

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