Gulabkothari's Blog

दिसम्बर 20, 2016

अब क्या बचा?

सरकार ने आज एक और घोषणा नोटबंदी के सिलसिले में की है, जो कि पिछली घोषणा से कुछ अलग हटकर है। विरोधाभासी भी कह सकते हैं। यह तो स्पष्ट हो गया है कि सरकार के मन में कोई तो भय पैदा हो गया है। एक   नोटबंदी के आदेश के बाद कितने आदेशों की बौछार हो गई। क्यों? अरुण जेटली और रविशंकर प्रसाद कई बार कह चुके हैं कि नोटबंदी का फैसला बहुत सोचकर किया गया है। फिर इतने बदलाव क्यों? सरकार को किस पर विश्वास नहीं है-कार्यपालिका पर, जनता पर अथवा स्वयं पर।

सारे नियमों को एक साथ रखकर पढ़ें तो लगेगा कि सरकार भी किंकर्तव्यविमूढ़ हो रही है। जो फैसला कर रही है, उल्टा पड़ रहा है। बाजार में चर्चा दिनभर होती है अथवा भ्रष्टाचारी जिस प्रकार गलियां निकालते दिखाई पड़ते हैं, उससे प्रभावित होकर सरकार फिर एक नई घोषणा ले आती है। पहले घोषणा की गई थी कि 500-1000 रुपये कितने भी पुराने नोट 30 दिसम्बर तक जमा कराए जा सकते हैं। आज सरकार ने नई घोषणा करते हुए कहा है कि तीस दिसम्बर तक कोई भी व्यक्ति 500-1000 रुपये के पुराने नोट जमा तो करा सकता है, किन्तु कुल 5000 रुपये तक ही। 5000 रुपये से ज्यादा राशि सिर्फ एक बार जमा कराई जा सकती है, वह भी उसके स्रोत की पूरी जांच पड़ताल के बाद। प्रधानमंत्री ने पहले अवधि तीस दिसम्बर ही दी थी, किन्तु बिना किसी शर्त के। सरकार को ग्यारह दिन पहले ऐसा क्या सपना आया कि अपने मूल आदेश का ही अपमान करा बैठी? क्या प्रधानमंत्री की घोषणा के ऊपर भी कोई घोषणा कर सकता है? बहुत से लोग ऐसे भी होंगे जिन्होंने यात्रा पर होने, बैंकों में भीड़ होने या  कहीं व्यस्त होने के कारण दिसम्बर के अंतिम दिनों में पुराने नोट जमा कराने का विचार किया होगा। या यही सोच कर रुक गए होंगे कि अभी तो रोज नियम बदल रहे हैं, पहले सारी घोषणाएं हो जाने दो। अब वे लुटा हुआ महसूस कर रहे हैं।

दूसरी ओर सरकार ने पहले भी 50 प्रतिशत तक कर भरकर पुराने नोट जमा कराने की छूट दी। उसके बाद पुराने नोटों पर पूर्ण पाबंदी की तिथि भी (1 अप्रेल 2017 से) घोषित कर दी थी। पेट्रोल पंपों, अस्पतालों जैसी सेवाओं को सीमित अवधि की छूट थी। 15 दिसम्बर से यह छूट भी छीन ली गई है। इसके बाद भी भ्रष्टाचारियों को रद्दी हुए नोटों को कर के साथ जमा कराने की छूट दे रखी है।

सरकार की आज की घोषणा से उन लोगों को बड़ा झटका लगा है जो लोग सरकार पर भरोसा करके 30 दिसम्बर तक पुराने नोट जमा कराने की योजना बना रहे थे। वे यदि 10-15 हजार भी जमा कराना चाहते हैं तो 30 दिसम्बर से पहले एक बार ही इतनी राशि जमा करा पाएंगे। उसके लिए भी पहले दो बैंक अधिकारियों को संतुष्ट करो, उनके हिसाब से। मानो आप चोर हैं। उधर आप कर व जुर्माना देकर तीस दिसम्बर तक कितनी भी राशि जमा करा सकते हैं। क्या जनता के लिए यह भ्रामक स्थिति नहीं है? क्या गारण्टी है कि सरकार आगे भी फैसला नहीं बदलेगी। प्रश्न सरकार की साख का है। आज तो लुटी हुई लगती है। सरकार कुछ व्यवस्था कर भी नहीं पा रही है। एक ओर अरुण जेटली कह रहे हैं कि सरकार पूरे नोट नहीं छापेगी, वहीं दूसरी ओर एटीएम से नकली नोट निकलने लगे हैं। यह भी संभावना व्यक्त की जा रही है कि कहीं बड़ी तादाद में नकली नोट तो बैंक में जमा नहीं हो गए और इसी तथ्य को उजागर होने से रोका जा रहा है। पहले यह भी कहा गया कि जिन लोगों के खाते में ढाई लाख तक रुपये हैं, उनसे कोई पूछताछ नहीं की जाएगी। अब पूछताछ करने और नोटिस देने की बात की जा रही है। इसका मतलब पहले जाल फैलाया जा रहा था। अपनी ही जनता से यह व्यवहार किस कोटि का माना जाए। ऐसा तो शायद चाणक्य के शब्दकोश में भी नहीं है। सरकार खुले आम कह रही है, आपके खाते में किसी के पैसे जमा हुए हैं तो लौटाओ मत, खा जाओ। यह किस तरह के आचरण को बढ़ावा दिया जा रहा है !

इस सारी उठापटक का केन्द्र केवल आयकर दाता है। सरकार 95 प्रतिशत जनता के बारे में बालभर भी चिन्तित नहीं नजर आ रही । तब क्या लोकतंत्र केवल पांच प्रतिशत सत्ताधीशों के लिए ही जीवित रहेगा? एक बात और, भगवान कितने ही अवतार ले लें, किन्तु सामाजिक आचरण, सभ्यता और संस्कृति यदि प्रकृति के साथ सामंजस्य नहीं रखते, वहां धर्म की रक्षा संभव नहीं है। न तप से, न यज्ञ से, न भक्ति कर्म अथवा ज्ञान के आवरणों से। धर्महीन समाज में ही आसुरी शक्तियों का विकास होता है। केवल समाज ही इनके विरुद्ध संघर्ष कर सकता है। आज समाज की आत्मा सोई हुई है। युवाशक्ति भौतिकवाद के कारण देश प्रेम से दूर है। देश में सत्ता के लिए बड़ा संघर्ष चल रहा है। देश मौन है। नोटबंदी की आड़ में जब बैंक में पैसा समाप्त हो गया तो ‘कैशलैस” का जुमला चला दिया गया ताकि गरीब आदमी नोटबंदी की कराहट भूल जाए।

सारी लड़ाई कुर्सी बचाने की दिखाई पड़ती है। न्याय से, अन्याय से, छीनकर, मांगकर कैसे भी। चारों ओर हमारा ही साम्राज्य फैले। जनता आज फिर गुलामी की सूरत लिए बैठी है। संघर्ष करने को तैयार कहां है? तब गुलाम होना ही उनका भाग्य है। उनको यह तो महसूस होते ही रहना चाहिए कि सत्ता तो जनता की ही है। उसने ही प्रतिनिधि चुने हैं। भले ही लोकतंत्र की स्वतंत्रता नोटबंदी से छीन ली है। अब तक तो यह आशा थी कि शीघ्र कुछ हल तो निकल ही जाएगा, किन्तु अब तो नोट भी हाथ से निकलकर सत्ताधीशों के बिस्तर की शोभा बन जाएंगे। बैंकों में कहां से आएंगे? जो है, वह भी ई-पेमेंट लील जाएगा। नोट सत्ताधारियों  के पास, नागरिक कैशलैस, आम आदमी अपने डेबिट कार्ड को अगरबत्ती करता रहेगा। सब कुछ सरकार के हाथ में चला जाएगा। हो सकता है कभी किसी खाते की कोई सफाई कर जाए। कोई सुनने वाला नहीं मिलेगा।

आज जो हालात देश में हैं वे बेरोजगारी बढ़ाने का कार्य कर रहे हैं। गरीब का निवाला छीनकर सरकारें खा रही हैं। उत्पादन रुक गया, उद्योग-धन्धे ठप होने लग गए। सरकार अभी तक आश्वासन देते नहीं थकती। बिकाऊ मीडिया के भोंपू न जाने क्या-क्या वक्तव्य दे रहे हैं। उनका अपना कोई नजरिया ही नहीं रह गया। शुरू में जिस उत्साह से लोगों ने आशा के साथ नोटबंदी का स्वागत किया था, वह खुमारी उतर चुकी। गरीबों के घाव गहरा गए। अब उनको नोट मिल भी गए, तो पुराने घाव सूखने वाले तो नहीं हैं। लोगों को यह भी उम्मीद थी कि नोटबंदी के दूसरे चरण में नेताओं और अफसरों पर भी गाज अवश्य गिरेगी। यह भी राहत का एक परोक्ष बिन्दु तो था ही। किंतु ऐसा कुछ नहीं हुआ, बल्कि नित नए फैसले न केवल निराशा पैदा कर रहे हैं बल्कि भविष्य की छवि भी धूमिल कर रहे हैं। जनता को कभी तो जागना पड़ेगा। कोई भी उच्च शिक्षा प्राप्त या उद्योगपति देश में क्यों रहेगा? आयकर वाले कभी नहीं चाहेंगे कि देश में कोई उन्नति करके विकास में योगदान दे। उनका जीवन तो इन पांच प्रतिशत लोगों पर ही टिका है। किसी भी सरकार का आज तक यह संकल्प नहीं रहा कि वह पांच वर्षों में बीपीएल का 5-7 प्रतिशत कम करेगी। सही अर्थों में तो ये इनका आंकड़ा बढ़ते जाना ही देश का विकास मानते हैं। आश्चर्य इस बात का है कि इनको भी कैशलैस होने के लिए अनेकों योजनाएं और छूट के प्रस्ताव दिए जा रहे हैं। अनजाने में जनता एक चक्रव्यूह में फंसती जा रही है। न चुनाव आयुक्त आंखे दिखा सकता है, न ही सर्वोच्च न्यायालय स्वप्रसंज्ञान लेकर लोगों की तथा लोकतंत्र की इज्ज्त बचाने को उत्सुक है। उसे तो नया इतिहास रचना चाहिए।

काले धन के नाम पर आज जो खिलवाड़ प्रतिदिन कायदे-कानून बदल कर नागरिकों के साथ किया जा रहा है, उससे दो स्थितियां पूर्णत: स्पष्ट हैं। एक तो सरकार की विफलता की बौखलाहट स्पष्ट नजर आती है। दूसरी ओर इस चेहरे को छिपाने के लिए नित नए मुखौटों का सहारा लिया जा रहा है। जिन लोगों ने 34 प्रतिशत कर न देकर काला धन इकट्ठा किया, वे तो 50 प्रतिशत अथवा अधिक देकर कभी भी अपने धन का खुलासा नहीं करेंगे। लोग आसानी से बैंक वालों को 30 प्रतिशत दलाली देकर नये नोट प्राप्त कर रहे हैं। तब वे क्यूं 50 प्रतिशत देंगे? इसी तरह 50 प्रतिशत में तो आज डॉलर भी उपलब्ध है। बड़ी राशि वाले लोग तो उधर ही जा रहे हैं। आजकल एक कहावत चल रही है कि मगरमच्छ पकडऩे के लिए पूरे तालाब को खाली कर दिया गया किन्तु सारे मगरमच्छ तो पृथ्वी पर भाग चुके। इस संघर्ष में बेचारी मछलियां मारी गई। अर्थात जितने भी आदेश 8 नवंबर से आज तक जारी हुए, उनका लाभ केवल मगरमच्छों को ही हुआ है। जिस जनता ने सरकार को चुना, वह आज मूक दर्शक बनी हुई एक अपराध बोध के साथ आसमान की ओर ताक रही है क्यूंकि उसकी युवा पीढ़ी स्वयं किंकर्तव्यविमूढ़ होकर आंखे मूंदें बैठी है, लोकतंत्र के तीनों पाए, चौथे पाए की कृपा से कहर बरपा रहे हैं। सारा वातावरण कंस के लोकतंत्र जैसा छद्मवेशी बन गया है। निकट भविष्य में किसी विष्णु के अवतरित होने की संभावना नहीं लगती है। जिस दिन भी देश का युवा वर्ग जाग जाएगा, वही विष्णु का दसवां अवतार होगा। जनता अपने शासन के प्रति फिर से जागृत हो जाएगी एवं विनाश की ओर मुड़ती इस विकासधारा को एक नया मोड़ दे सकेगी। ईश्वर जल्दी ही ऐसा दिन दिखाए।

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