Gulabkothari's Blog

अक्टूबर 2, 2018

लुट न जाए सौहार्द

नीति का अर्थ है येन-केन-प्रकारेण अपनी स्वार्थ सिद्धि। इसके लिए किसी का भी अहित होता हो, कर दो। किसी की भी बलि चढ़ानी हो, चढ़ा दो। लोकतंत्र या तानाशाही, मलाई तो सत्ता के साथ रहती है। सारा ताण्डव इसी मलाई के लिए, सारा भ्रष्टाचार भी इसी मलाई के लिए। और यह युगों से होता आ रहा है। जनसेवा के लिए, प्रजापालन के लिए जाना जाने वाला राजतंत्र अन्तत: आसुरी ही प्रमाणित होता है। अत: अंकुश अनिवार्य है। निरंकुशता तंत्र का प्रवाह पतित कर देती है। तब नैतिकता और देश की प्राथमिकताएं रसातल में जाने लगती हैं। शासन ही देश की आत्मा कहलाता है। निर्विरोध (विरोधहीनता) और निरंकुशता ही जनता को त्रस्त और अपमानित करते हैं। स्वयं सत्ता देश से बड़ी बनकर राज करती है।

राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे तीन बड़े प्रदेशों में चुनाव सिर पर हैं। केन्द्र के साथ इन तीनों प्रदेशों में भी भाजपा सत्ता में है। अर्थात जो वोट पड़ेंगे, वे भाजपा के पक्ष या विरोध में पड़ेंगे। ‘पत्रिका’ ने जब बड़ा सर्वे करवाया, जिसमें कुल दो लाख, बासठ हजार लोगों से बात की, सरकारों के कामकाज पर बात की, अजा-जजा प्रकरण पर बात की, जनता के मानस को टटोलने का प्रयास किया तो एक बात बहुत स्पष्ट थी कि किसी भी सरकार को जनता की सुख-दु:ख की अभिव्यक्ति से कोई सरोकार नहीं है।

अत: पहली बार यह तथ्य प्रकट हुआ कि जनता इस बार दलों से ज्यादा अच्छे प्रत्याशी को प्राथमिकता देगी। लगभग एक लाख, बीस हजार (४६ फीसदी) लोगों का यह स्पष्ट मत था। यह किसी भी दल के लिए चिन्ता का विषय नहीं है। मुझे लगा कि ‘पत्रिका’ का चेंजमेकर अभियान जनता के इस चिन्तन में सहयोगी अवश्य होगा। नेतृत्व का अहंकार भी तब प्रतिलक्षित होता है जब लोग वर्तमान नेतृत्व का साथ छोड़ते दिखाई देते हैं। इसी प्रकार अजा-जजा एक्ट मुद्दे पर लोग (५२ फीसदी) नोटा का विकल्प चुनने को तैयार नहीं। वे जानते हैं उनको क्या करना है। प्रसार-प्रचार शायद उनको प्रभावित न कर पाए। सरकारों की अपनी अलग धुन है।

सरकारों को यह भी लगता है कि यदि सरकारी कर्मचारी प्रसन्न रहेंगे तो चुनाव आसानी से जीते जा सकते हैं। वेतन-भत्तों की बरसात होती रहती है। अजा-जजा एक्ट का मुद्दा, आरक्षण का विरोध, यह भी सरकारी सेवाओं के मद्देनजर ही अधिक महत्वपूर्ण है। उदाहरण के तौर पर राजस्थान में आठ लाख कर्मचारी हैं। इनमें अजा-जजा-ओबीसी आधे (करीब चार लाख) हैं। आबादी का लगभग आधा प्रतिशत। और इस कानून की मार पड़ेगी ९९.५ फीसदी आबादी को। सर्वे के आंकड़े इसका प्रमाण हैं। कौन सी मार? ७२ फीसदी सवर्ण मानते हैं कि आरक्षण नहीं होना चाहिए। वहीं ७४ फीसदी आरक्षित वर्ग इसके पक्ष में हैं, किन्तु इनमें भी ५० फीसदी क्रीमीलेयर को आरक्षण देने के पक्ष में नहीं हैं।

क्या आर्थिक स्तर ही जीवन का एकमात्र लक्ष्य होना चाहिए? सामाजिक वैमनस्यता बढ़े और आर्थिक स्तर भी अधिकांश का नहीं बढ़े, तब समाज व्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ेगा? सर्वे में ६४ फीसदी सवर्णों ने और ४५.७१ फीसदी आरक्षित वर्ग के लोगों ने स्वीकार किया है कि आरक्षण ने जातिगत वैमनस्यता बढ़ाई है। ४६.६ फीसदी सवर्ण और ४१.६ फीसदी आरक्षित वर्ग स्वीकारता है कि दोनों के बीच आपसी सम्बन्ध बिगड़े हैं। जीवन की सच्चाई तो यही मानी जाएगी। कानून अपनी जगह होता है। समाज और राष्ट्र सौहार्द से चलते हैं। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का यही तो अर्थ है। सम्बन्ध बिगड़ गए तो सौहार्द लुट जाएगा।

आज न तो सरकार और न ही कानून रोजमर्रा के जीवन में दिखाई पड़ते हैं। इनका साथ छूट गया तो क्या हो सकता है, यह किसी नेता, अधिकारी या न्यायाधीश की चिन्ता का विषय नहीं। आजादी के बाद का इतिहास तो अभी सामने ही है। साम्प्रदायिक दंगों का स्वरूप कौन नहीं जानता? आर्थिक स्तर से मानव का आत्मिक धरातल पोषित नहीं होता। आप चुनाव में होने वाले खर्च को गरीबों में बांटकर देख लें। एक भिखारी को रात में कोई नया कम्बल ओढ़ा दें, तो वह उसे सुबह बाजार में बेच देता है जबकि उसे गरीब मानकर ही लोग धन देते हैं।

आज देश के इतने टुकड़े हो गए, कानून ने भी किए, धर्म-सम्प्रदायों ने भी किए, राजनीति ने भी किए, कि एक ही समुदाय में एक से अधिक धड़े हो गए। एक-दूसरे के सामने तनकर खड़े हैं। राजनेता इसी से प्रसन्न हैं। देश को आज ऐसे संगठनों की आवश्यकता है जो स्वयं राजनीति से बाहर सामाजिक सौहार्द के लिए नए सिरे से वातावरण तैयार करे। ‘मुंह में राम, बगल में छुरी’ वाले वातावरण से मुक्ति दिला सके। अभी तो कोई दिखाई नहीं पड़ता। सम्पन्न वर्ग चाहे तो इसकी शुरुआत कर सकता है। वह गरीब परिवारों के एक-एक व्यक्ति को ऊपर उठाने की जिम्मेदारी ले सकता है। युवा चाहें तो देश को नेतृत्व दे सकते हैं, क्रान्ति ला सकते हैं। वरना तो विष्णु के दसवें अवतार ‘कल्कि’ के आने की ही प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। तब तक क्या यह देश हमारे हाथ में रह पाएगा?

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सितम्बर 28, 2018

लचीलापन क्यों?

सम्पूर्ण देश आज एक झंझावत से गुजर रहा है। आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, संवैधानिक आदि सभी व्यवस्थाओं में मानो एक भूचाल आया हुआ है। देश अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है। आने वाले चुनावों की अमर्यादित उखाड़-पछाड़ के बीच, भ्रष्टाचार, मुद्रा-महंगाई और बेरोजगारी के तीर चल रहे हैं, आरोप-प्रत्यारोप लगाए जा रहे हैं। सरकार की चारों ओर किरकिरी हो रही है। केन्द्र, विशेषकर प्रधानमंत्री, मौन हैं।

इस बार के चुनाव कुछ विशेष होंगे। सत्ताधीशों के लिए तो जनता खिलौना मात्र है। किन्तु जनता बेचैन है, त्रस्त है। नए परिवेश में देश तीन मुख्य धड़ों में बंट चुका है। कानून की भी इस विभाजन पर मोहर लग चुकी है। मुस्लिम इस बार अधिक संगठित हो गया है। यह भी चिन्ता का एक बड़ा राजनीतिक कारण बना हुआ है, विशेषकर भाजपा के लिए। वैसे भी तीन बड़े प्रान्तों का चुनाव भाजपा के विरोध में ही लड़ा जाना है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में तो भाजपा १५-१५ वर्षों से सत्ता में है। डर कहां है?

इस बार अजा-जजा एक्ट ने शेष भारत के भी बराबर के दो टुकड़े कर दिए। यह भी भाजपा और कांग्रेस दोनों की सहमति से हुआ। सर्वोच्च न्यायालय ने भी समर्थन किया। इसके परिणामस्वरूप सवर्ण समुदाय पहली बार आक्रामक हो गया। आरक्षण तो पहले भी था। आक्रोश ऐसा नहीं था। मुसलमानों को जब अल्पसंख्यक घोषित किया था, तब भी प्रतिक्रिया हुई थी। आज परिणाम सामने हैं। ठीक ऐसे ही परिणाम अजा-जजा एक्ट के कारण भी आ सकते हैं। भाजपा अब चारों ओर उठने वाली प्रतिक्रिया से घबरा गई है। हर एक एजेन्सी एक ही परिणाम की ओर इंगित कर रही है। भाजपा के लिए गरीबी में आटा गीला हो गया। न कुछ आश्वासन दे सकती, न ही किए को अनकिया कर सकती। तब बीच का रास्ता निकाला गया।

भाजपा के पास एक धारदार हथियार है, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ। संघ प्रमुख मोहन भागवत अश्वमेध यज्ञ की यात्रा पर निकले हुए हैं। जिस तरह की लचीली भाषा का वे प्रयोग कर रहे हैं, वह कितनी प्रभावकारी हो पाएगी, यह तो समय ही तय करेगा। मूल में तो भाजपा संघ की एक शाखा है। आज भागवत जी के बयानों से लगता कुछ और ही है। यहां तक कि संघ की हिन्दुत्व की परिभाषा, संविधान का सान्निध्य, पूरे गांव का एक कुआं, एक मन्दिर की बात, एक श्मशान की बात कह तो रहे हैं, किन्तु आरक्षण की कड़वाहट में कोई कैसे सुनेगा, वे यह भी जानते हैं। वे कह चुके हैं कि वे राम मन्दिर निर्माण के पूर्णत: हिमायती हैं और आरक्षण के भी। दोनों बातें साथ बैठती दिखाई नहीं देती।

आज देश-विदेश में लिंचिंग को लेकर भाजपा सरकारों की खूब किरकिरी हुई है। गौ-हत्या के नाम पर हत्याओं के लिए पहले ही बदनाम रही है। ऐसी स्थिति में संघ प्रमुख का यह बयान कि ‘जिस दिन हम कहेंगे कि हमें मुसलमान नहीं चाहिए, उस दिन हिन्दुत्व नहीं रहेगा’ कितना कारगर होगा? पिछले वर्षों में संघ की हिन्दुत्व की परिभाषा ने भी करवटें बदली हैं। आज जब भाजपा मुस्लिम विरोधी वातावरण बनाने के लिए बदनाम है, तब मोहन भागवत का बयान उन्हें शान्त करता दिखाई नहीं पड़ता। आग लगने पर कुआं खोदा जा रहा है। इस बयान को ‘अनेकता में एकता’ का प्रयास तो नहीं कह सकते। यह भी एक कटु सत्य है कि संघ का ही एक घटक मुसलमानों के सख्त खिलाफ है।

हम एक ओर कह रहे हैं कि सभी देशवासी हिन्दू हैं और दूसरी तरफ भागवत का आह्वान है कि ‘लालच में जो दूर चले गए, उन्हें वापिस लाओ।’ तब संविधान के अनुसार सभी धर्मों की रक्षा की बात कैसे मानी जाए? संविधान धर्मनिरपेक्ष है। आज बहाना हिन्दू-मुस्लिम के बीच संतुलन का है। हम ही वोटों के लिए देश के टुकड़े करते हैं, देश में आग लगाते हैं। सब मौन रहकर देखते हैं। यही हाल कुछ ही वर्षों में अजा-जजा और सवर्णों के मध्य होने वाला है, जिसके आज भागवत पक्षधर हैं। कल संतुलन संघ भी नहीं कर पाएगा। भाजपा की जमीन आज ही खिसकती जान पड़ रही है, कल क्या होगा? न एक कुआं काम आएगा, न एक मन्दिर। अल्पसंख्यकों के पास हुनर है, बच गए। इनके पास तो वह भी नहीं है।

संघ विश्व का बृहद्तम संगठन है। इसे राष्ट्रीय मुद्दों पर अपनी नीति इतनी लचीली नहीं बना लेनी चाहिए, मानो राजनीति के निर्णयों को प्रतिष्ठित करने का प्रयास कर रही हो। संघ को तो निर्णय लेने से पूर्व सरकार को भावी आशंकाओं से अवगत कराना चाहिए। निर्णय होने पर उनका समर्थन भी करना पड़े और नई परिस्थितियों का भय भी बना रहे, यह देश के हित में नहीं होगा, न ही संघ के हित में होगा। भाजपा की हां में हां मिलाने के स्थान पर एक पितृ-संस्था की तरह आदेशात्मक रवैया बना रहना चाहिए। इसके बिना देश को पितृभूमि और मातृभूमि का पाठ पढ़ाना काम नहीं आएगा।

हिन्दू धर्म नहीं, जीवन पद्धति है। देश का हर नागरिक हिन्दू है। यह सब बातें कहने मात्र की नहीं हैं। जब किसी भी समुदाय पर अन्याय होता है, तब सहायता के लिए संघ को ही अगली कतार में दिखाई देना चाहिए। कथनी और करणी तब शिरोधार्य होगी।

अगस्त 17, 2018

कृष्ण गए राजनीति से

वाजपेयी जी नहीं रहे। जाना तो था। राजनीति में शुचिता की मशाल थे, बुझ गई। अब नहीं लौटेंगे वे दिन। अब कोई कवि हृदय नहीं आएगा राजनीति में, जो क्रान्तदर्शी भी हो और संवेदनशील भी। स्पष्टवादी भी हो, कभी पद से बंधकर जीया नहीं हो, सदा साधारण व्यक्ति बनकर रहा हो। आज देखो, हर नेता को सुरक्षा चाहिए। सुविधा चाहिए। देश के लिए, देशवासियों के लिए कौन अब चिंतित होगा।

वाजपेयी जी ने संबंधों में दिल को ही सर्वोपरि रखा। दिमाग को बीच में नहीं आने दिया। किसी विवाद में नहीं फंसे। आत्मीयता के कारण बड़े-बड़े नेता उनके आगे बौने लगते थे। उनके व्यक्तिगत संबंध ही उनकी सफलता की कहानी बने। कवि होने के कारण विशाल हृदय रहे। दलगत राजनीति से सदा ऊपर रहे। तभी तो विपक्ष में रहकर भी देश का संयुक्त राष्ट्र में प्रतिनिधित्व कर गए। आज संभव है क्या? आज तो देश को विपक्ष मुक्त करने की मुहिम चालू है।

मेरे परिवार का सौभाग्य है कि तीन पीढिय़ों को उनका सानिध्य प्राप्त हुआ। पिताजी के तो अपने रिश्ते थे ही, मैं तो उनके आगे चिडिय़ा के बच्चे जैसा पत्रकार था। मुझे जो सम्मान प्राप्त हुआ उसे व्यवहार का श्रेष्ठ प्रमाण कह सकता हूं। मैं कभी भी उनके घर गया, तुरन्त बुलाया। जितनी देर चाहा बैठने दिया। अच्छी-बुरी हर तरह की चर्चा का अवसर दिया। उनके साथ विदेश दौरों का, यात्रा में अकेले चर्चा करने का भी कई बार अवसर मिला।

स्व. भैरोंसिंह जी द्वारा प्राप्त सम्मान से तो मैं अभिभूत रहा ही हूं। उनके निजी कारण भी रहे। किन्तु वाजपेयी जी ने व्यंग्य और गांभीर्य के बीच संतुलन बनाने का जो मार्ग दिया, वह अद्भुत था। वे स्वयं हिन्दूवादी थे, किन्तु सर्वधर्म समभाव को भी आदर्श की तरह स्थापित कर गए। कश्मीर के मुद्दे पर मानवीयता और कश्मीरीयत को कभी छोटा नहीं पडऩे दिया।

हां, भाजपा नेताओं के बड़बोलेपन से वे प्रसन्न नहीं थे। एक से अधिक बार कहा होगा कि ‘यह हमारा दुर्भाग्य है।’ बड़े लोग समय से पहले पैदा होते हैं, चले जाते हैं और जब समय आता है तब बहुत याद आते हैं। वे ऐसे कूटनीतिज्ञ थे, जिनकी बात का हर पक्ष विश्वास भी करता था और लोहा भी मानता था। वे लोकतंत्र के कुरुक्षेत्र को खाली कर गए। वाजपेयी जी राजनीति की एक ऐसी गीता लिख गए, जिसको पढऩे वाला अर्जुन राजनीति में कब जन्म लेगा, समय तय करेगा।

जून 26, 2018

रुपए किलो कैंसर

पूरे देश को सोने की उपज देने वाले पंजाब और हरियाणा कैंसर से सहम उठे। वहां से रोज कैंसर ट्रेन बीकानेर आ रही है। सोने की उपज पंजाब से श्रीगंगानगर आई, हनुमानगढ़ आई और यहां से भी कैंसर ट्रेन निकल पड़ी। मारवाड़ से अनाज मंगवा रहे हैं, वहां के लोग। उनको शायद पता ही नहीं कि अधमरी जनता को पूरी तरह मारने का पुख्ता इंतजाम, अर्थात् सामूहिक आत्महत्या का प्रारूप राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात जैसे बड़े-बड़े राज्यों ने कर डाला है। आने वाले समय में कैंसर अस्पतालों और कैंसर ट्रेनों का जाल बिछा होगा।

नेता किसानों को वोट बैंक मानते हैं। कृषि में आयकर नहीं लगता। किसानों को सब्सिडी देकर असली समस्याओं को किनारे कर दिया। सब्सिडी रासायनिक खाद पर दी गई। जैविक खाद को पिछड़ा मान लिया गया। उधर पशुओं में दुग्ध वृद्धि के लिए ऑक्सीटोसिन के इंजेक्शन दे रहे हैं। पशुओं को जो चारा खिलाया जा रहा है, वह भी तो कीटनाशकयुक्त ही है। उसी का परिणाम तो अनाज को कैंसर का पोषक बना रहा है। आज का यक्ष प्रश्न है कि क्या अधिक महत्वपूर्ण है- जीवन या धन (अधिक दूध अथवा पैदावार)? आज तो किसी को मरने की चिंता ही नहीं है। मानो जीवन बाजार में मिलता होगा।

पाठकों को याद होगा कि राजस्थान पत्रिका ने सन् २००४ में एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी कि किस प्रकार आधुनिक कृषि क्षेत्र (श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़) में सब्जी, फल, अनाज, मिट्टी से लेकर माताओं के दूध तक में कीटनाशकों के अवशेष पाए गए हैं। चुनावी रणनीति ने गुजरात, मध्यप्रदेश, राजस्थान जैसे राज्यों में ‘रुपए किलो कैंसर’ बांटना शुरू कर दिया था। घर-घर तक कैंसर का प्रसार किया जा रहा है। सरकारें ही इस कैंसरयुक्त अनाज को खरीद कर लोगों में बंटवा रही हैं। वरना, कोई नहीं खरीदने वाला। स्तन कैंसर ने तो नारी सशक्तीकरण के नारे की धज्जियां उड़ा दी। अकेले भारत में ही प्रतिदिन ५२७ नए मामले स्तन कैंसर के आते हैं और नित्य ११० की मृत्युदर। भारत में कीटनाशक का वार्षिक उत्पादन ८५,००० टन है। लगता है हमने सामूहिक, स्वैच्छिक मृत्यु का मार्ग पकडऩा ही श्रेष्ठ समझ लिया है।

हम प्रकृति से दूर हो गए। खान-पान भूगोल से कट गया। डिब्बा संस्कृति हमारे विकास का नेतृत्व करने लगी है। इनका एकमात्र कारण है शरीर के प्रति बढ़ता मोह और उसके लिए धन और भौतिक सुखों का बढ़ता महत्व। क्या कोई जादू या वरदान हमें इस कैंसर से मुक्त करा सकता है? विज्ञान कहता है-‘कलियुग के बाद तो प्रलय ही है। मेरे सहयोग के बिना नहीं आ सकती। हां, विकल्प दे सकता हूं। चाहो तो जन्म से पहले ही कैंसर की गोद में बैठ जाओ, (जननी सहित), अथवा पैदा होने के बाद उन कीटनाशकों को सीधा ही भोजन के साथ गले के नीचे उतार लेना। भोजन के जरिए कीटनाशक सम्पूर्ण मानव जाति के पेट में जाते रहेंगे।’ एक अनुमान के अनुसार विश्व में सन् २०३० तक प्रतिवर्ष दो करोड़, बीस लाख नए कैंसर रोगी बढ़ते ही जाएंगे।

प्रश्न यह है कि सरकार की इस योजनाबद्ध ‘सरकारी मृत्यु योजना’ से छुटकारा कैसे मिले? किसी भी प्रदेश का स्वास्थ्य विभाग स्वस्थ जीवन के लिए योजना नहीं बनाता। खाद्य निरीक्षक इस तथ्य से मस्त हैं कि वे हर खाने की चीज में सफलतापूर्वक मिलावट करवा लेते हैं। पार्कों की जमीनें नेता-अफसर ही नोंच लेते हैं। किसी को स्वास्थ्य लाभ न मिल जाए। शहर में डेयरी नहीं रहेंगी, सब्जियां नहीं उगाई जाएंगी। शहर की फैलावट के साथ दूर से दूर ताजगी का प्रश्न। सप्ताह भर पुराना सड़ा हुआ, कीटनाशकयुक्त दूध मेरी भावी पीढ़ी के भाग्य का निर्माण करेगा। सरकार कैंसर बेचती है। फिर इलाज जानलेवा। यानी सरकार ही मौत की बड़ी सौदागर। हमारी पुरातन जीवन शैली प्राकृतिक, बिना खर्च की, जीवन के प्रति आस्था प्रधान थी। आज विज्ञान के साथ प्रलय की ओर सामूहिक कूच कर रहे हैं देशवासी।

क्या हम विवेक से काम लेने को तैयार हैं। तब जीवन से प्यार करना सीखना पड़ेगा। धन के बजाय सुख को प्राथमिकता देनी होगी। खेती से रासायनिक खाद, कीटनाशक, ऑक्सीटोसिन आदि को बाहर करना पड़ेगा। इनकी छाया भी न पड़े खाद्य सामग्री पर। मौत का सिलसिला ठहर जाएगा। न कर्ज बढ़ेगा, न ही बीमारी। इस कारण तो आत्म-हत्या नहीं करनी पड़ेगी। हां, कम खाना पड़ सकता है। आधा देश (बीपीएल) तो आज भी कम ही खाता है। नई पीढ़ी को जीवनदान मिल जाएगा। आपकी आने वाली सात पीढिय़ां सुखी रहेंगी। पूरा देश आपको आशीर्वाद देगा। नकली दूध, नाले की सब्जियों से मुक्ति मिलेगी और कैंसर को देश निकाला देने की तैयारियां शुरू हो जाएंगी। मरना तो सबको ही है, किन्तु स्वाभिमान से क्यों नहीं! कैंसर की लाचारी से क्यों?

जून 23, 2018

बदलता लोकतंत्र

पिछले सत्तर वर्षों की राजनीति में जनता ने सभी दलों को फेल कर दिया। ये अलग बात है कि जो दल सत्ता में रहता है, वह ज्यादा गुर्राता है। पिछले गुजरात और कर्नाटक के विधानसभा चुनावों, लगभग सभी राज्यों में हुए उपचुनावों में, जम्मू और कश्मीर में जो कुछ परिणाम सामने आए वे लोकतंत्र का मुंह चिढ़ाने वाले अधिक थे। दल सत्ता हासिल करने के लिए शत्रुओं की तरह लड़ाई कर रहे थे। सामन्ती युग के राजाओं की तरह एक-दूसरे को मिटाने पर तुले हुए थे। कोई अपनी बात नहीं करता, सामने वाले को कोसता ज्यादा है, मानो वह अस्तित्व में ही क्यों है। मर क्यों नहीं जाता। यह हमारे वर्तमान लोकतंत्र का जानलेवा स्वरूप है। जीतने के बाद किसी भी दल को न जनता याद रहती है, न ही चुनावी वादे। देशभक्ति और राष्ट्रीय संप्रभुता की बातें इतिहास में दब गई। देश में आज चारों ओर जो हो रहा है, किसको दिखाई नहीं दे रहा।

राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और हरियाणा के विधानसभा चुनाव सिर पर हैं। नए गठबंधन, नए समीकरण एक ओर चर्चा में आ रहे हैं, वहीं “कांग्रेस मुक्त भारत” अभियान दूसरी ओर हिलोरे ले रहा है। भाजपा सत्ता में है, निश्चिंत है। उसे कहीं कोई खतरा दिखाई नहीं पड़ रहा। कांग्रेस पूरा दम लगाकर भी गुजरात और कर्नाटक में जीत दर्ज नहीं करा पाई। ठीक यही परिणाम आगे भी आने वाले हैं। सीटों का अनुपात भी लगभग वही रहेगा। कर्नाटक में तो कांग्रेस को तिनके का सहारा मिल गया। राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में तो ऐसा विकल्प मिलने वाला नहीं है। सभी तालाब सूखे पड़े हैं। अधिकांश दिग्गज पिछले चार सालों में धराशायी हो चुके हैं। फिर भी कांग्रेस को लग अवश्य रहा है कि सत्ता विरोधी हवा उन्हें सहायता कर देगी। कुछ नेता टर्र-टर्र करते सुनाई भी देने लगे हैं।

इन राज्यों में चुनाव (लड़ाई नहीं) चूंकि दो दलों के बीच ही होना है, और उनमें से एक दल सत्ता में हैं। अत: सारी तैयारियां केवल कांग्रेस को ही करनी है। यहां नेता अधिक और कार्यकर्ता कम हैं। काम करो, न करो, उनको तो कुर्सी दिखाई पड़ रही है। हर बार वे गलतफहमी के शिकार हो जाते हैं। सत्ता छूट जाती है। गुजरात चुनाव पूर्व उनको गठबंधन का ऑफर मिला था, नहीं स्वीकार किया। कर्नाटक में छोटे दल के आगे झुकना पड़ा। अब फिर दिल्ली में नए ऑफर को बड़ी अकड़ के साथ नकारा जा रहा है। जहां उसके पैरों तले जमीन ही नहीं है। दूसरी और कांग्रेस ने बसपा से गठबंधन की राह खोली है। तीनों राज्यों की ५२० सीटों में से बसपा को १८ सीटें देना चाहते हैं। बसपा ३० सीटों की मांग कर रही है।

प्रश्न यह है कि गठबंधन का कारण और लक्ष्य ही स्पष्ट नहीं हो रहे। क्या बसपा सभी सीटों पर चुनाव जीतकर भी कांग्रेस को बहुमत में लाने लायक मानती है। पिछले चुनावों में उसने छह सीटें जीती थीं राजस्थान में। इस बार यह भी खटाई में पड़ गई। इस गठबंधन का कोई सींग-पूछ ही समझ में नहीं आता। यही कांग्रेस की राष्ट्रीय समझ का उदाहरण भी है। कांग्रेस के नेता वस्तुस्थिति से बहुत दूर हैं। न जनमानस को जान पा रहे हैं, न ही कुछ नया करने की तैयारी है। देश को सशक्त विपक्ष की जरूरत है। देश के समक्ष भी कांग्रेस के अलावा विकल्प नहीं है।

देश न दलित है, न समझ से गरीब। आज के युवा को डण्डे से नहीं हांक सकते। नोटबंदी, बेरोजगारी, पेट्रोल के दाम, महंगाई ने भले ही उसे मार रखा है, किन्तु जो कांग्रेस अपनी स्थिति नहीं संभाल सकती, उस पर वे भरोसा कैसे कर लेंगे? आवश्यकता है कि समय रहते कांग्रेस स्वयं के बजाय देश की चिंता दिखाए। अहंकार छोडक़र कुछ कर गुजरने का विश्वास दिलाए, देश को नेतृत्व देने की क्षमता पर मंथन करे। यों ही कोई प्रधानमंत्री नहीं बन जाएगा। अभी तो एक भी प्रदेश आता हुआ दिखाई नहीं पड़ता।

जून 20, 2018

बड़ी ठोकर

आदमी का स्वभाव है कि दूसरों के अनुभवों से भी नहीं सीखता और न दूसरों की सलाह का ही उपयोग करता है। स्वयं ठोकर खाता है, आगे बढ़ता है। भारतीय जनता पार्टी के लिए जम्मू-कश्मीर में सत्ता का अनुभव बड़ी ठोकर ही मानी जाएगी।

तीन साल पूर्व पूरा देश भाजपा के इस निर्णय से सहमत नहीं था कि उसे सरकार में महबूबा मुफ्ती की पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के साथ गठबंधन करना चाहिए। आखिर भाजपा को समर्थन वापस लेना पड़ा। इस बीच कितनी किरकिरी हुई। भाजपा ने संघर्षविराम करके भी देख लिया। आज भी महबूबा भाजपा को दोष दे रही हैं। उन्होंने यहां तक कह डाला कि भाजपा भुज-बल की भाषा बोल रही है।

प्रेस कॉन्फ्रेंस में वे अपने पिता मुफ्ती मोहम्मद सईद के सपनों की बातें कर रही थीं, जिन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री रहते हुए अपनी बेटी को बचाने के लिए देश की सुरक्षा से समझौता किया था। खुद महबूबा भी संघर्षविराम को बढ़ाने की सिफारिश कर रही हैं, भले ही कितने ही सैनिक शहीद हो जाएं। वे पत्थरबाजों को रोक पाने में विफल हुईं या उन्हें उकसाने में मौन स्वीकृति दी, इसका भी उत्तर देश को जल्दी ही मिल जाएगा।

भाजपा ने भी सत्ता के लालच में देश की आवाज अनसुनी कर दी। आज लाचार होकर राज्यपाल शासन का मार्ग पकडऩा पड़ रहा है। दो विपरीत प्रकृति के दलों का गठबंधन नहीं करने का निर्णय शपथग्रहण के पहले ही हो जाना चाहिए था। किन्तु दोनों ही पक्षों को सत्ता का लालच था। पीडीपी को आज भी कोई हानि नहीं हुई। उसके पास खोने को है ही क्या। विधानसभा में तो वह पहले ही अल्पमत में थी। भाजपा अवश्य कंगाल हो गई। लोगों में उसके प्रति विश्वास हिल गया। जिस अनुच्छेद 370 को हटाने की घोषणा प्रधानमंत्री ने किश्तवाड़ रैली में की थी, उसे लोकसभा में पुन: प्रतिष्ठित करना पड़ा। अलगाववादियों से बात करनी पड़ी। जम्मू के कैम्प में पाकिस्तान शरणार्थियों की नागरिकता अधरझूल में है, कश्मीरी पंडित आज भी बेघर हैं। और गठबंधन टूट गया।

पत्रिका ने तो दो मार्च, 2015 को ही लिख दिया था कि ‘दोनों पार्टियों के नेतृत्व को देखते हुए यह भी कहा जा सकता है कि जिस दिन भी उनमें से एक के भी हितों पर आंच आई, सरकार गिर जाएगी।’

सरकार बनने के बाद का मुफ्ती मोहम्मद का भाषण भी भाजपा को याद आ रहा होगा और वे सारे समझौते भी जो भाजपा ने महबूबा सरकार के साथ किए। सब धूल में मिल गए। यह समय है जब भाजपा को अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करना चाहिए। देश का माहौल चुनाव परिणामों में दिख रहा है। पीछे हटने की जरूरत पड़ रही है। पीडीपी से गठबंधन तोडऩा भी पीछे हटने की दिशा का ही एक संकेत है। तेल की बढ़ती कीमतों पर सरकार की हर तरफ आलोचना हो रही है। नोटबंदी और जीएसटी के घाव भी अभी हरे हैं। यह समय है जब इन सबके मद्देनजर भाजपा को अपने पिछले चुनावी वादों और आगामी चुनावों की दृष्टि से जनता को नए सिरे से विश्वास में लेना चाहिए। अन्यथा जिस तरह से पार्टी जनाधार खो रही है, आरएसएस भी संकेत देने लगा है, कहीं और नुकसान न हो जाए। राज्यपाल शासन ही काफी नहीं है, समझदारी से गठबंधन में हुए नुकसान की भरपाई भी जरूरी है।

मई 20, 2018

बहुत हो गया

कर्नाटक विधानसभा में येड्डियूरप्पा ने इस्तीफा देकर अटलबिहारी जी के पुराने पदचिह्नों का अनुसरण ही किया है। इस निर्णय से उनकी हठधर्मिता का कलंक घट जाएगा। किन्तु भाजपा अध्यक्ष और राज्यपाल के माथे का टीका और स्याह हो जाएगा। राज्यपाल तो सीधे-सीधे ही कठघरे में आ गए। इन्होंने जिस संकीर्ण दृष्टि का परिचय दिया वह असाधारण बात है। मानो जिन्दा मक्खी निगल गए। सत्ता का अहंकार किस हद तक छाया है यह अमित शाह के वक्तव्यों में झलकता रहा है। प्रधानमंत्री जब कहते हैं कि ‘यह मोदी है’ तब अहंकार चरम पर जान पड़ता है।

यही वह कारण है कि चुनाव में जनता के विषय पीछे छूट गए। राजनीति शत्रुता पर आधारित हो गई। एक-दूसरे को मिटाने के नारे, कांग्रेस (विपक्ष) मुक्त भारत के नारे मुखर हो गए। चुनाव हार-जीत का मैदान बन गए। जन प्रतिनिधि के चुनाव की अवधारणा, जो लोकतंत्र की जड़ में रही है, पूर्णत: उखड़ ही गई। लोकतंत्र निर्मूल हो गया। देश तो आभारी है सर्वोच्च न्यायालय का (जो स्वयं विवादों से घिरा है), जिसने अदम्य साहस का परिचय दिया। अदृश्य भय की आशंका के बीच सत्य की रक्षा (परित्राणाय साधुनां) का संकल्प पूरा कर दिखाया। लोकतंत्र की सांसें लौट आईं। न्यायपालिका में भी हर्ष की लहर दौड़ी ही होगी। पहली बार किसी राज्यपाल के निर्णय पर ऐसी तीखी और आक्रामक टिप्पणी भी देश ने सुनी होगी।

सच तो यह है कि कांग्रेस पहली बार इतनी जागरूकता और आक्रामकता के साथ नए तेवर में, कफन बांधकर लडऩे के मूड में दिखाई दी। लगा कि लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका सत्तापक्ष से भी अधिक महत्वपूर्ण है। यहां तक कि अधिकार की लड़ाई के लिए देर रात सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खट-खटा दिया। इसमें चोट खाए हुए सांप की फुंफकार सुनाई दे रही थी। हाल ही में देश के मुख्य न्यायाधीश के विरुद्ध महाभियोग की उपराष्ट्रपति से स्वीकृति प्राप्त नहीं हुई थी। उपराष्ट्रपति के विरुद्ध भी कांग्रेस न्यायालय पहुंच गई। यह आक्रामकता की पराकाष्ठा थी।

एक प्रश्न यह भी उठ रहा है कि क्या भाजपा ने सत्ता का ऐसा दुरुपयोग पहली बार किया है? अपने चहेते लोगों को राज्यपाल बनाकर उनका अपयश पहली बार करवाया है? कांग्रेस कहां थी जब मार्च-२०१७ में मणिपुर के चुनावों में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी (२८ सीटें) थी और सरकार भाजपा (२१ सीटें) ने बनाई? गोवा में भी कांग्रेस (१७ सीटें) और भाजपा (१३ सीटें) की स्थिति ऐसी ही थी। वहां भी कर्नाटक में कांग्रेस की तरह भाजपा की सरकार थी। कैसे कांग्रेस ने वहां के राज्यपालों (क्रमश: नजमा हेपतुल्ला और मृदुला सिन्हा) के निर्णयों को मौन स्वीकृति दे दी?

इस वर्ष फरवरी में मेघालय विधानसभा चुनावों में भी राज्यपाल गंगाप्रसाद ने सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस (२१ सीटें) को नकार कर संगमा को (१९ सीटें) सरकार बनाने का आमंत्रण दे दिया। कांग्रेस मौन थी। जिसकी लाठी उसकी भैंस का अभियान बेरोकटोक चला। इससे भी एक कदम आगे लोकतंत्र की हत्या का उदाहरण सामने आया नगालैण्ड में। भाजपा ने चुनाव लड़ा एनपीएफ के गठबन्धन में। सीटें मिलीं १२ और २६ यानी बहुमत के साथ। सरकार बनी विरोधी पार्टी एनडीपीपी के साथ, जिसके विरुद्ध चुनाव लड़ा था। मानो वहां चुनाव आयोग भी नहीं था। राज्यपाल पद्मनाभ आचार्य ने शपथ दिला डाली।

इन चुनावों में सभी जगह राज्यपालों की भूमिका राजनेताओं की तरह स्पष्ट होती गई। किसी को अपमान की अनुभूति भी नहीं हुई। उनके समक्ष कोई स्पष्ट कानून भी नहीं था जो इनका मार्गदर्शन करता। निश्चित ही स्वविवेक तो अपनी प्राकृतिक दिशा में ही कार्य करेगा। कहीं गठबन्धन को प्राथमिकता, कहीं सबसे बड़े दल को। क्या कोर्ट का बीच में आना राज्यपाल के पद का अपमान नहीं? क्या भविष्य में कोई राज्यपाल इस प्रकार मनमर्जी से निर्णय कर पाएंगे? अन्य राज्य भी यदि अब न्यायालय में जाते हैं तो क्या लोकतंत्र गौरवान्वित होगा?

आज का ज्वलंत प्रश्न है कि क्या भाजपा सत्ता के अपने अहंकार का आकलन करेगी? यह ‘चित भी मेरी, पुट भी मेरी’ क्या आगे भी चलेगी। आज भाजपा की सहयोगी पार्टियां मुखर होने लगी हैं। चाहे असम गण परिषद हो, शिवसेना या अकाली दल हो। तेलुगूदेशम तो साथ ही छोड़ गई। दूसरी ओर कर्नाटक चुनाव का सारा श्रेय कांग्रेस को भी नहीं जा सकता। देश की सभी विपक्षी पार्टियां चुनाव अभियान में जुटी हुई थीं। सोनिया गांधी से लेकर मायावती, चन्द्र्रबाबू नायडू, चन्द्रशेखर राव, सीताराम येचुरी-विजयन (सीपीएम केरल) सहित भाजपा के विरुद्ध मैदान में थे। यही हमारे लोकतंत्र का भविष्य है। क्या कोई चिन्तित दिखाई पड़ता है- देश के लिए, लोकतंत्र के यशस्वी भविष्य के लिए?

हमारे सामने हिन्दी भाषी, बड़े एवं भाजपा शासित राज्यों के विधानसभा चुनाव सिर पर हैं। इस बार यहां भी कर्नाटक होगा, भले ही परम्परा से दो ही दल रहे हों। एक तो चेहरे बदलने की चर्चा पर केन्द्र की उठा-पटक, दूसरा सभी विरोधी दलों का एकजुट होकर मुकाबला करना। तीसरा कांग्रेस का नया आक्रामक चेहरा। भाजपा और कांग्रेस, दोनों को ही यह नहीं मान लेना चाहिए कि तूफान को आसानी से झेल लेंगे। जनमानस के प्रतिबिम्ब भी मीडिया में झलकते रहते हैं। देखने वाले की मर्जी और देश का भाग्य!

मई 18, 2018

स्थानीय नेतृत्व ही प्रभावी

कर्नाटक विधानसभा चुनावों ने देश की राजनीति में एक भूचाल सा ला दिया। चुनाव प्रचार की भाषा ने विश्व को स्पष्ट संदेश दे दिया कि भारत अब ज्ञान के, संस्कृति और शिष्टाचार के क्षेत्र का विश्वगुरु नहीं बनेगा। राजनेताओं के विषय जनता से जुड़े हुए नहीं थे। वहां तो दलगत दलदल था। सत्ता और सत्ता, बस! कुर्सी के इस संघर्ष में तीनों स्तम्भों के चेहरे भी देश ने देख लिए। जिसकी लाठी, उसकी भैंस!

क्या कर्नाटक की जोड़-तोड़, खरीद-फरोख्त धमकियों और सोशल मीडिया की यह गूंज इसी वर्ष होने वाले हिन्दी भाषी राज्यों के चुनाव को भी प्रभावित करेगी या बीच में ही खो जाएगी? वह कौन से अनुभव हैं जो हमें अगले चुनाव में भी काम आएंगे? राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में तो वैसे भी भाजपा की स्थायी सरकारें हैं। यानी, घर की मुर्गी दाल बराबर? कर्नाटक चुनाव कह रहे हैं कि फिर भी कुछ रहस्य तो है जिसके प्रति जागरूक तो रहना ही पड़ेगा। यह कहना काफी नहीं होगा कि भाजपा के साथ संघ की सेना है, और कांग्रेस सेवादल लडख़ड़ा गया है, कि कांग्रेस के पास उच्च और मध्यम दर्जे के कार्यकर्ता नहीं हैं। कुछ तथ्य और भी हैं जिनको हम विस्मृत नहीं कर सकते। आइए, सिंहावलोकन करें!

कर्नाटक के सन 2008 के विधानसभा चुनावों में भाजपा को 33.8 प्रतिशत मतों के साथ 110 सीटें मिली थीं। कांग्रेस 34.76 प्रतिशत के आंकड़ों के साथ 80 सीटें तथा एचडी देवेगौड़ा की पार्टी जद (ध) 18.96 प्रतिशत के साथ तीसरे स्थान पर रही थी। येड्डियूरप्पा भाजपा में ही थे। सन 2013 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने अकेले चुनाव लड़ा और 20 प्रतिशत मतों के साथ 40 सीटें जीत पाई थी। येड्डियूरप्पा की पार्टी को 9.79 प्रतिशत मतों के साथ 6 सीटें तथा श्रीरामुलू की पार्टी को 2.69 प्रतिशत के साथ चार सीटें हासिल हुई। तीनों दलों ने मिलकर 50 सीटें प्राप्त की। पिछले चुनावों के मुकाबले भाजपा परिवार को 60 सीटें खोनी पड़ी।

इस बार 2018 के चुनाव भाजपा येड्डियूरप्पा एवं श्रीरामुलू तीनों एक होकर लड़े। वर्ष 2013 के विधानसभा चुनाव की हार के बाद 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले ही भाजपा ने दोनों की पार्टियों को अपने में मिला लिया। तब फिर से भाजपा को 36.2 प्रतिशत मतों के साथ 104 सीटें मिल पाईं। हालांकि 2008 के मुकाबले अभी 6 सीटें टूटी। कांग्रेस को 38 प्रतिशत मतों के साथ 78सीटों पर संतोष करना पड़ा। जो गलती 2013 के चुनावों में भाजपा ने की थी, इस बार कांग्रेस ने दोहरा दी। आंकड़े गवाह हैं कांग्रेस और जद (ध) का गठबंधन भी यदि चुनाव पूर्व हो जाता तो सीटों की गणित बदल जाता। अभी जद (ध) तो मात्र 18.3 प्रतिशत के साथ 37 सीटों पर ही आकर ठहर गई है। लोकसभा चुनावों के आंकड़े भी कुछ ऐसी ही भाषा बोल रहे हैं। सन 2009 के चुनावों में भाजपा को 41.63 प्रतिशत मतों के साथ 19 सीटें मिली थी।

येड्डियूरप्पा की पार्टी के अलग होने से विधानसभा की करारी हार (2013) ने भाजपा और येड्डियूरप्पा के दल को पुन: एक कर दिया और 2014 के लोकसभा चुनाव में फिर इस गठजोड़ ने 43 प्रतिशत मतों के साथ 17 सीटों पर पहुंच बना ली। यदि इसी प्रकार अगले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस भी देवेगौड़ा की पार्टी से गठबन्धन करती है तो चुनाव धारदार हो जाएंगे।

निष्कर्ष क्या निकला? यही कि भाजपा हो अथवा कांग्रेस, क्षेत्रीय नेताओं की भूमिका के बिना कोई स्थानीय चुनाव नहीं जीत सकती। अगले चुनाव चूंकि भाजपा शासित राज्यों में हैं, अत: केंद्रीय नेतृत्व को तीनों मुख्यमंत्रियों श्रीमती वसुंधरा राजे, शिवराज सिंह चौहान एवं रमन सिंह को किसी भी दृष्टि से कम महत्वपूर्ण नहीं मानना चाहिए। सत्ता का अहंकार कैसे घातक होता है इसका प्रमाण तो कर्नाटक प्रत्यक्ष है। इनमें से किसी का भी चुनाव पूर्व हट जाना प्रदेश को खोने के बराबर ही होगा। बाहरी व्यक्ति कोढ़ में खाज का कार्य करेगा। कर्नाटक का यह सबक अगले चुनाव जीतने के लिए बहुत व्यापक और महत्वपूर्ण संकेत दे रहा है। इन संकेतों को नजरअंदाज करना भारी भूल साबित हो सकती है।

अप्रैल 4, 2018

जनता जनार्दन!

क्या सपने देखे थे इस देश के नागरिकों ने, आजादी के सिपाहियों ने, संविधान निर्माताओं ने, लोकतंत्र के प्रथम शासकों ने जब देश के भविष्य की कमान अंग्रेजों से छीनकर भारतीयों ने संभाली थी। नागरिकों का मनोबल भी शिखर पर था कि हम ही चुनेंगे हमारी सरकार और अब हम ही होंगे अपने देश के भाग्य विधाता। आज सत्तर साल बाद लगता है कि सिपाही सो गए, सपने हवा हो गए, नागरिक भी देश के प्रति उदासीन होते जा रहे हैं। नई पीढ़ी तो फिर से अंग्रेज बनने के सपने देखने लगी है। देश का प्रशासन-संविधान आज भी भारतीय नहीं बन पाया। देश की जिस अखण्डता और एकता की तब कसमें खाई गईं थीं, वो आज तार-तार हो चुकी हैं। हर सरकार अंग्रेजों की तरह ‘फूट डालो और राज करो’ के अभियान चलाती रही है। जाति और सम्प्रदाय इस देश के नासूर बन चुके हैं। जात-पांत की राजनीति ने देश का आन्तरिक विभाजन कर डाला। इस पर लोग फूले नहीं समा रहे। युवा बेरोजगारी से त्रस्त्र है, देश विकास को तरस रहा है। सामन्ती युग याद आने लगा है जब अपने ही अपनों को ठगने लगे हैं। राज दरबार फिर से चापलूसों से चहकने लगे, हड्डियां चबाने वालों का बोलवाला, चारों ओर शकुनि मामा के परिजनों की याद दिलाने लगे। पूरा देश आज लक्ष्मी के अंधकार में डूब गया है।

मेरे देशवासी जिस देश में भी जाकर बसे, उसे ही चमका दिया, ऊपर उठा दिया। आज फिर अवसर आ रहा है जब हम फिर से नए सपने देख सकते हैं, उनको साकार भी कर सकते हैं। हमारा सर्वे इशारा भी कर रहा है कि लोग बदलाव चाह रहे हैं। आइए! हम मिलकर राजस्थान पत्रिका/पत्रिका के मंच पर चिन्तन करते हैं, मनन करते हैं, निदिध्यासन करते हैं। यही उपासना देश के अभ्युदय का मार्ग प्रशस्त करेगी। स्वतंत्र चेतना की जागृति के इस यज्ञ में प्रत्येक वयस्क नागरिक को आहुति देनी है। स्वयं को देश के विकास में लगाने का संकल्प करना है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ‘स्वच्छ भारत अभियान’ के अन्तर्गत भ्रष्ट एवं स्वार्थी जनप्रतिनिधियों की सफाई का कार्य हाथ में लेना है। विधानसभाओं के चुनाव आ रहे हैं-राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और कर्नाटक में तो सिर पर ही हैं।

हम तुरन्त चर्चा शुरू कर दें कि हमको किस तरह के विधायक नहीं चाहिए और क्यों नहीं चाहिए? किस तरह के विधायक आने चाहिए, जिनको नई पीढ़ी, नए युग और भारतीय सांस्कृतिक वैभव की भी समझ हो? जो बेशर्मी से स्वार्थपूर्ति और अनाचार से चिपका न रहे। देश के प्रति मन में संवेदना हो। ईश्वर से डरता हो। वंशवाद, जातिवाद जैसे शस्त्रों से देश के टुकड़े करने वाला न हो। जनता के बीच में रहने वाला हो। आयाम तो अन्तहीन हैं। पत्रिका सर्वे दर्शाता है कि सुधार के लिए गैर राजनीतिक लोगों को भी आगे आना चाहिए। तीनों ही हिन्दी-भाषी राज्यों में पाठकों की एक जैसी राय है। आज राजनीतिक दलों के लिए न सिद्धान्त बड़ी चीज है और न विचारधारा। भ्रम और दिखावे की राजनीति ने देश के लोकतंत्र पर अनेक प्रश्नचिन्ह लगा दिए। आज गाली-गलौज पर आकर सारे दिग्गज तक ठहर चुके हैं।

आश्चर्य नहीं कि राजस्थान के ५६.०१ प्रतिशत, मध्यप्रदेश के ५२.०२ प्रतिशत, छत्तीसगढ़ के ४९.०५ प्रतिशत पाठक वर्तमान विधायकों को पुन: लौटाना नहीं चाहते। इससे भी एक कदम आगे ६२.५९, ५४.९७ तथा ५८.७८ प्रतिशत लोग सरकार को भी बदलने के पक्ष में हैं। कांग्रेस को भी जनता लायक नहीं मान रही। ५७.४७ प्रतिशत पाठकों का मानना है कि कांग्रेस को विपक्ष के रूप में जो भूमिका निभानी थी, उसका निर्वहन भी ढंग से नहीं कर पाई। जब मतदाता दोनों दलों से निराश है, तब कहां जाएगा? क्या दिल्ली की तरह बाहरी हवा का झोंका रंग लाएगा? मूल प्रश्न यह है कि सरकारें तो हम बदलते ही रहे हैं। क्या कर लिया? अब हमें क्या करना चाहिए, अपने नजरिए और कर्म की दिशा में क्या परिवर्तन करना चाहिए, ताकि नए प्रतिनिधि नए युग के अनुरूप चुने जाएं।

आंख मूंदकर जाति-धर्म-क्षेत्र जैसे नामों पर तो किसी भी दबाव में चयन नहीं करें। युवा आगे आएं। समाज में सामूहिक चिन्तन हो। व्यक्ति को प्राथमिकता दी जाए और उस व्यक्ति का चयन भी समाज ही करे। चेंजमेकर के तौर पर, बदलाव के नायक के रूप में राजनीति में अच्छे लोग सक्रिय हों। साफ-सुथरी छवि वाले, हालात बदलने का संकल्प धारण करने वाले आगे आएं। दूसरों को भी प्रेरित करें। बदलाव के नायकों का यह कदम स्वस्थ राजनीति के मार्ग का अभ्युदय करेगा। आरोप-प्रत्यारोप के स्थान पर रचनात्मक विकास की बहस आगे बढ़ेगी। पुराने विधायकों को भी अन्य दलों को गालियां देने के बजाय विकास और उपलब्धियों की बात करनी पड़ेगी। चुनावी हथकण्डे ज्यादा काम नहीं आ सकेंगे। नेताओं को भी मर्यादा में रहकर अपनी बात कहनी पड़ेगी। राजनीति में सफाई का दौर शुरू हो जाएगा। जनता अपनी शक्ति एवं विवेक का फिर से जागरूक होकर प्रयोग करेगी। ईश्वर साक्षी रहे!

मार्च 21, 2018

एक और काला

राजस्थान सरकार के काले कानून की राख अभी ठण्डी भी नहीं हुई कि मध्यप्रदेश में एक और काला कारनामा हो गया। अभी १५ मार्च को विधानसभा के प्रक्रिया तथा कार्य संचालन सम्बन्धी नियमावली में संशोधन किया गया। संशोधन करना साधारण बात है, किन्तु ७० साल के लोकतांत्रिक इतिहास में पहली बार कोई संशोधन बिना सदन में बहस के लागू कर दिया गया। अत: यह संशोधन प्रश्नों के घेरे में आ गए।

कुछ संशोधन तो ऐसे कर दिए कि संविधान की मूल भावना का गला ही घोंट दिया गया है। एक ओर विधायकों के अभिव्यक्ति के अधिकारों को कुचल दिया गया, वहीं दूसरी ओर विधानसभा के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया। जिस कार्य के लिए विधायक चुने जाते हैं, उसी मंशा को ध्वस्त कर दिया। आप देखिए संशोधन क्या किए गए।

एक नियमावली २३१ के तहत। क्रम सं.(२२) उसमें किसी समिति की ऐसी कार्यवाही के बारे में नहीं पूछा जाएगा जो समिति के प्रतिवेदन द्वारा सभा के सामने न रखी गई हो या समिति के समक्ष विचाराधीन हो। (इसका अर्थ यह हुआ कि कितना भी महत्वपूर्ण मुद्दा यदि किसी समिति के सामने विचाराधीन है तो कोई विधायक उस मुद्दे पर प्रश्न ही नहीं पूछ सकता।) क्रमांक (२५) उसमें साम्प्रदायिक दंगे, संवेदन घटनाओं अथवा गोपनीय स्वरूप की ऐसी गतिविधियों की जानकारी नहीं मांगी जाएगी जिनको प्रकट न करने का संवैधानिक, संविहित या पारम्परिक दायित्व हो। (संवेदन घटना और पारम्परिक दायित्व जैसे शब्दों की आड़ में किसी भी प्रश्न को सदन में आने से जब चाहे रोकने की आशंका) विधान सभा में प्रश्न करने का दायित्व तो हर एक विधायक का है। इसे बाधित नहीं किया जा सकता। अध्यक्ष के पास अधिकार होते हैं कि वह प्रश्नकर्ता को रोक सकता है। प्रश्न को स्थगित करवा सकता है। प्रश्न करने के अलावा एक विधायक वहां क्या कर सकता है। विशेषकर निर्दलीय अथवा विपक्ष का! उसका तो मूल कार्य ही सरकार के काले पक्ष को उजागर करना है। उस पर अंकुश लगाना तो सीधा-सीधा लोकतंत्र पर ही अंकुश है। फिर क्यों विधायकों का चुनाव हो और क्यों विधानसभा का गठन ही किया जाए? इन संशोधनों के बाद विधायकों की आवाज जहां चाहे रोकने की आशंका हो जाएगी। इनका दुरुपयोग कर जब चाहे लोकतंत्र का गला घोंटा जा सकता है। इस प्रकार के संशोधन ने तो संविधान निर्माताओं की समझ एवं निष्ठा पर ही सवाल उठा दिए।

क्या लोकतंत्र में स्पष्ट बहुमत का यह परिणाम होता है? क्या जनता को आगे के लिए इसे एक बड़े घातक अनुभव की तरह नीलकण्ठ बनकर निगल जाना चाहिए? पहले महाराष्ट्र ने तुरप का एक पत्ता खेला, फिर राजस्थान कुरुक्षेत्र में उतरा। अब मध्यप्रदेश में काला झण्डा लहराने लगा है। आश्चर्य तो यह है कि जिन लोगों ने आपातकाल का दंश झेला है, उन्हीं के हाथों आपातकाल के समकक्ष कदम उठाए जा रहे हैं। विधानसभा में जिनको विशेषाधिकार प्राप्त हैं, उनके अधिकार का हनन करना कितना सहज लग रहा है, मानो जीवनभर सरकार कुर्सी से नीचे ही नहीं आएगी। सत्ता का यह कैसा अहंकार है! अभी कुछ दिन पूर्व ही मध्यप्रदेश की एक मंत्री यशोधरा राजे ने एक चुनाव सभा में कहा था कि ‘यदि आप हमको वोट नहीं देंगे तो हम आपके कोई काम नहीं करेंगे।’ आज तक उनका बाल भी बांका नहीं हुआ।

इस संशोधन के लिए किसी प्रकार के कारण चर्चा में नहीं आए। क्यों सरकार इस तरह के संविधान विरोधी संशोधन ला रही है? किस प्रकार की समस्याएं पिछले कार्यकाल में सामने आईं जिनका निराकरण न विधायक के पास है, न आरटीआइ (जो कि आज भी लागू है) से हल हो सकती है। सरकार को खतरा आरटीआइ से कुछ नहीं है, केवल विधायकों द्वारा उठाए जाने वाले प्रश्नों से है। क्या इस संशोधन से विधायकों के साथ-साथ आम मतदाता का अपमान नहीं होगा? आज यह संशोधन आया, कल संविधान ही मान्य नहीं होगा, तब क्या करेंगे?

सरकार को संकल्प करके लोकतंत्र के हित में इस संशोधन को वापस ले लेना चाहिए। यदि सरकार का विवेक साथ न दे और केन्द्र भी महाराष्ट्र और राजस्थान की तरह यहां भी मौन रहे, तो विधायकों को मिलकर अपने इस अधिकार पर कुठाराघात के विरुद्ध संघर्ष करना चाहिए। भले ही ये संशोधन सर्वसम्मति से किए गए हों फिर भी इन्हें वापस लेने के लिए पार्टी और विचारधारा जैसे भेद त्याग कर उन्हें एकजुट होकर आवाज उठानी होगी।

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