Gulabkothari's Blog

दिसम्बर 5, 2018

धर्म-जाति नहीं, पहले देश

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों का आधे से ज्यादा सफर पूरा हो गया है। दो दिन बाद राजस्थान में मतदान की बारी है। राजनीतिक दलों का चुनावी अभियान चरम पर है, पर जनता अब भी किंकर्तव्यविमूढ़ की स्थिति में नजर आ रही है। पांच साल से भाजपा सत्ता में थी। उससे पहले कांग्रेस। आज फिर दोनों आमने-सामने हैं। वही जाति, धर्म की बातें। एक-दूसरे पर हल्के शब्दों में छींटाकशी। सरकारी मशीनरी के काम करने के ढंग में कोई परिवर्तन नहीं। सडक़ें, ओवरब्रिज बनाने में खूब पैसा, पर बेरोजगारी से त्रस्त युवा और कर्ज में डूबे किसान की हालत जस की तस। क्या मतदाता को फिर दो एक जैसे दिखने वाले दलों में से एक को चुनना है। या उसे व्यवस्था से संघर्ष का कोई रास्ता इन चुनावों के माध्यम से निकालना है? उसकी उधेड़बुन का केंद्र बिंदु यही सवाल है।

राजनीतिक दलों की सामंती सोच लोकतंत्र को लील गई। जनता कमाती है, लोकतंत्र के नाम पर दोनों पाए खा रहे हैं। वेतन-भत्तों में राजस्व कम पड़ जाता है। विकास कार्य करते हैं उधार लेकर, ब्याज सिर लेकर और कमीशन खाकर। ऊपर से भ्रष्टाचार-कोई सरकारी कार्य बिना रिश्वत नहीं होता। जनता ठगी सी देख रही है, अपने बेरोजगार बच्चों को, मरते किसानों और पशुधन को। बड़े उद्योग विदेशी निवेश और मित्र मण्डली के हाथ, मध्यम उद्योग अव्यावहारिक आर्थिक नीतियों और अफसरों की मनमानी की मार में डूबे। अब खुदरा व्यापारी वालमार्ट और ऑन-लाइन शॉपिंग की भेंट चढ़े। आज-पिछले सत्तर सालों से-हम कहने को तो स्वतंत्र हैं फिर भी परोक्ष रूप से परतंत्र होने लगे हैं। निजी विकास को छोडक़र, धर्म के नाम पर भगवान भरोसे छोड़ बैठे हैं देश को।

यही वर्तमान चुनावों का मौन है। धर्म से पेट नहीं भरता। राजा आज प्रजा की सुनवाई नहीं करता। विपक्ष भी मौन है, सुप्त है। अपना अस्तित्त्व खो चुका है। उसे लगता है कि आज फिर एक अवसर आया है। कपड़े झाडक़र फिर खड़ा होने के प्रयास कर रहा है। सत्तासीन होते ही भाजपा ने देश को विपक्षमुक्त करने की घोषणा कर डाली। थी। अत: आज अकेले ही-जनता के सामने चुनाव लड़ रही है। कांग्रेस सदा से राज करती रही है। उसे संघर्ष करना आता ही नहीं है। राजे-रजवाड़े जनता के साथ संघर्ष करेंगे क्या, जनता के लिए? आज भाजपा भी इसी परिभाषा में शामिल हो गई है।

लोकतंत्र में चुनाव कम से कम दो दलों के बीच होता है। यहां भी मुख्य रूप से कांग्र्रेस-भाजपा के बीच होता रहा है। जनता किसी एक का चुनाव करती रही है। इस बार सन्नाटा है। कोई भी प्रदेश हो, अभी तो एक ही पार्टी चुनाव लड़ रही है-सत्तासीन पार्टी। विपक्ष तो पूरे कार्यकाल में नदारद रहा है। जनता का कहीं प्रतिनिधित्व होता ही नहीं। सरकार या सत्तापक्ष की मनमानी झेलना जनता की मजबूरी बन चुकी थी। चुनाव आज एक दलीय रह गया। तब कैसा चुनाव? इसका एक ही अर्थ है-जनता और व्यवस्था (लोक और तंत्र) आमने-सामने हैं। यही वह चौराहा है, जहां से युवा पीढ़ी को दहाड़ मारनी है।

पिछले 70 सालों से हम धर्म और जाति के नाम पर ही वोट देते आए हैं। किसका भला हुआ! सभी समाज वहीं के वहीं हैं। हर जाति-धर्म के कुछ परिवार नए रजवाड़े बनकर खड़े हो गए। आम आदमी उन पर आश्रित हो गया। हम स्वतंत्र कहां हुए? बल्कि नए रजवाड़े भी अब तो गुण्डों-अपराधियों को टिकट देकर मतदाता का अपमान करने लगे हैं। धन और शराब के बदले वोट खरीदना जातियों के लिए गर्व की बात है क्या? लोकतंत्र व्यापार बन गया। हम अपने ही जनप्रतिनिधियों के हाथों सुरक्षित नहीं हैं, लुट रहे हैं। कब तक चलेगा यह, कौन रोकेगा इस परतंत्रता के अभियान को? जो प्रभावित होगा, जो अपना भविष्य खुद बनाना चाहेगा। आज एक अवसर है इस स्थिति पर पुनर्विचार करने के लिए। भविष्य बूढ़े-ठाड़ों पर नहीं टिकता। जवानी ही पहचान बनती है भविष्य की।

हम देख रहे हैं कि पूरा चुनाव अभियान आलोचना-प्रधान है। सबकी औकात भी इतनी ही है। लीडरशिप नदारद है। अत: नई पीढ़ी को वोट भी मंथन करने के बाद देना है और देश को नेतृत्व देने के लिए संकल्प भी करना है। खण्ड-खण्ड होते देश को अखण्ड रखने का भी संकल्प करना है। सोचो, हम भी विकास में ऊपर तक पहुंच सकते थे, नहीं पहुंच पाए। हम जाति और धर्म की बेडिय़ों को नहीं तोड़ पाए। हमारी शिक्षा ने हमें सक्षम नहीं बनाया। इसीलिए हमारे अस्तित्त्व का दोहन हो रहा है। आगे भी होता रहेगा, यदि हमने स्वयं को स्वतंत्र कर लेने का बीड़ा नहीं उठाया। पुरानी पीढ़ी को भी अपने दर्द में भागीदार करना पड़ेगा। नई पीढ़ी की अंगुली भी पकडक़र रखनी होगी। सब को एक ही लक्ष्य पर मोहर लगानी है।

व्यक्ति स्वयं की सोचकर बड़ा नहीं हो सकता। देश के लिए स्वयं का मोह छोडऩा ही व्यक्ति और समाज को बड़ा बनाता है। हम देश के साथ ही बड़े-छोटे हो सकते हैं। हां, भ्रष्टाचार और अपराधों के सहारे अलग से भी कागज के टुकड़े बटोर सकते हैं। बच्चों के तो साख ही काम आती है, जो आज की राजनीति में तो नहीं बचती। देश में अलग से जो बड़े होते जा रहे हैं, वे देश छोड़ते जा रहे हैं। वे देश के काम आते ही नहीं। नई पीढ़ी को फिर से आजादी के लिए अभियान छेडऩा है। स्वयं बीज बनकर फल आने वाली पीढ़ी के लिए छोडऩा है। जो अपने फल खुद खाना चाहता है, याद रखिए, वह कभी भी पेड़ नहीं बन सकता। समय के साथ नष्ट हो जाएगा। युवा वर्ग को पेड़ बनकर देश को हरा-भरा और पुष्पित-पल्लवित करना है। नहीं तो आपके बच्चों को उतना भी नहीं मिलेगा जितना आपके जीवन को मिल पाया है। कहते हैं कि, यदि छुरी सोने की भी हो तो पेट में नहीं मारी जाती।

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दिसम्बर 4, 2018

मुट्ठी भर मौन

इस देश को आजाद हुए 70 वर्ष बीत गए। कहने को किताबी शिक्षा का प्रसार भी हुआ। इसका व्यावहारिक जीवन से कोई सम्बन्ध नहीं है। अत: आज का शिक्षित युवा सांस्कृतिक धरातल से अछूता है। संस्कृति की गूढ़ता वह जानना नहीं चाहता, न ही संस्कृति को स्वीकार करना चाहता है। आज का देश दो भागों में बंटा है। पुरानी पीढ़ी बात तो संस्कृति की कर रही है, परम्परा की कर रही है, किन्तु मतलब किसी बात का नहीं समझा पाती अपने बच्चों को। आज चुनाव की तैयारियां जोरों पर हैं। मतदाता मौन है।

पुरानी पीढ़ी धर्म, जाति, वंश के सहारे लोकतंत्र की उपलब्धियां नहीं गिना पा रही है। आजादी के बाद विकास की चर्चा के नाम पर आज हर व्यक्ति त्रस्त दिखाई पड़ रहा है। मानो फिर से गुलाम हुआ जा रहा है। वहीं खड़ा है, जहां खड़ा था। आज भी सरकारों पर आश्रित है। जो कुछ विकास दिखाई दे रहा है, यह सारी समृद्धि मूल में तो लोकतंत्र के तीनों पायों तथा उनसे जुड़े वर्ग की है। आम आदमी की नहीं है।

दूसरी ओर सांस्कृतिक धरातल खो गया है। पहली बार लग रहा है पुरानी पीढ़ी ने युवाओं का हाथ छोड़ दिया है। देश की थाती नई पीढ़ी तक नहीं पहुंचा पा रही। शिक्षा की दीवार खड़ी हो गई। आज तो नई पीढ़ी इसमें ही अपना भविष्य ढूंढ़ रही है। उसके सामने अनेक प्रश्न हैं जिनका उत्तर कोई राजनेता नहीं दे रहा है। बल्कि हो यह रहा है कि धर्म को राजनीति से जोडक़र उसे भी विषैला बनाया जा रहा है। धर्म सहिष्णु देश का धर्म स्वयं कट्टर होता जा रहा है। धर्मनिरपेक्षता संविधान के पन्नों में सिमटकर रह जाएगी। जब देश का प्रधानमंत्री किसी भी एक पार्टी का प्रतिनिधि बनकर कार्य करने लगेगा, शेष भारत का प्रधानमंत्री कौन होगा?

नई पीढ़ी मौन है। धर्म-संकट में पड़ी है। स्वयं धर्म भी संकट में है। वह भी राजनीति का चोगा पहनकर अपना अस्तित्त्व बचा लेने की चिन्ता कर रहा है। क्या ऐसे चिन्तन वाले नेता 21वीं सदी के वैश्वीकरण का चिन्तन कर सकेंगे जहां नई पीढ़ी का भाग्य खड़ा है। क्या वे इस वातावरण में बेरोजगारी के स्वप्नजाल से बाहर आ सकेंगे? वे इस चुनाव को चुनौती मान रहे हैं। उनकी संख्या भी आधी से ज्यादा है। यही परिवर्तन का संकेत भी है। परम्पराएं टूटती दिखाई पड़ रही हैं। क्षितिज पर नया भोर का तारा चमक उठा है। यही मौन टूटकर देश को नई दिशा देगा।

इन चुनावों में पहली बार धर्म और धर्मगुरु फेल होंगे। संत, शंकराचार्य, पीर-पठान पीछे जाते जान पड़ेंगे। नई पीढ़ी इनके साथ अपना भविष्य नहीं जोड़ पा रही। गुण्डों, अपराधियों तथा धन-बल के सहारे लोकतंत्र का झांसा देने वाले भी उठ जाएंगे। इस बार युवा संकल्पित है। वह इस बार किसी लोभ में आने वाला नहीं दिखता। उसे निष्ठावान और भविष्यदृष्टा नेता चाहिए। जो उसकी चिन्ताओं को समझ सके। अत: निर्दलीय भी बहुत हैं और जीतेंगे भी। पत्रिका के ‘चेंजमेकर’ भी उभरे हैं- जन सहयोग से। कुछ परिवर्तन बड़ा होता नजर आ रहा है। शुरुआत राजस्थान से होगी, परिणाम 2019 के लोकसभा चुनावों में सामने आएंगे। विधानसभा चुनावों में मुकाबला सरकारों और जनता के बीच ही दिखाई दे रहा है। कांग्रेस चर्चा में नहीं है। उसके स्टार प्रचारक भी दिखाई नहीं दे रहे। युवा व्यवस्था में परिवर्तन ढूंढ़ रहा है।

अभी पश्चिमी राजस्थान के दौरे पर सामने आया कि वहां के सिंधी-सिपाही (मुसलमान) गाजी फकीर और पीर पगारों के इशारे पर ही मतदान करते हैं। ये फकीर पाकिस्तान के पीरों के प्रतिनिधि हैं। गुजरात में लुनार पीर है। यहां से नियमित चढ़ावा पाकिस्तान जाता है। वहां से फरमान जारी होते हैं। अर्थात् 70 साल बाद भी हम स्वतंत्र चुनाव नहीं करवा पा रहे। और सभी दल इस तथ्य को स्वीकार करके चल रहे हैं। मानो धरती के इस टुकड़े से उनका वास्ता ही नहीं है। राज्य सरकार की योजनाओं की सच्चाई इन लोगों से मिलकर देखी जा सकती है। अयोध्या का राममन्दिर ऐसी ही प्रतिक्रिया का परिणाम है। लोकतंत्र विकास का रास्ता छोडक़र युवा शक्ति को अन्यत्र ले जा रहा है। चुनाव की चाबी युवा के हाथ में है, जो किसी के बहकावे में आने की बजाय स्वतंत्र रूप से फैसला करने की क्षमता रखता है। वह मौन है। भविष्य उसकी मुट्ठी में बंद है। देखना है कि जब उसकी मुट्ठी खुलेगी, तब देश में क्या गुल खिलेंगे। कम से कम धर्म, जाति और ठकुराई (वंशवाद) तो नहीं रहेंगे।

नवम्बर 24, 2018

मप्र: खण्ड-खण्ड अखण्डता

लोकतंत्र के बढ़ते अंधेरे के बीच पंचवर्षीय चुनाव ही रजत रेखा है। असुरों का अधिपति वरुण अपना साम्राज्य खोना नहीं चाहता। सूर्य को ढकने वाले मेघों (बादलों-वृत्तासुर) का वध इन्द्र रूप में युवा पीढ़ी के हाथों होता है। सौभाग्य की बात है कि वर्तमान चुनावों में युवा पीढ़ी का ही बोलबाला है। चालीस वर्ष से कम उम्र का मतदाता लगभग दो तिहाई है। इनमें करीब २० प्रतिशत युवा पहली बार मतदान कर रहे हैं। हिन्दी क्षेत्र के तीनों बड़े राज्यों में एक जैसी स्थिति है।

अगले २०-२५ वर्षों में देश तकनीकी युग के किस मोड़ पर होगा। नई आवश्यकताएं, चुनौतियां कैसी होंगी और उनका सामना करने वाले जन प्रतिनिधि किस क्षमता वाले होंगे, इसका चुनाव इस बार करना है। प्रतिनिधि का केवल ईमानदार होना ही काफी नहीं है। उसका समझदार और दूरदृष्टि वाला होना भी उतना ही जरूरी है। दागी, अहंकारी और वंशवाद का प्रतिनिधि काम नहीं कर पाएगा। उसे भावी शिक्षा के स्वरूप, रोजगार तथा मानवीय संवेदनाओं के प्रति जागरूक होना चाहिए। वह भ्रष्टाचार से संघर्ष कर सके तथा धर्म-जाति के भेद से दूर रह सके। शक्तिमान के आगे कमजोर की रक्षा कर सके। हमें योजनाओं का अम्बार नहीं चाहिए। मुफ्तखोरी और मांगने की आदत भी नहीं चाहिए। स्वतंत्रता चाहिए। मुक्त वातावरण और स्वावलम्बन का मार्ग चाहिए। इस दृष्टि से देश अभी आजाद नहीं है। इस बार का चुनाव युवाशक्ति का भविष्य तय करने वाला होना चाहिए। ऐसा ही होता भी जान पड़ता है।

दूसरा समुदाय किसानों का है। मध्यप्रदेश के किसानों का अढ़ाई महिनों का पैदल मार्च अभी २८ अक्टूबर को ही समाप्त हुआ है। प्रदेश में ७० प्रतिशत से अधिक किसान मतदाता हैं। सरकार ने प्रदेश में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, भावान्तर योजना, बोनस भुगतान आदि कई प्रकार की योजनाएं चला रखी हंै। अपने छत्तीसगढ़ के अनुभव के आधार पर मैंने जबलपुर से सागर, विदिशा, भोपाल, इंदौर, बडऩगर, उज्जैन, शिवपुरी आदि क्षेत्रों की यात्रा के दौरान किसानों से चर्चा को ही प्राथमिकता दी। मन्दसौर गोली काण्ड में मरे छह किसानों के कारण क्षेत्र में व्याप्त रोष को समझने के लिए मैंने छह जिलों के किसान प्रतिनिधियों को इंदौर आमंत्रित किया। गांवों के बीच से गुजरा।

शरीर के किसी अंग में कोई भी चुभन हो, दर्द सर्वत्र होता है। छत्तीसगढ़ इस दृष्टि से अभी मध्यप्रदेश का अंग ही है। दोनों ही प्रदेशों के किसान परिवर्तन चाहते हैं। वे इस बात को स्वीकार करते हैं कि उनको सस्ता अनाज मिलता है। सडक़ें-पुल जैसे कमीशनखोरी वाले विकास कार्य भी खूब हुए हैं। किन्तु इनसे पेट नहीं भरता। मध्यप्रदेश में ज्यादातर रोष अधिकारियों की कार्यशैली पर है। सरकार की इन पर कोई पकड़ नहीं है। हर व्यक्ति भ्रष्टाचार से त्रस्त है। सरकार एक हाथ से दे रही है, तो दूसरे हाथ से छीन भी लेती है। कल्याणकारी योजनाएं ही किसानों की तकलीफों को, खर्चों को, नुकसान को बढ़ा रही हैं। उनका क्रियान्वयन ही कुछ इस तरह हो रहा है कि उनका लाभ मिलने के स्थान पर किसान को हानि अधिक हो रही है। किसान इस चक्रव्यूह से बाहर भी नहीं निकल पा रहा। शायद यह चुनाव ही उसके लिए अभिमन्यु साबित हो।

इस चुनाव का एक और महत्वपूर्ण पहलू है, जो पहली बार सुरसा की तरह मुंह फाड़े खड़ा है। वह है ध्रुवीकरण। संविधान में कोई बहुसंख्यक नहीं है, किन्तु अल्पसंख्यक कई हैं। सारे मिलकर लगभग २० प्रतिशत होंगे। इनमें सर्वाधिक मुस्लिम वर्ग के हैं।

मध्यप्रदेश में यह वर्ग भयग्रस्त है। हिन्दुत्व की उदारता और अनेकान्तवाद के प्रति भी आशंकित है। शेष ८० प्रतिशत आबादी भी अब दो ध्रुवों में बंट गई। अत्याचार निवारण कानून के बाद मध्यप्रदेश में सवर्ण अभियान आज भी मुखरित है। सामान्य वर्ग अपने सामने ६० प्रतिशत आबादी को देखता है। कई नेताओं, चिन्तकों और बुद्धिजीवियों से चर्चा हुई। आधी आबादी किसान बहुल ओबीसी की है। तीनों ही हिन्दी भाषी राज्यों में एक जैसा माहौल है। फेक-न्यूज और पेड-न्यूज दीमक की तरह लोकतंत्र को चाट रहे हैं।

देश में पहली बार इस प्रकार की उठा-पटक, दल-बदल, टिकट बंटवारे में बौखलाहट और दागी नेताओं का इतना महिमामण्डन दिखाई पड़ रहा है। चुनाव में राजनीतिक दलों का लोगों से किसी प्रकार का सरोकार ही दिखाई नहीं पड़ता। इनको तो येन-केन-प्रकारेण खरीद लेने की ही योजनाएं बनती हैं। लोक अलग है, तंत्र अलग है। प्रदेशों की सरकारें ध्रुवीकरण का समाधान नहीं कर सकतीं। कारण किसान हो, युवा हो अथवा ध्रुवीकरण। सतह के नीचे परिवर्तन की मौन धारा बह रही है। छत्तीसगढ़ में चुनाव के दो दिन पहले लोगों का मौन टूटा, मध्यप्रदेश में कुछ अलग नहीं होगा।

नवम्बर 9, 2018

कर गुजरो

हमारे लोकतंत्र को किसी की नजर लग गई है। कहने को हर पांच साल में चुनाव होते हैं। लेकिन उनमें धनबल-भुजबल और परिवारवाद हावी रहता है। कहने को सरकारें जन प्रतिनिधियों की बनती हैं। लेकिन उन पर हावी नौकरशाही रहती है। वही नीतियां-कार्यक्रम बनाती है और वही लागू करती है। मंत्री तो तभी बोलते दिखते हैं, जब उनका कोई स्वार्थ आड़े आता हो। राजनीतिक दलों को भी विषय विशेषज्ञ मंत्रियों की जरूरत नहीं लगती। वे मुख्यमंत्री के चेहरे की बात तो करते हैं लेकिन वित्त, स्वास्थ्य, शिक्षा, बिजली, पानी, सडक़ और रोजगार जैसे विभागों को कौन संभालेगा, इसकी उन्हें कोई चिन्ता नहीं होती।

चुनाव वाले इन राज्यों में तो राज्यसभा की तर्ज पर विधान परिषदें भी नहीं हैं कि उनसे विशेषज्ञ ले आएं। भाजपा आए या कांग्रेस उसकी जिन्दगी पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा। मंत्रियों की नासमझी और अक्षमता की हर तरफ जब मजाक उड़ता है तब मतदाता से ज्यादा कोई शर्मिंदा नहीं होता। उसे लोकतंत्र का मतलब ही समझ नहीं आता। पूरे पांच साल महंगाई, बेरोजगारी, बलात्कार, आत्महत्याओं का दौर बना रहता है। बजट कई-कई गुना बढ़ गए, योजनाओं और मुफ्त की बंदरबांट के अम्बार लगे हैं, किन्तु विकास के दावों के बीच गरीबी की रेखा के नीचे जाने वाले बढ़ रहे हैं।

आज पार्टियों को आम आदमी के हित की चिन्ता भी नहीं है। सब दलों का एक ही नारा गूंज रहा है-‘जिताऊ को टिकट देंगे।’ कोई इस ‘जिताऊ’ की परिभाषा देने को तैयार नहीं है। जिताऊ की कीमत समाज चुका रहा है। उनको तो दबंग, भ्रष्ट, अपराधी और कालाधन खर्च कर सकने की क्षमता वाला प्रत्याशी चाहिए। दागी को प्राथमिकता मिले तो कोई आश्चर्य नहीं। प्रश्न यह है कि क्या ऐेसे प्रतिनिधियों के भरोसे २१वीं सदी में लोकतंत्र की जड़ें गहरी हो सकेंगी? क्या युवा वर्ग और किसानों के घावों पर मरहम लगा पाएंगे? क्या जाति और धर्म की संकीर्णताओं से देश को बाहर निकाल सकेंगे? आज देश के हर क्षेत्र में विदेशी प्रवेश पा रहे हैं, हमारे काम-काज पर संकट के बादल हैं। ऊपर से भ्रष्टाचार का दानव अंग्रेजों को भला साबित कर रहा है।

इस माहौल में राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ तीन बड़े हिन्दी भाषी राज्यों में चुनाव सिर पर हैं। नई पीढ़ी के युवा मतदाता ६० फीसदी से अधिक हैं। यानी कि यह चाहे तो क्रान्ति ला सकते हैं। आज इन राज्यों में दो राजनीतिक दलों -कांग्रेस और भाजपा- ने सत्ता का ठेका ले रखा है। किसी को भी संघर्ष करने की आवश्यकता नहीं है। दोनों में से एक दल सत्ता पर काबिज होगा। भीतर दोनों दलों की मिलीभगत भी जगजाहिर है। जनता के लिए एक दल कुआं है तो दूसरा खाई। आज तीनों राज्यों में भाजपा की सरकार है।

कांग्रेस आश्वस्त है कि बिना किसी प्रयास के सत्ता उसके हाथ आने वाली है। यही आत्म-संतुष्टि जनता के लिए विषाक्त भी है और अभिशाप भी। बिना इस चक्रव्यूह से बाहर निकले नई पीढ़ी को तो शायद पीने के लिए शुद्ध पानी भी नहीं मिलेगा। रोटी और नौकरी किताबों और योजनाओं तक सिमटकर रह जाएंगी। यही समय और अवसर है युवा शक्ति के जागरण का, नेतृत्व अपने हाथ में लेने का।

बयार में बदलाव

परिवर्तन नित्य है, प्रकृति का नियम है। चारों युगों की यही कहानी है। सत्ता ही अहंकार है, प्रकृति-सत, रज, तम-ही परिवर्तन के कारक हैं। अविभाजित मध्य प्रदेश में कांग्रेस का शासन था। मुख्यमंत्री वर्तमान छत्तीसगढ़ क्षेत्र से आते थे। सन् 2000 में जब विभाजन हुआ, परिवर्तन का नया दौर शुरू हुआ। अजीत जोगी छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री बने। इससे पहले वर्ष 1967 में गैर-कांग्रेस सरकार बनी। खरीद-बेच और चुनावी खर्च की मर्यादा भंग की शुरुआत हो गई। 1969 में फिर श्यामाचरण शुक्ल मुख्यमंत्री बने। संविद सरकार बनी। सत्ता का एक सिद्धान्त आगे से आगे बढ़ता गया। जब किसी शक्तिमान को हराकर सत्ता को प्राप्त किया जाता है, तब शक्तिमान की सारी बुराइयां पहले ग्रहण की जाती हैं। जैसे अंग्रेजों की सारी बुराइयां हम आज तक ढो रहे हैं। कांग्रेस की बुराइयों को भाजपा ढो रही है। उसी तर्ज पर परिवारवाद बढ़ता जा रहा है। लोकतंत्र की मर्यादाएं तार-तार होती जा रही हैं। लोकतंत्र के तीनों पायों एवं मीडिया ने अपना भारत ही अलग बना लिया है। शेष भारत इसका पोषण करता है। कोई बड़ा नेता आगे किसी को तैयार नहीं करता। अपने लोगों को लाने के लिए संघर्ष करता दिखाई पड़ रहा है।

अब फिर राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे बड़े हिन्दी भाषी राज्यों में विधानसभा चुनाव सिर पर हैं। छत्तीसगढ़ में प्रथम चरण बारह नवम्बर को है। यहां पिछले पन्द्रह साल से भाजपा की सरकार है। मतदाताओं के लिए सुविधाओं और योजनाओं का अम्बार लगा है। मुख्यमंत्री रमनसिंह अपनी चौथी जीत के प्रति पूरी तरह आश्वस्त दिखाई दे रहे हैं, पर जनता में एक धारणा यह भी है कि बिना धन दिए कोई काम नहीं होता। अधिकारी आततायी हो गए हैं। विशेषकर जनजाति तथा आदिवासी क्षेत्रों में। भाजपा का सम्पर्क नीचे तक अवश्य है, किन्तु जनता में परिवर्तन की कसक स्पष्ट है। किन्तु यह भी कटु सत्य है कि कांग्रेस के पास नेतृत्व की क्षमता वाला चेहरा नहीं है। भाजपा के विरुद्ध वातावरण को ही कांग्रेस अपनी जीत मानकर चल रही है। अवसर का लाभ उठाने के लिए अभी तक भी कोई तैयारी दिखाई नहीं देती। बस, आत्म संतुष्टि है कि भाजपा से टूटा वोट कांग्रेस की झोली में ही गिरेगा। किसी ‘कुमार स्वामी’ की जरूरत नहीं पड़ेगी।

इतिहास करवट बदलता दिखाई पड़ता है। भाजपा और कांग्रेस को औसतन बराबर (38-39%) वोट मिलते रहे हैं-छत्तीसगढ़ में। 4 फीसदी बसपा, 7-8% निर्दलीय, 2-3% माकपा, सपा वगैरह को। इस बार समीकरण बदलते जान पड़ रहे हैं। सारा खेल नए मतदाता के हाथ में रहेगा, जो पार्टी को नहीं प्रत्याशी को महत्व देने वाला है। पूर्व चुनाव आयुक्त सुशील त्रिवेदी से चर्चा में सामने आया कि इस बार लगभग पांच लाख वोटर-18-19 वर्ष आयु के-पहली बार मतदान करेंगे। 20-29 आयु के अधिकांश मतदाता (कुल 54 लाख) भी पहली बार मतदान करेंगे। इनमें शेष युवा मतदाता (48 लाख) भी जोड़ लें तो लगभग एक करोड़ से अधिक मतदाता ऐसे होंगे, जो या तो बेरोजगार होंगे अथवा छोटा-मोटा काम नोटबंदी के कारण बंद कर चुके हैं। सड़क पर खड़े हैं। इनमें ही किसानों की नई पीढ़ी भी हैं जो खेती छोड़कर शहर में आकर मजदूरी करने को मजबूर है। इनमें तो चर्चा केवल बदलाव की ही है। वैसे भी छत्तीसगढ़ का किसान सरकार के विरुद्ध आन्दोलनरत है। पदयात्राएं कर चुका है। इनसे भाजपा को कितना समर्थन मिल पाएगा, समय ही तय करेगा।

दलों में लोकतंत्र कहीं नहीं बचा, सब जगह हाईकमान बन गए…

छत्तीसगढ़ में अनुसूचित जनजाति के 32% मत हैं। ओबीसी के 51% तथा अनुसूचित जातियों के 12% मत हैं। शेष सभी मतदाता पांच प्रतिशत में हैं। हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई सब इसी में हैं। इनमें भी दलित एवं ईसाई तो कट्टर भाजपा विरोधी माने जाते हैं। इसी कारण अजीत जोगी, मायावती एवं कम्युनिस्ट पार्टियों का गठबंधन इनको आकर्षित करने में लगा है।

यहां यह उल्लेख उचित होगा कि अनुसूचित जातियों की 10 में से नौ सीटें भाजपा के पास हैं। इसका कारण जोगी का त्रिकोण माना जाता है। इस बार भी यही संभावना भाजपा के लिए श्रेष्ठ वरदान साबित हो सकती है। आम धारणा है कि इस बार जोगी ‘किंग मेकर’ बनना चाहते हैं। जैसा कि कर्नाटक में कुमार स्वामी बन गए।

बस्तर आदिवासी क्षेत्र में भाजपा के पास 12 में से चार सीटें हैं। इस बार जोगी भी यहां जोर लगा रहे हैं। भाजपा के सामने इस बार प्रवीण तोगडिय़ा की अंतरराष्ट्रीय हिन्दू परिषद भी खड़ी है। विश्व हिन्दू परिषद् से अलग हुए प्रवीण तोगडिय़ा ने बताया कि उनका दल समझौता नहीं करेगा और लगभग पचास हजार सदस्य भाजपा के विरोध में मतदान करेंगे। यह वही क्षेत्र है जहां आदिवासी मतदाता कई स्थानों पर बूथ तक नहीं पहुंच पाता। फिर भी उसके मत पेटी में पाए जाते रहे हैं। इस बार संभावना इसलिए भी कम है क्योंकि प्रत्येक बूथ पर कैमरे लगे होंगे। प्रधानमंत्री की इस क्षेत्र में दो तथा सरगुजा में एक सभा हो चुकी है, किन्तु प्रभावशून्य ही रही हैं। यहां चुनाव 12 नवम्बर को हैं।

इसके साथ ही राजनांदगांव, दुर्ग क्षेत्र की छह सीटों पर भी इन्हीं के साथ चुनाव होंगे। यह मुख्य रूप से साहू, यादव और कुरमी समाज (ओबीसी) का क्षेत्र है। सन् 2013 के विधानसभा चुनावों में यहां 3.07% वोट नोटा में पड़े थे। भाजपा की जीत का कुल अन्तर 0.7% लगभग 80 हजार था-पूरे प्रदेश में। सन् 2014 के लोकसभा चुनावों में नोटा के मत 1.86% रह गए। जीत का अन्तर दस प्रतिशत हो गया था।

मत प्रतिशत इस बार और बढ़ेगा। सन् 1998 में मतदान प्रतिशत 60.37 से बढ़कर सन् 2013 में 77.82% हो गया था। प्रदेश में 13 जिले ऐसे भी हैं जहां महिलाएं अधिक संख्या में हैं। लगभग 33-34 विधानसभा क्षेत्रों में। मतदान का प्रतिशत पिछली बार भी अधिक था। इस बार भी बढऩे की संभावनाएं हैं। बेरोजगारी से यह क्षेत्र त्रस्त है। अच्छी सड़कों को देखकर पेट नहीं भर सकता।

छत्तीसगढ़ विधानसभा में वर्तमान स्थिति के अनुसार भाजपा-49, कांग्रेस-39 सीटों पर काबिज हैं। एक सीट पर बसपा तथा एक पर निर्दलीय विधायक है। इनमें से अनुसूचित जातियों की दस तथा अनुसूचित जनजातियों की 29 सीटें हैं। सन् 2008 में भाजपा करीब डेढ़ प्रतिशत मतों के अन्तर से सत्ता में आई थी। सन् 2013 में यह अन्तर आधा 0.7% रह गया था। भाजपा ने तीन सीटें तो 1500 मतों से कम अन्तर से हासिल की थीं। इसी प्रकार दस सीटों पर जीत का अन्तर 1500 से 5000 मतों का था।

आज जब हवा बदलाव की चल पड़ी है तो नए समीकरण बनेंगे। एक अन्य बड़ा मुद्दा सरकार के विरुद्ध अनुसूचित जनजाति बहुल बस्तर और सरगुजा क्षेत्र में बन गया है। सरकार ने वन अधिकार कानून के क्रियान्वयन में मनमानी के अनगिनत उदाहरण लोकहित के विरुद्ध पैदा किए। भू-राजस्व संहिता में बदलाव करके आदिवासी की मालिकाना भूमि को जबरन खरीदने के लिए लाए जाने वाले कानून से आदिवासी समाज का बड़ा हिस्सा भाजपा से नाराज है।

इसका प्रभाव मैदानी क्षेत्रों के अनुसूचित जाति वाले क्षेत्रों में भी दिखाई दे सकता है। इसका निराकरण अजीत जोगी-मायावती गठबंधन द्वारा कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने से होना माना जाता है। इसी क्षेत्र में, इसी कारण भाजपा को 10 में से 9 सीटें मिली थीं। इस बार बराबर रहने की संभावना है। प्रधानमंत्री पूरी तरह चर्चा से बाहर हैं।

साधारण सीटों पर कांग्रेस फर्जी राशन-कार्ड के मुद्दे को घर-घर पहुंचा रही है। सन् 2011 की रिपोर्ट में 56 लाख गरीब परिवार थे, जबकि ७२ लाख राशन-कार्ड बनाए गए। पोल खुल जाने के बाद हालांकि अब फर्जी कार्डों को निरस्त करना शुरू हो गया है।

वर्तमान विधानसभा में भाजपा दस सीटों से आगे है। इस बार यदि छह सीटें निकल जाती हैं, तो भाजपा कष्ट में आ जाएगी। इस बार अजीत जोगी गठबंधन में लड़ रहे हैं। वे स्वयं, उनकी पत्नी एवं उनका पुत्र जनता कांग्रेस से और पुत्रवधू बसपा से चुनाव लड़ रहे हैं।

जोगी स्वयं अंदरखाने रमनसिंह के साथ भी माने जाते हैं। तब इस बिखराव का लाभ सीधा कांग्रेस को ही मिलेगा। यह सारा संघर्ष सतनामी समुदाय के लगभग 35000 मतों के लिए मचा हुआ है। वैसे इस बार किसानों के अलावा शिक्षक, संविदा कर्मचारी, आंगनबाड़ी कर्मचारी अपना रोष जाहिर कर चुके हैं। निचले स्तर पर जो छोटी-छोटी संस्थाएं प्रदेश भर में भाजपा के साथ कार्य कर रही थीं, वे भी अपना हाथ खींचकर बैठ चुकी हैं।

सन् 2000 में मध्यप्रदेश का जब विभाजन हुआ, वहां पर दिग्विजय सिंह की सरकार थी। छत्तीसगढ़ में भी अजीत जोगी कांग्रेस के मुख्यमंत्री बने। इससे अधिकांश कांग्रेसी आदिवासी नेता नाराज हो गए। कांग्रेस को हराने का अभियान कांग्रेस में ही चल पड़ा। विद्याचरण शुक्ल ने सन् 2003 के चुनावों में शरद पवार से समझौता करके अलग चुनाव लड़ा। कुल सात प्रतिशत मत और एक सीट मिली, किन्तु कांग्रेस सत्ता से चूक गई।

इसी प्रकार पिछले विधानसभा चुनावों में अनुसूचित जाति की 10 में से 9 सीटों पर कांग्रेस की हार, तब कांग्रेस के एक बड़े नेता की सेंधमारी की वजह से ही मानी गई। यही संभावना इस बार भी भाजपा की सबसे बड़ी उपलब्धि बन सकती है। भले ही जनता भाजपा को बदलना चाहती है, किन्तु इसे भुनाने के लिए कांग्रेस पूरी तरह तैयार नहीं दिखाई पड़ती। जितनी मेहनत कांग्रेस को करनी चाहिए वो नहीं कर पा रही। बस, आत्म-मुग्ध है।

हालांकि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल मानते हैं कि पिछले 3-4 साल में कांग्रेस ने, उन्होंने स्वयं ने प्रदेश में काफी संघर्ष किया है, जिसके परिणाम निश्चित रूप से दिखाई देंगे। पिछले विधानसभा चुनाव के बाद जगदलपुर संभाग, अम्बिकापुर संभाग, ऊर्जानगरी कोरबा, इस्पात नगरी भिलाई में जब भी चुनाव हुए, कांग्रेस को जीत हासिल हुई। नगरपालिका चुनावों में कांग्रेस भाजपा से दो सीटें आगे रही और नगर पंचायत में एकतरफा जीत हासिल की। सोसायटी चुनाव में 75 प्रतिशत नतीजे कांग्रेस के पक्ष में गए।

कांग्रेस नेता मान रहे हैं कि ओबीसी के मतदाता एकतरफा कांग्रेस के साथ हैं। जीएसटी की वजह से छोटे व्यापारी भी भाजपा से छिटककर कांग्रेस के साथ आ गए हैं। उनका एक गणित यह भी है कि अनुसूचित जाति की सीटों पर निर्णायक वोट (लगभग 71 प्रतिशत) तो ओबीसी व सामान्य वर्ग के ही हैं। कांग्रेस का मानना है कि छत्तीसगढ़ में पार्टियों के पारंपरिक वोट गठबंधन के समय दूसरी पार्टी को हस्तांतरित नहीं होते। बघेल के नेतृत्व में धान खरीद, नसबंदी, जीएसटी, नोटबंदी आदि मुद्दों पर जो संघर्ष हुआ है, उसे वोटों में बदलते देखा जा रहा है।

पिछले चुनावों में नोटा में 3.07% वोट गए थे। नक्सलियों की धमकी काम कर गई कि वोट नहीं डालेंगे और डाले जाएं तो नोटा में डाल देना है। एक साल बाद लोकसभा चुनावों में नोटा कम होकर 1.86% रह गया। इस बार नक्सली प्रभाव क्षेत्र भी कम हो गया है। नोटा कम हो जाएगा। किन्तु भाजपा ने जमीन कानून बदलने का जो प्रयास किया उसने बड़ा विद्रोह खड़ा कर दिया। आदिवासी जातियों में तथा जनजातियों में। चूंकि पिछले चुनावों में जीत का अन्तर एक प्रतिशत से भी कम था, अत: भाजपा ने यहां पूरी ताकत झोंक रखी है।

यह सच है कि आज लोकतंत्र कहीं भी नहीं बचा। सब जगह हाईकमान बन गए। कांग्रेस की बुराई करते-करते उसके सारे दुर्गुण भी भाजपा ने ओढ़ लिए। सब मठाधीश बन गए। बजट दस गुणा बढ़ गया। परिवारवाद का प्रभाव यह भी हुआ कि नीचे की पंक्ति कहीं बनी ही नहीं। जो 20 साल से दरी उठा रहा है, वह ऊपर उठ ही नहीं रहा।

गांवों के वोट अब किसी एक शक्तिमान के कहने से नहीं पड़ सकते। अत: इस बार वोट का प्रतिशत, सीटें एवं परिणाम कुछ भिन्न होंगे। भाजपा की चिन्ता यही है कि उसकी सीटें तमाम प्रयासों के बावजूद बढ़ नहीं पा रही हैं।

अक्टूबर 2, 2018

लुट न जाए सौहार्द

नीति का अर्थ है येन-केन-प्रकारेण अपनी स्वार्थ सिद्धि। इसके लिए किसी का भी अहित होता हो, कर दो। किसी की भी बलि चढ़ानी हो, चढ़ा दो। लोकतंत्र या तानाशाही, मलाई तो सत्ता के साथ रहती है। सारा ताण्डव इसी मलाई के लिए, सारा भ्रष्टाचार भी इसी मलाई के लिए। और यह युगों से होता आ रहा है। जनसेवा के लिए, प्रजापालन के लिए जाना जाने वाला राजतंत्र अन्तत: आसुरी ही प्रमाणित होता है। अत: अंकुश अनिवार्य है। निरंकुशता तंत्र का प्रवाह पतित कर देती है। तब नैतिकता और देश की प्राथमिकताएं रसातल में जाने लगती हैं। शासन ही देश की आत्मा कहलाता है। निर्विरोध (विरोधहीनता) और निरंकुशता ही जनता को त्रस्त और अपमानित करते हैं। स्वयं सत्ता देश से बड़ी बनकर राज करती है।

राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे तीन बड़े प्रदेशों में चुनाव सिर पर हैं। केन्द्र के साथ इन तीनों प्रदेशों में भी भाजपा सत्ता में है। अर्थात जो वोट पड़ेंगे, वे भाजपा के पक्ष या विरोध में पड़ेंगे। ‘पत्रिका’ ने जब बड़ा सर्वे करवाया, जिसमें कुल दो लाख, बासठ हजार लोगों से बात की, सरकारों के कामकाज पर बात की, अजा-जजा प्रकरण पर बात की, जनता के मानस को टटोलने का प्रयास किया तो एक बात बहुत स्पष्ट थी कि किसी भी सरकार को जनता की सुख-दु:ख की अभिव्यक्ति से कोई सरोकार नहीं है।

अत: पहली बार यह तथ्य प्रकट हुआ कि जनता इस बार दलों से ज्यादा अच्छे प्रत्याशी को प्राथमिकता देगी। लगभग एक लाख, बीस हजार (४६ फीसदी) लोगों का यह स्पष्ट मत था। यह किसी भी दल के लिए चिन्ता का विषय नहीं है। मुझे लगा कि ‘पत्रिका’ का चेंजमेकर अभियान जनता के इस चिन्तन में सहयोगी अवश्य होगा। नेतृत्व का अहंकार भी तब प्रतिलक्षित होता है जब लोग वर्तमान नेतृत्व का साथ छोड़ते दिखाई देते हैं। इसी प्रकार अजा-जजा एक्ट मुद्दे पर लोग (५२ फीसदी) नोटा का विकल्प चुनने को तैयार नहीं। वे जानते हैं उनको क्या करना है। प्रसार-प्रचार शायद उनको प्रभावित न कर पाए। सरकारों की अपनी अलग धुन है।

सरकारों को यह भी लगता है कि यदि सरकारी कर्मचारी प्रसन्न रहेंगे तो चुनाव आसानी से जीते जा सकते हैं। वेतन-भत्तों की बरसात होती रहती है। अजा-जजा एक्ट का मुद्दा, आरक्षण का विरोध, यह भी सरकारी सेवाओं के मद्देनजर ही अधिक महत्वपूर्ण है। उदाहरण के तौर पर राजस्थान में आठ लाख कर्मचारी हैं। इनमें अजा-जजा-ओबीसी आधे (करीब चार लाख) हैं। आबादी का लगभग आधा प्रतिशत। और इस कानून की मार पड़ेगी ९९.५ फीसदी आबादी को। सर्वे के आंकड़े इसका प्रमाण हैं। कौन सी मार? ७२ फीसदी सवर्ण मानते हैं कि आरक्षण नहीं होना चाहिए। वहीं ७४ फीसदी आरक्षित वर्ग इसके पक्ष में हैं, किन्तु इनमें भी ५० फीसदी क्रीमीलेयर को आरक्षण देने के पक्ष में नहीं हैं।

क्या आर्थिक स्तर ही जीवन का एकमात्र लक्ष्य होना चाहिए? सामाजिक वैमनस्यता बढ़े और आर्थिक स्तर भी अधिकांश का नहीं बढ़े, तब समाज व्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ेगा? सर्वे में ६४ फीसदी सवर्णों ने और ४५.७१ फीसदी आरक्षित वर्ग के लोगों ने स्वीकार किया है कि आरक्षण ने जातिगत वैमनस्यता बढ़ाई है। ४६.६ फीसदी सवर्ण और ४१.६ फीसदी आरक्षित वर्ग स्वीकारता है कि दोनों के बीच आपसी सम्बन्ध बिगड़े हैं। जीवन की सच्चाई तो यही मानी जाएगी। कानून अपनी जगह होता है। समाज और राष्ट्र सौहार्द से चलते हैं। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का यही तो अर्थ है। सम्बन्ध बिगड़ गए तो सौहार्द लुट जाएगा।

आज न तो सरकार और न ही कानून रोजमर्रा के जीवन में दिखाई पड़ते हैं। इनका साथ छूट गया तो क्या हो सकता है, यह किसी नेता, अधिकारी या न्यायाधीश की चिन्ता का विषय नहीं। आजादी के बाद का इतिहास तो अभी सामने ही है। साम्प्रदायिक दंगों का स्वरूप कौन नहीं जानता? आर्थिक स्तर से मानव का आत्मिक धरातल पोषित नहीं होता। आप चुनाव में होने वाले खर्च को गरीबों में बांटकर देख लें। एक भिखारी को रात में कोई नया कम्बल ओढ़ा दें, तो वह उसे सुबह बाजार में बेच देता है जबकि उसे गरीब मानकर ही लोग धन देते हैं।

आज देश के इतने टुकड़े हो गए, कानून ने भी किए, धर्म-सम्प्रदायों ने भी किए, राजनीति ने भी किए, कि एक ही समुदाय में एक से अधिक धड़े हो गए। एक-दूसरे के सामने तनकर खड़े हैं। राजनेता इसी से प्रसन्न हैं। देश को आज ऐसे संगठनों की आवश्यकता है जो स्वयं राजनीति से बाहर सामाजिक सौहार्द के लिए नए सिरे से वातावरण तैयार करे। ‘मुंह में राम, बगल में छुरी’ वाले वातावरण से मुक्ति दिला सके। अभी तो कोई दिखाई नहीं पड़ता। सम्पन्न वर्ग चाहे तो इसकी शुरुआत कर सकता है। वह गरीब परिवारों के एक-एक व्यक्ति को ऊपर उठाने की जिम्मेदारी ले सकता है। युवा चाहें तो देश को नेतृत्व दे सकते हैं, क्रान्ति ला सकते हैं। वरना तो विष्णु के दसवें अवतार ‘कल्कि’ के आने की ही प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। तब तक क्या यह देश हमारे हाथ में रह पाएगा?

सितम्बर 28, 2018

लचीलापन क्यों?

सम्पूर्ण देश आज एक झंझावत से गुजर रहा है। आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, संवैधानिक आदि सभी व्यवस्थाओं में मानो एक भूचाल आया हुआ है। देश अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है। आने वाले चुनावों की अमर्यादित उखाड़-पछाड़ के बीच, भ्रष्टाचार, मुद्रा-महंगाई और बेरोजगारी के तीर चल रहे हैं, आरोप-प्रत्यारोप लगाए जा रहे हैं। सरकार की चारों ओर किरकिरी हो रही है। केन्द्र, विशेषकर प्रधानमंत्री, मौन हैं।

इस बार के चुनाव कुछ विशेष होंगे। सत्ताधीशों के लिए तो जनता खिलौना मात्र है। किन्तु जनता बेचैन है, त्रस्त है। नए परिवेश में देश तीन मुख्य धड़ों में बंट चुका है। कानून की भी इस विभाजन पर मोहर लग चुकी है। मुस्लिम इस बार अधिक संगठित हो गया है। यह भी चिन्ता का एक बड़ा राजनीतिक कारण बना हुआ है, विशेषकर भाजपा के लिए। वैसे भी तीन बड़े प्रान्तों का चुनाव भाजपा के विरोध में ही लड़ा जाना है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में तो भाजपा १५-१५ वर्षों से सत्ता में है। डर कहां है?

इस बार अजा-जजा एक्ट ने शेष भारत के भी बराबर के दो टुकड़े कर दिए। यह भी भाजपा और कांग्रेस दोनों की सहमति से हुआ। सर्वोच्च न्यायालय ने भी समर्थन किया। इसके परिणामस्वरूप सवर्ण समुदाय पहली बार आक्रामक हो गया। आरक्षण तो पहले भी था। आक्रोश ऐसा नहीं था। मुसलमानों को जब अल्पसंख्यक घोषित किया था, तब भी प्रतिक्रिया हुई थी। आज परिणाम सामने हैं। ठीक ऐसे ही परिणाम अजा-जजा एक्ट के कारण भी आ सकते हैं। भाजपा अब चारों ओर उठने वाली प्रतिक्रिया से घबरा गई है। हर एक एजेन्सी एक ही परिणाम की ओर इंगित कर रही है। भाजपा के लिए गरीबी में आटा गीला हो गया। न कुछ आश्वासन दे सकती, न ही किए को अनकिया कर सकती। तब बीच का रास्ता निकाला गया।

भाजपा के पास एक धारदार हथियार है, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ। संघ प्रमुख मोहन भागवत अश्वमेध यज्ञ की यात्रा पर निकले हुए हैं। जिस तरह की लचीली भाषा का वे प्रयोग कर रहे हैं, वह कितनी प्रभावकारी हो पाएगी, यह तो समय ही तय करेगा। मूल में तो भाजपा संघ की एक शाखा है। आज भागवत जी के बयानों से लगता कुछ और ही है। यहां तक कि संघ की हिन्दुत्व की परिभाषा, संविधान का सान्निध्य, पूरे गांव का एक कुआं, एक मन्दिर की बात, एक श्मशान की बात कह तो रहे हैं, किन्तु आरक्षण की कड़वाहट में कोई कैसे सुनेगा, वे यह भी जानते हैं। वे कह चुके हैं कि वे राम मन्दिर निर्माण के पूर्णत: हिमायती हैं और आरक्षण के भी। दोनों बातें साथ बैठती दिखाई नहीं देती।

आज देश-विदेश में लिंचिंग को लेकर भाजपा सरकारों की खूब किरकिरी हुई है। गौ-हत्या के नाम पर हत्याओं के लिए पहले ही बदनाम रही है। ऐसी स्थिति में संघ प्रमुख का यह बयान कि ‘जिस दिन हम कहेंगे कि हमें मुसलमान नहीं चाहिए, उस दिन हिन्दुत्व नहीं रहेगा’ कितना कारगर होगा? पिछले वर्षों में संघ की हिन्दुत्व की परिभाषा ने भी करवटें बदली हैं। आज जब भाजपा मुस्लिम विरोधी वातावरण बनाने के लिए बदनाम है, तब मोहन भागवत का बयान उन्हें शान्त करता दिखाई नहीं पड़ता। आग लगने पर कुआं खोदा जा रहा है। इस बयान को ‘अनेकता में एकता’ का प्रयास तो नहीं कह सकते। यह भी एक कटु सत्य है कि संघ का ही एक घटक मुसलमानों के सख्त खिलाफ है।

हम एक ओर कह रहे हैं कि सभी देशवासी हिन्दू हैं और दूसरी तरफ भागवत का आह्वान है कि ‘लालच में जो दूर चले गए, उन्हें वापिस लाओ।’ तब संविधान के अनुसार सभी धर्मों की रक्षा की बात कैसे मानी जाए? संविधान धर्मनिरपेक्ष है। आज बहाना हिन्दू-मुस्लिम के बीच संतुलन का है। हम ही वोटों के लिए देश के टुकड़े करते हैं, देश में आग लगाते हैं। सब मौन रहकर देखते हैं। यही हाल कुछ ही वर्षों में अजा-जजा और सवर्णों के मध्य होने वाला है, जिसके आज भागवत पक्षधर हैं। कल संतुलन संघ भी नहीं कर पाएगा। भाजपा की जमीन आज ही खिसकती जान पड़ रही है, कल क्या होगा? न एक कुआं काम आएगा, न एक मन्दिर। अल्पसंख्यकों के पास हुनर है, बच गए। इनके पास तो वह भी नहीं है।

संघ विश्व का बृहद्तम संगठन है। इसे राष्ट्रीय मुद्दों पर अपनी नीति इतनी लचीली नहीं बना लेनी चाहिए, मानो राजनीति के निर्णयों को प्रतिष्ठित करने का प्रयास कर रही हो। संघ को तो निर्णय लेने से पूर्व सरकार को भावी आशंकाओं से अवगत कराना चाहिए। निर्णय होने पर उनका समर्थन भी करना पड़े और नई परिस्थितियों का भय भी बना रहे, यह देश के हित में नहीं होगा, न ही संघ के हित में होगा। भाजपा की हां में हां मिलाने के स्थान पर एक पितृ-संस्था की तरह आदेशात्मक रवैया बना रहना चाहिए। इसके बिना देश को पितृभूमि और मातृभूमि का पाठ पढ़ाना काम नहीं आएगा।

हिन्दू धर्म नहीं, जीवन पद्धति है। देश का हर नागरिक हिन्दू है। यह सब बातें कहने मात्र की नहीं हैं। जब किसी भी समुदाय पर अन्याय होता है, तब सहायता के लिए संघ को ही अगली कतार में दिखाई देना चाहिए। कथनी और करणी तब शिरोधार्य होगी।

अगस्त 17, 2018

कृष्ण गए राजनीति से

वाजपेयी जी नहीं रहे। जाना तो था। राजनीति में शुचिता की मशाल थे, बुझ गई। अब नहीं लौटेंगे वे दिन। अब कोई कवि हृदय नहीं आएगा राजनीति में, जो क्रान्तदर्शी भी हो और संवेदनशील भी। स्पष्टवादी भी हो, कभी पद से बंधकर जीया नहीं हो, सदा साधारण व्यक्ति बनकर रहा हो। आज देखो, हर नेता को सुरक्षा चाहिए। सुविधा चाहिए। देश के लिए, देशवासियों के लिए कौन अब चिंतित होगा।

वाजपेयी जी ने संबंधों में दिल को ही सर्वोपरि रखा। दिमाग को बीच में नहीं आने दिया। किसी विवाद में नहीं फंसे। आत्मीयता के कारण बड़े-बड़े नेता उनके आगे बौने लगते थे। उनके व्यक्तिगत संबंध ही उनकी सफलता की कहानी बने। कवि होने के कारण विशाल हृदय रहे। दलगत राजनीति से सदा ऊपर रहे। तभी तो विपक्ष में रहकर भी देश का संयुक्त राष्ट्र में प्रतिनिधित्व कर गए। आज संभव है क्या? आज तो देश को विपक्ष मुक्त करने की मुहिम चालू है।

मेरे परिवार का सौभाग्य है कि तीन पीढिय़ों को उनका सानिध्य प्राप्त हुआ। पिताजी के तो अपने रिश्ते थे ही, मैं तो उनके आगे चिडिय़ा के बच्चे जैसा पत्रकार था। मुझे जो सम्मान प्राप्त हुआ उसे व्यवहार का श्रेष्ठ प्रमाण कह सकता हूं। मैं कभी भी उनके घर गया, तुरन्त बुलाया। जितनी देर चाहा बैठने दिया। अच्छी-बुरी हर तरह की चर्चा का अवसर दिया। उनके साथ विदेश दौरों का, यात्रा में अकेले चर्चा करने का भी कई बार अवसर मिला।

स्व. भैरोंसिंह जी द्वारा प्राप्त सम्मान से तो मैं अभिभूत रहा ही हूं। उनके निजी कारण भी रहे। किन्तु वाजपेयी जी ने व्यंग्य और गांभीर्य के बीच संतुलन बनाने का जो मार्ग दिया, वह अद्भुत था। वे स्वयं हिन्दूवादी थे, किन्तु सर्वधर्म समभाव को भी आदर्श की तरह स्थापित कर गए। कश्मीर के मुद्दे पर मानवीयता और कश्मीरीयत को कभी छोटा नहीं पडऩे दिया।

हां, भाजपा नेताओं के बड़बोलेपन से वे प्रसन्न नहीं थे। एक से अधिक बार कहा होगा कि ‘यह हमारा दुर्भाग्य है।’ बड़े लोग समय से पहले पैदा होते हैं, चले जाते हैं और जब समय आता है तब बहुत याद आते हैं। वे ऐसे कूटनीतिज्ञ थे, जिनकी बात का हर पक्ष विश्वास भी करता था और लोहा भी मानता था। वे लोकतंत्र के कुरुक्षेत्र को खाली कर गए। वाजपेयी जी राजनीति की एक ऐसी गीता लिख गए, जिसको पढऩे वाला अर्जुन राजनीति में कब जन्म लेगा, समय तय करेगा।

जून 26, 2018

रुपए किलो कैंसर

पूरे देश को सोने की उपज देने वाले पंजाब और हरियाणा कैंसर से सहम उठे। वहां से रोज कैंसर ट्रेन बीकानेर आ रही है। सोने की उपज पंजाब से श्रीगंगानगर आई, हनुमानगढ़ आई और यहां से भी कैंसर ट्रेन निकल पड़ी। मारवाड़ से अनाज मंगवा रहे हैं, वहां के लोग। उनको शायद पता ही नहीं कि अधमरी जनता को पूरी तरह मारने का पुख्ता इंतजाम, अर्थात् सामूहिक आत्महत्या का प्रारूप राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात जैसे बड़े-बड़े राज्यों ने कर डाला है। आने वाले समय में कैंसर अस्पतालों और कैंसर ट्रेनों का जाल बिछा होगा।

नेता किसानों को वोट बैंक मानते हैं। कृषि में आयकर नहीं लगता। किसानों को सब्सिडी देकर असली समस्याओं को किनारे कर दिया। सब्सिडी रासायनिक खाद पर दी गई। जैविक खाद को पिछड़ा मान लिया गया। उधर पशुओं में दुग्ध वृद्धि के लिए ऑक्सीटोसिन के इंजेक्शन दे रहे हैं। पशुओं को जो चारा खिलाया जा रहा है, वह भी तो कीटनाशकयुक्त ही है। उसी का परिणाम तो अनाज को कैंसर का पोषक बना रहा है। आज का यक्ष प्रश्न है कि क्या अधिक महत्वपूर्ण है- जीवन या धन (अधिक दूध अथवा पैदावार)? आज तो किसी को मरने की चिंता ही नहीं है। मानो जीवन बाजार में मिलता होगा।

पाठकों को याद होगा कि राजस्थान पत्रिका ने सन् २००४ में एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी कि किस प्रकार आधुनिक कृषि क्षेत्र (श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़) में सब्जी, फल, अनाज, मिट्टी से लेकर माताओं के दूध तक में कीटनाशकों के अवशेष पाए गए हैं। चुनावी रणनीति ने गुजरात, मध्यप्रदेश, राजस्थान जैसे राज्यों में ‘रुपए किलो कैंसर’ बांटना शुरू कर दिया था। घर-घर तक कैंसर का प्रसार किया जा रहा है। सरकारें ही इस कैंसरयुक्त अनाज को खरीद कर लोगों में बंटवा रही हैं। वरना, कोई नहीं खरीदने वाला। स्तन कैंसर ने तो नारी सशक्तीकरण के नारे की धज्जियां उड़ा दी। अकेले भारत में ही प्रतिदिन ५२७ नए मामले स्तन कैंसर के आते हैं और नित्य ११० की मृत्युदर। भारत में कीटनाशक का वार्षिक उत्पादन ८५,००० टन है। लगता है हमने सामूहिक, स्वैच्छिक मृत्यु का मार्ग पकडऩा ही श्रेष्ठ समझ लिया है।

हम प्रकृति से दूर हो गए। खान-पान भूगोल से कट गया। डिब्बा संस्कृति हमारे विकास का नेतृत्व करने लगी है। इनका एकमात्र कारण है शरीर के प्रति बढ़ता मोह और उसके लिए धन और भौतिक सुखों का बढ़ता महत्व। क्या कोई जादू या वरदान हमें इस कैंसर से मुक्त करा सकता है? विज्ञान कहता है-‘कलियुग के बाद तो प्रलय ही है। मेरे सहयोग के बिना नहीं आ सकती। हां, विकल्प दे सकता हूं। चाहो तो जन्म से पहले ही कैंसर की गोद में बैठ जाओ, (जननी सहित), अथवा पैदा होने के बाद उन कीटनाशकों को सीधा ही भोजन के साथ गले के नीचे उतार लेना। भोजन के जरिए कीटनाशक सम्पूर्ण मानव जाति के पेट में जाते रहेंगे।’ एक अनुमान के अनुसार विश्व में सन् २०३० तक प्रतिवर्ष दो करोड़, बीस लाख नए कैंसर रोगी बढ़ते ही जाएंगे।

प्रश्न यह है कि सरकार की इस योजनाबद्ध ‘सरकारी मृत्यु योजना’ से छुटकारा कैसे मिले? किसी भी प्रदेश का स्वास्थ्य विभाग स्वस्थ जीवन के लिए योजना नहीं बनाता। खाद्य निरीक्षक इस तथ्य से मस्त हैं कि वे हर खाने की चीज में सफलतापूर्वक मिलावट करवा लेते हैं। पार्कों की जमीनें नेता-अफसर ही नोंच लेते हैं। किसी को स्वास्थ्य लाभ न मिल जाए। शहर में डेयरी नहीं रहेंगी, सब्जियां नहीं उगाई जाएंगी। शहर की फैलावट के साथ दूर से दूर ताजगी का प्रश्न। सप्ताह भर पुराना सड़ा हुआ, कीटनाशकयुक्त दूध मेरी भावी पीढ़ी के भाग्य का निर्माण करेगा। सरकार कैंसर बेचती है। फिर इलाज जानलेवा। यानी सरकार ही मौत की बड़ी सौदागर। हमारी पुरातन जीवन शैली प्राकृतिक, बिना खर्च की, जीवन के प्रति आस्था प्रधान थी। आज विज्ञान के साथ प्रलय की ओर सामूहिक कूच कर रहे हैं देशवासी।

क्या हम विवेक से काम लेने को तैयार हैं। तब जीवन से प्यार करना सीखना पड़ेगा। धन के बजाय सुख को प्राथमिकता देनी होगी। खेती से रासायनिक खाद, कीटनाशक, ऑक्सीटोसिन आदि को बाहर करना पड़ेगा। इनकी छाया भी न पड़े खाद्य सामग्री पर। मौत का सिलसिला ठहर जाएगा। न कर्ज बढ़ेगा, न ही बीमारी। इस कारण तो आत्म-हत्या नहीं करनी पड़ेगी। हां, कम खाना पड़ सकता है। आधा देश (बीपीएल) तो आज भी कम ही खाता है। नई पीढ़ी को जीवनदान मिल जाएगा। आपकी आने वाली सात पीढिय़ां सुखी रहेंगी। पूरा देश आपको आशीर्वाद देगा। नकली दूध, नाले की सब्जियों से मुक्ति मिलेगी और कैंसर को देश निकाला देने की तैयारियां शुरू हो जाएंगी। मरना तो सबको ही है, किन्तु स्वाभिमान से क्यों नहीं! कैंसर की लाचारी से क्यों?

जून 23, 2018

बदलता लोकतंत्र

पिछले सत्तर वर्षों की राजनीति में जनता ने सभी दलों को फेल कर दिया। ये अलग बात है कि जो दल सत्ता में रहता है, वह ज्यादा गुर्राता है। पिछले गुजरात और कर्नाटक के विधानसभा चुनावों, लगभग सभी राज्यों में हुए उपचुनावों में, जम्मू और कश्मीर में जो कुछ परिणाम सामने आए वे लोकतंत्र का मुंह चिढ़ाने वाले अधिक थे। दल सत्ता हासिल करने के लिए शत्रुओं की तरह लड़ाई कर रहे थे। सामन्ती युग के राजाओं की तरह एक-दूसरे को मिटाने पर तुले हुए थे। कोई अपनी बात नहीं करता, सामने वाले को कोसता ज्यादा है, मानो वह अस्तित्व में ही क्यों है। मर क्यों नहीं जाता। यह हमारे वर्तमान लोकतंत्र का जानलेवा स्वरूप है। जीतने के बाद किसी भी दल को न जनता याद रहती है, न ही चुनावी वादे। देशभक्ति और राष्ट्रीय संप्रभुता की बातें इतिहास में दब गई। देश में आज चारों ओर जो हो रहा है, किसको दिखाई नहीं दे रहा।

राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और हरियाणा के विधानसभा चुनाव सिर पर हैं। नए गठबंधन, नए समीकरण एक ओर चर्चा में आ रहे हैं, वहीं “कांग्रेस मुक्त भारत” अभियान दूसरी ओर हिलोरे ले रहा है। भाजपा सत्ता में है, निश्चिंत है। उसे कहीं कोई खतरा दिखाई नहीं पड़ रहा। कांग्रेस पूरा दम लगाकर भी गुजरात और कर्नाटक में जीत दर्ज नहीं करा पाई। ठीक यही परिणाम आगे भी आने वाले हैं। सीटों का अनुपात भी लगभग वही रहेगा। कर्नाटक में तो कांग्रेस को तिनके का सहारा मिल गया। राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में तो ऐसा विकल्प मिलने वाला नहीं है। सभी तालाब सूखे पड़े हैं। अधिकांश दिग्गज पिछले चार सालों में धराशायी हो चुके हैं। फिर भी कांग्रेस को लग अवश्य रहा है कि सत्ता विरोधी हवा उन्हें सहायता कर देगी। कुछ नेता टर्र-टर्र करते सुनाई भी देने लगे हैं।

इन राज्यों में चुनाव (लड़ाई नहीं) चूंकि दो दलों के बीच ही होना है, और उनमें से एक दल सत्ता में हैं। अत: सारी तैयारियां केवल कांग्रेस को ही करनी है। यहां नेता अधिक और कार्यकर्ता कम हैं। काम करो, न करो, उनको तो कुर्सी दिखाई पड़ रही है। हर बार वे गलतफहमी के शिकार हो जाते हैं। सत्ता छूट जाती है। गुजरात चुनाव पूर्व उनको गठबंधन का ऑफर मिला था, नहीं स्वीकार किया। कर्नाटक में छोटे दल के आगे झुकना पड़ा। अब फिर दिल्ली में नए ऑफर को बड़ी अकड़ के साथ नकारा जा रहा है। जहां उसके पैरों तले जमीन ही नहीं है। दूसरी और कांग्रेस ने बसपा से गठबंधन की राह खोली है। तीनों राज्यों की ५२० सीटों में से बसपा को १८ सीटें देना चाहते हैं। बसपा ३० सीटों की मांग कर रही है।

प्रश्न यह है कि गठबंधन का कारण और लक्ष्य ही स्पष्ट नहीं हो रहे। क्या बसपा सभी सीटों पर चुनाव जीतकर भी कांग्रेस को बहुमत में लाने लायक मानती है। पिछले चुनावों में उसने छह सीटें जीती थीं राजस्थान में। इस बार यह भी खटाई में पड़ गई। इस गठबंधन का कोई सींग-पूछ ही समझ में नहीं आता। यही कांग्रेस की राष्ट्रीय समझ का उदाहरण भी है। कांग्रेस के नेता वस्तुस्थिति से बहुत दूर हैं। न जनमानस को जान पा रहे हैं, न ही कुछ नया करने की तैयारी है। देश को सशक्त विपक्ष की जरूरत है। देश के समक्ष भी कांग्रेस के अलावा विकल्प नहीं है।

देश न दलित है, न समझ से गरीब। आज के युवा को डण्डे से नहीं हांक सकते। नोटबंदी, बेरोजगारी, पेट्रोल के दाम, महंगाई ने भले ही उसे मार रखा है, किन्तु जो कांग्रेस अपनी स्थिति नहीं संभाल सकती, उस पर वे भरोसा कैसे कर लेंगे? आवश्यकता है कि समय रहते कांग्रेस स्वयं के बजाय देश की चिंता दिखाए। अहंकार छोडक़र कुछ कर गुजरने का विश्वास दिलाए, देश को नेतृत्व देने की क्षमता पर मंथन करे। यों ही कोई प्रधानमंत्री नहीं बन जाएगा। अभी तो एक भी प्रदेश आता हुआ दिखाई नहीं पड़ता।

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