Gulabkothari's Blog

अप्रैल 16, 2014

जैन एकता… (4)

महावीर का अनेकान्त एक अनूठी देन है। इसका अर्थ है दिमाग में खुलापन, सबको स्वीकार करने का भाव, विश्वमैत्री का भाव। यही अहिंसा का मार्ग भी है। दूसरे की स्थिति को समझकर कार्य करना ताकि किसी का अहित न हो। हो सके तो दूसरे के हित या विकास में सहायक बनें। यही अहंकार मुक्ति का मार्ग है। इसी से क्रोध, मान, माया, लोभ बढ़ते हैं। इन्हीं के शमन के लिए चार महाव्रत क्रमश: अहिंसा, ब्रह्मचर्य, सत्य और अचौर्य की प्रतिष्ठा हुई। वेद, बौद्ध तथा जैन मतों में इन चारों का महत्व बराबर है। अपरिग्रह समय के साथ बदलने वाला व्रत है। बौद्ध इसे नशा मुक्ति कहते हैं। वेद में इसका स्थान दान ने ले रखा है।

अहंकार मुक्ति या अनेकान्त दृष्टि में व्यक्ति स्वयं को केन्द्र में नहीं रखता। गुठली की तरह जड़ बनकर जमीन में रहता है। उसे चिन्ता नहीं कि उसके फल कौन खाएगा। वह अपने भौतिक अस्तिžव के लिए जीता ही नहीं है। जिन्दगी इतनी जटिल है कि जब भी हम उसे एक कोने से पकड़कर आग्रह करने लगते हैं, तभी हमारा आग्रह झूठा हो जाता है, इसी आग्रह को एकान्त कहा है। जीवन के एक पहलू को पकड़कर उसे पूरे जीवन होने का दावा करे, वह एकान्तवादी है। महावीर कहते हैं कि सब कोने अगर देख लोगे तो यह दावा छूट जाएगा क्योंकि इसमें ऎसे कोने भी मिलेंगे जो विपरीत हैं। और वे भी इतने ही सही हैं जितना एक कोना सही है और तब यह दावा नहीं रहेगा।

अनेकान्त का अर्थ है जीवन के सब पहलुओं की एक साथ स्वीकृति, विरोधी दृष्टि ही नहीं है, सारे विचार जहां एक-दूसरे के परिपूरक हैं। हमारी सीमित दृष्टि के कारण विरोधी दिखाई पड़ते हैं।

इसी बात को हम दूसरी तरह देखते हैं। महावीर ने ईश्वर की सत्ता को नकारा। क्योंकि व्यक्ति इसमें परतंत्र हो जाता है। जीवन की नियंता ईश्वर हो जाता है। वेद भी “अहं ब्रह्मास्मि” का उद्घोष करता है। महावीर भी प्रत्येक व्यक्ति की आत्मा को परमात्म मानते हैं। वह सब कुछ करने में समर्थ एवं स्वतंत्र है। गीता में कृष्ण भी कहते हैं-“ममैवांशो जीवलोके…” जब मैं स्वयं ईश्वर का अंश हूं तो मेरा कार्य स्वयं अपने स्वरूप को समझना है। मैं यहां ओशो के उद्धृत करना चाहता हूं-“महावीर के परमात्मा की धारणा अस्तिžव की गहराइयों से निकलती है, बाहर से नहीं आती। इसी अस्तिžव में जो सार भूत विकसित होते-होते अन्तिम क्षणों तक विकास को उपलब्ध हो जाता है, वही परमात्मा है।” आज की पीढ़ी बुद्धिमान है अपने भविष्य के प्रति चिंतनशील भी है और किसी भी बात को बिना वैज्ञानिक विश्लेषण के स्वीकार नहीं करती। हम केवल अपने शास्त्रों के सहारे उसके मन में विश्वास पैदा नहीं कर पा रहे, यह एक सच्चाई है। न हम दूसरे धर्मो के हवाले से उसके तर्को का समाधान दे पा रहे हैं। उसके लिए आवश्यक है कि हमारे महाव्रत सकारात्मक तथा जीवनोपयोगी रूप में उसके सामने रखे जाएं। उसकी आज की आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाले दिखाई पड़े, ताकि धर्म का जो निषेधात्मक ढांचा आज खड़ा है, जो आज बच्चों को हमारी ओर आने में बाधक बनता है, इस ढांचे को देशकाल के अनुरूप बदला जाए। बच्चों की भाषा के नए साहित्य की सर्जना करनी होगी। छोटी उम्र से उनको संस्कारवान बनाने के प्रयास करने पडेंगे और इसके लिए हमें माताओं को भी इस दृष्टि से शिक्षित करना पड़ेगा । यह कार्य हमारे साधु-संत बहुत प्रभावी ढंग से कर सकते हैं। मीडिया भी इसमें अपनी पूर्ण भागीदारी निभा सकता है। वरना जिस तेजी से जैन धर्म संकुचित होता जा रहा है, विश्व की धार्मिक चर्चाओं से बाहर होता जा रहा है, तब इसके भविष्य के प्रति सदा ही आशंका बनी रहेगी। और इसके लिए आवश्यकता हो तो साधु-संतों के विदेश गमन का मार्ग खोलना होगा ताकि वे अपने सिद्धान्त पक्ष को वैश्विक स्तर पर रख सकें। विभिन्न धार्मिक आचार्यो के प्रश्नों का समाधान कर सकें। तब जाकर हम महावीर के सिद्धान्तों को विश्व के पटल पर प्रतिष्ठित कर पाएंगे। तब हमारी पीढ़ी महावीर को भगवान मानेगी। उनके आगे सिर झुकाकर गर्व कर सकेगी।

परमात्मा को पाने का, आत्म-साक्षात्कार करने का जो उपक्रम है, वही अपरिग्रह का मार्ग है। जो अनावश्यक है, उसे छोड़ते जाओ। शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा के लिए जो व्यर्थ है, छोड़ दो। अन्नमय, प्राणमय, मनोमय कोषों का परिष्कार करते जाएं। ये मन-वचन-काया के ही नाम हैं। इन तीनों संस्थाओं से करना, कराना और अनुमोदन करना बधकारक कहा है। इसी प्रकार जो हमारे पास नहीं है उसको पाने की लालसा भी हमारे मन में रहती है। पकड़ने की इच्छा हमारे असुरक्षा के भाव के कारण रहती है। जब चेतना को पता लग जाए कि चेतना के स्तर पर कोई असुरक्षा है ही नहीं, न भय, न पीड़ा, तब क्यों पकड़ेगा? कर्म के साथ यह पकड़ने का भाव ही बन्ध का कारण होता है। इस भाव को ही अंहकार कहा है। छोड़ने को त्याग नहीं कहते, छोड़ने के बोध को त्याग कहते हैं। जब हम कुछ छोड़ते हैं तब उसके पीछे छोड़ने की पकड़ रह जाती है। “मैंने यह छोड़ दिया।” इसे भी छोड़ देना है।

तवार्थ सूत्र में परिग्रह को मूच्र्छा कहा गया है। परिग्रह का अर्थ है वस्तु के प्रति ममत्व या आसक्ति का भाव रखना। मूच्र्छा का यह भाव केवल जड़-चेतन वस्तुओं तक ही सीमित नहीं रहता किन्तु अपने विचारों, भावनाओं और सिद्धान्तों के प्रति भी इतना सघन होता है कि अपने से भिन्न विचारों या सिद्धान्तों को सुनने के लिए तैयार नहीं होता। इसी कारण तो विश्व भी पूंजीवाद और साम्यवाद के समूहों में बंट गया। जब हम मूच्र्छा की व्याख्या करते हैं तो उसके व्यापक अर्थ में धन अर्जित करना, उसकी रक्षा करना, पशु, सम्पत्ति आदि तो इसकी परिधि में आते ही हैं लेकिन वासनाओं और कषायों को मन में पोषित करना भी एक तरह से भावनात्मक मूच्र्छा है। मूच्र्छा का अभाव ही अपरिग्रह है। कामना मुक्त होना ही मोक्ष है।

आत्मा के आन्तरिक गुण जैसे “ज्ञान एवं अन्तर्दृष्टि” परिग्रह भाव से मुक्त हैं। अपरिग्रह समत्व है, परिग्रह भोग की संस्कृति है। भगवान महावीर ने कहा था-“प्रमत्त मनुष्य इस लोक में अथवा परलोक में धन से त्राण नहीं पाता।” अंधेरी गुफा में जिसका दीपक बुझ गया हो, उसकी भांति अनन्त मोह वाला प्राणी पार ले जाने वाले मार्ग को देखकर भी नहीं देखता। जो मनुष्य कुमति को स्वीकार कर पापकारी प्रवृत्तियों से धन का उपार्जन करता है, ऎसे लोग धन को छोड़कर मौत के मंुह में जाने को तैयार रहते हैं। वे कर्म से बधे हुए मरकर नरक में जाते हैं। अज्ञानी मनुष्य ऎश्वर्यपूर्ण जीवन जीने की कामना करता है। वह अपने द्वारा कृत कामना की व्यथा से मूढ़ होकर विपर्याय को प्राप्त होता है। दु:ख को प्राप्त करता है।

महावीर के अनुसार हिंसा एवं परिग्रह को समझे बिना व्यक्ति धर्म को नहीं जान सकता। न संयम का विकास कर सकता है। वर्तमान परिस्थितियों में अपरिग्रह महत्वपूर्ण है। अहिसा तो इसी से निकलता है। विलासितापूर्ण जीवन तथा विकास के नाम पर होने वाले विनाश से बचने का एकमात्र उपाय है अपरिग्रह मूलक जीवन शैली। इसी से वहनीय विकास (सस्टेनेबल लिविंग) की संस्कृति का वैश्विक अभियान प्रारंभ हो सकेगा।

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अप्रैल 15, 2014

जैन एकता… (3)

हम खाना खाते हैं, तब क्या हमारा ध्यान खाने में रहता है? क्या हम पांचों ज्ञानेन्द्रियों का उपयोग करते हैं खाने में? क्या हमें याद रहता है कि-जैसा खावे अन्न, वैसा होवे मन! न जाने कितने विचार चलते रहते हैं मन में, कि खाने के बाद क्या-क्या करना है। खाना किसने खाया, किसने बनाया, क्या कैसा बना, सब गौण हो गया। क्या यही स्थिति सामायिक-प्रतिक्रमण में नहीं रहती? हम वर्तमान के बजाए अतीत या अनागत में जीते हैं। ध्यान तो वर्तमान में जीने का नाम है। अतीत की स्मृतियां तथा अनागत की कल्पनाएं हमारे वर्तमान को ध्वस्त कर देती है। तब हम पांचों महाव्रतों की सूक्ष्मता को कैसे समझ सकेंगे। जब महावीर ने कही थी, तब कैसा युग था। आज वैसा क्या बचा है? संसार की भौगोलिक तथा भौतिकवादी तस्वीरें बदल चुकी हैं। हां, आत्मा का भाग, सृष्टि के सिद्धान्त वही हैं। आगे भी नहीं बदलने वाले। जरूरत इस बात की है कि हम महावीर की यात्रा से उस अन्तरात्मा के स्वरूप का विवेचन 21 वीं सदी की भाषा में कर सकें। उसकी सार्थकता मोक्ष मार्ग तथा लोक कल्याण में सहायक होने पर होगी। कर्मो की निर्जरा तथा नए कर्म बन्धनों से मुक्ति कैसे हो, यह बताना पड़ेगा।

जीवन में महावीर नि:श्रेयस तथा अभ्युदय के साथ-साथ वर्तमान जीवन की सफलता में भी सहयोग कर सके। साथ ही सिद्धान्त को सरल व्यवहार में ढालना पड़ेगा। वरन् व्यक्ति उनकी पालना भी नहीं कर पाएगा और झूठ भी बोलता रहेगा। चरित्र में यदि विरोधाभास हुआ तो अन्य समुदाय के लोग हम पर हंस भी सकते हैं। हमारा व्यवहार रूढ़ी बनकर न रह जाए। मेरी ही नई पीढ़ी मेरी ही बात नहीं मानेगी। उदाहरण के तौर पर साधु-संत कहते हैं कि गृहस्थ स्वयं के लिए खाना बनाएं और उसी में से हमको भी दें। ताकि हम हिंसा के निमित्त नहीं बनें। मेरा अनुभव है कि प्रत्येक बड़े चातुर्मास में सैंकड़ों चूल्हे केवल साधुओं के निमित्त ही यात्री जलाते हैं। गोचरी के लिए लगभग चालीस से अधिक निषेध लागू होते हैं। साधु-साघ्वियां आज फरमाइश करके जाते हैं कि अगली बार वे क्या ले जाना चाहेंगे।

महावीर तथा बुद्ध के काल में उपनिषदों की ज्ञान धारा प्रमुख थी, चरित्र गौण था। महावीर चरित्र को “अति” तक ले गए। शरीर शुद्धि के लिए तप अनिवार्य कर दिया। अन्न के साथ ही मन की शुद्धि भी जुड़ी ही है। उपनिषद् में आकाश को छोड़कर शेष चार महाभूतों को देवता माना जाता था। महावीर ने इनमें जीव तत्व सिद्ध कर दिया। कह दिया कि किसी भी “काय” की हिंसा नहीं करनी चाहिए। व्यक्ति कभी भी किसी तत्व रूप में पैदा हो सकता है। इसी प्रकार उपनिष्द् आत्मा को पवित्र ही मानते हैं। महावीर ने इसको नकार दिया। उन्होंने कहा कि यदि शुद्ध होती तो जन्म ही क्यों लेती। आत्मा को अच्छा-बुरा कर्म बांधता है। फल की इच्छा इसका कारण है। अत: आत्मा में बस स्थित रहना है। दूसरे के स्थान पर खड़े होकर सोचना ही अनेकान्त है।

आज सम्यक् दृष्टि की आवश्यकता है। तभी हम अहिंसा, अनेकान्त, अपरिग्रह जैसे आधार भूत व्रतों को यथार्थ में समझ सकेंगे। भोगोपभोग परिमाण व्रत की सीमा बांध सकेंगे। इसके अभाव में हमारी शक्ति भी क्षीण होगी तथा पराधीनता बढ़ेगी। मन तथा शरीर कमजोर होते चले जाएंगे। बल तो शान्ति की साधना से मिलता है। आत्मा तो शाश्वत है। तप के द्वारा नश्वर का त्याग करना होता है। यही से अपरिग्रह शुरू हो जाता है। हमारे दु:ख का कारण भी हमारी दु:खों से भागने की मानसिकता ही है। हम सदा सुखों के बारे में एक अभावग्रस्त मानसिकता रखते हैं। जड़ पदार्थो में सुख कहां मिल सकता है। शरीर के बाहर सुख कैसे प्राप्त कैसे होगा। पदार्थो के पीछे भागना बन्द हो तो जन्म-जन्म का भागना भी बंद हो जाएगा। यही मोक्ष है।

क्रमश:

अप्रैल 14, 2014

जैन एकता… (2)

महावीर जयन्ती के अवसर पर आपसे प्रश्न करना चाहता हूं कि भगवान महावीर का दर्शन आपके दैनिक जीवन में कितना जुड़ा है। जितने भी बुजुर्ग श्रावक-श्राविकाएं यहां विराजमान हैं, क्या वे अपनी तीसरी पीढ़ी को महावीर से जोड़ पाए। एक भी “हां” कहने की स्थिति में नहीं है। यही जैन धर्म का भविष्य है। सुनने में जरूर कड़वा लगता होगा। अब दूसरा प्रश्न यह है कि क्या जो कुछ हो रहा है, उसे होने देना है अथवा हमें कुछ करना चाहिए। आज स्थिति यह हो रही है कि हम अपने धर्म के बारे में अजैनों को सच बता ही नहीं पा रहे। कहते कुछ हैं और करते कुछ और ही हैं।

आज अपने पोते को मैं किसी साधु के पास ले जाऊं तो उनके प्रश्नों की और निषेधों की सूची देखकर मैं हतप्रभ रह जाता हूं। प्रश्नों के उत्तर तो पोता नकारात्मक ही देगा। निषेधों की सूची सुनकर वह फिर कभी नहीं लौटेगा। वह तो टीवी, इण्टरनेट से जुड़ा है। उसका अपना एक वातावरण है। उसके अपने सपने हैं, जिनसे वह कभी समझौता करने वाला नहीं है। उसके मन में किसी समाज व्यवस्था का भार या भय भी नहीं है। उसे तो बस अपने कॅरियर की चिन्ता है। नौकरी मिली कि घर छूटा। तीन-चार पीढ़ी के बाद कौनसा समाज और कौनसा धर्म रहेगा?

एक रास्ता है। धर्म को, महावीर को शास्त्रों से बाहर निकालें। एक व्यवहार गत स्वरूप तैयार किया जाना चाहिए। सिद्धान्त जैन धर्म के हों तथा व्यवहार 21 वीं सदी का। आत्मा शाश्वत है तो सिद्धान्तों से जुड़ी रहे, व्यवहार देश, काल के अनुरूप बदलता रहे। जो सूर्यास्त से पूर्व घर ही नहीं पहुंचे अथवा जिसकी नौकरी ही रात्रि की हो, तो उसे रात्रि भोजन की छूट अधिकारिक रूप से मिल जाए। ऎसा न होने पर अजैन आपके रात्रि भोजन के नियम पर हंसेंगे। इसी तरह महाव्रतों की पालना के मानदण्ड नए सिरे से बनाए जाने चाहिए। भौतिकवाद के युग में परिग्रह की पुरानी परिभाषा नहीं ठहर सकती। महावीर के युग में न बिजली थी, न उपकरण। न उन्नत विज्ञान ही था, न नौकरी आधारित शिक्षा। जीवन में कहीं कृत्रिमता नहीं थी। विचारों से उद्दण्ड लोग तो उस युग में भी थे। महावीर ने कभी किसी के कार्य की प्रतिक्रिया नहीं की। उस युग में तो आचरण के अलावा था क्या? उन्होंने किसी को शत्रु नहीं माना। त्याग के अर्थ में अनावश्यक को कभी छुआ नहीं। प्रत्येक व्यक्ति में परमात्मा है। सब स्वतंत्र जीव हैं। अत: ईश्वर-नियन्ता की सत्ता को स्वीकार नहीं किया। पराधीनता का बोध कराती रहती है।

आज जैन धर्म का रूप जातिगत हो गया। एक तरह से सम्प्रदायवाद का पोषण कर रहे हैं। कट्टरवाद भी फैल रहा है। भौतिकवाद, क्षेत्रवाद, भाषा की भूमिका, सन्तों की शिक्षा, नई पीढ़ी का विश्वास आदि में एक तरह का बिखराव दिखाई पड़ रहा है। अन्य धर्मो में भी जैन धर्म के अनुयायियों के प्रति प्रश्न उठने लगे हैं। सम्यक् ज्ञान, सम्यक् दर्शन तो सब सिद्धान्त रूप में ज्यों के त्यों हैं। व्यवहार में तो सम्यक् चरित्र ही दिखाई पड़ता है। वहां हम शाम को प्रतिक्रमण करते हैं, दिन में अतिक्रमण करते हैं। बहुत अन्तर है कथनी और करनी में। इससे मेरी तीसरी पीढ़ी को ही विश्वास नहीं जैन धर्म में।

जैन धर्म भी बौद्ध धर्म के समकालीन था ही। बौद्ध धर्म का प्रसार लगातार बढ़ रहा है। जैन धर्म संकुचित होता जा रहा है। कट्टरवाद का उदाहरण तो इतना ही काफी है कि हर मंगलपाठ/मांगलीक के अन्त में हम कहते हैं-“ये चार शरणा, मंगल करना, और न शरणा कोय।” क्या अर्थ हुआ इसका? यही न कि जैन धर्म ही सर्वश्रेष्ठ है? क्या यही महावीर का अनेकान्त दर्शन है? तब हम अन्य धर्मो को कैसे स्वीकार करेंगे। उनके सिद्धान्तों पर क्यों कर शोध करने वाले! हम तो महावीर के ही अन्य अनुयायियों को नहीं मानते। एकमत भी नहीं हैं। अर्थात, हमने अपने दरवाजे बन्द कर लिए हैं। हमारा कोई साधु कुरान या बाइबिल पर बात नहीं करता। अब तो महावीर का विवेचन भी कम होता जा रहा है। प्राकृत या पाली से उद्धृत कर देते हैं। नई पीढ़ी को क्या लेना-देना। दूसरी बात यह भी है कि हमें उनके जीवन की सांसारिक घटनाओं के बजाय आत्मा से जुड़े विचारों को समझने की आवश्यकता अधिक है।

बाहरी जीवन इतिहास है। अंतर्जीवन दृष्टि है। भीतर चेतना है। उसकी गति, दिशा, रूपान्तरण, विकास आदि अधिक महत्वपूर्ण है। भीतर-बाहर का सीधा एक ही सम्बंध है कि भीतर चेतना है, बाहर स्वप्न है, नश्वर, परिवर्तनशील सृष्टि है। बाहर का जीवन सबका भिन्न-भिन्न, भीतर का सब एक जैसा। महावीर, जीसस, बुद्ध। इतिहास यानी तथ्य, दृश्य, संग्रह योग्य। भीतर की-पुराणों से-जो पढ़ेगा, उसके भीतर भी कुछ तो घटेगा। ऎसे उदाहरणों के अर्थ परोक्ष और गहरे होते हैं।

प्रत्यक्ष में तो धर्म भी बन्धन दिखाई देता है। एक आचार्य से पूछा कि संसार के बन्धनों में तथा संन्यास के बन्धनों में क्या भेद है। संन्यास के नियम तो ज्यादा कठोर है। कहने लगे यह तो धर्म का मार्ग है-मोक्ष मार्ग है। मेरा प्रश्न था कि मार्ग तो मंजिल आने पर छूट जाता है। आप तो अन्तिम श्वास भी इन्हीं बन्धनों में लेते हो। सम्प्रदाय तक नहीं छूटता। यहां तक कि मरने के बाद श्रावकों के लिए भी जैन श्मशान अलग होते हैं। शव भी मुक्त कहां हुए? तब आचार्य जी ने अपने सभी सन्तों को बुलाकर मेरे प्रश्न को दोहराया। कुछ ही दिनों बाद उन्होंने सार्वजनिक रूप से घोषणा कर दी कि अब मेरे किसी तरह का भी बन्धन नहीं रहेगा। वे नीचे सभा में आकर बैठ गए। हमें महावीर के सूत्रों को गहरे में समझना होगा। उद्धृत करने से काम नहीं चलेगा। हमारी आज यही मूल समस्या बन गई। आप किसी भी साधु-साध्वी से पूछो कि अहिंसा क्या है, तो वे तुरन्त हिंसा पर बोलना शुरू कर देंगे। पूछो अपरिग्रह क्या है, तो परिग्रह की चर्चा शुरू कर देंगे। प्रश्न उठता है कि क्या हमारे महाव्रत नकारात्मक शैली में घड़े गए हैं? हम सामायिक करते हैं, प्रतिक्रमण करते हैं, ध्यान करते हैं, तब क्या किसी ने हमको समय में रहना सिखाया है? निश्चेष्ट होने का मर्म हमारी शिक्षा का अंग रहा है। यही कारण है कि हम वर्तमान में जीना ही नहीं जानते। जो अब तक किया, उस कारण यहां तक पहुंचे। अब जो करेंगे, वही हमारा भविष्य होगा।

क्रमश:

अप्रैल 12, 2014

जैन एकता का प्रश्न… (1)

बातें तो हम राष्ट्रीय एकता और अखण्डता की करते हैं लेकिन देश कहीं से भी एक और अखण्ड दिखाई नहीं देता। कहीं जाति और धर्म के नाम पर, कहीं भाषा और क्षेत्र के नाम पर तो कहीं आरक्षित और गैर आरक्षित के नाम पर, हम हर तरफ से बिखरे और बंटे हुए दिखाई देते हैं। कैसे एक हों, हम कहां से और कैसे शुरूआत करें, सबके सामने यह प्रश्न बड़ा है। शुरूआत सबसे छोटी इकाई समाज से करनी होगी, फिर हम देश तक पहुंच पाएंगे। पहले एक-एक कर सारे समाज आपसी विवादों को खत्म करें, फिर समाजों को जोड़ें, इसी से राष्ट्रीय एकता की मंजिल तक पहुंच सकते हैं। राजस्थान पत्रिका समूह के प्रधान सम्पादक गुलाब कोठारी देश की एकता-अखण्डता से लेकर राष्ट्रीय राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक मुद्दों पर खुल कर लिखते रहे हैं। जैन समाज को अल्पसंख्यक दर्जे पर उनके विचारों को सुनने के बाद अनेक पत्र आए हैं जिनमें जैन समाज की एकता पर उनके विचार चाहे गए हैं। कल महावीर जयन्ती है। आज प्रस्तुत है जैन समाज की एकता पर यह आलेख। एकता के यही सूत्र सभी समाजों और राष्ट्र पर लागू होते हैं।

पत्र -1

महोदय,
केन्द्र सरकार की ओर से हाल ही में जैन समाज को अल्पसंख्यक का दर्जा दिया गया है। मैं पत्रिका के माध्यम से यह जानना चाहता हूं कि जैन एकता को लेकर आपके क्या विचार हैं। जैनों को अल्पसंख्यक का दर्जा दिए जाने को लेकर आप अपने विचार से अवगत कराएं।
भानमल जैन,
टोंक फाटक, जयपुर

पत्र -2

महोदय,
जैन समाज को देश में अल्पसंख्यक का दर्जा दिया गया है। समाज को इस नई पहचान के मामले में विचारों से अवगत कराने की कृपा करें। जैन समाज की एकता पर भी प्रकाश डालें।
धन्यवाद!
पीयूष जैन,
महेश नगर, जयपुर

पत्र -3

महोदय,
देश में जैन समाज को भी अल्पसंख्यक मान लिया गया है। मन में उथल-पुथल है कि केन्द्र सरकार का यह निर्णय कल्याणकारी है या भेद करने वाला। बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक वर्गीकरण ही है, इसलिए इन वर्गो में खाई की आशंका भी है। स्वयं की सोच को दिशा देना चाहता हूं इसलिए कृपया इस विषय पर अपने विचार बताएं।
धन्यवाद!
एस.सी. जैन,
बेंगलूरू

एकता हर हाल में शक्ति ही होती है। कहावत है कि बन्धी बुहारी लाख की, बिखर जाए तो खाक की।

जैन एकता की चर्चा बचपन से ही सुनता आया हूं। श्वेताम्बर-दिगम्बर की दीवार बहुत चौड़ी होती जा रही है। सम्मेद शिखर तीर्थ को लेकर कोर्ट में जो मुद्दा चला, जिस तरह राजनीति का सहारा लिया गया, उसमें जैनों के विखण्डन का सूत्रपात ही हुआ। जैनों का एक धड़ा बहुत गौरवान्वित हुआ था। पुराने-पुराने मन्दिरों में तनाव व्याप्त हो गया था। आसरों के लिए झगड़े होने लगे थे। आज भी आरक्षण के मुद्दे पर जैन समाज बंटा हुआ है। अल्पसंख्यक घोषित होने के बाद भी समाज तो दो धड़ों में बंटा हुआ ही है। एक धड़ा स्वयं संतुष्ट है, दूसरा अपमानित महसूस कर रहा है। इस दर्द को “विजयी” धड़ा महसूस भी नहीं करना चाहता। जिन मन्दिरों के नामों के साथ में दिगम्बर या श्वेताम्बर जुड़ा हुआ है, वहां उनके अपने पर्वो पर ही भीड़ लगती है। साधारण दिनों में कोई एक-दूसरे के मन्दिर में भी नहीं जाता। हमने तो यहां तक देखा है कि एक सम्प्रदाय के श्रावक अन्य सम्प्रदाय के सन्तों के दर्शन को भी नहीं जाते थे। प्रणाम तक नहीं करते थे।

आज तो जैन धर्म भी महावीर प्रधान होने के साथ व्यक्ति प्रधान भी होने लगा है। न तो आज सारे श्वेताम्बर एक आचार्य को मानने को तैयार, न ही सारे दिगम्बर एक आचार्य की निश्रा में चलने को राजी होने वाले। दर्जनों आचार्य, उनके अपने-अपने महावीर के दर्शन की व्याख्या। अपने-अपने पोस्टर, वीडियो और राजनेता। वर्ष भर में महावीर से ज्यादा उनकी जयन्तियां और समारोह। सबके साथ उनके सांसारिक स्वजन जुड़ने लगे। त्याग का स्थान ट्रस्टों ने ले लिया। सामाजिक, धार्मिक गतिविधियों में इनका सीधा दखल होने लगा है। विभिन्न बोलियों में धन इकटा करने का नजारा देखते ही बनता है। किसी ने यदि जैन एकता का अभियान चला दिया तो इन सब आचार्यो के समक्ष अस्तित्व का प्रश्न खड़ा हो जाएगा। मुंह से कुछ भी कह लें, मानेगा कोई नहीं। इनका अहंकार महावीर को भीतर प्रवेश ही नहीं करने देता। अत: अपने-अपने घेरे में जीते हैं।

आचार्य विनोबा भावे ने एक प्रयास किया था। जैन एकता के लिए। जिनेन्द्र वर्णी जी से आग्रह करके “समण सुत्त” लिखवाया गया। सभी मतों के जैनाचार्यो को पढ़ाया गया। उनकी सम्मति ली गई। सबने ग्रन्थ को स्वीकार किया। आज तक किसी ने उपयोग ही नहीं किया। यह स्वयं में एकता का श्रेष्ठ उदाहरण बन गया। आचार्य पद स्वयं में सत्ता सूचक भाव है। सिद्धों और अरिहन्तों को किसने देखा है। आचार्य ही शीर्ष पद है। ऎसा कई बार होता रहा है कि कोई सन्त विभिन्न कारणों से किसी सम्प्रदाय से छिटक कर नया सम्प्रदाय और नया आचार्य बना लेते हैं। अब तो आचार्य पद और भी चकाचौंध वाला होता जा रहा है। क्योंकि धर्म के साथ राजनेता और धन जुड़ता जा रहा है।

जैन समाज की नई पीढ़ी किधर जा रही है? क्या महावीर की वाणी का मर्म इसके मन में अंकित है। संस्कारों के प्रति इस पीढ़ी के मन में क्या अवधारणा है! टीवी, इण्टरनेट, मोबाइल फोन के सहारे अकेला जीना इनके स्वभाव का अंग बनता जा रहा है। कॅरियर की पकड़ जीवनशैली पर बहुत ही मजबूत है। भौतिकवाद का सपना भी इनको महत्वाकांक्षी बना रहा है। दृष्टिकोण उदारवादी होता जा रहा है। लेकिन खण्ड-खण्ड दिखते समाज की एकजुटता के लिए आवश्यक उदारता का नितान्त अभाव है। अकेला जीने वाला व्यक्ति कभी समूह में सहज नहीं रहेगा। माता-पिता के साथ आज भी साधु-सन्तों के या मन्दिर में नियमित नहीं जा रहा। शास्त्रों का नित्य पाठ नहीं कर रहा। उसके मन में धर्म के प्रति वैसा आकर्षण या प्रगाढ़ श्रद्धा नहीं है, जैसी पिछली पीढियों में थी। अत: आसानी से वह अजैनों जैसा व्यवहार भी कर लेता है। तब जैन एकता का झण्डा कौन उठाएगा? माता-पिता की स्वयं की कथनी और करनी में बहुत अन्तर है। पहली समस्या जैन होने की है। एकता बहुत आगे की बात है।

कभी अभियान चला करते थे कि हमें अपने नाम के आगे जैन लिखना चाहिए। गौत्र से महत्वपूर्ण स्थान जैन होने का मानते थे। आज “अल्प संख्यक” बनने के बाद हजारों लोग नाम के आगे जैन लिखना ही बन्द कर देंगे। वे अल्प संख्यक नहीं कहलवाना चाहते। न ही उनके साथ दिखाई पड़ना चाहते हैं। उनको देने वालों की श्रेणी में रहना उचित लगता है, लेने वाले नहीं बनना चाहते। नई शैली में जैन-अजैन एक जैसे होते जा रहे हैं। खान-पान, पहनावा, संस्कृति, मूल्य आदि एक जैसे होते जा रहे हैं। अभी तो पहला प्रश्न जो जड़ से जुड़ा है, वह यह है कि दो-तीन पीढियों के बाद समाज का समूह रूप रहेगा या लु# हो जाएगा। क्या धार्मिक संस्थाओं की प्रतिष्ठा आज की तरह बनी रहेगी? एकता की बात तो शुद्ध दिखावटी है। अन्तर्जातीय विवाह, अन्तर्जातीय खान-पान जैन परिवारों में प्रवेश कर चुका है। संस्कृति और धन में मित्रता हो चुकी है। मेल-बेमेल एक हो चुके हैं।

धर्म का कार्य मुक्त करना है। सम्प्रदाय बान्धने का कार्य करते हैं। टुकड़े करने का सारा श्रेय या तो राजनेताओं को जाता है, या फिर धर्माचार्यो को। आज धर्म के नाम पर भी राजनीति करने की बात कई आचार्य कर रहे हैं। चुनावों में जैनियों को टिकट कितने मिलने चाहिए, यह चर्चा का विषय धर्मसभाओं में सुनाई देने लगा। अब तो जो मिलेगा, अल्पसंख्यक कोटा में मिलेगा। अब तक तो जैन मुख्य धारा में थे।

एक समय था जब वीतरागता के भावों की प्रबलता के कारण एक गृहस्थ साधु बनता था। आज? साधुओं में वीतरागता का स्थान राग-द्वेष ने ले लिया। यही खण्डन के कारण बन गए। वीतरागता में झगड़ा-संघर्ष संभव नहीं है। तीर्थकरों को भी लोगों ने कम परेशान (उपसर्ग) नहीं किया था, किन्तु उन्होंने प्रतिक्रिया नहीं की। आज तो आचार्यो की वीतरागता की परिभाषा ही बदल गई। यह भी रिकार्ड पर है कि लगभग पचास वर्ष पूर्व एक जैनाचार्य का चित्र खींचने पर कैमरा तोड़ दिया गया था। कैमरामैन की पिटाई की गई। चित्र लेने को आत्म प्रदर्शन की संज्ञा थी। बाद में उन्हीं के सैकड़ों वीडियो बन गए। प्रश्न यह भी है कि ऎसे में समाज की जिम्मेदारी क्या? इसके बिना एकता की बात?

वस्तु स्थिति यह भी है कि शास्त्रों में कहीं भी “जैन” शब्द की परिभाषा नहीं दी गई। अत: जैन के घर जन्मा वही जैन। तब जैन धर्म न होकर एक जाति बन गया। परिभाषा सदा अतिव्याप्ति, अव्याप्ति तथा असंभव से परे होती है। यहां नहीं है। तब एकता किसकी? साधुत्व ही जैनों का लक्षण है। यहां एकता की बात का अर्थ क्या? एकता सदा किसी के विरोध में होती है। जैनों का अनेकान्तवाद सारे भेद मिटाकर सौहार्द बनाए रख सकता है। जहां तक मन्दिर आदि सम्पत्तियों के मुद्दे हैं, एक सेवानिवृत्त जजों की समिति इन्हें निपटा सकती है। इसमें दोनों तरफ के जज हो सकते हैं। एक-दो अजैन भी हो सकते हैं।

सामाजिक पहचान और शक्ति एकता से ही प्राप्त होते हैं। यह कार्य आचार्य नहीं करेंगे। वे तो अन्य सम्प्रदाय के सन्तों को साधु भी नहीं मानते। नियम ही ऎसे हैं। साधु का छठा गुण स्थान होता है। चारों सम्प्रदाय के साधुओं के महाव्रतों का स्वरूप भिन्न होता है। एकता संभव नहीं है। हां, व्यवहार में सौहार्द प्रकट कर सकते हैं। व्रत बल पूर्वक थोपे नहीं जा सकते। ज्ञान और श्रद्धा तथा चारित्र में भी बल वांछित नहीं है।

एकता का कार्य युवा ही कर सकता है। वहां किसी प्रकार के तात्विक भेद भी नहीं होते। समाज के प्रतिनिधि भी युवा ही होते हैं। पहचान की जरूरत भी इन्हीं को होती है। ये सब मिलकर अपनी नई “आचार संहिता” बना सकते हैं। आचार्यो की सलाह काम नहीं आएगी। वैसे भी हमारे यहां आचार्यो की कोई परिभाषा नहीं दी गई। न उनके अधिकार एवं उत्तरदायित्व की कोई स्पष्टता है। तभी तो वे स्वयं को धर्माचार्य कह रहे हैं और हम एक जाति की तरह व्यवहार कर रहे हैं। आचार्यगण वीतरागता से विमुख होते जा रहे हैं। हमें उनसे भी बात करनी चाहिए। उनकी स्वीकृति से एकता को बल ही मिलेगा। आज तो सन्त हमें खुला छोड़ने को तैयार ही नहीं हैं। यह उनकी ही कमजोरी है। इसी तरह से मीडिया भी उनकी कमजोरी हो गया है।

धर्म को सकारात्मक रूप देना पड़ेगा। अ-हिंसा, अ-स्तैय, अ-परिग्रह की व्याख्या सहज नहीं होती। निषेध भी परोक्ष भाव में ही परोसे जाएं। वरना, बच्चे दुबारा नहीं आएंगे। सबको मिलकर एक रूप में ही महावीर को ग्रहण करना होगा। प्रसारण करना होगा। तब जाकर सामाजिक-आर्थिक पहचान की अन्य धर्म-समुदायों में प्रतिष्ठा बढ़ेगी। आज उनमें जगह बनाना हमारी प्राथमिकता नहीं है। अपने समाज के कमजोर वर्ग को भी आज हमने ऊपर उठाना छोड़ दिया। दानदाता मन्दिरों के जरिए सन्तों का राजनीतिक लाभ उठाने लग गए। सरस्वती पुत्र तैयार करना बन्द हो गया। शास्त्रों पर शोध बन्द-सा हो गया-वैज्ञानिक विवेचन होता ही नहीं।

युवा एकता की पहली शर्त यह है कि हमारे प्रयास वर्तमान शैली के अनुरूप हों। नहीं तो भागीदारी नहीं होगी। अब जब अल्पसंख्यक श्रेणी का लाभ उठाना है तो बिना एकजुटता के संभव ही नहीं होगा। सामाजिक कार्यो के स्वरूप एकता का प्रमाण बनें, जरूरी हैं। नई पीढ़ी की आवश्यकताएं, चिन्तन, कॅरियर तथा जीवन शैली बिना किसी आलोचना के समाहित की जानी चाहिए। तभी हम शैक्षणिक नेतृत्व भी दे पाएंगे। छोटे-बड़े का भेद मिटा पाएंगे। धर्म के प्रति आस्था का नया प्रवाह तथा गति पैदा कर पाएंगे। तीर्थो का सामूहिक उत्तरदायित्व, नई पीढियों को जोड़े रखने के लिए तदनुरूप साहित्य का निर्माण जैसे कार्य हो सकेंगे। कुल मिलाकर युवा वर्ग को संकल्प करना होगा कि नई चेतना की जाग्रति के साथ विश्व में जैन दर्शन का प्रकाश फैलाएंगे।

क्रमश:

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