Gulabkothari's Blog

सितम्बर 14, 2015

धर्म को धर्म रहने दें-2

जैन धर्म का मूल अहिंसा है। यहां यह ध्यातव्य है कि अहिंसा के पालन के लिए अथवा धर्म के किसी भी सिद्धान्त के पालन के लिए बल का प्रयोग स्वयं में एक हिंसा है। धर्म स्वैच्छिक है, उसे किसी पर लादना नहीं चाहिए। यह सभी जैन आचार्यो का मत है।

जो यह चाहे कि मांसाहार का प्रयोग न किया जाए क्योंकि इसमें पशु के प्रति क्रूरता होती है वे पशु के प्रति संवेदनशीलता जगाने के लिए अधिकाधिक प्रेरणा दें-यह धर्मसम्मत मार्ग है किन्तु किसी को मांस न खाने के लिए कानून बनाकर मजबूर किया जाए यह धर्म का मार्ग नहीं क्योंकि इसमें बल का प्रयोग किया जा रहा है।

वस्तुत: जैनों को मांसाहार के विरूद्ध सारे तर्क देकर लोगों को मांस छोड़ने की प्रेरणा देनी चाहिए। यह उनका मौलिक अधिकार है कि वे अपनी धार्मिक मान्यता का प्रचार करें किन्तु इसके लिए किसी कानून का सहारा लेना धर्म की दृष्टि से उचित नहीं।

जहां तक मांसाहारियों का प्रश्न है उन्हें मांसाहार के विरोधियों की भावना का सम्मान करते हुए स्वेच्छा से पर्यूषण के दिनों में मांसाहार का त्याग करने की घोषणा कर देनी चाहिए। इस छोटे से त्याग के बदले उन्हें न केवल जैन प्रत्युत अजैन शाकाहारियों की भी सद्भावना का अमूल्य उपहार प्राप्त होगा। जैसा कि सदियों से होता रहा है।

चाहे मांसाहार विरोधी हों अथवा मांसाहारी हों-दोनों को ही एक-दूसरे के प्रति सद्भावना स्थापित करनी चाहिए। दुर्भावना तो किसी भी स्थिति में देश के लिए इष्ट नहीं है।

महावीर ने कहा कि जीव भारी होता है प्रणतिपात से, हिंसा करने से। जीव भारी होता है हिंसा की स्मृति से। हिंसा की स्मृति ही वास्तविक हिंसा है। क्रियमाण हिंसा उतनी बड़ी नहीं है। हिंसा के संस्कार की स्मृति बड़ी हिंसा है। वही हमें भारी बनाती है। हमारी हिंसा उस स्मृति को और भारी बना देती है। यदि मन में हिंसा का संस्कार न हो और हिंसा का संस्कार स्मृति रूप में जाग्रत न हो तो वर्तमान की हिंसा संभव ही नहीं है। जो भी वर्तमान में हिंसा कर रहा है, उसके मन में हिंसा का संस्कार है। उस हिंसा के संस्कार की स्मृति जाग्रत हो रही है। अत: हिंसा का मूल वर्तमान घटना से ज्यादा हिंसा की स्मृति है। घटना तो परिणाम है।

हमारी चेतना जैसे-जैसे जाग्रत होगी, ऊपर उठेगी, हिंसा स्वत: समाप्त हो जाएगी। महाप्रज्ञ ने लिखा था कि हिंसा छोड़ने से समाप्त नहीं होती, करने से समाप्त नहीं होती, केवल चेतना के जागरण से समाप्त होती है। उससे हिंसा का संस्कार समाप्त हो जाता है। न स्मृति रहती है, न ही घटना। हमारी भौतिकता के तल में छिपी हुई कोई ऎसी प्रखर ज्योति है जो निर्णय ले रही है और वह निर्णय हमारे बाहर तक पहुंच रहा है। भीतर हमारा अस्तित्व होता है- मैं हूं। बाहर हमारा व्यक्तित्व रहता है-“मैं” विशिष्ट हूं। “मैं” सदा बाहर देखता है। “हूं” भीतर देखता है।

शास्त्र की भाषा में कहें तो भाव-हिंसा मुख्य है, द्रव्य हिंसा नहीं। बलपूर्वक यदि द्रव्य हिंसा रोक भी दी जाए तो भाव-हिंसा तो प्रज्ञा के जागरण से ही रूकती है, न कि किसी कानून के द्वारा। सच्ची अहिंसा तो तब है जब भाव हिंसा अर्थात् मान, माया, क्रोध, लोभ की कषाय मन्द हो। स्पष्ट है कि यह समझ पैदा होने पर ही सम्भव है, कानून के बनाने से नहीं और यही सच्चा अहिंसा धर्म है।

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सितम्बर 13, 2015

धर्म को धर्म रहने दें-1

इस देश में धर्म तो सनातन है। हजारों वर्षो से चला आ रहा है। उसको ही आज हिन्दू धर्म का जामा पहना दिया गया। नया शब्द चल पड़ा-हिन्दुत्व। धर्म की आड़ में हिन्दुत्व राजनीति का अखाड़ा बन गया। धीरे-धीरे प्रत्येक धर्म-समुदाय में राजनीति प्रवेश कर गई। जहां हजारों वर्षो में धार्मिक पर्वो-परम्पराओं को लेकर कभी राजनीति नहीं हुई, वहीं आज जैन पर्व पर लगी मांस की बिक्री पर रोक में राजनीति घुस गई। कुछ लोग तो इतने आक्रामक हो गए मानो स्वयं हिंसक हों। मांस के प्रति उनके मन में इतना राग, कि सभी धार्मिक सहिष्णुता द्वेष में बदल गई। मुम्बई में तो मानो कोहराम ही मच गया।

क्या इस कोहराम के पीछे जैन समुदाय था? क्या सरकार का आदेश सत्तर वर्षो में पहली बार आया? क्या आदेश जारी करने वाली पार्टी-भाजपा-के साथ शिवसेना भागीदार नहीं थी? तब क्या उद्धव ठाकरे का ऎलान राजनीति नहीं थी? क्यों एक-एक करके भाजपा शासित प्रदेशों में ही मांस-ब्रिकी पर निषेध लागू होने के समाचार टीवी पर चलाए जा रहे हैं? क्या गैर-भाजपा शासित राज्यों में ऎसे आदेश जारी नहीं हुए अथवा वहां कोई राजनीति नहीं हुई? ऎसा लगता है कि बिहार चुनाव के मद्देनजर यह एक जैन कार्ड हिन्दू-मुस्लिम विभाजन को गहरा करने की नीयत से फैंका गया। बिहार के बाद आगे के महीनों में बंगाल, केरल, तमिलनाडु और असम में विधानसभा चुनाव होने हैं। शिवसेना वहां होगी ही नहीं। उसने अपने ही निर्णय को अपने पांव पर दे मारा।

पर्व कोई नया नहीं, निषेध कोई नया नहीं। प्रतिवर्ष पर्व आते हैं, निर्देश जारी होते हैं। दुकानें भी बन्द होती हैं। किसी प्रकार की प्रतिक्रिया नहीं होती। इस बार सब कुछ उल्टा हो रहा है। कुछ माह पहले केन्द्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने गौ-मांस के विरूद्ध आवाज उठाई। उन्हीं के साथी केन्द्रीय मंत्री किरण रिजिजू विरोध में खडे हो गए। रिजिजू ने तो यहां तक कह डाला कि कोई रोककर तो दिखाए। तब उद्धव कहां थे? अब कश्मीर भी इसी मुद्दे पर सुलग गया। एक तरफ भाजपा मांस बिक्री पर रोक लगाकर हिन्दू मतदाताओं को रिझाना चाहती है, दूसरी ओर वही भाजपा इसका भी विरोध शिवसेना से करवाती है। गौ-मांस बिक्री का समर्थन करती है उत्तर-पूर्व में और निषेध जारी करती है महाराष्ट्र और कश्मीर में? ऎसी स्थिति में न्यायालय क्या कर सकता है? किसी की निजी आस्था पर रोक तो वह भी नहीं लगा सकता।

इसे सामाजिक पहलू ही मानना चाहिए। यदि कोई राजनीति करता है तो समाज को ही आगे आकर संवाद कर लेना चाहिए। वैसे भी दो या चार दिन की जो बात है, वह एक-एक दिन की ही है। एक साथ चार दिन तो बिक्री बंद होती भी नहीं है। एक दिन की बिक्री बरसों से बन्द रहती रही है, जब रेफ्रीजरेटर नहीं होते थे तब भी। जीवन धार्मिक सोहार्द्र से ही चलता है। यही मांस बिक्री निषेध के आदेश राजस्थान-एम.पी.-छत्तीसगढ़ जैसे भाजपा शासित प्रदेशों में भी जारी हुए हैं। वहां पर शिवसेना जैसी प्रतिक्रिया क्यों नहीं हुई? वहां पर राजनीति न करने का भी तो कोई सोचा-समझा कारण होगा!

देशहित में है कि धर्म को धर्म ही रहने दिया जाए। राजनेता और राजनीति अवसरवादी होते हैं। इनको न हिन्दुओं से कोई मोह है, न मुस्लिमों से, न ही आदिवासियों से। ये तो सत्ता में रहना चाहते हैं-जनता को बांट-बांटकर। एक ही तरीका रह गया है कि जनता भी अपने कानों में अंगुली डाल ले। नेताओं की भाषा से प्रभावित होने के बजाए भाईचारे के रास्ते शान्ति से जीते चले जाएं। – क्रमश:

सितम्बर 8, 2015

वादे हैं वादों का क्या!

हमारे देश का लोकतंत्र आज रहस्यमय चौराहे पर खड़ा है। सांस्कृतिक रूपान्तरण हो रहा है हमारे लोकतंत्र का। बेटा घर के संस्कारों को स्वीकार करने को राजी नहीं है। हर अपने संकल्प को तोड़ देना चाहता है जो उसने ईश्वर के सामने किया हो। राजनीतिक दलों का भी यही हाल है। वे भी सवा सौ करोड़ जनता के सामने किए हर वादे को भूल जाना चाहते हैं। पहले कांग्रेस ने हमेशा यही किया और अब भारतीय जनता पार्टी का चुनावी घोषणा-पत्र भी राजनीतिक मुखौटा बनकर रह गया। संविधान मौन है, कानून लाचार है, चुनाव आयोग और चुनाव आयुक्त शून्य में चले जाते हैं परिणाम घोषित करके। रह जाते हैं एकमात्र शीर्ष पुरूष-महामहिम राष्ट्रपति। वे केवल सलाह दे सकते हैं सरकार को। मानें न मानें!

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ एवं भाजपा की हाल ही दिल्ली में हुई समन्वय बैठक में यह तो स्पष्ट हो गया कि केन्द्र सरकार के एजेण्डे में धारा 370 तथा अयोध्या के राम मंदिर निर्माण का मुद्दा शामिल नहीं है। समान नागरिक संहिता की अब कहीं बात भी नहीं होती और काले धन को वापस लाने की बात को तो सरकार ने राजनीतिक झुनझुना कहकर दाखिल दफ्तर कर दिया है। रही बात “न खाऊंगा, न खाने दूंगा” की, तो खुलेआम अपने भ्रष्टाचार में आकण्ठ डूबे नेताओं को बचाते रहना स्वत: प्रमाण है। यह भी आश्चर्यजनक तथ्य है कि घोषणा-पत्र के मुद्दों से मुकर कर सरकार फिर से चुनाव जीतने के सपने देख रही है। हम को तो साल भर में ही लोकप्रियता का ग्राफ गिरता जान पड़ रहा है। उनको यह लग रहा है कि सरकार जो कुछ कर रही है, वह ही एक मात्र सही मार्ग है विकास का। इतने सारे मंत्री, अफसर, न्यायाधीश भी कुछ बोझ दिखाई पड़ रहे हैं। इनकी भी छंटनी हो जाने की चर्चा है।

प्रश्न मूल में यह रह गया है कि जिन वादों को जन-जन के सामने रखकर भाजपा ने वोट मांगे थे, चाहे घोषणा-पत्र में लिखकर अथवा फिर चुनाव सभाओं में बोलकर, क्या वे सब ही मात्र “लॉलीपॉप” थे? मान भी लें तो जनता यह तो अवश्य जानना चाहेगी कि अपने काल में भाजपा सरकार देश और देशवासियों के लिए क्या करना चाहती है, जो इन वादों से भी मूल्यावान हों। जिस संघ से भाजपा की उत्पत्ति हुई, उसके प्रमुख मोहन भागवत को जेड सुरक्षा की बेडियों में बांध दिया। उनकी स्वतंत्रता छिन गई। जनता से लोकतंत्र छिन गया। तब अपने को इतिहास में दर्ज कराने के लिए सरकार ऎसा क्या करना चाहती है? उसे अपना यह मानचित्र या रोड मैप जनता के सामने रखना चाहिए। वरना तो यही माना जाएगा कि कांग्रेस के नकारापन एवं अल्पमत में होने के कारण भाजपा एक पक्षीय निर्णय करने लगी है। भले ही लोकतंत्र खतरे में पड़ जाए। वैसे भी अब तक विपक्ष को समानता का दर्जा दिया ही कहां है? केवल कोसा ही है, आलोचना क रके ही अपना बड़प्पन देश को दिखाया है। कैसे मानें कि कमल पानी से ऊपर रहता है।

प्रश्न यह भी है कि संघ प्रमुख को कैसा लग रहा है। संघ के पदाधिकारी सत्ता भोग में डूब चुके या अभी योग का प्रभाव शेष है। भाजपा को सरकार में लाने के पीछे मुख्य भूमिका (स्वीकृति सहित) संघ की ही थी। चुनावी घोषणा-पत्र के जिन मुद्दों से भाजपा ने किनारा कर दिखाया, वास्तव में वे संघ के ही मुद्दे थे। भाजपा संघ की पकड़ से बाहर हो गई। हां, संघ के कुछ लोगों को सरकारी नियुक्तियां भले ही दे दे। क्या मोहन भागवत इस परिस्थिति को सिद्धांतत: स्वीकार करेंगे? तब क्या यह देश संघ पर अपना विश्वास बना पाएगा? अथवा, संघ और भाजपा बीच की दीवार हटाकर एक हो जाएंगे?

कांग्रेस मौन है। मानो केवल एक परिवार की पार्टी रह गई हो। किंकर्तव्यविमूढ़ है। नीचे के छुटभैया नेताओं की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ा। सबके पेट भरे हुए हैं। उनकी चेतना भी लोकतंत्र के मुद्दे पर सुप्त है। मां-बेटे जानें और उनकी कांग्रेस जाने। वे मानकर बैठे हैं कि अगले चुनावों में जनता फिर भाजपा के विरोध में मतदान करेगी और कांग्रेस का राज लौट आएगा यह तो लोक तंत्र नहीं हुआ। आज देश को विपक्ष की अत्यन्त आवश्यकता लग रही है। विपक्ष मौन क्यों है? जिस प्रकार संसद में भूमि अधिग्रहण पर एकजुट होकर प्रहार किया था, आज क्या घोषणा-पत्र से मुंह फेरने का मुद्दा छोटा है?

सच तो यह है कि आज सत्ता और विपक्ष दोनों ही लोकतंत्र को अपमानित कर रहे हैं। जनता विकल्पहीन है। शून्य में ताक रही है। अकर्मण्यता और भ्रष्टाचार चारों ओर अभिवृद्धि पा रहे हैं। तीसरे मोर्चे के दलों का इतिहास भी देखते ही बनता है। ऎसे में पहली आशा तो सदा सत्ता पक्ष से रहेगी। उसने हाथ झाड़ने शुरू कर दिए हैं, तब विपक्ष की बारी आई। अब देश के युवा को ही उठना पड़ेगा। वह आधे से ज्यादा हिस्सा है देश का। उसके सामने तीन साल से कुछ अधिक समय है। भविष्य की नई रूपरेखा बनानी ही पड़ेगी। आज का लोकतंत्र भी किसी गुलामी से कम नहीं। युवाओं के लिए भविष्य नहीं है इसमें। जनता के प्रति वचनबद्धता नहीं है इसमें। भारतीय संस्कृति की आत्मा कहीं गहरे में सिमट गई है। भारतीय शरीरों में बैठा “इण्डिया” ही राज कर रहा है । इससे बड़ा अपमान इस सोने की चिडिया का क्या हो सकता है। जरूरत है इसे अपने पंखों को फड़फड़ाने की। देश के तमाम राजनीतिक दलों पर यह कानूनी बंदिश तो लगनी ही चाहिए कि वे जनता से जो वादे करके सरकार बनाएं वे सौ प्रतिशत पूरे हों। फिर ये वादे चाहे लिखे हों या बोले। तभी जनता जीत पाएगी। नहीं तो जैसे पिछले 68 सालों से हार रही है, आगे भी हारती रहेगी।

सितम्बर 5, 2015

पढ़े सो पढ़ावे

शिक्षक और अध्यापक का अर्थ पढ़ने वाला भी होता है और पढ़ाने वाला भी। इसका एक ही अर्थ है कि जो पढ़ नहीं सकता, वह पढ़ा भी नहीं सकता। किन्तु कुर्सी का अहंकार ही ऎसा होता है कि उस पर बैठते ही व्यक्ति सर्वज्ञ हो जाता है। एक तो आज डिग्रियां प्राप्त करने के लिए पसीना ही नहीं बहाना पड़ता, कुछ छात्रों को शायद पढ़ना भी नहीं पड़ता। कुछ कॉलेजों में तो कक्षाएं लगती ही नहीं। एक विश्वविद्यालय ने 25,000 फर्जी डिग्रियां दे डालीं, उनकी खेप को नौकरियां भी मिल गई। शिक्षा विभाग ने कार्रवाई न करके अपने असली स्वरूप की सार्वजनिक अभिव्यक्ति भी कर दी। नौकरी से सरकार के आका भी निकाल नहीं सकते। तब पढ़े कौन और क्यों?

मेरे गुरू स्व. देवीदत्त चतुर्वेदी नित्य रात को तीन-चार घण्टे तैयारी करते थे। मेरे संभावित प्रश्नों का चिंतन-मनन करते थे। अपने गुरू से विषय को पढ़ाने की आज्ञा लेते थे। आचार्य महाप्रज्ञ को बहुत पास से देखने का अवसर मुझे प्राप्त हुआ। उनके बारे में मेरा मत था कि वे स्वयं अपने लिए नहीं जीया करते थे। उनके आधे दाएं भाग में आचार्य तुलसी का स्थान था और बाएं आधे भाग में महाश्रमण का। अपने गुरू से लेते जाते और शिष्य को देते जाते। पितृ सिद्धांत की तरह ही गुरू परम्परा में भी सात पीढ़ी तक ज्ञान का प्रवाह बना रहता है। ऎसा मनीषियों का कहना है। उनका कहना था कि शिष्य ही गुरू को तैयार करता है। शिष्य नई पीढ़ी का होने से उसके अनुभव और उसकी जीवन-शैली भिन्न होती है। आवश्यकताएं भी बहुत कुछ नई होती हैं। ज्ञान की सार्थकता इसी में है कि वह हर देश-काल में उपयोगी हो सके। शिक्षक को इसी के नवीनीकरण का प्रयास करना पड़ता है, जो एक दुरूह कार्य है। इसके लिए समाज में होते रहने वाले परिवर्तनों का आकलन आवश्यक है। आज बिना कुछ किए ही शिक्षा इतना बड़ा व्यापार बन गई है, कि शिक्षा में ज्ञान की आवश्यकता ही समाप्त हो गई। पिछले साठ सालों में ज्ञान का स्थान लगभग अज्ञान ने ले लिया है। साहित्य बस रटाया जा रहा है। अनुवाद भी रटाया जा रहा है। वेद भी कंठस्थ कराए जा रहे हैं। इनमें ज्ञान क्या है, कैसे व्यक्ति के जीवन में उपयोगी हो सकता है, कोई नहीं जानता। सायण, उवर-महिधर ने भी अनुवाद ही किए हैं। उन्हीं को हम भी रटा रहे हैं। शोध, नयापन, विज्ञान से आगे उठने जैसी इच्छा किसी के मन में पैदा ही नहीं होती।

इसका एक कारण यह भी है मूल्य परक शिक्षा का लोप हो गया। कम से कम शिक्षक तो पढ़ता। उसको ही अपने आचरण और उत्तरदायित्वों का बोध तो होता। यह देश का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि धर्म-निरपेक्षता की अवधारणा नेे प्रत्येक व्यक्ति के जीवन से धर्म को बाहर निकाल फेंका। स्वयं शिक्षक छात्र-छात्राओं से मर्यादाहीन व्यवहार करने लग गए। ऎसे शिक्षक ही ज्ञान में “घुण” का कार्य कर रहे हैं। अज्ञान के गर्त में समाज को ले जा रहे हैं।

प्राणवान् शिक्षा के लिए पहले शिक्षक को ही राष्ट्र चिंतन के साथ संकल्पित होना पड़ेगा। त्याग के मार्ग पर चलकर आदर्श प्रस्तुत करना पड़ेगा। तब प्रत्येक नागरिक (अभिभावक हो या नेता-अभिनेता) कर्म को धर्म मानकर व्यवहार करेंगे। शिक्षा विभाग, शिक्षण संस्थान तथा शिक्षक आज जिस तरह का व्यापार कर रहे हैं, वे अपनी ही भावी सात पीढियों को “ज्ञान-मुक्त” कर रहे हैं।

अगस्त 30, 2015

हमें तो मरना है

सरकारों में आत्मा तक पहुंचने की प्रज्ञा नहीं होती। अत: लगता भी नहीं है कि आरक्षण पर गहन चिन्तन होगा।

आरक्षण का प्रश्न शरीर और बुद्धि मात्र का नहीं है। आत्मा का है तथा मन को साथ लेकर समझना पड़ेगा। वरना, कितने भी बदलाव कर लें कानूनों में, हम भारतीय आत्मा को छू भी नहीं पाएंगे। केवल अपने राष्ट्र प्रेम की दुहाई देने से भी काम नहीं चलेगा। प्रयासों की चर्चा न करके परिणाम लाने के प्रयास होने चाहिए।

भारतीय दर्शन का लक्ष्य है अभ्युदय और नि:श्रेयस । अभ्युदय शरीर का विषय है, जिसके पीछे पूरा विश्व आंखें मूंदकर भाग रहा है। लक्ष्मी चेतना शून्य जड सम्पत्ति है । प्रकृति अथवा माया का विषय है। अर्थ और काम का क्षेत्र है। नि:श्रेयस आत्मा से जुड़ा धर्म और मोक्ष का विषय है। हमारी संस्कृति की परिभाषा में दो शब्द हैं-सम और कृति अर्थात ईश्वर की सृष्टि। नि:श्रेयस इसी के साथ जुड़ा है। इसी के अनुरूप प्रकृति कार्य करती है। शरीर-मन-बुद्धि का संचालन करती है। इसी के साथ समाज व्यवस्था, सम्प्रदाय आदि जुड़ जाते हैं। यह हमारी सभ्यता का निर्माण करते हैं। आरक्षण का मुद्दा सभ्यता का नहीं है, संस्कृति का है। हमारी आत्मा को कचोटता ही रहेगा। राजनीति में संवेदना होती ही नहीं। सत्ता के लिए लोग हर युग में मां-बाप तक को मारते रहे हैं। प्रजा की तो बात ही क्या है? इतिहास साक्षी है- लोकतंत्र में भी सत्ता पक्ष बहुमत के अनुपात में अधिनायकवादी होता ही है। विपक्ष को गालियां देते-देते पांच साल पूरे कर जाता है। कुछ नया होने की, देशहित के मुद्दों पर दूरदर्शी निर्णयों की उम्मीद अब भी नहीं है। घोषणा-पत्र दफन किया जा चुका है। जिस प्रकार की नियुक्तियां हो रही हैं, वह एक नया ही आरक्षण है। आने वाले समय में केवल तीन जातियां ही पैदा होंगी इस देश में। आरक्षित, गैर-आरक्षित और अल्पसंख्यक। तब ब्राह्मण के घर ब्राह्मण अथवा जाट के घर जाट कैसे पैदा होगा। सरकार में तो मात्र तीन श्रेणियां रहेंगी।

अच्छी योग्यता वाले युवा सरकारी नौकरियों से परहेज क्यों करने लग गए? जब उनका पलायन भी होने लगेगा तो सरकार और देश के पास सिवाय “ब्रेन ड्रेन” का रोना रोने के क्या रह जाएगा? फिर आरक्षित वर्ग में भी सभी को इसका लाभ भी नहीं मिल पा रहा।

सरकारों में आत्मा तक पहुंचने की प्रज्ञा नहीं होती। अत: लगता भी नहीं है कि आरक्षण पर गहन चिन्तन होगा। अधिकांश मंत्री भी गहन भारतीय धरातल पर जीते ही नहीं। अफसर भारतीयता को छूना तक नहीं चाहते। वे तो लिव-इन-रिलेशन और समलैंगिकता के कानूनों को पास कराने में रस लेते प्रतीत होते हैं। संस्कृति को जानते तक नहीं है। उनका अधिकार भी सभ्यता तक ठहरा हुआ है। आम जन के प्रति संवेदना वहां भी शून्य है। फिर आधे तो आरक्षण वाले ही हैं। कौन साथ देगा आरक्षण हटाने में? केन्द्र सरकार के पास समय नहीं है। उसे भूमि अधिग्रहण बिल और जी. एस.टी. के मुद्दे अपने अहंकार की तुष्टि के लिए सर्वोपरि लगते हैं। पिछले डेढ़ साल में उसने उल्लेखनीय कुछ किया नहीं। नीचे देखने की जरूरत किसी को नहीं लगती। कोई नहीं देख रहा कि, हमेशा गुणवत्ता की बात करने वाला यह देश कदम-कदम पर गुणवत्ता से समझौता क्यों कर रहा है? अच्छी योग्यता वाले युवा सरकारी नौकरियों से परहेज क्यों करने लग गए? जब उनका पलायन भी होने लगेगा तो सरकार और देश के पास सिवाय ‘ब्रेन ड्रेन’ का रोना रोने के क्या रह जाएगा? फिर आरक्षित वर्ग में भी सभी को इसका लाभ भी नहीं मिल पा रहा। उसमें भी कुछ ही परिवार होते हैं जो मलाई समेटते हैं। अन्य तो उसे देख मिलने का इंतजार ही कर रहे हैं। क्यों आरक्षित और अनारक्षित वर्ग के दो व्यक्तियों के मध्य होनेे वाली मामूली सी कहा-सुनी कानूनों की आड़ में कोर्ट-कचहरी तक पहुंच जाती है? जब पड़ौस में रहने वाले दो व्यक्ति इस तरह लड़ेंगे तो समाज जुड़ेगा या टूटेगा? इसमें तो जुड़ाव की संभावना दूर-दूर तक नहीं होगी। सब अपना अलग-अलग घेरा बना लेंगे। जबकि प्रकृति में कोई छोटा-बड़ा अथवा अच्छा-बुरा नहीं है। जो जैसा है, वैसा है। हमारी समाज व्यवस्था ने भिन्न-भिन्न परिभाषाएं दी हैं, जो देश-काल के अनुरूप बदलती रहती हैं। सबसे बड़ा परिवर्तन तो यह हुआ कि हमारे ज्ञान का माध्यम जो भाषाएं थीं, उनमें समय के साथ न जाने कितने परिवर्तन आ गए। मौर्य आए, मुगल आए, अंग्रेज आए और हमारे ज्ञान समर्थक शास्त्रों का भाव भी बदलता गया।

स्वतंत्रता के बाद हमारे ही प्रतिनिधियों ने हमारे ज्ञान की जमकर धज्जियां उड़ाई। संविधान को धर्मनिरपेक्ष कहकर हमारी संस्कृति के साथ भौंडा मजाक ही किया। शासन में धर्म का प्रवेश वर्जित हो गया। हमारी संस्कृति का आधार आश्रम व्यवस्था तथा इसी के साथ वर्ण व्यवस्था रही है। प्रकृति की प्रत्येक वस्तु एवं प्राणी में वर्ण रहते हैं। चाहें पेड़-पौधे हों, पत्थर हों, या जीव जगत। आकृ ति का आधार पृथ्वी है, मन का आधार चन्द्रमा है। यह रजोगुण प्रधान है। इसी चन्द्रमा के देव प्राण से मानव के वर्ण का विकास हुआ। शरीर कर्म प्रधान है। प्रकृतियुक्त देवप्राण के प्रभाव को जन्ममूला कहा गया है- “प्रकृतिविशिष्टं चातुर्वण्र्य संस्कारविशेषाच्च।” प्रकृतिमूला वर्ण अवर्ण आठ भागों में विभक्त है।

सूर्य के “धियो यो न: प्रचोदयात्” से मानव के बुद्धि तंत्र का विकास हुआ। सत्वगुण प्रधान तथा अहंकृति भाव से समन्वित है। इससे गोत्र भाव का विकास होता है। क्योंकि सौर प्राण ऋषि रूप हैं। अर्थात् वर्ण प्रकृति सिद्घ हैं, गोत्र अहंकृति सिद्घ हैं तथा समदर्शन आत्मसिद्घ है। अन्न प्राशन संस्कार के समय बालक के सामने पुस्तक, कलम, चाकू एवं झाड़ू रखा जाता है। बच्चा पहले किस वस्तु को छूता है, उसी से उसके वर्ण का निर्धारण किया जाता है। अर्थात् वर्ण किसी वर्ग या जाति से नहीं जुड़ा होता। किसी भी वर्ण के व्यक्ति के घर में किसी भी वर्ण की संतान उत्पन्न हो सक ती है । ब्राह्मण-पुत्र भी ब्राह्मण वर्ण का हो, यह आवश्यक नहीं है। अत: कोई मानव एक-दूसरे से भिन्न नहीं हो सकता।

आज समाज में शूद्र शब्द को अपमानजनक माना जाता है- जबकि शास्त्र कहते हैं- “जन्मना जायते शूद्र: संस्काराद् द्विज उच्यते।” जन्म से प्रत्येक व्यक्ति शूद्र होता है, चाहे किसी कुल में क्यों न पैदा हुआ हो। तब शूद्र अपमान सूचक कैसे हो सकता है? कैसे ये भेद-भाव का आधार हो सकता है? शास्त्रों के निर्माण के बाद तो सब कुछ बदल चुका है। धर्म और छुआछूत की अवधारणा में आमूल-चूल परिवर्तन आ चुका है। अन्तर्जातीय विवाहों का सिलसिला तक चल पड़ा है। आने वाले समय में तो समाज व्यवस्था भी लुप्त हो चुकी होगी। एकल परिवार-मुक्त व्यवहार होगा। तब इस समाज व्यवस्था को तो बदला ही जा सकता है। आज तो अनेक जातियां ही लुप्त हो चुकी हैं। शेष भी तेजी से लुप्त हो रही हैं। अब नई जातियां-डाक्टर, इंजीनियर, सीए, एमबीए आदि पैदा हो रही है। इसी तरह अल्पसंख्यक के घर में अल्पसंख्यक पैदा होगा। आरक्षित परिवार का बच्चा आरक्षित होगा। उनको मनुष्य धारा में जीने का अधिकार नहीं होगा। उनका अपना-अपना कोटा होगा। यह हमारी पिछले अड़सठ सालों की कमाई है। जो काम 700 सालों में मुगल नहीं कर पाए, 200 सालों में अंग्रेज नहीं कर पाए, वही उजाड़ मात्र पांच मिनट में पूर्व प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह कर गए। यह कांटा कोई बौद्धिक तर्क से निकलने वाला कांटा नहीं है। देश को बांटने का इतना सहज उपक्रम शायद इतिहास में अन्यत्र नहीं होगा। आरक्षण!!

आरक्षण! देश भर में पिछले साठ सालों में इसके विरोध में कितनी आवाजें उठीं, जुलूस निकले, गोलियां चलीं और सैकड़ों मर चुके। क्या किसी नेता, अफसर या न्यायाधीश की पेशानी पर पसीना दिखाई पड़ा? आज तो किसान हत्या के जुमले चल रहे हैं जिनके बीच आरक्षण की आवाजें दब चुकी हैं। गुजरात में अहमदाबाद की यह हार्दिक पटेल की रैली जिसमें आरक्षण को पूरी तरह समाप्त करने या फिर पाटीदारों को भी आरक्षण देने की जो मांग की गई वह क्रान्ति का बिगुल जैसी है। हर प्रांत में बजना चाहिए। कोई सुने या न सुने।

देश में समय-समय पर हुए आरक्षण विरोधी आंदोलन अब तक लगभग 500 जानें ले चुके। सरकार की गोलियों से। समानता लाने के स्थान पर इतनी असमानता छा गई कि हम स्वयं अपने ही लोगों के लिए शत्रु बन बैठे। पहले तो अल्पसंख्यकों के नाम पर हिन्दू-मुसलमानों के दो धड़े बन गए। आरक्षण चूंकि केवल हिन्दुओं पर ही लागू है, अत: इनको भी 50-50 कर दिया। किया सब विकास के नाम पर, बिना समाज को शिक्षित किए। आज केवल इस एक कारण से देश साठ साल आगे जाने के बजाए साठ साल पीछे चला गया। राजनेता इसी पर छाती फ ुलाते हैं। आम जन इसी की मार से कराह रहा है। उसके काम होने बंद हो गए, अपशब्द और झूठी शिकायतों की भरमार हो गई। आरक्षण का सीधा प्रभाव बदले की भावना में बदल गया और व्यक्ति काम करना छोड़कर इसी में व्यस्त हो गया। सरकारी काम भी लगभग खड़ा सा हो गया। भ्रष्टाचार कई गुना हो गया। उच्च शिक्षा निम्न कोटि में बदल गई। जो नेता देश के विकास के जुमले कहते हैं, वे हमारी आंखों में धूल झौंकते हैं। आरक्षित वर्ग के लोग आरक्षित वर्ग के डाक्टरों तक से इलाज कराने को तैयार नहीं। सरकारी अफसर निजी अस्पतालों में जाने लगे। एक ओर गुणवत्ता का ह्रास, दूसरी ओर काम में कमी, अपमान का वातावरण हमारे विकास की सीढ़ी हो गई । अल्पसंख्यक तथा दो बराबर भागों में हिन्दू तीनों एक-दूसरे के आमने-सामने हो गए एक ही देश में । अंग्रेजों ने भी देश का इतना नुकसान तो नहीं किया था। कोई आश्चर्य नहीं 80-100 सालों में गुलामी फिर इस देश को जकड़ ले।

विवेकानन्द ने कहा था “गाली देना काम नहीं आएगा। तुम भी पढ़ो और इनके बराबर हो जाओ।” किन्तु आरक्षण ने भेद-भाव का आधार भी बढ़ा दिया और उसको दृढ़ भी कर दिया। आज समृद्घ व्यक्ति को यह कहकर भगा दिया जाता है कि “….”, “तुमने ही हमको सताया है। भाग यहां से।” गरीब के लिए मनरेगा। इतिहास गवाह है कि पहली शताब्दी से 350 वर्ष तक देश में शूद्रों ने ही राज किया है। किन्तु जिस प्रकार सरकारी मन्दिरों में चैन्नई सरकार ने शूद्रों को पुजारी बना दिया था, मंत्र संस्कृत के स्थान पर तमिल में बोलने के निर्देश दिए गए थे, उससे तो आग भड़कनी ही थी। यह वैसा ही रवैया था जैसा हिन्दी के विरोध में दिखाया था। इन राजनीतिक कार्यो से व्यक्ति की चेतना में भेद और भी दृढ़ हो जाता है। तब मन में शत्रुता घर कर जाती है। हर व्यक्ति के भीतर उसका शिव तत्व (परमात्मा) रहता है। उसकी चेतना स्वतंत्र होती है।

हमने एक बात नहीं समझी। व्यक्ति की प्रकृति, बौद्धिक क्षमता, आकृति, अहंकृति कुदरत देती है। पद के कारण प्रतिभा नहीं आ जाती। जाति और वर्ण भी एक नहीं है। जातियां लुप्त हो रही हैं। हम पढ़ाना चाहते हैं, किंतु नौकरियां दे नहीं पाते। दसवीं पास बच्चा कुम्हार या खाती बनने को तैयार नहीं। आरक्षण से एक ओर अक्षम को नौकरी मिल रही हैं, क्षमतावान बेरोजगार रहता है। फिर भी साठ साल में क्या आरक्षण ने आरक्षित जातियों के विकास के मार्ग खोले? जरा भी नहीं खुले। क्या उन जातियों में विकास के समान अवसर उपलब्ध हुए? क्या इस कारण देश में धर्म परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त हुआ? न कोई सरकार यह कह पाई कि हिन्दुओं में ही ऎसा क्या है कि वहां आरक्षण अनिवार्य है। क्या तीनों वर्णो (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) के घरों में शूद्र पैदा नहीं होते? हम शब्दों को पकड़ते हैं। व्यंजना नहीं करते। प्रकृति में विषमता है ही नहीं। केवल कर्मफल है। भारतीय दर्शन भी समता आधारित है। कालक्रम का प्रभाव अवश्य पड़ता है। तब हम सब भारतीय क्यों नहीं हैं?

भारत सम्पन्न देश था। द्वितीय विश्व युद्घ के बाद यूरोप दरिद्र हो चुका था। अंग्रेजों ने हमारे संसाधनों पर अतिक्रमण कर लिया और हम दरिद्र हो गए। फिर अंग्रेजी के बीज बो गए, तो हमारा ज्ञान से सम्पर्क ही टूट गया। कोरा विज्ञान रह गया। चेतना सुप्त हो गई। पंचवर्षीय योजनाएं कृषि और पशुधन पर आधारित नहीं रही। संविधान का भी भारतीयकरण नहीं हो पाया। विकास के लिए अब समान अवसर नहीं रहे। तब हमें तो कंगाल ही होना है। भ्रष्टाचार हमको और भिखारी बना रहा है। सभी नेता मांगने की भाषा बोलने लगे। बड़ी-बड़ी परियोजनाओं में स्वयं दलाली खाने लग गए। चुनावी घोषणा-पत्रों को लाल बस्ते में बंद कर देते हैं। इन सभी विनाशकारी दृश्यों के मूल में आरक्षण है।

जब संविधान में अनुसूचित जाति-जनजाति के लिए आरक्षण की व्यवस्था लागू की गई, उस वक्त देश के हालात कुछ अलग थे। आरक्षण का सीधा फायदा सरकारी नौकरियों में मिलना था। सरकारी नौकरियां सीमित थी। शिक्षा का प्रचार-प्रसार भी इन दशकों में अधिक नहीं हुआ था। केंद्र और राज्यों के सरकारी विभागों का विस्तार और नए विभागों का गठन पूरी तरह नहीं हुआ था। समाज के बड़े और गैर-आरक्षित वर्ग के लिए भी सरकारी भर्तियों में ज्यादा संभावना नहीं थी। आजादी के प्रारम्भिक दो दशक तक इसका देश और समाज पर व्यापक असर नहीं पड़ा। वर्ष 1980 के दशक के बाद आरक्षण ने गैर-आरक्षित वर्ग को प्रभावित करना शुरू किया। इस दौर तक एक पूरी पीढ़ी शिक्षित हो चुकी थी। संविधान में आरक्षण का जो विष बीज बोया गया था, वह अब वट वृक्ष बनकर पनपने लगा। एक तरफ उत्तीर्ण होने के लिए आवश्यक अंक लाने से भी कम अंकों पर सरकारी नौकरियां मिलने लगी तो दूसरी तरफ अच्छे-खासे अंकों के बाद भी नौकरी सपने सरीखी रही। इस अदृश्य सामाजिक अंतर से देश में वर्ग विभाजन की दरार उभरने लगी। यहां तक भी समाज का गैरआरक्षित वर्ग आरक्षण के विषपान को हलाहल करता रहा। नब्बे के दशक के बाद अन्य पिछड़ा वर्ग को आरक्षण के दायरे में शामिल करके तो मानो देश की सामाजिक समरसता-सौहार्द के साथ एकता- अखंडता को रौंद डाला गया। दलितों को आरक्षण देने से देश में उभरी विभाजन रेखा ओबीसी को आरक्षण देने के बाद खाई में बदल गई। एक ऎसी खाई जिसका फैलाव आज तक जारी है। समाज के अन्य वर्ग भी जाति, धर्म, लिंग और भौगोलिक आधार पर आरक्षण की मांग करने लगे। राजनीतिक दलों ने जिस खेल को अपने निहित स्वार्थो के लिए शुरू किया। उससे देश की शिराओं में जातिवाद विष बन कर बहने लगा। मांग पूरी नहीं करने पर हिंसा, तोड़फोड़ और कानून-व्यवस्था चौपट कर दी गई। हरियाणा में जाटों, राजस्थान में गुर्जरों और अब गुजरात में पटेलों के आरक्षण की मांग को लेकर आई कर्फ्यू की नौबत से समूचा देश स्तब्ध है। राजनीतिक दल सत्ता की खातिर इनकी मांगों के सामने झुकते गए और मजबूत देश का ख्वाब टुकड़ों में बदलता गया। इससे देश की भौगोलिक सीमाएं भले ही अपरिवर्तित रही हों पर हकीकत में देश एक ऎसे ढांचे में बदलता जा रहा है, जिसकी ऊपरी परत बेशक सुदृढ़ नजर आए पर अन्दरूनी हिस्से लगातार जर्जर हो रहे हैं।

आश्चर्य की बात है कि न्यायपालिका ने भी देश के इस दर्द को नहीं समझा। न्यायपालिका भी शब्द जाल में ही अटककर मानो रह गई अथवा सत्ता पक्ष से प्रभावित हो गई थी। सत्ता पक्ष का अहंकार तो शाश्वत है। पिछली सरकारें हों या वर्तमान सरकार, देश हित के प्रति गंभीर नहीं रहे। हिन्दुओं को तोड़कर कोई अपने को हिन्दुवादी कह सकता है? पिछली सरकार जीवनशैली से जुड़े कितने कानून लाने चली थी। क्या देशवासियों की राय जानना कतई आवश्यक नहीं रह गया है? आरक्षण के विरोध में तो आज पूरा देश एकमत है। देश पीछे जा रहा है। सामाजिक वातावरण विषाक्त हो रहा है। विकास के स्थान पर विनाश हो रहा है और सत्ताधीश मतदाता की ओर देखकर अट्टहास करते हैं। खाली दिमाग शैतान का घर। बेरोजगारी, विषमता, भारतीय संसाधनों में विदेशी निवेश आरक्षण आन्दोलन को हवा ही देंगे। सरकारें तो अपना ही सोचने लगी हैं, देश का भविष्य समय ही तय करेगा।

अगस्त 20, 2015

संथारा/सल्लेखना

जैन धर्म मूल में त्याग और तपस्या के मार्ग पर चलकर जीने का मार्ग है। शरीर को साधन मानकर आत्मकल्याण इसकी प्राथमिकता है। हर वर्ष भाद्रपद माह में हजारों जैन मासखमण (एक माह के निर्जल उपवास) करते हैं। वेद भी शरीर को साधन मात्र ही मानता है। कालिदास ने “कुमारसंभव” में लिखा है-“शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्।” पुरूषार्थ का लक्ष्य भी मोक्ष प्राप्ति (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) ही है। यह भी सच है कि भौतिक सुख की अवधारणा के बीच आत्मा मर चुकी है, मात्र शरीर जीवन का प्रतीक रह गया है। शिक्षा ने हमारे कर्म, कर्मफल और पुनर्जन्म के सिद्घांतों को ताले में बंद ही कर दिया। सारे धर्म और दर्शनों के अर्थ ही बदल गए।

राजस्थान हाईकोर्ट ने दस अगस्त 2015 को दिए अपने एक निर्णय में जैन धर्म की संथारा/सल्लेखना की पद्घति को आत्महत्या की परिभाषा में सम्मिलित कर दिया। कोर्ट ने कहा कि “जैन धर्म के शास्त्रों में, अभ्यास अथवा प्रवचनों में कहीं भी संथारा/सल्लेखना का उल्लेख नहीं पाया गया। न ही यह पाया कि मोक्ष प्राप्ति के लिए संथारा एक अनिवार्यता है। न ही किसी ऋषि-मुनि ने यह लिखा कि संथारे के अभाव में मोक्ष प्राप्ति नहीं हो सकती। न ही इसके प्रमाण ही सामने आए कि जैन धर्म के अनुयायियों में यह सिद्घान्त प्रचुरता में पालन किया जाता है। संथारा को स्वैच्छिक कृत्य कहकर आत्महत्या न मानना एक बात है तथा संविधान की धारा 25 और 26 में स्वीकृत करना दूसरी बात है। न ही धारा 21 में जीवन समाप्त करने का अधिकार दिया जा सकता है। “धार्मिक स्वतंत्रता अधिकार” में भी स्वयं मृत्यु मार्ग के चयन की स्वीकृति नहीं दी जा सकती। अत्यंत विकट परिस्थितियों में भी नहीं। अत: सरकार इस परम्परा को बंद करावे तथा इसे धारा 309 के अन्तर्गत आत्महत्या का दर्जा दिया जाए। जैन धर्म में अब किसी भी रूप में संथारा परम्परा को प्रश्रय न दिया जाए।”

आज जैन धर्म विश्व के धर्मो के बीच अपनी पहचान रखता है। लगभग 2500 वर्ष पुराना तथा अन्तिम तीर्थंकर भगवान महावीर के नाम से पहचाना जाने वाला धर्म है। जीवन भर तप-त्याग के साथ जी कर, अन्तिम काल में निवृत्ति का अभ्यास और “संथारा” का योगमार्ग दिया गया। संथारा का सामान्य अर्थ है बिछौना। यह श्वेताम्बर परम्परा में प्रचलित है। दिगम्बर परम्परा में इसे सल्लेखना कहते हैं। सल्लेखना का अर्थ है-कृश कर देना। किसको? क्रोध, मान, माया, लोभ इन चार कषायों को, जो मोक्ष मार्ग के मुख्य बाधक हैं। इसको ही धर्माचरण कहा गया है। जब तक शरीर धर्माचरण में सहायक रहता है, उसका पोषण किया जाता है।

जब शरीर इस कार्य में असमर्थ हो जाए तब उसका पोषण बंद कर दें। जीवन खाना खाने के लिए नहीं है। भोजन छोड़ देना “भक्त प्रत्याख्यान” कहलाता है। दिगम्बर मुनि तो भिक्षा के लिए स्वयं जाते हैं। खड़े-खड़े आहार ग्रहण करते हैं। इसमें असमर्थ होने पर स्वयं ही आहार का त्याग हो जाता है।

प्रश्न यह है कि क्या संथारा/सल्लेखना को आत्महत्या माना जा सकता है? पांचवीं शताब्दी ईस्वी में जैनाचार्य पूज्यपाद के सामने भी यही प्रश्न आया था। उस उत्तर को सर्वार्थसिद्घ अध्याय (संग्रह) भा.ज्ञानपीठ-1955 में उद्घृत किया गया है । जैनेन्द्र सिद्घान्त कोश (4) में सवार्थसिद्धि उद्घृत करते हुए कहा गया है कि- “सल्लेखना आत्महत्या नहीं है। क्योंकि इसमें प्रमाद का अभाव है । प्रमाद योग (क्रोध-मान-माया-लोभ) सेे प्राण का वध करना हिंसा है। राग-द्वेष, मोह से युक्त होकर जो विष और शस्त्रादि से अपना घात करता है, वह आत्महत्या है। सल्लेखना प्राप्त जीव को रागादिक तो होता नहीं है। यह तो अहिंसा (रागादिक न होना) है।”

जैन धर्म का प्राचीनतम ग्रन्थ है “आयारो”। इसे महावीर की वाणी ही माना जाता है। इसका आचार्य महाप्रज्ञ द्वारा किया गया अनुवाद तथा विवेचन भी उपलब्ध है। जिस प्रकार प्रथम ब्रह्मसूत्र है-“अथातो ब्रह्मजिज्ञासा”, वैसे ही जैन दर्शन का भी मूल मंत्र है-“अथातो आत्मजिज्ञासा”। यही कर्ता और भोक्ता है, बंध और मोक्ष का कारक है। ज्ञान और आचार मिलकर मोक्ष का हेतु बनते हैं। भगवान महावीर ने आचार के पांच भेद किए-ज्ञान, दर्शन, चरित्र, तप और वीर्य। आचार सबके साथ जुड़ा है, अत: मोक्ष का सम्यक् उपाय है। अर्थात् शरीर और कर्म का अनिवार्य योग है।

“न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषत:”-गीता 18/11

“राग-द्वेष से कर्म करना और फलाशंसा रखना, ये दोनों असंयम हैं।”

आचारांग और गीता एक ही तथ्य प्रकट कर रहे हैं।

भगवान महावीर का दर्शन समता का है। उन्होंने समता के द्वारा जीवन के रूपांतरण की दिशा प्रदर्शित की। आचारांग के मूल प्राकृत सूत्र 125 के हिन्दी अनुवाद में प्रायोपगमन अनशन पर लिखा है-जिस भिक्षु को ऎसा संकल्प होता है-

“मैं इस समय (समयोचित क्रिया करने में) इस शरीर को वहन करने में ग्लान (असमर्थ) महसूस कर रहा हूं ।” वह भिक्षु क्रमश: आहार का संक्षेप करे, कषायों को कृश करे। कषायों को कृश कर समाधिपूर्ण भाव वाला, फलक की भांति शरीर और कषाय-दोनों ओर से कृश बना हुआ भिक्षु समाधि-मरण के लिए उत्थित होकर शरीर को स्थिर-शांत करे।”

सूत्र-126 (वह संथारा करने वाला भिक्षु शारीरिक शक्ति होने पर) गांव, नगर, आश्रम, निगम, राजधानी आदि में जाकर घास की याचना करे। एकान्त में शुद्घ स्थान देखकर घास का बिछौना करे । बिछौना कर उस समय प्रायोपगमन (उत्तर ज्झयणाणि भाग-2) अनशन कर शरीर, उसकी प्रवृत्ति (उन्मेष-निमेष आदि) और गमनागमन का प्रत्याख्यान (अस्वीकार) करे।

सूत्र 127-वह अनशन सत्य है। उसे सत्यवादी वीतराग, संसार-सागर का पार पाने वाला, “अनशन का निर्वाह होगा या नहीं” इस संशय से मुक्त, सर्वथा कृतार्थ, परिस्थिति से अप्रभावित, शरीर को क्षणभंगुर जानकर, नाना प्रकार के परिषहों और उपसर्गों को मथकर, “जीव पृथक् है, शरीर पृथक् है” इस भेद विज्ञान की भावना तथा भैरव अनशन का अनुपालन करता हुआ क्षुब्ध न हो।

128-ऎसा करते हुए भी उसकी वह काल मृत्यु होती है।

129-उस मृत्यु से वह अन्त:क्रिया (पूर्ण कर्म-क्षय) करने वाला भी हो सकता है।

130-यह मरण प्राण-मोह से मुक्त भिक्षुओं का आयतन, हितकर, सुखकर, कालोचित, कल्याणकारी और भविष्य में साथ देने वाला होता है। ऎसा मैं महावीर कहता हूं।

“दिव्य और मानुषी-सब प्रकार के विषयों में अमूर्छित और आयुकाल के पार तक पहुंचने वाला भिक्षु तितिक्षा को परम जानकर, हितकर विमोक्ष-भक्त प्रत्याख्यान, इंगित मरण और प्रायोपगमन-में से किसी एक का आलम्बन ले।-ऎसा मैं कहता हूं।”

आचारांग सूत्र में बहुत विस्तार दिया गया है। संथारा-सल्लेखना को काल-मृत्यु और अहिंसा का दर्जा दिया गया है। इसी प्रकार सल्लेखना का महत्व व फल, प्रधानता, आवश्यकता, निषेध, यो ग्य अवसर अन्त समय की प्रधानता का कारण आदि विषयों पर शास्त्रों में प्रचुर सामग्री उपलब्ध है।

ऎसे धार्मिक विषयों पर न्यायालयों में चर्चा करते समय मात्र कानूनी दलीलों पर विश्वास नहीं करना चाहिए। धर्म का विषय आत्मा से जुड़ा होता है। आत्मा कभी मरता नहीं है। जड शरीर नश्वर है, अचेतन है। उसमें विचार करने की चेतना होती ही नहीं। तब आत्महत्या का विषय शरीर के नियंत्रण में भी नहीं रह सकता। अच्छा होता यदि इस फैसले से पूर्व कुछ धर्माचार्यों से चर्चा की जाती। क्योंकि ये प्रज्ञा के विषय हैं। धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार को सामाजिक नहीं, आत्मा के धरातल पर ही तय करना उचित होगा।

अप्रैल 16, 2014

जैन एकता… (4)

महावीर का अनेकान्त एक अनूठी देन है। इसका अर्थ है दिमाग में खुलापन, सबको स्वीकार करने का भाव, विश्वमैत्री का भाव। यही अहिंसा का मार्ग भी है। दूसरे की स्थिति को समझकर कार्य करना ताकि किसी का अहित न हो। हो सके तो दूसरे के हित या विकास में सहायक बनें। यही अहंकार मुक्ति का मार्ग है। इसी से क्रोध, मान, माया, लोभ बढ़ते हैं। इन्हीं के शमन के लिए चार महाव्रत क्रमश: अहिंसा, ब्रह्मचर्य, सत्य और अचौर्य की प्रतिष्ठा हुई। वेद, बौद्ध तथा जैन मतों में इन चारों का महत्व बराबर है। अपरिग्रह समय के साथ बदलने वाला व्रत है। बौद्ध इसे नशा मुक्ति कहते हैं। वेद में इसका स्थान दान ने ले रखा है।

अहंकार मुक्ति या अनेकान्त दृष्टि में व्यक्ति स्वयं को केन्द्र में नहीं रखता। गुठली की तरह जड़ बनकर जमीन में रहता है। उसे चिन्ता नहीं कि उसके फल कौन खाएगा। वह अपने भौतिक अस्तिžव के लिए जीता ही नहीं है। जिन्दगी इतनी जटिल है कि जब भी हम उसे एक कोने से पकड़कर आग्रह करने लगते हैं, तभी हमारा आग्रह झूठा हो जाता है, इसी आग्रह को एकान्त कहा है। जीवन के एक पहलू को पकड़कर उसे पूरे जीवन होने का दावा करे, वह एकान्तवादी है। महावीर कहते हैं कि सब कोने अगर देख लोगे तो यह दावा छूट जाएगा क्योंकि इसमें ऎसे कोने भी मिलेंगे जो विपरीत हैं। और वे भी इतने ही सही हैं जितना एक कोना सही है और तब यह दावा नहीं रहेगा।

अनेकान्त का अर्थ है जीवन के सब पहलुओं की एक साथ स्वीकृति, विरोधी दृष्टि ही नहीं है, सारे विचार जहां एक-दूसरे के परिपूरक हैं। हमारी सीमित दृष्टि के कारण विरोधी दिखाई पड़ते हैं।

इसी बात को हम दूसरी तरह देखते हैं। महावीर ने ईश्वर की सत्ता को नकारा। क्योंकि व्यक्ति इसमें परतंत्र हो जाता है। जीवन की नियंता ईश्वर हो जाता है। वेद भी “अहं ब्रह्मास्मि” का उद्घोष करता है। महावीर भी प्रत्येक व्यक्ति की आत्मा को परमात्म मानते हैं। वह सब कुछ करने में समर्थ एवं स्वतंत्र है। गीता में कृष्ण भी कहते हैं-“ममैवांशो जीवलोके…” जब मैं स्वयं ईश्वर का अंश हूं तो मेरा कार्य स्वयं अपने स्वरूप को समझना है। मैं यहां ओशो के उद्धृत करना चाहता हूं-“महावीर के परमात्मा की धारणा अस्तिžव की गहराइयों से निकलती है, बाहर से नहीं आती। इसी अस्तिžव में जो सार भूत विकसित होते-होते अन्तिम क्षणों तक विकास को उपलब्ध हो जाता है, वही परमात्मा है।” आज की पीढ़ी बुद्धिमान है अपने भविष्य के प्रति चिंतनशील भी है और किसी भी बात को बिना वैज्ञानिक विश्लेषण के स्वीकार नहीं करती। हम केवल अपने शास्त्रों के सहारे उसके मन में विश्वास पैदा नहीं कर पा रहे, यह एक सच्चाई है। न हम दूसरे धर्मो के हवाले से उसके तर्को का समाधान दे पा रहे हैं। उसके लिए आवश्यक है कि हमारे महाव्रत सकारात्मक तथा जीवनोपयोगी रूप में उसके सामने रखे जाएं। उसकी आज की आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाले दिखाई पड़े, ताकि धर्म का जो निषेधात्मक ढांचा आज खड़ा है, जो आज बच्चों को हमारी ओर आने में बाधक बनता है, इस ढांचे को देशकाल के अनुरूप बदला जाए। बच्चों की भाषा के नए साहित्य की सर्जना करनी होगी। छोटी उम्र से उनको संस्कारवान बनाने के प्रयास करने पडेंगे और इसके लिए हमें माताओं को भी इस दृष्टि से शिक्षित करना पड़ेगा । यह कार्य हमारे साधु-संत बहुत प्रभावी ढंग से कर सकते हैं। मीडिया भी इसमें अपनी पूर्ण भागीदारी निभा सकता है। वरना जिस तेजी से जैन धर्म संकुचित होता जा रहा है, विश्व की धार्मिक चर्चाओं से बाहर होता जा रहा है, तब इसके भविष्य के प्रति सदा ही आशंका बनी रहेगी। और इसके लिए आवश्यकता हो तो साधु-संतों के विदेश गमन का मार्ग खोलना होगा ताकि वे अपने सिद्धान्त पक्ष को वैश्विक स्तर पर रख सकें। विभिन्न धार्मिक आचार्यो के प्रश्नों का समाधान कर सकें। तब जाकर हम महावीर के सिद्धान्तों को विश्व के पटल पर प्रतिष्ठित कर पाएंगे। तब हमारी पीढ़ी महावीर को भगवान मानेगी। उनके आगे सिर झुकाकर गर्व कर सकेगी।

परमात्मा को पाने का, आत्म-साक्षात्कार करने का जो उपक्रम है, वही अपरिग्रह का मार्ग है। जो अनावश्यक है, उसे छोड़ते जाओ। शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा के लिए जो व्यर्थ है, छोड़ दो। अन्नमय, प्राणमय, मनोमय कोषों का परिष्कार करते जाएं। ये मन-वचन-काया के ही नाम हैं। इन तीनों संस्थाओं से करना, कराना और अनुमोदन करना बधकारक कहा है। इसी प्रकार जो हमारे पास नहीं है उसको पाने की लालसा भी हमारे मन में रहती है। पकड़ने की इच्छा हमारे असुरक्षा के भाव के कारण रहती है। जब चेतना को पता लग जाए कि चेतना के स्तर पर कोई असुरक्षा है ही नहीं, न भय, न पीड़ा, तब क्यों पकड़ेगा? कर्म के साथ यह पकड़ने का भाव ही बन्ध का कारण होता है। इस भाव को ही अंहकार कहा है। छोड़ने को त्याग नहीं कहते, छोड़ने के बोध को त्याग कहते हैं। जब हम कुछ छोड़ते हैं तब उसके पीछे छोड़ने की पकड़ रह जाती है। “मैंने यह छोड़ दिया।” इसे भी छोड़ देना है।

तवार्थ सूत्र में परिग्रह को मूच्र्छा कहा गया है। परिग्रह का अर्थ है वस्तु के प्रति ममत्व या आसक्ति का भाव रखना। मूच्र्छा का यह भाव केवल जड़-चेतन वस्तुओं तक ही सीमित नहीं रहता किन्तु अपने विचारों, भावनाओं और सिद्धान्तों के प्रति भी इतना सघन होता है कि अपने से भिन्न विचारों या सिद्धान्तों को सुनने के लिए तैयार नहीं होता। इसी कारण तो विश्व भी पूंजीवाद और साम्यवाद के समूहों में बंट गया। जब हम मूच्र्छा की व्याख्या करते हैं तो उसके व्यापक अर्थ में धन अर्जित करना, उसकी रक्षा करना, पशु, सम्पत्ति आदि तो इसकी परिधि में आते ही हैं लेकिन वासनाओं और कषायों को मन में पोषित करना भी एक तरह से भावनात्मक मूच्र्छा है। मूच्र्छा का अभाव ही अपरिग्रह है। कामना मुक्त होना ही मोक्ष है।

आत्मा के आन्तरिक गुण जैसे “ज्ञान एवं अन्तर्दृष्टि” परिग्रह भाव से मुक्त हैं। अपरिग्रह समत्व है, परिग्रह भोग की संस्कृति है। भगवान महावीर ने कहा था-“प्रमत्त मनुष्य इस लोक में अथवा परलोक में धन से त्राण नहीं पाता।” अंधेरी गुफा में जिसका दीपक बुझ गया हो, उसकी भांति अनन्त मोह वाला प्राणी पार ले जाने वाले मार्ग को देखकर भी नहीं देखता। जो मनुष्य कुमति को स्वीकार कर पापकारी प्रवृत्तियों से धन का उपार्जन करता है, ऎसे लोग धन को छोड़कर मौत के मंुह में जाने को तैयार रहते हैं। वे कर्म से बधे हुए मरकर नरक में जाते हैं। अज्ञानी मनुष्य ऎश्वर्यपूर्ण जीवन जीने की कामना करता है। वह अपने द्वारा कृत कामना की व्यथा से मूढ़ होकर विपर्याय को प्राप्त होता है। दु:ख को प्राप्त करता है।

महावीर के अनुसार हिंसा एवं परिग्रह को समझे बिना व्यक्ति धर्म को नहीं जान सकता। न संयम का विकास कर सकता है। वर्तमान परिस्थितियों में अपरिग्रह महत्वपूर्ण है। अहिसा तो इसी से निकलता है। विलासितापूर्ण जीवन तथा विकास के नाम पर होने वाले विनाश से बचने का एकमात्र उपाय है अपरिग्रह मूलक जीवन शैली। इसी से वहनीय विकास (सस्टेनेबल लिविंग) की संस्कृति का वैश्विक अभियान प्रारंभ हो सकेगा।

अप्रैल 15, 2014

जैन एकता… (3)

हम खाना खाते हैं, तब क्या हमारा ध्यान खाने में रहता है? क्या हम पांचों ज्ञानेन्द्रियों का उपयोग करते हैं खाने में? क्या हमें याद रहता है कि-जैसा खावे अन्न, वैसा होवे मन! न जाने कितने विचार चलते रहते हैं मन में, कि खाने के बाद क्या-क्या करना है। खाना किसने खाया, किसने बनाया, क्या कैसा बना, सब गौण हो गया। क्या यही स्थिति सामायिक-प्रतिक्रमण में नहीं रहती? हम वर्तमान के बजाए अतीत या अनागत में जीते हैं। ध्यान तो वर्तमान में जीने का नाम है। अतीत की स्मृतियां तथा अनागत की कल्पनाएं हमारे वर्तमान को ध्वस्त कर देती है। तब हम पांचों महाव्रतों की सूक्ष्मता को कैसे समझ सकेंगे। जब महावीर ने कही थी, तब कैसा युग था। आज वैसा क्या बचा है? संसार की भौगोलिक तथा भौतिकवादी तस्वीरें बदल चुकी हैं। हां, आत्मा का भाग, सृष्टि के सिद्धान्त वही हैं। आगे भी नहीं बदलने वाले। जरूरत इस बात की है कि हम महावीर की यात्रा से उस अन्तरात्मा के स्वरूप का विवेचन 21 वीं सदी की भाषा में कर सकें। उसकी सार्थकता मोक्ष मार्ग तथा लोक कल्याण में सहायक होने पर होगी। कर्मो की निर्जरा तथा नए कर्म बन्धनों से मुक्ति कैसे हो, यह बताना पड़ेगा।

जीवन में महावीर नि:श्रेयस तथा अभ्युदय के साथ-साथ वर्तमान जीवन की सफलता में भी सहयोग कर सके। साथ ही सिद्धान्त को सरल व्यवहार में ढालना पड़ेगा। वरन् व्यक्ति उनकी पालना भी नहीं कर पाएगा और झूठ भी बोलता रहेगा। चरित्र में यदि विरोधाभास हुआ तो अन्य समुदाय के लोग हम पर हंस भी सकते हैं। हमारा व्यवहार रूढ़ी बनकर न रह जाए। मेरी ही नई पीढ़ी मेरी ही बात नहीं मानेगी। उदाहरण के तौर पर साधु-संत कहते हैं कि गृहस्थ स्वयं के लिए खाना बनाएं और उसी में से हमको भी दें। ताकि हम हिंसा के निमित्त नहीं बनें। मेरा अनुभव है कि प्रत्येक बड़े चातुर्मास में सैंकड़ों चूल्हे केवल साधुओं के निमित्त ही यात्री जलाते हैं। गोचरी के लिए लगभग चालीस से अधिक निषेध लागू होते हैं। साधु-साघ्वियां आज फरमाइश करके जाते हैं कि अगली बार वे क्या ले जाना चाहेंगे।

महावीर तथा बुद्ध के काल में उपनिषदों की ज्ञान धारा प्रमुख थी, चरित्र गौण था। महावीर चरित्र को “अति” तक ले गए। शरीर शुद्धि के लिए तप अनिवार्य कर दिया। अन्न के साथ ही मन की शुद्धि भी जुड़ी ही है। उपनिषद् में आकाश को छोड़कर शेष चार महाभूतों को देवता माना जाता था। महावीर ने इनमें जीव तत्व सिद्ध कर दिया। कह दिया कि किसी भी “काय” की हिंसा नहीं करनी चाहिए। व्यक्ति कभी भी किसी तत्व रूप में पैदा हो सकता है। इसी प्रकार उपनिष्द् आत्मा को पवित्र ही मानते हैं। महावीर ने इसको नकार दिया। उन्होंने कहा कि यदि शुद्ध होती तो जन्म ही क्यों लेती। आत्मा को अच्छा-बुरा कर्म बांधता है। फल की इच्छा इसका कारण है। अत: आत्मा में बस स्थित रहना है। दूसरे के स्थान पर खड़े होकर सोचना ही अनेकान्त है।

आज सम्यक् दृष्टि की आवश्यकता है। तभी हम अहिंसा, अनेकान्त, अपरिग्रह जैसे आधार भूत व्रतों को यथार्थ में समझ सकेंगे। भोगोपभोग परिमाण व्रत की सीमा बांध सकेंगे। इसके अभाव में हमारी शक्ति भी क्षीण होगी तथा पराधीनता बढ़ेगी। मन तथा शरीर कमजोर होते चले जाएंगे। बल तो शान्ति की साधना से मिलता है। आत्मा तो शाश्वत है। तप के द्वारा नश्वर का त्याग करना होता है। यही से अपरिग्रह शुरू हो जाता है। हमारे दु:ख का कारण भी हमारी दु:खों से भागने की मानसिकता ही है। हम सदा सुखों के बारे में एक अभावग्रस्त मानसिकता रखते हैं। जड़ पदार्थो में सुख कहां मिल सकता है। शरीर के बाहर सुख कैसे प्राप्त कैसे होगा। पदार्थो के पीछे भागना बन्द हो तो जन्म-जन्म का भागना भी बंद हो जाएगा। यही मोक्ष है।

क्रमश:

अप्रैल 14, 2014

जैन एकता… (2)

महावीर जयन्ती के अवसर पर आपसे प्रश्न करना चाहता हूं कि भगवान महावीर का दर्शन आपके दैनिक जीवन में कितना जुड़ा है। जितने भी बुजुर्ग श्रावक-श्राविकाएं यहां विराजमान हैं, क्या वे अपनी तीसरी पीढ़ी को महावीर से जोड़ पाए। एक भी “हां” कहने की स्थिति में नहीं है। यही जैन धर्म का भविष्य है। सुनने में जरूर कड़वा लगता होगा। अब दूसरा प्रश्न यह है कि क्या जो कुछ हो रहा है, उसे होने देना है अथवा हमें कुछ करना चाहिए। आज स्थिति यह हो रही है कि हम अपने धर्म के बारे में अजैनों को सच बता ही नहीं पा रहे। कहते कुछ हैं और करते कुछ और ही हैं।

आज अपने पोते को मैं किसी साधु के पास ले जाऊं तो उनके प्रश्नों की और निषेधों की सूची देखकर मैं हतप्रभ रह जाता हूं। प्रश्नों के उत्तर तो पोता नकारात्मक ही देगा। निषेधों की सूची सुनकर वह फिर कभी नहीं लौटेगा। वह तो टीवी, इण्टरनेट से जुड़ा है। उसका अपना एक वातावरण है। उसके अपने सपने हैं, जिनसे वह कभी समझौता करने वाला नहीं है। उसके मन में किसी समाज व्यवस्था का भार या भय भी नहीं है। उसे तो बस अपने कॅरियर की चिन्ता है। नौकरी मिली कि घर छूटा। तीन-चार पीढ़ी के बाद कौनसा समाज और कौनसा धर्म रहेगा?

एक रास्ता है। धर्म को, महावीर को शास्त्रों से बाहर निकालें। एक व्यवहार गत स्वरूप तैयार किया जाना चाहिए। सिद्धान्त जैन धर्म के हों तथा व्यवहार 21 वीं सदी का। आत्मा शाश्वत है तो सिद्धान्तों से जुड़ी रहे, व्यवहार देश, काल के अनुरूप बदलता रहे। जो सूर्यास्त से पूर्व घर ही नहीं पहुंचे अथवा जिसकी नौकरी ही रात्रि की हो, तो उसे रात्रि भोजन की छूट अधिकारिक रूप से मिल जाए। ऎसा न होने पर अजैन आपके रात्रि भोजन के नियम पर हंसेंगे। इसी तरह महाव्रतों की पालना के मानदण्ड नए सिरे से बनाए जाने चाहिए। भौतिकवाद के युग में परिग्रह की पुरानी परिभाषा नहीं ठहर सकती। महावीर के युग में न बिजली थी, न उपकरण। न उन्नत विज्ञान ही था, न नौकरी आधारित शिक्षा। जीवन में कहीं कृत्रिमता नहीं थी। विचारों से उद्दण्ड लोग तो उस युग में भी थे। महावीर ने कभी किसी के कार्य की प्रतिक्रिया नहीं की। उस युग में तो आचरण के अलावा था क्या? उन्होंने किसी को शत्रु नहीं माना। त्याग के अर्थ में अनावश्यक को कभी छुआ नहीं। प्रत्येक व्यक्ति में परमात्मा है। सब स्वतंत्र जीव हैं। अत: ईश्वर-नियन्ता की सत्ता को स्वीकार नहीं किया। पराधीनता का बोध कराती रहती है।

आज जैन धर्म का रूप जातिगत हो गया। एक तरह से सम्प्रदायवाद का पोषण कर रहे हैं। कट्टरवाद भी फैल रहा है। भौतिकवाद, क्षेत्रवाद, भाषा की भूमिका, सन्तों की शिक्षा, नई पीढ़ी का विश्वास आदि में एक तरह का बिखराव दिखाई पड़ रहा है। अन्य धर्मो में भी जैन धर्म के अनुयायियों के प्रति प्रश्न उठने लगे हैं। सम्यक् ज्ञान, सम्यक् दर्शन तो सब सिद्धान्त रूप में ज्यों के त्यों हैं। व्यवहार में तो सम्यक् चरित्र ही दिखाई पड़ता है। वहां हम शाम को प्रतिक्रमण करते हैं, दिन में अतिक्रमण करते हैं। बहुत अन्तर है कथनी और करनी में। इससे मेरी तीसरी पीढ़ी को ही विश्वास नहीं जैन धर्म में।

जैन धर्म भी बौद्ध धर्म के समकालीन था ही। बौद्ध धर्म का प्रसार लगातार बढ़ रहा है। जैन धर्म संकुचित होता जा रहा है। कट्टरवाद का उदाहरण तो इतना ही काफी है कि हर मंगलपाठ/मांगलीक के अन्त में हम कहते हैं-“ये चार शरणा, मंगल करना, और न शरणा कोय।” क्या अर्थ हुआ इसका? यही न कि जैन धर्म ही सर्वश्रेष्ठ है? क्या यही महावीर का अनेकान्त दर्शन है? तब हम अन्य धर्मो को कैसे स्वीकार करेंगे। उनके सिद्धान्तों पर क्यों कर शोध करने वाले! हम तो महावीर के ही अन्य अनुयायियों को नहीं मानते। एकमत भी नहीं हैं। अर्थात, हमने अपने दरवाजे बन्द कर लिए हैं। हमारा कोई साधु कुरान या बाइबिल पर बात नहीं करता। अब तो महावीर का विवेचन भी कम होता जा रहा है। प्राकृत या पाली से उद्धृत कर देते हैं। नई पीढ़ी को क्या लेना-देना। दूसरी बात यह भी है कि हमें उनके जीवन की सांसारिक घटनाओं के बजाय आत्मा से जुड़े विचारों को समझने की आवश्यकता अधिक है।

बाहरी जीवन इतिहास है। अंतर्जीवन दृष्टि है। भीतर चेतना है। उसकी गति, दिशा, रूपान्तरण, विकास आदि अधिक महत्वपूर्ण है। भीतर-बाहर का सीधा एक ही सम्बंध है कि भीतर चेतना है, बाहर स्वप्न है, नश्वर, परिवर्तनशील सृष्टि है। बाहर का जीवन सबका भिन्न-भिन्न, भीतर का सब एक जैसा। महावीर, जीसस, बुद्ध। इतिहास यानी तथ्य, दृश्य, संग्रह योग्य। भीतर की-पुराणों से-जो पढ़ेगा, उसके भीतर भी कुछ तो घटेगा। ऎसे उदाहरणों के अर्थ परोक्ष और गहरे होते हैं।

प्रत्यक्ष में तो धर्म भी बन्धन दिखाई देता है। एक आचार्य से पूछा कि संसार के बन्धनों में तथा संन्यास के बन्धनों में क्या भेद है। संन्यास के नियम तो ज्यादा कठोर है। कहने लगे यह तो धर्म का मार्ग है-मोक्ष मार्ग है। मेरा प्रश्न था कि मार्ग तो मंजिल आने पर छूट जाता है। आप तो अन्तिम श्वास भी इन्हीं बन्धनों में लेते हो। सम्प्रदाय तक नहीं छूटता। यहां तक कि मरने के बाद श्रावकों के लिए भी जैन श्मशान अलग होते हैं। शव भी मुक्त कहां हुए? तब आचार्य जी ने अपने सभी सन्तों को बुलाकर मेरे प्रश्न को दोहराया। कुछ ही दिनों बाद उन्होंने सार्वजनिक रूप से घोषणा कर दी कि अब मेरे किसी तरह का भी बन्धन नहीं रहेगा। वे नीचे सभा में आकर बैठ गए। हमें महावीर के सूत्रों को गहरे में समझना होगा। उद्धृत करने से काम नहीं चलेगा। हमारी आज यही मूल समस्या बन गई। आप किसी भी साधु-साध्वी से पूछो कि अहिंसा क्या है, तो वे तुरन्त हिंसा पर बोलना शुरू कर देंगे। पूछो अपरिग्रह क्या है, तो परिग्रह की चर्चा शुरू कर देंगे। प्रश्न उठता है कि क्या हमारे महाव्रत नकारात्मक शैली में घड़े गए हैं? हम सामायिक करते हैं, प्रतिक्रमण करते हैं, ध्यान करते हैं, तब क्या किसी ने हमको समय में रहना सिखाया है? निश्चेष्ट होने का मर्म हमारी शिक्षा का अंग रहा है। यही कारण है कि हम वर्तमान में जीना ही नहीं जानते। जो अब तक किया, उस कारण यहां तक पहुंचे। अब जो करेंगे, वही हमारा भविष्य होगा।

क्रमश:

अप्रैल 12, 2014

जैन एकता का प्रश्न… (1)

बातें तो हम राष्ट्रीय एकता और अखण्डता की करते हैं लेकिन देश कहीं से भी एक और अखण्ड दिखाई नहीं देता। कहीं जाति और धर्म के नाम पर, कहीं भाषा और क्षेत्र के नाम पर तो कहीं आरक्षित और गैर आरक्षित के नाम पर, हम हर तरफ से बिखरे और बंटे हुए दिखाई देते हैं। कैसे एक हों, हम कहां से और कैसे शुरूआत करें, सबके सामने यह प्रश्न बड़ा है। शुरूआत सबसे छोटी इकाई समाज से करनी होगी, फिर हम देश तक पहुंच पाएंगे। पहले एक-एक कर सारे समाज आपसी विवादों को खत्म करें, फिर समाजों को जोड़ें, इसी से राष्ट्रीय एकता की मंजिल तक पहुंच सकते हैं। राजस्थान पत्रिका समूह के प्रधान सम्पादक गुलाब कोठारी देश की एकता-अखण्डता से लेकर राष्ट्रीय राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक मुद्दों पर खुल कर लिखते रहे हैं। जैन समाज को अल्पसंख्यक दर्जे पर उनके विचारों को सुनने के बाद अनेक पत्र आए हैं जिनमें जैन समाज की एकता पर उनके विचार चाहे गए हैं। कल महावीर जयन्ती है। आज प्रस्तुत है जैन समाज की एकता पर यह आलेख। एकता के यही सूत्र सभी समाजों और राष्ट्र पर लागू होते हैं।

पत्र -1

महोदय,
केन्द्र सरकार की ओर से हाल ही में जैन समाज को अल्पसंख्यक का दर्जा दिया गया है। मैं पत्रिका के माध्यम से यह जानना चाहता हूं कि जैन एकता को लेकर आपके क्या विचार हैं। जैनों को अल्पसंख्यक का दर्जा दिए जाने को लेकर आप अपने विचार से अवगत कराएं।
भानमल जैन,
टोंक फाटक, जयपुर

पत्र -2

महोदय,
जैन समाज को देश में अल्पसंख्यक का दर्जा दिया गया है। समाज को इस नई पहचान के मामले में विचारों से अवगत कराने की कृपा करें। जैन समाज की एकता पर भी प्रकाश डालें।
धन्यवाद!
पीयूष जैन,
महेश नगर, जयपुर

पत्र -3

महोदय,
देश में जैन समाज को भी अल्पसंख्यक मान लिया गया है। मन में उथल-पुथल है कि केन्द्र सरकार का यह निर्णय कल्याणकारी है या भेद करने वाला। बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक वर्गीकरण ही है, इसलिए इन वर्गो में खाई की आशंका भी है। स्वयं की सोच को दिशा देना चाहता हूं इसलिए कृपया इस विषय पर अपने विचार बताएं।
धन्यवाद!
एस.सी. जैन,
बेंगलूरू

एकता हर हाल में शक्ति ही होती है। कहावत है कि बन्धी बुहारी लाख की, बिखर जाए तो खाक की।

जैन एकता की चर्चा बचपन से ही सुनता आया हूं। श्वेताम्बर-दिगम्बर की दीवार बहुत चौड़ी होती जा रही है। सम्मेद शिखर तीर्थ को लेकर कोर्ट में जो मुद्दा चला, जिस तरह राजनीति का सहारा लिया गया, उसमें जैनों के विखण्डन का सूत्रपात ही हुआ। जैनों का एक धड़ा बहुत गौरवान्वित हुआ था। पुराने-पुराने मन्दिरों में तनाव व्याप्त हो गया था। आसरों के लिए झगड़े होने लगे थे। आज भी आरक्षण के मुद्दे पर जैन समाज बंटा हुआ है। अल्पसंख्यक घोषित होने के बाद भी समाज तो दो धड़ों में बंटा हुआ ही है। एक धड़ा स्वयं संतुष्ट है, दूसरा अपमानित महसूस कर रहा है। इस दर्द को “विजयी” धड़ा महसूस भी नहीं करना चाहता। जिन मन्दिरों के नामों के साथ में दिगम्बर या श्वेताम्बर जुड़ा हुआ है, वहां उनके अपने पर्वो पर ही भीड़ लगती है। साधारण दिनों में कोई एक-दूसरे के मन्दिर में भी नहीं जाता। हमने तो यहां तक देखा है कि एक सम्प्रदाय के श्रावक अन्य सम्प्रदाय के सन्तों के दर्शन को भी नहीं जाते थे। प्रणाम तक नहीं करते थे।

आज तो जैन धर्म भी महावीर प्रधान होने के साथ व्यक्ति प्रधान भी होने लगा है। न तो आज सारे श्वेताम्बर एक आचार्य को मानने को तैयार, न ही सारे दिगम्बर एक आचार्य की निश्रा में चलने को राजी होने वाले। दर्जनों आचार्य, उनके अपने-अपने महावीर के दर्शन की व्याख्या। अपने-अपने पोस्टर, वीडियो और राजनेता। वर्ष भर में महावीर से ज्यादा उनकी जयन्तियां और समारोह। सबके साथ उनके सांसारिक स्वजन जुड़ने लगे। त्याग का स्थान ट्रस्टों ने ले लिया। सामाजिक, धार्मिक गतिविधियों में इनका सीधा दखल होने लगा है। विभिन्न बोलियों में धन इकटा करने का नजारा देखते ही बनता है। किसी ने यदि जैन एकता का अभियान चला दिया तो इन सब आचार्यो के समक्ष अस्तित्व का प्रश्न खड़ा हो जाएगा। मुंह से कुछ भी कह लें, मानेगा कोई नहीं। इनका अहंकार महावीर को भीतर प्रवेश ही नहीं करने देता। अत: अपने-अपने घेरे में जीते हैं।

आचार्य विनोबा भावे ने एक प्रयास किया था। जैन एकता के लिए। जिनेन्द्र वर्णी जी से आग्रह करके “समण सुत्त” लिखवाया गया। सभी मतों के जैनाचार्यो को पढ़ाया गया। उनकी सम्मति ली गई। सबने ग्रन्थ को स्वीकार किया। आज तक किसी ने उपयोग ही नहीं किया। यह स्वयं में एकता का श्रेष्ठ उदाहरण बन गया। आचार्य पद स्वयं में सत्ता सूचक भाव है। सिद्धों और अरिहन्तों को किसने देखा है। आचार्य ही शीर्ष पद है। ऎसा कई बार होता रहा है कि कोई सन्त विभिन्न कारणों से किसी सम्प्रदाय से छिटक कर नया सम्प्रदाय और नया आचार्य बना लेते हैं। अब तो आचार्य पद और भी चकाचौंध वाला होता जा रहा है। क्योंकि धर्म के साथ राजनेता और धन जुड़ता जा रहा है।

जैन समाज की नई पीढ़ी किधर जा रही है? क्या महावीर की वाणी का मर्म इसके मन में अंकित है। संस्कारों के प्रति इस पीढ़ी के मन में क्या अवधारणा है! टीवी, इण्टरनेट, मोबाइल फोन के सहारे अकेला जीना इनके स्वभाव का अंग बनता जा रहा है। कॅरियर की पकड़ जीवनशैली पर बहुत ही मजबूत है। भौतिकवाद का सपना भी इनको महत्वाकांक्षी बना रहा है। दृष्टिकोण उदारवादी होता जा रहा है। लेकिन खण्ड-खण्ड दिखते समाज की एकजुटता के लिए आवश्यक उदारता का नितान्त अभाव है। अकेला जीने वाला व्यक्ति कभी समूह में सहज नहीं रहेगा। माता-पिता के साथ आज भी साधु-सन्तों के या मन्दिर में नियमित नहीं जा रहा। शास्त्रों का नित्य पाठ नहीं कर रहा। उसके मन में धर्म के प्रति वैसा आकर्षण या प्रगाढ़ श्रद्धा नहीं है, जैसी पिछली पीढियों में थी। अत: आसानी से वह अजैनों जैसा व्यवहार भी कर लेता है। तब जैन एकता का झण्डा कौन उठाएगा? माता-पिता की स्वयं की कथनी और करनी में बहुत अन्तर है। पहली समस्या जैन होने की है। एकता बहुत आगे की बात है।

कभी अभियान चला करते थे कि हमें अपने नाम के आगे जैन लिखना चाहिए। गौत्र से महत्वपूर्ण स्थान जैन होने का मानते थे। आज “अल्प संख्यक” बनने के बाद हजारों लोग नाम के आगे जैन लिखना ही बन्द कर देंगे। वे अल्प संख्यक नहीं कहलवाना चाहते। न ही उनके साथ दिखाई पड़ना चाहते हैं। उनको देने वालों की श्रेणी में रहना उचित लगता है, लेने वाले नहीं बनना चाहते। नई शैली में जैन-अजैन एक जैसे होते जा रहे हैं। खान-पान, पहनावा, संस्कृति, मूल्य आदि एक जैसे होते जा रहे हैं। अभी तो पहला प्रश्न जो जड़ से जुड़ा है, वह यह है कि दो-तीन पीढियों के बाद समाज का समूह रूप रहेगा या लु# हो जाएगा। क्या धार्मिक संस्थाओं की प्रतिष्ठा आज की तरह बनी रहेगी? एकता की बात तो शुद्ध दिखावटी है। अन्तर्जातीय विवाह, अन्तर्जातीय खान-पान जैन परिवारों में प्रवेश कर चुका है। संस्कृति और धन में मित्रता हो चुकी है। मेल-बेमेल एक हो चुके हैं।

धर्म का कार्य मुक्त करना है। सम्प्रदाय बान्धने का कार्य करते हैं। टुकड़े करने का सारा श्रेय या तो राजनेताओं को जाता है, या फिर धर्माचार्यो को। आज धर्म के नाम पर भी राजनीति करने की बात कई आचार्य कर रहे हैं। चुनावों में जैनियों को टिकट कितने मिलने चाहिए, यह चर्चा का विषय धर्मसभाओं में सुनाई देने लगा। अब तो जो मिलेगा, अल्पसंख्यक कोटा में मिलेगा। अब तक तो जैन मुख्य धारा में थे।

एक समय था जब वीतरागता के भावों की प्रबलता के कारण एक गृहस्थ साधु बनता था। आज? साधुओं में वीतरागता का स्थान राग-द्वेष ने ले लिया। यही खण्डन के कारण बन गए। वीतरागता में झगड़ा-संघर्ष संभव नहीं है। तीर्थकरों को भी लोगों ने कम परेशान (उपसर्ग) नहीं किया था, किन्तु उन्होंने प्रतिक्रिया नहीं की। आज तो आचार्यो की वीतरागता की परिभाषा ही बदल गई। यह भी रिकार्ड पर है कि लगभग पचास वर्ष पूर्व एक जैनाचार्य का चित्र खींचने पर कैमरा तोड़ दिया गया था। कैमरामैन की पिटाई की गई। चित्र लेने को आत्म प्रदर्शन की संज्ञा थी। बाद में उन्हीं के सैकड़ों वीडियो बन गए। प्रश्न यह भी है कि ऎसे में समाज की जिम्मेदारी क्या? इसके बिना एकता की बात?

वस्तु स्थिति यह भी है कि शास्त्रों में कहीं भी “जैन” शब्द की परिभाषा नहीं दी गई। अत: जैन के घर जन्मा वही जैन। तब जैन धर्म न होकर एक जाति बन गया। परिभाषा सदा अतिव्याप्ति, अव्याप्ति तथा असंभव से परे होती है। यहां नहीं है। तब एकता किसकी? साधुत्व ही जैनों का लक्षण है। यहां एकता की बात का अर्थ क्या? एकता सदा किसी के विरोध में होती है। जैनों का अनेकान्तवाद सारे भेद मिटाकर सौहार्द बनाए रख सकता है। जहां तक मन्दिर आदि सम्पत्तियों के मुद्दे हैं, एक सेवानिवृत्त जजों की समिति इन्हें निपटा सकती है। इसमें दोनों तरफ के जज हो सकते हैं। एक-दो अजैन भी हो सकते हैं।

सामाजिक पहचान और शक्ति एकता से ही प्राप्त होते हैं। यह कार्य आचार्य नहीं करेंगे। वे तो अन्य सम्प्रदाय के सन्तों को साधु भी नहीं मानते। नियम ही ऎसे हैं। साधु का छठा गुण स्थान होता है। चारों सम्प्रदाय के साधुओं के महाव्रतों का स्वरूप भिन्न होता है। एकता संभव नहीं है। हां, व्यवहार में सौहार्द प्रकट कर सकते हैं। व्रत बल पूर्वक थोपे नहीं जा सकते। ज्ञान और श्रद्धा तथा चारित्र में भी बल वांछित नहीं है।

एकता का कार्य युवा ही कर सकता है। वहां किसी प्रकार के तात्विक भेद भी नहीं होते। समाज के प्रतिनिधि भी युवा ही होते हैं। पहचान की जरूरत भी इन्हीं को होती है। ये सब मिलकर अपनी नई “आचार संहिता” बना सकते हैं। आचार्यो की सलाह काम नहीं आएगी। वैसे भी हमारे यहां आचार्यो की कोई परिभाषा नहीं दी गई। न उनके अधिकार एवं उत्तरदायित्व की कोई स्पष्टता है। तभी तो वे स्वयं को धर्माचार्य कह रहे हैं और हम एक जाति की तरह व्यवहार कर रहे हैं। आचार्यगण वीतरागता से विमुख होते जा रहे हैं। हमें उनसे भी बात करनी चाहिए। उनकी स्वीकृति से एकता को बल ही मिलेगा। आज तो सन्त हमें खुला छोड़ने को तैयार ही नहीं हैं। यह उनकी ही कमजोरी है। इसी तरह से मीडिया भी उनकी कमजोरी हो गया है।

धर्म को सकारात्मक रूप देना पड़ेगा। अ-हिंसा, अ-स्तैय, अ-परिग्रह की व्याख्या सहज नहीं होती। निषेध भी परोक्ष भाव में ही परोसे जाएं। वरना, बच्चे दुबारा नहीं आएंगे। सबको मिलकर एक रूप में ही महावीर को ग्रहण करना होगा। प्रसारण करना होगा। तब जाकर सामाजिक-आर्थिक पहचान की अन्य धर्म-समुदायों में प्रतिष्ठा बढ़ेगी। आज उनमें जगह बनाना हमारी प्राथमिकता नहीं है। अपने समाज के कमजोर वर्ग को भी आज हमने ऊपर उठाना छोड़ दिया। दानदाता मन्दिरों के जरिए सन्तों का राजनीतिक लाभ उठाने लग गए। सरस्वती पुत्र तैयार करना बन्द हो गया। शास्त्रों पर शोध बन्द-सा हो गया-वैज्ञानिक विवेचन होता ही नहीं।

युवा एकता की पहली शर्त यह है कि हमारे प्रयास वर्तमान शैली के अनुरूप हों। नहीं तो भागीदारी नहीं होगी। अब जब अल्पसंख्यक श्रेणी का लाभ उठाना है तो बिना एकजुटता के संभव ही नहीं होगा। सामाजिक कार्यो के स्वरूप एकता का प्रमाण बनें, जरूरी हैं। नई पीढ़ी की आवश्यकताएं, चिन्तन, कॅरियर तथा जीवन शैली बिना किसी आलोचना के समाहित की जानी चाहिए। तभी हम शैक्षणिक नेतृत्व भी दे पाएंगे। छोटे-बड़े का भेद मिटा पाएंगे। धर्म के प्रति आस्था का नया प्रवाह तथा गति पैदा कर पाएंगे। तीर्थो का सामूहिक उत्तरदायित्व, नई पीढियों को जोड़े रखने के लिए तदनुरूप साहित्य का निर्माण जैसे कार्य हो सकेंगे। कुल मिलाकर युवा वर्ग को संकल्प करना होगा कि नई चेतना की जाग्रति के साथ विश्व में जैन दर्शन का प्रकाश फैलाएंगे।

क्रमश:

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