Gulabkothari's Blog

जनवरी 1, 2017

एक म्यान में दो तलवार

पिछले तीन दिनों में उत्तर प्रदेश और अरुणाचल, दो राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पार्टी से निष्कासित करने की घटनाएं हुईं। यूपी में सपा ने अखिलेश का निष्कासन वापस ले लिया लेकिन अरुणाचल में बर्खास्त मुख्यमंत्री ने भाजपा में शामिल होकर राज्य की पहली भाजपा सरकार बनवा दी। ऐसे ही प्रयास पूरे के पूरे दल को भाजपा से जोडऩे के मणिपुर और उत्तराखण्ड में हो चुके हैं। राज्यपालों की संख्या तो और भी बड़ी है। देश में भाजपा के इस, लोकतंत्र की छवि का मीडिया आकलन करना नहीं चाहता। क्या ये घटनाएं उसकी नजर में गंभीर नहीं हैं। यह तो तस्वीर का एक पहलू है। उत्तर प्रदेश की घटना का परिप्रेक्ष्य कुछ दूसरा भी है। अमरसिंह की भूमिका को भी पूरी तरह संदिग्ध ही माना जा रहा है। घर में फूट हो तो कोई भी भितरघात कर सकता है। कृष्ण कह गए हैं कि, समय परिवर्तनशील है। जिस दिन मैंने राजस्थान पत्रिका का कार्यभार संभाला, उसी दिन श्रद्धेय बाबू साहब ने एक संकेत किया था-‘एक म्यान में दो तलवारें नहीं रह सकतीं। जिस दिन मैं 60 साल का हुआ, मैंने पत्रिका के पाठकों से विदा मांग ली थी। जिस दिन तुम साठ साल के हो जाओ, उस दिन तुम्हें भी यही करना है। तुम इस गलतफहमी में मत रहना कि तुम्हारे बिना पत्रिका नहीं चलेगी। पत्रिका के परिवर्तन को तब तुम संभाल नहीं पाओगे।’

समाजवादी पार्टी की आज वही स्थिति है। अभी तक मुलायम सिंह को भी यही गलतफहमी है कि सपा उनके बिना नहीं चल पाएगी। अखिलेश, उनको अभी बच्चा लगता है। अपने पुराने विश्वास पात्रों की सलाह पर उन्होंने अखिलेश का पार्टी से निष्कासन कर दिया। यह निर्णय अखिलेश के लिए एक स्वर्णिम अवसर बन गया। कहां तो सपा टूटने के कगार पर थी और कहां अखिलेश ने कांग्रेस और रालोद को साथ लेकर विजय का एक तरह से जयघोष कर डाला। मुलायम सिंह और शिवपाल न केवल दंग रह गए बल्कि समय की धारा को अखिलेश के पक्ष में जाते देखकर घुटने टेक दिए। शक्ति प्रदर्शन में जहां अखिलेश के खेमे में 198 विधायक खड़े थे, उसके मुकाबले नेताजी उर्फ मुलायम सिंह के यहां कव्वे उड़ रहे थे। इससे ज्यादा और क्या किरकिरी हो सकती है। अपनी बात को ढकने के लिए एक चर्चा यह चला दी गई कि, यह तो मुलायम सिंह की रणनीति ही थी जिससे कि खराब छवि के लोगों को अखिलेश से दूर किया जा सके। पर यह चर्चा काम नहीं आई। भीष्म पितामह के हाथ तो बंधे ही रहेंगे।

मुलायम सिंह कितने भी अनुभवी हों, उनके सम्पर्क कितने भी मजबूत क्यों न हो, अब वे ‘सक्रिय राजनीति’ में रहने की स्थिति में नहीं हैं। उन्हें आज भी अपनी परिस्थिति का आकलन करना चाहिए। भारतीय पुरा-शास्त्रों के निर्देशों को समझना चाहिए और उससे भी आगे इस तथ्य को हृदयंगम कर लेना चाहिए कि, जब तक वे शीर्ष पुरुष के रूप में सपा में निर्णय करते रहेंगे, तब तक अखिलेश हर निर्णय के लिए उनकी ओर ही देखते रहेंगे। वह पूर्ण आत्मविश्वास के साथ स्वयं निर्णय नहीं ले पाएंगे। मुलायम सिंह के लिए तो उचित यही है कि वे अपनी मर्जी से पद का त्याग कर दें। ससम्मान यह पद अखिलेश को सौंप दें और स्वयं एक सलाहकार की भूमिका निभाएं। यह बात मैं वंशवाद को बढ़ावा देने के लिए नहीं लिख रहा पर आज की स्थिति में तो इसका विकल्प भी नहीं है। अखिलेश अपनी सूझ-बूझ से पहले भी दो-तीन बार मुलायम सिंह को मात दे चुके हैं।

सपा के दो फाड़ होने की खबर से भाजपा ने अवश्य दिवाली मनाई होगी। किन्तु अब तो उसके लिए परिस्थितियां पहले से अधिक विकट होती नजर आ रही हैं। अब भाजपा को न तो सपा से सीधा लडऩा पड़ेगा, ना ही कांग्रेस से। यदि राहुल गांधी और जयंत चौधरी का अखिलेश से गठबंधन तय हो जाता है तब उत्तर प्रदेश का चुनाव एक त्रिकोणीय संघर्ष रह जाएगा। भाजपा को सरकार तक पहुंचने के लिए एक ही मार्ग उपलब्ध होगा। जिस प्रकार उसने जम्मू एवं कश्मीर में सिर झुकाकर पीडीपी के साथ हाथ मिलाया और सरकार में शामिल हो गए। ऐसा एक और अवसर भाजपा के सामने है। उत्तर प्रदेश में भी भाजपा सत्ता तक पहुंच सकती है, क्योंकि स्वतंत्र रूप से आज भी भाजपा के पास सिवाय नरेन्द्र मोदी के कोई दूसरा चेहरा नहीं है। सबक लेने के लिए बिहार के चुनाव परिणाम भी उसके सामने हैं। भाजपा यह खतरा क्यूं कर मोल लेगी। पर बिना चेहरे के कौन अखिलेश और मायावती को चुनौती देगा, यह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। सपा के चौबीस घंटे के इस भूकम्प ने चुनाव के सारे समीकरण बदल दिए।

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दिसम्बर 24, 2016

जंग हारे जंग

एक बार बुद्ध ने रत्नाकर डाकू से पूछा कि, तू यह सारे पाप किसके लिए करता है? उसने उत्तर दिया-अपने परिवार के लिए ! बुद्ध का दूसरा प्रश्र था कि क्या तेरे इन पापों का फल परिवार वाले भी बांटेंगे? इस प्रश्र को रत्नाकर ने अपनी पत्नी एवं पिता के सम्मुख रख दिया। उन्होंने कहा कि, हम तेरे कर्म में सहायक अवश्य हैं किन्तु तुम्हारा किया तो तुम ही भोगोगे। रत्नाकर जिंदगी की जंग हार गया। ठीक वैसे ही दिल्ली के उपराज्यपाल नजीब जंग अनगिनत ज्यादतियों के साथ अपने राजनीतिक जीवन की यह जंग हार बैठे। अचानक गुरुवार को उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। कह नहीं सकते कि, देश में किसी को भी इस दुर्घटना पर अफसोस हुआ हो। अपने कार्यकाल में उन्होंने भी चमड़े के सिक्के चलाने का वैसा ही प्रयास किया जैसा कि, भिश्ती ने एक दिन का बादशाह बनकर किया था।

नजीब जंग को जुलाई 2013 में यूपीए सरकार ने दिल्ली का उपराज्यपाल नियुक्त किया था। इससे पूर्व वे जामिया-मिलिया विश्वविद्यालय के उपकुलपति थे। मूलत: आईएएस अफसर रहे जंग ने उपराज्यपाल के रूप में जिस तरीके के आदेशात्मक प्रहार दिल्ली सरकार पर किए, उसने तो मथुरा के कंसराज की याद दिला दी। उनका वश चलता तो वासुदेव की तरह केजरीवाल को भी कारागार में ठूस देते। कितने घटनाक्रम सामने आए, सुनकर लगता ही नहीं कि नजीब लोकतंत्र के प्रतिनिधि थे। राजतंत्र में तो वैसे भी कोई किसी का सगा नहीं होता। फिर नजीब ने तो लोकहित की बड़ी-बड़ी योजनाओं (देवकी पुत्र) की निर्मम हत्याएं कम नहीं की। जंग ने अपने व्यवहार से यह तो साबित कर ही दिया कि, वे किसी शहंशाह से कम नहीं हैं। तब उनका बेआबरू होकर जाना, प्रकृति के कानून सम्मत ही है। देश के इतिहास में, उनका लिखा काला पन्ना, आने वाली पीढिय़ों के लिए एक नजीर रहेगा।

एक कहावत है कि, जो चोर होता है, उसको सारे लोग चोर ही नजर आते हैं। संत को कोई बुरा नहीं लगता। दिल्ली सरकार के प्रथम गठन के साथ ही उस पर जंग की नजर लग गई थी। जंग ने अरविंद केजरीवाल को एक सौत की तरह ही मानकर व्यवहार किया। दूसरे चरण में तो जंग दोनों हाथों में तलवारें लेकर मानो सड़क पर ही उतर आए। मानो यह उनका निजी स्वार्थ था। अफसरों की नियुक्ति को लेकर तो आए दिन फाइलें लौटाते ही रहे। उन्होंने तो मुख्यमंत्री के सचिव राजेन्द्र कुमार के घर पर छापा होने तक की व्यवस्था की। किंतु वहां कोई ऐसा दस्तावेज नहीं मिला कि वे मुख्यमंत्री को अपमानित कर पाते। उसके बाद तो वे चोट खाए हुए नाग की तरह फुफकारने लगे। दिल्ली सरकार की सैंकड़ों फाइलों की छानबीन करा डाली। यहां भी उन्हें निराशा ही हाथ लगी और केजरीवाल सूखे ही बच निकले। मुझे यह जानकारी तो नहीं कि, केन्द्र सरकार ने उनके इस सचाई पूर्ण वक्तव्य को कितना सच माना किन्तु आज के जमाने में यह पचने वाली बात नहीं थी। और जिस तरह से जंग ने केजरीवाल को सभी प्रकार के अधिकारों से वंचित कर रखा था, तब तो यह उत्तर असंभव ही था। आज की स्थिति तो यह है कि मुख्यमंत्री निवास के सभी बागवानों और रसोईदारों तक को हटा दिया गया है। मुख्यमंत्री बनाए खाना उनकी बला से।

जंग की कार्यप्रणाली से भाजपा सरकार को कितना फायदा हुआ या नहीं, यह अलग बात है लेकिन उनकी इस कार्यप्रणाली को सहन करना अथवा स्वीकृत करना दूसरी बात है। जिस प्रकार असंतुष्ट होकर भाजपा सरकार ने कई राज्यपालों के इस्तीफे लिए, उसी कड़ी में नजीब जंग का इस्तीफा भी जुड़ गया। उनका अब तक का सारा किया-कराया पानी में बह गया। अन्तर केवल इतना ही है कि, पिछले तीन साल से वे दिल्ली में भाजपा की किश्ती चला रहे थे। सुप्रीम कोर्ट के एक झौंके ने किश्ती को हिला दिया। अच्छा हुआ जंग ने इस्तीफा दे दिया वर्ना क्या पता न्याय की अगली कड़ी क्या रंग लाती क्योंकि अपने पूरे कार्यकाल में नजीब जंग एक चुनी हुई सरकार को उखाड़ फैंकने में लगे हुए थे। दिल्ली में तो आने वाले समय में, प्रत्येक उपराज्यपाल के लिए सम्मानपूर्वक जीने के लिए जंग की नजीर ही काफी होगी। अभी तक की जंग में जीत जनता की हुई, इसमें कोई सन्देह नहीं है।

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