Gulabkothari's Blog

नवम्बर 1, 2017

जब तक काला : तब तक ताला

राजस्थान सरकार ने अपने काले कानून के साए से आपातकाल को भी पीछे छोड़ दिया। देशभर में थू-थू हो गई, लेकिन सरकार ने कानून वापस नहीं लिया। क्या दु:साहस है सत्ता के बहुमत का। कहने को तो प्रवर समिति को सौंप दिया, किन्तु कानून आज भी लागू है। चाहे तो कोई पत्रकार टेस्ट कर सकता है। किसी भ्रष्ट अधिकारी का नाम प्रकाशित कर दे। दो साल के लिए अन्दर हो जाएगा। तब क्या सरकार का निर्णय जनता की आंखों में धूल झोंकने वाला नहीं है?

विधानसभा के सत्र की शुरुआत २३ अक्टूबर को हुई। श्रद्धांजलि की रस्म के बाद हुई कार्य सलाहकार समिति (बी.ए.सी.) की बैठक में तय हुआ कि दोनों विधेयक १. राज. दण्ड विधियां संशोधन विधेयक, २०१७ (भादंस), २. सी.आर.पी.सी. की दण्ड प्रक्रिया संहिता, २०१७। २६ अक्टूबर को सदन के विचारार्थ लिए जाएंगे। अगले दिन २४ अक्टूबर को ही सत्र शुरू होने पर पहले प्रश्नकाल, फिर शून्यकाल तथा बाद में विधायी कार्य का क्रम होना था। इससे पहले बीएसी की रिपोर्ट सदन में स्वीकार की जानी थी लेकिन अचानक प्रश्नकाल में ही गृहमंत्री गुलाब चन्द कटारिया ने वक्तव्य देना शुरू कर दिया। नियम यह है कि पहले विधेयक का परिचय दिया जाए, फिर उसे विचारार्थ रखा जाए, उस पर बहस हो। उसके बाद ही कमेटी को सौंपा जाए। किन्तु प्रश्नकाल में ही हंगामे के बीच ध्वनिमत से प्रस्ताव पास करके विधेयक प्रवर समिति को सौंप दिया गया।

यहां नियमानुसार कोई भी विधायक इस विधेयक को निरस्त करने के लिए परिनियत संकल्प लगा सकता है, जो कि भाजपा विधायक घनश्याम तिवारी लगा चुके थे और आसन द्वारा स्वीकृत भी हो चुका था। उसे भी दरकिनार कर दिया गया। विधेयक २६ के बजाए २४ अक्टूबर को ही प्रवर समिति को दे दिया गया। सारी परम्पराएं ध्वस्त कर दी गईं।

कानून का मजाक देखिए! विधानसभा में दोनों अध्यादेश एक साथ रखे गए। नियम यह भी है कि एक ही केन्द्रीय कानून में राज्य संशोधन करता है तो दो अध्यादेश एक साथ नहीं आ सकते। एक के पास होने पर ही दूसरा आ सकता है, ऐसी पूर्व के विधानसभा अध्यक्षों की व्यवस्थाएं हैं। एक विधेयक जब कानून बन जाए तब दूसरे की बात आगे बढ़ती है। यहां दोनों विधेयकों को एक साथ पटल पर रख दिया गया। यहां भी माननीय कटारिया जी अति उत्साह में पहले दूसरे विधेयक (दण्ड प्रक्रिया संहिता, २०१७) की घोषणा कर गए। वो प्रवर समिति को चला गया। अब दूसरा कैसे जाए? तब सदन को दो घंटे स्थगित करना पड़ा। फिर उसके साथ पहले घोषित बिल भी २६ अक्टूबर के बजाए २५ अक्टूबर को ही समिति के हवाले कर दिया गया। बिना किसी चर्चा के-बिना बहस के।

देखो तो! कानून भी काला, पास भी नियमों व परम्पराओं की अवहेलना करते हुए किया गया। और जनता को जताया ऐसे मानो कानून सदा के लिए ठण्डे बस्ते में आ गया। ऐसा हुआ नहीं। नींद की गोलियां बस दे रखी हैं। जागते ही दुलत्ती झाडऩे लगेगा। और लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की हत्या हो जाएगी। कानून क्या रास्ता लेगा, यह समय के गर्भ में है। आज तो वहां भी कई प्रश्नचिह्न लगते हैं। जब एक राज्य सरकार सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को जेब में रखकर अपने भ्रष्ट सपूतों की रक्षा के लिए कानून बनाती है, तब चर्चा कानून की पहले होनी चाहिए अथवा अवमानना की? जब तक तारीखें पड़ती रहेंगी, अध्यादेश तो कण्ठ पकड़ेगा ही।

क्या उपाय है इस बला से पिण्ड छुड़ाने का। राजस्थान पत्रिका राजस्थान का समाचार-पत्र है। सरकार ने तो हमारे चेहरे पर कालिख पोतने में कसर नहीं छोड़ी। क्या जनता मन मारकर इस काले कानून को पी जाए? क्या हिटलरशाही को लोकतंत्र पर हावी हो जाने दे? अभी चुनाव दूर हैं। पूरा एक साल है। लम्बी अवधि है। बहुत कुछ नुकसान हो सकता है। राजस्थान पत्रिका ऐसा बीज है जिसके फल जनता को ही समर्पित हैं। अत: हमारे सम्पादकीय मण्डल की सलाह को स्वीकार करते हुए निदेशक मण्डल ने यह निर्णय लिया है कि जब तक मुख्यमंत्री श्रीमती वसुन्धरा राजे इस काले कानून को वापस नहीं ले लेतीं, तब तक राजस्थान पत्रिका उनके एवं उनसे सम्बन्धित समाचारों का प्रकाशन नहीं करेगा। यह लोकतंत्र की, अभिव्यक्ति की, जनता के मत की आन-बान-शान का प्रश्न है। आशा करता हूं कि जनता का आशीर्वाद सदैव की भांति बना रहेगा। जय भारत! जय लोकतंत्र!!

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अक्टूबर 27, 2017

ठीकरा कोर्ट के सिर…

नीति में धर्म नहीं होता। साम, दाम, दण्ड, भेद ही नीति के हथियार होते हैं। नीति में चतुराई से अधिक चालाकी काम आती है। एक शिक्षा मंत्री के पास किसी स्कूल में बच्चों को भर्ती कराने के लिए बहुत लोग आने लगे। स्कूल में जगह थी ही नहीं। फिर भी प्रत्येक बच्चे के लिए सिफारिशी पत्र पर हस्ताक्षर करते गए। प्रिन्सिपल को इशारा भी कर दिया। उसने पत्रों को इकट्ठा करना शुरू कर दिया। भर्ती किसी को नहीं किया। आखिर तो अभिभावकों के सब्र का बांध टूटना था। एक दिन कुछ अभिभावक प्रिन्सिपल से लड़ पड़े। प्रिन्सिपल ने सबको बिठाया और दराज में से एक कागजों का पुलिन्दा निकालकर सबसे सामने रख दिया। बोले- ‘आप लोग देख लीजिए। इन सभी पत्रों में मंत्री जी ने सिफारिश करने को हस्ताक्षर कर रखे हैं। इनके लिए मुझे तो नया क्लास रूम बनवाना पड़ेगा। कैसे मैं सब बच्चों को भर्ती कर सकता हूं?’ तो यह है चालाकी-लोगों की आंखों में धूल झोंकना। सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे।

राजस्थान सरकार इसी पटरी पर चल रही है। गुर्जर आरक्षण का मुद्दा हो, पट्टा वितरण और नियमित करने (अवैध बसावट को) की बात हो, मास्टर प्लान से छेड़छाड़ का दु:साहस हो चाहे भ्रष्ट अफसरों को संरक्षण देने वाला संशोधन। यहां तक कि बुधवार को राज्य विधानसभा से पास ‘विधायकों के लिए लाभ का पद बचाने’ का लालीपॉप या फिर गुरुवार को पास एसबीसी विधेयक। सबके सब मुद्दे जो चुनाव के नाम पर जोर आजमाइश कर रहे हैं और जिनका स्वीकार किया जाना सरकार के लिए संवैधानिक रूप से संभव नहीं है, उन सभी मुद्दों पर सरकार प्रभावितों के पक्ष में फैसले करती रहती है। इस प्रकार सभी वर्गों का विश्वास जीतने का प्रयास कर रही है। क्या सरकार फैसला करते समय नहीं जानती कि ये फैसले न्यायालय में टिक नहीं पाएंगे? जानती है। फिर भी फैसला करती जाती है।

गुर्जर आरक्षण के मुद्दे पर सरकार को कितनी बार कोर्ट में हारना पड़ा। पिछले दस वर्षों में कम से कम पांच बार ऐसा हुआ है। राज्य सरकार ने उन्हें आरक्षण के विधेयक बनाए, अधिसूचना जारी की और उच्च न्यायालय ने उन्हें रद्द कर दिया। किन्तु गुरुवार को फिर उसने आरक्षण का ओबीसी कोटा २१ प्रतिशत से बढ़ाकर २६ प्रतिशत करने का विधेयक विधानसभा से पारित करवा लिया। इससे राज्य में आरक्षण ५० प्रतिशत से अधिक हो जाएगा। जो कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का स्पष्ट उल्लंघन होगा। जैसा अब तक होता रहा है, यह न्यायालय से फिर लौट जाएगा। सरकार गुर्जरों की सीधी नाराजगी से बच जाएगी। ठीकरा कोर्ट के माथे फूटेगा। कोर्ट भी सारे विधायकों के विरुद्ध अवमानना तो जारी नहीं करेगा।

मास्टर प्लान के मामले में जनवरी २०१७ का राजस्थान उच्च न्यायालय का फैसला स्पष्ट है। सरकार ने चुनाव की दृष्टि से जो लोक लुभावन वादे लोगों से किए थे, उनको पूरे नहीं कर पा रही है। फिर भी बीच-बीच में आदेश निकालकर कुछ अवैध कब्जों को नियमित करने की बात भी करती जाती है, कुछ को हटाती भी जाती है। हर बार तारीख पर पुराने आदेश की अर्थी उठ जाती है। अगली तारीख से पहले फिर नया गैरकानूनी आदेश जारी कर देती है। जानती भी है कि यह आदेश भी रद्द ही होगा। उसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गई। वहां भी राहत नहीं मिली। किन्तु लोगों को सीधे नाराज करने से अच्छा है कोर्ट का आदेश सामने रख दे।

भ्रष्ट अधिकारियों के संरक्षण का अध्यादेश भी इसी नीयत से जारी किया। अफसर प्रसन्न हो गए। सरकार जानती थी परिणाम क्या होंगे? देशभर में सरकार कलंकित हो गई। कोर्ट में भी मुद्दा टिकने वाला नहीं था। सरकार ने विधानसभा की प्रवर समिति को मामला सौंपकर कोर्ट में इज्जत बिगडऩे से रोक ली। अब अफसर भी सरकार को दोष कैसे दे सकेंगे? उनका काम भी नहीं हुआ। सांप भी मर गया, लाठी भी नहीं टूटी।

सरकार का दु:साहस कही रुकने को तैयार ही नहीं। विधानसभा में ‘लाभ का पद’ बचाकर विधायकों को एक बार तो खुश कर दिया। क्या अफसरों के संरक्षण बिल के साथ इस मुद्दे पर भी विधि विभाग ने चेतावनी नहीं दी थी? क्या आगे यह मुद्दा भी कोर्ट में टिक पाएगा? क्या सरकार यह नहीं जानती कि इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय यहां तक कह चुका है कि, कोई भी विधानसभा इस पर कानून नहीं बना सकती। कोई भी सरकार १५ प्रतिशत से ज्यादा विधायकों को लाभ का पद नहीं दे सकती।

अब भी सरकार जानती है कि कोर्ट में यह कहीं नहीं टिकने वाला परन्तु सामने वालों को राजी रखने के लिए ठीकरा कोर्ट के सिर फोडऩे के लिए कानून बना दिया। यही तो चालाकी है। अफसर भी नहीं समझ पाए। लोगों की आंखों में जमकर धूल झोंकी जा रही है। नित नए आदेश संविधान अथवा कानून के अथवा न्यायालय के फैसलों के विरुद्ध जारी हो जाते हैं, यह मानकर कि ये कोर्ट में खारिज हो जाएंगे। और कोर्ट के हर फैसले को सहर्ष मान भी लेते हैं। सरकार ने लोगों के काम न करने का अच्छा कानूनी रास्ता निकाल लिया है। इससे अधिक चालाक तो बिल्ली मौसी भी नहीं होती।

अक्टूबर 22, 2017

उखाड़ फेंकेगी जनता

राजस्थान विधानसभा का सत्र कल से शुरू होने वाला है। यूं तो लोकाचार निभाने जैसा संक्षिप्त ही होने की संभावना है। इस सत्र में वैसे तो विधायकों ने लगभग १२०० प्रश्न लगा रखे हैं, किन्तु लोकतंत्र की दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण होगा सरकार द्वारा इस्तगासा दायर करने को लेकर सी.आर.पी.सी. में किया गया संशोधन। इस संशोधन से आई.पी.सी. की धारा २२८ में २२८ बी जोडक़र प्रावधान किया गया है कि सीआरपीसी की धारा १५६(३) और धारा १९० (१)(सी) के विपरीत कार्य किया गया तो दो साल कारावास एवं जुर्माने की सजा दी जा सकती है। न्यायाधीश, मजिस्ट्रेट व लोक सेवक के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति मिलने से पहले उनका नाम एवं अन्य जानकारी का प्रकाशन, प्रसारण नहीं हो सकेगा।

वैसे न्यायपालिका पर उच्च न्यायालय की पूर्व स्वीकृति पहले भी आवश्यक है। लोकसेवकों को इनकी आड़ में जोडऩे के लिए इनका हवाला दे दिया। सही बात तो यह है कि सरकार ये मंशा स्पष्ट कर रही है कि उसे आज भी लोकतंत्र में कतई विश्वास नहीं है। उसे तो सामन्ती युग की पूर्ण स्वच्छन्दता ही चाहिए। दुर्योधन का राज्यकाल चाहिए। भ्रष्ट कार्य प्रणाली की वर्तमान छूट भी चाहिए और भावी सरकारों से सुरक्षा की गारण्टी भी चाहिए। क्या बात है! याद करिए जब मुख्यमंत्री ने विधानसभा में ही कहा था कि ‘हम हौसलों की उड़ान भरते हैं।’ क्या हौसला दिखाया है!

सात करोड़ प्रदेशवासियों ने जिस सम्मान से सिर पर बिठाया था, उसे ठेंगा दिखा दिया। यहां तक कि बार-बार विधि विभाग के असहमति प्रकट करने को सिरे से नकार ही नहीं दिया, बल्कि विधि विभाग को अपने हाथ में ले लिया। अब कौन रोक सकता था इस अनैतिक आक्रमण को? अनैतिक इसलिए कह रहा हूं कि यह संशोधन असंवैधानिक है। उच्चतम न्यायालय के सन २०१२ के फैसले के खिलाफ है, जो सुब्रह्मण्यम स्वामी के मामले में दिया गया था।

महाराष्ट्र सरकार ने भी ऐसा ही कानून दो वर्ष पहले लागू किया है। वहां अभियोजन स्वीकृति के लिए सरकार को केवल तीन माह का समय दिया गया है, तथा सजा का प्रावधान भी नहीं है। फैसले को लागू करने की जो जल्दबाजी सरकार ने दिखाई वह भी आश्चर्यजनक है। आनन-फानन में राष्ट्रपति से स्वीकृति लेना, राज्यपाल द्वारा अध्यादेश को स्वीकृत करना और इस विधानसभा सत्र की प्रतीक्षा न करना सब प्रश्नों के घेरे में आ जाते हैं! क्या उसी तर्ज पर विधानसभा भी इसे पारित कर देगी?

सरकार और सभी २०० विधायक अगले विधानसभा चुनाव की देहरी पर खड़े हैं। राजस्थान की जनता का पिछले चार साल का काल काले भ्रष्टाचार की खेती को पनपते देखते गुजरा है। आम आदमी एक ओर नोटबन्दी और जीएसटी से त्रस्त है। दूसरी ओर राज्य की खोटी नीयत की मार पड़ रही है। ऐसे में यह संशोधन यदि पास हो जाता है, तो निश्चित है कि जनता अगले चुनाव में सरकार को दोनों हाथों से उखाड़ फेंकेगी। भले ही सामने विपक्ष कमजोर हो। लोकतंत्र स्वयं मार्ग निकाल लेगा। अपराध, भ्रष्टाचार, अराजकता को प्रतिष्ठित करने के लिए भाजपा को नहीं चुना था। कांग्रेस बिलों से बाहर निकलने को तैयार ही नहीं है।

सरकार को रीढ़विहीन कहना गलत नहीं होगा क्योंकि सरकार भ्रष्टाचारियों को दण्डित करने के बजाए उनको बचाने के लिए कानून बना रही है। क्या करोड़ों मतदाताओं का दिया अधिकार धूल हो गया? अथवा सरकार की स्वार्थपूर्ति के लिए ही लोकसेवक भ्रष्टाचार में लिप्त हैं?

विधायकों को अपने साथ-साथ प्रदेश के भविष्य का भी ध्यान रखना चाहिए। धन तो जड़ पदार्थ है। उसके लिए करोड़ों चैतन्य आत्माओं की आस्था से खिलवाड़ कहीं ऐसा कुछ न कर दे जिसकी आपको आज कल्पना ही नहीं। फिर आपको भविष्य में भी राजनीति करनी है तो संतुलित विवेक का प्रदर्शन करना चाहिए। लोकतंत्र को ध्वस्त करने वाला संशोधन पास नहीं होना चाहिए। नहीं तो आप भी जनता की अदालत में पास नहीं होंगे।

सरकार केवल भ्रष्ट विधायकों और लोकसेवकों की सुरक्षा के लिए काम कर रही है। उन्हें अपराध की खुली छूट दे रही है। इसका कारण पूर्ण बहुमत ही है। इसी शक्ति के अहंकार के बूते पर संविधान के ९१वें संशोधन के तहत लाभ के पद के दायरे में आने वाले विधायकों को हटाने के विरुद्ध भी कानून आ रहा है। भले ही राष्ट्रपति ने दिल्ली सरकार के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था, भले ही चुनाव आयोग ने हरी झण्डी न दी हो, भले ही सर्वोच्च न्यायालय ने स्वीकृति न दी हो, भले ही देश के छह उच्च न्यायालायों ने संविधान के ९१ वे संशोधन से छेड़छाड़ के लिए मना कर दिया हो। इसमें एक उल्लेखनीय पहलू यह भी है कि सन २०१३ में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी ऐसा ही एक संशोधन (संसदीय सचिवों को लेकर) राज्यसभा में पेश किया था। भाजपा के घोर विरोध के कारण तब यह संशोधन पास नहीं हुआ और अभी तक लम्बित है।

राज्य सरकार इस कानून को भी आप सभी २०० विधायकों के हाथों ही पास करवाने वाली है। विचार तो आपको भी गंभीरता से करना ही चाहिए कि क्या कोई राज्य सरकार न्यायालय को आदेश दे सकती है कि उसे किस मामले में सुनवाई करनी चाहिए और कब नहीं करनी चाहिए? क्या पुलिस जांच के बाद भी सुनवाई करने के लिए न्यायालय को सरकार से स्वीकृति लेनी जरूरी होना चाहिए? क्या एसीबी या अन्य जांच एजेंसियों द्वारा पकड़े गए आरोपियों के नाम प्रकाशित नहीं करना ही संविधान की धारा १९(१) में प्रदत्त ‘स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति’ का मन्तव्य रह जाएगा? तब क्या जरूरत है मतदान की, चुनाव की, संविधान की! सरकार ने भी परोक्ष रूप से घोषणा कर ही दी है कि उसको भी जनहित और जनतंत्र में विश्वास नहीं है। एक बड़ा प्रश्न यह भी उठता है कि क्या महाराष्ट्र और राजस्थान में उठाए गए इन कदमों को भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की स्वीकृति भी प्राप्त है।

सितम्बर 22, 2017

या देवी सर्व भूतेषु!

‘या देवी सर्व भूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्ये, नमस्तस्ये, नमस्तस्ये नमो नम: ॥’

हे दुर्गे! हे प्रकृते! तेरे तीनों गुण- सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण क्रमश: सुख, दु:ख और मोह स्वभाव वाले हैं। प्रकाशक, प्रवर्तक एवं नियामक भी हैं। सत्वगुण का कार्य प्रकाश (प्रकट) करना, रजोगुण का कार्य प्रवर्तन करना तथा तमोगुण नियमन कर्ता है। तेरी शक्ति से ही शिव भिन्न-भिन्न रूप में विश्व बनता है। तेरे से बाहर विश्व में चेतन-अचेतन कुछ नहीं है।

हे शकेृ! आजादी के समय देश ने कुछ सपने देखे थे। राष्ट्र का संचालन हमारे चिन्तन और संस्कृति के अनुकूल होगा। इसी के अनुरूप ज्ञान की धारा बहेगी। कोई गरीब नहीं रहेगा। किसी का शोषण नहीं होगा। मेहनती, चरित्रवान और बुद्धिप्रधान युवा शक्ति देश का नेतृत्व करेगी। आज वह बेरोजगार घूम रही है। राष्ट्र का एकता और अखण्डता का सपना पूरा होगा। आज तो धर्म, जाति, सम्प्रदाय, क्षेत्र, भाषा जैसे असुर इस यज्ञ को भ्रष्ट कर रहे हैं। ये फूट ही स्वतंत्रता के लिए सबसे बड़ा खतरा है। रक्तबीज की तरह बढ़ रहा है।

हमारे संविधान की भूमिका में, तेरी साक्षी में, हे सरस्वत्ये! तीन पुष्प जनता को समर्पित किए थे- समानता का अधिकार, स्वतंत्रता और बन्धुत्व का अधिकार। वरुण की सेना ने छीन लिए सारे सपने। समान नागरिक संहिता तक नहीं बनी, देश का ‘भारत’ नाम नहीं पड़ पाया, ऊंच-नीच वैसे ही है। बड़े-बड़े नेता दलितों के घर जाते हैं भोजन का दिखावा करने। विकास के समान अवसर शिक्षा की सुरसा निगल गई। बच्चा जीवन की शुरुआत ही विषमता से करता है। महिलाओं के प्रति अपराध बढ़े हैं। राजनीति का भी स्वरूप ‘राम राज्य’ के स्थान पर लंका जैसा, राक्षस रूप हो गया। धर्म में राजनीति प्रवेश कर गई। बड़े-बड़े संत विकराल दैत्य रूप धारण करने लगे हैं। सफेदपोश नेता भी वोट की राजनीति करने के लिए सांपों को दूध पिला रहे हैं। यह नया गठजोड़ देश के सीने पर कटार बन गया है।

हम तेरा आह्वान करते हैं, हे काली! इन असुरों का अपने खड्ग से सिर विच्छेद कर। अगले नौ दिनों में ये भ्रष्टाचारी, जन-धन के चोर, बढ़-चढक़र तेरी आराधना का ढोंग भी रचाने वाले हैं। जड़ स्वभाव वाली लक्ष्मी के पीछे दौडऩे से इनकी मति भी जड़ हो गई है। उल्लू के वाहन पर अंधकार में विचरण करने वाली लक्ष्मी के पुजारी मद-मस्त होकर देश को विदेशी हाथों बेचने के सपने देख रहे हैं। बहुत कुछ व्यापार ठप हो चुका। बाकी अपे्रल के बाद होने लग जाएगा, जब विदेशी माल शुल्क मुक्त प्रवेश करने लगेगा देश में। सोने की चिडिय़ा भी अब नहीं बनेगा भारत और आज की गुलाम परस्त (पेट भरने मात्र के लिए) शिक्षा विश्वगुरु भी नहीं बनने देगी। न धर्म-ज्ञान-वैराग्य-ऐश्वर्य रूपी विद्या देश में प्रचारित होगी, न अभ्युदय की फिर कोई दुंदुभि बजेगी। रणभेरी बजाओ मां! शस्त्र उठाओ! चारों ओर भस्मासुर और महिषासुर के सींग ललकार रहे हैं। आरक्षण ने देश को खण्ड-खण्ड कर दिया है। शुंभ-निशुंभ से अधिक बलवान हैं। नि:श्रेयस के मार्ग को बन्द कर रखा है।

हे शक्ति स्वरूपा दुर्गे! सुर-असुर दोनों का अस्तित्व तुझसे ही है। तुझसे बलवान भी अन्य कोई नहीं। तब क्यों महिलाएं तेरे राज में असुरक्षित हैं? क्यों कानून का राज नहीं ठहर पाता? क्यों मैं अपने देश में बिना टोल दिए यात्रा नहीं कर पाता? दो पैसे भी कमाता हूं तो सरकार गली निकालकर कर लगा देती है। सत्तर साल हो गए, मां! वरुणपाश बढ़ते ही जा रहे हैं। किसानों के साथ अब तो व्यापारी भी आत्म-हत्या करने लगे हैं। सत्ता में संविधान कौन पढ़ता है। सब झूठ और अमर्यादित बोलने में गर्व महसूस कर रहे हैं, दुर्गे! क्या वे ही तुम्हारी सन्तान हैं? उनके आगे कानून-पुलिस सब घुटने टेकते जान पड़ते हैं। कोई प्रत्यक्ष, कोई परोक्ष।

अब तू ही बता प्रकृते! क्यूं करे कोई तेरी आराधना? या हमारे पापों का ही फल हम भोग रहे हैं? तब तेरी क्या आवश्यकता रह जाएगी? फिर तो कृष्णा के स्थान पर कृष्ण को याद करेंगे, जो कह गए-‘यदा यदाय धर्मस्य….’ पर यह देश आस्थावान है। यहां संस्कृति प्रकृति का सम्मान करती है। हम प्रतीक्षा करेंगे, हे देवी! तू आएगी, दु:ख और संहार से देश को बाहर निकालेगी। आज से नवरात्र में स्वागत करता तेरा, ये देशवासी।

सितम्बर 15, 2017

मरो तो मां के लिए

मुम्बई से आया तो आज के पत्रिका के मुखपृष्ठ पर ‘हिन्दी दिवस’ पर सामग्री पढ़ी। पेट के साथ चिपकी और मूल्यों से अनभिज्ञ अंग्रेजीदां पीढ़ी कैसे-कैसे सवाल उठा रही है, हिन्दी के विरोध में! विज्ञान की पढ़ाई कैसे संभव है हिन्दी में? रूस और जर्मनी जैसे देशों में जाकर देख लें। भारत से कितने लोग रूस में डॉक्टरी पढक़र आ रहे है? जर्मनी में संस्कृत के विद्वान जो कर रहे हैं, हमारे संस्कृत के आचार्य नहीं कर पा रहे। भाषा केवल माध्यम है ज्ञान अर्जित करने का। कोई अंग्रेजी दां माहौल की चर्चा में व्यस्त है, तो कोई इसे आजीविका से जोड़ रहा है। किसी को दुनिया से जुडऩे की चिन्ता है। माटी के इन सपूतों के सहारे ही भारतीय संस्कृति पुष्पित और पल्लवित हो रही है।

मेरे देश ने शब्द को ब्रह्म कहा है। क्या कोई भौतिकवादी अथवा अंग्रेजीदां मनीषी इस मर्म को समझा सकता है? क्या भाषा का उपयोग पेट भरना है या स्टाइल मारना है? क्या मानव जीवन का उद्देश्य मात्र पेट भरना ही है? तब तो हर प्राणी को अंग्रेजी सीख लेनी चाहिए। अरे, यह अंग्रेजी ही है, जिसने जीवन से मानवीय मूल्य छीन लिए हैं। अंग्रेजीदां व्यक्ति, अंग्रेजों की तरह, आज भी आम भारतीय को दोयम दर्जे का ही मानता है। हमारे अफसर, चाहे किसी भी शाखा के हों, इसका जीता जागता प्रमाण हैं। इस देश का दुर्भाग्य है कि इन अधिकारियों का प्रशिक्षण आज भी अंग्रेजी भाषा में होता है। इनको आप आम आदमी से जुड़ा हुआ कभी नहीं पाएंगे। इससे भी बड़ी त्रासदी यह है कि ये लोग सोचते ही अंग्रेजी में हैं, जहां इस देश की संस्कृति-परम्पराएं या जीवनशैली चर्चा में ही नहीं आती। अत: देश की नीतियों में संस्कृति की छाया तक दिखाई नहीं देती।

यही हाल अंग्रेजी मीडिया का भी है जो सदा सत्ताधीशों के इर्द-गिर्द तो रहता है, किन्तु जीवन मूल्यों और दर्शन की बात नहीं करता। अंग्रेजी पत्र-पत्रिकाओं में भी भारतीय दर्शन और जीवन का अभाव दिखाई देता है। विडम्बना यही है कि इनकी सलाह से ही शिक्षा-स्वास्थ्य जैसी नीतियां बनती हैं, जो कि विदेशों की नकल पर आधारित होती हैं। भारतीय चिन्तन उस स्तर से हिन्दी के साथ ही सिमट गया। आज जिस प्रकार समलैंगिकता तथा अन्य मर्यादाहीन जीवनशैली पर आधारित कानून बनने लगे, उनका जो प्रभाव देशवासियों की मानसिकता पर पड़ा या जो कुछ प्रतिक्रिया देश में हुई, किसी को कोई फर्क नहीं पड़ा। अंग्रेजी शिक्षा ने देश का सारा पारिवारिक ढांचा उजाड़ दिया। व्यक्ति को एकल जीवन में फंसाकर समाज व्यवस्था को तार-तार कर दिया।

क्या हिन्दी को भाषा मानने से देश पीछे चला जाएगा? क्या बेरोजगारी आज से भी ज्यादा हो जाएगी? क्या कारखाने बंद हो जाएंगे या बीपीएल की संख्या बढ़ जाएगी? सच बात तो यह है कि देश को देखना और समझना है तो हिन्दी ही माध्यम है। सभी प्रांतीय भाषाओं की स्थिति अपने-अपने प्रदेश में मातृभाषा की श्रेणी में आती है। अंग्रेजी में देश दिखाई ही नहीं देता। पिछले ७० सालों का अनुभव कहता है कि अभी तक अंग्रेजी ही देश को लूट रही है। अंग्रेजीदां लोग- लोकतंत्र के तीनों स्तम्भ आज भी अंग्रेजी से बाहर नहीं निकले। इसका अर्थ है कि उन्होंने अंग्रेजी को भाषा की तरह कामकाज का माध्यम नहीं माना, बल्कि जीवन में एक सभ्यता के रूप में मानसिकता को आवरित कर लिया। इनमें से कितने बचे हैं जो देश के पुरातन साहित्य-वेद, ब्राह्मण, उपनिषद् आदि… के ज्ञान के प्रति गम्भीर हैं। क्यों आज भी गीता विश्व में चर्चा और शोध का विषय बना हुआ है? अंग्रेजी के कारण? अथवा उस ज्ञान के कारण जो कि अंग्रेजी में भी उपलब्ध नहीं है?

मेरा देशवासियों से अनुरोध है कि ज्ञान को मात्र पेट भरने का साधन न मानें, भाषा को जीवनशैली से न जोड़ें और मातृभाषा की शक्ति को विकासवाद या वैश्वीकरण के नाम से तिलांजलि देने का प्रयास न करें। आप किसी के भी काम आने लायक नहीं रहेंगे। अपनी चिन्ता और सुरक्षा के प्रश्नों से कभी उबर भी नहीं पाएंगे। हिन्दी की वर्णमाला में जो अभिव्यक्ति है, तथा जो मंत्र शक्ति है, किसी अन्य भाषा में, कम से कम दैनिक उपयोग में, तो नहीं है। शब्द ब्रह्म की चर्चा बेवजह नहीं है। जीवन की कीमत खा-पीकर मर जाने में नहीं है। हम पिछले जन्म का आज खा रहे हैं, इस जन्म का आगे जन्म-जन्मों में भी खाते रहेंगे। जीवन का यह शाश्वत सत्य यदि कहीं है तो हिन्दी में है। संस्कृत का बोझ भी आज हिन्दी ही उठा रही है। देश की जड़ों को फिर से हरा करने की शक्ति हिन्दी में ही है। अंग्रेजी तो जड़ें सुखाती आ रही है। अंग्रेजी आम खाना सिखाती है। हिन्दी जमीन में गढक़र पेड़ बनना सिखाती है। आम कोई खाए-छाया कोई भोगे!

अगस्त 19, 2017

जैसा अन्न- वैसा मन

प्रकृति के सिद्धान्त समय, व्यक्ति अथवा क्षेत्र के साथ बदलते नहीं हैं। प्रकृति प्रत्येक कर्म का निश्चित फल भी देती है। हां, यह हमारी समझ से परे है कि फल कब मिलेगा। कहते हैं- ‘वहां देर है, अंधेर नहीं है।’ कर्म का केन्द्र मन होता है। मन में इच्छा पैदा होगी तभी कर्म होगा। और मन बनता है अन्न से। ‘जैसा अन्न, वैसा मन’। मन का सत्वभाव अन्न शुद्धि पर ही टिका है। सात्विक, राजस, तामस जैसा भी अन्न खाया जाएगा वैसा ही भाव भी मन में पैदा होगा। मनु ने तो अन्न दोष को ही व्यक्ति की जीवित-मृत्यु का कारण माना है। तब क्या आश्चर्य है कि अनेक बड़े-बड़े नेताओं, अधिकारियों और उद्योगपतियों के आचरण तथा उनकी सन्तानों के आचरण आसुरी हो रहे हैं। ऐसा पहली बार नहीं है। हर काल में होता रहा है। जाति, धर्म, राजनीतिक दलों की इसमें कोई सीमा नहीं होती। ऐसे दागी हर जगह मिल जाते हैं।

हाल ही हमारे सामने कुछ नाम सार्वजनिक हुए हैं- पूर्व मंत्री (उ.प्र) याकूब कुरेशी की चाबुक वाली बेटी आशमां, सपा नेता का भतीजा मोहित यादव, राहुल महाजन, महिपाल मदेरणा, मलखान सिंह, बी.बी. मोहन्ती, मधुकर टंडन, अमित जोगी, विकास-विशाल यादव, विकास बराला से लेकर तेजस्वी-मीसा तक के उदाहरण रिकॉर्ड पर हैं। भले ही नेता सत्ता के जोर पर अपराधों को ढंकने में कामयाब हो जाएं, किन्तु ईश्वर की नजर से कैसे बचेंगे। कहते हैं कि ईश्वर जिससे रुष्ट होता है, उसे खूब धन, समृद्धि देता है ताकि वह ईश्वर से बहुत दूर चला जाए। उसको याद भी नहीं करे। और जिससे प्रेम करता है उसको तिल-तिल कर जलाता है। ताकि वह एक पल को भी दूर न हो।

स्वामी राम नरेशाचार्य ने पत्रिका के ही एक कार्यक्रम में कहा था-‘कोई मंगल उपस्थित हो जो हमारे जीवन को उत्कर्ष देने वाला है तो हमारे यहां कहा जाता है, हमारे पुण्य का फल है। वैसे तो आपने देखा है, गलत तरीके से जीवन जीकर भी आदमी मोटा हो जाता है, बड़े पद पर चला जाता है, धनवान हो जाता है। लेकिन उसको, शास्त्र कहते हैं कि यह उसके पुण्य का फल नहीं है, उसके पाप का फल है, क्योंकि निश्चित रूप से यह उसे दु:ख देगा, लांछित करेगा, जेल में पहुंचाएगा, उसकी पीढिय़ां दर पीढिय़ां लांछित होंगी, नष्ट हो जाएंगी। यदि सही रीति से कोई आगे बढ़ा है तो ही वह सुख प्राप्त करता है और जीवन का जो परम उत्कर्ष है जहां स्थायित्व है, पुनरावर्तन नहीं है उसको प्राप्त करता है।’ मनुस्मृति में कहा है-

‘अधर्मेणैधतेतावत्ततो भद्राणि पश्यति।
सपत्नाञ्जयते सर्वान् समूलस्तु विनश्यति ॥’

अर्थात्-प्रथमत: मनुष्य अधर्म से बढ़ता है और सब प्रकार की समृद्धि प्राप्त करता है तथा अपने सभी प्रतियोगियों से आगे भी निकल जाता है किन्तु समूल नष्ट हो जाता है। इसका भावार्थ है कि अधर्म के जरिए उत्पन्न अन्न जिसके भी भोग में आएगा, उसका, उसकी सन्तानों का, सम्बन्धियों का सम्पूर्ण (जड़ सहित) नाश निश्चित है। ऐसे अन्न का अर्जन करने वाला यह सुनिश्चित कर जाना चाहता है कि इस अन्न का भोग करने वाला अपराधी, असामाजिक तत्त्व के रूप में भी जाना जाए। कुल को कलंकित भी करे तथा अन्त में समूल नष्ट हो जाए। आज जिस गति से भ्रष्टाचार बढ़ता जा रहा है, भ्रष्ट लोगों के परिजन नित्य-प्रतिदिन समाजकंटक के रूप में सामने आते जा रहे हैं। हर युग मे ऐसे प्रमाण सामने आते रहे हैं। पारिवारिक कलह, असाध्य रोग और अकाल मृत्यु के योग बने रहते हैं। आज तो इनके नाम बड़े-बड़े घोटालों में अपयश प्राप्त करते हैं।

हम प्रकृति की सन्तान हैं। न अपनी मर्जी से पैदा होते हैं, न ही मर्जी से मर सकते हैं, केवल कर्म हमारे हाथ में है। चूंकि आज अन्न भी तामसिक हो गया है। गीता १७/१० में तामस भोजन को परिभाषित करते हुए कहा गया है कि, ‘झूठ-कपट, चोरी-डकैती, धोखेबाजी आदि किसी तरह से पैसे कमाए जाएं, ऐसा भोजन तामस होता है।’ इसी तरह गीता १६/१२ में अन्यायपूर्वक धन संचय करने वाले के लिए कहा गया है कि ‘आसुरी प्रकृति वाले मनुष्यों का उद्देश्य धन संग्रह करना और विषयों का भोग करना होता है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए वे बेईमानी, धोखेबाजी, विश्वासघात, टैक्स की चोरी आदि करके, दूसरों का हक मारकर, मन्दिर, बालक, विधवा आदि का धन दबाकर और इस तरह अन्यान्य पाप करके धन का संचय करना चाहते हैं।’

आज स्वाद स्वभाव पर भारी पड़ रहा है। जंक फूड, विषाक्त अन्न और आपराधिक, भ्रष्ट आचरणों से अर्जित अन्न समाज और देश के नवनिर्माण की सबसे बड़ी बाधा है। पिछले दस-बीस वर्षों के मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों, दल के नेताओं का इतिहास देखें, उनकी सन्तानों का आकलन आज करें, तो सारे प्रकृति के समीकरण समझ में आ जाएंगे। और यह भी समझ में आ जाएगा कि अपने परिजनों के इनसे बड़े शुभचिन्तक भी कौन होंगे, जो इनके सम्पूर्ण नाश की व्यवस्था करके जाते हैं-रावण और कंस की तरह। और यह भी तय है कि भविष्य की भी यही तस्वीर है। भ्रष्टों की सन्तानें अधिक भ्रष्ट होंगी। समाज को आतंकित करेंगी। पुलिस उनकी ही सहायता करेगी। जनता को स्वयं इस समस्या से लडऩा पड़ेगा। सत्ता का अहंकार सत्व गुण का विरोधी होता है। सत्ता भी भ्रष्ट तरीकों से हासिल की जाने लगी है। खुद अपराधी सत्ता में बैठने लगे हैं। ईश्वर उनको सद्बुद्धि दे, वरना सरकारी आतंक ही सुख-चैन छीनने का माध्यम बन जाएगा। रक्षक ही भक्षक हो जाएंगे।

अगस्त 15, 2017

हे ‘नाथ’ सन्त!

योगी आदित्यनाथ ‘नाथ’ सम्प्रदाय के महन्त हैं, जिसमें योगी मच्छेन्द्रनाथ, जलंधरनाथ, गोरखनाथ जैसे ऋषि तुल्य गुरु हुए हैं। यह सम्प्रदाय अखाड़ों के रूप में फैला हुआ है और रजवाड़ों के समय में शहरी सुरक्षा व्यवस्था के लिए जाना जाता था। आध्यात्मिक क्षेत्र की विशिष्ट परम्पराओं के लिए भी यह सम्प्रदाय जाना जाता है। आज योगी आदित्यनाथ राजनीतिक अखाड़े में उतर चुके हैं। राजनीति किसी मर्यादा एवं संवेदना से सम्बन्ध नहीं रखती। यह बात गोरखपुर के बीआरडी अस्पताल में ४८ घंटों में हुई ३० बच्चों की मौत से प्रमाणित हो गया। योगी के मुख से क्षमा याचना और धार्मिक मर्यादा से जुड़े दो शब्द भी नहीं निकल पाए। ऑक्सीजन की समाप्ति की चेतावनी दरकिनार हो गई। किसी को योगी की नाराजगी का डर नहीं था क्या?

योगी सरकार ने पहले मृतक बच्चों के शवों का पोस्टमार्टम करवाने से क्यों मना कर दिया? क्या यह कार्य धर्म विरुद्ध था? क्या किसी निजी अस्पताल को ऐसी ही दुर्घटना पर माफ कर दिया जाता? मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल का निलम्बन क्यों किया, क्या उसे बर्खास्त नहीं किया जाना चाहिए था।

दो शर्मनाक व्यवहार के उदाहरण योगी के धार्मिक आचरण को सीधा कलंकित करते हैं। वैसे तो सम्पूर्ण दुर्घटना ही सरकार पर कलंक है। उस पर स्वास्थ्य मंत्री का बयान दुर्घटना का मुंह चिढ़ा रहा है। वाह रे राजनीति! ‘अगस्त में मौत का आंकड़ा बढ़ जाता है। बच्चों की मौत उस समय में नहीं हुई, जब ऑक्सीजन समाप्ति का अलार्म बज रहा था। छह घंटे के बाद हुई।’ यह निर्लज्जता, निर्दयता और संवेदनहीनता की पराकाष्ठा ही कही जाएगी। इस पर योगी का महन्ती मौन?

सबसे दर्दनाक और अमानवीय कार्रवाई जो धार्मिक छाते के नीचे हुई वह थी डॉ. कफील खान को पद से हटा देने की। यह वार्ड के प्रभारी थे जिन्होंने इतने बच्चों की मृत्यु के बाद अन्य अस्पतालों से ऑक्सीजन सिलेण्डर मंगाए थे ताकि आगे बच्चों को मौत के मुंह से बचाया जा सके। ऐसे प्रयासों के लिए तो सरकार को उन्हें पारितोषिक देना चाहिए था। यहां भी राजनीति ही संस्कारों पर भारी पड़ गई। और यह सब कुछ धार्मिक चोगे के रहते।

योगी को एक तथ्य पर अवश्य विचार करना चाहिए कि यदि गोरखनाथ यह सब देख रहे होंगे तो क्या मन में आ रहा होगा उनके? क्या उनके उत्तराधिकारियों का भी ऐसा आचरण उन्हें स्वीकार होगा? राजनीति पर सम्प्रदाय हावी रहे तो उत्तम, सम्प्रदाय पर राजनीति हावी हो गई तो गद्दी ही कलंकित हो जाएगी। इस सबका समाधान यह है कि वे, वो करें जो उनका दिल कहे। किसी और को उनके विचारों को प्रभावित करने की छूट नहीं होनी चाहिए। और यदि वर्तमान भूमिका में उन्हें दिल की सुनना असंभव लगे तो गद्दी किसी और को सौंप खुद पूरी तरह राजनीति में उतर जाना चाहिए। वर्ना दो घोड़ों की सवारी हमेशा जान को जोखिम में बनाए रख सकती है।

अगस्त 3, 2017

भय बिन होत न प्रीत

माननीय जस्टिस खेहर,
भारत के मुख्य न्यायाधीश

आपकी टिप्पणी ‘आखिरकार हम ठहरे तो भारतीय ही। कानून और कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन हमारे खून और संस्कृति में है।’ ‘आज यह एक चलन बनता जा रहा है कि मैं कानून का पालन नहीं करूंगा। मैं कोर्ट के निर्देशों को नहीं मानूंगा। जो भी हो, इसमें मुझे कोई फर्क नहीं पडऩे वाला है।’ संवेदना भी प्रकट कर रही है और न्यायालयों की कार्यप्रणाली का प्रभाव भी दिखा रही है। मान्यवर! हमारे देश की संस्कृति सदा संस्कारवान ही रही है। आज की शिक्षा, सत्ता का अहंकार, क्षुद्र स्वार्थ और न्यायपालिका का नरम रवैया ही अवमानना की मानसिकता को खून में प्रवाहित करने के कारण हैं। यह तो सही है कि सुविधाओं के लिए न्यायपालिका सरकारों की ओर से देखती है, किन्तु इतनी बड़ी कीमत चुकाकर संविधान तथा न्यायपालिका की हैसियत को समय-समय पर आहत भी किया है।

सत्ताधीशों, प्रभावशाली अधिकारियों तथा सरकारों की अमर्यादित कार्यशैली पर मौन रहना, स्वप्रसंज्ञान न लेना और बड़े लोगों को सजा के स्थान पर लम्बी अवधि की सुविधा देने के लिए क्या न्यायालय दोषी नहीं हैं? हमारे सामने दर्जनों बड़े-बड़े उदाहरण हैं जहां राज्य सरकारों ने न सर्वोच्च न्यायालय के कई फैसले ही लागू करवाए, न ही राज्य के उच्च न्यायालयों के। आज तक किसी भी मंत्री या अधिकारी को जेल नहीं जाना पड़ा। फिर कैसी अवमानना? जब न्यायाधीशों को अवमानना ही नहीं लगे, अवमानना करने वालों के हौसले बुलन्द क्यों नहीं होंगे!

मान्यवर! इससे भी गंभीर प्रश्न यह है कि अवमानना घोषित होने पर सजा न देना एक पहलू है, दूसरा मुख्य पहलू यह है कि इस स्थिति के चलते सारा जनहित अनदेखा होता जा रहा है। जनहित के कई बड़े-बड़े फैसले अनेक कारणों से लागू ही नहीं हो पाते। इसके लिए अलग से विभाग भी होना चाहिए, जो फैसलों की क्रियान्विति पर नजर रख सके।

राजस्थान उच्च न्यायालय में ही हर माह सरकार के बड़े अधिकारियों को अवमानना मामलों में तलब किया जाता है। प्रश्न है कि परिणाम क्या निकले! जयपुर के निकट रामगढ़ बांध, जिसकी भराव क्षमता साठ फुट से अधिक है, वर्षों से सूखा पड़ा है। अनेक बार हाईकोर्ट की टिप्पणियां भी जारी हुईं कि प्रवाह क्षेत्र मे कॉलोनियां न बसने दी जाएं, अतिक्रमण न किए जाएं, निम्स विश्वविद्यालय के निर्माण प्रवाह क्षेत्र से हटा दिए जाएं। आज भी न कोई कार्रवाई, न अवमानना में कोई सजा! प्रदेश में तो यह भी हुआ, जिन १९ वरिष्ठ अधिकारियों पर मामले चल रहे थे उन्हें भी राज्य सरकार ने वापस ले लिया।

विभिन्न शहरों के मास्टर प्लान बदलते रहने के मामले की सुनवाई के दौरान माननीय न्यायाधीशों ने अधिकारियों को फटकार लगाते हुए जारी निर्देशों की पालना करने के आदेश दिए। क्या फटकार लगाना, ऐसे जनहित के महत्वपूर्ण मुद्दों में, पर्याप्त है? अफसर तो बदलते ही रहते हैं। अगली सुनवाई पर दूसरा आ जाएगा। तब किसको चिन्ता पड़ी अवमानना की। यह चिन्ता तो न्यायपालिका को ही करनी पड़ेगी। पूरे देश पर अंगुली उठाना तो उचित नहीं कहा जा सकता।

एक और परम्परा भी देखने को मिल रही है। प्रदेश के उच्च न्यायालय यदि जनहित में कोई महत्वपूर्ण फैसला राज्य सरकार के खिलाफ देता है, तो राज्य सरकारें इस तरह के फैसले के विरुद्ध सर्वोच्य न्यायालय पहुंच जाती हैं। फैसला लागू ही नहीं हो पाता। तब सरकारें क्यों डरने लगीं अवमानना से। होना तो यह चाहिए कि राज्य सरकारों को बाध्य किया जाए कि पहले फैसला लागू करें, फिर अपील करें।

जबलपुर हाईकोर्ट का निर्णय कि प्रमोशन के दौरान आरक्षण लागू न हो, अभी तक उच्चतम न्यायालय में अटका पड़ा है। क्या इससे उच्च न्यायालय की मानसिकता को चोट नहीं पहुंचेगी? इसी प्रकार दूध के दाम और नियंत्रण के अधिकार का २०१५ का फैसला उच्चतम न्यायालय में निलंबित है। वहां अधिकांश मामले निपटने तक सरकारें ही बदल जाती हैं।

शहरों की सफाई, यातायात, कारों के शीशों पर काली फिल्में लगाना, ध्वनि प्रदूषण, रात्रि में पटाखे चलाने जैसे कार्यों की सूची तो लम्बी है। क्या राज्यों में भी कानून विभाग में ऐसे अधिकारी नहीं होने चाहिएं जो कानून एवं फैसलों की पालना के लिए जिम्मेदार हों? सबसे जरूरी तो यह है कि अवमानना को एक सीमा के बाद नजरअंदाज ही न किया जाए। भ्रष्टाचार ही बढ़ेगा। जो लोग न्यायालय की अवमानना या कानून का उल्लंघन करते हैं उनके मन में डर पैदा होना आवश्यक है। उनमें यह डर पैदा हो, इसकी जिम्मेदारी भी न्यायपालिका की ही है।

आज सारा देश न्यायपालिका की ओर आशा की किरण तलाश रहा है, कार्यपालिका और विधायिका विश्वास खोती जा रही है, ऐसे में माई लॉर्ड, आपकी टिप्पणी देश को निराशा की ओर ले जाएगी। अब भी समय है, आप न्यायपालिका के लिए प्रकाश स्तम्भ की भूमिका निभा सकते हैं ताकि देशवासियों का न्याय के प्रति विश्वास और अधिक सुदृढ़ हो सके।

जून 19, 2017

जीएसटी?

आज जिस रूप में हम एक जुलाई से इसे लागू करने की सोच रहे हैं क्या उसमें वो ही सारी अवधारणा दिखाई पड़ रही हैं? उनमें से कुछ भी दिखाई नहीं पड़ रहा। ये चिंता का विषय भी है और सब तरफ से एक चिंता की आवाज देश भर में सुनाई भी दे रही है।

हमारे देश में राजनीति ने एक नया स्वरूप ग्रहण कर लिया है। सरकारें अपनी संतुष्टि के लिए नीतियां बनाने लगी हैं। हर दल जो सत्ता में आता है उसे अपनी संतुष्टि की परवाह ज्यादा होती है। उसके आगे वो आम आदमी के कष्टों को गौण मान लेते हैं। आज सबसे तेज चर्चा जो देश में चल रही है, वो जीएसटी की है। जीएसटी को एक जुलाई से लागू करने का प्रस्ताव भी है। जीएसटी आज का नहीं करीब-करीब 15-16 वर्ष पुराना विषय है। इतने सालों से जीएसटी पर चर्चा चल रही है। और अब जाकर के इस निर्णय पर सरकार आ रही है कि हमें इसे लागू करना है।

प्रश्न यह है कि क्या सोच कर हमने जीएसटी की अवधारणा को लागू करने की सोची। वैट वाले सिस्टम में ऐसी क्या कमियां थी कि हम उसको हटाना चाह रहे हैं। जीएसटी की सबसे बड़ी उपादेयता देश भर में करों में एकरूपता बताई गई। बहुत बड़ी बात है, यह छोटी बात नहीं है, करों में एकरूपता लाना, इंस्पेक्टर राज का घट जाना, छोटे व्यापारियों-उद्योगपतियों को इससे कितनी बड़ी राहत होती है। इसमें संदेह नहीं है लेकिन आज जिस रूप में हम एक जुलाई से इसे लागू करने की सोच रहे हैं क्या उसमें वो ही सारी अवधारणा दिखाई पड़ रही हैं? उनमें से कुछ भी दिखाई नहीं पड़ रहा। ये चिंता का विषय भी है और सब तरफ से एक चिंता की आवाज देश भर में सुनाई भी दे रही है।

अभी 15 जून को कपड़ा व्यापारियों ने देशभर में हड़ताल की थी, इसी जीएसटी के खिलाफ। अभी सरकार के ही नागरिक उड्डयन विभाग ने कहा है कि एक जुलाई को लागू करने की तैयारी हमारी नहीं है। हमको कम से कम सितंबर तक का समय दिया जाना चाहिए। सवाल ये है क्या एक विभाग की तैयारी नहीं है या बाकी विभागों की बात किसी एक विभाग के जरिए हम बाहर पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। मंशा तो सभी विभागों की हो सकता है यही हो। क्योंकि इस वक्त जो देश के हालात चल रहे हैं। उनको बहुत गंभीरता से समझना पड़ेगा। भाजपा सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री सुब्रह्रमण्यम स्वामी ने तो यहां तक कहा कि 2019 के पहले यदि जीएसटी लागू कर दिया तो केंद्र सरकार को भारी पड़ जाएगा। वो भी एक वाटरलू जैसा कांड हो जाएगा। ये सही है कि इतना दूर हमारी सरकार को देखना तो पड़ेगा। आज हम किस स्थिति में से गुजर रहे हैं, ये तो देखें। क्या हमको नहीं मालूम है कि नोटबंदी के बाद देश की क्या स्थिति रही आर्थिक स्तर पर? आज नकदी की जो समस्या है, उसको कौन नकार रहा है। खुद एसबीआई और हमारे आर्थिक सलाहकार लोग कह रहे हैं कि देश में बड़ा आर्थिक संकट है। सात लाख करोड़ के कर्जे तो जो बड़े-बड़े प्रभावी लोग हैं वो वापस नहीं चुका रहे हैं। किसानों के ऋण माफ किए तो वो तीन लाख करोड़ का भार आने वाला है। दस लाख करोड़ तो ये ही हो गए। इसके साथ-साथ ये भी देखना है कि महंगाई की मार कितनी पड़ती है। हमारी जीडीपी की दर घटकर 6.1 प्रतिशत पर आ गई।

बेरोजगारी की स्थिति सबके सामने है। किसानों की हड़ताल से जो नुकसान हो रहा है। इसमें भी तो ये सारी प्रतिक्रियाएं दिखाई दे रही हैं। हर आंदोलन इसी जीएसटी के नाम पर होना भी जरूरी नहीं है? पर उन सब अभिव्यक्तियों के अंदर उनकी मंशाओं में जाएंगे तो सबको आर्थिक संकट ही दिखाई पड़ रहा है। और उसके अलावा भी देखें की जो सुविधाएं जो प्रावधान जीएसटी ने वापस किए वो सब वह नहीं हैं जो शुरूआती अवधारणा में थे। आज खुद जीएसटी एक दर पर टिका हुआ नहीं दिखाई दे रहा, उसके आठ स्तर बना दिए। कैसे बना दिए आठ स्तर? जीएसटी की तो एक दर देश में रखनी थी। आठ स्तर कहां से हो गए।

हमको इंस्पेक्टर राज से मुक्ति दिलानी थी। आज उल्टा ये है कि छोटे-छोटे व्यापारियों को जो तीन-चार फॉर्म भरने पड़ते थे, उनको तीन दर्जन फॉर्म भरने पडग़ें। लग यह रहा है कि हम सुविधाओं की बात तो कर रहे हैं कि सुविधाएं बढ़ेंगी, महंगाई भी घटेगी। लेकिन ये सरकार की घोषणाएं तो ठीक उसके विपरीत जा रही हैं। तब ये स्वभाविक है कि लोग नाराज तो होंगे। देश के हर कोने से इस नाराजगी की आवाज अब आ रही है। प्रश्न ये है कि ये आवाज सरकार के कानों में कितनी पहुंचती है? सरकार की खुद की तैयारी कितनी है कि दस लाख करोड़ की ये कमी और उसके बाद किसानों की मांगें पूरी करना। अगर किसानों की ही मांगें हर प्रदेश की पूरी हो गई तो वो कितना भार आने वाला है। और क्या सरकारें उससे बच सकती हैं और क्या जेटली जी के कहने से लोग मान जाएंगे कि राज्य सरकारें अपना-अपना निर्णय खुद करेंगी। ये सब भुलावे की बातें हैं। जो परिस्थितियां बनेंगी वो कुछ और बनने वाली हैं। और इन जुमलों से परिस्थितियों का सामना हम नहीं कर पाएंगे। हमें यथार्थ के धरातल पर काम करना चाहिए और इतनी बड़ी नीति में परिवर्तन से पहले लोगों को विश्वास में लेना पहली जरूरत है। बल्कि आज वैट जो भी चल रहा है इन नई परिस्थितियों के मुकाबले में तो ठीक ही है।

यह भी सही है कि कई विकसित देशों में जीएसटी लागू हुई। पर क्या कहीं पर भी 20 प्रतिशत से ऊपर जीएसटी है? बल्कि 15 और 20 प्रतिशत के बीच में ही है। फिर हमारे यहां 28 प्रतिशत जीएसटी तक पहुंचने की जरूरत क्या है? हमारे यहां तो लोगों के पास रोटी खाने को नहीं है, पीने को साफ पानी भी नहीं है और हम 28 प्रतिशत जीएसटी पर जा रहे हैं। ये वो बड़े सवाल हैं जो छोटे व्यापारियों को अभी भी दुख दे रहे हैं। उनकी समस्याएं घटने के बजाए बढऩे वाली दिख रही हैं। महंगाई भी बढऩे वाली दिख रही है। इन सब चीजों पर संवेदनाओं के साथ पुनर्विचार होना चाहिए। और इस जीएसटी का अगले पांच सालों में देश की आर्थिक व्यवस्था पर क्या असर पड़ता है, उसका आंकलन अभी हमारे हाथ में होना चाहिए। हम गलतियों को ढंकने की कोशिश करते हैं, लेकिन वो फिर नासूर बन कर के प्रकट हो जाती हैं, वो स्थिति आगे ना आए और जीएसटी को हमे और दो-चार महीने आगे भी करना पड़ा तो इतने बड़े देश में ये कोई बड़ी अवधि नहीं है। प्रश्न ये है कि हम निश्चिंत होकर पूरे देश की जनता को विश्वास में लेकर ये काम करेंगे तो सुखद परिणाम भी होंगे और पूरा देश केंद्र सरकार के साथ हाथ मिलाकर के काम करेगा।

मई 26, 2017

पूत के पांव

उनके काम में, काम करने के तरीके में कमियां गिनाई जा सकती हैं लेकिन उनकी नीयत या देश के प्रति निष्ठा पर अंगुली उठाने वाला शायद ही कोई मिले।

मोदी सरकार आज अपने कार्यकाल के तीन वर्ष पूरे कर रही है। जब यह सरकार बनी थी तब देश की जनता को भाजपा से ज्यादा नरेन्द्र मोदी से उम्मीदें थीं। वह उन्हें सर्वशक्तिमान की तरह देख रही थी। जो कुर्सी पर बैठते ही देश की सारी समस्याओं का समाधान कर देंगे। यही वह कारण था कि भारतीय जनता पार्टी को पहली बार स्पष्ट बहुमत मिला। तीन साल का कार्यकाल बहुत ज्यादा भी नहीं होता, तो बहुत कम भी नहीं होता। कोई भी सरकार जो करना चाहती है वह शुरू कर चुकी होती है। कुछ नतीजे सामने भी आने लगते हैं। कई तरह से सरकार के वादों और देशहित की मंशा भी सतह पर आ जाती है।

इन तीन सालों में सबसे बड़ी उपलब्धि सरकार देश की जनता में निराशा के माहौल का खात्मा बता सकती है। जब 2014 के आम चुनाव हुए तो देश में निराशा का सा माहौल था। हर दिन यूपीए सरकार के किसी ना किसी मंत्री का भ्रष्टाचार अथवा भाई भतीजावाद अखबारों की सुर्खियां बन रहा था। कभी कॉमनवैल्थ खेल तो कभी टू जी तो कभी कोयला घोटाला। स्वच्छ छवि का होने के बावजूद चुप्पी की वजह से उसके छींटे तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तक जा रहे थे। कम से कम इन तीन सालों में ऐसे किसी भ्रष्टाचार का आरोप तो केन्द्र सरकार के किसी मंत्री पर नहीं लगा।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तो इन वर्षों में पूर्ववर्ती तमाम प्रधानमंत्रियों से अपनी एक अलग साख बनाई है। उनके काम में, काम करने के तरीके में कमियां गिनाई जा सकती हैं लेकिन उनकी नीयत या देश के प्रति निष्ठा पर अंगुली उठाने वाला शायद ही कोई मिले। एक तरफा ही सही पर नियमित रूप से देश के सामने अपने ‘मन की बात’ रखना भी कम हिम्मत की बात नहीं है। उनकी मंत्रिपरिषद के सदस्यों में कुछ तो ऐसे हैं ही जो अपने विभागों में मन लगाकर काम कर रहे हैं। अपने-अपने विभागों का उनका काम देश भर में बोल रहा है। ऐसे मंत्रियों में  रेलमंत्री सुरेश प्रभु, ऊर्जामंत्री पीयूष गोयल, मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर, पेट्रोलियम व गैस मंत्री धर्मेंद्र प्रधान एवं सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी शामिल हैं। गोवा लौटने से पहले ढाई साल में रक्षामंत्री के रूप में मनोहर पर्रिकर भी अपनी अलग छाप छोड़ गए हैं।

पिछले तीन सालों में बहुत कुछ अच्छा हुआ किन्तु लोकतंत्र को झटके भी कम नहीं लगे। विपक्ष का सम्मान लगभग समाप्त हो गया। जो भी नेता भाजपा के विरुद्ध भारी पड़ेगा, उससे निपट लिया जाएगा। मानो भाजपा के सारे नेता दूध के धुले ही हों। कांग्रेस द्वारा नियुक्त राज्यपाल किस तरह हटाए गए, किस प्रकार नजीब जंग ने दिल्ली सरकार को नाकों चने चबवाए- ऐसा नजारा आश्चर्यजनक ही था। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि विपक्ष जितना मजबूत होगा, सरकार भी उतना ही अच्छा कार्य कर पाएगी। इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए उन्होंने स्वयं पार्टी के कुछ कद्दावर नेताओं को विपक्ष की भूमिका से जोड़ा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी कुछ बड़े नेताओं के जरिए जनसंघ की स्थापना की थी।

तीन वर्ष पहले किए गए कुछ चुनावी वादों को तो भाजपा के ही बड़े नेताओ ने चुनावी जुमले कहकर दाखिल दफ्तर कर दिया। जनता ने जो बहुमत दिया शायद यह उसका इनाम था। पेट्रोल के दाम बढ़ते गए। खाद्य पदार्थ पहले ही वर्ष में महंगे हो गए। नीचे का भ्रष्टाचार ज्यों का त्यों है। कालाधन वापस लाने की घोषणाएं अभी पूरी होने का इंतजार कर रही हैं। इसके विपरीत नोटबंदी करके बेरोजगारी की समस्या भी पैदा कर दी। सैकड़ों उद्योग धंधे बन्द हो गए। प्रधानमंत्री ने अपनी पारी की शुरुआत ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ के सपने के साथ की थी। इसके लिए दिन रात मेहनत भी की थी। लोगों की उम्मीदों के खिलाफ  अपने शपथ समारोह में पड़ोसी राष्ट्राध्यक्षों के साथ पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ  को भी बुलाया था।

विकास की नीतियों में ‘रिटेल में सीधे विदेशी निवेश’ का विरोध करने वाली भाजपा ने यूपीए सरकार द्वारा मंजूर 51 प्रतिशत एफडीआई को ही आगे बढ़ाया। मेक इन इंडिया की चर्चा तो खूब की गई, किन्तु रोजगार का ग्राफ  नीचे आता ही जा रहा है। अब तो छटनी की हवा चल पड़ी है, सरकारी भर्तियां बन्द पड़ी हैं। हर व्यक्ति के बैंक खातों में 15 लाख जमा कराने का वादा ‘अच्छे दिन’ उड़ाकर ले गया। देश में नक्सलवाद बढ़ता जा रहा है। लोग मरते जा रहे हैं। अन्य अपराध, महिलाओं से जुड़े अपराधों का ग्राफ  भी बढ़ा और निर्भया जैसे मामले भी बढ़े।

कश्मीर में हालात बेकाबू हो चुके हैं। पाकिस्तान युद्ध विराम का उल्लंघन करता जा रहा है। सर्जिकल स्ट्राइक का प्रयोग निष्प्रभावी रहा। उसके बाद भी तीन बार पाक सैनिक हमारे जवानों के सिर काटकर ले गए। चीन-रूस से संबंध कड़वे हुए। सारे पड़ोसी पहले ही मुंह सुजाए हुए हैं। चीन से हुए व्यापारिक समझौते काम नहीं आए। अब तो नेपाल से भी तनाव बढऩे लगा है।

इन वर्षों में केन्द्र ने हर सरकार की तरह योजनाओं का अम्बार-सा लगा दिया। जनधन योजना, स्वच्छ भारत, प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास, उज्जवला, ग्राम सड़क योजना की शुरुआत की। 22 करोड़ जनधन खाते खुले, 100 करोड़ से अधिक आधार-कार्ड बने, स्वच्छ भारत के लिए 9000 करोड तथा स्मार्ट सिटी के लिए 7060 करोड़ रुपए आवंटित किए। 20 हजार करोड़ गंगा की सफाई के लिए रखे गए। दो वर्षों में 13 लाख शौचालय बनाए गए। कालाधन, मनरेगा, आधार कार्ड, जीएसटी और एफडीआई पर टैक्स के मुद्दों पर सरकार ने यू-टर्न लेकर मनमोहन सरकार की शैली को ही स्वीकार किया। लोकपाल की नियुक्ति अभी तक नहीं हो पाई है। उच्चतम न्यायालय के साथ कॉलेजियम को लेकर विवाद भी जारी है। धारा 370 और राम मंदिर के मुद्दे वहीं के वहीं हैं। कॉमन सिविल कोड और तीन तलाक के मुद्दे सर्वोच्च न्यायालय में हैं।

एक और परिवर्तन पिछले तीन सालों में यह सामने आया कि मोदी सरकार ने यह प्रमाणित कर दिया कि लोकतंत्र के प्रहरी-मीडिया को आसानी से जनता के बजाय सरकार के साथ जोड़ा जा सकता है। उसके मुंह में शब्द रखे जा सकते हैं। जिस सोशल मीडिया को मोदी सरकार ने सर पर बिठाया था आज वही मोदी जी के पिछले और आज के वक्तव्यों के विरोधाभास दिखा रहा है। समझने की बात इतनी ही है कि, सरकार का ध्यान कितना देश की ज्वलंत समस्याओं पर रहा। जैसे कि, जनसंख्या, गरीबी, बेरोजगारी, स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा। अन्तिम बिन्दु के व्यक्ति तक कितना लाभ पहुंच पाया-? आज तो जीवन की पहली प्राथमिकता-पीने का स्वच्छ पानी भी सबको नसीब नहीं है।

और भी कई कमियां हैं पर ये सब आज की नहीं हैं। पिछले सत्तर वर्षों से चल रही हैं। तब प्रश्न दोष देने का नहीं है। प्रश्न है उम्मीदों का। देश की जनता को प्रधानमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी से कुछ अलग ही तरह की उम्मीदें हैं। ऐसी उम्मीदें जो शायद उसने पहले देश के किसी प्रधानमंत्री से नहीं की। यह उम्मीदें रोजमर्रा के सरकारी कामकाज से हटकर हैं। उनके द्वारा कुछ क्रान्तिकारी काम करने का जनता को अभी इन्तजार है।

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