Gulabkothari's Blog

April 3, 2020

प्रकृति

सृष्टि में महामारी प्राकृतिक प्रकोप कहा जाता है, जो कि वैश्विक समस्या बन जाती है। कई रूपों में इसका क्रम भी सम्वत्सर की भांति नियमित भी होता है। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का निर्माण चूंकि प्रकृति ही करती है, अत: हम भी प्रकृति की ही उपज हैं। अत: प्रभावित होना अनिवार्य है। यह चर्चा भी विश्व में बराबर बनी रहती है कि हम प्रकृति से खिलवाड़ कर रहे हैं, उसका अमर्यादित दोहन कर रहे हैं। पर्यावरण दूषित हो रहा है, पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है। इसके बावजूद प्रकृति के स्वरूप एवं कार्य की चर्चा नहीं होती। न शिक्षा में और न ही विज्ञान में इसका समावेश है, तब व्यक्ति कहां से शुरू करे!

जब प्रकृति में कुछ नहीं (प्रलय) होता, तब भी एक प्राण तत्त्व रहता है-अक्षर। सृष्टि इसी में लीन होती है और पुन: इसी से सृष्ट होती है। जब भी किसी वस्तु का निर्माण होता है तो पहले उसका केन्द्र बनता है। केन्द्र को ‘हृदय’ कहते हैं। हृदय में हृ-आहरण सूचक विष्णु प्राण, द-दयति सूचक इन्द्र प्राण तथा य-यमयति-नियंत्रक ब्रह्मा प्राण वाचक है। एक ही प्राण विभिन्न कार्यों के रूपों में विभिन्न नामों से जाना जाता है। हृदय के बाहर अग्नि और सोम सृष्टि क्रम को आगे बढ़ाते हैं। केन्द्र-अहंकृति, परिधि-आकृति एवं मध्य भाग प्रकृति कहे जाते हैं। तीनों एक साथ उत्पन्न होते हैं। अहंकृति सूर्य से, प्रकृति चन्द्रमा से और आकृति का निर्माण पृथ्वी तत्त्व से होता है। हृदय में स्थित ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र प्राणों की शक्तियों को क्रमश: सरस्वती, लक्ष्मी, काली कहते हैं। पुराणों में इन्द्र को महेश कहते हैं। ये तीनों शक्तियां ही रज, सत्व, तम नाम से प्रकृति कही जाती हैं।

सूर्य से आगे मह:लोक से प्रकृति आदि का निर्माण होता है। जीव का निर्माण होता है। ‘ममयोनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन गर्भंदधाम्यहं’ (गीता)। सूर्य जगत् का पिता है। सृष्टि वहीं से मूर्त रूप लेती है। जीव सोम रूप वर्षा के माध्यम से पृथ्वी की अग्नि में गिरता (आहूत होता) है। वनस्पति और औषधियां (स्थूल सृष्टि) एवं प्राणी उत्पन्न होते हैं। ये सब आगे की सृष्टि के अन्न बनते हैं। श्रुति कहती है-‘जीवो जीवस्य भोजनम्’। अन्न की प्रकृति के अनुरूप तीन श्रेणियां हो जाती हैं। गीता कहती है-‘सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण-ये तीनों जीवात्मा को शरीर में बांधते हैं’।

आयु, बुद्धिबल, आरोग्य, सुख और प्रीति को बढ़ाने वाला, रसयुक्त, चिकना, स्थिर रहने वाला अन्न सात्विक कहलाता है। कड़वे, खट्टे, लवणयुक्त, गर्म, तीखे, रूखे, दाहकारक, दु:ख, चिन्ता और रोगों को उत्पन्न करने वाला आहार राजस है। अधपका, रसविहीन, दुर्गंधयुक्त, बासी और अपवित्र भोजन तामसी कहलाता है। (गीता)

जिस अन्न से हमारा निर्माण होता है, वह चार भागों में विभक्त रहता है-दधि, घृत, मधु और अमृत। जिस अन्न में ये चारों रस विकसित रहते हैं, वह जठराग्नि (वैश्वानर) का अन्न होता है। कच्चा अन्न मानव के लिए नहीं होता। पका धान ही अन्न बनता है। आटे में जो कण भाग है, वही दधि भाग है, जो मांस, अस्थि जैसे घन भागों का निर्माण करता है। आटे को जब ओसणा (गोंदा) जाता है, तब लोच (स्नेहन) दिखाई पड़ता है, वही घृत का अंश है। दधि भाग पार्थिव द्रव्य था, घृत भाग आन्तरिक्ष्य द्रव्य है। घृत ज्योतिर्मय है। मधु द्युलोक का रस है। चैत्रमास में सूर्य जब भरणी नक्षत्र पर आते हैं, तब भूमण्डल पर मधु वर्षा होती है। मधुमास काल होता है। सब में एक प्रकार का मिठास आ जाता है। अन्न में रहने वाला मिठास ही मधु का प्रत्यक्ष है।

घृत भाग से रस, रक्त, मज्जा आदि तरल पदार्थों का पोषण होता है, मधुरस से शुक्र का। शुक्र को मधु भी कहते हैं। अमृत रूप चौथे तत्त्व का आगमन परमेष्ठी (जन:) लोक से होता है। यह मन का पोषण करता है। यही अमृत ‘स्वाद’ कहलाता है। हम सोच सकते हैं कि पर्यावरण का परिणाम सबसे पहले हमारी अन्न उत्पादक क्रियाओं पर होता है। कहते हैं-‘जैसा खावे अन्न, वैसा होवे मन’।

सृष्टि के आरंभ काल में कृषि का विकास नहीं हुआ था। चारों ओर जल था, समुद्र थे, रेगिस्तान थे। जहां जो उपलब्ध हुआ, लोग उसी से जीवन यापन करते थे। जब कृषि का ज्ञान हुआ, सभ्यता आगे बढ़ी, अन्न का मानवीय स्वरूप विकसित होने लगा। मनुष्य की प्रकृति बदलने लगी। उसी के साथ आकृति और अहंकृति का स्वरूप भी बदला। समय के साथ मांसाहार का स्थान शाकाहार ने लेना शुरू कर दिया। विशेषकर कृषिप्रधान क्षेत्रों में। आकृति-प्रकृति-अहंकृति में बड़ा परिवर्तन आया। शरीर की त्वचा तक पतली पड़ गई। पाश्विक स्वभाव की आक्रामकता, हिंसा में कमी आई। चूंकि औषधियों में दुग्ध, दही, घृत, मधु, अमृत के अंश पशु शरीर के अनुपात में प्रचुर मात्रा में रहते हैं, अत: स्नेह-माधुर्य का विकास भी स्पष्ट हुआ।

आज प्रकृति के अलावा मनुष्य ने स्वयं अपनी तृष्णा के कारण और विज्ञान के नाम पर अन्न को विष बना लिया। कृत्रिम बीज, कृत्रिम खाद, कीटनाशकों के प्रयोगों ने न केवल अनाज, बल्कि सब्जियों, फलों तथा दूध तक को विषैला बना दिया। तृष्णा का वातावरण शिक्षा ने दिया, विज्ञान ने पोषित किया और मनुष्य कैंसर की चपेट में आ बैठा। हृदय की प्रकृति रूठ गई, शरीर की प्रकृति विकृत हो गई। हर महामारी के लिए हमारे द्वार खुल गए। उधर मांसाहार ने शरीर के कई अवयवों को पाश्विक तत्त्वों से जोड़ दिया। मृत पशु में न रस रहता है, न मन, न स्नेहन और न ही अमृत। अमृत के जाने को ही तो मृत्यु कहते हैं। मृत्यु जीवन का आधार कैसे बन सकता है। मन निर्मल-असंभव!

April 1, 2020

परीक्षा की घड़ी

आपदा कहकर नहीं आती। आपदा निजी जीवन में भी आती है और सार्वजनिक जीवन में भी आती है। वैसे तो क्षणभंगुर जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं रहता। सुख का घट जाना ही दु:ख है, दु:ख का बढ़ते जाना ही आपदा है। भारतीय संस्कृति में आपदा या विपत्ति को परीक्षा की घड़ी माना जाता है। आज भले ही यह बात अच्छी नहीं लगे, किन्तु शास्त्र कहते हैं कि विपत्ति ईश्वर जानबूझकर देता है। विपत्ति में व्यक्ति ईश्वर को कभी नहीं भूलता।

महाभारत का एक प्रसंग है-युद्ध के बाद जब सारी स्थितियां सुचारु हो गईं, कृष्ण पहुंचते हैं कुंती के पास। कहते हैं-‘बुआ! आज्ञा लेने आया हूं द्वारिका प्रस्थान के लिए। सब व्यवस्थित हो गया है।’ कुंती को विश्वास तो नहीं हुआ, फिर भी पूछा कि क्या बुआ को खाली हाथ छोडकऱ चला जाएगा? कृष्ण ने कहा-‘नहीं! आप जो भी आदेश करें, देकर जाऊंगा।’ कुंती ने सिर हिलाया-‘विश्वास नहीं होता। तेरा तो नाम ही छलिया है। विश्वास कैसे करूं?’

‘मेरे कहने से ही कर लो।’ कृष्ण रुक गए।

‘अच्छा देना ही चाहता है और दे ही सकता है तो…। कुंती पूरी बात कहे इसके पहले ही कृष्ण ने पूछ लिया-‘क्या?’

‘मुझे दु:ख चाहिए, दु:ख दे।’ कुंती आगे नहीं बोल पाई। कृष्ण भी चकित थे। ‘बुआ! बारह साल का वनवास काटा, एक वर्ष अज्ञातवास और सम्पूर्ण खानदान को आंखों के आगे उजड़ते देख लिया। अब कौनसा दु:ख बाकी रह गया।’ ‘बातें मत बना। देना है तो दे। मना तो कर ही सकता है। बात यह है कृष्ण! दु:ख में ही तू सदा साथ रहता है। सुख में छोड़ जाता है।’

आज देश के समक्ष प्राकृतिक आपदा मुंहबाएं खड़ी है। हर नागरिक के सिर पर मौत की तलवार लटक रही है। और सबको अपना-अपना मालिक याद आ रहा है। मालिक या ईश्वर सबके दिलों में ही है। देश स्वप्नवास्था से जाग्रत हो चुका है। हमें अपने उस ईश्वरीय स्वरूप को प्रकट करना है। सबके भीतर एक ही स्वरूप दिखाई पड़ेगा। उसका बचना ही हमारा बचना है। हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई, नाम कुछ भी हो, हम एक ही पेड़ की डालियां हैं। हर प्राणी उसी पेड़ का पत्ता है। पेड़ सुरक्षित है, तो पत्ता है। कोई पत्ता एक-दूसरे से टूटकर जीवित नहीं रह सकता।

यह भी सच है कि आपदा मानव की गलती से आई है। प्रकृति कुपित हुई है। हम क्षमा याचना करें प्रकृति से भी, अपनी आत्मा से भी। हमें निकल पडऩा है नर की सेवा करने। आज चारों ओर गरीब पलायन कर रहा है। भूख उसे नोंच रही है। सरकार का अपना तरीका है, राहत पहुंचाने का। पहले उनको फाइलों का पेट भरना होता है, फिर इंसानों का। हमें निकल पडऩा है। घर-घर से दो-तीन परिवारों का खाना तथा अन्य आवश्यक सामग्री अवश्य पहुंचनी चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति दाता बन जाए। जिसके आसपास जो दिखाई दे, उसी तक पहुंच जाओ। एक गाना था पुराना-‘तेरे द्वार खड़ा भगवान, भगत भर दे रे झोली।’ हमारे छोटे से सहयोग से पूरा देश कोरोना से लड़ सकेगा। रामसेतु निर्माण में गिलहरी की भूमिका कम नहीं थी।

आज हमें प्रकृति ललकार भी रही है, पुकार भी रही है। वही हमारी मां भी है। हमने जो उसका अपमान किया, उसके लिए क्षमा मांगते हुए जीवन की नई डगर पकड़ें। जहां न जाति, न समाज। सब अपने-अपने घरों के भीतर। बाहर हम एक पेड़ के पत्ते। जुड़वां भाई-बहिन। किसी को भी खोकर हम सुखी नहीं। न कोई भूखा सोए, न इलाज से वंचित रहे। यदि हुआ, तो यह हमारा और हमारी संस्कृति का अपमान होगा। नर की सेवा ही नारायण-व्यक्ति ही देश-व्यक्ति ही ब्रह्म-के योग का मार्ग है। सब मिलकर सुखी रह सकें, यही स्वर्ग है।

March 31, 2020

जवाबदेह कौन?

जब किसी परिवार अथवा देश का मुखिया अपने सहयोगियों की अक्षम्य लापरवाही के लिए देश/परिवार से क्षमा मांगे, इससे बड़ी शर्म की बात और हो भी क्या सकती है। शर्म तो इस बात पर भी आती है कि प्रधानमंत्री ने लापरवाही पर 22 मार्च को भी नाराजगी प्रकट की थी। नोएडा में जाम लगा था। दिल्ली तथा चार राज्यों में तो कर्फ्यू लगाना पड़ गया था। राज्यों को सख्ती से निपटने के आदेश भी जारी किए थे। प्रश्न यह है कि फिर भी अधिकारी हिले नहीं। राजस्थान में तो कार-बाइक तक पर रोक लगा दी गई। तब से आज तक कोरोना की गंभीरता तथा कामगारों के पलायन का जो नजारा सामने आया, उसने प्रशासन के निकम्मेपन की भी पोल खोल दी और सरकारों की प्रशासन पर प्रभावहीनता को भी उजागर कर दिया।

अगले दिन 25 मार्च को मजदूरों ने गांव की ओर पैदल कूच कर दिया। एक साथ हजारों-हजार और अधिकारी ‘वर्क फ्रॉम होम’ की तर्ज पर। किसी की नींद नहीं उड़ी। प्रधानमंत्री ने 24 मार्च को रात 8 बजे पूरे देश में लॉकडाउन की घोषणा करते हुए कहा था कि ‘लापरवाही की बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी। जो जहां है, वहीं रहे’। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का समर्थन तो किया था, किन्तु कल राजस्थान दिवस पर उन्होंने कहा या कहना पड़ा कि ‘मेरी अपील की यदि गंभीरता से पालना होती तो बेहतर होता’।

जिस लोकतंत्र में नेतृत्व लाचार नजर आए, सर्वोच्च नेतृत्व क्षमा मांगे तो जनता की स्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है। क्यों नहीं हर स्तर पर लापरवाही की निष्पक्ष जांच कराई जाए। जो निकम्मे, अपराधी मानसिकता वाले, सरकार के आदेशों की अवहेलना करते नजर आएं, उन्हें सजा मिले और सेवा मुक्त भी तुरन्त-आपातकाल की स्थिति मानते हुए-किया जाए।

अचानक उद्योग बंद हो गए, अधिकारी बेखबर। क्या इस परिस्थिति को योजना बनाकर नियंत्रित नहीं किया जा सकता था। क्या यह अचानक हो गया? नहीं। अधिकारियों ने रुचि नहीं दिखाई। सम्पूर्ण देश के उद्योग एक ही दिन बंद हो गए।

उद्योगपतियों की सूझबूझ और संवेदनहीनता का और प्रमाण क्या चाहिए। उनको भी प्रशासन से चर्चा करनी चाहिए थी। जब बसें, रेलें, हवाई यात्राएं बंद थीं तो क्या दिखाई नहीं दे रहा था कि मजदूर कहां जाएगा? अधिकारी की नौकरी को खतरा होता तो यह सब नहीं होता। जब मजबूरी में राज्यों को बसें लगाकर लोगों को भेजना पड़ा, तो क्यों नहीं उद्योग बंद करने के साथ ही यह फैसला हो जाता। लोगों को सडक़ पर कष्ट भी नहीं उठाने पड़ते, न ही कोरोना के वायुमण्डल को और दूषित करना पड़ता। सरकार के किसी बंदे को अनुमान नहीं है कि पिछले 3-4 दिनों में देश भय के किस वातावरण से गुजरा है। मौत का यह भय मौत से भी बड़ा रहा है। क्यों राज्यों ने केन्द्र की एडवाइजरी को लागू नहीं किया? क्यों इस छंटनी तथा पलायन के मुद्दे पर केन्द्र और राज्यों में समन्वय की आवश्यकता महसूस तक नहीं हुई? उत्तरप्रदेश जैसे राज्यों ने तो आने वालों के प्रवेश को ही रोक दिया। वाह रे, लोकतंत्र! मेरे लिए मेरा गांव ही विदेश हो गया! इस दुर्घटना में देश की एक नई तस्वीर उभरकर सामने आई है। प्रवासी मजदूरों के प्रति संवेदना नहीं-अपने ही देश में।

केन्द्रीय नेतृत्व के लॉकडाउन के प्रोटोकॉल का उल्लंघन सहजता से हो रहा है, किसी स्तर पर कोई पीड़ा ही नहीं। अब तीसरी बार केन्द्र को निर्देश जारी करने पड़े। कलक्टर और एस.पी. को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराया जाएगा, जो कैडर में आमतौर पर सबसे जूनियर होते हैं। जवाबदारी केन्द्र और राज्यों के वरिष्ठ सेनापतियों के सिर पर होनी चाहिए। बाकी को लगाना उनका दायित्व हो। अभी समस्या की शुरूआत है। सीमा सील कर दी और पलायन जारी है। बांग्लादेश सीमा से लोग पार जा सकते हैं, तो उदयपुर की सीमा तो घर की है।

केन्द्र सरकार ने तो एक 1.7 लाख करोड़ का बजट राहत के लिए जारी कर दिया। कोई क्रियान्विति को भी नियंत्रित करे यह आवश्यक है। हमारे बीपीएल का अनाज आज भी बाजार में बिकता है। स्थिति गंभीर है। देश जिंदगी और मौत के बीच झूल रहा है। ऐसे में राज्यों की लापरवाही के लिए प्रधानमंत्री को क्षमा मांगनी पड़े, इस कंलक को तुरंत मिटाने के प्रयास करने चाहिए।

March 30, 2020

कामना

‘या देवी सर्वभूतेषु क्षुधा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:’॥

दुर्गा-अर्चना में इस विष्णु माया रूप को क्षुधा कहा गया है। क्षुधा का अर्थ भूख होता है। हम केवल शरीर की इस भूख को ही क्षुधा मान बैठते हैं। शरीर की भूख है भोजन, मन की भूख है सुख, बुद्धि की भूख है ज्ञान तथा आत्मा की भूख है मोक्ष। भूख का अर्थ है अभाव। बिना अभाव के अनुभव के कैसी इच्छा अथवा कामना! इच्छा के लिए ज्ञान पहली आवश्यकता है। बिना ज्ञान के इच्छा पैदा ही नहीं होती। ज्ञान आत्मा का पर्याय है। इच्छा मन में पैदा होती है, शरीर या बुद्धि में पैदा नहीं होती। अर्थात्-कामना में मन केन्द्र होता है तथा आत्मा इसका आधार होता है।

जीवन कामना से चलता है। मन में यदि कामना नहीं है, तो कर्म भी नहीं है। मन को कामना ही चलाती है। बल्कि मन को कामना ही पैदा करती है। कामना को मन का बीज कहा है-

‘कामस्तग्रे समवर्तताधि, मनसो रेत: प्रथमं यदासीत् ॥’

सृष्टि के आरंभ में ब्रह्म निष्काम है। माया के प्रकट होते ही कामना जाग्रत हो उठती है-‘एकोहं बहुस्याम्’। माया ही कामना है। यही ब्रह्म के जीवन का संचालन करती है। कामना पूर्ति के लिए संकल्पित होना ही तो बन्धन है। कामना ही फल की इच्छा है। कामना ही कर्ता भाव पैदा करती है। आत्मा को आवरित करके जीव को आगे करती है। कामना ही ब्रह्म को जीव बनाती है। सूक्ष्म से स्थूल का निर्माण होता है, यही सृष्टि है। इसका अर्थ यह भी है कि यह कामना जीवन की शक्ति है, यह किसी देवता का नाम नहीं है।

सृष्टि में कर्म है, गति है, किन्तु कामना ब्रह्म की है। क्षुधा ही कर्म की प्रेरणा है। क्षुधापूर्ति ही छाया है, तृष्णा है। माया के, शक्ति के अथवा पत्नी रूप स्त्री के दोनों रूप कार्यरत दिखाई पड़ते हैं। एक सृष्टि में प्रवृत्त और दूसरा अध्यात्म जनित निवृत्त भाव। क्षुधापूर्ति के साथ ही तृष्णा उसकी अधोगति का मार्ग है। पेट भर जाता है, मन नहीं भरता। यही तृष्णा है। शक्ति की प्राप्ति भी क्षुधापूर्ति ही है, किन्तु कुछ अच्छा करने को प्रवृत्त करती है। विरोधी गतिविधियों में लज्जा एकमात्र ऐसा कारण है जो व्यक्ति को सकारात्मक बनाए रखता है।

यहां हमें यह ध्यान में रखना चाहिए कि माया के तीन भाव (गुण) होते हैं-सत्व, रज, तम-जिनके अनुरूप मन में इच्छा उठती है-कर्म होता है और वैसा ही फल मिलता है। इन मन के भावों का नियंत्रण अन्न-ब्रह्म के द्वारा किया जाता है। अर्थात् सम्पूर्ण सृष्टि में माया के कार्य ब्रह्म की इच्छा से ही होते हैं। सत्व और रज माया के कर्मों की दिशाएं हैं। रज ही गति तत्त्व (यजु:) है। जिस प्रकार मन और वाक् (परिणाम) के मध्य प्राण होता है।

मानव जीवन में भी माया का स्वरूप कामना ही है। पत्नी कामना बनकर ही जीवन में प्रवेश करती है। सृष्टि विस्तार (ब्रह्म की) की निमित्त बनती है। बीज को वृक्ष का रूप प्रदान करती है। वृक्ष में नया बीज पैदा करने की क्षमता पैदा करती है। चूंकि आत्मा अमर है, अत: उसे मां-बाप पैदा नहीं करते। सृष्टि विस्तार के लिए शुद्ध आत्मा का यज्ञ के आरंभ में आह्वान करते हैं। पत्नी ही क्षुधापूर्ति का साधन बनती है, वही तृष्णा भी बन जाती है, तो शक्ति भी बन सकती है।

कामना दो प्रकार की होती है-एक, ईश्वर की तथा दूसरी, जीव की। ईश्वर की कामना कर्म फल के अनुसार आत्मा से पैदा होती है। इसके कर्म को चाहकर भी नहीं टाला जा सकता।

जन्म-मृत्यु-विवाह-संतान-रोग-दुर्घटना-मित्र-शत्रु आदि इसके क्षेत्र हैं। व्यक्ति की कामना उसके अहंकार का प्रतीक है। प्रकृति उसे एक निश्चित दिशा में जीने के लिए, एक निश्चित उद्देश्य और पृष्ठभूमि के साथ किसी परिवार में भेजती है। वैसी ही इच्छाएं उसके मन में उठती भी हैं। जब तक व्यक्ति अपने भीतर से जुड़ा रहता है, प्रकृति के साथ जीता है। ईश्वर ने कोई इंसान एक जैसे नहीं बनाए। प्रत्येक व्यक्ति अद्वितीय है। आज शिक्षा ने इस विशेषता को समाप्त करके सबको एकसा बना दिया, कारखाने के उत्पाद की तरह। अत: व्यक्ति की इच्छाएं जीवन में अधिक प्रभावी हो गईं। भीतर की कोई सुनता ही नहीं। स्वयं अपना ईश्वर बन बैठा।

आज कोरोना वायरस ने सबको बाहर जाने से रोक दिया। हम सबके पास भीतर जीने का अवसर है। हमें जीवन की दिशा, शक्तियों और कमजोरियों का आकलन कर लेना चाहिए। सबका जीवन बदल सकता है। ऊंचा उठ सकता है। सबके भीतर वही ईश्वर बैठा है। सभी शक्तिमान पुरुष हैं। सभी प्रकृति रूप शरीर भी हैं। अद्र्धनारीश्वर हैं। शक्ति के द्वारा ही पुरुष प्रकट होता है। स्त्री के भीतर भी वही एक पुरुष है। भीतर के चिंतन में हम शरीर के केन्द्र में अपने स्वरूप को पहचानने का, अपने स्वरूप या स्वभाव से परिचय करने का प्रयास करें।

एकान्त-शान्त स्थान में बैठकर कुछ समय के लिए कुछ न करें। ब्रह्म की तरह से निष्क्रिय हो जाएं। माया (शरीर-मन-बुद्धि) को भी शान्त होते देखना है। प्रयास कुछ भी नहीं करना है। शरीर पूर्ण शिथिल, श्वास मंद, विचार शान्त-शून्य। आप दर्शक मात्र। विचार आएंगे, आने दें-पकड़े नहीं-जाने दें। कुछ अभ्यास के बाद स्वत: ही ठहराव आने लगेगा। धीरे-धीरे भीतर का कचरा बाहर निकल जाएगा। तब आपका निजी स्वरूप-जो आप लेकर पैदा हुए तथा जिसमें आपका पूर्व जन्मों का ज्ञान सम्मिलित भी है, प्रकट होता चला जाएगा। नित्य नए-नए विचार सामने उभरेंगे। आपकी प्रकृति जितनी शान्त और नियंत्रण में रहेगी, आपका आत्म (ब्रह्म) स्वरूप प्रकाशित होता चला जाएगा। इस कोरोना के लॉकडाउन को वरदान में बदल सकते हैं। स्वर्णिम जीवन जीने का स्वर्णिम अवसर है। जीवन की चकाचौंध के पीछे की वास्तविकता का ज्ञान हो जाएगा। कोरोना चला जाएगा, हमारा प्रवाह भी क्षीर सागर की ओर मुड़ जाएगा। वेद वाक्य है कि जो हुआ, अच्छा हुआ, जो होगा, अच्छा ही होगा।

March 28, 2020

भीतर भी झांकें

भारत एक मात्र ऐसा देश है जहां नारी की शक्ति रूप पूजा-अर्चना होती है। वही सृष्टि रचती है, वही पालन-पोषण करती है, वही पुरुष का निर्माण करती है और जिस प्रकार पुरुष को निर्माण के लिए प्रेरित करती है, उसी प्रकार वानप्रस्थ के समय उसे विरक्त भी करती है। मोक्ष ही जीवन में पुरुषार्थ का लक्ष्य माना गया है। मोक्ष के लिए माया ही पुरुष को तैयार ही करती है।

पिछले तीन दिनों से पूरा देश शक्ति रूपा दुर्गा की आराधना कर रहा है। नवरात्रा पर्व और नवसम्वत्सर के अनुष्ठान चल रहे हैं। शिक्षित एवं समर्थ वर्ग नारी को भोग की वस्तु मानता रहा है। उनका मन शिक्षित नहीं होता। भावनाओं से भी समृद्ध लोग दिखावटी ही माने जाते हैं। न इनके पास परिजनों के लिए समय होता है, न ही स्वजनों के लिए। इनकी गृहस्थी का भार स्त्री ही उठाती है। उसके दिल में देवता रहते हैं। पुरुष दिमाग से जीता है जहां देवता के लिए कोई स्थान सुरक्षित नहीं है।

मैं प्रकृति का आभार प्रकट करता हूं कि अपना क्रोध कोरोना के माध्यम से सम्पूण विश्व में प्रकट किया। मृत्यु सबकी होनी है। किन्तु मानव में चेतना का सुप्त होना भी मृत्यु है। और यह सारा खेल भी माया रूप प्रकृति का ही है। कृष्ण ने कहा कि-‘नाह प्रकाश: सर्वस्य योगमाया समावृत:।’ गीता और इस कोरोना के माध्यम से प्रत्येक परिवार में प्रत्येक नारी पुन: प्रतिष्ठित हो रही है। सबके पति घर पर, बच्चे घर पर, परिजन-स्वजन साथ और काम करने वाले छुट्टी पर। धोबी, नाई, सफाई वाले छुट्टी पर। और सारे फ्रण्ट महिलाओं के हाथ में। क्या वह दस हाथ वाली दुर्गा प्रमाणित नहीं हो रही प्रत्येक परिवार में। कौन है उसका विकल्प? पति या पुत्र? पति को भी वही पुत्र बनाती है। वृद्धावस्था में पति को ही पुत्र की तरह पालती है। कभी विचार करके देखना कि कौन किसको भोग रहा है। पुरुष भीतर से शीघ्र द्रविण होने वाला है। शीघ्र उसका मानस बदलता रहता है। स्त्री के साथ ऐसा नहीं है। वह भीतर से कठोर होती है। सौम्यता उसका शस्त्र है। कठोरता और दस हाथ-अस्त्र-शस्त्र सहित-उसके साधन हैं-सृष्टि निर्माण के। पुरुष को वही ब्रह्म से छीनकर अंश रूप में लेकर आती है, उसका ही यह दायित्व भी है कि वही अंश को अंशी से मिलाए। क्या यह कार्य स्थूल देह से संभव है? पुरुष भीतर कम झांकता है, स्त्री भीतर जीती है।

जब तक हम घरों में बन्द हैं, बाहर नहीं जा सकते, हमें भीतर जीने का अभ्यास कर लेना चाहिए। हम भीतर हैं, बाहर शरीर है। न स्त्री शरीर का नाम है, न पुरुष। तत्त्व रूप में दोनों पुरुष हैं, दोनों अद्र्धनारीश्वर हैं। फिर भी जब ब्रह्मा-विष्णु असुरों के डर से भाग जाते हैं, मोहिनी शक्ति का ही सहारा लेते हैं। हमारे जन्म के साथ भी असुरों (नकारात्मक भावों) की सेना साथ आती है। इनमें से अधिकांश को तो मां गर्भावस्था में ही नष्ट कर देती है। गुरु बनकर अभिमन्यु बना देती है। नाद ब्रह्म से जोड़ती है।

देवता 33 और असुर 99 होते हैं। देवों से बलवान भी होते हैं। तब दूसरे चरण में पत्नी रूप में अन्न-ब्रह्म के माध्यम से निर्माण करती है। आत्मा से आत्मा का सम्प्रेषण करती है। अपनी आत्मा को पति की आत्मा में आहूत करती है। दम्पत्ति रति (वात्सल्य, स्नेह, श्रद्धा, प्रेम) का अभ्यास करती है, ताकि गृहस्थाश्रम के बाद व्यक्ति स्वत: ही देवरति में प्रवेश कर ले।

क्या यह स्पष्ट नहीं होता कि जन्म से मृत्यु पर्यन्त स्त्री स्वयं के लिए जीती ही नहीं। वह प्रकृति है, माया है, शक्तिमान की शक्ति है। आज की भौतिकवादी शिक्षा ने हमें लक्ष्मी का दास-जड़-बना दिया। हमारी चेतना को शिक्षा सुला देती है। हम पशु रह जाते हैं। आहार-निद्रा-भय-मैथुन से आगे चिन्तन ही ठहर जाता है। तब स्त्री भोग या मनोरंजन की वस्तु बन जाती है।

हमें कोरोना के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए कि इसने आंखों से जाले हटा दिए। जीवन को पास से देखने का, वास्तविक दृष्टि का परिचय कराया। हमें सही अर्थों में इंसान बनने का मार्ग प्रशस्त किया। आगे! हम सब मिलकर घर में हर स्त्री को देवी रूप में प्रतिष्ठित करें। घर-परिवार में हर दिन नवरात्र हो जाएगा।

March 25, 2020

आत्मविश्वास ही समाधान

माननीय प्रधानमंत्री जी,

कल आपसे संवाद करके तथा आप द्वारा श्रद्धेय पिताजी का स्मरण किए जाने से पत्रिका परिवार, प्राकृतिक आपदा के इस दौर में, अति प्रेरित हुआ है। हमको यह सुनकर भी प्रसन्नता हुई कि आप आज तक प्रेस को विश्वसनीय और प्रभावी भी मान रहे हैं। आपका यह कहना कि “देश को जागरूक करने में, चेतना जगाने में प्रिंट मीडिया की भूमिका प्रशंसनीय रही है। इसकी विश्वसनीयता आज भी देश के सामान्य नागरिकों के दिलों में हैं। कोरोना संबंधी जानकारी देने के लिए आपको प्रशासन व सामान्य जनता के बीच लिंक के रूप में काम करने के लिए मैं आग्रह कर रहा हूं” प्रिंट मीडिया पाठक और वितरकों के मन में आत्मविश्वास को प्रतिष्ठित ही करेगा।

आपका कल का संवाद कोरोना विषयक प्रेस की भूमिका से जुड़ा था। आपातकाल की तरह प्राकृतिक प्रकोप के इस दौर में आपने जिस नेतृत्व क्षमता का आदर्श देश के समक्ष रखा है, इसी का परिणाम वह आत्मविश्वास था, जिसने 22 मार्च को जनता कर्फ्यू लागू कर दिखाया। दृढ़ नेतृत्व ही समाधान है। प्रश्न यह भी एक उठता है कि क्या कोरोना विश्व की अन्तिम महामारी होगी? यह तो परिणाम मात्र है। आज भी इसके कारणों पर चर्चा नहीं हो रही। कहते हैं कि चोर को नहीं, चोर की मां को मारो।

कौन है कोरोना की मां? कम होती रोग निरोधक क्षमता। विज्ञान ने आदमी की उम्र तो बढ़ा दी, किन्तु शक्ति भी उसी अनुपात में कम करता गया। विज्ञान व्यापार बन गया। शिक्षा ने भौतिकवाद को बढ़ावा दिया और विज्ञान ने सुविधाएं उपलब्ध करवा दीं। कृत्रिम रूप से उम्र को बढ़ा देना और बीमारी की राह पर खड़ा कर देना क्या एक ही बात नहीं है? कोरोना के आक्रमण के पीछे भी कहीं न कहीं प्रकृति का अपमान ही छिपा है। हमको मां-बाप ने नहीं, प्रकृति ने पैदा किया है। शरीर प्रकृति ने दिया, संचालन-पोषण का भार भी प्रकृति उठाती है। कर्म जरूर व्यक्ति के प्रभाव ड़ालने वाले होते हैं। सच तो यह है प्रकृति की चौरासी लाख योनियों में मनुष्य के अतिरिक्त कोई भी प्राणी मर्यादा का उल्लंघन नहीं करता। इस चक्र में मनुष्य का होना ही समस्या है। पेड़ के हर पत्ते को जड़ के साथ एक रहकर जीना ही पड़ेगा। विकल्प नहीं है। व्यक्ति अकेला “वसुधैव कुटुम्बकम” के बाहर सुखी कैसे रहेगा। जो भी डाल पेड़ से कटेगी, सूख जाएगी।

ऋतु चक्र के अनुसार आज नव संवत्सर का पहला दिन है। नववर्ष का मंगल प्रवेश। आपको भी, देश को भी बधाई। इसके साथ ही ग्रीष्म ऋतु दस्तक दे रही है। कोरोना वायरस की शुरूआत बसंत से हुई थी। ग्रीष्म में उतरेगी। वर्षा ऋतु में पुन: आवेश बढेगा। इस बार तो वर्षा की कमी की घोषणा भी ज्योतिषी कर चुके हैं। शायद 31 मार्च का संदेश भी यही है। गुरू और शनि की युक्ति 30 मार्च से शुरू होगी। न्याय काल, जैसा कर्म, वैसा फल रहेगा। आपने ग्रेटाथनबर्ग को संयुक्त राष्ट्र में सुना होगा। वह बोली थी “मैं स्कूल वापस जाना चाहती हूं, जो समुद्र के दूसरी ओर है। और आप कहते हैं कि युवा हमारी उम्मीद हैं! आप लोगों ने मेरे सपने चुरा लिए, मेरा बचपन चुरा लिया। लोग संकट ग्रस्त हैं। मर रहे हैं। पूरा पारिस्थितक तंत्र बर्बाद हो रहा है। और आप पैसे की बात कर रहे हैं। इकॉनामिक ग्रोथ की परिकथाएं सुना रहे हैं।

आपकी हिम्मत कैसे हुई?” कोस रही थी, विज्ञान को, सत्ताधीशों द्वारा प्रकृति के दोहन को। छीना जा रहा है, भविष्य आने वाली संतानों का। छीला जा रहा है बदन कुदरत का। क्या माफ करेगी वह हमको?

अन्न को विष बना ड़ाला विदेशी खाद से, कीटनाशक से, उन्नत बीजों से। विज्ञान पैदा नहीं कर पाया शिव, नीलकण्ठ। विष्णु के क्षीर सागर का अमृत भी हो गया विष। दूध को माया ने जहर बना दिया। क्या इस क्षीर को पीकर किसी बालक की रोग निरोधक क्षमता सुरक्षित रह पाएगी? बालक तो लगता है महामारियों के मध्य ही जीता जाएगा। नकली दूध पीएगा, कच्चा कीटनाशक युक्त डेयरी का दूध पीएगा, विदेशी गायों का घी-मक्खन खाकर कृष्ण तो नहीं बनेगा। बाल सखाओं के साथ मौत को कौन चुराएगा। माननीय मोदी जी, कृष्ण एक स्वास्थ्य का अभूतपूर्व स्वरूप (सिद्धांत रूप) देश को दे गए- “गाय का, बिलौवणे का, मक्खन खाओ, भले ही चुराकर खाना पड़े।” आज विज्ञान ने उसे भी विषाक्त कर दिया। अब तो डेयरी उत्पादों के उपयोग पर भी प्रतिबंध लगने लगे हैं।

यही कोरोना वायरस की समस्या का हल भी है। आप नियमित रूप से जनता से जुड़े रहिए। जनता का आत्म-विश्वास कोरोना से जूझता रहेगा । स्वयं स्वास्थ्य मंत्री भी दिन-ब-दिन प्रेस के साथ जुड़े रहें तो महत्वपूर्ण होगा । प्रेस तो हर आपात स्थिति में एक जुट रहा ही है। आगे भी रहेगा।

नमस्कार!

March 7, 2020

भरोसे का प्रतीक

प्रिय पाठको…

जो बीज में होता है, वही पेड़ में प्रकट होता है। फूलों एवं फलों में प्रकट होता है। बीज बोने और फल आने में एक काल चाहिए। प्रतीक्षा के लिए धैर्य और पालन-पोषण के लिए परिश्रम और स्नेह चाहिए, प्रार्थना चाहिए। और सब कुछ आत्मभाव से चाहिए। शरीर से श्रम, मन से स्नेह तथा आत्मा से प्रार्थना। फल मूलत: प्रार्थना के रस से मीठा होता है। भोक्ता को सुख प्रदान करता है।

राजस्थान पत्रिका का बीजारोपण स्वंतत्र, स्वस्थ और निर्भीक पत्रकारिता के संकल्प के साथ हुआ। संकल्प को ही मन का बीज कहते हैं। पत्रिका का विस्तार इसी स्वप्न का, पाठकों के प्रति निष्ठा का विस्तार ही कहा जाएगा। श्रद्धेय बाबू सा. (कर्पूर चंद्र कुलिश) के इस वृक्ष ने समय-समय पर मीठे फल ही दिए हैं। आंधी-तूफान और ओलावृष्टि तक सहे हैं। आज भी सह रहा है, आगे भी अडिग़ खड़ा रहेगा। जो बढ़ता जाए, वही ब्रह्म है।

स्नेह का कार्य जोडऩा है। पत्रिका ने जोड़ा है। प्रदेशवासियों को माटी से जोड़ा है, प्रवासी राजस्थानियों को जोड़ा है। इससे भी आगे बढक़र प्रदेशों को जोड़ा है, उत्तर को दक्षिण से जोड़ा है। पाठकों को विकास के साथ-साथ संस्कृति से जोड़ा है। एक ओर जीवन को सचाई और विश्वास से जोड़ा है, तो दूसरी ओर सामाजिक कार्यों के माध्यम से सेवा और श्रमदान से जोड़ा है। राष्ट्रीय योजनाओं, अपराध-निवारण अभियानों एवं लोकतंत्र में भागीदारी से जोड़ा है। संवाद सेतु के जरिए जहां गांव-शहरों को आपस में जोडक़र उनकी समस्याओं को मजबूती से समाधान के लिए सरकार के सामने रखा वहीं दिशा बोध के माध्यम से देश के नौजवानों को सही दिशा देने का मजबूत प्रयास किया। टीवी और डिजीटल भी इसमें जुड़े। पाठक-श्रोता-दर्शक समय-समय पर यही हमें लौटाते भी रहे हैं।

पत्रिका आज एक परिवार रूप संहित वृक्ष बन गया है। हर पत्ते का जड़ से जीवन भर का नाता हो गया है। श्रद्धेय बाबूसा. का परिवार का सपना, यानी कि नि:स्वार्थ भाव से एक-दूसरे के लिए कर्म करना था। फल समाज को पहुंचेंगे। अत: पाठक सदा सर्वोपरि रहा।

देश का मीडिया जहां आज लोकतंत्र का चौथा पाया बन गया है, पत्रिका आज भी लोकतंत्र के प्रहरी के रूप में काम कर रहा है। सरकारों के साथ भागीदारी पत्रिका का लक्ष्य नहीं है, न ही होगा। जनता और सरकारों के मध्य सेतु है, सेतु ही रहेगा। पाया बनने में संघर्ष नहीं है। सेतु बनने में संघर्ष है। लेकिन पत्रकारिता के मूल्यों और जनता के अधिकारों की रक्षा के लिए हमें स्वीकार्य है। जैसे काले कानून का संघर्ष। हमारा श्रम पाठक की आराधना है। प्रात: पाठक द्वारा पत्रिका की प्रतीक्षा करना, प्रात: पठन करना इसका सुखद फल है। ईश्वर इस डोर को, इस ग्रन्थिबन्धन को सदा-सदा दृढ़ और पवित्र बनाए रखे। जिस सम्मान के साथ पिछले छह दशक गुजरे हैं, आगे और भी स्नेह गहरा होता रहे। नमस्कार!

February 25, 2020

सत्ता तो सत्ता ही है

मेरे लिए बड़ा आश्चर्य था कि राजस्थान के मुख्यमंत्री एवं वित्तमंत्री अशोक गहलोत ने अपने बजट भाषण के अन्त में यह कहा कि मैंने तो अपना उत्तरदायित्व पूरा कर लिया। आगे का क्रियान्वयन अधिकारियों पर निर्भर करेगा। वैसे यह बात अशोक जी ने इस बार कई बार दोहराई है। रविवार को ही उन्होंने राजस्थान आवासन मण्डल के समारोह में कहा- ‘शक्तियां दीं तो जेडीए की तरह भ्रष्ट हो जाएगा आवासन मण्डल।’ जब भी बजरी माफिया, चिकित्सा क्षेत्र एवं अस्पतालों से जुड़ी खबरें अथवा बढ़ते अपराध एवं भ्रष्टाचार के मुद्दों पर चर्चा हुई, वे इसी जगह आकर निरुत्तर हो जाते, कि क्या किया जाए-न अफसर कार्य करते हैं और कई मंत्री भी अनुभवहीन हैं।

मैं माननीय मुख्यमंत्री जी को कहना चाहता हूं कि यदि कांग्रेस को देश की राजनीति में वजूद बनाए रखना है तो सबसे पहले अपने शासन वाले राज्यों में स्वच्छ, प्रभावशाली, विकासमान और संवेदनशील प्रशासन का उदाहरण पेश करे। दिल्ली के केजरीवाल का उदाहरण सामने है। भाजपा जैसी शक्ति भी ढह गई। कांग्रेस का भविष्य भी इसी बात पर टिका है। स्वयं मुख्यमंत्री पल्ला झाड़ दें, तब सरकार कहां है? सात करोड़ लोगों ने एक उत्तरदायित्व सौंपा, वे कष्ट के समय कहां जाएंगे?

पैसा नहीं है तो विकास भले ही न हो, किन्तु संवेदनशीलता और सुशासन के माध्यम से दिलों को जीता जा सकता है। स्थिति यहां उल्टी है। माफिया राज कर रहा है। अपराध बढ़ते जा रहे हैं। पुलिस निरंकुश होती जा रही है। इसका एक कारण कांग्रेस का शीर्ष कमजोर होना भी है। अत: दलाली करने वाले अफसरों की समानान्तर सरकार बन गई है। जो लोग पिछली सरकार में कमाई (अवैध) कर रहे थे, आज भी वे ही कर रहे हैं।

बाईस फरवरी की रात को जो कुछ घटनाक्रम सात, सिविल लाईन्स में हुआ, उसका पूरा सी.सी.टी.वी. रेकॉर्ड प्रमाण है। पुलिस का रेकॉर्ड तो यह कहता है कि बड़े से बड़े हादसे पर भी समय पर नहीं पहुंचती। यहां क्या तेज आवाज इतना बड़ा आपातकाल या अपराध था कि पुलिस अधिकारी ने पत्रिका के किसी व्यक्ति से बात करना उचित ही नहीं समझा। मकान की तलाशी उसी ढंग से ली गई, जैसे दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के घर की। यानी बदले की भावना से। क्या इसे निष्पक्ष पत्रकारिता के विरुद्ध दबाव की राजनीति नहीं माना जाएगा? जबकि स्वयं मुख्यमंत्री अनेक पत्रकार वार्ताओं में ऐसी मानसिकता प्रकट कर चुके हैं। हमारे साथ वही सब कुछ हो भी रहा है, जैसी उनकी घोषणाएं हैं। हमें कोई शिकायत भी नहीं है। सरकार उनको ही चलानी है। हमें तो इस पुलिस के आक्रमण से, गरिमाहीन व्यवहार से है, जो सरकार के इशारे से किया गया। विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता गुलाब चंद कटारिया व उपनेता राजेन्द्र राठौड़ ने इस मामले को सदन में उठाया। संतोष की बात यह रही कि, जवाब में संसदीय कार्यमंत्री शान्ति धारीवाल ने माना, ऐसी कार्रवाई की सरकार की कोई मंशा नहीं थी। जो भी अधिकारी वहां गए, किसलिए गए इसकी जांच वरिष्ठ अधिकारी से करवाई जाएगी।

सरकार तो जनता ने बदल दी। लोग तो वही हैं, मानसिकता वही है। आज खबरों से जब मंत्री नाराज हों, तो विज्ञापन बन्द, भुगतान बन्द। जब सही रास्ते पर चलने का यह फल है लोकतंत्र में। साधारण व्यक्ति पर क्या गुजरती होगी!

जनता को तैयार होना पड़ेगा। केवल पांच साल में एक बार मतदान करना काफी नहीं होगा। भ्रष्टाचार के विरुद्ध भी अभियान चलाना पड़ेगा। वरना, नई पीढ़ी लाचारी में ही जीवन काटेगी। जब नेता ही हाथ झाड़ दे तो कहां जाएंगे? अफसर पैदा तो भारत में ही होते हैं, शिक्षा और प्रशिक्षण से शुद्ध अंग्रेज हैं। नेता और अधिकारी के बीच इसीलिए छत्तीस का आंकड़ा है और यही देश का दुर्भाग्य है।

February 12, 2020

यह तो होना ही था

दिल्ली विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी (आप) की लगातार तीसरी बार जीत और देश की दोनों बड़ी पार्टियों की हार लोकतंत्र में एक नया पथ प्रदर्शित करेंगी। एक ओर अरविन्द केजरीवाल और उनकी टीम, दूसरी ओर प्रधानमंत्री और गृहमंत्री सहित भाजपा का सम्पूर्ण तंत्र और कांग्रेस के दिग्गज नेताओं का राजधानी में जमावड़ा। ऐसे में आज के परिणामों को आप सरकार के पांच साल के कार्यकाल का ही परिणाम कहना होगा।

दिल्ली परिणामों ने स्पष्ट कर दिया है कि राज्यों में विकास के मुद्दों को हल करने के मामले में भाजपा और कांग्रेस-दोनों ही जनता का विश्वास खो चुकी हैं। राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी पिछले विधानसभा चुनावों में कांग्रेस जीती तो इसका मुख्य कारण इन राज्यों में स्थानीय भाजपा सरकारों से नाराजगी था। जब सरकारें वादा करके भी जनता से जुड़ी समस्याओं को भूल जाती हैं और विकास के नाम पर कमीशनखोरी वाले कामों को ही आगे बढ़ाती हैं तो जनता को उन्हें सबक सिखाने में देर नहीं लगती। दिल्ली कभी केदारनाथ साहनी, मदल लाल खुराना, विजय कुमार मल्होत्रा जैसे दिग्गज भाजपा नेताओं का गढ़ होता था। ढह गया अथवा ढहा दिया गया। आज मनोज तिवारी नौसिखिए नजर आते हैं।

आप पार्टी सेवा के नाम पर जीती है। दिल्ली में नागरिकों का सम्मान बढ़ा है। भ्रष्ट नेताओं पर तुरन्त कार्रवाई की गई। दूसरी ओर, भाजपा अपराधियों को बचाने में जुटती दिखाई पड़ती है। भाजपा राष्ट्रीयता और धर्म को आधार बनाकर आगे बढ़ती है। विकास के आगे इस मुद्दे की सीमा छोटी होती है। इस दृष्टि से भाजपा को अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करना चाहिए। पिछले वर्षों में राज्यों में स्थापित नेतृत्व की उपेक्षा करके नए, कमजोर लोगों को खड़ा किया गया। जिन-जिन राज्यों में भाजपा पिछले वर्षों में हारी, वहां मुख्य समस्या ही नेतृत्व रहा। कई स्थानों पर भाजपा ने ऐन मौके पर सहयोगी दलों का साथ छोड़ दिया। राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखण्ड के परिणामों का इसी दृष्टि से आकलन किया जाना चाहिए। वरना, भविष्य में यह रेखा बड़ी ही होती चली जाएगी। बिहार, पं.बंगाल, उत्तराखण्ड के चुनावों में पुन: भाजपा की अग्नि परीक्षा होने वाली है। हार गए तो बचेगा क्या? परिवर्तन की बयार चल पड़ी है। इसका रुख मोडऩे की तैयारी दिखानी चाहिए। कांग्रेस की स्थिति और भी विकट है। वह भी विकास के मुद्दे छोड़ भाजपा विरोध के सहारे आगे बढऩे का प्रयास कर रही है। उसने सोच लिया है कि भाजपा जिन मुद्दों को आगे बढ़ाएगी उनका विरोध करना ही है। भाजपा को दिल्ली में अगर कुछ सीटें मिली हैं तो उसका कारण कांग्रेस ही है जो स्वयं शून्य को छू रही है। भाजपा के पास मजबूत केन्द्रीय नेतृत्व तो है, कांग्रेस इस मामले में भी उलझी हुई है।

दिल्ली चुनाव ने देश को नई सोच विकसित करने की ओर संकेत किया है। पहले भी क्षेत्रीय दल भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुके हैं। इस बार चुनौती सेवा के माध्यम से, विकास के नाम पर दी गई। अत: आप पार्टी की ओर से चुनाव जनता ने लड़ा है। अरविन्द केजरीवाल एवं इनके सहयोगी बधाई के पात्र हैं। जनता न बंटी, न भ्रमित हुई, बल्कि अपने संकल्प पर डटी रही। निश्चित है कि दिल्ली के ये चुनाव देश के भावी चुनावों की नजीर बनेंगे।

January 21, 2020

मानवता की फसल

भारत को स्वतंत्र हुए कागजों में सत्तर साल से अधिक हो गए, किन्तु हमारे संविधान के रखवाले मन से भारतीय हुए ही नहीं। इनके बनाए हुए कानूनों को हमें समझने का प्रयास करना चाहिए। अधिकांश कानून या तो भारतीय जीवन शैली से मेल नहीं खाते अथवा कानूनों का लाभ सीधा-सीधा सत्ताधीशों को मिल रहा होता है। संसद एक ऐसी प्रयोगशाला बन गई है, जहां सत्ता में बैठी कोई भी पार्टी जनता पर प्रयोगधर्मी कानून बनाती रहती है। उनके कानूनों का स्वरूप पाश्चात्य देशों के कानूनों को प्रतिबिम्बित करता है।

अब तक के जनप्रतिनिधियों में सम्पूर्ण राष्ट्र को एक ही धागे में माला की तरह देखने वाले तो बहुत कम ही थे। अधिकारियों पर ही निर्भर रहते थे। अधिकारी वर्ग ने तो आज तक भी भारतीय जीवन शैली को स्वीकार नहीं किया है। उनके निजी अथवा पारिवारिक जीवन पर दृष्टि डालकर देख सकते हैं। अभी तक तो आम आदमी को बराबरी का भी नहीं मानते। प्रशिक्षण भी अंग्रेजी तर्ज पर दिया जाता है। जिस प्रकार के कानून बनते हैं, वे भारतीय जीवन में प्रवेश तक नहीं कर पाते और कानूनों के हवाले से नागरिकों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाइयों की एक बाढ़ सी आ जाती है, मानो वे इस देश के नागरिक ही नहीं हैं। कानून में व्यक्ति का कोई सम्मान नहीं है। पुलिस का व्यवहार देख लीजिए, कानून की कछुआ चाल देख लीजिए, चाहे नेताओं के वादे याद कर लीजिए-कहीं जनता के प्रति दर्द दिखाई नहीं देता। सत्ता में आने के बाद जनता के घोड़े पर सवार होकर पांच साल में जनता के नाम पर जो कुछ जनता के लिए किया जाता है, वह लोक का हित साधक तो नहीं कहा जा सकता।

पिछले दो दिनों से संघ प्रमुख मोहन भागवत जनसंख्या पर अपना वक्तव्य दे रहे हैं। वे भी देश को सत्ताधीश की तरह ही सम्बोधित कर रहे हैं। यही जनसंख्या का मुद्दा कभी परिवार नियोजन के नाम पर महान गृह संग्राम देख चुका है। जनता पर सरकारी निर्देश, जोर-जबरदस्ती का एक अचिन्त्य वातावरण बना हुआ था। इसकी सजा भी सत्ताधीशों को भुगतनी पड़ी थी। चीन में ‘एक दम्पत्ति-एक संतान’ का अध्यादेश लगभग तीन दशक पूर्व जारी हुआ था। सन् 2016 में ‘दो संतान’ की नीति लागू की गई। संघ प्रमुख के नाते भागवत का किसी भी विषय पर बोलना बहुत महत्वपूर्ण है। इसीलिए जनसंख्या पर उनके बयान चर्चा में ही नहीं आए अपितु लोग उनके अपने-अपने अर्थ भी लगाने लगे।

यह किसने तय किया कि कौन भारत में पैदा होगा और कौन किसी दूसरे देश में? संतान का पैदा होना और कितना पैदा करना, सरकार का अधिकार क्षेत्र होना चाहिए अथवा प्रकृति का? क्या परिवार नियोजन से सम्बद्ध कानून और इन्हें लागू करने के नियम प्रकृति को चुनौती नहीं हैं। किसी एक शासन की नीतियों का नुकसान पूरा देश भुगते, फिर दूसरा शासन कहे-‘भविष्य में आप ज्यादा संतानें पैदा करेंगे।’ आपको इसलिए सुविधाएं, नौकरी में प्रोत्साहन दिए जाएंगे। नहीं तो कठोर दण्ड भी मिल सकता है। कभी पैदा करने पर सजा, कभी पैदा न करने पर सजा! वाह, इंसान क्या हुआ, सत्ताधीशों की प्रयोगशाला हो गई। आपकी मर्जी नहीं चलेगी। यह लोकतंत्र है। आपकी संतान होना, न होना, आपका नहीं राज्य का दायित्व है।

क्या देश भूल गया नसबन्दी अभियानों को, सरकारी आंकड़ों की अनवरत गगनचुम्बी इबारत को। लाखों महिलाओं के ऑपरेशन सरकारी अमले ने करवाए होंगे, कितने दलाली करने वालों के घर रोशन हुए थे। जब सरकार आबादी नहीं चाहे, तो आपको नसबन्दी करानी ही पड़ेगी। गली-गली में गर्भनिरोधक सामग्री का प्रचार-मुफ्त वितरण। नहीं मानों तो सजा। जब सरकार कहे ‘हो जाओ शुरू’, और चल पड़ो। आज चीन के हालात देखकर भारत भी चिन्तित होने लगा है, कि जो हालात हठधर्मिता से किए गए परिवार नियोजन ने चीन में पैदा कर दिए, कल हमें भी भुगतने पड़ेंगे।

पिछले तीस वर्षों के ‘एक ही संतान’ कानून के कारण आज चीन में युवा आबादी तेजी से घट गई, वृद्धजनों का प्रतिशत बढ़ गया है। अकेले पिछले वर्ष में सरकारी अनुमान से पचास-साठ लाख बच्चे कम पैदा हुए। सन् 1955 में जो वृद्धि दर दो प्रतिशत थी, आज घटकर 0.4 प्रतिशत रह गई है। इसका सीधा असर अर्थ-व्यवस्था पर पडऩे वाला है। अनुमान है कि सन् 2050 तक एक तिहाई आबादी 60 साल से अधिक उम्र वालों की हो जाएगी।

पानी सिर से गुजर गया। नव-दम्पत्ति अधिक संतान पैदा करने के पक्ष में ही नहीं हैं। महंगाई और शिक्षा खर्च दो बड़ी बाधाएं सामने खड़ी हैं। एक बच्चे की शिक्षा एवं प्रतिस्पर्धा की तैयारी में आधी आय खर्च हो रही है। देर से शादी होना भी दूसरी संतान के मार्ग में रुकावट है। हालांकि आय में वृद्धि हुई है। किन्तु जिस क्षेत्र में मंदी का दौर अधिक है, वहां दम्पत्ति संतान पैदा करने में रुचि नहीं ले रहे। रोजगार की स्थिति का सीधा सम्बन्ध है। भारत की स्थिति भी इस दृष्टि से कोई अच्छी नहीं है। शहरीकरण ने देश का नक्शा बदल डाला। विकास अपने आप में एक बड़ा परिवार नियोजन का हथियार कहा जाता है। विकास के नाम पर घोषणाएं भी होती रहती हैं, जिनमें अधिकांश मृग मरिचिकाएं साबित होती हैं। कार्यपालिका जनता की ओर देखना भी नहीं चाहती। इनके व्यवहार से जनता अधिक दु:खी होती है। चीन में एक प्रकार का रोष भी पैदा हो रहा है-नए दो संतान वाले कानून को लेकर।

भारत में स्थिति और भी खराब है। पिछले घाव आज भी हरे हैं। परिवार नियोजन को एक बार तो साम्प्रदायिक रंग तक दे डाला था। प्रतिक्रियास्वरूप इसका परिणाम भी विपरीत ही हुआ था। जिस आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग में नियोजन को प्रभावी करना था, वहां तो हुआ नहीं, बल्कि सम्पन्न वर्ग आधा हो गया। आज देश की लगभग आधी आबादी गरीबी की रेखा के नीचे चली गई। जिस प्रकार मनुष्य अपनी तृष्णा की पूर्ति के लिए अन्य प्राकृतिक संसाधनों का अमर्यादित और अवैध दोहन करता है, उसी तरह सत्ता के मद में अन्धा तंत्र स्त्री शक्ति की प्राकृतिक निर्माण क्षमता पर भी अपनी तुष्टि के लिए कानून बनाकर आक्रमण करता है। इस आसुरी चिन्तन ने धरती पर नर्क की व्यवस्था कर डाली। किसी भी देश को परिवार नियोजन का लाभ नहीं मिला। जहां भी यह भ्रम पैदा हुआ, वहां एक नया वातावरण भी स्पष्ट उभरकर आया। भारत का चित्र स्पष्ट है। जितना प्रयास परिवार नियोजन का, जिस निर्ममता से, किया गया, उसमें कुछ महिलाओं की प्रजनन क्षमता ही समाप्त कर दी गई थी। जिन्होंने गोलियां खाईं, वे अधिकांशत: कैंसर ग्रस्त हो गईं। पुरुष वहीं का वहीं रहा। उसने गोलियां नहीं खाई।

भारत में आबादी को ध्यान में रखकर पैदावार बढ़ाने का अभियान चलाया गया। नहरी सिंचाई, रासायनिक खाद, कीटनाशक का साम्राज्य फैल गया। हर नागरिक कैंसर खाने लग गया। मरना तो होगा, चाहे पैदा होने से पहले या जिन्दा रहने के बाद। सरकारें अपनी अक्षमता और नासमझी को छिपाने के लिए आम आदमी पर आक्रमण करती हैं। सरकारें चलाने के लिए टैक्स का भार भी ऐसा ही अतिक्रमण है। बाहरी उद्योगों को लाकर, बाहरी पूंजी को लाकर उत्पादन को भारतीय बताना भी उतना ही बड़ा अतिक्रमण है, जनता के अधिकारों का। ठप्पा भले ही भारतीय हो, उसमें हमारा विकास परिलक्षित नहीं होगा। उधर व्यक्ति की औसत उम्र बढ़ती चली गई। पिछले पचास सालों में लगभग 20 वर्ष आयु बढ़ गई। जितना पाया-उतना खोया।

आवश्यकता इस बात की है कि जो भारतीय दर्शन पढ़ाया जाता है, सरकारें भी उसी अनुरूप शासन चलाएं। सत्ता में अंग्रेजी के ग्लैमर ने ही देश की आज यह हालत बना दी है। बातें तो गांधीजी की करते हैं, सत्य न बोलने का प्रतिनिधि देश बनता जा रहा है। देश के लिए जीने का संकल्प तृष्णा के संघर्ष में खो गया। धन मिट्टी भी है, साथ भी नहीं जाता। हम मानवता का जितना भी ह्रास करेंगे, वो कृष्ण का ही होगा। उसने कहा था-‘ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:’।

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