Gulabkothari's Blog

जून 19, 2017

जीएसटी?

आज जिस रूप में हम एक जुलाई से इसे लागू करने की सोच रहे हैं क्या उसमें वो ही सारी अवधारणा दिखाई पड़ रही हैं? उनमें से कुछ भी दिखाई नहीं पड़ रहा। ये चिंता का विषय भी है और सब तरफ से एक चिंता की आवाज देश भर में सुनाई भी दे रही है।

हमारे देश में राजनीति ने एक नया स्वरूप ग्रहण कर लिया है। सरकारें अपनी संतुष्टि के लिए नीतियां बनाने लगी हैं। हर दल जो सत्ता में आता है उसे अपनी संतुष्टि की परवाह ज्यादा होती है। उसके आगे वो आम आदमी के कष्टों को गौण मान लेते हैं। आज सबसे तेज चर्चा जो देश में चल रही है, वो जीएसटी की है। जीएसटी को एक जुलाई से लागू करने का प्रस्ताव भी है। जीएसटी आज का नहीं करीब-करीब 15-16 वर्ष पुराना विषय है। इतने सालों से जीएसटी पर चर्चा चल रही है। और अब जाकर के इस निर्णय पर सरकार आ रही है कि हमें इसे लागू करना है।

प्रश्न यह है कि क्या सोच कर हमने जीएसटी की अवधारणा को लागू करने की सोची। वैट वाले सिस्टम में ऐसी क्या कमियां थी कि हम उसको हटाना चाह रहे हैं। जीएसटी की सबसे बड़ी उपादेयता देश भर में करों में एकरूपता बताई गई। बहुत बड़ी बात है, यह छोटी बात नहीं है, करों में एकरूपता लाना, इंस्पेक्टर राज का घट जाना, छोटे व्यापारियों-उद्योगपतियों को इससे कितनी बड़ी राहत होती है। इसमें संदेह नहीं है लेकिन आज जिस रूप में हम एक जुलाई से इसे लागू करने की सोच रहे हैं क्या उसमें वो ही सारी अवधारणा दिखाई पड़ रही हैं? उनमें से कुछ भी दिखाई नहीं पड़ रहा। ये चिंता का विषय भी है और सब तरफ से एक चिंता की आवाज देश भर में सुनाई भी दे रही है।

अभी 15 जून को कपड़ा व्यापारियों ने देशभर में हड़ताल की थी, इसी जीएसटी के खिलाफ। अभी सरकार के ही नागरिक उड्डयन विभाग ने कहा है कि एक जुलाई को लागू करने की तैयारी हमारी नहीं है। हमको कम से कम सितंबर तक का समय दिया जाना चाहिए। सवाल ये है क्या एक विभाग की तैयारी नहीं है या बाकी विभागों की बात किसी एक विभाग के जरिए हम बाहर पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। मंशा तो सभी विभागों की हो सकता है यही हो। क्योंकि इस वक्त जो देश के हालात चल रहे हैं। उनको बहुत गंभीरता से समझना पड़ेगा। भाजपा सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री सुब्रह्रमण्यम स्वामी ने तो यहां तक कहा कि 2019 के पहले यदि जीएसटी लागू कर दिया तो केंद्र सरकार को भारी पड़ जाएगा। वो भी एक वाटरलू जैसा कांड हो जाएगा। ये सही है कि इतना दूर हमारी सरकार को देखना तो पड़ेगा। आज हम किस स्थिति में से गुजर रहे हैं, ये तो देखें। क्या हमको नहीं मालूम है कि नोटबंदी के बाद देश की क्या स्थिति रही आर्थिक स्तर पर? आज नकदी की जो समस्या है, उसको कौन नकार रहा है। खुद एसबीआई और हमारे आर्थिक सलाहकार लोग कह रहे हैं कि देश में बड़ा आर्थिक संकट है। सात लाख करोड़ के कर्जे तो जो बड़े-बड़े प्रभावी लोग हैं वो वापस नहीं चुका रहे हैं। किसानों के ऋण माफ किए तो वो तीन लाख करोड़ का भार आने वाला है। दस लाख करोड़ तो ये ही हो गए। इसके साथ-साथ ये भी देखना है कि महंगाई की मार कितनी पड़ती है। हमारी जीडीपी की दर घटकर 6.1 प्रतिशत पर आ गई।

बेरोजगारी की स्थिति सबके सामने है। किसानों की हड़ताल से जो नुकसान हो रहा है। इसमें भी तो ये सारी प्रतिक्रियाएं दिखाई दे रही हैं। हर आंदोलन इसी जीएसटी के नाम पर होना भी जरूरी नहीं है? पर उन सब अभिव्यक्तियों के अंदर उनकी मंशाओं में जाएंगे तो सबको आर्थिक संकट ही दिखाई पड़ रहा है। और उसके अलावा भी देखें की जो सुविधाएं जो प्रावधान जीएसटी ने वापस किए वो सब वह नहीं हैं जो शुरूआती अवधारणा में थे। आज खुद जीएसटी एक दर पर टिका हुआ नहीं दिखाई दे रहा, उसके आठ स्तर बना दिए। कैसे बना दिए आठ स्तर? जीएसटी की तो एक दर देश में रखनी थी। आठ स्तर कहां से हो गए।

हमको इंस्पेक्टर राज से मुक्ति दिलानी थी। आज उल्टा ये है कि छोटे-छोटे व्यापारियों को जो तीन-चार फॉर्म भरने पड़ते थे, उनको तीन दर्जन फॉर्म भरने पडग़ें। लग यह रहा है कि हम सुविधाओं की बात तो कर रहे हैं कि सुविधाएं बढ़ेंगी, महंगाई भी घटेगी। लेकिन ये सरकार की घोषणाएं तो ठीक उसके विपरीत जा रही हैं। तब ये स्वभाविक है कि लोग नाराज तो होंगे। देश के हर कोने से इस नाराजगी की आवाज अब आ रही है। प्रश्न ये है कि ये आवाज सरकार के कानों में कितनी पहुंचती है? सरकार की खुद की तैयारी कितनी है कि दस लाख करोड़ की ये कमी और उसके बाद किसानों की मांगें पूरी करना। अगर किसानों की ही मांगें हर प्रदेश की पूरी हो गई तो वो कितना भार आने वाला है। और क्या सरकारें उससे बच सकती हैं और क्या जेटली जी के कहने से लोग मान जाएंगे कि राज्य सरकारें अपना-अपना निर्णय खुद करेंगी। ये सब भुलावे की बातें हैं। जो परिस्थितियां बनेंगी वो कुछ और बनने वाली हैं। और इन जुमलों से परिस्थितियों का सामना हम नहीं कर पाएंगे। हमें यथार्थ के धरातल पर काम करना चाहिए और इतनी बड़ी नीति में परिवर्तन से पहले लोगों को विश्वास में लेना पहली जरूरत है। बल्कि आज वैट जो भी चल रहा है इन नई परिस्थितियों के मुकाबले में तो ठीक ही है।

यह भी सही है कि कई विकसित देशों में जीएसटी लागू हुई। पर क्या कहीं पर भी 20 प्रतिशत से ऊपर जीएसटी है? बल्कि 15 और 20 प्रतिशत के बीच में ही है। फिर हमारे यहां 28 प्रतिशत जीएसटी तक पहुंचने की जरूरत क्या है? हमारे यहां तो लोगों के पास रोटी खाने को नहीं है, पीने को साफ पानी भी नहीं है और हम 28 प्रतिशत जीएसटी पर जा रहे हैं। ये वो बड़े सवाल हैं जो छोटे व्यापारियों को अभी भी दुख दे रहे हैं। उनकी समस्याएं घटने के बजाए बढऩे वाली दिख रही हैं। महंगाई भी बढऩे वाली दिख रही है। इन सब चीजों पर संवेदनाओं के साथ पुनर्विचार होना चाहिए। और इस जीएसटी का अगले पांच सालों में देश की आर्थिक व्यवस्था पर क्या असर पड़ता है, उसका आंकलन अभी हमारे हाथ में होना चाहिए। हम गलतियों को ढंकने की कोशिश करते हैं, लेकिन वो फिर नासूर बन कर के प्रकट हो जाती हैं, वो स्थिति आगे ना आए और जीएसटी को हमे और दो-चार महीने आगे भी करना पड़ा तो इतने बड़े देश में ये कोई बड़ी अवधि नहीं है। प्रश्न ये है कि हम निश्चिंत होकर पूरे देश की जनता को विश्वास में लेकर ये काम करेंगे तो सुखद परिणाम भी होंगे और पूरा देश केंद्र सरकार के साथ हाथ मिलाकर के काम करेगा।

मई 26, 2017

पूत के पांव

उनके काम में, काम करने के तरीके में कमियां गिनाई जा सकती हैं लेकिन उनकी नीयत या देश के प्रति निष्ठा पर अंगुली उठाने वाला शायद ही कोई मिले।

मोदी सरकार आज अपने कार्यकाल के तीन वर्ष पूरे कर रही है। जब यह सरकार बनी थी तब देश की जनता को भाजपा से ज्यादा नरेन्द्र मोदी से उम्मीदें थीं। वह उन्हें सर्वशक्तिमान की तरह देख रही थी। जो कुर्सी पर बैठते ही देश की सारी समस्याओं का समाधान कर देंगे। यही वह कारण था कि भारतीय जनता पार्टी को पहली बार स्पष्ट बहुमत मिला। तीन साल का कार्यकाल बहुत ज्यादा भी नहीं होता, तो बहुत कम भी नहीं होता। कोई भी सरकार जो करना चाहती है वह शुरू कर चुकी होती है। कुछ नतीजे सामने भी आने लगते हैं। कई तरह से सरकार के वादों और देशहित की मंशा भी सतह पर आ जाती है।

इन तीन सालों में सबसे बड़ी उपलब्धि सरकार देश की जनता में निराशा के माहौल का खात्मा बता सकती है। जब 2014 के आम चुनाव हुए तो देश में निराशा का सा माहौल था। हर दिन यूपीए सरकार के किसी ना किसी मंत्री का भ्रष्टाचार अथवा भाई भतीजावाद अखबारों की सुर्खियां बन रहा था। कभी कॉमनवैल्थ खेल तो कभी टू जी तो कभी कोयला घोटाला। स्वच्छ छवि का होने के बावजूद चुप्पी की वजह से उसके छींटे तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तक जा रहे थे। कम से कम इन तीन सालों में ऐसे किसी भ्रष्टाचार का आरोप तो केन्द्र सरकार के किसी मंत्री पर नहीं लगा।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तो इन वर्षों में पूर्ववर्ती तमाम प्रधानमंत्रियों से अपनी एक अलग साख बनाई है। उनके काम में, काम करने के तरीके में कमियां गिनाई जा सकती हैं लेकिन उनकी नीयत या देश के प्रति निष्ठा पर अंगुली उठाने वाला शायद ही कोई मिले। एक तरफा ही सही पर नियमित रूप से देश के सामने अपने ‘मन की बात’ रखना भी कम हिम्मत की बात नहीं है। उनकी मंत्रिपरिषद के सदस्यों में कुछ तो ऐसे हैं ही जो अपने विभागों में मन लगाकर काम कर रहे हैं। अपने-अपने विभागों का उनका काम देश भर में बोल रहा है। ऐसे मंत्रियों में  रेलमंत्री सुरेश प्रभु, ऊर्जामंत्री पीयूष गोयल, मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर, पेट्रोलियम व गैस मंत्री धर्मेंद्र प्रधान एवं सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी शामिल हैं। गोवा लौटने से पहले ढाई साल में रक्षामंत्री के रूप में मनोहर पर्रिकर भी अपनी अलग छाप छोड़ गए हैं।

पिछले तीन सालों में बहुत कुछ अच्छा हुआ किन्तु लोकतंत्र को झटके भी कम नहीं लगे। विपक्ष का सम्मान लगभग समाप्त हो गया। जो भी नेता भाजपा के विरुद्ध भारी पड़ेगा, उससे निपट लिया जाएगा। मानो भाजपा के सारे नेता दूध के धुले ही हों। कांग्रेस द्वारा नियुक्त राज्यपाल किस तरह हटाए गए, किस प्रकार नजीब जंग ने दिल्ली सरकार को नाकों चने चबवाए- ऐसा नजारा आश्चर्यजनक ही था। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि विपक्ष जितना मजबूत होगा, सरकार भी उतना ही अच्छा कार्य कर पाएगी। इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए उन्होंने स्वयं पार्टी के कुछ कद्दावर नेताओं को विपक्ष की भूमिका से जोड़ा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी कुछ बड़े नेताओं के जरिए जनसंघ की स्थापना की थी।

तीन वर्ष पहले किए गए कुछ चुनावी वादों को तो भाजपा के ही बड़े नेताओ ने चुनावी जुमले कहकर दाखिल दफ्तर कर दिया। जनता ने जो बहुमत दिया शायद यह उसका इनाम था। पेट्रोल के दाम बढ़ते गए। खाद्य पदार्थ पहले ही वर्ष में महंगे हो गए। नीचे का भ्रष्टाचार ज्यों का त्यों है। कालाधन वापस लाने की घोषणाएं अभी पूरी होने का इंतजार कर रही हैं। इसके विपरीत नोटबंदी करके बेरोजगारी की समस्या भी पैदा कर दी। सैकड़ों उद्योग धंधे बन्द हो गए। प्रधानमंत्री ने अपनी पारी की शुरुआत ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ के सपने के साथ की थी। इसके लिए दिन रात मेहनत भी की थी। लोगों की उम्मीदों के खिलाफ  अपने शपथ समारोह में पड़ोसी राष्ट्राध्यक्षों के साथ पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ  को भी बुलाया था।

विकास की नीतियों में ‘रिटेल में सीधे विदेशी निवेश’ का विरोध करने वाली भाजपा ने यूपीए सरकार द्वारा मंजूर 51 प्रतिशत एफडीआई को ही आगे बढ़ाया। मेक इन इंडिया की चर्चा तो खूब की गई, किन्तु रोजगार का ग्राफ  नीचे आता ही जा रहा है। अब तो छटनी की हवा चल पड़ी है, सरकारी भर्तियां बन्द पड़ी हैं। हर व्यक्ति के बैंक खातों में 15 लाख जमा कराने का वादा ‘अच्छे दिन’ उड़ाकर ले गया। देश में नक्सलवाद बढ़ता जा रहा है। लोग मरते जा रहे हैं। अन्य अपराध, महिलाओं से जुड़े अपराधों का ग्राफ  भी बढ़ा और निर्भया जैसे मामले भी बढ़े।

कश्मीर में हालात बेकाबू हो चुके हैं। पाकिस्तान युद्ध विराम का उल्लंघन करता जा रहा है। सर्जिकल स्ट्राइक का प्रयोग निष्प्रभावी रहा। उसके बाद भी तीन बार पाक सैनिक हमारे जवानों के सिर काटकर ले गए। चीन-रूस से संबंध कड़वे हुए। सारे पड़ोसी पहले ही मुंह सुजाए हुए हैं। चीन से हुए व्यापारिक समझौते काम नहीं आए। अब तो नेपाल से भी तनाव बढऩे लगा है।

इन वर्षों में केन्द्र ने हर सरकार की तरह योजनाओं का अम्बार-सा लगा दिया। जनधन योजना, स्वच्छ भारत, प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास, उज्जवला, ग्राम सड़क योजना की शुरुआत की। 22 करोड़ जनधन खाते खुले, 100 करोड़ से अधिक आधार-कार्ड बने, स्वच्छ भारत के लिए 9000 करोड तथा स्मार्ट सिटी के लिए 7060 करोड़ रुपए आवंटित किए। 20 हजार करोड़ गंगा की सफाई के लिए रखे गए। दो वर्षों में 13 लाख शौचालय बनाए गए। कालाधन, मनरेगा, आधार कार्ड, जीएसटी और एफडीआई पर टैक्स के मुद्दों पर सरकार ने यू-टर्न लेकर मनमोहन सरकार की शैली को ही स्वीकार किया। लोकपाल की नियुक्ति अभी तक नहीं हो पाई है। उच्चतम न्यायालय के साथ कॉलेजियम को लेकर विवाद भी जारी है। धारा 370 और राम मंदिर के मुद्दे वहीं के वहीं हैं। कॉमन सिविल कोड और तीन तलाक के मुद्दे सर्वोच्च न्यायालय में हैं।

एक और परिवर्तन पिछले तीन सालों में यह सामने आया कि मोदी सरकार ने यह प्रमाणित कर दिया कि लोकतंत्र के प्रहरी-मीडिया को आसानी से जनता के बजाय सरकार के साथ जोड़ा जा सकता है। उसके मुंह में शब्द रखे जा सकते हैं। जिस सोशल मीडिया को मोदी सरकार ने सर पर बिठाया था आज वही मोदी जी के पिछले और आज के वक्तव्यों के विरोधाभास दिखा रहा है। समझने की बात इतनी ही है कि, सरकार का ध्यान कितना देश की ज्वलंत समस्याओं पर रहा। जैसे कि, जनसंख्या, गरीबी, बेरोजगारी, स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा। अन्तिम बिन्दु के व्यक्ति तक कितना लाभ पहुंच पाया-? आज तो जीवन की पहली प्राथमिकता-पीने का स्वच्छ पानी भी सबको नसीब नहीं है।

और भी कई कमियां हैं पर ये सब आज की नहीं हैं। पिछले सत्तर वर्षों से चल रही हैं। तब प्रश्न दोष देने का नहीं है। प्रश्न है उम्मीदों का। देश की जनता को प्रधानमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी से कुछ अलग ही तरह की उम्मीदें हैं। ऐसी उम्मीदें जो शायद उसने पहले देश के किसी प्रधानमंत्री से नहीं की। यह उम्मीदें रोजमर्रा के सरकारी कामकाज से हटकर हैं। उनके द्वारा कुछ क्रान्तिकारी काम करने का जनता को अभी इन्तजार है।

मई 23, 2017

राख से उठ पाएगी कांग्रेस?

कांग्रेस में आज एक भी ऐसा नेता दिखाई नहीं दे रहा। राहुल गांधी कांग्रेस की बागडोर को संभालने के लिए उतावले हैं पर उनकी परिपक्वता अभी इस लायक दिखाई नहीं देती। …सोनिया गांधी की अब स्थिति ही नहीं है नेतागिरी करने की।

भारतीय जनता पार्टी सन् 2004 में चुनाव हारी। कांग्रेस सत्ता में आई। उसके बाद अगला चुनाव 2009 का भी हार गई और कांग्रेस फिर सत्ता में आ गई। तब संघ प्रमुख मोहन भागवत ने यह ऐलान किया था कि भाजपा फिर सत्ता में आएगी। भाजपा को सत्ता में आने से कोई नहीं रोक सकता। भाजपा को राख से उठना आता है। बहुत बुलंद संकल्प था और उनकी आवाज में बहुत विश्वास था। यह विश्वास 2014 के चुनावों में फिर दिखाई दिया। भाजपा सत्ता में आई। तब भाजपा ने बढ़त को इतना आगे खींचा कि 281 सीटें लेकर आई। और उस चुनाव में कांग्रेस की जो हालत थी वो भी बड़ी दयनीय थी। उसे केवल 45 सीटों पर सब्र करना पड़ा। अब प्रश्न यह है कि क्या कांग्रेस में भी आज ऐसा कोई नेता उपस्थित है या उपलब्ध है जो मोहन भागवत जैसे विश्वास से यह कह सके कि कांग्रेस भी राख से उठना जानती है?

अब कांग्रेस में इन्दिरा गांधी नहीं हैं। उन्होंने तो अपनी हार के बाद भी संघर्ष किया था। जेल भी गईं थीं। उनके खिलाफ भी कई आरोप लगे थे। लेकिन उसके बाद भी उन्होंने संघर्ष नहीं छोड़ा। वह वापस सत्ता में आ गई थीं। कांग्रेस में आज एक भी ऐसा नेता दिखाई नहीं दे रहा। राहुल गांधी कांग्रेस की बागडोर को संभालने के लिए बहुत उतावले हैं पर उनकी परिपक्वता अभी इस लायक दिखाई नहीं देती।

अगर हम यूपी में उनके दिए गए भाषणों का आकलन करें तो इतने बड़े देश के नेता का उनका कद है ही नहीं। वो फुल टाइम नेता लगते ही नहीं सच पूछें तो। सोनिया गांधी की अब स्थिति ही नहीं है नेतागिरी करने की। इसके साथ एक सवाल यह भी जुड़ा हुआ है कि आज जो कांग्रेस की स्थिति है उसकी जिम्मेदार भी ये ही हैं। कोई दूसरा नहीं है। वो ही सोनिया गांधी है और वो ही राहुल गांधी हैं। तब क्या हम इनके भरोसे कांग्रेस को मर जाने देंगे। हमारी रुचि कांग्रेस में नहीं है, हमारी रुचि बीजेपी में नहीं है। हमारी रुचि देश के लोकतंत्र में है। कांग्रेस अगर मर जाती है तो विपक्ष मर जाता है। मोदीजी तो बार-बार कहते हैं कि मैं इस देश को कांग्रेस मुक्त करना चाहता हूं, इसका अर्थ साफ-साफ है कि वो लोकतंत्र को विपक्ष से मुक्त करना चाहते हैं। क्योंकि इसके अलावा देश में तीसरी ऐसी पार्टी ही नहीं है जो राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष का काम कर सके। अगर विपक्ष चला गया संसद और विधान सभाओं से तो क्या यहां लोकतंत्र रहेगा? या राजतंत्र हो जाएगा। आज कांग्रेस की सबसे पहली जरूरत है कि इसे खड़ा किया जाए और इसके लिए गांधी परिवार को त्याग करने के लिए आगे आना पड़ेगा। पिछले सालों में तो उन्होंने मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बना दिया और खुद संगठन के पदों पर रह गए।

आज उन्हें संगठन को छोडऩे की जरूरत है और वहां किसी नये कद्दावर नेता को आना चाहिए जो कांग्रेस को खड़ा कर सके। इसके लिए उन्हें कांग्रेस से छिटक कर बाहर गए उन सब लोगों को भी वापस लाना पड़ेगा, चाहे वो शरद पवार हों या ममता बनर्जी हों। कोई भी हों। सारी कांग्रेस को फिर से एक जगह पर लाना पड़ेगा। उनमें से किसी ना किसी नेता को खड़ा करना पड़ेगा। उसे यह बागडोर संभालनी पड़ेगी। राहुलजी को पीछे हटना चाहिए। आज भी ऐसे लोग मिलेंगे जिन्हें देश स्वीकार करेगा। हो सकता है ममता को ना करे क्योंकि वो भी अनप्रिडेक्टेबिल हैं। अपने मूड से निर्णय करती हैं। लेकिन और भी लोग हैं। ए. के. एंटोनी जैसे। चर्चा करेंगे तो आपको और लोगों की लिस्ट मिल जाएगी। परन्तु अब बिना समय गंवाए इनको एक नेता का चुनाव करना चाहिए और जो जितने पदों पर बैठे हैं उन्हें पीछे हट जाना चाहिए। वह पीछे से सलाह दे सकते हैं पर उन्हें अब सामने आकर निर्णय करने की जरूरत नहीं है। क्योंकि सिर पर आज बड़े-बड़े प्रदेशों के चुनाव खड़े हैं। आज इनमें से किसी प्रदेश में कांग्रेस नहीं है क्यों ? क्योंकि इन्हीं लोगों के पीछे जो कमान पकड़े बैठे हैं। इन्हें छोडऩा चाहिए, अगर यह नहीं छोड़ते तो यह देश के साथ न्याय भी नहीं करने वाले हैं। अगर कांग्रेस डूबेगी और लोकतंत्र डूबेगा तो क्या देश इन्हें माफ कर पाएगा? यह प्रश्न हमारे सामने है और इसमें जनता को भागीदारी निभानी पड़ेगी। जनता को आगे आकर इन्हें प्रेरित भी करना पड़ेगा और सबक भी सिखाना पड़ेगा।

अप्रैल 21, 2017

कश्मीर में आपात स्थिति

हम यह समझना ही नहीं चाहते कि बिना मुस्लिम देशों की आर्थिक मदद के न कश्मीर सुलग सकता है, न पत्थर चल सकते हैं और न ही हथियारों के जखीरे देश में आ सकते हैं।

आज का ज्वलन्त प्रश्न यह है कि कश्मीर सुलग रहा है अथवा सुलगाया जा रहा है? पूरा देश देख रहा है। सोशल मीडिया पर जो फिल्में चल रही हैं, वे देखने में भारतीय भी नहीं लग रहीं। मेरे देश में मेरी सेना के खिलाफ बगावत के सुर, पत्थरबाजी और देश विरोधी नारे? और वह भी भाजपा की संयुक्त सरकार में, जहां केन्द्र में भाजपा बैठी हो? प्रधानमंत्री मौन, मुख्यमंत्री भी बयान में कश्मीरियों के पक्ष में, सर्वोच्च न्यायालय सीमा के बाहर जाकर निर्देश जारी करे, सेना के हाथ बांधने पर उतारू हो जाए। क्या अब तक राष्ट्रपति शासन लागू नहीं हो जाना चाहिए था? सख्ती बरतें तो आपातकाल भी लागू कर सकते हैं। जिन सैनिकों ने बाढ़ में कश्मीरियों की जान बचाई, क्या यह उसका इनाम दिया जा रहा है?

दूसरा प्रश्न यह है कि क्या यह सब रातों-रात हो गया? दिल्ली में क्या एक भी नेता ऐसा नहीं है जिसने एक साल पहले ही स्थिति को भांप लिया हो? क्या भाजपा ने महबूबा से समझौता करके सरकार बनाई थी, तब ऐसी आशंका नहीं बनी थी? राजनीति में सत्ता के आगे देशवासियों की प्रतिक्रिया का कोई अर्थ नहीं रह जाता। अब तो केन्द्र का कोई भी सख्त निर्णय स्वयं भाजपा के ही खिलाफ पड़ेगा।

यूपी के विधानसभा चुनावों में इस आग में दोनों हाथों से घी की आहुतियां सभी दलों के नेताओं ने दे डाली। क्या-क्या शब्द नहीं कहे गए, किस-किस ने नहीं कहे। न लोकलाज, न मर्यादा, न देश के भविष्य पर पडऩे वाले प्रभावों की किसी को चिन्ता। ध्रुवीकरण की राजनीति चरम पर थी। श्मशान और कब्रिस्तान के चर्चे गर्म थे। आज हम कितनी भी सफाई दें, किन्तु तथाकथित हिन्दूवादी नेताओं ने जिस आक्रामक शैली से वार किया था, वह तो हिन्दुओं की उदारवादी नीति से मेल खाती ही नहीं। कभी-कभी तो यह भी लगता है कि ऐसी भाषा बोलने वाले हिन्दू का अर्थ भी जानते हैं या नहीं? ग्रंथ पढ़े भी होंगे या नहीं? आज भी सरकारें गंभीर चिन्तन में नहीं लगी हैं। कश्मीर केवल भाजपा का ही मुद्दा नहीं है। वैसे भी सांसद शपथ लेने के बाद किसी दल का नहीं रह जाता। प्रधानमंत्री भी भारत के रहेंगे, भाजपा के नहीं। यह सीमा भी समय के साथ छोटी होती जा रही है।

आज पूरे विश्व में आतंक छाया हुआ है। जो भी जिहादी अब तक पकड़े गए सब इस्लाम से जुड़े निकले। अभी हाल ही में जिन-जिन यूरोप के देशों ने इनको शरण दी, उनके साथ भी आतंकियों जैसा व्यवहार करने लग गए। प्रभाव यहां तक दिखाई दिया कि, फ्रांस के नागरिक, इनसे दु:खी होकर फ्रांस छोड़ गए। अहसान की तो बात किताबों में ही रह गई। अलग-अलग मार्गों से ये ही लोग हमारे यहां पहुंच रहे हैं। सैनिक इनकी मदद करने के लिए बदनाम हो चुके हैं। मोटे अनुमान के तौर पर 3-4 करोड़ बांग्लादेशी यहां अवैध रूप से रह रहे हैं। किसी सरकार में किसी तरह की कोई हलचल नहीं है। देश में हथियार जमा हो रहे हैं। जब-जब परिस्थितियां बनीं राजस्थान में भी ऐसे जखीरे सामने आते रहे हैं। ऐसी स्थिति में कश्मीर का मुद्दा बड़ी लपटों में बदल सकता है। हमारी खुफिया एजेंसियों की क्षमता करगिल में सामने आ चुकी है। हम यह समझना ही नहीं चाहते कि बिना मुस्लिम देशों की आर्थिक मदद के न कश्मीर सुलग सकता है, न पत्थर चल सकते हैं और न ही हथियारों के जखीरे देश में आ सकते हैं।

हमारी केन्द्र सरकार तो भाजपा का परचम फैलाने और देश को कांग्रेस मुक्त करने में व्यस्त है। सरकार को आज जुमलों की राजनीति का चस्का लग गया है। आश्चर्य है कि मोहन भागवत भी यदा-कदा कुछ बोलते तो हैं लेकिन कोई स्पष्ट निर्देश नहीं दे रहे। न तो भाजपा के लिए, न ही संघ के लिए। एक प्रश्न जो सबकी आंखों से ओझल है, वह यह कि क्या सन् 2026 के बाद देश रहेगा?

अप्रैल 2, 2017

किसके भरोसे महिला?

आधी आबादी किसके भरोसे रहे? अपनी पीड़ा लेकर किसके पास जाए? निर्भया के दोषी आज भी कानूनी गलियों में अपना बचाव करते घूम रहे हैं।

भा रत की संस्कृति में रावण को अपराधियों का सिरमौर माना जाता है। सीताहरण का हीरो था वह। किन्तु सीता को उसने छुआ तक नहीं था। उस पर यह कलंक कि, वह अपराधियों का सिरमौर है! और आज जो कुछ हो रहा है, उन घटनाओं ने तो रावण को भी आदर्श पुरुष प्रमाणित कर दिया। छोटी-छोटी बच्चियों के साथ बलात्कार, खून के रिश्तों द्वारा दुष्कर्म! मन में आता है कि ऐसे लोग पैदा होते ही क्यों नहीं मर जाते! भ्रूण हत्या तो इनकी होनी चाहिए थी। इनके डर से कन्याएं पेट में ही मारी जा रही हैं। खेद है कि, माताओं को भी ऐसी औलाद पर शर्म नहीं आती। दूसरी ओर प्रभावशाली लोग दुष्कर्मियों को बचाने में लगे रहते हैं। न्यायपालिका की स्थिति यह है कि, वहांं तारीखें पड़ती रहती हैं। अपराधियों को बचाने में सब लग जाते हैं। पीडि़ता और परिजनों पर बयान बदलने के दबाव डाले जाते हैं। नोखा (बीकानेर) का उदाहरण ताजा है। और यह सब पुलिस की आंखों के सामने होता है। तब जय-जयकार किसकी हो- गृहमंत्री की या सरकार की।

प्रश्न यह है कि क्या हम लोकतंत्र में जी रहे हैं? किसी पीडि़त परिवार से पूछना चाहिए। राजस्थान के गृहमंत्री की हालत के बारे में कुछ कहने की जरूरत ही नहीं है। वे स्वयं को ही प्रभावहीन मानकर चल रहे हैं। बातों में पीड़ा जताते रहते हैं कि सारे निर्णय तो मुख्यमंत्री स्तर पर होते हैं। तब यदि राजस्थान महिला अपराधों के मामले में दूसरे या तीसरे स्थान पर रहता है तब आश्चर्य क्यों होना चाहिए? राज्य की मुख्यमंत्री स्वयं एक महिला हैं लेकिन बड़ी से बड़ी दुर्घटना पर भी मुख्यमंत्री ने एक शब्द नहीं बोला। तब क्या प्रत्येक पीडि़ता प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के पास शिकायत करने जाएगी? प्रदेश के स्तर पर इतना बड़ा कलंक का टीका भी सरकार को उद्वेलित नहीं कर रहा।

इसी तरह हत्याओं का सिलसिला भी थमने का नाम नहीं ले रहा। तीन मार्च को खबर छपी थी ‘हर दूसरे दिन मर्डर-18 दिन में 9 हत्याएं।’ मानो जयपुर नहीं जोहानिसबर्ग हो गया है। पिछले सप्ताह जोधपुर के हरियाढाणा में ललिता को पेट्रोल डालकर जिन्दा जला दिया गया था। वह पेड़ों को काटने से रोक रही थी। क्या यह आश्चर्य नहीं है वहां जनभावनाओं को भी ठुकरा दिया? कोटा में 12 साल की बच्ची से दुष्कर्म करने वाला फरार है। लालकोठी, जयपुर में छह साल की बच्ची शिकार हो गई। जोधपुर में 17 मार्च को ही डॉक्टर के घर फायर करके लोग फरार हो गए। राज्य में बलात्कार, हत्याएं आम बात हो गईं। सरकार का मौन चिंताजनक है। पुलिस भी गृहमंत्री जी के कदमों पर चल रही है। चोरियों की संख्या तो पुलिस रिकॉर्ड में नगण्य होती है।

चिन्ता की बात यह भी है कि जनता को अब पुलिस पर भरोसा नहीं रहा। पुलिस जरूर अपनी इस छवि से चिन्तित नजर नहीं आती। अब पीडि़त बलात्कार तथा हत्याओं की जांच पुलिस से करवाने को राजी नहीं होते। सरकार इसके लिए बधाई की पात्र है!

पुलिस भर्ती भी नहीं हो रही, घरों से अर्दली हट नहीं रहे, किसी घटना के होने के बाद छानबीन में व्यस्त पुलिस घटनाओं को रोकने, जनता को शिक्षित करने में नाकाम ही साबित हुई है। इस दृष्टि से सुरक्षाकर्मी भी केवल सजावटी ही बन गए हैं। किसी दुर्घटना को टाल पाना संभव नहीं रह गया है। हां, सुरक्षा के नाम पर आम आदमी को अपमानित करने से नहीं चूकते।

आंकड़ों को देखें तो मध्यप्रदेश के हों या अन्य किसी प्रदेश के, जनता के प्रति सरकारों की बेरुखी साफ झलकती है। किसानों की आत्महत्याएं भी मानो रोबोट देखते हों। संवेदना का लेशमात्र शब्द भी सुनाई नहीं देता। तब आधी आबादी किसके भरोसे रहे? अपनी पीड़ा लेकर किसके पास जाए? पांच साल हो गए निर्भया के दोषी आज भी कानूनी गलियों में अपना बचाव करते घूम रहे हैं। तब उसे सख्त बनाने का भी क्या लाभ हुआ? वह भी कागजी ही रह गया। जैसा पहले था। फांसी तो किसी को हुई नहीं। महिला अत्याचारों के मामलों में समाज को भी जागना पड़ेगा। जब आरोपियों के पीडि़त या उसके परिजन बयान बदलते हैं तब समाज को आगे आना चाहिए। उसे हिम्मत बंधानी चाहिए। जब तक समाज नहीं जागेगा, सरकार और पुलिस के भरोसे कुछ नहीं होने वाला। जब महिला की पीड़ा पर महिला का हृदय भी न पिघले, तब निराकरण क्या?

फ़रवरी 5, 2017

नया दौर

पंजाब और गोवा विधानसभा के लिए मतदान हो चुका है। दोनों ही प्रदेशों में उत्साह के साथ वोट डाले गए हैं। गोवा में 83 प्रतिशत और पंजाब में 75 प्रतिशत मतदान हुआ। इन चुनावों में इस बार कुछ नया-नया भी दिखाई पड़ रहा है। वैसे तो परिवर्तन नित्य है ही, किन्तु इस बार दोनों ही मोर्चों पर रूपान्तरण जैसा माहौल दिखाई पड़ रहा था। दोनों स्थानों पर एक नई राजनीतिक पार्टी आम आदमी पार्टी पहली बार मैदान में उतरी है। आज तक केवल दो ही दल चुनाव लड़ते रहे हैं। चाहे अकेले या गठबंधन के रूप से। पंजाब में कांग्रेस और भाजपा घटक शिरोमणि अकाली दल आमने-सामने होते थे। आम आदमी पार्टी ने भी धमाके के साथ नया समीकरण बनाया है। हालांकि ‘आप’ ने अपना पंजाब में प्रवेश पिछले लोकसभा चुनावों में ही कर लिया था, जहां उसने चार सीटों पर कब्जा किया था। यह भी एक आश्चर्य ही था। उसी हौसले को लेकर वह इस बार पूरे प्रदेश स्तर पर चुनाव लड़ रही है।

पिछली बार जब अरविन्द केजरीवाल से बात हुई थी तब उनका आकलन 87 सीटों का था। इसका मूल कारण वे युवा वर्ग तथा सिख मतदाताओं को मानते थे। इसके बाद ही वे हिन्दू मतदाताओं में उतरे थे। जीतना-हारना समय के गर्भ में है, किन्तु इसका यह अर्थ तो स्पष्ट है कि टक्कर कांटे की है। यही अपने-आप में महत्वपूर्ण घटना है। युवा वर्ग इतिहास पढ़कर भविष्य की सोचता है। इसी के हाथ में त्रिकोणीय संघर्ष की नकेल भी है। भाजपा तथा शिअद के लिए भी दांव बड़ा है। लोकसभा में स्थिति परिवर्तन का मुख्य प्रश्न भी है और राज्य में सत्ता चले जाने का भी।

गोवा में भी आम आदमी पार्टी ने दो बंदरों की लड़ाई में बिल्ली की भूमिका निभाने की सोची है। पहली बार वहां भी आप तीसरे दल के रूप में टक्कर देने को खड़ी है। युवा वर्ग के साथ-साथ वहां दिल्ली के बदले वातावरण एवं केन्द्र के प्रहारों को सहन करने की क्षमता उसका हथियार है। यहां उसकी छवि पंजाब से भले ही कम लगती होगी, किन्तु परम्पराओं को तोडऩे का साहस तो दिखाया है। यही इतिहास बनेगा, आने वाली पीढ़ी का। इसमें भी हार-जीत गौण ही है। लोकतंत्र को समय के साथ दिशा देना राजनेताओं का ही दायित्व है। ठहरा पानी सड़ जाता है।

इस बार यूपी में कांग्रेस का सपा से हाथ मिलाना भी एक नया प्रयोग साबित हो सकता है। जिस प्रकार भाजपा भी जम्मू और कश्मीर में सत्ता तक पहुंची थी। कांग्रेस भी अवसर का लाभ उठाने की सोच रही है। इस कदम की कांग्रेसियों में तो विपरीत प्रतिक्रिया भी हो चुकी है। इसी प्रकार नोटबंदी का असर भी इस चुनाव पर विशेष पडऩे वाला है। हालांकि केन्द्र ने समय पूर्व बजट पेश करके इस प्रभाव को कम करने का प्रयास तो किया है। परिणाम समय बताएगा।

इन दोनों प्रदेशों में युवा का वर्चस्व और ‘आप’ का प्रवेश, दो धाराओं के बहाव की दिशा को तय करेंगे। पहले ही चुनाव में किसी दल का इतनी बड़ी चुनौती बन जाना भी एक प्रश्न है। मानो जनता पार्टी या स्वतंत्र पार्टी का युग लौट आया है। बिना किसी आपातकाल के। हां, प्रधानमंत्री की यह घोषणा कि देश को कांग्रेस मुक्त करके छोड़ेंगे। कांग्रेस को विपक्ष का दर्जा न देना तथा लोकतंत्र के मूल स्वरूप को ध्वस्त करना भी परोक्ष रूप से यही दर्शाता है। इस कदम के बिना नोटबंदी का निर्णय भी संभव नहीं था। भाजपा को भावी सभी चुनावों में इनके प्रभावों को देखने का अवसर मिलेगा। बेरोजगारी और महंगाई विकास के मार्ग की दो ही तो बड़ी बाधाएं हैं। नोटबंदी ने इनको चरम पर पहुंचा दिया है। चुनावी वादों को जुमला बताकर स्वयं भाजपा ने मतदाता का अपमान ही किया है। तब नए जुमलों पर कौन विश्वास करेगा?

आज चुनावों में जिस प्रकार का भ्रष्टाचार, धन का बहाव देखा जाता है, वैसा ही लोकतंत्र का स्वरूप भी बनता जा रहा है। हमारे जहन में तो एक ही नारा है- जनता जागे, तो भ्रष्टाचार भागे। तब हमारा लोकतंत्र देश को लाए आगे।

जनवरी 1, 2017

एक म्यान में दो तलवार

पिछले तीन दिनों में उत्तर प्रदेश और अरुणाचल, दो राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पार्टी से निष्कासित करने की घटनाएं हुईं। यूपी में सपा ने अखिलेश का निष्कासन वापस ले लिया लेकिन अरुणाचल में बर्खास्त मुख्यमंत्री ने भाजपा में शामिल होकर राज्य की पहली भाजपा सरकार बनवा दी। ऐसे ही प्रयास पूरे के पूरे दल को भाजपा से जोडऩे के मणिपुर और उत्तराखण्ड में हो चुके हैं। राज्यपालों की संख्या तो और भी बड़ी है। देश में भाजपा के इस, लोकतंत्र की छवि का मीडिया आकलन करना नहीं चाहता। क्या ये घटनाएं उसकी नजर में गंभीर नहीं हैं। यह तो तस्वीर का एक पहलू है। उत्तर प्रदेश की घटना का परिप्रेक्ष्य कुछ दूसरा भी है। अमरसिंह की भूमिका को भी पूरी तरह संदिग्ध ही माना जा रहा है। घर में फूट हो तो कोई भी भितरघात कर सकता है। कृष्ण कह गए हैं कि, समय परिवर्तनशील है। जिस दिन मैंने राजस्थान पत्रिका का कार्यभार संभाला, उसी दिन श्रद्धेय बाबू साहब ने एक संकेत किया था-‘एक म्यान में दो तलवारें नहीं रह सकतीं। जिस दिन मैं 60 साल का हुआ, मैंने पत्रिका के पाठकों से विदा मांग ली थी। जिस दिन तुम साठ साल के हो जाओ, उस दिन तुम्हें भी यही करना है। तुम इस गलतफहमी में मत रहना कि तुम्हारे बिना पत्रिका नहीं चलेगी। पत्रिका के परिवर्तन को तब तुम संभाल नहीं पाओगे।’

समाजवादी पार्टी की आज वही स्थिति है। अभी तक मुलायम सिंह को भी यही गलतफहमी है कि सपा उनके बिना नहीं चल पाएगी। अखिलेश, उनको अभी बच्चा लगता है। अपने पुराने विश्वास पात्रों की सलाह पर उन्होंने अखिलेश का पार्टी से निष्कासन कर दिया। यह निर्णय अखिलेश के लिए एक स्वर्णिम अवसर बन गया। कहां तो सपा टूटने के कगार पर थी और कहां अखिलेश ने कांग्रेस और रालोद को साथ लेकर विजय का एक तरह से जयघोष कर डाला। मुलायम सिंह और शिवपाल न केवल दंग रह गए बल्कि समय की धारा को अखिलेश के पक्ष में जाते देखकर घुटने टेक दिए। शक्ति प्रदर्शन में जहां अखिलेश के खेमे में 198 विधायक खड़े थे, उसके मुकाबले नेताजी उर्फ मुलायम सिंह के यहां कव्वे उड़ रहे थे। इससे ज्यादा और क्या किरकिरी हो सकती है। अपनी बात को ढकने के लिए एक चर्चा यह चला दी गई कि, यह तो मुलायम सिंह की रणनीति ही थी जिससे कि खराब छवि के लोगों को अखिलेश से दूर किया जा सके। पर यह चर्चा काम नहीं आई। भीष्म पितामह के हाथ तो बंधे ही रहेंगे।

मुलायम सिंह कितने भी अनुभवी हों, उनके सम्पर्क कितने भी मजबूत क्यों न हो, अब वे ‘सक्रिय राजनीति’ में रहने की स्थिति में नहीं हैं। उन्हें आज भी अपनी परिस्थिति का आकलन करना चाहिए। भारतीय पुरा-शास्त्रों के निर्देशों को समझना चाहिए और उससे भी आगे इस तथ्य को हृदयंगम कर लेना चाहिए कि, जब तक वे शीर्ष पुरुष के रूप में सपा में निर्णय करते रहेंगे, तब तक अखिलेश हर निर्णय के लिए उनकी ओर ही देखते रहेंगे। वह पूर्ण आत्मविश्वास के साथ स्वयं निर्णय नहीं ले पाएंगे। मुलायम सिंह के लिए तो उचित यही है कि वे अपनी मर्जी से पद का त्याग कर दें। ससम्मान यह पद अखिलेश को सौंप दें और स्वयं एक सलाहकार की भूमिका निभाएं। यह बात मैं वंशवाद को बढ़ावा देने के लिए नहीं लिख रहा पर आज की स्थिति में तो इसका विकल्प भी नहीं है। अखिलेश अपनी सूझ-बूझ से पहले भी दो-तीन बार मुलायम सिंह को मात दे चुके हैं।

सपा के दो फाड़ होने की खबर से भाजपा ने अवश्य दिवाली मनाई होगी। किन्तु अब तो उसके लिए परिस्थितियां पहले से अधिक विकट होती नजर आ रही हैं। अब भाजपा को न तो सपा से सीधा लडऩा पड़ेगा, ना ही कांग्रेस से। यदि राहुल गांधी और जयंत चौधरी का अखिलेश से गठबंधन तय हो जाता है तब उत्तर प्रदेश का चुनाव एक त्रिकोणीय संघर्ष रह जाएगा। भाजपा को सरकार तक पहुंचने के लिए एक ही मार्ग उपलब्ध होगा। जिस प्रकार उसने जम्मू एवं कश्मीर में सिर झुकाकर पीडीपी के साथ हाथ मिलाया और सरकार में शामिल हो गए। ऐसा एक और अवसर भाजपा के सामने है। उत्तर प्रदेश में भी भाजपा सत्ता तक पहुंच सकती है, क्योंकि स्वतंत्र रूप से आज भी भाजपा के पास सिवाय नरेन्द्र मोदी के कोई दूसरा चेहरा नहीं है। सबक लेने के लिए बिहार के चुनाव परिणाम भी उसके सामने हैं। भाजपा यह खतरा क्यूं कर मोल लेगी। पर बिना चेहरे के कौन अखिलेश और मायावती को चुनौती देगा, यह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। सपा के चौबीस घंटे के इस भूकम्प ने चुनाव के सारे समीकरण बदल दिए।

दिसम्बर 24, 2016

जंग हारे जंग

एक बार बुद्ध ने रत्नाकर डाकू से पूछा कि, तू यह सारे पाप किसके लिए करता है? उसने उत्तर दिया-अपने परिवार के लिए ! बुद्ध का दूसरा प्रश्र था कि क्या तेरे इन पापों का फल परिवार वाले भी बांटेंगे? इस प्रश्र को रत्नाकर ने अपनी पत्नी एवं पिता के सम्मुख रख दिया। उन्होंने कहा कि, हम तेरे कर्म में सहायक अवश्य हैं किन्तु तुम्हारा किया तो तुम ही भोगोगे। रत्नाकर जिंदगी की जंग हार गया। ठीक वैसे ही दिल्ली के उपराज्यपाल नजीब जंग अनगिनत ज्यादतियों के साथ अपने राजनीतिक जीवन की यह जंग हार बैठे। अचानक गुरुवार को उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। कह नहीं सकते कि, देश में किसी को भी इस दुर्घटना पर अफसोस हुआ हो। अपने कार्यकाल में उन्होंने भी चमड़े के सिक्के चलाने का वैसा ही प्रयास किया जैसा कि, भिश्ती ने एक दिन का बादशाह बनकर किया था।

नजीब जंग को जुलाई 2013 में यूपीए सरकार ने दिल्ली का उपराज्यपाल नियुक्त किया था। इससे पूर्व वे जामिया-मिलिया विश्वविद्यालय के उपकुलपति थे। मूलत: आईएएस अफसर रहे जंग ने उपराज्यपाल के रूप में जिस तरीके के आदेशात्मक प्रहार दिल्ली सरकार पर किए, उसने तो मथुरा के कंसराज की याद दिला दी। उनका वश चलता तो वासुदेव की तरह केजरीवाल को भी कारागार में ठूस देते। कितने घटनाक्रम सामने आए, सुनकर लगता ही नहीं कि नजीब लोकतंत्र के प्रतिनिधि थे। राजतंत्र में तो वैसे भी कोई किसी का सगा नहीं होता। फिर नजीब ने तो लोकहित की बड़ी-बड़ी योजनाओं (देवकी पुत्र) की निर्मम हत्याएं कम नहीं की। जंग ने अपने व्यवहार से यह तो साबित कर ही दिया कि, वे किसी शहंशाह से कम नहीं हैं। तब उनका बेआबरू होकर जाना, प्रकृति के कानून सम्मत ही है। देश के इतिहास में, उनका लिखा काला पन्ना, आने वाली पीढिय़ों के लिए एक नजीर रहेगा।

एक कहावत है कि, जो चोर होता है, उसको सारे लोग चोर ही नजर आते हैं। संत को कोई बुरा नहीं लगता। दिल्ली सरकार के प्रथम गठन के साथ ही उस पर जंग की नजर लग गई थी। जंग ने अरविंद केजरीवाल को एक सौत की तरह ही मानकर व्यवहार किया। दूसरे चरण में तो जंग दोनों हाथों में तलवारें लेकर मानो सड़क पर ही उतर आए। मानो यह उनका निजी स्वार्थ था। अफसरों की नियुक्ति को लेकर तो आए दिन फाइलें लौटाते ही रहे। उन्होंने तो मुख्यमंत्री के सचिव राजेन्द्र कुमार के घर पर छापा होने तक की व्यवस्था की। किंतु वहां कोई ऐसा दस्तावेज नहीं मिला कि वे मुख्यमंत्री को अपमानित कर पाते। उसके बाद तो वे चोट खाए हुए नाग की तरह फुफकारने लगे। दिल्ली सरकार की सैंकड़ों फाइलों की छानबीन करा डाली। यहां भी उन्हें निराशा ही हाथ लगी और केजरीवाल सूखे ही बच निकले। मुझे यह जानकारी तो नहीं कि, केन्द्र सरकार ने उनके इस सचाई पूर्ण वक्तव्य को कितना सच माना किन्तु आज के जमाने में यह पचने वाली बात नहीं थी। और जिस तरह से जंग ने केजरीवाल को सभी प्रकार के अधिकारों से वंचित कर रखा था, तब तो यह उत्तर असंभव ही था। आज की स्थिति तो यह है कि मुख्यमंत्री निवास के सभी बागवानों और रसोईदारों तक को हटा दिया गया है। मुख्यमंत्री बनाए खाना उनकी बला से।

जंग की कार्यप्रणाली से भाजपा सरकार को कितना फायदा हुआ या नहीं, यह अलग बात है लेकिन उनकी इस कार्यप्रणाली को सहन करना अथवा स्वीकृत करना दूसरी बात है। जिस प्रकार असंतुष्ट होकर भाजपा सरकार ने कई राज्यपालों के इस्तीफे लिए, उसी कड़ी में नजीब जंग का इस्तीफा भी जुड़ गया। उनका अब तक का सारा किया-कराया पानी में बह गया। अन्तर केवल इतना ही है कि, पिछले तीन साल से वे दिल्ली में भाजपा की किश्ती चला रहे थे। सुप्रीम कोर्ट के एक झौंके ने किश्ती को हिला दिया। अच्छा हुआ जंग ने इस्तीफा दे दिया वर्ना क्या पता न्याय की अगली कड़ी क्या रंग लाती क्योंकि अपने पूरे कार्यकाल में नजीब जंग एक चुनी हुई सरकार को उखाड़ फैंकने में लगे हुए थे। दिल्ली में तो आने वाले समय में, प्रत्येक उपराज्यपाल के लिए सम्मानपूर्वक जीने के लिए जंग की नजीर ही काफी होगी। अभी तक की जंग में जीत जनता की हुई, इसमें कोई सन्देह नहीं है।

दिसम्बर 20, 2016

अब क्या बचा?

सरकार ने आज एक और घोषणा नोटबंदी के सिलसिले में की है, जो कि पिछली घोषणा से कुछ अलग हटकर है। विरोधाभासी भी कह सकते हैं। यह तो स्पष्ट हो गया है कि सरकार के मन में कोई तो भय पैदा हो गया है। एक   नोटबंदी के आदेश के बाद कितने आदेशों की बौछार हो गई। क्यों? अरुण जेटली और रविशंकर प्रसाद कई बार कह चुके हैं कि नोटबंदी का फैसला बहुत सोचकर किया गया है। फिर इतने बदलाव क्यों? सरकार को किस पर विश्वास नहीं है-कार्यपालिका पर, जनता पर अथवा स्वयं पर।

सारे नियमों को एक साथ रखकर पढ़ें तो लगेगा कि सरकार भी किंकर्तव्यविमूढ़ हो रही है। जो फैसला कर रही है, उल्टा पड़ रहा है। बाजार में चर्चा दिनभर होती है अथवा भ्रष्टाचारी जिस प्रकार गलियां निकालते दिखाई पड़ते हैं, उससे प्रभावित होकर सरकार फिर एक नई घोषणा ले आती है। पहले घोषणा की गई थी कि 500-1000 रुपये कितने भी पुराने नोट 30 दिसम्बर तक जमा कराए जा सकते हैं। आज सरकार ने नई घोषणा करते हुए कहा है कि तीस दिसम्बर तक कोई भी व्यक्ति 500-1000 रुपये के पुराने नोट जमा तो करा सकता है, किन्तु कुल 5000 रुपये तक ही। 5000 रुपये से ज्यादा राशि सिर्फ एक बार जमा कराई जा सकती है, वह भी उसके स्रोत की पूरी जांच पड़ताल के बाद। प्रधानमंत्री ने पहले अवधि तीस दिसम्बर ही दी थी, किन्तु बिना किसी शर्त के। सरकार को ग्यारह दिन पहले ऐसा क्या सपना आया कि अपने मूल आदेश का ही अपमान करा बैठी? क्या प्रधानमंत्री की घोषणा के ऊपर भी कोई घोषणा कर सकता है? बहुत से लोग ऐसे भी होंगे जिन्होंने यात्रा पर होने, बैंकों में भीड़ होने या  कहीं व्यस्त होने के कारण दिसम्बर के अंतिम दिनों में पुराने नोट जमा कराने का विचार किया होगा। या यही सोच कर रुक गए होंगे कि अभी तो रोज नियम बदल रहे हैं, पहले सारी घोषणाएं हो जाने दो। अब वे लुटा हुआ महसूस कर रहे हैं।

दूसरी ओर सरकार ने पहले भी 50 प्रतिशत तक कर भरकर पुराने नोट जमा कराने की छूट दी। उसके बाद पुराने नोटों पर पूर्ण पाबंदी की तिथि भी (1 अप्रेल 2017 से) घोषित कर दी थी। पेट्रोल पंपों, अस्पतालों जैसी सेवाओं को सीमित अवधि की छूट थी। 15 दिसम्बर से यह छूट भी छीन ली गई है। इसके बाद भी भ्रष्टाचारियों को रद्दी हुए नोटों को कर के साथ जमा कराने की छूट दे रखी है।

सरकार की आज की घोषणा से उन लोगों को बड़ा झटका लगा है जो लोग सरकार पर भरोसा करके 30 दिसम्बर तक पुराने नोट जमा कराने की योजना बना रहे थे। वे यदि 10-15 हजार भी जमा कराना चाहते हैं तो 30 दिसम्बर से पहले एक बार ही इतनी राशि जमा करा पाएंगे। उसके लिए भी पहले दो बैंक अधिकारियों को संतुष्ट करो, उनके हिसाब से। मानो आप चोर हैं। उधर आप कर व जुर्माना देकर तीस दिसम्बर तक कितनी भी राशि जमा करा सकते हैं। क्या जनता के लिए यह भ्रामक स्थिति नहीं है? क्या गारण्टी है कि सरकार आगे भी फैसला नहीं बदलेगी। प्रश्न सरकार की साख का है। आज तो लुटी हुई लगती है। सरकार कुछ व्यवस्था कर भी नहीं पा रही है। एक ओर अरुण जेटली कह रहे हैं कि सरकार पूरे नोट नहीं छापेगी, वहीं दूसरी ओर एटीएम से नकली नोट निकलने लगे हैं। यह भी संभावना व्यक्त की जा रही है कि कहीं बड़ी तादाद में नकली नोट तो बैंक में जमा नहीं हो गए और इसी तथ्य को उजागर होने से रोका जा रहा है। पहले यह भी कहा गया कि जिन लोगों के खाते में ढाई लाख तक रुपये हैं, उनसे कोई पूछताछ नहीं की जाएगी। अब पूछताछ करने और नोटिस देने की बात की जा रही है। इसका मतलब पहले जाल फैलाया जा रहा था। अपनी ही जनता से यह व्यवहार किस कोटि का माना जाए। ऐसा तो शायद चाणक्य के शब्दकोश में भी नहीं है। सरकार खुले आम कह रही है, आपके खाते में किसी के पैसे जमा हुए हैं तो लौटाओ मत, खा जाओ। यह किस तरह के आचरण को बढ़ावा दिया जा रहा है !

इस सारी उठापटक का केन्द्र केवल आयकर दाता है। सरकार 95 प्रतिशत जनता के बारे में बालभर भी चिन्तित नहीं नजर आ रही । तब क्या लोकतंत्र केवल पांच प्रतिशत सत्ताधीशों के लिए ही जीवित रहेगा? एक बात और, भगवान कितने ही अवतार ले लें, किन्तु सामाजिक आचरण, सभ्यता और संस्कृति यदि प्रकृति के साथ सामंजस्य नहीं रखते, वहां धर्म की रक्षा संभव नहीं है। न तप से, न यज्ञ से, न भक्ति कर्म अथवा ज्ञान के आवरणों से। धर्महीन समाज में ही आसुरी शक्तियों का विकास होता है। केवल समाज ही इनके विरुद्ध संघर्ष कर सकता है। आज समाज की आत्मा सोई हुई है। युवाशक्ति भौतिकवाद के कारण देश प्रेम से दूर है। देश में सत्ता के लिए बड़ा संघर्ष चल रहा है। देश मौन है। नोटबंदी की आड़ में जब बैंक में पैसा समाप्त हो गया तो ‘कैशलैस” का जुमला चला दिया गया ताकि गरीब आदमी नोटबंदी की कराहट भूल जाए।

सारी लड़ाई कुर्सी बचाने की दिखाई पड़ती है। न्याय से, अन्याय से, छीनकर, मांगकर कैसे भी। चारों ओर हमारा ही साम्राज्य फैले। जनता आज फिर गुलामी की सूरत लिए बैठी है। संघर्ष करने को तैयार कहां है? तब गुलाम होना ही उनका भाग्य है। उनको यह तो महसूस होते ही रहना चाहिए कि सत्ता तो जनता की ही है। उसने ही प्रतिनिधि चुने हैं। भले ही लोकतंत्र की स्वतंत्रता नोटबंदी से छीन ली है। अब तक तो यह आशा थी कि शीघ्र कुछ हल तो निकल ही जाएगा, किन्तु अब तो नोट भी हाथ से निकलकर सत्ताधीशों के बिस्तर की शोभा बन जाएंगे। बैंकों में कहां से आएंगे? जो है, वह भी ई-पेमेंट लील जाएगा। नोट सत्ताधारियों  के पास, नागरिक कैशलैस, आम आदमी अपने डेबिट कार्ड को अगरबत्ती करता रहेगा। सब कुछ सरकार के हाथ में चला जाएगा। हो सकता है कभी किसी खाते की कोई सफाई कर जाए। कोई सुनने वाला नहीं मिलेगा।

आज जो हालात देश में हैं वे बेरोजगारी बढ़ाने का कार्य कर रहे हैं। गरीब का निवाला छीनकर सरकारें खा रही हैं। उत्पादन रुक गया, उद्योग-धन्धे ठप होने लग गए। सरकार अभी तक आश्वासन देते नहीं थकती। बिकाऊ मीडिया के भोंपू न जाने क्या-क्या वक्तव्य दे रहे हैं। उनका अपना कोई नजरिया ही नहीं रह गया। शुरू में जिस उत्साह से लोगों ने आशा के साथ नोटबंदी का स्वागत किया था, वह खुमारी उतर चुकी। गरीबों के घाव गहरा गए। अब उनको नोट मिल भी गए, तो पुराने घाव सूखने वाले तो नहीं हैं। लोगों को यह भी उम्मीद थी कि नोटबंदी के दूसरे चरण में नेताओं और अफसरों पर भी गाज अवश्य गिरेगी। यह भी राहत का एक परोक्ष बिन्दु तो था ही। किंतु ऐसा कुछ नहीं हुआ, बल्कि नित नए फैसले न केवल निराशा पैदा कर रहे हैं बल्कि भविष्य की छवि भी धूमिल कर रहे हैं। जनता को कभी तो जागना पड़ेगा। कोई भी उच्च शिक्षा प्राप्त या उद्योगपति देश में क्यों रहेगा? आयकर वाले कभी नहीं चाहेंगे कि देश में कोई उन्नति करके विकास में योगदान दे। उनका जीवन तो इन पांच प्रतिशत लोगों पर ही टिका है। किसी भी सरकार का आज तक यह संकल्प नहीं रहा कि वह पांच वर्षों में बीपीएल का 5-7 प्रतिशत कम करेगी। सही अर्थों में तो ये इनका आंकड़ा बढ़ते जाना ही देश का विकास मानते हैं। आश्चर्य इस बात का है कि इनको भी कैशलैस होने के लिए अनेकों योजनाएं और छूट के प्रस्ताव दिए जा रहे हैं। अनजाने में जनता एक चक्रव्यूह में फंसती जा रही है। न चुनाव आयुक्त आंखे दिखा सकता है, न ही सर्वोच्च न्यायालय स्वप्रसंज्ञान लेकर लोगों की तथा लोकतंत्र की इज्ज्त बचाने को उत्सुक है। उसे तो नया इतिहास रचना चाहिए।

काले धन के नाम पर आज जो खिलवाड़ प्रतिदिन कायदे-कानून बदल कर नागरिकों के साथ किया जा रहा है, उससे दो स्थितियां पूर्णत: स्पष्ट हैं। एक तो सरकार की विफलता की बौखलाहट स्पष्ट नजर आती है। दूसरी ओर इस चेहरे को छिपाने के लिए नित नए मुखौटों का सहारा लिया जा रहा है। जिन लोगों ने 34 प्रतिशत कर न देकर काला धन इकट्ठा किया, वे तो 50 प्रतिशत अथवा अधिक देकर कभी भी अपने धन का खुलासा नहीं करेंगे। लोग आसानी से बैंक वालों को 30 प्रतिशत दलाली देकर नये नोट प्राप्त कर रहे हैं। तब वे क्यूं 50 प्रतिशत देंगे? इसी तरह 50 प्रतिशत में तो आज डॉलर भी उपलब्ध है। बड़ी राशि वाले लोग तो उधर ही जा रहे हैं। आजकल एक कहावत चल रही है कि मगरमच्छ पकडऩे के लिए पूरे तालाब को खाली कर दिया गया किन्तु सारे मगरमच्छ तो पृथ्वी पर भाग चुके। इस संघर्ष में बेचारी मछलियां मारी गई। अर्थात जितने भी आदेश 8 नवंबर से आज तक जारी हुए, उनका लाभ केवल मगरमच्छों को ही हुआ है। जिस जनता ने सरकार को चुना, वह आज मूक दर्शक बनी हुई एक अपराध बोध के साथ आसमान की ओर ताक रही है क्यूंकि उसकी युवा पीढ़ी स्वयं किंकर्तव्यविमूढ़ होकर आंखे मूंदें बैठी है, लोकतंत्र के तीनों पाए, चौथे पाए की कृपा से कहर बरपा रहे हैं। सारा वातावरण कंस के लोकतंत्र जैसा छद्मवेशी बन गया है। निकट भविष्य में किसी विष्णु के अवतरित होने की संभावना नहीं लगती है। जिस दिन भी देश का युवा वर्ग जाग जाएगा, वही विष्णु का दसवां अवतार होगा। जनता अपने शासन के प्रति फिर से जागृत हो जाएगी एवं विनाश की ओर मुड़ती इस विकासधारा को एक नया मोड़ दे सकेगी। ईश्वर जल्दी ही ऐसा दिन दिखाए।

दिसम्बर 19, 2016

बचकाने राहुल

यथा राजा तथा प्रजा। क्योंकि दोनों एक ही प्रकृति द्वारा संचालित होते हैं। बिना शब्दों के भी एक-दूसरे की मंशा भांप लेते हैं। लोकतंत्र में वंशानुगत राजा नहीं होता। मर्यादा के बाहर जाकर प्रयास तो किए ही जाते हैं। तब वहां शासन का स्वरूप बदल जाता है। इस देश में आजादी के साथ ही कांग्रेस सत्ता में आई और लगभग 40-45 वर्षों तक शासन किया। इनमें भी वंशवाद छाया रहा जिसके कारण शासन का स्वरूप अधिनायकवादी हो गया। देश आज इसी का दंश भोग रहा है। कांग्रेस को आज भी विपक्ष की भूमिका का अनुभव नहीं है। या तो स्वयं कांग्रेस ने निरंकुश होकर शासन किया, या फिर अन्य दलों को निरंकुश शासन करने की छूट दे दी। दोनों ही परिस्थितियों में लोकतंत्र पंगु ही रहा। इसी कारण क्षेत्रीय दल भी प्रकट हुए।

आज भी कांग्रेस के पास राष्ट्रीय नेताओं का अभाव है तो परिवारवाद के कारण। नेहरू के बाद नेतृत्व की गिरावट, लोकतंत्र पर कुठाराघात बढऩे लगे। सोनिया गांधी का अध्यक्ष काल तो पूर्णत: निरंकुश होकर रह गया। यही कारण है कि आज कांग्रेस विपक्षी दल के रूप में भी मान्य नहीं है। यह कांग्रेस की सबसे बड़ी बौखलाहट का कारण बनता जा रहा है। उसमें भी मां-बेटे के दो खेमें। किसी भी संस्था को डुबाना हो तो नेतृत्व को दो टुकड़ों में बांट दो।

सोनिया फिर से खड़ी होती नहीं जान पड़तीं। लाड़ले राहुल के पांव पालने में ही नजर आ रहे हैं। कांग्रेस की नाव में छेद भी कम नहीं हैं। चारों ओर केवल अवसरवादी तत्व रह गए हैं। इसमें उनका निजी स्वार्थ है। राहुल के पांवों तले जमीन नहीं है। तभी तो मोदी जी ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ का नारा चला चुके हैं। कांग्रेस की बौखलाहट और बढ़ गई।

आज राहुल गांधी ने पार्टी की कमान अपने हाथ में ले रखी है। एक परिपक्व नेता के स्थान पर छात्रनेता अधिक दिखाई दे रहे हैं। अभी नोटबंदी को लेकर रोजाना एक बयान दे रहे थे कि मुझे संसद में बोलने ही नहीं दिया जाता। बोलूंगा तो भूचाल आ जाएगा। बोला आज तक कुछ नहीं। प्रेस को ही बता देते। जैसे एक बच्चे को दूसरा बच्चा पीट दे और पहला चेतावनी दे कि अब के पीट के देख, और दूसरा फिर उसे पीट दे।

नोटबंदी के मुद्दे पर विपक्ष संगठित भी हुआ। राष्ट्रपति जी तक शिकायत करने भी पहुंचा। इस बीच सरकार ने अगस्ता हेलीकॉप्टर सौदे में करोड़ों की दलाली की चर्चा छेड़ दी। लगता है राहुल गांधी पंक्चर हो गए। तुरंत संयुक्त विपक्ष की सलाह को दरकिनार करके, संगठन की कीमत पर, स्वयं कांग्रेस का प्रतिनिधि मण्डल लेकर प्रधानमंत्री से मिलने चले गए। राजनीति में तो इसका अर्थ घुटने टेकना होता है। क्या राहुल का यह कदम बचकाना नहीं है? कांग्रेस के लिए आत्मघाती नहीं है? यदि सरकार 10, जनपथ की दो-चार फाइलें खोल दे तो राहुल का क्या हाल हो? इससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि राहुल गलती करते रहें तो उन्हें रोके कौन? कीमत देश ही चुकाएगा।

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