Gulabkothari's Blog

फ़रवरी 5, 2017

नया दौर

पंजाब और गोवा विधानसभा के लिए मतदान हो चुका है। दोनों ही प्रदेशों में उत्साह के साथ वोट डाले गए हैं। गोवा में 83 प्रतिशत और पंजाब में 75 प्रतिशत मतदान हुआ। इन चुनावों में इस बार कुछ नया-नया भी दिखाई पड़ रहा है। वैसे तो परिवर्तन नित्य है ही, किन्तु इस बार दोनों ही मोर्चों पर रूपान्तरण जैसा माहौल दिखाई पड़ रहा था। दोनों स्थानों पर एक नई राजनीतिक पार्टी आम आदमी पार्टी पहली बार मैदान में उतरी है। आज तक केवल दो ही दल चुनाव लड़ते रहे हैं। चाहे अकेले या गठबंधन के रूप से। पंजाब में कांग्रेस और भाजपा घटक शिरोमणि अकाली दल आमने-सामने होते थे। आम आदमी पार्टी ने भी धमाके के साथ नया समीकरण बनाया है। हालांकि ‘आप’ ने अपना पंजाब में प्रवेश पिछले लोकसभा चुनावों में ही कर लिया था, जहां उसने चार सीटों पर कब्जा किया था। यह भी एक आश्चर्य ही था। उसी हौसले को लेकर वह इस बार पूरे प्रदेश स्तर पर चुनाव लड़ रही है।

पिछली बार जब अरविन्द केजरीवाल से बात हुई थी तब उनका आकलन 87 सीटों का था। इसका मूल कारण वे युवा वर्ग तथा सिख मतदाताओं को मानते थे। इसके बाद ही वे हिन्दू मतदाताओं में उतरे थे। जीतना-हारना समय के गर्भ में है, किन्तु इसका यह अर्थ तो स्पष्ट है कि टक्कर कांटे की है। यही अपने-आप में महत्वपूर्ण घटना है। युवा वर्ग इतिहास पढ़कर भविष्य की सोचता है। इसी के हाथ में त्रिकोणीय संघर्ष की नकेल भी है। भाजपा तथा शिअद के लिए भी दांव बड़ा है। लोकसभा में स्थिति परिवर्तन का मुख्य प्रश्न भी है और राज्य में सत्ता चले जाने का भी।

गोवा में भी आम आदमी पार्टी ने दो बंदरों की लड़ाई में बिल्ली की भूमिका निभाने की सोची है। पहली बार वहां भी आप तीसरे दल के रूप में टक्कर देने को खड़ी है। युवा वर्ग के साथ-साथ वहां दिल्ली के बदले वातावरण एवं केन्द्र के प्रहारों को सहन करने की क्षमता उसका हथियार है। यहां उसकी छवि पंजाब से भले ही कम लगती होगी, किन्तु परम्पराओं को तोडऩे का साहस तो दिखाया है। यही इतिहास बनेगा, आने वाली पीढ़ी का। इसमें भी हार-जीत गौण ही है। लोकतंत्र को समय के साथ दिशा देना राजनेताओं का ही दायित्व है। ठहरा पानी सड़ जाता है।

इस बार यूपी में कांग्रेस का सपा से हाथ मिलाना भी एक नया प्रयोग साबित हो सकता है। जिस प्रकार भाजपा भी जम्मू और कश्मीर में सत्ता तक पहुंची थी। कांग्रेस भी अवसर का लाभ उठाने की सोच रही है। इस कदम की कांग्रेसियों में तो विपरीत प्रतिक्रिया भी हो चुकी है। इसी प्रकार नोटबंदी का असर भी इस चुनाव पर विशेष पडऩे वाला है। हालांकि केन्द्र ने समय पूर्व बजट पेश करके इस प्रभाव को कम करने का प्रयास तो किया है। परिणाम समय बताएगा।

इन दोनों प्रदेशों में युवा का वर्चस्व और ‘आप’ का प्रवेश, दो धाराओं के बहाव की दिशा को तय करेंगे। पहले ही चुनाव में किसी दल का इतनी बड़ी चुनौती बन जाना भी एक प्रश्न है। मानो जनता पार्टी या स्वतंत्र पार्टी का युग लौट आया है। बिना किसी आपातकाल के। हां, प्रधानमंत्री की यह घोषणा कि देश को कांग्रेस मुक्त करके छोड़ेंगे। कांग्रेस को विपक्ष का दर्जा न देना तथा लोकतंत्र के मूल स्वरूप को ध्वस्त करना भी परोक्ष रूप से यही दर्शाता है। इस कदम के बिना नोटबंदी का निर्णय भी संभव नहीं था। भाजपा को भावी सभी चुनावों में इनके प्रभावों को देखने का अवसर मिलेगा। बेरोजगारी और महंगाई विकास के मार्ग की दो ही तो बड़ी बाधाएं हैं। नोटबंदी ने इनको चरम पर पहुंचा दिया है। चुनावी वादों को जुमला बताकर स्वयं भाजपा ने मतदाता का अपमान ही किया है। तब नए जुमलों पर कौन विश्वास करेगा?

आज चुनावों में जिस प्रकार का भ्रष्टाचार, धन का बहाव देखा जाता है, वैसा ही लोकतंत्र का स्वरूप भी बनता जा रहा है। हमारे जहन में तो एक ही नारा है- जनता जागे, तो भ्रष्टाचार भागे। तब हमारा लोकतंत्र देश को लाए आगे।

जनवरी 1, 2017

एक म्यान में दो तलवार

पिछले तीन दिनों में उत्तर प्रदेश और अरुणाचल, दो राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पार्टी से निष्कासित करने की घटनाएं हुईं। यूपी में सपा ने अखिलेश का निष्कासन वापस ले लिया लेकिन अरुणाचल में बर्खास्त मुख्यमंत्री ने भाजपा में शामिल होकर राज्य की पहली भाजपा सरकार बनवा दी। ऐसे ही प्रयास पूरे के पूरे दल को भाजपा से जोडऩे के मणिपुर और उत्तराखण्ड में हो चुके हैं। राज्यपालों की संख्या तो और भी बड़ी है। देश में भाजपा के इस, लोकतंत्र की छवि का मीडिया आकलन करना नहीं चाहता। क्या ये घटनाएं उसकी नजर में गंभीर नहीं हैं। यह तो तस्वीर का एक पहलू है। उत्तर प्रदेश की घटना का परिप्रेक्ष्य कुछ दूसरा भी है। अमरसिंह की भूमिका को भी पूरी तरह संदिग्ध ही माना जा रहा है। घर में फूट हो तो कोई भी भितरघात कर सकता है। कृष्ण कह गए हैं कि, समय परिवर्तनशील है। जिस दिन मैंने राजस्थान पत्रिका का कार्यभार संभाला, उसी दिन श्रद्धेय बाबू साहब ने एक संकेत किया था-‘एक म्यान में दो तलवारें नहीं रह सकतीं। जिस दिन मैं 60 साल का हुआ, मैंने पत्रिका के पाठकों से विदा मांग ली थी। जिस दिन तुम साठ साल के हो जाओ, उस दिन तुम्हें भी यही करना है। तुम इस गलतफहमी में मत रहना कि तुम्हारे बिना पत्रिका नहीं चलेगी। पत्रिका के परिवर्तन को तब तुम संभाल नहीं पाओगे।’

समाजवादी पार्टी की आज वही स्थिति है। अभी तक मुलायम सिंह को भी यही गलतफहमी है कि सपा उनके बिना नहीं चल पाएगी। अखिलेश, उनको अभी बच्चा लगता है। अपने पुराने विश्वास पात्रों की सलाह पर उन्होंने अखिलेश का पार्टी से निष्कासन कर दिया। यह निर्णय अखिलेश के लिए एक स्वर्णिम अवसर बन गया। कहां तो सपा टूटने के कगार पर थी और कहां अखिलेश ने कांग्रेस और रालोद को साथ लेकर विजय का एक तरह से जयघोष कर डाला। मुलायम सिंह और शिवपाल न केवल दंग रह गए बल्कि समय की धारा को अखिलेश के पक्ष में जाते देखकर घुटने टेक दिए। शक्ति प्रदर्शन में जहां अखिलेश के खेमे में 198 विधायक खड़े थे, उसके मुकाबले नेताजी उर्फ मुलायम सिंह के यहां कव्वे उड़ रहे थे। इससे ज्यादा और क्या किरकिरी हो सकती है। अपनी बात को ढकने के लिए एक चर्चा यह चला दी गई कि, यह तो मुलायम सिंह की रणनीति ही थी जिससे कि खराब छवि के लोगों को अखिलेश से दूर किया जा सके। पर यह चर्चा काम नहीं आई। भीष्म पितामह के हाथ तो बंधे ही रहेंगे।

मुलायम सिंह कितने भी अनुभवी हों, उनके सम्पर्क कितने भी मजबूत क्यों न हो, अब वे ‘सक्रिय राजनीति’ में रहने की स्थिति में नहीं हैं। उन्हें आज भी अपनी परिस्थिति का आकलन करना चाहिए। भारतीय पुरा-शास्त्रों के निर्देशों को समझना चाहिए और उससे भी आगे इस तथ्य को हृदयंगम कर लेना चाहिए कि, जब तक वे शीर्ष पुरुष के रूप में सपा में निर्णय करते रहेंगे, तब तक अखिलेश हर निर्णय के लिए उनकी ओर ही देखते रहेंगे। वह पूर्ण आत्मविश्वास के साथ स्वयं निर्णय नहीं ले पाएंगे। मुलायम सिंह के लिए तो उचित यही है कि वे अपनी मर्जी से पद का त्याग कर दें। ससम्मान यह पद अखिलेश को सौंप दें और स्वयं एक सलाहकार की भूमिका निभाएं। यह बात मैं वंशवाद को बढ़ावा देने के लिए नहीं लिख रहा पर आज की स्थिति में तो इसका विकल्प भी नहीं है। अखिलेश अपनी सूझ-बूझ से पहले भी दो-तीन बार मुलायम सिंह को मात दे चुके हैं।

सपा के दो फाड़ होने की खबर से भाजपा ने अवश्य दिवाली मनाई होगी। किन्तु अब तो उसके लिए परिस्थितियां पहले से अधिक विकट होती नजर आ रही हैं। अब भाजपा को न तो सपा से सीधा लडऩा पड़ेगा, ना ही कांग्रेस से। यदि राहुल गांधी और जयंत चौधरी का अखिलेश से गठबंधन तय हो जाता है तब उत्तर प्रदेश का चुनाव एक त्रिकोणीय संघर्ष रह जाएगा। भाजपा को सरकार तक पहुंचने के लिए एक ही मार्ग उपलब्ध होगा। जिस प्रकार उसने जम्मू एवं कश्मीर में सिर झुकाकर पीडीपी के साथ हाथ मिलाया और सरकार में शामिल हो गए। ऐसा एक और अवसर भाजपा के सामने है। उत्तर प्रदेश में भी भाजपा सत्ता तक पहुंच सकती है, क्योंकि स्वतंत्र रूप से आज भी भाजपा के पास सिवाय नरेन्द्र मोदी के कोई दूसरा चेहरा नहीं है। सबक लेने के लिए बिहार के चुनाव परिणाम भी उसके सामने हैं। भाजपा यह खतरा क्यूं कर मोल लेगी। पर बिना चेहरे के कौन अखिलेश और मायावती को चुनौती देगा, यह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। सपा के चौबीस घंटे के इस भूकम्प ने चुनाव के सारे समीकरण बदल दिए।

दिसम्बर 24, 2016

जंग हारे जंग

एक बार बुद्ध ने रत्नाकर डाकू से पूछा कि, तू यह सारे पाप किसके लिए करता है? उसने उत्तर दिया-अपने परिवार के लिए ! बुद्ध का दूसरा प्रश्र था कि क्या तेरे इन पापों का फल परिवार वाले भी बांटेंगे? इस प्रश्र को रत्नाकर ने अपनी पत्नी एवं पिता के सम्मुख रख दिया। उन्होंने कहा कि, हम तेरे कर्म में सहायक अवश्य हैं किन्तु तुम्हारा किया तो तुम ही भोगोगे। रत्नाकर जिंदगी की जंग हार गया। ठीक वैसे ही दिल्ली के उपराज्यपाल नजीब जंग अनगिनत ज्यादतियों के साथ अपने राजनीतिक जीवन की यह जंग हार बैठे। अचानक गुरुवार को उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। कह नहीं सकते कि, देश में किसी को भी इस दुर्घटना पर अफसोस हुआ हो। अपने कार्यकाल में उन्होंने भी चमड़े के सिक्के चलाने का वैसा ही प्रयास किया जैसा कि, भिश्ती ने एक दिन का बादशाह बनकर किया था।

नजीब जंग को जुलाई 2013 में यूपीए सरकार ने दिल्ली का उपराज्यपाल नियुक्त किया था। इससे पूर्व वे जामिया-मिलिया विश्वविद्यालय के उपकुलपति थे। मूलत: आईएएस अफसर रहे जंग ने उपराज्यपाल के रूप में जिस तरीके के आदेशात्मक प्रहार दिल्ली सरकार पर किए, उसने तो मथुरा के कंसराज की याद दिला दी। उनका वश चलता तो वासुदेव की तरह केजरीवाल को भी कारागार में ठूस देते। कितने घटनाक्रम सामने आए, सुनकर लगता ही नहीं कि नजीब लोकतंत्र के प्रतिनिधि थे। राजतंत्र में तो वैसे भी कोई किसी का सगा नहीं होता। फिर नजीब ने तो लोकहित की बड़ी-बड़ी योजनाओं (देवकी पुत्र) की निर्मम हत्याएं कम नहीं की। जंग ने अपने व्यवहार से यह तो साबित कर ही दिया कि, वे किसी शहंशाह से कम नहीं हैं। तब उनका बेआबरू होकर जाना, प्रकृति के कानून सम्मत ही है। देश के इतिहास में, उनका लिखा काला पन्ना, आने वाली पीढिय़ों के लिए एक नजीर रहेगा।

एक कहावत है कि, जो चोर होता है, उसको सारे लोग चोर ही नजर आते हैं। संत को कोई बुरा नहीं लगता। दिल्ली सरकार के प्रथम गठन के साथ ही उस पर जंग की नजर लग गई थी। जंग ने अरविंद केजरीवाल को एक सौत की तरह ही मानकर व्यवहार किया। दूसरे चरण में तो जंग दोनों हाथों में तलवारें लेकर मानो सड़क पर ही उतर आए। मानो यह उनका निजी स्वार्थ था। अफसरों की नियुक्ति को लेकर तो आए दिन फाइलें लौटाते ही रहे। उन्होंने तो मुख्यमंत्री के सचिव राजेन्द्र कुमार के घर पर छापा होने तक की व्यवस्था की। किंतु वहां कोई ऐसा दस्तावेज नहीं मिला कि वे मुख्यमंत्री को अपमानित कर पाते। उसके बाद तो वे चोट खाए हुए नाग की तरह फुफकारने लगे। दिल्ली सरकार की सैंकड़ों फाइलों की छानबीन करा डाली। यहां भी उन्हें निराशा ही हाथ लगी और केजरीवाल सूखे ही बच निकले। मुझे यह जानकारी तो नहीं कि, केन्द्र सरकार ने उनके इस सचाई पूर्ण वक्तव्य को कितना सच माना किन्तु आज के जमाने में यह पचने वाली बात नहीं थी। और जिस तरह से जंग ने केजरीवाल को सभी प्रकार के अधिकारों से वंचित कर रखा था, तब तो यह उत्तर असंभव ही था। आज की स्थिति तो यह है कि मुख्यमंत्री निवास के सभी बागवानों और रसोईदारों तक को हटा दिया गया है। मुख्यमंत्री बनाए खाना उनकी बला से।

जंग की कार्यप्रणाली से भाजपा सरकार को कितना फायदा हुआ या नहीं, यह अलग बात है लेकिन उनकी इस कार्यप्रणाली को सहन करना अथवा स्वीकृत करना दूसरी बात है। जिस प्रकार असंतुष्ट होकर भाजपा सरकार ने कई राज्यपालों के इस्तीफे लिए, उसी कड़ी में नजीब जंग का इस्तीफा भी जुड़ गया। उनका अब तक का सारा किया-कराया पानी में बह गया। अन्तर केवल इतना ही है कि, पिछले तीन साल से वे दिल्ली में भाजपा की किश्ती चला रहे थे। सुप्रीम कोर्ट के एक झौंके ने किश्ती को हिला दिया। अच्छा हुआ जंग ने इस्तीफा दे दिया वर्ना क्या पता न्याय की अगली कड़ी क्या रंग लाती क्योंकि अपने पूरे कार्यकाल में नजीब जंग एक चुनी हुई सरकार को उखाड़ फैंकने में लगे हुए थे। दिल्ली में तो आने वाले समय में, प्रत्येक उपराज्यपाल के लिए सम्मानपूर्वक जीने के लिए जंग की नजीर ही काफी होगी। अभी तक की जंग में जीत जनता की हुई, इसमें कोई सन्देह नहीं है।

दिसम्बर 20, 2016

अब क्या बचा?

सरकार ने आज एक और घोषणा नोटबंदी के सिलसिले में की है, जो कि पिछली घोषणा से कुछ अलग हटकर है। विरोधाभासी भी कह सकते हैं। यह तो स्पष्ट हो गया है कि सरकार के मन में कोई तो भय पैदा हो गया है। एक   नोटबंदी के आदेश के बाद कितने आदेशों की बौछार हो गई। क्यों? अरुण जेटली और रविशंकर प्रसाद कई बार कह चुके हैं कि नोटबंदी का फैसला बहुत सोचकर किया गया है। फिर इतने बदलाव क्यों? सरकार को किस पर विश्वास नहीं है-कार्यपालिका पर, जनता पर अथवा स्वयं पर।

सारे नियमों को एक साथ रखकर पढ़ें तो लगेगा कि सरकार भी किंकर्तव्यविमूढ़ हो रही है। जो फैसला कर रही है, उल्टा पड़ रहा है। बाजार में चर्चा दिनभर होती है अथवा भ्रष्टाचारी जिस प्रकार गलियां निकालते दिखाई पड़ते हैं, उससे प्रभावित होकर सरकार फिर एक नई घोषणा ले आती है। पहले घोषणा की गई थी कि 500-1000 रुपये कितने भी पुराने नोट 30 दिसम्बर तक जमा कराए जा सकते हैं। आज सरकार ने नई घोषणा करते हुए कहा है कि तीस दिसम्बर तक कोई भी व्यक्ति 500-1000 रुपये के पुराने नोट जमा तो करा सकता है, किन्तु कुल 5000 रुपये तक ही। 5000 रुपये से ज्यादा राशि सिर्फ एक बार जमा कराई जा सकती है, वह भी उसके स्रोत की पूरी जांच पड़ताल के बाद। प्रधानमंत्री ने पहले अवधि तीस दिसम्बर ही दी थी, किन्तु बिना किसी शर्त के। सरकार को ग्यारह दिन पहले ऐसा क्या सपना आया कि अपने मूल आदेश का ही अपमान करा बैठी? क्या प्रधानमंत्री की घोषणा के ऊपर भी कोई घोषणा कर सकता है? बहुत से लोग ऐसे भी होंगे जिन्होंने यात्रा पर होने, बैंकों में भीड़ होने या  कहीं व्यस्त होने के कारण दिसम्बर के अंतिम दिनों में पुराने नोट जमा कराने का विचार किया होगा। या यही सोच कर रुक गए होंगे कि अभी तो रोज नियम बदल रहे हैं, पहले सारी घोषणाएं हो जाने दो। अब वे लुटा हुआ महसूस कर रहे हैं।

दूसरी ओर सरकार ने पहले भी 50 प्रतिशत तक कर भरकर पुराने नोट जमा कराने की छूट दी। उसके बाद पुराने नोटों पर पूर्ण पाबंदी की तिथि भी (1 अप्रेल 2017 से) घोषित कर दी थी। पेट्रोल पंपों, अस्पतालों जैसी सेवाओं को सीमित अवधि की छूट थी। 15 दिसम्बर से यह छूट भी छीन ली गई है। इसके बाद भी भ्रष्टाचारियों को रद्दी हुए नोटों को कर के साथ जमा कराने की छूट दे रखी है।

सरकार की आज की घोषणा से उन लोगों को बड़ा झटका लगा है जो लोग सरकार पर भरोसा करके 30 दिसम्बर तक पुराने नोट जमा कराने की योजना बना रहे थे। वे यदि 10-15 हजार भी जमा कराना चाहते हैं तो 30 दिसम्बर से पहले एक बार ही इतनी राशि जमा करा पाएंगे। उसके लिए भी पहले दो बैंक अधिकारियों को संतुष्ट करो, उनके हिसाब से। मानो आप चोर हैं। उधर आप कर व जुर्माना देकर तीस दिसम्बर तक कितनी भी राशि जमा करा सकते हैं। क्या जनता के लिए यह भ्रामक स्थिति नहीं है? क्या गारण्टी है कि सरकार आगे भी फैसला नहीं बदलेगी। प्रश्न सरकार की साख का है। आज तो लुटी हुई लगती है। सरकार कुछ व्यवस्था कर भी नहीं पा रही है। एक ओर अरुण जेटली कह रहे हैं कि सरकार पूरे नोट नहीं छापेगी, वहीं दूसरी ओर एटीएम से नकली नोट निकलने लगे हैं। यह भी संभावना व्यक्त की जा रही है कि कहीं बड़ी तादाद में नकली नोट तो बैंक में जमा नहीं हो गए और इसी तथ्य को उजागर होने से रोका जा रहा है। पहले यह भी कहा गया कि जिन लोगों के खाते में ढाई लाख तक रुपये हैं, उनसे कोई पूछताछ नहीं की जाएगी। अब पूछताछ करने और नोटिस देने की बात की जा रही है। इसका मतलब पहले जाल फैलाया जा रहा था। अपनी ही जनता से यह व्यवहार किस कोटि का माना जाए। ऐसा तो शायद चाणक्य के शब्दकोश में भी नहीं है। सरकार खुले आम कह रही है, आपके खाते में किसी के पैसे जमा हुए हैं तो लौटाओ मत, खा जाओ। यह किस तरह के आचरण को बढ़ावा दिया जा रहा है !

इस सारी उठापटक का केन्द्र केवल आयकर दाता है। सरकार 95 प्रतिशत जनता के बारे में बालभर भी चिन्तित नहीं नजर आ रही । तब क्या लोकतंत्र केवल पांच प्रतिशत सत्ताधीशों के लिए ही जीवित रहेगा? एक बात और, भगवान कितने ही अवतार ले लें, किन्तु सामाजिक आचरण, सभ्यता और संस्कृति यदि प्रकृति के साथ सामंजस्य नहीं रखते, वहां धर्म की रक्षा संभव नहीं है। न तप से, न यज्ञ से, न भक्ति कर्म अथवा ज्ञान के आवरणों से। धर्महीन समाज में ही आसुरी शक्तियों का विकास होता है। केवल समाज ही इनके विरुद्ध संघर्ष कर सकता है। आज समाज की आत्मा सोई हुई है। युवाशक्ति भौतिकवाद के कारण देश प्रेम से दूर है। देश में सत्ता के लिए बड़ा संघर्ष चल रहा है। देश मौन है। नोटबंदी की आड़ में जब बैंक में पैसा समाप्त हो गया तो ‘कैशलैस” का जुमला चला दिया गया ताकि गरीब आदमी नोटबंदी की कराहट भूल जाए।

सारी लड़ाई कुर्सी बचाने की दिखाई पड़ती है। न्याय से, अन्याय से, छीनकर, मांगकर कैसे भी। चारों ओर हमारा ही साम्राज्य फैले। जनता आज फिर गुलामी की सूरत लिए बैठी है। संघर्ष करने को तैयार कहां है? तब गुलाम होना ही उनका भाग्य है। उनको यह तो महसूस होते ही रहना चाहिए कि सत्ता तो जनता की ही है। उसने ही प्रतिनिधि चुने हैं। भले ही लोकतंत्र की स्वतंत्रता नोटबंदी से छीन ली है। अब तक तो यह आशा थी कि शीघ्र कुछ हल तो निकल ही जाएगा, किन्तु अब तो नोट भी हाथ से निकलकर सत्ताधीशों के बिस्तर की शोभा बन जाएंगे। बैंकों में कहां से आएंगे? जो है, वह भी ई-पेमेंट लील जाएगा। नोट सत्ताधारियों  के पास, नागरिक कैशलैस, आम आदमी अपने डेबिट कार्ड को अगरबत्ती करता रहेगा। सब कुछ सरकार के हाथ में चला जाएगा। हो सकता है कभी किसी खाते की कोई सफाई कर जाए। कोई सुनने वाला नहीं मिलेगा।

आज जो हालात देश में हैं वे बेरोजगारी बढ़ाने का कार्य कर रहे हैं। गरीब का निवाला छीनकर सरकारें खा रही हैं। उत्पादन रुक गया, उद्योग-धन्धे ठप होने लग गए। सरकार अभी तक आश्वासन देते नहीं थकती। बिकाऊ मीडिया के भोंपू न जाने क्या-क्या वक्तव्य दे रहे हैं। उनका अपना कोई नजरिया ही नहीं रह गया। शुरू में जिस उत्साह से लोगों ने आशा के साथ नोटबंदी का स्वागत किया था, वह खुमारी उतर चुकी। गरीबों के घाव गहरा गए। अब उनको नोट मिल भी गए, तो पुराने घाव सूखने वाले तो नहीं हैं। लोगों को यह भी उम्मीद थी कि नोटबंदी के दूसरे चरण में नेताओं और अफसरों पर भी गाज अवश्य गिरेगी। यह भी राहत का एक परोक्ष बिन्दु तो था ही। किंतु ऐसा कुछ नहीं हुआ, बल्कि नित नए फैसले न केवल निराशा पैदा कर रहे हैं बल्कि भविष्य की छवि भी धूमिल कर रहे हैं। जनता को कभी तो जागना पड़ेगा। कोई भी उच्च शिक्षा प्राप्त या उद्योगपति देश में क्यों रहेगा? आयकर वाले कभी नहीं चाहेंगे कि देश में कोई उन्नति करके विकास में योगदान दे। उनका जीवन तो इन पांच प्रतिशत लोगों पर ही टिका है। किसी भी सरकार का आज तक यह संकल्प नहीं रहा कि वह पांच वर्षों में बीपीएल का 5-7 प्रतिशत कम करेगी। सही अर्थों में तो ये इनका आंकड़ा बढ़ते जाना ही देश का विकास मानते हैं। आश्चर्य इस बात का है कि इनको भी कैशलैस होने के लिए अनेकों योजनाएं और छूट के प्रस्ताव दिए जा रहे हैं। अनजाने में जनता एक चक्रव्यूह में फंसती जा रही है। न चुनाव आयुक्त आंखे दिखा सकता है, न ही सर्वोच्च न्यायालय स्वप्रसंज्ञान लेकर लोगों की तथा लोकतंत्र की इज्ज्त बचाने को उत्सुक है। उसे तो नया इतिहास रचना चाहिए।

काले धन के नाम पर आज जो खिलवाड़ प्रतिदिन कायदे-कानून बदल कर नागरिकों के साथ किया जा रहा है, उससे दो स्थितियां पूर्णत: स्पष्ट हैं। एक तो सरकार की विफलता की बौखलाहट स्पष्ट नजर आती है। दूसरी ओर इस चेहरे को छिपाने के लिए नित नए मुखौटों का सहारा लिया जा रहा है। जिन लोगों ने 34 प्रतिशत कर न देकर काला धन इकट्ठा किया, वे तो 50 प्रतिशत अथवा अधिक देकर कभी भी अपने धन का खुलासा नहीं करेंगे। लोग आसानी से बैंक वालों को 30 प्रतिशत दलाली देकर नये नोट प्राप्त कर रहे हैं। तब वे क्यूं 50 प्रतिशत देंगे? इसी तरह 50 प्रतिशत में तो आज डॉलर भी उपलब्ध है। बड़ी राशि वाले लोग तो उधर ही जा रहे हैं। आजकल एक कहावत चल रही है कि मगरमच्छ पकडऩे के लिए पूरे तालाब को खाली कर दिया गया किन्तु सारे मगरमच्छ तो पृथ्वी पर भाग चुके। इस संघर्ष में बेचारी मछलियां मारी गई। अर्थात जितने भी आदेश 8 नवंबर से आज तक जारी हुए, उनका लाभ केवल मगरमच्छों को ही हुआ है। जिस जनता ने सरकार को चुना, वह आज मूक दर्शक बनी हुई एक अपराध बोध के साथ आसमान की ओर ताक रही है क्यूंकि उसकी युवा पीढ़ी स्वयं किंकर्तव्यविमूढ़ होकर आंखे मूंदें बैठी है, लोकतंत्र के तीनों पाए, चौथे पाए की कृपा से कहर बरपा रहे हैं। सारा वातावरण कंस के लोकतंत्र जैसा छद्मवेशी बन गया है। निकट भविष्य में किसी विष्णु के अवतरित होने की संभावना नहीं लगती है। जिस दिन भी देश का युवा वर्ग जाग जाएगा, वही विष्णु का दसवां अवतार होगा। जनता अपने शासन के प्रति फिर से जागृत हो जाएगी एवं विनाश की ओर मुड़ती इस विकासधारा को एक नया मोड़ दे सकेगी। ईश्वर जल्दी ही ऐसा दिन दिखाए।

दिसम्बर 19, 2016

बचकाने राहुल

यथा राजा तथा प्रजा। क्योंकि दोनों एक ही प्रकृति द्वारा संचालित होते हैं। बिना शब्दों के भी एक-दूसरे की मंशा भांप लेते हैं। लोकतंत्र में वंशानुगत राजा नहीं होता। मर्यादा के बाहर जाकर प्रयास तो किए ही जाते हैं। तब वहां शासन का स्वरूप बदल जाता है। इस देश में आजादी के साथ ही कांग्रेस सत्ता में आई और लगभग 40-45 वर्षों तक शासन किया। इनमें भी वंशवाद छाया रहा जिसके कारण शासन का स्वरूप अधिनायकवादी हो गया। देश आज इसी का दंश भोग रहा है। कांग्रेस को आज भी विपक्ष की भूमिका का अनुभव नहीं है। या तो स्वयं कांग्रेस ने निरंकुश होकर शासन किया, या फिर अन्य दलों को निरंकुश शासन करने की छूट दे दी। दोनों ही परिस्थितियों में लोकतंत्र पंगु ही रहा। इसी कारण क्षेत्रीय दल भी प्रकट हुए।

आज भी कांग्रेस के पास राष्ट्रीय नेताओं का अभाव है तो परिवारवाद के कारण। नेहरू के बाद नेतृत्व की गिरावट, लोकतंत्र पर कुठाराघात बढऩे लगे। सोनिया गांधी का अध्यक्ष काल तो पूर्णत: निरंकुश होकर रह गया। यही कारण है कि आज कांग्रेस विपक्षी दल के रूप में भी मान्य नहीं है। यह कांग्रेस की सबसे बड़ी बौखलाहट का कारण बनता जा रहा है। उसमें भी मां-बेटे के दो खेमें। किसी भी संस्था को डुबाना हो तो नेतृत्व को दो टुकड़ों में बांट दो।

सोनिया फिर से खड़ी होती नहीं जान पड़तीं। लाड़ले राहुल के पांव पालने में ही नजर आ रहे हैं। कांग्रेस की नाव में छेद भी कम नहीं हैं। चारों ओर केवल अवसरवादी तत्व रह गए हैं। इसमें उनका निजी स्वार्थ है। राहुल के पांवों तले जमीन नहीं है। तभी तो मोदी जी ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ का नारा चला चुके हैं। कांग्रेस की बौखलाहट और बढ़ गई।

आज राहुल गांधी ने पार्टी की कमान अपने हाथ में ले रखी है। एक परिपक्व नेता के स्थान पर छात्रनेता अधिक दिखाई दे रहे हैं। अभी नोटबंदी को लेकर रोजाना एक बयान दे रहे थे कि मुझे संसद में बोलने ही नहीं दिया जाता। बोलूंगा तो भूचाल आ जाएगा। बोला आज तक कुछ नहीं। प्रेस को ही बता देते। जैसे एक बच्चे को दूसरा बच्चा पीट दे और पहला चेतावनी दे कि अब के पीट के देख, और दूसरा फिर उसे पीट दे।

नोटबंदी के मुद्दे पर विपक्ष संगठित भी हुआ। राष्ट्रपति जी तक शिकायत करने भी पहुंचा। इस बीच सरकार ने अगस्ता हेलीकॉप्टर सौदे में करोड़ों की दलाली की चर्चा छेड़ दी। लगता है राहुल गांधी पंक्चर हो गए। तुरंत संयुक्त विपक्ष की सलाह को दरकिनार करके, संगठन की कीमत पर, स्वयं कांग्रेस का प्रतिनिधि मण्डल लेकर प्रधानमंत्री से मिलने चले गए। राजनीति में तो इसका अर्थ घुटने टेकना होता है। क्या राहुल का यह कदम बचकाना नहीं है? कांग्रेस के लिए आत्मघाती नहीं है? यदि सरकार 10, जनपथ की दो-चार फाइलें खोल दे तो राहुल का क्या हाल हो? इससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि राहुल गलती करते रहें तो उन्हें रोके कौन? कीमत देश ही चुकाएगा।

दिसम्बर 11, 2016

लोकतंत्र का आतंक

भारत एक कृषि प्रधान देश है। जहां लगभग दो-तिहाई आबादी गांव में रहती है। इनका मुख्य व्यवसाय कृषि व पशुपालन ही है। अत: देश में इतना अनाज पैदा होता है कि हमारी आबादी सही अर्थों में उसको खपा भी नहीं सकती। दूसरी ओर हम अन्न को ब्रह्म कहते हैं, देवता कहते हैं। अग्नि-सोम की सृष्टि में जो आहूत होता है, वह अन्न कहलाता है। अत: केवल खेतों में पैदावार ही अन्न नहीं है। हमारा आपसी व्यवहार भी एक-दूसरे का अन्न है। सृष्टि के निर्माण क्रम में, अन्न की जठराग्नि में आहुति चौथे क्रम में आती है और उसी से शरीर की सप्तधातुओं का निर्माण होता है। अन्न के साथ चन्द्रमा से पितृ प्राण भी बारिश के साथ हमारे शरीर में प्रवेश करते हैं। ये पितृप्राण शरीर के सातवें धातु शुक्र के जरिए फिर अग्नि में आहूत होकर निर्माण की अन्तिम कड़ी को पूरा करता है। इसी से सन्तान उत्पन्न होती है। हम अन्न को निर्जीव वस्तु मानते हैं। अत: उसके बारे में उससे अधिक जानकारी करने का प्रयास भी नहीं करते। आज तो विकसित मानव नर-नारी के शरीर को भी वस्तुपरक संज्ञा ही देता है, यह एक अलग बात है।

किसानों को आर्थिक सुरक्षा देने के नाम पर गेहूं की खरीद सीधे सरकार करने लगी है। लाखों टन अनाज पैदा होता है। हम इस गेहूं का सहजता से निर्यात भी कर सकते हैं। किन्तु शर्म की बात ये है कि इसके बावजूद भी हमें गेहूं का आयात करना पड़ता है और इसका एकमात्र कारण सरकार की नीतियां तथा बाबू लोगों की भ्रष्ट कार्यप्रणाली। इसके कारण पूरा देश अच्छी किस्म के गेहूं से भी वंचित रहता है और विदेशों से कैंसरयुक्त गेहूं मंगाकर खाने को भी लाचार दिखाई पड़ता है।

गेहूं और व्यक्ति दोनों ही प्राकृतिक उत्पाद हैं। आज हम पूरा जोर लगाकर इस प्राकृतिक गेहूं का नामोनिशान मिटा देने पर तुले हैं। जैसे कांग्रेस मुक्त भारत का नारा। वैसे ही, हमारी श्वेत और हरित क्रान्ति ढलती जा रही हैं। न आधुनिक दूध का, न ही आधुनिक अन्न का प्राकृतिक मानव से कोई संबंध रह गया है। ऊपर से सरकारी कार्यप्रणाली कोढ़ में खाज का काम कर रही है। जिस बेरहमी से हमारे अधिकारी किसान के खून-पसीने की कमाई से खिलवाड़ करते हैं, उससे तो कभी-कभी ये भी लगता है कि वे पत्थर के बने हैं।

देशभर में तीन सालों में 46,568 मीट्रिक टन गेहूं सड़ गया। किसान की आंखों से तो खून टपकता है और अधिकारियों की बांछें खिलती रहती हैं। यदि गेहूं सड़ेगा नहीं तो आयात कैसे करेंगे? सड़ता क्यों है? क्योंकि सरकार के पास भंडारण की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होती। लाखों-करोड़ों के बजट में कहीं भी इन गोदामों के निर्माण का किसी को ध्यान ही नहीं आता। किसान के प्रति इनके दर्द का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले 25 सालों में नया गोदाम भवन ही नहीं बनाया गया। संवेदनहीनता और बेशर्मी की हद इससे ज्यादा क्या होगी?

अकेले राजस्थान में जहां 33 जिले हैं, वहां मात्र 91 गोदाम हैं और सभी 25 साल से ज्यादा पुराने हैं। हर साल गेहूं बाहर सड़ता है, क्योंकि जो भी 2-3 गोदाम जिले में होते हैं वे दवाइयों, फलों तथा अन्य खाद्य वस्तुओं के लिए किराए पर उठ चुके होते हैं। यदि सरकार की यही नीति है और आगे भी रहनी है तो क्या हमें इस व्यवस्था को बंद नहीं कर देना चाहिए? इसमें भी कई लोगों का स्वार्थ टकराता है। आयात में कमीशन का खेल हर विभाग में आम बात है। अब जब सरकार आयात कर में छूट दे देगी, तब तो कमीशन की राशि भी बढ़ जाएगी और देश में पहुंचने वाला गेहूं फिर भी सस्ता होगा।

प्रश्न तो यह है कि सरकार का लक्ष्य क्या केवल इतना ही है? सरकार को अन्न के बारे में अधिक गंभीर होने की आवश्यकता है। जो भी गेहूं हम आयात करेंगे उसकी कल्पना तो सहज ही हो सकती है। ये सब विकसित खेती के उत्पाद हैं। भारत में भी सरकारों ने स्वयं को विकसित देशों  की होड़ में उतारने का प्रयास किया है, जिसका परिणाम यह है कि उन्नत गेहूं और नहरी पानी की जो यात्रा पंजाब से शुरू हुई, जहां की धरती को सोना उगलने वाली बना दिया गया था, आज वहां गेहूं का उत्पादन घट गया। उसके स्थान पर प्रतिदिन 600 से अधिक कैंसर के मरीज इलाज के लिए राजस्थान आ रहे हैं। सोचिए देश में ये आंकड़ा क्या संदेश दे रहा होगा? मात्र पिछले 3 साल के आंकड़ों को देखकर सोच सकते हैं कि इस रोग की भारत में क्या स्थिति होगी।

क्या हमें इनके प्रति उदासीन हो जाना चाहिए? रासायनिक खाद के उपयोग के मामले में राजस्थान के श्रीगंगानगर व हनुमानगढ़ जिले ने पंजाब का अनुकरण किया। इन दोनों जिलों की स्थिति तो आज और भी बदतर है। उन्नत बीज, रासायनिक खाद, कीटनाशक जैसे विकसित एवं वैज्ञानिक संसाधनों के कारण आज माता के दूध में भी कीटनाशकों के अवशेष पाए जाते हैं। पत्रिका के एक सर्वे में आंकड़ा लगभग 50 प्रतिशत था। यहां का गेहूं उन्नत होते-होते पूर्ण रूप से रासायनिक हो गया है। हमारा शरीर सिंथेटिक खाने को पचा नहीं सकता। वे ही कैंसर का रूप लेते हैं।

आज भोजन से रस लुप्त हो गया, तब वह अन्न की श्रेणी में भी नहीं आता क्योंकि वेद कहते हैं- ‘रसौ वै स:’ अर्थात रस ही ब्रह्म है, इसके बिना शरीर की रोग निरोधक क्षमता कैसे बढ़ सकती है। न ही व्यक्ति की आत्मा का निर्माण होगा। वो भी तो ब्रह्म ही है, अर्थात् अन्न का जीवात्मा और परमात्मा को जोडऩे का सेतु। जिसका एक छोर स्थूल व दूसरा छोर सूक्ष्म है। क्या ऐसा सेतु परमात्मा के अलावा कोई बन सकता है।

लेकिन नीतिकारों को इससे क्या फर्क पड़ता है कि कौन मरता है, कौन बचता है। जो भी बीज हम आयात करेंगे वो शायद और भी उन्नत हो ताकि कैंसर भी पूरे देश में उसी गति से पनप सके। हम अपने अमृततुल्य अन्न को तो सड़ा कर दारू बनाने वालों को बेचने में खुशी मनाते हैं, वो भी तो आज की परिभाषा में विकसित होने का ही मापदंड है। हम इस अमृत के बदले रुपए किलो में कैंसर खरीदने जा रहे हैं। ये तो इसका स्थूल परिणाम स्पष्ट समझ में आता है। यह हमारा दुर्भाग्य ही है कि जनता का साहस मर चुका है, जिसके कारण देश में जगह-जगह आसुरी शक्तियां सिर उठा रही हैं।

यदि विश्वास करें तो एक और बड़ा पहलू सिद्धान्त रूप से अन्न के साथ जुड़ा है और वो है, जीवात्मा की यात्रा का निमित्त बनना। प्राकृतिक नियम के अनुसार पितृ आत्माओं का भी भौगोलिक विभाजन होता है। ये देश और काल का प्रभाव अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। हमारी संस्कृति का बहुत बड़ा आधार भी है। अब यदि ऑस्ट्रेलिया में पैदा किया गेहूं भारत आयात करता है, तब उसके साथ किस प्रकार का जीवात्माएं हमारे पैदा होंगी। उनके पितृ हमारे शरीरों में काम करेंगे। हमारे पितृ तो पानी में बह जाते हैं। हां ये भी सत्य है कि हमें प्रलय की ओर ही तो बढऩा है। सरकारें अपनी नीतियों से उसे जल्दी बुलाने का प्रयास कर रही हैं। और ये भी सपने देखती हैं कि भारत फिर से सोने की चिडिय़ा बनेगा। विश्व में फिर से ज्ञान के शीर्ष पर होगा, विदेशी अन्न खाकर? वहां की आत्माओं ने तो अन्न की धार्मिकता और मार्मिकता को समझा ही नहीं, तब उस अन्न को खाने वाला जीवात्मा कैसे भारतीय ज्ञान की ओर आकर्षित होगा।

विदेशों से आयातित गेहूं को वहां पशुओं के खाने लायक भी नहीं समझा जाता। हमारे यहां आने पर इसकी जांच भी नहीं की जाती कि इसकी गुणवत्ता खाने लायक भी है या नहीं।  अन्न का आयात देश के किसानों की तपस्या का अपमान है। कुदरत ने जो हमें दिया आज उसका अवदान हमें उपलब्ध नहीं है। ऋषियों के ज्ञान को विज्ञान के नाम पर झुठलाने की होड़ लगी है। किन्तु फिर भी वैदिक विश्वविद्यालयों में अनुवाद के आगे कोई शिक्षा उपलब्ध नहीं है। ज्ञान से तो पढ़ाने वाले भी अनभिज्ञ हैं। हमारे पास एक ही विकल्प रह जाता है कि हम अपने अज्ञान के कारण मानवीय संस्कृति का ह्रास करते हुए स्वयं को भी सिंथेटिक अन्न बनाकर प्रकृति में आहूत कर दें।

दिसम्बर 7, 2016

‘मैं’ और ‘मेरा’

मंगलवार प्रात: पत्रिका में मानवीय तथा आध्यात्मिक दृष्टि से एक अत्यन्त महत्वपूर्ण समाचार पढ़ा। अनायास ही मेरा सिर न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री ‘जॉन की’ के आगे झुक गया। उन्होंने नेशनल पार्टी के मुखिया के रूप में दस वर्ष पूरे किए और इसी अवसर पर उन्होंने यह स्वीकारोक्ति भी की, कि एक दशक से ज्यादा समय से मेरी पत्नी और बच्चे अकेले हैं। ‘मेरे घर लौटने का यह सबसे सही समय है।’ उनका कहना था कि वे राजनीतिक जिम्मेदारियों से मुक्त होकर परिवार के साथ समय गुजारना चाहते हैं। यह घटना आज के युग में असंभव लगती है। क्योंकि जीवन के अब वे लक्ष्य नहीं रहे जहां तक पहुंचने के लिए कभी व्यक्ति 100-100 साल तपता था।

आज केवल शरीर के नाम से व्यक्ति उछलता है, घमण्ड करता है। उसे लगता है कि, उसके जैसा दूसरा कोई नहीं। जैसे-जैसे बड़ा होता है, उम्र में, धन में, पद में, शोहरत में, उसकी पहली मार उसके परिवार को ही पड़ती है जो कि समय के साथ उसकी नजर में छोटे होते चले जाते हैं। हम यदि गुलाब के फूल को देखें तो क्या उसकी इज्जत पंखुडिय़ों से नहीं है? क्या बिना कांटों के वह सुरक्षित रह सकता है? यदि उसकी पंखुडिय़ां गिर जाएं तो उसकी सुगंध भी चली जाएगी। इन सबके बीच रहते हुए ही व्यक्ति अपने जीवन की वास्तविकता को समझ सकता है। ‘मेरे’ के साथ रहकर ‘मैं’ विकसित नहीं हो सकता। ‘मैं’ केवल ‘मैं’ के साथ ही अपनी आत्मा को समझ सकता है। शास्त्र कहते हैं आत्मा से आत्मा को देखो।

व्यक्ति एक बीज होता है। पेड़ उसका परिवार होता है। फल उसकी कमाई होते हैं। जब बीज स्वयं की चिंता में लग जाएगा, क्या वह कभी जमीन में दब जाने को तैयार होगा? क्या वह कभी पेड़ बन पाएगा? उसकी स्थिति उस मां की तरह होगी जिसने बच्चा तो पैदा कर दिया किन्तु मां बनने का अहसास नहीं कर पाई। इसके लिए तो उसे मौत के मुंह से गुजरना पड़ता। केवल पेट चीरकर संतान दे देना मां बन जाना नहीं है। हम कहते हैं- मातृ देवो भव:, पितृ देवो भव:। क्यों कहते हैं? क्योंकि मैं कहता हूं- अहम् ब्रह्मास्मि। मैं स्वयं अपनी पत्नी के पेट में प्रवेश करता हूं और संतान बनकर बाहर निकलता हूं। सोचिए क्या पत्नी अद्भुत शक्ति नहीं है? संतान भी मैं ही हूं। पत्नी मेरी शक्ति है जो मेरे इशारे पर निर्माण कार्य करती है। वह मेरा ही निर्माण करती आई है। हमने तो पुरुष को अहंकार का पुतला ही देखा है। शायद उसने पत्नी को शक्ति के रूप में देखा ही नहीं बल्कि वह तो उसे अपनी सम्पदा मानता है। अर्द्धनारीश्वर की भूमिका को समझता ही नहीं। इस देश की हर स्त्री अपने पति के निर्माण के लिए जीती है। इसी संकल्प के कारण वह सब कुछ छोड़कर एकसूत्रीय कार्यक्रम के साथ पति के साथ रहने आती है। पति के अहंकार को तोड़ती है। अपने शक्ति रूप के कारण पति की एक मूर्ति का निर्माण करती है। उसके सारे दोष एवं अनावश्यक वातावरण को हटाती है। उसके कर्ता भाव को आस्था से जोड़ती है। इसके बिना कोई भी पति सहजता से पशु बन जाएगा।

ये कुदरत का नियम है कि पुरुष कुछ नहीं करता। क्रिया सारी प्रकृति की होती है। आपको कोई भी पुरुष स्त्री के व्यक्तित्व का निर्माण करता नहीं मिलेगा क्योंकि उसमें कर्म भाव नहीं है। ये भी इकतरफा नियम है। केवल पत्नी ही पुरुष का निर्माण कर सकती है। इसीलिए उसे शक्ति कहा गया है। पत्नी के अलावा हर दूसरी स्त्री उसे रसातल में ले जाएगी। पत्नी उसे पुरुषार्थ से जोड़कर, मोक्ष के अंतिम पड़ाव तक का मार्ग सुगम कर देगी। यहां तक कि वानप्रस्थ के शुरुआत में भी पति के मन में एक अद्भुत विरक्ति भाव पैदा करती है ताकि उसका सारा प्रेम अध्यात्म के भीतर की ओर मुड़ जाए। वह स्वयं को उसके भीतर ढूंढ़ सके। यही तो ‘जॉन की’ करना चाहते हैं। पाठकों को याद होगा कि जब अमरीकी राष्ट्रपति का चुनाव अभियान शुरू हुआ तब राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कहा था कि अगर मैंने अब भी चुनाव लड़ा तो मिशेल मुझे तलाक दे देगी। कनाडा के सीनेटर बॉब डे और पीयरे कार्ल के उदाहरण भी हमारे सामने हैं जिन्होंने परिवार के लिए राजनीति छोड़ दी। टेनिस खिलाड़ी एंडी मरे ने भी आस्टे्लियाई ओपन शुरू होने से पहले ही कह दिया था कि, भले मुझे फाइनल छोडऩा पड़े लेकिन वह स्वयं को पत्नी के पेट से अवतरित होते देखना चाहेगा।

इतनी सी बात तो सब समझते हैं कि, जब तक पेड़ पर आम नहीं लग जाते, गुठली के प्राण पेड़ में बहते रहते हैं। उसी से आम की नस्ल बनती है। उसमें रूप, रस, गंध पैदा होते हैं। यदि गुठली आधे रास्ते में ही काम करना बंद कर दे तब आगे आम नहीं लगेंगे। भारतीय मनीषा मानती है कि, व्यक्ति अपने पीछे और आगे की सात-सात पीढिय़ों से बंधा रहता है। आम नहीं लगा तो उसकी मुक्ति संभव नहीं है। इस दृष्टि से भी ‘जॉन की’ का यह निर्णय ऋषि कोटि का है। जो धन, पद की महत्वाकांक्षा को ठोकर मारकर आगे बढ़ता है। वही ऐश्वर्य का भागीदार होता है। सिद्धियां उसी का वरण करती हैं। यह तभी संभव है जब आदमी यह समझ जाए कि ‘मैं’ शरीर नहीं हूं। इसके भीतर रहने वाला हूं। तभी वह परिजनों के बीच में रहकर सारी कामनाओं से मुक्त रह सकता है, तीनों गुणों से मुक्त रह सकता है। यही प्रज्ञा पुरुष के लक्षण हैं। ‘जॉन की’ को शत-शत नमन जिसने ऊंचाई की अवधारणाओं के शिखर पर पहुंच कर उसे ठोकर मार दी।

विश्व के दिग्गज नेताओं, राजपरिवारों एवं अधिनायकवाद के रसूखदारों, सैन्य शासकों को यदि विश्व में शांति की स्थापना करनी है, केवल अपना पेट नहीं भरना तो अपने भीतर बैठकर जीने का अभ्यास करना होगा। आज की शिक्षा में ये घुन डिग्री के साथ ही लग जाता है। आदमी स्वयं को भूलकर शारीरिक सुख के लिए ही जीने लग जाता है। उसके लिए करियर की अवधारणा इसके आगे है ही नहीं। बड़ा पैकेज, भौतिक सुख में ही वह सौ साल पूरे कर जाता है। उसकी जीवन यात्रा शुरू ही नहीं होती। जहां पैदा होता है, वहीं मर जाता है। उसके जीवन का उद्देश्य शरीर, मन, बुद्धि का उपयोग करते हुए आत्मा को मुक्त करना है। न उसके सामने लक्ष्य होता है, न यात्रा का पथ, न काल की कोई गणना। इसके बिना सम्पूर्ण 100 साल व्यर्थ ही जीता है। इस जीवन का उसके आत्मकल्याण से कोई सम्बंध नहीं होता। उसका अहंकार उसे अन्यत्र देखने ही नहीं देता। उस स्थिति में भी उसके परिजन, पत्नी-पुत्र, माता-पिता, बंधु-बांधव जो सभी उसके साथ अपने कर्मों का फल भोगने के लिए पैदा हुए हैं, वे व्यक्ति के जीवन में कभी पूरक हो ही नहीं पाएंगे। वे ही कड़वे-मीठे बोल हथियार की तरह काम में लेते हुए, व्यक्ति के प्रज्ञा चक्षु खोलते हैं। झूठ के आवरणों को ध्वस्त करते हैं। हर व्यक्ति एक दर्पण का काम करता है। इसीलिए मानव एक सामाजिक प्राणी है। वन्य जीवों की तरह स्वच्छंद विचरण नहीं करता। ‘जॉन की’ के 10 साल स्वच्छंद विचरण के थे। जब-जब उन्हें ठोकर लगी, उन्हें परिवार याद आया, धन्य हैं वे। लोग कहते हैं दिया तले अंधेरा किन्तु सूरज तले उजाला।

दिसम्बर 4, 2016

ध्वस्त होती संस्कृति

एक समय था जब मैं और मेरे पड़ोस की पांच नंबर वाली चाचीजी हाथी बाबू के बाग से छोटी चौपड़ तक रोजाना सब्जी खरीदने पैदल जाया करते थे। मैंने एक दिन पूछ लिया कि, हम सिटी बस से क्यों नहीं आते। उनका उत्तर था कि सिटी बस से आने और जाने के दस-दस पैसे लगते हैं। उन बीस पैसों को बचाने के लिए ही तो हम यहां आते हैं। वर्ना तो जयपुर के पोलोविक्ट्री सिनेमा क्षेत्र से ही खरीद लेते।

बचत की यही परंपरा बच्चों को दी जाने वाली मिट्टी की गुल्लक के साथ बीज रूप में देखी जा सकती है। बच्चों को आकर्षित करने के लिए भी कई बैंकों ने नए-नए डिजाइनों में गुल्लकें बांटी थीं। आज तो वे आदमी से कटकर धन से जुड़ गए। जबकि संचय तो अपने पुण्यों का व्यक्ति अगले जन्म के लिए भी करता है। असली धन तो पुण्य है।

आज चाचीजी के उस उत्तर पर मैं देश की महिला शक्ति को बार-बार नमन करता हूं। कैसे उन्होंने एक-एक परिवार को बचत के लिए संस्कारित किया, विकसित किया? बच्चों को पढ़ा-लिखा कर तैयार किया? जिन्दगीभर पति की जेब से चोरी करके भी कभी स्वयं के लिए दो रुपए नहीं खर्चे। उनके इस त्याग की चर्चा इतिहास के किसी पन्ने पर पढऩे को नहीं मिलती। आज जब हमारी केंद्र सरकार कैशलैस व्यवस्था की बात करती है तब इस निर्णय में देश की यह बचत करने की परंपरा ध्वस्त होती दिखाई पड़ रही है। क्या किसी नेता को यह पता है कि संस्कृति और सभ्यता का अंतर क्या है? देश में परंपराओं का विकास सैकड़ों नहीं हजारों सालों में होता है और वही देश की पहचान और विकास की नींव बनती है। पाठकों को याद होगा कि जब सनï् 2008 में वैश्विक आर्थिक मंदी का दौर आया था, अमरीका जैसी महाशक्तियों ने घुटने टेक दिए थे। तब उस झंझावात में भी हमारी आर्थिक स्थिति संयत थी। पूरे विश्व ने इस बात पर भारत को बधाई दी थी कि हमारी बचत परंपरा बहुत गहरी है। आज हम दोनों हाथों में कुल्हाड़ी लेकर उसी परंपरा को निर्मूल करने पर तुले हुए हैं।

आधुनिक शिक्षा ने विकास की परिभाषाएं बदल डालीं। स्त्री-पुरुष को अन्य प्राणियों की तरह शरीर मात्र मानकर, अन्य विकसित देशों की नकल पर चल पड़े। उन विकसित देशों में अध्यात्म की संस्थाओं (शरीर,मन,बुद्धि,आत्मा) का स्वरूप बिखरा हुआ है। जिसे हमारे शिक्षित समुदाय ने भी अपनाना शुरू कर दिया है। देश की पिछली कांग्रेस सरकार के मानव संसाधन मंत्री और ख्यातनाम वकील कपिल सिब्बल ने जिन नीतियों को हवा देने का प्रयास किया, वे सारी हमारी नैतिक मूल्यों की परंपराओं को ध्वस्त करने ही वाली थीं। लेकिन वे इसे अपनी उपलब्धि मानकर सदन में बार-बार गरजते रहे। उदाहरण के लिए समलैंगिकता को कानूनी जामा पहनाने की कोशिशें। उदाहरण के लिए 16 वर्ष की लड़की को स्वेच्छा से किसी भी पुरुष के साथ शारीरिक संबंध बनाने की छूट लेकिन विवाह की उम्र 18 वर्ष!

इस देश में स्त्री और पुरुष, शिव और शक्ति के रूप में एक पवित्र संस्था हैं। वर्तमान सरकार का नोटबंदी का निर्णय भी मूलत: देश की एक बहुमूल्य परंपरा को ध्वस्त ही करने जा रहा है। पैसा लोगों को विरासत में मिल सकता है। किन्तु उसका मूल्य मिट्टी से अधिक नहीं माना जा सकता। हमारे यहां परंपराओं को ही मूल्यवान विरासत माना जाता है। क्या किसी अफसर/राजनेता को निर्णय करने से पहले यह अनुभव था कि इस निर्णय का देश की पचास प्रतिशत महिला आबादी की कार्यप्रणाली, घर के विकास में उसकी भूमिका तथा जीवन के प्रति उसकी एकात्म की अवधारणा पर क्या फर्क पड़ेगा? उनके लिए तो परंपराओं का कोई मूल्य ही नहीं है। न ही उनमें किसी प्रकार की कोई संवेदनशीलता दिखाई पड़ती है। क्योंकि वे चिंतन से अंग्रेजीदां हैं। भारतीय परंपराओं से उनका कोई लेना-देना नहीं है। जैसी सरकार आती है, वे वैसी ही नीतियां बनाने में लग जाते हैं। देश के प्रति उनकी निजी प्रतिबद्धता देखने को नहीं मिलती। उनका विकासवाद धन, ग्लैमर और प्रभावशाली वातावरण तक सीमित है। तब उनको कैसे पता चलेगा कि आपातकाल के लिए तो चींटियां भी बचत करती हैं। इसमें बाधा डालना क्या चींटियों के अस्तित्व का अपमान नहीं होगा?

आप किसी भी परिवार के इतिहास को अंदर तक पढऩे का अभ्यास करें तब दिखाई पड़ जाएगा कि कैसे महिलाओं की बचत ने बच्चों को पढ़ाया, घर को ऊपर उठाया और बीमारी-दुर्घटना जैसी आपात परिस्थितियों में कैसी महत्ती भूमिका निभाई। इन्होंने ही अपने आभूषण बेचे। इसी बचत के सहारे अपने ऋणों का भुगतान किया। गृहस्वामी की कमजोर स्थिति में हर स्त्री ने एक से अधिक बार अपने कंधों का सहारा दिया। आज वह अपमानित महसूस कर रही है। उसकी बरसों की बचत आज मिट्टी में मिल गई है। भ्रष्टाचारियों का तो कुछ बिगड़ा ही नहीं, किन्तु आस्थावान गृहस्थ लोगों की गाड़ी के पहिए कीचड़ में धंस कर ठहर गए। क्या वह फिर से बचत करने की सोच पाएंगे? सरकारी नीतियों और बैंकों ने जिन भ्रष्ट और निकम्मी कार्यप्रणालियों के प्रमाण दिए तब कौनसी महिला किस बैंक पर विश्वास करेगी। दूसरी ओर मोबाइल रखना और साक्षरता दोनों एक बात नहीं हैं।

सरकार मानती है कि उसको तीन से चार लाख करोड़ उन खातों में मिल जाएंगे जिन पर चार प्रतिशत ब्याज देय होता है। जिसके आधार पर वह आयकर छूट की सीमा बढ़ाने की बात करती है। छोटी पूंजी वाले गृहस्थी सारा पैसा बैंक में रख कर क्या सौ रुपए की वस्तु पर एक सौ तीस रुपए खर्च करना चाहेंगे? तब इस योजना की सफलता पर स्वत: ही प्रश्नचिह्न लग जाता है।

बड़े उद्योगपतियों के साथ क्या होता है, आम आदमी को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। न ही कोई सरकार अफसरों-नेताओं से काला धन वसूल कर पाएगी। भले छुट्भैयाओं पर जरूर कुछ बेनामी संपत्ति के आधार पर छोटी-मोटी कार्रवाई हो जाए। संभवत: सरकार भी 8 नवंबर से आज तक स्वयं की योजना को सफल नहीं मान रही। इसलिए नित नए आदेश जारी कर रही है। इन प्रयासों से देश की सभ्यता तो बदनाम होगी ही, संस्कृति की जड़ें भी हिल जाएंगी। आदमी का मूल्य समय के साथ गिरता ही चला जाएगा। आधार कार्ड की अनिवार्यता करके सरकार ने अपनी यह प्रतिबद्धता भी जाहिर कर दी है कि वह छोटे से छोटे परिवार में भी न धन देखना चाहती है, न सोना। तब बचत की परंपरा होलिका की तरह धूं-धूं करके जल जाएगी।

नवम्बर 21, 2016

आयकर क्यों…?

धन न काला होता है, न ही सफेद। धन कभी आसमान से नहीं टपकता, कमाया जाता है। जिस देश की आधी जनता तो गरीबी रेखा -बीपीएल- के नीचे ही जीती हो, जिसने पांच सौ का नोट हाथ में भी नहीं लिया हो, उसके आगे कालेधन की चर्चा करना…? उधर मुस्लिम समुदाय बैंकों में पैसा ही नहीं रखता- सूद खाने की इस्लाम में मनाही है। बच्चों और बूढ़ों को छोड़ दो तो आंकड़ा फिर 4 प्रतिशत के नीचे, अर्थात आयकर देने वालों तक सिमट जाता है। जहां आयकर लागू होता है, केवल और केवल वहीं पर कालाधन बसता है। इन 4 प्रतिशत के किए (?) की सजा शेष 96 प्रतिशत को आज जिस तरह से मिल रही है, लोकतंत्र के परे की कल्पना है यह। आयकर कानून की अभी इस देश को जरूरत नहीं है। 70 साल में तो हम लोगों को रोटी-पानी भी नहीं दे पाए। आयकर कानून हटा देंगे तो देश का सारा धन उत्पादकता में काम आने लगेगा। हमारा धन सड़े और बाहरी लोग (FDI) के नाम से देश की सम्पदा खरीदें, यह कहां तक उचित है? यह भी कहां तक उचित है कि केवल चार प्रतिशत आबादी के लिए इतने बड़े देश की सरकार अलग से कानून बनाए? क्या इतने से लोगों के व्यवहार से आर्थिक समता या विषमता संभव है? हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि आयकर वसूलने का खर्च कितना है? तब बड़ा प्रश्न यह उठता है कि हमने आयकर कानून को आखिर किसलिए इतना प्रतिष्ठित कर रखा है? नोटबंदी के बाद आज जिन परिस्थितियों से देश गुजर रहा है, उसमें तो 96 प्रतिशत आबादी त्राहि-त्राहि करने लगी है। और सरकार कहती है कि वह नोट बंद करके भारतीय अर्थव्यवस्था में घुन की तरह लग रहे कालेधन को निकाल लेगी। माना जाता है कि, भारत में यह कुल जीडीपी का 23 से 26 प्रतिशत है जबकि सरकार ढाई साल में केवल सवा लाख करोड़ रुपए ही निकाल पाई है। तब कैसे एकत्र कर पाएंगे, सारा कालाधन? इस देश में कई मुख्यमंत्री ऐसे रह चुके हैं जिनके बारे में चर्चा है कि वे अपने कार्यकाल में सवा लाख करोड़ की इस राशि के आस-पास की राशि बटोर कर जा चुके हैं। तब इस सवा लाख करोड़ का कोई अर्थ सिवाय लीपापोती के नजर नहीं आता।

आयकर कानून का एक बड़ा प्रभाव देश के सामने यह आया कि देश के ये चार प्रतिशत ‘कमाऊ पूत’ आयकर विभाग की नजरों में चोर बनकर रह गए। एक ओर तो ये लोग देश के विकास-रथ के पहिये हैं और दूसरी ओर इनको ही सबसे बड़ा अपमान का घूंट पीना पड़ता है। जितना अपमान इनका और इनके परिजनों का आयकर विभाग की ओर से छापे मारकर किया जाता है, उससे तो ये स्वयं को द्वितीय श्रेणी के नागरिकों से भी छोटा महसूस करते हैं। शायद आयकर कानून के पीछे यही राजनीति हो। केन्द्रीय सरकार के लिए लाख-दो लाख करोड़ की राशि सच में कोई अर्थ नहीं रखती। आज तो उनकी एक-एक योजना ही इस राशि से बड़ी होती है।

लोकतंत्र में विरोधियों पर मूक आक्रमण करने के लिए ही शायद ये हथियार जिंदा हैं। आज भी हम सुन रहे हैं कि भारत सरकार के अगले कदम अफसरों और नेताओं के विरुद्ध उठाए जाएंगे। ये बात स्वयं समय सिद्ध कर देगा कि जिनके यहां छापे पडेंग़े उनमें अधिकांशत: विरोधी पक्ष के निकलेंगे। जनता तो आज स्पष्ट रूप से मान बैठी है कि इन छापों की शुरुआत आप, कांग्रेस, टीएमसी जैसे आक्रामक दलों से होगी। चर्चा तो यह भी है कि सरकार मीडिया पर भी खार खाए बैठी है। हाल ही में मीडिया में एक खबर यह भी छपी थी कि बिना पूर्व स्वीकृति के किसी भी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ भ्रष्टाचार की जांच नहीं की जाए वर्ना उनका मनोबल टूट जाएगा। पिछले सालों में आपने कितने मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों के यहां छापे पड़ते देखे। सत्ता पक्ष ही ऐसे कानूनों की परिभाषा सरकार की अनुकूलता देखकर तय करता है।

यहां आयकर कानून के बारे में जो अभिव्यक्ति श्रद्धेय पिताजी ने सन् 1986 एवं 1996 में की थी उसके भी कुछ अंश उद्धृत करना समीचीन होगा

‘यह सर्वथा निन्दनीय है कि आयकर न देने वालों को चोर-डाकू की तरह बरता जाए। माना कि लोग कर चुराते हैं, परन्तु यह नहीं भूलना चाहिए कि वे अपनी कमाई का एक हिस्सा देते भी हैं। इसकी व्याख्या यों नहीं की जा सकती कि उन्होंने चोरी की है या डाका डाला है किसी दूसरे की कमाई पर। यहां चोर-चोर में फर्क करना होगा।’

‘करचोर को करचोर मानने से पहिले करदाता मानना होगा और दाता के साथ वैसा ही व्यवहार करना होगा। यह कितना बेहूदा-बर्बर या जंगली तरीका है कि करदाता के घर-दफ्तर पर फौज पलटन लेकर धावा बोल दिया जाए, घर घेर लिया जाए, उसकी बहू-बेटियों की तलाशी ली जाए, रसोई, स्नानघर या शयनकक्ष को खोदा जाए और खाना-पीना हराम कर दिया जाए। आयकर के नियमों में छापामारी का प्रावधान हो सकता है, परन्तु इसे हटाया जाना चाहिए।’

‘वह वित्तमंत्री घोर दरिद्री ही होगा, जो इसको बड़ी उपलब्धि मानता हो।’

‘हमें दृष्टिकोण बदलना होगा और कार्यप्रणाली भी। यह सोचना गलत है कि आयकर समाप्त होते ही अकस्मात असमानता बढ़ जाएगी। यदि यही एक तर्क है तो पहिले यह आकलन करवाया जाए कि आयकर कानून के कारण असमानता कम हुई है या नहीं। जिन-जिन देशों में आयकर लागू है वह एक विशेष आर्थिक अवस्था उत्पन्न होने के बाद लागू किया गया है।’

‘आयकर कानून के पक्ष में भी बहुत कुछ कहा जाएगा। अर्थशास्त्री खासतौर पर इसे समर्थन देंगे, नौकरशाह हां में हां मिलाएंगे, नेता लोग ऐसा फैसला करने में कांपेंगे, परन्तु यह निश्चय है कि धरती रसातल में नहीं चली जाएगी। प्रयोग करने की तो बात है। परिणाम ठीक न हो, तो कानून फिर बनाया जा सकता है। धरती पर राज तो फिर भी कायम रहेगा ही।’ (क.च. कुलिश)

आज नोटबंदी के इस वातावरण में हमें देश के गांवों का दौरा करना चाहिए। क्या सोचता है, आम आदमी? छूटते ही तो हर व्यक्ति यह कहता है कि, वाह! केन्द्रीय सरकार का यह निर्णय बिल्कुल सही है। इन भ्रष्टाचारियों के तो मार पडऩी ही चाहिए। फिर धीरे-धीरे उसकी आवाज बदलती है। एक तो वो यह नहीं मानता कि प्रभावशाली लोगों के खिलाफ कोई बड़ी कार्रवाई हो सकती है। राजनीति में सबकी एक उम्र होती है। उसके बाद वह भी आम आदमियों के साथ जुड़ जाता है। वह भी आम आदमी की तरह भ्रष्टाचारियों को कोसता है और यह भी मानता है कि, इससे छुटकारा संभव नहीं है। दावे कोई कितने भी कर ले। आज आम आदमी का चेहरा बोलते-बोलते तमतमाने भी लग जाता है। उसकी दो जून की रोटी गई। बच्चों की पढ़ाई के पैसे भी नहीं। सारी जिन्दगी की चर्चाएं (व्यापार) ठप्प हो गईं।

उसके सामने एक बड़ा प्रश्न यह है कि दु:ख की इस घड़ी में उसके पास पैसा होते हुए भी उसे भूखों मरना पड़ रहा है! गरीब तो बात करते ही टप-टप आंसू बहाने लगता है। ऐसी कोई ठौर उसे नजर नहीं आती जहां जाकर वो अपना दुखड़ा रो सके। और यह आबादी 96 प्रतिशत है। सारे नेता 4 प्रतिशत करदाताओं की छीना झपटी को लेकर सारे दिन बयानबाजी कर रहे हैं। जिनका आम आदमी के जीवन से कोई सम्बन्ध नहीं है। भ्रष्टाचार 70 सालों से चल ही रहा है पर आम आदमी कभी भूखा नहीं सोया। आज भ्रष्टाचार मिटाने की कवायद में उसे भूखा सोना पड़ रहा है। यह कैसी प्रशासनिक दक्षता है? किसी ने इस बात का मनन नहीं किया कि गरीबी और अमीरी के बीच संघर्ष ऐसी ही परिस्थितियों से उत्पन्न होते हैं। आने वाली पीढ़ी को जब इतिहास के इस तरह के पन्ने पढऩे को मिलेंगे तब क्या वह हमारे लोकतंत्र पर विश्वास कर पाएगी?

मुद्दे की बात यह है कि सरकार को कुछ फैसले राजनीति से ऊपर उठकर ‘सर्वजन हिताय’ में भी करने चाहिएं। यदि सारे ही फैसले, सरकार की सुरक्षा के लिए हों तब तो लोकतंत्र की बानगी भी शायद ना बचे। आज लोकतंत्र के तीनों पाये सत्ता पक्ष की कठपुतली बनते जा रहे हैं। और सत्ता पक्ष की प्राथमिकता विरोधियों से हिसाब चुकाने की हो गई है। तब कोई भी कानून जनता के लिए तो ‘आश्वासनों का आसव’ ही होगा किन्तु यह कटु सत्य है कि देश के विकास को यदि गति देनी है, देश में अर्जित धन को यदि पूरी तरह से विकास में लगाना है, देश में कमाऊ पूतों के सम्मान का वातावरण बनाना है, नई पीढ़ी को आगे आने के लिए प्रोत्साहित करना है तब हमें संकल्प करना होगा कि, हमारे कानून केवल देशहित में बनाए जाएंगे। उस दृष्टि से तो आज का यह आयकर-कानून तुरंत प्रभाव से निरस्त कर देना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि, ‘कोढ में खाज’ हो जाए। पांच करोड़ लोगों को अहंकारवश फांसी देने पर भी इस देश का बड़ा नुकसान नहीं होगा। किन्तु सवा सौ करोड़ लोगों का सम्मानपूर्वक जीना आवश्यक है। आज तो सब दु:खी हैं।

नवम्बर 10, 2016

सर्जिकल स्ट्राइक

जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सर्जिकल स्ट्राइक-वन के लिए कदम उठाया था और उसका एक निश्चित अंजाम देशवासियों के सामने रखा था तब इस माटी का कण-कण उनको सलाम कर रहा था। आजादी के 70 साल बीत जाने के बाद भी किसी ने स्वयं को भारतीय प्रधानमंत्री की हैसियत से जनता के सामने प्रस्तुत करने का प्रयास नहीं किया। लोगों को सर्जिकल स्ट्राइक-वन क्यों मंत्रमुग्ध कर गया? क्योंकि उस कार्रवाई के पीछे देश की अंतरात्मा की ठोस आवाज थी। हमारे लोकतांत्रिक इतिहास को पढ़ें तो हमारे अधिकांश प्रधानमंत्री स्वयं को अपने राजनीतिक दल का नेता बनाकर सिमट गए। एक या दो को छोड़कर किसी का भी नाम जनता की जुुबान पर नहीं है।

प्रधानमंत्री मोदी, पिछले ढाई वर्षों में अपनी अनगिनत विदेश यात्राओं के लिए चर्चा में रहे हैं। मीडिया में छाए रहे हैं। क्योंकि वे विदेशों में भारत के प्रधानमंत्री के रूप में बोलते हैं। इसी अवधि के दौरान मोदी की छवि में जो गिरावट आई उसका भी कारण यही है। भारत में वे भाजपा के प्रधानमंत्री के रूप में जाने जाते हैं जबकि संघीय व्यवस्था में सदन का नेता, प्रत्येक सांसद का नेता होता है। वहां उसकी कोई दलीय पहचान नहीं रह जाती।

मोदी जी ने कांग्रेस के प्रति, ‘आप’ के प्रति या अन्य विपक्षी दलों के बारे में जिस प्रकार के वक्तव्य दिए हैं, उसमें नहीं लगता कि वे अन्य दलों के सांसदों का भाजपा सांसदों के बराबर सम्मान करते हैं। सर्जिकल स्ट्राइक-दो (500 एवं 1000 के वर्तमान नोटों पर पाबंदी) के परिणाम जो भी आएं, पूरा देश सर्जिकल स्ट्राइक-वन की तरह ही प्रधानमंत्री मोदी के साहस को सलाम करता है। इस निर्णय में मोदी जी सभी राजनीतिक दलों के स्तर से ऊपर उठकर देशहित पर मत्था टेकते दिखाई दे रहे हैं। यह स्ट्राइक लोकतंत्र के तीनों स्तम्भों पर असर डालेगा। इस निर्णय में वे कहीं भी भाजपा के प्रधानमंत्री नहीं है और यही इस देश के भविष्य की सुनहरी रेखा है।

हर देशवासी जानता है कि रावण के दस सिर होते हैं, नौ नहीं होते। अभी आठ बाकी हैं। और इसमें भी जो आखिरी होगा, वह देशवासियों के लिए समान नागरिक संहिता की अनिवार्यता होगा। सबसे पहले तो उन शक्तियों को विखण्डित करना होगा जिनसे देश की संप्रभुता विखंडित होती जान पड़ती है। उदाहरण के लिए आतंकवाद, उदाहरण के लिए धारा 370, उदाहरण के लिए आरक्षण, उदाहरण के लिए संविधान को धर्मनिरपेक्षता के स्थान सम्प्रदाय निरपेक्ष बनाना, उदाहरण के लिए एक राष्ट्रीय भाषा की नीति की प्रतिष्ठा होना, उदाहरण के लिए आयकर कानून का समाप्त होना वगैरहा-वगैरहा।

सर्जिकल स्ट्राइक का एक बड़ा क्षेत्र हमारी शिक्षा से मैकाले का सिर उड़ाना है जो केवल पेट भरने के लिए नौकर तैयार करती है। हमें व्यक्ति के निर्माण की रूपरेखा तैयार करनी है जिसके बिना देश का सांस्कृतिक निर्माण संभव ही नहीं है। शिक्षा में ही एक सर्जिकल स्ट्राइक हमारे पौराणिक और शास्त्रीय ग्रंथों का मजाक उड़ाने वालों पर भी होनी चाहिए। आज के संस्कृत विश्वविद्यालयों में भी इन ग्रंथों के जीवन का स्वरूप एवं प्रकृति विज्ञान का जीवन स्वरूप किसी को नहीं मालूम। न ही ऐसी बातें किसी पाठ्यक्रम में शामिल है। तब इस देश में पुराणों की संहिताओं के ज्ञान की चर्चा करना अर्थहीन लगता है।

पिछले 70 सालों में भारत के महामहिम राष्ट्रपति ने कितने संस्कृत विद्वानों का सम्मान किया है? क्या उनमें से किसी एक ने भी वेदों में छिपे विज्ञान को खोजने का साहस दिखाया? पाश्चात्य विद्वानों द्वारा उड़ाए गए मखौलों का प्रत्युत्तर ये विद्वान दे पाए? तब एक ही विषय के नियमित प्रोफेसरों के इस सम्मान का अर्थ क्या माना जाए? आप केवल उन विद्वानों के सम्मान की घोषणा करें जो हमारे शास्त्रीय ग्रंथों को प्रकृति से, जीवन से जोड़ सकें। और पाश्चात्य विद्वानों के समकक्ष खड़े हो सकें।

यह एक मात्र ऐसी सर्जिकल स्ट्राइक होगी जो भारत को नए सिरे से ज्ञान के शिखर पर लाएगी, सोने की चिडिय़ा भी बनाएगी और हर नागरिक को देश के शत्रुओं से लडऩे की ताकत भी देगी ताकि जरूरत पडऩे पर हर नागरिक अपने-अपने क्षेत्र की सर्जिकल स्ट्राइक में भाग ले सके। पिछले दो स्ट्राइक ने दिवाली के अंधेरे में, लक्ष्मी और सरस्वती के दो दीये जला दिए। उम्मीद है वे दीपमालिका भी प्रज्जवलित करेंगे।

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