Gulabkothari's Blog

अप्रैल 4, 2018

जनता जनार्दन!

क्या सपने देखे थे इस देश के नागरिकों ने, आजादी के सिपाहियों ने, संविधान निर्माताओं ने, लोकतंत्र के प्रथम शासकों ने जब देश के भविष्य की कमान अंग्रेजों से छीनकर भारतीयों ने संभाली थी। नागरिकों का मनोबल भी शिखर पर था कि हम ही चुनेंगे हमारी सरकार और अब हम ही होंगे अपने देश के भाग्य विधाता। आज सत्तर साल बाद लगता है कि सिपाही सो गए, सपने हवा हो गए, नागरिक भी देश के प्रति उदासीन होते जा रहे हैं। नई पीढ़ी तो फिर से अंग्रेज बनने के सपने देखने लगी है। देश का प्रशासन-संविधान आज भी भारतीय नहीं बन पाया। देश की जिस अखण्डता और एकता की तब कसमें खाई गईं थीं, वो आज तार-तार हो चुकी हैं। हर सरकार अंग्रेजों की तरह ‘फूट डालो और राज करो’ के अभियान चलाती रही है। जाति और सम्प्रदाय इस देश के नासूर बन चुके हैं। जात-पांत की राजनीति ने देश का आन्तरिक विभाजन कर डाला। इस पर लोग फूले नहीं समा रहे। युवा बेरोजगारी से त्रस्त्र है, देश विकास को तरस रहा है। सामन्ती युग याद आने लगा है जब अपने ही अपनों को ठगने लगे हैं। राज दरबार फिर से चापलूसों से चहकने लगे, हड्डियां चबाने वालों का बोलवाला, चारों ओर शकुनि मामा के परिजनों की याद दिलाने लगे। पूरा देश आज लक्ष्मी के अंधकार में डूब गया है।

मेरे देशवासी जिस देश में भी जाकर बसे, उसे ही चमका दिया, ऊपर उठा दिया। आज फिर अवसर आ रहा है जब हम फिर से नए सपने देख सकते हैं, उनको साकार भी कर सकते हैं। हमारा सर्वे इशारा भी कर रहा है कि लोग बदलाव चाह रहे हैं। आइए! हम मिलकर राजस्थान पत्रिका/पत्रिका के मंच पर चिन्तन करते हैं, मनन करते हैं, निदिध्यासन करते हैं। यही उपासना देश के अभ्युदय का मार्ग प्रशस्त करेगी। स्वतंत्र चेतना की जागृति के इस यज्ञ में प्रत्येक वयस्क नागरिक को आहुति देनी है। स्वयं को देश के विकास में लगाने का संकल्प करना है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ‘स्वच्छ भारत अभियान’ के अन्तर्गत भ्रष्ट एवं स्वार्थी जनप्रतिनिधियों की सफाई का कार्य हाथ में लेना है। विधानसभाओं के चुनाव आ रहे हैं-राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और कर्नाटक में तो सिर पर ही हैं।

हम तुरन्त चर्चा शुरू कर दें कि हमको किस तरह के विधायक नहीं चाहिए और क्यों नहीं चाहिए? किस तरह के विधायक आने चाहिए, जिनको नई पीढ़ी, नए युग और भारतीय सांस्कृतिक वैभव की भी समझ हो? जो बेशर्मी से स्वार्थपूर्ति और अनाचार से चिपका न रहे। देश के प्रति मन में संवेदना हो। ईश्वर से डरता हो। वंशवाद, जातिवाद जैसे शस्त्रों से देश के टुकड़े करने वाला न हो। जनता के बीच में रहने वाला हो। आयाम तो अन्तहीन हैं। पत्रिका सर्वे दर्शाता है कि सुधार के लिए गैर राजनीतिक लोगों को भी आगे आना चाहिए। तीनों ही हिन्दी-भाषी राज्यों में पाठकों की एक जैसी राय है। आज राजनीतिक दलों के लिए न सिद्धान्त बड़ी चीज है और न विचारधारा। भ्रम और दिखावे की राजनीति ने देश के लोकतंत्र पर अनेक प्रश्नचिन्ह लगा दिए। आज गाली-गलौज पर आकर सारे दिग्गज तक ठहर चुके हैं।

आश्चर्य नहीं कि राजस्थान के ५६.०१ प्रतिशत, मध्यप्रदेश के ५२.०२ प्रतिशत, छत्तीसगढ़ के ४९.०५ प्रतिशत पाठक वर्तमान विधायकों को पुन: लौटाना नहीं चाहते। इससे भी एक कदम आगे ६२.५९, ५४.९७ तथा ५८.७८ प्रतिशत लोग सरकार को भी बदलने के पक्ष में हैं। कांग्रेस को भी जनता लायक नहीं मान रही। ५७.४७ प्रतिशत पाठकों का मानना है कि कांग्रेस को विपक्ष के रूप में जो भूमिका निभानी थी, उसका निर्वहन भी ढंग से नहीं कर पाई। जब मतदाता दोनों दलों से निराश है, तब कहां जाएगा? क्या दिल्ली की तरह बाहरी हवा का झोंका रंग लाएगा? मूल प्रश्न यह है कि सरकारें तो हम बदलते ही रहे हैं। क्या कर लिया? अब हमें क्या करना चाहिए, अपने नजरिए और कर्म की दिशा में क्या परिवर्तन करना चाहिए, ताकि नए प्रतिनिधि नए युग के अनुरूप चुने जाएं।

आंख मूंदकर जाति-धर्म-क्षेत्र जैसे नामों पर तो किसी भी दबाव में चयन नहीं करें। युवा आगे आएं। समाज में सामूहिक चिन्तन हो। व्यक्ति को प्राथमिकता दी जाए और उस व्यक्ति का चयन भी समाज ही करे। चेंजमेकर के तौर पर, बदलाव के नायक के रूप में राजनीति में अच्छे लोग सक्रिय हों। साफ-सुथरी छवि वाले, हालात बदलने का संकल्प धारण करने वाले आगे आएं। दूसरों को भी प्रेरित करें। बदलाव के नायकों का यह कदम स्वस्थ राजनीति के मार्ग का अभ्युदय करेगा। आरोप-प्रत्यारोप के स्थान पर रचनात्मक विकास की बहस आगे बढ़ेगी। पुराने विधायकों को भी अन्य दलों को गालियां देने के बजाय विकास और उपलब्धियों की बात करनी पड़ेगी। चुनावी हथकण्डे ज्यादा काम नहीं आ सकेंगे। नेताओं को भी मर्यादा में रहकर अपनी बात कहनी पड़ेगी। राजनीति में सफाई का दौर शुरू हो जाएगा। जनता अपनी शक्ति एवं विवेक का फिर से जागरूक होकर प्रयोग करेगी। ईश्वर साक्षी रहे!

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मार्च 21, 2018

एक और काला

राजस्थान सरकार के काले कानून की राख अभी ठण्डी भी नहीं हुई कि मध्यप्रदेश में एक और काला कारनामा हो गया। अभी १५ मार्च को विधानसभा के प्रक्रिया तथा कार्य संचालन सम्बन्धी नियमावली में संशोधन किया गया। संशोधन करना साधारण बात है, किन्तु ७० साल के लोकतांत्रिक इतिहास में पहली बार कोई संशोधन बिना सदन में बहस के लागू कर दिया गया। अत: यह संशोधन प्रश्नों के घेरे में आ गए।

कुछ संशोधन तो ऐसे कर दिए कि संविधान की मूल भावना का गला ही घोंट दिया गया है। एक ओर विधायकों के अभिव्यक्ति के अधिकारों को कुचल दिया गया, वहीं दूसरी ओर विधानसभा के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया। जिस कार्य के लिए विधायक चुने जाते हैं, उसी मंशा को ध्वस्त कर दिया। आप देखिए संशोधन क्या किए गए।

एक नियमावली २३१ के तहत। क्रम सं.(२२) उसमें किसी समिति की ऐसी कार्यवाही के बारे में नहीं पूछा जाएगा जो समिति के प्रतिवेदन द्वारा सभा के सामने न रखी गई हो या समिति के समक्ष विचाराधीन हो। (इसका अर्थ यह हुआ कि कितना भी महत्वपूर्ण मुद्दा यदि किसी समिति के सामने विचाराधीन है तो कोई विधायक उस मुद्दे पर प्रश्न ही नहीं पूछ सकता।) क्रमांक (२५) उसमें साम्प्रदायिक दंगे, संवेदन घटनाओं अथवा गोपनीय स्वरूप की ऐसी गतिविधियों की जानकारी नहीं मांगी जाएगी जिनको प्रकट न करने का संवैधानिक, संविहित या पारम्परिक दायित्व हो। (संवेदन घटना और पारम्परिक दायित्व जैसे शब्दों की आड़ में किसी भी प्रश्न को सदन में आने से जब चाहे रोकने की आशंका) विधान सभा में प्रश्न करने का दायित्व तो हर एक विधायक का है। इसे बाधित नहीं किया जा सकता। अध्यक्ष के पास अधिकार होते हैं कि वह प्रश्नकर्ता को रोक सकता है। प्रश्न को स्थगित करवा सकता है। प्रश्न करने के अलावा एक विधायक वहां क्या कर सकता है। विशेषकर निर्दलीय अथवा विपक्ष का! उसका तो मूल कार्य ही सरकार के काले पक्ष को उजागर करना है। उस पर अंकुश लगाना तो सीधा-सीधा लोकतंत्र पर ही अंकुश है। फिर क्यों विधायकों का चुनाव हो और क्यों विधानसभा का गठन ही किया जाए? इन संशोधनों के बाद विधायकों की आवाज जहां चाहे रोकने की आशंका हो जाएगी। इनका दुरुपयोग कर जब चाहे लोकतंत्र का गला घोंटा जा सकता है। इस प्रकार के संशोधन ने तो संविधान निर्माताओं की समझ एवं निष्ठा पर ही सवाल उठा दिए।

क्या लोकतंत्र में स्पष्ट बहुमत का यह परिणाम होता है? क्या जनता को आगे के लिए इसे एक बड़े घातक अनुभव की तरह नीलकण्ठ बनकर निगल जाना चाहिए? पहले महाराष्ट्र ने तुरप का एक पत्ता खेला, फिर राजस्थान कुरुक्षेत्र में उतरा। अब मध्यप्रदेश में काला झण्डा लहराने लगा है। आश्चर्य तो यह है कि जिन लोगों ने आपातकाल का दंश झेला है, उन्हीं के हाथों आपातकाल के समकक्ष कदम उठाए जा रहे हैं। विधानसभा में जिनको विशेषाधिकार प्राप्त हैं, उनके अधिकार का हनन करना कितना सहज लग रहा है, मानो जीवनभर सरकार कुर्सी से नीचे ही नहीं आएगी। सत्ता का यह कैसा अहंकार है! अभी कुछ दिन पूर्व ही मध्यप्रदेश की एक मंत्री यशोधरा राजे ने एक चुनाव सभा में कहा था कि ‘यदि आप हमको वोट नहीं देंगे तो हम आपके कोई काम नहीं करेंगे।’ आज तक उनका बाल भी बांका नहीं हुआ।

इस संशोधन के लिए किसी प्रकार के कारण चर्चा में नहीं आए। क्यों सरकार इस तरह के संविधान विरोधी संशोधन ला रही है? किस प्रकार की समस्याएं पिछले कार्यकाल में सामने आईं जिनका निराकरण न विधायक के पास है, न आरटीआइ (जो कि आज भी लागू है) से हल हो सकती है। सरकार को खतरा आरटीआइ से कुछ नहीं है, केवल विधायकों द्वारा उठाए जाने वाले प्रश्नों से है। क्या इस संशोधन से विधायकों के साथ-साथ आम मतदाता का अपमान नहीं होगा? आज यह संशोधन आया, कल संविधान ही मान्य नहीं होगा, तब क्या करेंगे?

सरकार को संकल्प करके लोकतंत्र के हित में इस संशोधन को वापस ले लेना चाहिए। यदि सरकार का विवेक साथ न दे और केन्द्र भी महाराष्ट्र और राजस्थान की तरह यहां भी मौन रहे, तो विधायकों को मिलकर अपने इस अधिकार पर कुठाराघात के विरुद्ध संघर्ष करना चाहिए। भले ही ये संशोधन सर्वसम्मति से किए गए हों फिर भी इन्हें वापस लेने के लिए पार्टी और विचारधारा जैसे भेद त्याग कर उन्हें एकजुट होकर आवाज उठानी होगी।

मार्च 1, 2018

सब एक रंग…

भारत में चार सांस्कृतिक राष्ट्रीय उत्सव रहे हैं-होली, रक्षाबन्धन, दशहरा और दीपावली। समय के साथ कुछ नए पर्व जुड़ गए। इनमें एकमात्र होली ही ऐसा त्यौहार है जिसे सभी वर्ग समान रूप से, मिलजुलकर मनाते हैं। सर्वाधिक उल्लास का पर्व है। इसमें सबकी पहचान खो जाती है। कोई छोटा-बड़ा भी नहीं रह जाता। एक-दूसरे के प्रति जो शिकवे-शिकायत होती है, वह भी धुल जाती है या यूं कह लें कि रंगों में घुल जाती है। एक नए संकल्प के साथ नए जीवन की डगर पर पांव रखते हैं। हर कोई दूसरे को अपने रंग में रंगना चाहता है। तब अपने पास रंग कैसा होना चाहिए? जो शरीर पर लगे और भीतर तक को स्पन्दित कर दे, रंग दे।

रंगना, किसी के रंग में रंग जाना ही तो भक्ति की परिभाषा है। जिस रंग पर दूसरा रंग न चढ़े, वही तो भक्ति है। तब सोचिए, यह रंगने का त्यौहार कितना गूढ़ अर्थ रखता है। आपका रंग किसी पर कब चढ़ेगा? वह तो एक ही रंग है-प्रेम का। इसमें शरीर की भूमिका ही नहीं है। मैं शरीर नहीं हूं-शरीर मेरा है। ‘अहं ब्रह्मास्मि’ बनकर जब ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के लिए निकलूं, तब प्रेम बरसेगा। होली का त्यौहार इसी का अभ्यास है। स्थूल के माध्यम से सूक्ष्म को रंगा जाता है। यहां न कोई काला है, न ही कोई ताला है। जो तू वही मैं।

होली मनों के मैल धोने का त्यौहार है। पर्व तो पौरी को कहते हैं, जहां से नया निर्माण (कोपल) फूटता है। प्रत्येक पर्व पर हमें भी नए निर्माण के लिए स्वयं को संकल्पित करना है। हमारा लक्ष्य देश को अखण्ड एवं मूल्यवान बनाए रखना है। यह कार्य तपस्या जैसा होगा। सच्चाई का मार्ग कांटों भरा होता है। बीच-बीच में ईश्वर भी हमारी परीक्षा लेता रहता है। किन्तु दृढ़ संकल्पवान सदा उत्तीर्ण ही होते हैं। हमें भी उत्तीर्ण ही होते रहना है। हम मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारे कहीं भी जाएं, हमारी एक ही प्रार्थना रहनी चाहिए। होली के रंगों में हमारी पहचान खो जाए। हम भारतीय रह जाएं। हमारे सम्प्रदाय और धर्म घर तक रहें, पूजाघरों तक रहें। बाहर हम सब एक रंग में रंगे नजर आएं। नई पीढ़ी मेरी इस बात पर अवश्य गौर करे, यह मेरा अनुरोध है। धर्म ने, सम्प्रदायों के रहनुमाओं ने हमें मशीन बना दिया। हमें ग्रन्थ पकड़ा दिए कि इनको पढ़ते जाओ और वैसे ही जीते जाओ। स्वतंत्र रूप से जीने की इजाजत नहीं है। और ग्रन्थ कितने अनगिनत। सारे अनुयायी एक फैक्ट्री के माल की तरह एक जैसे, एक-दूसरे की नकल करते हुए जीएंगे। धत् तेरे की!

ईश्वर ने किसी दो को एक जैसा नहीं बनाया। एक ओर सम्प्रदायों ने तथा दूसरी ओर शिक्षा ने रोड रोलर चलाकर सबको समतल कर दिया। जो कुछ ईश्वर ने देकर भेजा, सब पिचककर दब गया। अब सिर पर चुनाव आ रहे हैं। राजनेताओं के आक्रमण शुरू होने वाले हैं। वे हमको फिर से धर्म-जातियों में बांटेंगे। कोई क्षेत्रवाद की दुहाई देगा। कोई किसान अथवा व्यापारी कहकर सम्बोधित करेगा। सबको टुकड़ों में बांटने की चेष्टा करेगा। एक नहीं होने देगा। हमें जागते रहना है। नहीं तो हमारा भविष्य हमारे हाथ से छूटकर उनके हाथ में पूरे पांच वर्ष के लिए चला जाना है। ये तो मुडक़र भी नहीं देखेंगे।

हमारी होली का रंग नहीं उतार सके कोई। पूरी आत्मीयता के साथ, सारे भेदभाव छोडक़र ही लगाना है। सदा-सदा के लिए सम्प्रदाय, जात-पांत, क्षेत्र या भाषा के भेद समाप्त हो जाएं। किसी के भी आगे हमारी एकता समर्पित न होने पाए। रोज सवेरे अपना संकल्प दोहराएं, देश की अखण्डता का सपना ही देखें। नित्य प्रार्थना करें कि हम प्राणवान बने रहें। होली की तरह हर त्यौहार विकास का नया पर्व (पौर) बनता चला जाए। इस नए संघर्ष का शुभारम्भ हम इस होली से ही करें। एक कहावत है-‘काम गेलो काढ़ ले सी।’

फ़रवरी 20, 2018

सत्यमेव जयते…

इस देश में सत्य की जीत स्वयं में एक उत्सव है। राज्य विधानसभा में सोमवार को की गई यह घोषणा कि सरकार काले कानून बनने वाले विधेयक को प्रवर समिति से वापस लेती है, राज्य के लिए ऐतिहासिक अवसर है। पहली बधाई जनता जनार्दन को। उसने जब दिया दिल खोलकर दिया और जब छीना तो समय रहते अलवर और अजमेर में दिखा दिया।

दूसरी बधाई पत्रिका के कर्णधार चि. निहार और चि. सिद्धार्थ को, उनकी पूरी टीम को। मैंने तो अपनी ओर से एक मौन सत्याग्रह शुरू करके सरकार से संघर्ष का श्रीगणेश कर दिया। खतरे तो इन लोगों को ही उठाने पड़े। हां, आज श्रद्धेय बाबूसा (कुलिश जी) स्वर्ग से भी इनको आशीष दे रहे होंगे। जहां मीडिया पैसे में बिक रहा है, इन्होंने अपने हौसले को बनाए रखा और मुझे भी आश्वस्त करते रहे।

तीसरी बधाई राज्य सरकार को, स्वयं मुख्यमंत्री राजे को, जिन्होंने अपने अहंकार पर लगी चोट को भूल हंसते हुए अपना कदम वापस लिया। उम्मीद करनी चाहिए कि आने वाले समय में कुछ बदलेगा। इस कानून को बनने से रोककर सरकार ने संविधान और लोकतंत्र के प्रति सम्मान ही जताया है।

एक बड़ा तथ्य सामने जो आया, वह गंभीर है। अध्यादेश छह सितम्बर २०१७ को जारी हुआ था। २३ अक्टूबर २०१७ को दण्ड प्रक्रिया संहिता राजस्थान संशोधन विधेयक २०१७ के रूप में विधानसभा में रखा गया था और उसी दिन प्रवर समिति को भी सौंप दिया गया था। पिछले पांच महीनों में किसी को भी इस विधेयक की आंच महसूस ही नहीं हुई। इसी सत्र में प्रवर समिति का कार्यकाल ६ माह बढ़ा दिया गया। विपक्ष चाहता तो बड़ा आन्दोलन खड़ा कर सकता था। सत्ता पक्ष के इतने सारे विधायक और सब मौन (घनश्याम तिवाड़ी के अलावा)। क्या होगा उनके दिलों पर जो इस विधेयक को प्रासंगिक बता रहे थे। क्या इन सबके व्यवहार को देखकर लोकतंत्र की आत्मा इनको नहीं कचोटेगी? सबने जनता को धता बताकर अपने-अपने स्वार्थ साध लिए।

आज विधानसभा में १९ जुलाई सन् १९७७ का राज्यपाल का वक्तव्य सुनाया, वह इस काले अध्यादेश पर भी हूबहू लागू होता है। उसे दोहराना भी उपयुक्त ही होगा। ‘आपातकालीन स्थिति देश के इतिहास में एक काला पृष्ठ है। एक व्यक्ति को सत्ता में बनाए रखने के लिए सारे देश को भयंकर उत्पीडऩ सहना पड़ा। हजारों लोग अकारण ही जेलों में डाल दिए गए। गिरफ्तारी व यातनाओं से एवं समाचार प्रकाशन पर प्रतिबंध लगाकर देश में भय का वातावरण उत्पन्न किया गया।

व्यक्ति पूजा इस हद तक पहुंची कि देश को एक ही व्यक्ति का पर्याय समझा जाने लगा। न्यायपालिका के अधिकारों को सीमित कर दिया गया। यहां तक कि संसद में प्रतिनिधियों द्वारा व्यक्त किए गए विचारों के प्रकाशन पर भी रोक लगा दी गई। सत्ता के गैर संवैधानिक केन्द्रों द्वारा सत्ता का खुले आम दुरुपयोग किया गया। विरोधी दल के सम्मानित नेताओं के विरुद्ध झूठा एवं अनर्गल प्रचार निरन्तर चलता रहा।’

प्रदेश के इतिहास का काला पृष्ठ बनने से रोक लेना जरूर जनहित में होगा। किन्तु गहराई से समझने की बात यह है कि क्या सरकार के इस प्रयास को जनता भी कभी भूल पाएगी? इसे भुलाना ही सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती रहेगी।

फ़रवरी 6, 2018

अवसर तो है…?

विधानसभा में सोमवार को विवादास्पद विधेयक वापस लेने की तैयारी नहीं दिखाते हुए प्रवर कमेटी के कार्यकाल को अगले सत्र के लिए बढ़ा दिया। यानी सरकार ने काले कानून वाले विधेयक को निरस्त तो किया नहीं। बल्कि सदन को अपनी मंशा समझाते हुए विधेयक को प्रासंगिक भी बताया। इसमें आश्चर्य केवल इतना ही हुआ कि सदन में उपस्थित सत्ता पक्ष के एक घनश्याम तिवाड़ी को छोडक़र किसी विधायक की आवाज तक नहीं निकली मानो सभी राज्य में लोकतंत्र को नकारना चाह रहे थे। सब जानते हैं कि, यदि यह विधेयक पास हो गया और कानून बन गया तो कार्यपालिका, न्यायपालिका, मीडिया कुछ भी स्वतंत्र नहीं रहेंगे। राजस्थान से लोकतंत्र विदा हो जाएगा। और भाजपा के सभी विधायक मानो इसे धक्का देने को तैयार ही बैठे हैं। और यह सब कुछ होगा, लोकतंत्र के नाम पर चुनी हुई सरकार द्वारा। जनता के साथ इससे बड़ा धोखा और हो भी क्या सकता है?

हाल ही के उपचुनावों में जनता ने सरकार को आईना दिखा दिया। सम्पूर्ण चुनाव क्षेत्रों से ही भाजपा को देश निकाला दे दिया। देश के इतिहास में पहली बार सत्ता पक्ष को सभी क्षेत्रों में हार का ऐसा उदाहरण शायद ही मिले। उसके बाद भी सरकार अपनी हठधर्मिता पर अड़ी हुई है। वह विधेयक को प्रासंगिक भी मानती है और इसके विरोध को अनर्गल भी कहती है। मानो लोकतंत्र को मिटाकर फिर से राजाओं के राज को स्थापित करना चाहती है। क्या सभी विधायक भी यही चाहते हैं, यह भी जनता को जानने का अधिकार है। जैसे एक दिन के लिए भिश्ती को राजा बनाया तो उसने चमड़े के सिक्के चला दिए, यह कहावत है। आज तो प्रदेश इस कहावत को चरितार्थ होते स्पष्ट देख रहा है।

हाल ही एक स्थानीय टीवी चैनल के राज्य प्रभारी ने अपने साक्षात्कार में कहा है कि, यदि आज राज्य में चुनाव होते हैं तो सत्ता पक्ष को ८-१० सीटें ही मिलेंगी। लेकिन सरकार तो केवल सोशल मीडिया पर ही विश्वास करती है। उसी के माध्यम से छवि सुधार करने के लिए २० करोड़ रुपए का बजट प्रावधान भी किया है। यह सारा कुछ सरकार के सलाहकारों की समझ पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है। हाल के चुनाव परिणाम भी उन्हीं की सलाह का परिणाम हैं। प्रश्न यह भी है कि सत्ता में प्रतिष्ठा, व्यक्तिगत अहंकार की होनी चाहिए अथवा सरकार की। यहां सरकार की मंशा स्पष्ट रूप से विधेयक को वापस लेने की नहीं है। जनता का दिया गया बहुमत ही इस अहंकार का कारण है। जनता अगले विधानसभा चुनाव में जो चाहे कर ले, आज तो कुछ नहीं कर सकती।

चुनौती तो असल में प्रदेश के युवा के सामने है कि, उसे अपना भविष्य कैसा चाहिए? इसके लिए अपनी भूमिका आज ही तय करनी होगी। अपने भाग्य के निर्माण को अपने ही हाथ में लेना पड़ेगा वर्ना हो सकता है कि, आजादी के संघर्ष पर ही प्रश्न खड़ा हो जाए। प्रदेश फिर से लोकतंत्र का गुलाम होकर रह जाए।

हां, इसमें अभी एक आशा की किरण है। और वो है, सरकार की सद्बुद्धि। सरकार प्रदेश को अनहोनी से बचा सकती है। फिर से आजादी का नया वातावरण पैदा कर सकती है। और जनता से फिर एक सीधे संवाद का मार्ग प्रशस्त कर सकती है। यह सरकार के हाथ में है कि, वह चाहे तो विधानसभा की प्रवर समिति को दिया हुआ विधेयक सदन के माध्यम से वापस भी ले सकती है। सारा परिदृश्य सरकार के पक्ष में हो जाएगा। अब तक जो कीमत सरकार ने चुकाई वह भी कम नहीं है। आगे न चुकानी पड़े, उसी में भलाई है। अत: सरकार को अपनी हठधर्मिता छोडक़र इसी सत्र के चलते यह निर्णय कर लेना चाहिए।

फ़रवरी 2, 2018

प्यार से नफरत तक

एक चावल बता देता है कि देगची के चावल पक गए अथवा नहीं। कल राज्य के सत्रह विधानसभा क्षेत्रों (दो लोकसभा सीटों के १६ तथा मांडलगढ़ विधानसभा क्षेत्र) पर हुए उपचुनावों ने स्पष्ट संकेत दे दिया कि राज्य में भाजपा के लिए अब स्थान नहीं बचा। इस बार सभी सत्रह विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा हार गई। इन चुनावों ने यह धारणा भी खत्म कर दी कि, शहरी मतदाता की पहली पसंद भाजपा है। अजमेर उत्तर, अजमेर दक्षिण और अलवर शहर जैसे उसके परम्परागत किले भी ढह गए। ‘काला कानून’ लाने वाली सरकार को मतदाता ने उखाड़ फेंकने का जज्बा दिखा दिया। मतदाता की परिपक्वता बधाई की पात्र है। वैसे तो सरकार भी बधाई की पात्र है जिसके काले कानून विधेयक ने मतदाताओं को अपना पूर्व निर्णय बदलने का मार्ग प्रशस्त किया। कांग्रेस के लिए तो सही मायनों में ये सीटें झोली में आकर गिरी हैं। हालांकि मांडलगढ़ कांग्रेस प्रभारी ने दो प्रत्याशियों के सहारे भाजपा को जीत का अवसर दे दिया था। लेकिन जनता की समझ पैनी साबित हुई।

दो वर्ष पूर्व भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने मुझसे पूछा था कि राजस्थान सरकार के क्या हाल हैं? तब मैंने कहा था कि यदि आज ही चुनाव हो जाएं तो भाजपा को ३०-३५ से ज्यादा सीटें मिलना संभव ही नहीं है। उनको मेरी बात कहां गले उतरने वाली थी! मुझ पर नाराज भी नजर आए थे। आज तो उनको मेरी बात की सत्यता अक्षरश: समझ में आ गई होगी। हालांकि इस बीच शाह जब भी राजस्थान प्रवास पर आए, उन्होंने मुक्त कण्ठ से सरकार की प्रशंसा कर सिर पर चढ़ाने में कसर नहीं छोड़ी। उनको क्या लाभ मिला, वे ही जानें। भाजपा की तो लोकसभा में दो सीटें कम हो गईं।

पं. बंगाल के उपचुनाव भी भाजपा हार गई। अभी मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र एवं उत्तरप्रदेश में उपचुनाव होने हैं। लोकसभा में भाजपा का अपना बहुमत किनारे लगता जा रहा है। भाजपा की इस स्थिति से न तो राजस्थान की मुख्यमंत्री और न अमित शाह का कुछ बिगडऩे वाला है। दीर्घकालीन नुकसान भारतीय जनता पार्टी का ही होगा। ये तो अपने-अपने घर चले जाएंगे। इसके लिए पार्टी को ही स्थितियों पर चिंतन करना होगा। वर्ना दूसरे राज्यों में भी ऐसी नौबत आ सकती है। गुजरात में स्वयं प्रधानमंत्री ऐन वक्त पर कमान नहीं संभालते तो नोटबंदी और जीएसटी जैसे कदमों ने वहां भी हार की पटकथा लिख ही दी थी।

हाल ही में प्रधानमंत्री के हाथों राजस्थान सरकार ने रिफाइनरी का पुन: शिलान्यास करवाया है। नाम कुछ भी दिया होगा। जनता तो जानती है कि प्रधानमंत्री तक को सच्चाई से कितना दूर रखा जाता है। जो आंकड़े विकास दिखाते हैं, उनमें किसानों की मौत की छाया दिखाई नहीं देगी। राज्य में हत्या, दुष्कर्म कैसे रोजमर्रा की घटनाओं जैसे नजर आएंगे? आम आदमी आज यह सोच बैठा है कि सरकार स्वयं जाने की तैयारी में अपने झोले भर रही है। भाजपा का अहो भाग्य ही कहा जाएगा कि उसके प्रान्तीय अध्यक्ष अशोक परनामी भी दोनों हाथों पार्टी की जड़ें खोदने में ही लगे हैं।

कुछ मंत्रीगण तो जनता से पूरी तरह मुंह फेर चुके। स्वास्थ्य, स्थानीय निकाय, परिवहन, सडक़, जल, शिक्षा जैसे सार्वजनिक जीवन से जुड़े विभाग भी जनता का ही दोहन कर रहे हैं। इन पर नियंत्रण रखने वाले, संगठन के मुखिया के नेतृत्व में प्रदेश भर में अतिक्रमण और अराजकता का माहौल बना हुआ है। फिर भी दिल्ली प्रशंसा करते नहीं थकता। कुछ तो राज है!

राजस्थान में पहले भी पांच उपचुनाव हो चुके हैं। भाजपा को दो सीटें ही मिली थीं। यानीकि कुल २२ विधानसभा क्षेत्रों में से बीस हाथ से निकल गए। इस बार तो भाजपा मानो किनारे पर ही बैठी थी। मतदाता ने कुहनी मारी और नीचे गिर पड़ी। निष्कर्ष यही निकला कि सन् २०१८ का विधानसभा चुनाव भी इसी सरकार के नेतृत्व में लड़ा गया तो राजस्थान में भाजपा बचेगी क्या? हालांकि आज ही एक भाजपा प्रवक्ता टीवी पर बोल रहे थे कि दो-तीन चुनाव हारने से भाजपा पर कोई फर्क नहीं पड़ता। हम तो दो से उठकर भी बहुमत तक पहुंचना जानते हैं। बेचारे, प्रवक्ता! यह नहीं समझ पाए कि, कब प्यार नफरत में बदल जाता है।

जनवरी 19, 2018

नाकारा सरकार

राज्य में कानून व्यवस्था की स्थिति नारकीय स्तर तक पहुंच चुकी है। हत्याएं, बलात्कार, चिकित्सा में जीवन के स्थान पर मौत का उपहार, अतिक्रमणों को मौन स्वीकृति, भर्तियों में घोटाले, खान आवंटन में भ्रष्टाचार आदि के अलावा प्रदेश में हो क्या रहा है? आश्चर्य तो यह भी है कि गृहमंत्री गुलाब चंद कटारिया आंकड़ों के नशे में धुत्त हैं। उन्हें कुछ गलत होता दिखाई ही नहीं देता। उनके चिन्तन और कार्यशैली की गिरावट को शब्दों में नहीं कहें तो ज्यादा उचित होगा। हालांकि इस सरकार में तो कितने मंत्रियों के कामकाज इस्तीफा देने की सीमा को भी पार कर चुके हैं। चाहे स्वास्थ्य मंत्री कालीचरण सराफ हों, नगरीय विकास एवं आवास मंत्री श्रीचन्द कृपलानी हों या फिर परिवहन मंत्री युनुस खान। प्रश्न यह है कि इस्तीफा मांगे कौन? इसी को रामराज्य कहते हैं।

आज हमारा सिर शर्म से झुक गया है। हमारी संवैधानिक एजेंसियां अपने यहां की जन समस्याओं, विशेषकर कानून व्यवस्था, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार आदि से कारगर ढंग से निपट नहीं पाई। यह भी कह सकते हैं कि नाकारा साबित हो गईं। पुलिस, न्यायपालिका, लोकायुक्त, राज्य मानव अधिकार आयोग जैसे भारी-भरकम स्तम्भ जाने-अनजाने कारणों से चरमराते जान पड़ रहे हैं। इन रोजमर्रा की दुर्घटनाओं के निस्तारण के लिए जन सुनवाई करने अध्यक्ष एच एल दत्तू सहित पूरे राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का जयपुर आना ही विषय की गंभीरता को दर्शाता है।

कहीं तो आग है कि धुआं दिल्ली तक पहुंचा है। प्रश्न बड़ा है कि राज्य का कोई भी संस्थान अपने कार्य में सफल क्यों नहीं होता? क्यों सभी जगह लीपापोती और पत्राचार के आगे सब मौन। क्या पेट अब देश से बड़ा होने लग गया है? अथवा कोई भीतर का डर हमें खा रहा है! जो भी कारण हों, मार्ग हमें निकालना होगा। प्रदेशवासियों को भी इस संघर्ष में आगे आना ही पड़ेगा। बहुत सो लिए, बहुत स्वार्थ भी साध लिए। कुछ तो आजादी बनाए रखने के लिए भी नियमित तपना पड़ेगा। युवावर्ग क्यों मौन है?

आज राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने जन सुनवाई के दौरान आपात स्थिति की तर्ज पर पुलिस महानिदेशक को बुलवाया और कानून व्यवस्था की नारकीय स्थिति पर गंभीर टिप्पणियां कीं। यह भी कहा कि, राज्य की स्थिति ठीक नहीं है। तब क्या महानिदेशक का सिर गर्व से ऊंचा हुआ होगा? जिसके आदेशों की पालना में उनका सारा लवाजमा लगा रहता है, उनके बारे में थी यह टिप्पणी। इतना ही नहीं, आयोग ने चेतावनी भी दे डाली कि भविष्य में आयोग यहां नहीं आएगा, बल्कि दिल्ली बुलाएगा। किस मतदाता को शर्म नहीं आएगी अपनी चुनी हुई सरकार पर?

यह भी आश्चर्य है कि सरकार और सभी सरकारी एजेंसियां मौन धारण किए बैठी हैं। सब अपनी-अपनी कुर्सी की अकड़ भी बनाए हुए हैं। जन समस्याएं बहुत छोटी लगती हैं, अपने पेट के आगे। चाहे बच्चे मरें, किसान मरें, मरीज मरें, बेरोजगार मृत्यु की स्वीकृति मांगें। क्या यही हमारे सपनों का लोकतंत्र है? जनता को सोचना तो पड़ेगा कि क्या यही विरासत नई पीढ़ी को सौंपकर जाएंगे? क्या सरकार ही संकल्प कर लेगी कि अगली बार मानवाधिकार आयोग कुछ अच्छा ही देखेगा?

नवम्बर 1, 2017

जब तक काला : तब तक ताला

राजस्थान सरकार ने अपने काले कानून के साए से आपातकाल को भी पीछे छोड़ दिया। देशभर में थू-थू हो गई, लेकिन सरकार ने कानून वापस नहीं लिया। क्या दु:साहस है सत्ता के बहुमत का। कहने को तो प्रवर समिति को सौंप दिया, किन्तु कानून आज भी लागू है। चाहे तो कोई पत्रकार टेस्ट कर सकता है। किसी भ्रष्ट अधिकारी का नाम प्रकाशित कर दे। दो साल के लिए अन्दर हो जाएगा। तब क्या सरकार का निर्णय जनता की आंखों में धूल झोंकने वाला नहीं है?

विधानसभा के सत्र की शुरुआत २३ अक्टूबर को हुई। श्रद्धांजलि की रस्म के बाद हुई कार्य सलाहकार समिति (बी.ए.सी.) की बैठक में तय हुआ कि दोनों विधेयक १. राज. दण्ड विधियां संशोधन विधेयक, २०१७ (भादंस), २. सी.आर.पी.सी. की दण्ड प्रक्रिया संहिता, २०१७। २६ अक्टूबर को सदन के विचारार्थ लिए जाएंगे। अगले दिन २४ अक्टूबर को ही सत्र शुरू होने पर पहले प्रश्नकाल, फिर शून्यकाल तथा बाद में विधायी कार्य का क्रम होना था। इससे पहले बीएसी की रिपोर्ट सदन में स्वीकार की जानी थी लेकिन अचानक प्रश्नकाल में ही गृहमंत्री गुलाब चन्द कटारिया ने वक्तव्य देना शुरू कर दिया। नियम यह है कि पहले विधेयक का परिचय दिया जाए, फिर उसे विचारार्थ रखा जाए, उस पर बहस हो। उसके बाद ही कमेटी को सौंपा जाए। किन्तु प्रश्नकाल में ही हंगामे के बीच ध्वनिमत से प्रस्ताव पास करके विधेयक प्रवर समिति को सौंप दिया गया।

यहां नियमानुसार कोई भी विधायक इस विधेयक को निरस्त करने के लिए परिनियत संकल्प लगा सकता है, जो कि भाजपा विधायक घनश्याम तिवारी लगा चुके थे और आसन द्वारा स्वीकृत भी हो चुका था। उसे भी दरकिनार कर दिया गया। विधेयक २६ के बजाए २४ अक्टूबर को ही प्रवर समिति को दे दिया गया। सारी परम्पराएं ध्वस्त कर दी गईं।

कानून का मजाक देखिए! विधानसभा में दोनों अध्यादेश एक साथ रखे गए। नियम यह भी है कि एक ही केन्द्रीय कानून में राज्य संशोधन करता है तो दो अध्यादेश एक साथ नहीं आ सकते। एक के पास होने पर ही दूसरा आ सकता है, ऐसी पूर्व के विधानसभा अध्यक्षों की व्यवस्थाएं हैं। एक विधेयक जब कानून बन जाए तब दूसरे की बात आगे बढ़ती है। यहां दोनों विधेयकों को एक साथ पटल पर रख दिया गया। यहां भी माननीय कटारिया जी अति उत्साह में पहले दूसरे विधेयक (दण्ड प्रक्रिया संहिता, २०१७) की घोषणा कर गए। वो प्रवर समिति को चला गया। अब दूसरा कैसे जाए? तब सदन को दो घंटे स्थगित करना पड़ा। फिर उसके साथ पहले घोषित बिल भी २६ अक्टूबर के बजाए २५ अक्टूबर को ही समिति के हवाले कर दिया गया। बिना किसी चर्चा के-बिना बहस के।

देखो तो! कानून भी काला, पास भी नियमों व परम्पराओं की अवहेलना करते हुए किया गया। और जनता को जताया ऐसे मानो कानून सदा के लिए ठण्डे बस्ते में आ गया। ऐसा हुआ नहीं। नींद की गोलियां बस दे रखी हैं। जागते ही दुलत्ती झाडऩे लगेगा। और लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की हत्या हो जाएगी। कानून क्या रास्ता लेगा, यह समय के गर्भ में है। आज तो वहां भी कई प्रश्नचिह्न लगते हैं। जब एक राज्य सरकार सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को जेब में रखकर अपने भ्रष्ट सपूतों की रक्षा के लिए कानून बनाती है, तब चर्चा कानून की पहले होनी चाहिए अथवा अवमानना की? जब तक तारीखें पड़ती रहेंगी, अध्यादेश तो कण्ठ पकड़ेगा ही।

क्या उपाय है इस बला से पिण्ड छुड़ाने का। राजस्थान पत्रिका राजस्थान का समाचार-पत्र है। सरकार ने तो हमारे चेहरे पर कालिख पोतने में कसर नहीं छोड़ी। क्या जनता मन मारकर इस काले कानून को पी जाए? क्या हिटलरशाही को लोकतंत्र पर हावी हो जाने दे? अभी चुनाव दूर हैं। पूरा एक साल है। लम्बी अवधि है। बहुत कुछ नुकसान हो सकता है। राजस्थान पत्रिका ऐसा बीज है जिसके फल जनता को ही समर्पित हैं। अत: हमारे सम्पादकीय मण्डल की सलाह को स्वीकार करते हुए निदेशक मण्डल ने यह निर्णय लिया है कि जब तक मुख्यमंत्री श्रीमती वसुन्धरा राजे इस काले कानून को वापस नहीं ले लेतीं, तब तक राजस्थान पत्रिका उनके एवं उनसे सम्बन्धित समाचारों का प्रकाशन नहीं करेगा। यह लोकतंत्र की, अभिव्यक्ति की, जनता के मत की आन-बान-शान का प्रश्न है। आशा करता हूं कि जनता का आशीर्वाद सदैव की भांति बना रहेगा। जय भारत! जय लोकतंत्र!!

अक्टूबर 27, 2017

ठीकरा कोर्ट के सिर…

नीति में धर्म नहीं होता। साम, दाम, दण्ड, भेद ही नीति के हथियार होते हैं। नीति में चतुराई से अधिक चालाकी काम आती है। एक शिक्षा मंत्री के पास किसी स्कूल में बच्चों को भर्ती कराने के लिए बहुत लोग आने लगे। स्कूल में जगह थी ही नहीं। फिर भी प्रत्येक बच्चे के लिए सिफारिशी पत्र पर हस्ताक्षर करते गए। प्रिन्सिपल को इशारा भी कर दिया। उसने पत्रों को इकट्ठा करना शुरू कर दिया। भर्ती किसी को नहीं किया। आखिर तो अभिभावकों के सब्र का बांध टूटना था। एक दिन कुछ अभिभावक प्रिन्सिपल से लड़ पड़े। प्रिन्सिपल ने सबको बिठाया और दराज में से एक कागजों का पुलिन्दा निकालकर सबसे सामने रख दिया। बोले- ‘आप लोग देख लीजिए। इन सभी पत्रों में मंत्री जी ने सिफारिश करने को हस्ताक्षर कर रखे हैं। इनके लिए मुझे तो नया क्लास रूम बनवाना पड़ेगा। कैसे मैं सब बच्चों को भर्ती कर सकता हूं?’ तो यह है चालाकी-लोगों की आंखों में धूल झोंकना। सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे।

राजस्थान सरकार इसी पटरी पर चल रही है। गुर्जर आरक्षण का मुद्दा हो, पट्टा वितरण और नियमित करने (अवैध बसावट को) की बात हो, मास्टर प्लान से छेड़छाड़ का दु:साहस हो चाहे भ्रष्ट अफसरों को संरक्षण देने वाला संशोधन। यहां तक कि बुधवार को राज्य विधानसभा से पास ‘विधायकों के लिए लाभ का पद बचाने’ का लालीपॉप या फिर गुरुवार को पास एसबीसी विधेयक। सबके सब मुद्दे जो चुनाव के नाम पर जोर आजमाइश कर रहे हैं और जिनका स्वीकार किया जाना सरकार के लिए संवैधानिक रूप से संभव नहीं है, उन सभी मुद्दों पर सरकार प्रभावितों के पक्ष में फैसले करती रहती है। इस प्रकार सभी वर्गों का विश्वास जीतने का प्रयास कर रही है। क्या सरकार फैसला करते समय नहीं जानती कि ये फैसले न्यायालय में टिक नहीं पाएंगे? जानती है। फिर भी फैसला करती जाती है।

गुर्जर आरक्षण के मुद्दे पर सरकार को कितनी बार कोर्ट में हारना पड़ा। पिछले दस वर्षों में कम से कम पांच बार ऐसा हुआ है। राज्य सरकार ने उन्हें आरक्षण के विधेयक बनाए, अधिसूचना जारी की और उच्च न्यायालय ने उन्हें रद्द कर दिया। किन्तु गुरुवार को फिर उसने आरक्षण का ओबीसी कोटा २१ प्रतिशत से बढ़ाकर २६ प्रतिशत करने का विधेयक विधानसभा से पारित करवा लिया। इससे राज्य में आरक्षण ५० प्रतिशत से अधिक हो जाएगा। जो कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का स्पष्ट उल्लंघन होगा। जैसा अब तक होता रहा है, यह न्यायालय से फिर लौट जाएगा। सरकार गुर्जरों की सीधी नाराजगी से बच जाएगी। ठीकरा कोर्ट के माथे फूटेगा। कोर्ट भी सारे विधायकों के विरुद्ध अवमानना तो जारी नहीं करेगा।

मास्टर प्लान के मामले में जनवरी २०१७ का राजस्थान उच्च न्यायालय का फैसला स्पष्ट है। सरकार ने चुनाव की दृष्टि से जो लोक लुभावन वादे लोगों से किए थे, उनको पूरे नहीं कर पा रही है। फिर भी बीच-बीच में आदेश निकालकर कुछ अवैध कब्जों को नियमित करने की बात भी करती जाती है, कुछ को हटाती भी जाती है। हर बार तारीख पर पुराने आदेश की अर्थी उठ जाती है। अगली तारीख से पहले फिर नया गैरकानूनी आदेश जारी कर देती है। जानती भी है कि यह आदेश भी रद्द ही होगा। उसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गई। वहां भी राहत नहीं मिली। किन्तु लोगों को सीधे नाराज करने से अच्छा है कोर्ट का आदेश सामने रख दे।

भ्रष्ट अधिकारियों के संरक्षण का अध्यादेश भी इसी नीयत से जारी किया। अफसर प्रसन्न हो गए। सरकार जानती थी परिणाम क्या होंगे? देशभर में सरकार कलंकित हो गई। कोर्ट में भी मुद्दा टिकने वाला नहीं था। सरकार ने विधानसभा की प्रवर समिति को मामला सौंपकर कोर्ट में इज्जत बिगडऩे से रोक ली। अब अफसर भी सरकार को दोष कैसे दे सकेंगे? उनका काम भी नहीं हुआ। सांप भी मर गया, लाठी भी नहीं टूटी।

सरकार का दु:साहस कही रुकने को तैयार ही नहीं। विधानसभा में ‘लाभ का पद’ बचाकर विधायकों को एक बार तो खुश कर दिया। क्या अफसरों के संरक्षण बिल के साथ इस मुद्दे पर भी विधि विभाग ने चेतावनी नहीं दी थी? क्या आगे यह मुद्दा भी कोर्ट में टिक पाएगा? क्या सरकार यह नहीं जानती कि इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय यहां तक कह चुका है कि, कोई भी विधानसभा इस पर कानून नहीं बना सकती। कोई भी सरकार १५ प्रतिशत से ज्यादा विधायकों को लाभ का पद नहीं दे सकती।

अब भी सरकार जानती है कि कोर्ट में यह कहीं नहीं टिकने वाला परन्तु सामने वालों को राजी रखने के लिए ठीकरा कोर्ट के सिर फोडऩे के लिए कानून बना दिया। यही तो चालाकी है। अफसर भी नहीं समझ पाए। लोगों की आंखों में जमकर धूल झोंकी जा रही है। नित नए आदेश संविधान अथवा कानून के अथवा न्यायालय के फैसलों के विरुद्ध जारी हो जाते हैं, यह मानकर कि ये कोर्ट में खारिज हो जाएंगे। और कोर्ट के हर फैसले को सहर्ष मान भी लेते हैं। सरकार ने लोगों के काम न करने का अच्छा कानूनी रास्ता निकाल लिया है। इससे अधिक चालाक तो बिल्ली मौसी भी नहीं होती।

अक्टूबर 22, 2017

उखाड़ फेंकेगी जनता

राजस्थान विधानसभा का सत्र कल से शुरू होने वाला है। यूं तो लोकाचार निभाने जैसा संक्षिप्त ही होने की संभावना है। इस सत्र में वैसे तो विधायकों ने लगभग १२०० प्रश्न लगा रखे हैं, किन्तु लोकतंत्र की दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण होगा सरकार द्वारा इस्तगासा दायर करने को लेकर सी.आर.पी.सी. में किया गया संशोधन। इस संशोधन से आई.पी.सी. की धारा २२८ में २२८ बी जोडक़र प्रावधान किया गया है कि सीआरपीसी की धारा १५६(३) और धारा १९० (१)(सी) के विपरीत कार्य किया गया तो दो साल कारावास एवं जुर्माने की सजा दी जा सकती है। न्यायाधीश, मजिस्ट्रेट व लोक सेवक के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति मिलने से पहले उनका नाम एवं अन्य जानकारी का प्रकाशन, प्रसारण नहीं हो सकेगा।

वैसे न्यायपालिका पर उच्च न्यायालय की पूर्व स्वीकृति पहले भी आवश्यक है। लोकसेवकों को इनकी आड़ में जोडऩे के लिए इनका हवाला दे दिया। सही बात तो यह है कि सरकार ये मंशा स्पष्ट कर रही है कि उसे आज भी लोकतंत्र में कतई विश्वास नहीं है। उसे तो सामन्ती युग की पूर्ण स्वच्छन्दता ही चाहिए। दुर्योधन का राज्यकाल चाहिए। भ्रष्ट कार्य प्रणाली की वर्तमान छूट भी चाहिए और भावी सरकारों से सुरक्षा की गारण्टी भी चाहिए। क्या बात है! याद करिए जब मुख्यमंत्री ने विधानसभा में ही कहा था कि ‘हम हौसलों की उड़ान भरते हैं।’ क्या हौसला दिखाया है!

सात करोड़ प्रदेशवासियों ने जिस सम्मान से सिर पर बिठाया था, उसे ठेंगा दिखा दिया। यहां तक कि बार-बार विधि विभाग के असहमति प्रकट करने को सिरे से नकार ही नहीं दिया, बल्कि विधि विभाग को अपने हाथ में ले लिया। अब कौन रोक सकता था इस अनैतिक आक्रमण को? अनैतिक इसलिए कह रहा हूं कि यह संशोधन असंवैधानिक है। उच्चतम न्यायालय के सन २०१२ के फैसले के खिलाफ है, जो सुब्रह्मण्यम स्वामी के मामले में दिया गया था।

महाराष्ट्र सरकार ने भी ऐसा ही कानून दो वर्ष पहले लागू किया है। वहां अभियोजन स्वीकृति के लिए सरकार को केवल तीन माह का समय दिया गया है, तथा सजा का प्रावधान भी नहीं है। फैसले को लागू करने की जो जल्दबाजी सरकार ने दिखाई वह भी आश्चर्यजनक है। आनन-फानन में राष्ट्रपति से स्वीकृति लेना, राज्यपाल द्वारा अध्यादेश को स्वीकृत करना और इस विधानसभा सत्र की प्रतीक्षा न करना सब प्रश्नों के घेरे में आ जाते हैं! क्या उसी तर्ज पर विधानसभा भी इसे पारित कर देगी?

सरकार और सभी २०० विधायक अगले विधानसभा चुनाव की देहरी पर खड़े हैं। राजस्थान की जनता का पिछले चार साल का काल काले भ्रष्टाचार की खेती को पनपते देखते गुजरा है। आम आदमी एक ओर नोटबन्दी और जीएसटी से त्रस्त है। दूसरी ओर राज्य की खोटी नीयत की मार पड़ रही है। ऐसे में यह संशोधन यदि पास हो जाता है, तो निश्चित है कि जनता अगले चुनाव में सरकार को दोनों हाथों से उखाड़ फेंकेगी। भले ही सामने विपक्ष कमजोर हो। लोकतंत्र स्वयं मार्ग निकाल लेगा। अपराध, भ्रष्टाचार, अराजकता को प्रतिष्ठित करने के लिए भाजपा को नहीं चुना था। कांग्रेस बिलों से बाहर निकलने को तैयार ही नहीं है।

सरकार को रीढ़विहीन कहना गलत नहीं होगा क्योंकि सरकार भ्रष्टाचारियों को दण्डित करने के बजाए उनको बचाने के लिए कानून बना रही है। क्या करोड़ों मतदाताओं का दिया अधिकार धूल हो गया? अथवा सरकार की स्वार्थपूर्ति के लिए ही लोकसेवक भ्रष्टाचार में लिप्त हैं?

विधायकों को अपने साथ-साथ प्रदेश के भविष्य का भी ध्यान रखना चाहिए। धन तो जड़ पदार्थ है। उसके लिए करोड़ों चैतन्य आत्माओं की आस्था से खिलवाड़ कहीं ऐसा कुछ न कर दे जिसकी आपको आज कल्पना ही नहीं। फिर आपको भविष्य में भी राजनीति करनी है तो संतुलित विवेक का प्रदर्शन करना चाहिए। लोकतंत्र को ध्वस्त करने वाला संशोधन पास नहीं होना चाहिए। नहीं तो आप भी जनता की अदालत में पास नहीं होंगे।

सरकार केवल भ्रष्ट विधायकों और लोकसेवकों की सुरक्षा के लिए काम कर रही है। उन्हें अपराध की खुली छूट दे रही है। इसका कारण पूर्ण बहुमत ही है। इसी शक्ति के अहंकार के बूते पर संविधान के ९१वें संशोधन के तहत लाभ के पद के दायरे में आने वाले विधायकों को हटाने के विरुद्ध भी कानून आ रहा है। भले ही राष्ट्रपति ने दिल्ली सरकार के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था, भले ही चुनाव आयोग ने हरी झण्डी न दी हो, भले ही सर्वोच्च न्यायालय ने स्वीकृति न दी हो, भले ही देश के छह उच्च न्यायालायों ने संविधान के ९१ वे संशोधन से छेड़छाड़ के लिए मना कर दिया हो। इसमें एक उल्लेखनीय पहलू यह भी है कि सन २०१३ में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी ऐसा ही एक संशोधन (संसदीय सचिवों को लेकर) राज्यसभा में पेश किया था। भाजपा के घोर विरोध के कारण तब यह संशोधन पास नहीं हुआ और अभी तक लम्बित है।

राज्य सरकार इस कानून को भी आप सभी २०० विधायकों के हाथों ही पास करवाने वाली है। विचार तो आपको भी गंभीरता से करना ही चाहिए कि क्या कोई राज्य सरकार न्यायालय को आदेश दे सकती है कि उसे किस मामले में सुनवाई करनी चाहिए और कब नहीं करनी चाहिए? क्या पुलिस जांच के बाद भी सुनवाई करने के लिए न्यायालय को सरकार से स्वीकृति लेनी जरूरी होना चाहिए? क्या एसीबी या अन्य जांच एजेंसियों द्वारा पकड़े गए आरोपियों के नाम प्रकाशित नहीं करना ही संविधान की धारा १९(१) में प्रदत्त ‘स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति’ का मन्तव्य रह जाएगा? तब क्या जरूरत है मतदान की, चुनाव की, संविधान की! सरकार ने भी परोक्ष रूप से घोषणा कर ही दी है कि उसको भी जनहित और जनतंत्र में विश्वास नहीं है। एक बड़ा प्रश्न यह भी उठता है कि क्या महाराष्ट्र और राजस्थान में उठाए गए इन कदमों को भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की स्वीकृति भी प्राप्त है।

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