Gulabkothari's Blog

मार्च 8, 2019

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवसः क्या चन्द्रमा सूर्य से स्वतंत्र हो सकता है?

पश्चिम के प्रभाव में दाम्पत्य सम्बन्धों की हमारी आध्यात्मिक पृष्ठभूमि धुंधली पड़ती जा रही है। भौगोलिक दृष्टि से पूर्वी प्रदेश अग्नि प्रधान तथा पश्चिमी देश सोमप्रधान क्षेत्र है। वहां के नर-नारी शरीर पर प्रकृति के प्रभाव एक समान नहीं हो सकते। एक-दूसरे की नकल के परिणाम या दुष्परिणाम भी सामने आते जा रहे हैं।

हमारी इस सृष्टि में निर्माण-स्थिति एवं संहार की प्रक्रिया सतत चलती रहती है। इस प्रक्रिया में कम से कम दो तत्त्व होते हैं द्ग ब्रह्म और माया। विज्ञान कहता है कि सृष्टि में दो तत्त्व मूल में हैं। एक पदार्थ तथा दूसरा ऊर्जा यानी मैटर और एनर्जी। दोनों एक दूसरे में बदलते रहते हैं, किन्तु इनका ह्रास नहीं होता। वेद भी ब्रह्म और माया को ही इन दो तत्त्वों के रूप में देखता है। आगे जाकर इन्हीं को अग्नि-सोम के नाम से व्यवहार किया जाता है। आकाश में ये ही सूर्य-चन्द्रमा हैं, पर्जन्य और सोम हैं, पृथ्वी और वर्षा भी यही हैं, नर-नारी भी इन्हीं का रूपान्तरित अग्नि-सोम रूप हैं। अर्थात् नर-नारी भी तत्त्व रूप हैं, मात्र देह नहीं हैं। अग्नि-सोम के इस तात्विक स्वरूप को योषा-वृषा कहते हैं।

समय के साथ नर-नारी के देह में तो कोई परिवर्तन नहीं आया, किन्तु चिन्तन और जीवन शैली में बहुत परिवर्तन आया है। यह परिवर्तन किस सीमा तक हितकर है तथा कहां जाकर विष उगलने लगता है, किसी को इसका आकलन करने का समय नहीं मिलता। सबसे बड़ी बात तो यह है कि स्त्री अपने भोग्या रूप को भी नहीं समझा पा रही और भोक्ता रूप में सफल भी नहीं हो पा रही। स्त्री (देह में) पुरुष के साथ स्वतंत्रता एवं समानाधिकार के साथ-जीने को उत्सुक है। उसे शायद स्वतंत्रता के अर्थ भी नहीं मालूम। क्या चन्द्रमा सूर्य से स्वतंत्र हो सकता है या पृथ्वी बिना वर्षा के औषधि और वनस्पति पैदा कर सकती है? इनको तो संवत्सर के तंत्र को शिरोधार्य करना ही पड़ेगा।

शरीर के साथ मन-बुद्धि-आत्मा (अध्यात्म) को भी सम्मिलित करना होगा। हम ऐसा नहीं करेंगे तो शरीरपरक मिथुन भाव तक ही सीमित रह जाएंगे। मानव देह तो पैदा कर सकेंगे, अभिमन्यु की कल्पना नहीं कर सकते। काम पुरुषार्थ की उस उदात्त अवधारणा का स्पर्श नहीं कर पाएंगे जो सृष्टि का मूल है। ‘कामस्तदगेे्र समवर्तताधि…’ अभिप्राय यह है कि जीव शरीरों के सृजन की प्रक्रिया केवल शरीर पर निर्भर नहीं है। वह दो मनों का मिलन तो है ही, दो आत्मरूपों का मिलन भी है। इसमें पिछले जन्मों के कर्मफल भी अपना प्रभाव डालते हैं। दाम्पत्य की भारतीय अवधारणा आत्मिक ही है, शारीरिक नहीं है।

पश्चिम के प्रभाव में दाम्पत्य सम्बन्धों की हमारी यह आध्यात्मिक पृष्ठभूमि धुंधली पड़ती जा रही है। भौगोलिक दृष्टि से पूर्वी प्रदेश अग्नि प्रधान तथा पश्चिमी देश सोमप्रधान क्षेत्र है। वहां के नर-नारी शरीर पर प्रकृति के प्रभाव एक समान नहीं हो सकते। एक-दूसरे की नकल के परिणाम या दुष्परिणाम भी सामने आते जा रहे हैं। विवाह-विच्छेद की बढ़ती घटनाएं, ‘लिव-इन-रिलेशन’ द्ग जैसी अवधारणाएं तथा समलैंगिकता जैसी मानसिक विकृतियां प्रकृति विरुद्ध आचरण ही तो है। इनको कानूनी मान्यता देना मानवता को पाशविक स्वच्छन्दता की ओर धकेलना ही है। परम्परागत विवाह संस्था तो आज मानो ‘आउट-डेटेड्’ हो गई। जबकि इस संस्था का वैज्ञानिक आधार सार्वभौमिक और सार्वकालिक है। मनुष्य जब पशु योनि से विकास की ओर बढ़ता है, तब विवाह का स्वरूप कुछ प्राकृतिक नियमों की वैज्ञानिकता को स्वीकारता है। ऐसी किसी समाज व्यवस्था पर नहीं ठहरता जिसे हम जब चाहें बदल डालें।

शिव का विश्व रूप ही अभ्युदय है और विश्व का शिव में लीन हो जाना ही नि:श्रेयस है। पहला निर्माण काल है, दूसरा निर्वाण काल। यही शिव-शक्ति का दाम्पत्य भाव है। यही भारतीय विवाह संस्कार की मूल अवधारणा है। नारी यज्ञ में भागीदार बनकर पत्नी का स्वरूप ग्रहण करती है। यही सृष्टि निर्माण की कामना का प्रथम ‘स्पन्द’ कहलाता है। शक्ति ही कामना बनकर आहुत होती है। दाम्पत्य रति ही निर्माण की भूमि बनती है। इसी से वानप्रस्थ में देवरति का प्रादुर्भाव होता है, जो निर्वाण का मार्ग प्रशस्त करती है।

नर आग्नेय है-सत्य है, नारी सौम्या है, ऋत है। केन्द्र रहित है। कामनाघन है। अभ्युदय ही इस कामना का लक्ष्य है। नर केन्द्र में जीना चाहता है। अंशी में लीन होने को जीवन भर आतुर रहता है। दाम्पत्य भाव में नर की प्रधानता गृहस्थी को अध्यात्म से जोड़े रखती है। नारी की प्रधानता भौतिक सुखों का जाल फैलाए रखती है। मन की चंचलता, आसक्ति, राग-द्वेष आदि क्लेशों में भी उलझी ही रहती है। भीतर आत्मा उसकी भी नर ही है, किन्तु लक्ष्य भोग ही रहता है, योग नहीं रहता।

यही नारी पत्नी रूप में संकल्पित होकर पति की शक्ति बन जाती है। पति को पूर्णता प्रदान करके स्वयं भी पूर्ण हो जाती है। दोनों का अद्र्धनारीश्वर स्वरूप पूर्णता को प्राप्त होता है। समय के साथ विरक्ति भी पत्नी ही पैदा करती है। यह कार्य अन्य नारी नहीं कर सकती। इसी विरक्त भाव के कारण पूर्णता प्राप्त ‘पति’ अपने नि:श्रेयस् मार्ग का चयन कर पाता है। शक्ति ही पुरुष शरीर में सदाशिव को प्रकट कर देती है। शरीर शव, आत्मा सदाशिव।

पश्चिम में विवाह के बाद भी पति-पत्नी एक-दूसरे के लिए, अर्थात् एकाकार होकर नहीं जीते। दोनों ही स्वतंत्र पहचान बनाकर जीना चाहते हैं। आगे चलकर यही चिन्तन विवाह विच्छेद का कारण बनता है। पूर्व में विवाह विच्छेद की अवधारणा शास्त्रीय तो कभी नहीं थी। आदिम जातियों में ही रही थी। यहां विवाह का उद्देश्य दोनों द्ग ‘अभ्युद और नि:श्रेयस’ रहे हैं। जीवन के 25 साल पूर्ण होने पर विवाह के साथ ही ‘गृहस्थाश्रम’ की शुरुआत होती है। नारी का पत्नी रूप में, नर के जीवन में प्रवेश होता है। वह नर के साथ जीने के लिए आती है। अपना सब कुछ छोडक़र ही आती है (नाम और पहचान भी)। नारी सौम्या है और अग्नि में पूर्णरूपेण आहुत होने आती है। फिर से माता-पिता के घर में जाकर जीना उसका स्वप्न नहीं होता।

तब जीवन के शेष 75 साल उसको पति के घर में क्या करना है? पहले तो उस घर में अपना स्वामित्व स्थापित करना है। पति को अपने वशीभूत करना है, ताकि वह हर सलाह को स्वीकार कर सके। इसके लिए पति को रिझाना उसका पहला और अनिवार्य कर्म होता है। वह पति की ‘शक्ति’ है। उसे दाम्पत्य रति-वात्सल्य, स्नेह, श्रद्धा, प्रेम का अभ्यास कराती है। उसके अग्नि प्रधान जीवन में इन गुणों का स्थान कहां हो सकता है? वह अपने माधुर्य और लालित्य के सहारे उसमें मिठास घोलने का प्रयास करती है। उसे भी स्त्रैण बनाने का प्रयास करती है। यही तो पुरुष का वह निर्माण है, जो निर्वाण की पृष्ठभूमि है। विवाह पूर्व जो व्यक्ति स्वच्छन्द था, नारी साहचर्य से अनभिज्ञ था, कोरा पत्थर था-संवेदनाहीन था, उसे कड़ुवे-मीठे बोल से पूर्णता देती है। उसके अधूरेपन की पूर्णता उसकी स्वयं की पूर्णता बन जाती है। सही अर्थों में वही नर की भोक्ता है। जीवन के 25 वर्षों में पुरुष का निर्माण ऐसे करती है कि 50 वर्ष की उम्र में पुरुष के मन में एक विरक्ति का भाव भी पैदा कर देती है। उसके जीवन के निर्माण क्रम से बाहर होकर उसे निर्वाण पथ पर खड़ा कर देती है। यहां से जीवन का तीसरा आश्रम-वानप्रस्थ शुरू हो जाता है। अब दोनों पूर्ण भी हैं और मित्र भी हैं।

वानप्रस्थ गृहस्थ कार्यों से मुक्ति का काल है। धारणा-ध्यान-समाधि-सेवा के अभ्यास का काल है। मन में विरक्ति का भाव यदि नहीं आया, तो व्यक्ति कभी वानप्रस्थ को सही रूप में सार्थक नहीं बना सकता। यह कार्य तो न स्वयं व्यक्ति ही कर सकता है, न कोई अन्य नारी ही कर सकती है। अन्य नारी तो आसक्ति ही पैदा करेगी, चंचलता पैदा करेगी। तब कहां ध्यान और कहां समाधि?

पत्नी वानप्रस्थ में पति के मन को प्राण और वाक् (सृष्टि क्रम) से हटाकर आनन्द-विज्ञान (मोक्ष साक्षी क्रम) से जोड़ती है। आध्यात्मिक दाम्पत्य रति को आधिदैविक देवरति में प्रेरित करती है। जीवन का लक्ष्य पुरुषार्थ (धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष) ही तो है। कामनामुक्त व्यक्ति ही मोक्ष प्राप्त करता है। नारी या नर दोनों ही अकेले रहकर कामनामुक्त नहीं हो सकते। यही आज पश्चिम की मूल समस्या है। न अकेले रह सकते, न दूसरे का बनकर ही रह सकते। एक साथी से विरक्त होते ही दूसरे की तलाश शुरू हो जाती है। जीवन आहार-निद्रा-भय-मैथुन में बंधकर रह जाता है। अभ्युदय प्राप्त हो जाता है। नि:श्रेयस उनके चिन्तन का विषय ही नहीं होता। हमें इससे बचना है। दाम्पत्य सम्बन्धों की अपनी आध्यात्मिक पृष्ठभूमि की उज्ज्वलता को बनाए रखना है। तभी हम विश्व को बता पाएंगे कि नारी क्या है और क्या कर सकती है?

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मार्च 7, 2019

पाठकों को बधाई

आज राजस्थान पत्रिका 63 साल की हो गई। उम्र के साथ जवान हो रही है, हरी-भरी हो रही है, पत्ते बढ़ रहे हैं। समाज में शीतलता बढ़ रही है। यह गर्व की बात है कि सदा की तरह पिछला वर्ष भी पाठकों के नाम ही रहा। स्वतंत्र पत्रकारिता एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए पूरे वर्ष पाठक कंधे से कंधा मिलाकर साथ खड़े रहे। पाठकों ने अद्भुत परिपक्वता का परिचय भी दिया। मैं पत्रिका के पाठकों की गंभीरता देखकर गद्गद् हूं। छत्तीसगढ़ में राज्य सरकार के विरुद्ध संघर्ष में भी दिखा। राजस्थान में काला-कानून के खिलाफ बिगुल बजाया, तब भी देखा तथा पिछले विधानसभा चुनावों में भी यही भावनात्मकता और आत्मीयता का प्रदर्शन प्रकट हुआ। इस विश्वास से बड़ी दौलत कोई एक जन्म में कमा भी क्या सकता है! नतमस्तक हूं।

मैंने स्वयं चुनावों से पूर्व राजस्थान, मध्यप्रदेश, और छत्तीसगढ़ का सघन दौरा करके मतदाताओं का मानस टटोला था। बेरोजगारी से त्रस्त युवा, तंगी से जूझ रहे किसान-व्यापारी किस विश्वास के साथ चर्चा कर रहे थे, किस उत्साह से आवभगत कर रहे थे, मानो हृदय उंडेल रहे हों। उनकी स्थिति को हमने पाठकों, सरकारों और राजनीतिक दलों के सामने रखा। हमारे लिखे पर न तो कांग्रेस को भरोसा हुआ कि माहौल उनके पक्ष में था और भाजपा को लग रहा था कि हम उनके विरुद्ध लिख रहे थे। परिणामों ने ही सिद्ध किया कि हम तटस्थ थे। जनता का मूड ही बयान कर रहे थे।

हमारे चुनाव अभियान का सबसे बड़ा प्रभाव यह देखने को मिला कि राजनीतिक दलों ने न सिर्फ अपने घोषणा पत्रों में इन मुद्दों को प्रमुखता से शामिल किया, बल्कि तीनों हिन्दी प्रदेशों की सरकारों एवं केन्द्र सरकार को भी किसानों की कर्ज माफी, बेरोजगारी भत्ता, गरीबों को आरक्षण, जीएसटी में बदलाव जैसे निर्णय करने पड़े।

‘चेंजमेकर’ अभियान के माध्यम से हमने समाज के चिन्तनशील लोगों को स्वयं राजनीति में आने का आह्वान किया। लोगों ने इस मुद्दे को गंभीरता से लिया और इस अभियान से जुड़े 32 लोग जनप्रतिनिधि (विधायक) बनकर विधानसभाओं में पहुंचे। लोकतंत्र के यज्ञ में यह एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ। इसका श्रेय जनता को ही जाता है। हम भी जनता की कसौटी पर खरे उतरे।

भ्रष्टाचार के खिलाफ हमारी जंग जारी रही। यह अलग बात है कि भीतर कई जगह राजनीतिक दल एक होते जान पड़ते हैं। कई बार उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय के फैसले तक लागू नहीं हो पाते। जयपुर के रामगढ़ और जलमहल तो बड़े-बड़े उदाहरण हैं। मास्टर प्लान से खिलवाड़ करने के खिलाफ दायर मामले में भी उच्च न्यायालय ने साथ दिया। यह अलग बात है कि सरकार कानून का आदर करने को तैयार नहीं थी। इसी प्रकार राजस्थान में बजरी घोटाला, मध्यप्रदेश में ई-टेण्डर घोटाला, छत्तीसगढ़ का नान घोटाला भी परत-दर-परत पत्रिका ने ही उजागर किया। पिछली सरकार (छत्तीसगढ़) के सलवा जुडूम को पत्रिका ने उजागर किया था और उच्चतम न्यायालय ने इसे गैर-संवैधानिक करार दिया था। आज उन सभी आदिवासियों को मुआवजा दिया जा रहा है। उनका आशीर्वाद सदा हमारे साथ रहेगा।

हां! यहां यह उल्लेख करना भी उचित होगा कि सच्चाई और धर्म का मार्ग जीवन की कठिन परीक्षाओं का मार्ग है। राजा हरिश्चन्द्र-तारामती की कथा सुनी होगी। सत्ता का अहंकार तो लंगोट तक छीनने पर उतारू हो जाता है। शक्ति उनके पास भी जनता की होती है, मीडिया के पास भी जनता की। जनशक्ति ने पग-पग पर पत्रिका का साथ दिया।

नए साल की सबसे बड़ी चुनौती लोकसभा के भावी चुनाव हैं। हमारी टीमें चाक-चौबंद हैं और मैदान में उतर चुकी हैं। ‘ग्राउण्ड रिपोटर्स’ तो आप पढ़ ही रहे होंगे। इस बार भी अच्छे प्रतिनिधि चुनने हैं। भ्रष्ट और अपराधी विधानसभा चुनाव में कई बच निकले थे। इस बार युवा दृष्टि अपनी कमजोरी को दूर कर पाएगी। इनकी संख्या (नए मतदाता) भी दस करोड़ से अधिक है। इनकी प्राथमिकता भी युवा सांसदों पर ही रहनी चाहिए। मप्र, छग और राजस्थान में नए विधायक आ चुके हैं। केंद्र में भी नए सांसद आएंगे। इनकी प्रत्येक गतिविधि पर ध्यान रखना, पाठकों को विषय विशेषज्ञों से जोडऩा, लोकतंत्र में भागीदार बनाए रखना, चरित्र निर्माण करना जैसे सभी उद्देश्य आगे भी जारी रहेंगे। देश युवा है, दूर तक जाना है, सपने साकार करने का संकल्प बनाए रखना है।

पिछले वर्ष सोशल मीडिया ने मीडिया को बदनाम किया। फेक न्यूज, पेड न्यूज तथा भ्रामक प्रचार का माहौल चरम पर था। किसी को इज्जत की चिन्ता करते नहीं देखा। मीडिया सरकार के साथ हो गया था। इसी बीच पत्रिका की ‘ग्राउण्ड रिपोटर्स’, ‘हॉट सीट’, ‘जन एजेण्डा’, ‘चेंजमेकर’, ‘सेल्फी विद इंक’, ‘मेरा वोट-मेरा संकल्प’, ‘जनता की अदालत’ जैसे नए अभियानों ने हर मतदाता को लोकतंत्र से जोडऩे का सार्थक प्रयोग किया। आगे भी करेंगे। हमारा संकल्प भारत को भारत बनाए रखने का है। पाठकों से सीधे जुड़े रहने का है। बुराईयों से लडऩा और विकास में भागीदारी का है। आज पुन: इस संकल्प को दोहराने का दिन है। हम सब ‘राजस्थान पत्रिका’ हैं, चाहे पाठक हैं, कर्मचारी हैं अथवा नागरिक। पत्रिका पर्याय है स्वतंत्रता का, सम्मान का, संस्कृति का। यही हमारा भविष्य का मार्ग होगा। एक बार पुन: सबको मंगलकामना!

नमस्कार!!

फ़रवरी 27, 2019

दोगला है अनुच्छेद-370

धरती का स्वर्ग कश्मीर जल रहा है। आज से नहीं पिछले 72 सालों से। पिछले तीन दशकों में ही 41 हजार से ज्यादा लोग इस स्वर्ग में आतंकवाद से स्वर्गवासी हो गए। भारतीयों को तो इस स्वर्ग में रहने का अधिकार ही नहीं है लेकिन जो कश्मीरी वहां रह रहे हैं, उनकी जिन्दगी कम नारकीय नहीं है। ऐसे में पुलवामा के जवाब में मंगलवार की सुबह हुई एयर स्ट्राइक की घटना मात्र से सारे देश में हर्ष की लहर दौड़ गई। यह लहर इस बात का संकेत भी है कि, कश्मीर को लेकर भारतवासियों के दिलों में दर्द कितना गहरा है। बड़ा प्रश्न यह है कि, क्या कश्मीर के हालात सुधारने के लिए यह दवा काफी है? जवाब आएगा, नहीं। इसे वापस स्वर्ग बनाने के लिए धारा-370 और 35 ए जैसे कांटों को हटाना जरूरी है।

कश्मीरी मुसलमानों में अलगाव और आतंकवाद की जड़ संविधान की अस्थायी धारा-370 है। पं. नेहरू ने शेख अब्दुल्ला के आग्रह पर यह धारा स्वीकार की थी। अब्दुल्ला कश्मीर के भारत में विलय के पक्षधर नहीं थे। उन्होंने कहा था- ‘हमने कश्मीर का ताज खाक से उठाया है। हम हिन्दुस्तान में शामिल होंगे या पाकिस्तान में यह बाद का प्रश्न है। पहले हमें अपनी आजादी मुकम्मल करनी है।’ इतना ही नहीं उनका यह कहना भी था कि वे केन्द्रीय सरकार पर भरोसा नहीं कर सकते, क्योंकि उसमें हिन्दुओं का बहुमत होगा। मुस्लिमों को आश्वस्त करने के लिए कश्मीर को एक विशेष दर्जा दिया जाए। उसका अपना झण्डा, सदर-ए-रियासत और संविधान हो। इस प्रस्ताव का संविधान सभा ने विरोध किया था, किन्तु नेहरू के ‘वचन’ के कारण स्वीकार कर लिया गया। बाद में गोपालस्वामी ने कहा था कि यह धारा अस्थायी है। इसे शीघ्र ही निरस्त कर दिया जाएगा।

आज यह धारा भारत की एकता के लिए चुनौती बन चुकी है। दो दिन पहले ही वहां की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने कह दिया कि धारा हटाने की कोशिश हुई तो लोग पता नहीं कौन सा झण्डा उठा लेंगे। इनके पिता की राष्ट्रभक्ति पूरा देश देख चुका है। इनके आगे देश बहुत तुच्छ वस्तु है। अब तो केन्द्र सरकार ने भी मान लिया होगा कि उसने भी सांपों को ही दूध पिलाया था। इनको ऐसी धारा चाहिए जो पंथ निरपेक्षता और संविधान के मूल सिद्धान्तों को ठुकरा दे। समान नागरिक अधिकारों का सम्मान न करे। कश्मीर के नागरिकों को पूरे देश में समान अधिकार प्राप्त हों, किन्तु भारतवासियों को कश्मीर में रहने-करने का, शादी करने-कराने का, सम्पत्ति खरीद का अधिकार न हो। हां, यहां की स्त्रियां पाकिस्तानी पुरुष के साथ शादी कर करके उन्हें कश्मीर का नागरिक बना सकती हैं।

कश्मीर का संविधान और राष्ट्रध्वज अलग है। विस्थापित नागरिक सांसद चुन सकते हैं, विधायक नहीं। संसद को भी अत्यन्त सीमित क्षेत्रों के अधिकार प्राप्त हैं। उच्चतम न्यायालय के आदेश वहां मान्य नहीं हैं। अक्टूबर 2015 में उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एच. एल. रत्तू ने धारा-370 हटाने वाली याचिका पर सुनवाई करने से मना कर दिया था। उनका कहना था कि इस बारे में संसद ही फैसला कर सकती है। जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय ने इसे स्थायी प्रावधान ठहराते हुए कहा था कि इससे कोई छेड़छाड़ नहीं कर सकता।

सब कर रहे भ्रमित…

ये सारे प्रयास देश और कश्मीर के रिश्तों को कमजोर करने के ही हैं। आज का वातावरण संविधान के प्रति सम्मानजनक कहां है? राजनीतिक इच्छा शक्ति कई बार उन्हीं का साथ देती जान पड़ती है। बौद्धिक स्तर पर हमारी कार्रवाइयां भले ही सही जान पड़े, भारतीय जनभावनाओं का प्रभाव या दर्द निर्णयों में नहीं होता। सन् 1964 की संसद की बहस में, जो दस घंटों से अधिक चली, सभी ने स्पष्ट रूप से 370 की अस्थायी प्रकृति एवं उसके दुष्परिणामों के कारण इसे हटाने को कहा था। पूरी संसद एकमत थी। ढाई महीने में तीन बार बहस हुई थी। निर्णय नहीं हो पाया। आज तक भी नहीं हो पाया। सब अपने-अपने शब्दों से देश को भ्रमित करते जा रहे हैं।

कानूनी दोगलेपन का दूसरा प्रमाण है आर्टिकल 35-ए। संविधान में इसकी कहीं चर्चा नहीं है। बाद में-370 का ही उप-प्रावधान बनाया गया, जो कहता है कि राष्ट्रपति के आदेश से आप विशेष प्रावधान जम्मू-कश्मीर के लिए सम्मिलित कर सकते हैं। यह संविधान का विधायी प्रावधान नहीं है। इसी के अन्तर्गत वहां के स्थायी निवासी को जमीन, रोजगार आदि देने के अधिकार वहां की विधानसभा को हैं। समस्या की बड़ी जड़ बन गया है 35-ए। वहां के नागरिकों को दोहरी नागरिकता तथा भारतीय नागरिकों पर निषेध। सन् 1947 के बाद बसे प्रवासी भारत के नागरिक हैं, लोकसभा चुनाव में वोट डाल सकते हैं। जम्मू-कश्मीर के स्थायी निवासी नहीं होने के कारण विधानसभा चुनावों में भाग नहीं ले सकते। वह भी उस अनुच्छेद के अन्तर्गत जो अभी भी संविधान का स्थायी अंग नहीं है। अधिकांश लोगों को तो शायद यह जानकारी भी नहीं होगी। सोच सकते हैं कि अनुच्छेद-370 किसके विरुद्ध है।

भाजपा और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कश्मीर से धारा-370 हटाने का वादा किया था। सन् 2014 के चुनावों में तो भाजपा ने अपने चुनाव घोषणा पत्र तक में धारा-370 हटाने की बात कही थी।

धारा-370 के प्रावधान में स्पष्ट कहा गया था कि जैसे ही जम्मू-कश्मीर का संविधान बनाने वाली समिति अपना कार्य शुरू करेगी, धारा-370 हट जाएगी। इस समिति को संविधान तथा विलय सम्बन्धी धाराएं तय करनी थीं। उसमें कहा गया कि अगर बीच में कभी धारा-370 को हटाना है तो इस समिति की अनुमति लेनी होगी। अपना कार्य पूरा करके संविधान समिति 1953 में भंग हो गई।

प्रश्न यह है कि क्या एक देश में दो विधान हो सकते हैं? तब धारा-370 क्यों? इसी के कारण आज वहां सारा विध्वंस हो रहा है। क्या राष्ट्रपति स्वयं अनुच्छेद-370 को नहीं हटा सकते? मोदी सरकार के पहले दिन ही राज्यमंत्री जितेन्द्र सिंह ने धारा-370 को नुकसानदायक बताया था। वे स्वयं जम्मू से हैं। आज चर्चा का एक बड़ा विषय यह भी बन गया है कि बांग्लादेश (पूर्वी पाकिस्तान) से जो मुस्लिम आए, वे तो नागरिक बन सकते हैं लेकिन भारत के लोग जम्मू-कश्मीर में नहीं बस सकते। यही हमारी अखण्डता और पंथ निरपेक्षता का प्रमाण है। क्या यह शर्म की बात नहीं कि इस धारा के कारण भारत का कोई भी कानून जम्मू-कश्मीर में तभी लागू होगा, जब वहां की विधानसभा उसे पारित कर दे? न तो राष्ट्रपति इस राज्य के संविधान को रद्द कर सकते हैं, न ही कोई निर्देश दे सकते हैं। राष्ट्रपति की राष्ट्रीय संकट की घोषणा भी एक सीमा तक ही लागू हो सकती है।

समय के साथ वहां स्थिति विस्फोटक होती जा रही है। सेना पर पथराव का एक बड़ा लम्बा दौर देश ने साक्षात किया । लोग बेरोकटोक आना-जाना चाहते हैं, घाटी में दोनों देशों की मुद्राएं प्रचलित हैं। अनेक प्रमुख नेताओं के पाकिस्तान में सीधे सम्पर्क भी हैं। पीडीपी स्व-शासन की बात करती है, कोई 1953 पूर्व, तो कोई आजाद कश्मीर की मुहिम चलाए हुए है। पाकिस्तान घाटी से सेना हटाने की मांग दोहराता रहता है। आम्र्ड फोर्सेज स्पेशल पावर एक्ट को समाप्त करने का मुद्दा उठता रहता है। इसमें प्रावधान है कि किसी सैनिक के विरुद्ध अभियोग चलाने से पूर्व केन्द्र सरकार की स्वीकृति आवश्यक है। आज यह एक्ट भी निष्प्रभावी हो गया है। सरकारें सदा इन अलगाववादियों के आगे बहाने बना-बनाकर घुटने टेकती जाती हैं।

मैंने जनमानस की टोह लेने की दृष्टि से जम्मू, कश्मीर और लद्दाख की यात्रा की। राज्य में चल रहे कश्मीरी पंडितों और 1947 के बाद शरणार्थियों के शिविरों का भी दौरा किया। वहां साम्प्रदायिक स्वरूप प्रशासन में भी गहराता जा रहा है। आज विधानसभा क्षेत्रों का सीमांकन तक इस तरह हो चुका है कि केवल कश्मीर के क्षेत्र पर आधिपत्य जमाकर सरकार चलाई जा सकती है। इस प्रभाव को जम्मू की ओर बढ़ाने के प्रयास भी बदस्तूर जारी देखे थे।

हालात बदल चुके हैं। पुलवामा के हादसे ने जन-चेतना को जाग्रत कर दिया है। लोग प्रतिक्रिया करने लगे हैं। देश में बसे कश्मीरी असुरक्षित महसूस करने लगे हैं। राज्य सरकारों को भी छात्रों की सुरक्षा के लिए विशेष निर्देश जारी हो चुके हैं। इसकी आंच जम्मू-कश्मीर के नेताओं तक भी पहुंच चुकी है। डॉ. फारुख अब्दुल्ला ने और महबूबा मुफ्ती ने लौटने वाले प्रदेशवासियों के लिए मस्जिद-गुरुद्वारों में लंगर खोल दिए हैं। पुलिस के पहरे में लोगों को अपने शहरों तक पहुंचाया जा रहा है। यह सब काफी नहीं है।

न सर्जिकल स्ट्राइक ही काफी है। यह बुद्धिजीवियों को सन्तुष्ट करने का माध्यम जरूर है, किन्तु जनभावना के आहत मन का मरहम नहीं हो सकती। यह इस बात का संकेत भी है कि अभी सरकार भी स्थायी समाधान नहीं चाहती। युद्ध भी समाधान नहीं है। समाधान के लिए तो पहले आर्टिकल-35 ए को तुरन्त निरस्त करना पड़ेगा। यह दोगलेपन को लागू करने का प्रभावी हथियार है। साथ ही सरकार अनुच्छेद-370 को हटाने की सार्वजनिक घोषणा करके क्रियान्वयन प्रक्रिया शुरू कर दे। जनभावना को सत्ता के जोर से दबाया तो जा सकता है, मिटाया नहीं जा सकता।

जनवरी 1, 2019

छुड़ा दो छक्के

नव वर्ष की मंगल कामनाएं!

नेताओं के पांवों में १७वीं लोकसभा के चुनावों के घुंघरू बंधने लग गए हैं। सन् १९५२ से अब तक १६ बार लोकसभा चुनाव हो चुके हैं। कौन जीता, कौन हारा, किसने क्या किया-न किया, किसको याद है! मतदाता अधिकांशत: जाति-धर्म से बंधकर चल रहा था। किस जाति या धर्म का भला हुआ? हुआ क्या?

इस बार तीन हिन्दी राज्यों के विधानसभा चुनाव कुछ बदले-बदले थे। विपक्ष मजबूत बना। इधर लोकसभा में तो विपक्ष नदारद है। वहां लोकतंत्र की परिभाषा बदली हुई है। चोरी और सीना जोरी स्पष्ट दिखाई दे रही है। लोकपाल नहीं बना, संवैधानिक संस्थाएं दबाव में आती जा रही हैं। सुप्रीम कोर्ट पर दबाव, लगभग एक सौ नियुक्तियां स्वीकृति की प्रतीक्षा में, चुनाव आयुक्त, सूचना का अधिकार, आईबी, रिजर्व बैंक गवर्नर जैसे पद विवादों के घेरे में। जबकि सांसदों के भ्रष्टाचार, कालेधन या उनकी भूमिका की कभी कोई चर्चा ही नहीं। ये तो मानो उनका अधिकार अथवा मूल कर्तव्य बनता जा रहा है।

दागी और अपराधी सांसदों का बढ़ते जाना ही आज का स्वस्थ लोकतंत्र रह गया है। आपके पास एक बार निर्वाचित अपने ही जनप्रतिनिधि को वापस बुलाने का अधिकार भी नहीं है। न ५० प्रतिशत मत प्राप्त करना आवश्यक रह गया है, सरकार बनाने के लिए। नोट और नोटा दो नॉटी (शरारती) स्वरूप बीच में प्रभावी होते जा रहे हैं। संसद में राजनीतिक दलों की बढ़ती संख्या ने तो लोकतंत्र की कमर ही तोड़ दी। ‘बांटो और राज करो’ का दृश्य स्पष्ट है। निश्चित है कि विपक्ष कमजोर होता जा रहा है। सत्ता पक्ष को और क्या चाहिए?

उधर सांसदों की संसद के नियम-कायदों से अनभिज्ञता बढ़ती जा रही है। अध्यक्ष तक अनुशासनात्मक कार्यवाही से दूर दिखाई पड़ते हैं। सदन में निंदा प्रस्ताव, विशेषाधिकार हनन, अवमानना जैसे मुद्दे खोते जा रहे हैं। हां, एक मीडिया बचा है, जिसे नोटिस भेजने में चूक नहीं होती। निजी स्तर पर भी सांसदों की भूमिका लुप्त प्राय: होती जा रही है। सत्ता पक्ष के सांसद ‘छोटे ठाकुर’ जैसे होते जा रहे हैं। कुछ ही उपलब्धियां गिनाने की स्थिति में होते हैं। न क्षेत्र की चिन्ता करते, न समस्याओं का अध्ययन करते, न ही योजनाओं को लागू करवाने में इनकी भूमिका दिखाई पड़ती है। कईयों को तो विकास की समझ तक नहीं होती। न वे संसद में अपने राज्य अथवा क्षेत्र के मुद्दे ही उठा पाते। वे देश के सांसद तो बन ही नहीं पाते। पूरे कार्यकाल में पार्टी के ही सांसद रहते हैं।

राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में तो करीब-करीब सभी सांसद भाजपा के हैं। कितनों की आवाज लोकसभा में सुनाई दी। राज्य के लिए कुछ किया, दिखता ही नहीं। काम के नाम पर ज्यादातर चुनने वाले मतदाता का अपमान ही करते दिखते हैं। सरकारें भी दलों की ही कहलाती हैं, देश की नहीं। लोकसभाएं भंग होती हैं, नई बनती जाती हैं। मूलभूत मुद्दे वहीं के वहीं रहते हैं। सत्तर साल में अभी सबको पीने का पानी नहीं मिला। नौकरियां नहीं, नक्सली गए नहीं, सम्मान लुटता जा रहा नागरिकों का, फेल होती नीतियां और किसान ने अपनाना शुरू किया आत्महत्या का मार्ग। क्या कोई भी सरकार मानेगी अपनी गलत नीतियों का प्रभाव या सीना जोरी की भाषा ही बोलेगी। अब तो हालात ऐसे बन गए हैं कि, सत्ता हो या संगठन, नेता की गलती पर जानते-बूझते भी कोई अंगुली नहीं उठा सकता। फिर लोकतंत्र कहां रह गया!

वर्तमान लोकसभा में प्रधानमंत्री के आह्वान पर सांसदों ने एक-एक गांव गोद लिया था। क्या हुआ, पिछले चार सालों में? किसने क्या भूमिका निभाई, सबके सामने है। कितनी बार गए वहां, पानी-बिजली के अलावा क्या किसी ने खेती और पशुपालन पर चर्चाएं कीं? सिंचाई या चारा डिपो की ओर ध्यान दिया? स्वास्थ्य सेवाओं या मजदूरी को लेकर जनता के साथ संघर्ष किया? अधिकांश सांसदों ने तो बजट का पूरा उपयोग तक नहीं किया।

ऐसे सांसदों से राष्ट्रीय मुद्दों पर चिन्तन की अपेक्षा की जा सकती है? क्यों चुनते आ रहे हैं हम ऐसे सांसद? चर्चा होनी चाहिए, नई पीढ़ी के बीच में। ये लोग ही तो राष्ट्रीय विकास के लिए नीतियां बनाते हैं। सामने है अब तक क्या हुआ? हां, विशेषाधिकारों के लिए उनकी जंग जरूर जारी रहती है। पिछले वर्षों में बहुत से तो अपने दिल्ली के घर और उसके लॉन को किराए पर उठाने के लिए बदनाम रहे। दिल्ली के बावजूद राज्यों की राजधानियों में भी सरकारी मकानों के लिए लड़ते नजर आते हैं।

राज्य सभा के सांसद तो अधिकांश परदेशी होते हैं। कठपुतली की तरह आते हैं और छह साल का कार्यकाल पूरा कर लौट जाते हैं। इनका जनता से भी कोई सरोकार नहीं और न ये किसी तरह के राज्य स्तरीय उत्तरदायित्वों का निर्वहन ही करते हैं। सत्ता के गढ़-रावले बन गए हैं। कई तो इसलिए भी चुनेे जाते हैं, क्योंकि वे लोकसभा चुनाव जीतने लायक नहीं होते। कोई दमदार आए तो राज्य का भी भला हो। आने वाले समय में तो इस तरह के प्रस्तावों का सार्वजनिक विरोध होना चाहिए। ऐसे सांसद लोकतंत्र को कलंकित ही ज्यादा करते हैं।

सांसदों से यह भी अपेक्षा रहती है कि कानूनों का समर्थन देश की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, देश की परम्पराओं को ध्यान में रखकर करें। विदेशी नकल के आधार पर, अंग्रेजी दां लोगों की हां में हां मिलाना बंद होना चाहिए। देशी मानस पर विदेशी विकास की अवधारणा ने देश की शक्तियों का हृास ही किया है। न हम भारतीय ही रह पाते हैं और न विदेशी बन सकते हैं। इसका जो प्रभाव केन्द्र-राज्य की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर पड़ता है, उसका अनुमान विदेशी दिमाग नहीं लगा सकता।

लोकसभा के आने वाले चुनाव इस दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण होंगे। युवा पीढ़ी को ही अपना भविष्य तय करना है। कृत्रिम बौद्धिकता के युग में रोजगार की नई दिशा, प्राकृतिक खेती एवं दूध की उपलब्धता, आधुनिकीकरण के साथ आपसी सौहार्द, वैश्वीकरण के क्षेत्र में देश के सामान्य जन-व्यापारी का स्थान-सम्मान, महिलाओं की भूमिका और उनका सम्मान बढ़ता जाना चाहिए।

जो सांसद नकारा रहे, उन्हें तो वापिस हर्गिज नहीं जीतने देना है। विधानसभा चुनावों में भी कुछ दागी लोग जीतकर आए हैं। क्या लोकसभा चुनावों में हम इनकी हार निश्चित कर सकते हैं? धर्म-जाति और वंशवाद के कारण भी अधिकांश नकारा लोग चयनित तो हो जाते हैं, करते कुछ नहीं हैं। उनको तो यह भी याद नहीं रहता कि वे जाति के नहीं प्रदेश के प्रतिनिधि कहलाते हैं। नहीं चाहिए ऐसे सांसद! इतिहास को कोसते भी हैं और बदलने का प्रयास भी नहीं करते। हमें इनकी दृष्टि, नेतृत्व क्षमता, ईमानदारी और माटी के प्रति प्रतिबद्धता को देखना है। मुद्दों को, दलों के स्वरूप और राजनीतिक स्थिति को भी देखना है और इतिहास को भी।

दागी, बागी, दलबदलू और वंशवादियों से अपने लोकतंत्र को आजाद कराना है। पढ़े-लिखे, स्वच्छ छवि के और धर्म-जाति से ऊपर उठकर विकास एवं सम्पूर्ण समाज के लिए काम करने वालों को जिताना है। ऐसे युवा हों तो सोने में सुहागा। हमें भावुकता की गेंद को खेलना ही नहीं है। छोड़ देना है। उम्मीद की जानी चाहिए कि, युवा पीढ़ी लोकतंत्र की आजादी के लिए छक्के मारेगी और धर्म-जाति के ठेकेदारों के छक्के भी छुड़ाएगी। तभी हम ऐसे सांसद चुन पाएंगे जो मतदाता का, देश का गौरव बढ़ा सकें। हिम्मत का यह काम नई पीढ़ी ही कर सकती है। विश्वास है, नए साल में, नई लोकसभा के लिए वह नए संकल्प से चुनाव करेगी।

दिसम्बर 22, 2018

विकास के आगे घुटने टेकता जीवन

सारी नीतियां पलायनवादी हैं। कोई भी जिम्मेदारी उठाने की क्षमता एवं मानसिकता इनमें नहीं है। तब कौन बचाएगा कृषि और पशुधन? कौन बचाएगा धरती? तब कैसे बच पाएंगे किसान और गांव? प्रकृति से छिटक जाएगा इंसान। कलियुग के बाद प्रलय की पूर्ण तैयारी हो रही है।

भारत का अर्थ गांवों में दिखाई देता है। शहर विदेशों की नकल करते हैं। भारत से दूर भागते देखे जा सकते हैं। भौतिकवाद की अंधी दौड़ में भागे जा रहे हैं, बस। सरकारें शहरों में बसती हैं। शहरी दृष्टि ही कानूनों के माध्यम से गांवों पर आक्रमण, अतिक्रमण और वैश्वीकरण के अस्त्र-शस्त्र चलाती हैं। ग्रामीण त्रस्त और शहरी मस्त हैं। शहर और ग्राम कहने को एक ही देश के हैं, किन्तु दोनों की जीवन पद्धति विरोधाभासी है। तंत्र शहर के हाथ में, विदेशी ज्ञान का बोलवाला है। वह भी विज्ञान के नाम पर। भारतीय परम्परा से बड़ा टकराव है। सरकार नीतियां बनाकर लागू करती हैं। ग्रामीण परिपे्रक्ष्य को समझती भी नहीं है और थोपने का मार्ग पकड़ लिया है।

ग्रामीण कृषक क्या समझेगा विज्ञान के प्रयोग। वह तो जलवायु और परम्परा को जानता है। सरकार इस ज्ञान को भुलाने के पीछे पड़ी है। दो विरोधी संस्कृतियों के संघर्ष में कमजोर कृषक मार खा रहा है। उसकी संतानें खेती से विमुख हो रही हैं। सरकारें खाद्यान्नों में विष घोलकर समाज में कैंसर बांट रही हैं। कृषक को मरने के लिए मजबूर कर रही हैं। देश में आदान-प्रदान का स्थान एक पक्षीय भ्रष्टाचार ने ले लिया है।

गांवों की बसावट का ढांचा ध्वस्त हो गया है। अतिक्रमण और प्रभावी लोगों का दबदबा बढ़ गया है। बिना योजना के सडक़ें और नहरें लाभ के स्थान पर हानिकारक होने लगी हैं। सरकारी योजनाएं चोरी, मुफ्तखोरी और भ्रष्टाचार फैला रही हैं। कर्म और धर्म प्रधान समाज सरकार को आश्रित भाव से देखने लगा है। अब उसे बिना कर्म किए सब-कुछ चाहिए। बिजली-पानी-सडक़ ने गांवों को आधा शहर बना दिया है। न गांव रहे, न शहर बने।

कहते हैं द्ग भारत गांव में, गांव से अन्न, अन्न में ब्रह्म, ब्रह्म संस्कृति का केंद्र, वही भारत का वैश्विक स्वरूप। भारत कृषि प्रधान देश रहा है। साल में तीन ऋतुएं होती हैं। विभिन्न प्रकार का अन्न पैदा होता है। भूगोल इसका आधार है। कहते हैं ‘जैसा खावे अन्न, वैसा होवे मन।’ किसान हमारा अन्नदाता है। हम किसान को, खेती को तथा पशुधन को विदेशी बनाने में लगे हैं। इसी को हम विकास कह रहे हैं। यानी हम, हम न रहें द्ग दूसरों की नकल करके जीएं। सच पूछो तो यही हाल हमारे अंग्रेजी दां अफसरों का है, बुद्धिजीवियों का है। वे भारतीय वातावरण में जीने को तैयार ही नहीं हैं। न वे चाहते हैं कि हमारी शिक्षा हमारी आवश्यकता के अनुरूप हो। वे पूरे देश को विदेशी चश्मे से देख रहे हैं। वैसा ही बनाना चाहते हैं। परिणाम क्या हो रहा है-‘कौव्वा चला हंस की चाल, अपनी चाल भी भूला।’

आज देश का किसान न खेती के लिए स्वतंत्र है, न ही पशुधन के पालन-पोषण और अभिवृद्धि के लिए। उसका भारतीय दर्शन, ज्ञान और जीवन शैली सब लुट गए। विकास की भेंट चढ़ गए। विकास का अर्थ ही विदेशी शैली है। खेती में बीज से लेकर खाद, कीटनाशक और सिंचाई के ढंग सब कुछ तो विदेशी हो गया, बल्कि उसमें ऐसी एकरूपता भी आ गई जैसी स्कूल की पढ़ाई में आई है। सारे बच्चे एक जैसे बनेंगे। सम्पूर्ण राज्य में कृषि भी एक पाठ्यक्रम की तरह एक जैसी हो जाएगी। हजारों वर्षों से जोती जाने वाली जमीन कुछ ही वर्षों में बेकार होने लगी है। नहरी इलाकों की जमीन तो ५० वर्ष भी इस मार को नहीं झेल पाती। पंजाब, श्रीगंगानगर, कोटा आदि क्षेत्र जीते-जागते प्रमाण हैं। यह भी एक तथ्य है कि किसान भी जमीन के साथ ही मर जाता है।

गांव की आबादी किसान की जरूरतों की पूर्ति के लिए ही होती है। अत: किसान के साथ गांव भी उजडऩे लग गए हैं। सरकारी विभाग को इन सब परिस्थितियों से कोई लेना-देना नहीं होता। वे भी विदेशी की तरह आते हैं, संवेदनहीनता के साथ नियम-कायदों की बात करके चले जाते हैं। किसान उनको अपने जीवन का हिस्सा लगता ही नहीं। अत: भ्रष्टाचार का चरम आप वहां देख सकते हैं। ऋण, अनुदान, मनरेगा, सरकारी योजनाएं, बीमा के मुआवजे आदि किसान की मौत के साधन बन गए। अफसरों के लिए किसान तो सोने के अण्डे देने वाली मुर्गी हो गया। अत: अफसर उसका पेट चीरने में लगा है।

एक तरफ भारतीय खाद्य सामग्री का स्थान तेजी से पाश्चात्य सामग्री लेती जा रही है, वहीं कोई भी खाद्य सामग्री ऐसी नहीं बची, जो कीटनाशक के प्रभाव से अछूती बची हो। अन्न, सब्जियां, दूध, डिब्बा बंद सामग्री, हर एक में कीटनाशक मौजूद है। बहुत से अनुसंधानों में कीटनाशकों और कैंसर का सीधा सम्बन्ध पाया गया है। हम प्रकृति को चुनौती दे रहे हैं। विज्ञान के नाम पर कृत्रिमता की ओर सभ्यता को धकेल रहे हैं। हमारे यहां अवैध तरीकों से ड्रग-ट्रायल भी होते रहते हैं। लोग मरते रहते हैं। विज्ञान का अट्टहास सरकारों के मुंह से सुनते रहते हैं। सन् २०१२ में इन प्रयोगों पर २,७६० करोड़ रुपए खर्च हुए थे। लोग कितने मरे? पत्रिका ने श्रीगंगानगर में कीटनाशक के प्रयोग पर एक सर्वे प्रकाशित किया था। पशुओं के दूध में कीटनाशक होते हैं। चारे और कपास के बीजों में खूब कीटनाशक का प्रभाव रहता है। फल-सब्जी, यहां तक कि शहर की मिट्टी में कीटनाशक, माताओं के दूध में कीटनाशक। आज कपास के खेत पर १४ बार कीटनाशक दवाओं का छिडक़ाव किया जाता है। लगभग सभी उन्नत बीजों में रोग निरोधक क्षमता न्यूनतम होती है।

जहां से देश में उन्नत खेती शुरू हुई थी, उसी लुधियाना, पंजाब, बठिण्डा से प्रतिदिन एक ट्रेन आती है, बीकानेर। उसका नाम पड़ गया है कैंसर ट्रेन। इसी अधमरी जनता को पूरी तरह मारने की पूर्ण व्यवस्था कई राज्य सरकारों ने कर डाली। रुपए किलो कैंसर (गेहूं) बांटकर। दस-पन्द्रह साल बाद चारों ओर कैंसर ट्रेन और अस्पतालों का जाल बिछ जाएगा।

जीवन से बड़ी चीज क्या है? आज विकास के आगे जीवन का मोह घुटने टेक रहा है। प्राकृतिक जीवन शैली की उपेक्षा ही विकासवाद का स्वरूप है। अनाज और दूध दोनों ही प्रकृति से जुड़े हैं। गांवों के उत्पाद हैं। जमीनें शहरी लोग और सरकारें खा रही हैं। परम्परागत कृषि शिक्षा कहां है? हैं तो अशिक्षित कृषकों एवं पशु-पालकों को परम्पराओं के विपरीत खींचते जटिल कानून और मौत की ओर खींचती कानूनों की बेरहम अनुपालना। कृषकों की मौत साधारण घटना रह गई।

इन सबके विपरीत आज के नए बीजों, रासायनिक खाद और कीटनाशकों का ताण्डव बढ़ता जा रहा है। इनके कारण कैंसर का बढ़ता आतंक और उसका सारा दोष कृषकों-दुग्ध उत्पादकों के माथे। जबकि इन आत्म-हत्याओं और बढ़ते रोगों का सारा दोष सरकारी नीतियों और अधिकारियों द्वारा इनके क्रियान्वयन के माथे पडऩा चाहिए। इनकी सारी नीतियां पलायनवादी हैं। कोई भी जिम्मेदारी उठाने की क्षमता एवं मानसिकता इनमें नहीं है। तब कौन बचाएगा कृषि और पशुधन? कौन बचाएगा धरती? तब कैसे बच पाएंगे किसान और गांव? प्रकृति से छिटक जाएगा इंसान। कलियुग के बाद प्रलय की पूर्ण तैयारी हो रही है।

दिसम्बर 12, 2018

लो कर दिखाया

टूटा मौन और जनता ने कर दिखाया जो तय कर लिया था दो साल पहले। पत्रिका ने दिनांक २२ अक्टूबर २०१७ को लिखा था कि अगले चुनावों में जनता सरकार को उखाड़ फेंकेगी। जनता ने अपना काम कर दिया। अब कांग्रेस उसका पूरा लाभ नहीं उठा पाई तो कारण भी वही ढूंढे। कहा जाता है कि भिश्ती को एक दिन का बादशाह बना दिया तो उसने चमड़े के सिक्के चला दिए। वसुंधरा सरकार अपार बहुमत को जनता का प्रसाद मानने के बजाए अपने राजसी अहंकार में आ गई। प्रदेश में काला कानून लाकर लोकतंत्र को समेट देने का प्रयास किया। लेकिन पत्रिका की मुहिम और जन आक्रोश का सामना नहीं कर पाई। प्रस्ताव वापिस लेना पड़ा। इसी की नकल की मध्यप्रदेश की शिवराज सरकार ने। बाद में उनको भी पीछे हटना पड़ा। इसके बाद भी केन्द्र सरकार ने ऐसा ही कानून बना डाला। इस मानसिकता के प्रति जनता ने मानस बनाकर मौन धारण किया था। अर्थ स्पष्ट ही था। जरूरत चश्मा उतारकर देखने की थी। हमारे चश्मा था ही नहीं। तीनों प्रदेशों में घर-घर जाकर जन-मन को टटोला, नेताओं से चर्चा की, पिछले चुनावों पर दृष्टि डाली, पिछले वर्षों में सरकारों की मंशा क्या रही, इसको भांपने का प्रयास किया और उसी के आधार पर चर्चा को आगे बढ़ाते गए। मतदाता को देवता मानकर अन्तस से बात की। तब उसके भीतर चल रही लहर को महसूस कर पाए। छत्तीसगढ़ के दौरे में ही लहर ने स्थिति स्पष्ट कर दी थी। बस्तर के आदिवासी ज्यादा मुखर थे। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ आज भी एक-दूसरे से प्रभावित रहते हैं। किसान और सवर्ण मध्यप्रदेश में भी उसी तर्ज पर थे। किसान तीनों ही राज्यों में अफसरों को कोस रहे थे जिनके कारण प्रत्येक योजना दुर्गति का कारण बनती चली गई। इसमें बीमा का मुद्दा भी पर्दे के पीछे दरिन्दगी का कारण रहा। हर व्यक्ति अच्छी सरकार चाहता है। फिर अच्छा कार्य करके सरकारें पुन: प्रतिष्ठित नहीं होना चाहती, यह एक यक्ष प्रश्न हल नहीं पा सका।

जो वातावरण मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में पन्द्रह वर्षों में बना, वह राजस्थान में पांच वर्षों में ही बन गया। क्या यही सारी कमाई की पांच वर्षों में! इससे पूर्व कांग्रेस सरकार को भी इसी प्रकार से जनता ठुकरा चुकी थी। किसी को ठेस नहीं लगती, अपमान महसूस ही नहीं होता। मानो आत्मा होती ही नहीं, नेताओं के। कांग्रेस के पहले भी यही तो वसुन्धरा सरकार थी। क्यों हारी थी, वे कारण किसने समझे और किसने उनका निराकरण किया? जनता वहीं की वहीं ठगी सी खड़ी जुमलों की बारिश में नहा रही है।

छत्तीसगढ़ आदिवासियों की जमीनें हड़पने (कानून बनाकर) के लिए और सलवा जुडुम जैसे असंवैधानिक अभियानों के लिए जाना जाएगा। कोल ब्लॉक्स आवंटन का खेल भी रमन सिंह के काल में हुआ था। उधर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री अपनी वाक्-चतुराई के लिए जाने जाते हैं। किन्तु उनकी कथनी और करनी विरोधाभासी रही है। अपराध और भाजपा के अपराधी दोनों ही इस काल में खूब फले-फूले हैं। किसानों पर तो मानो स्वयं सभी सरकारें ही टूट पड़ीं। युवा बेरोजगार है और छोटा व्यापारी घुटन महसूस कर रहा है।

विशेष बात यह रही कि चुनाव में जनता और भाजपा सीधे आमने-सामने रहे। ७० वर्षों में पहली बार ऐसी स्थिति बनी है। कांग्रेस विजयी नहीं हुई, भाजपा हारी है। कांग्रेस को जीतने के लिए अभी पांच साल कुछ करके अपनी दक्षता और निष्ठा प्रमाणित करनी पड़ेगी। मुद्दा तो यह भी है कि क्या देश सदा के लिए इन दो धर्मों-कांग्रेस और भाजपा-में बंटकर रह जाएगा? क्या सत्ता से उतरा हुआ दल विपक्ष की भूमिका भी निभाएगा अथवा सत्ताधारी को सामन्ती छूट बनाए रखेगा। इसके कई प्रमाण मिलते रहते हैं कि दोनों दल भीतर कुछ समझौता करके भी चलते हैं। चहेतों को जिताने के लिए सामने वाले दल के कमजोर व्यक्ति को टिकट दिलवाने में सफल हो जाते हैं। इस बार के चुनावों में भी ऐसा जगह-जगह हुआ है। कीमत जनता चुकाती है। युवा पीढ़ी को इस दृष्टि से जागरूक रहने की आवश्यकता है।

क्या इसी परिणाम और नागरिक सम्मान के लिए हमारे पूर्वजों ने लोकतंत्र की स्थापना की थी? आज आगे बढऩे से पहले इस प्रश्न पर सामाजिक बहस होनी चाहिए कि क्या सरकार बदल देना मात्र ही लोकतंत्र है। क्या पद से उतार देना ही जनप्रतिनिधि की ‘अपने अनकिए’ की और ‘विरुद्ध किए’ की सजा है? कैसे कोई सत्ता-पक्ष जनता की अस्मत से खेलकर बरी हो सकता है?

इन चुनावों ने युवा पीढ़ी को जगाया है। एक नए युग की शुरूआत हुई है। युवा सक्षम है, राष्ट्रनिष्ठ है, भविष्य दृष्टा है, ऊर्जावान है। रूढि़वाद के बंधन टूटने शुरू हो गए हैं। लोकतंत्र के तीनों पायों के लिए चुनौती तैयार हो रही है। ‘देश को भविष्य दो, देश को स्वतंत्रता और सम्मान दो।’ यही नया नारा रहेगा। विकास की परिभाषा युवा तय करेगा, सरकारें नहीं। भावी सरकारें भी ऐसी होनी चाहिए जो देश की २५-५० वर्ष आगे की सोच सकें।

चुनावी दौरे में तीनों राज्यों में जाने का मौका मिला। हर वर्ग के लोगों से चर्चा करने का अवसर भी प्राप्त हुआ। शहरी से अधिक गांवों पर अधिक केन्द्रित रहे। औपचारिक बातचीत में औपचारिक शिकायतें, नाराजगियां ही चर्चा में आईं। इनका अर्थ लगाने से कोई निष्कर्ष नहीं निकल सकता। यहां तक कि पार्टी नेताओं की जानकारियां भी खरी नहीं उतरीं। परिणाम हमारे आकलन के अनुरूप ही आए।

इस बार के चुनाव पहले से भिन्न थे। युवा के हाथ में कमान थी। जाति-धर्म से ऊपर थे। महिलाएं युवा के साथ बहुत आगे थीं। चुनाव सारी गणनाओं के बाहर जाने वाले स्पष्ट दिखाई पड़ रहे थे। वही हमने लिखा और वैसा ही हुआ भी।

यह चुनाव परिणाम २०१९ के आम चुनावों को भी निश्चित रूप से प्रभावित करेगा। सरकारों को बदलकर युवा नए जोश में होगा। किसान भी अपनी ताकत आजमाएंगे। कांग्रेस सहित सम्पूर्ण विपक्ष एकजुट और आक्रामक होगा। तीन राज्यों में नई सरकारों का भी उन्हें लाभ मिलेगा। भले समय कम है लेकिन भाजपा की केन्द्र सरकार के पास मौका है, कुछ सुधारात्मक कदम उठाने का। उसे कुछ भी करने की, अपनी एकतरफा कार्यप्रणाली बदलनी होगी। उसकी नीति और निर्णयों के जो कांटे जनता को चुभ रहे हैं, वे निकालने होंगे।

दिसम्बर 10, 2018

आहट बदलाव की

विधानसभा चुनाव सम्पन्न हो गए। इस बार लोकतंत्र ने करवट बदली है। जैसा कि हमारा आह्वान था और अनुमान भी, इस युवा वर्ग ने अंगड़ाई ली है। लोकतंत्र के बिगड़ते हालात की डोर अपने हाथ में थामी है। अपने भविष्य के सपनों को साकार करने के लिए कदम बढ़ाया है। आज नहीं तो कल मंजिल मिल जाएगी। इस बदलाव की हवा में नारी शक्ति का भी पुरजोर समर्थन है। इस बार जहां हम किसानों की भी तीन-चौथाई भागीदारी देख रहे हैं, वहीं पहली बार मतदान करने वाला, 18-19 वर्ष की आयु वर्ग का मतदाता बहुत मुखर दिखाई पड़ रहा है। राजस्थान में लगभग 16 लाख 20 हजार युवा मत पड़े, जो इनके कुल मत का 80.23 प्रतिशत रहा है। यह पूर्ण जागरूकता का प्रमाण है। आशा करनी चाहिए कि पूरे पांच साल जागरूक रहकर प्रदेश के विकास को नई दिशा देगा। भ्रष्टाचार, जातिवादी शक्तियों, भाई-भतीजावाद के राह में रोड़े अटकाकर रखेंगे। इनका भविष्य ही प्रदेश और देश का भविष्य है।

इस वर्ग का साथ दिया है इसके आगे की पीढ़ी (22-25 वर्ष) के मतदाता ने। इस वर्ग में सर्वाधिक बेरोजगार बच्चे हैं। कुछ रोजगार की तलाश में गांवों से भागकर शहर में आए हैं। इन पर जीएसटी की मार भी पड़ी है। इनकी हालत देखकर मां-बाप भी सहम जाते हैं। नए मतदाताओं के मुकाबले इनकी संख्या तीन गुणा अधिक है। 50.21 लाख। ऐसी ही स्थिति मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ की है।

ये दोनों आयु वर्ग ऐसे हैं जो लोकतंत्र के स्वरूप को आमूल-चूल बदल देने वाले हैं। कोई भी राजनेता या दल इनको थोक में नहीं खरीद सकता। न ही ये परम्परा से बंधे रहेंगे। विकास को धता बताने वाले जातिवाद, वंशवाद अथवा अन्य ठेकेदारी प्रथा के बैरियर ये वर्ग ही तोड़ेंगे। एक-दो चुनावों के बाद सब बदल जाएगा।

इसके साथ मातृशक्ति भी एकजुट है। पुरुष बिखर सकता है, महिला भीतर से अधिक मजबूत होती है। उसका प्रेम बोलता नहीं, कर गुजरता है। इन चुनावों में भी महिला मतदाता बदलाव के अभियान में पुरुषों से आगे रही हैं। पिछले चुनाव (2013) में भी बदलाव का निमित्त बनी थीं महिलाएं। राजस्थान में इस बार 73.80 प्रतिशत पुरुष मतदाताओं ने वोट डाले, वहीं महिला मतदाताओं के मामले में यह प्रतिशत 74.66 रहा। यानी पुरुषों से 0.86 प्रतिशत आगे। पिछले चुनाव में 0.65 प्रतिशत आगे थीं। इसका एक कारण महिला शिक्षा है, तो दूसरे कारण- महंगाई, बेरोजगारी, नोटबंदी में इनकी जमा पूंजी का चले जाना, विकास के अवसरों का अभाव रहा है।

बच्चों को संस्कार मां ही देती है। कष्ट में मां ही साथ रहती है। लोकतंत्र, आज कष्टदायक हो चला है। युवा शक्ति के साथ मां भी रक्षण में उतरी है। कुछ बड़ा घटने वाला है। मैं पत्रिका की ओर से दोनों शक्तियों का आभार भी व्यक्त करता हूं और अभिनंदन भी करता हूं। आपने हमारे जागो जनमत, चेंजमेकर आदि अभियानों का मान बढ़ाया। हमारे आह्वान पर आगे आकर लोकतंत्र को अक्षुण रखने का कार्य अपने हाथ में लिया। पूरा प्रदेश गौरवान्वित है। आगे भी हम तो साथ-साथ ही रहेंगे। शुभकामनाएं।

दिसम्बर 7, 2018

उठो, लोकतंत्र के सैनिकों!

लोकतंत्र में चुनाव का दिन देश और प्रदेश के भाग्य निर्माण का दिन होता है। विवेकपूर्ण निर्णय का दिन होता है। अपने लिए नहीं, अपनी सन्तान के भविष्य को ध्यान में रखकर निर्णय किया जाना चाहिए। उनको विकास तथा सुखी जीवन का वातावरण मिलता रहे। ऐसे निर्णयों में भावुकता, आसक्ति (धर्म और जाति के प्रति) एक बड़ी रुकावट होती है। यही तो वह कारण है कि आजादी के ७० साल बाद भी हम उसी भाषा में बोल रहे हैं। भारतीय चिंतन की दिशा कभी भी ऐसी नहीं रही।

भारतीय चिन्तन की मूलधारा के अनुसार तो-‘हर व्यक्ति अपने आप में एक स्वतंत्र जीव है। स्वतंत्र ही उसके कर्म और भाग्य हैं। अपने किए का फल भी उसी को भोगना पड़ता है, चाहे किसी के नाम से करे।’ व्यक्ति ही समाज और देश की इकाई होता है। समाज सभ्यता है, संस्कृति नहीं होता। समय के साथ बदलता है। हमारा खाना-पीना, पहनावा, जीवन शैली यहां तक कि सपने भी वैश्विक हो गए। समाज का मूल स्वरूप नहीं होता, बदलता जाता है। आने वाली पीढिय़ां कम्प्यूटर पर होंगी। ‘कृत्रिम बुद्धि’ हावी होगी। समाज का नाम कुछ भी होगा। बल्कि सच तो यह है कि पूरा देश एक नया समाज होगा। विश्व के किसी विकसित देश को देख सकते हैं। हमें भी वैश्वीकरण की भाषा सीखनी होगी, तभी नए वातावरण का निर्माण होगा। हम स्वयं को मुक्ताकाश से-स्वतंत्र चिंतन से-जोड़ सकेंगे।

हमें उस नए समाज के लिए आज से ही वातावरण तैयार करना है। जीवन के हर पहलू का स्वरूप बदल चुका होगा। वही युवा सपनों का देश होगा। कोई भी वृक्ष एक दिन में फल नहीं देता। समाज को बदलने के लिए लंबा काल चाहिए। बदलाव तो आना ही है। वांछित दिशा में लाया जाए, स्वयं के श्रम और तप से लाया जाए तो सुखद होता है। मिठास होती है उसमें।

हमें निर्णय से पहले लोकतंत्र के क्षेत्रीय इतिहास को पढ़ लेना चाहिए। कितने लोगों को समाज ने जाति के नाम पर, धर्म के नाम पर जिताकर भेजा। समाज में उनकी भूमिका क्या रही और आज वे कहां खड़े हैं। समाज और उनके बीच संबंध क्या हो गए? क्या वे समाज को नए युग में ले जाने की चिंतन क्षमता रखते हैं, अथवा दारू और पैसा बांटकर पांच साल के लिए हमें बांध लेना चाहते हैं?

बीता समय लौटकर नहीं आता। हम आज अपने हालात से दु:खी हैं, क्योंकि हमने सही प्रतिनिधि का चुनाव नहीं किया था। भावनाओं में बह गए थे। इस बार शिक्षित और भावी कर्णधार होने का परिचय देना है। नई पीढ़ी को आपके निर्णय का पछतावा न हो, जैसा कि आज हम अनुभव कर रहे हैं। हमें स्वस्थ और सकारात्मक लोकतंत्र की स्थापना करनी है। हमारे चुनाव का प्रभाव पूरे प्रदेश पर पड़ता है। विधायक पूरे प्रदेश का हो जाता है। किसी पार्टी या समुदाय विशेष का नहीं रह जाता। अच्छा प्रतिनिधि प्रदेश में समुदाय का गौरव बढ़ाता है और प्रदेश के विकास में समुदाय की भूमिका निश्चित करता है।

बाहरी दुश्मनों से लोहा लेने के लिए तो हमारी सेना सीमाओं पर तैनात हैं। पर भीतर के दुश्मन वे हैं जो लोकतंत्र की जड़ों को खोखला कर रहे हैं। सोशल मीडिया भी उनमें से एक है। उस पर चल रही झूठी खबरों से सावधान रहना है। अन्य दुश्मनों से भी हमें निपटना है। लोकतंत्र के सैनिकों के रूप में इनसे लोहा लेने का आज सबसे बड़ा अवसर हमारे सामने है। इसलिए, आइए! संकल्प के साथ मतदान करें। प्रदेश आगे बढ़े, लोकतंत्र स्वस्थ रहे, मेरी पीढिय़ां भारत में रहकर सुखी रहें। देश छोडक़र भागने की न सोचें। देश आस्थावान बना रहे। सभी एक ही ईश्वर के बन्दे हैं। कार्यों के अनुरूप सामाजिक स्वरूप भिन्न हैं। हमारा नारा ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ है। भविष्य में भी बना रहे। हमारे मतदान से यही संदेश जाना चाहिए।

दिसम्बर 6, 2018

बचो फेक न्यूज से

दो हिन्दी भाषी प्रदेशों के विधानसभा चुनाव हो चुके। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में परिवर्तन की हवा चले तो आश्चर्य की बात नहीं होगी क्योंकि दोनों ही प्रदेशों की सरकारें 15-15 वर्ष पूरे कर चुकी हैं। राजस्थान में तो अभी एक कार्यकाल ही पूरा हुआ है। फिर भी चर्चा उठ रही है? फैसला तो मतदाता ही करेगा। चुनाव आयोग ने जनमत संग्रह पर भी रोक लगा रखी है। मैदान में या तो सोशल मीडिया है या फिर पेड-न्यूज की बाढ़ आई हुई है। फेक-न्यूज चलाने वालों को सोशल मीडिया पर गर्व हो रहा है। इस देश में चुनाव की गंभीरता का स्थान मनोरंजन ने ले लिया है। देश का भविष्य खिलवाड़ का विषय बनकर रह गया है। छींटाकशी करके सब हाथ झाड़ लेना चाहते हैं।

दोनों प्रदेशों के चुनाव पूर्ण हो जाने का एक लाभ राजस्थान को यह हुआ कि लगभग सारा इलेक्ट्रानिक मीडिया राजस्थान में फैल गया। इससे एक ओर जहां पर्यटन केन्द्रों की चर्चा बढ़ी, वहीं दूसरी ओर पानी, कृषि, महिला विकास जैसे विषयों की हकीकत भी देशभर में पहुंची। मीडिया पर लोग भरोसा करते हैं। उससे आशा करते हैं कि वह किसी ‘पक्ष’ से नहीं जुड़ेगा और निष्पक्षता से हकीकत को उजागर करेगा। किन्तु पिछले कुछ वर्षों से मीडिया का एक और स्वरूप तेजी से उभरा है-‘पक्षकार’ मीडिया का। इस तरह का मीडिया किसी न किसी राजनीतिक दल का पक्ष लेता है और उसके पक्ष में समाचार देता है। दिखावा निष्पक्षता का करता है, पर लोग जल्दी ही असलियत समझ जाते हैं। इनको कोई गंभीर नहीं मानता। सिर्फ मनोरंजन के रूप में लेते हैं। पर ऐसे पक्षकार मीडिया सम्पूर्ण मीडिया जगत की गरिमा जरूर घटा देते हैं।

ऐसे एक नहीं अनेक उदाहरण रोज हमारे सामने आते हैं। नामी क्रिकेटर और पंजाब सरकार में मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू पिछले दिनों अलवर गए। अपनी एक चुनावी सभा में। किसी ने नारा लगाया, पाकिस्तान मुर्दाबाद का। लेकिन एक चैनल पर वह चला पाकिस्तान जिंदाबाद का। मुद्दा बनना था, बना। सबने सिद्धु को निशाने पर लिया। लेकिन जब सिद्धू ने असलियत बताई, मानहानि के मुकदमे की धमकी दी, तब सुधार किया गया। इसी तरह की एक खबर सट्टा बाजार के सर्वे की आई। पूरी तरह मनगढ़ंत थी। लेकिन बड़ी सफाई से उस पर लोगो बीबीसी का लगा दिया।

सामान्य आदमी के लिए सर्वे पर भरोसा करना आसान हो गया। जब तक असलियत सामने आई, खबर हजारों आंखों से निकल गई। दोनों मामलों में सच सामने आया तो मीडिया-सोशल मीडिया की खूब थू-थू हुई। साख का खूब नुकसान हो गया।

चुनाव प्रचार में फेक-न्यूज के ऐसे मामलों ने मीडिया की गरिमा घटाई है। उच्च पदों के लिए अनर्गल भाषा का प्रयोग पहले किसी चुनाव में ऐसा नहीं देखा जाता था। आज नेताओं से ज्यादा सोशल मीडिया की आलोचना हो रही है। कितना कूड़ा इधर से उधर फेंका जा रहा है, मानो देश में सकारात्मक संवाद बचा ही नहीं। न हम देशवासियों को शिक्षित करना चाहते हैं, न ही अपना सही परिचय देना चाहते हैं। धन के बदले नागरिकों को भ्रामक सूचनाएं देना मीडिया को देशभक्त तो नहीं बना सकता। तब स्थिति ऐसी बनकर उभरी कि भ्रामक समाचार कोई तैयार करवा रहा है, परोसने का कार्य मीडिया कर रहा है। यह व्यापार खूब फल-फूल रहा है। भले ही यह लोकतंत्र के लिए कितना भी घातक है।

राजस्थान के चुनावों को सट्टा बाजार ने भी एक पक्षीय बना रखा है। पिछले लगभग एक माह से सट्टा-बाजार कांग्रेस की एक तरफा जीत के आंकड़े प्रसारित कर रहा है। देश का सारा मीडिया इसके आगे फेल है। सट्टा-बाजार ने सारा गुड़-गोबर कर रखा है। इस पर लोगों का करोड़ों रुपयों का दावं लगा हुआ है और इसकी सूचना पर शंका नहीं होती। न इस पर किसी प्रकार का नियंत्रण संभव है, न ही इसे चुनाव आयोग अथवा कानून ही रोक पाया है। इसको गलत साबित करने के लिए कई मीडिया-सीरीज चलाई जा चुकी हैं। युवा भ्रमित नहीं हुआ।

लेकिन मीडिया की साख अवश्य सिमटकर रह गई। सट्टा-बाजार किसी एक स्थान पर केन्द्रित नहीं होता, जैसा कि शेयर बाजार है। देश के हर बड़े शहर में इसके भाव उपलब्ध रहते हैं। भाव भी लगभग एक जैसे ही होते हैं। तभी तो आप देश में कहीं से भी दांव लगा सकते हैं।

कभी-कभी तो पक्षकार मीडिया में फेक न्यूज इतनी जोर-शोर से प्रकाशित करवाई जाती हैं कि वे निष्पक्ष मीडिया के सच को ढक लेती हैं। सौ झूठ के बीच एक सच भी झूठा पड़ जाता है। भले ही बाद में परिणाम उसे सच सिद्ध कर दें। चुनाव में मीडिया की भूमिका इतनी बढ़ गई है कि यदि मीडिया अपना थोड़ा सा स्वार्थ छोड़ दे, तो देश विकास में छलांगें लगाने लगेगा। अगली पीढ़ी के मीडिया कर्मी को सम्मान मिलेगा। आज मीडिया संचालक का जनता से कोई नाता नहीं है। वह सिमटकर सरकारों में शामिल रहना चाहता है। जिस दिन जनता उससे नाता तोड़ लेगी, उसका अस्तित्त्व ही खो जाएगा।

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